बीते दिनों दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में सम्पन्न हुए जी- 20 समूह की शिखर बैठक में वैश्विक स्तर पर निर्धनता,और भुखमरी के खिलाफ एक नया वैश्विक गठबंधन ने आकार लिया और इसे "भूख और गरीबी के विरुद्ध वैश्विक गठबंधन" का नाम दिया गया।
ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा की दिमागी उपज यह गठबंधन 2023 में सम्पन्न हुए G20 की नई दिल्ली शिखर सम्मेलन 2023 में अपनाए गए खाद्य सुरक्षा और पोषण 2023 पर "डेक्कन उच्च स्तरीय सिद्धांतों " के कार्यान्वयन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इस पहल का मुख्य ध्येय नकदी हस्तांतरण,स्कूल भोजन और किसानों को सहायता देने पर केंद्रित है।
वैश्विक सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाएँ गरीबी उन्मूलन और सतत विकास के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख पहलों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये योजनाएँ उन परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और पर्यावरणीय संरक्षण जैसे कार्यों को पूरा करने की शर्तें पूरी करते हैं। ये कार्यक्रम न केवल तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के शिक्षा(एसडीजी 4), स्वास्थ्य (एसडीजी 3), और गरीबी उन्मूलन (एसडीजी 1) जैसे सतत विकास लक्ष्यों को भी बढ़ावा देते हैं।
रियो में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'सामाजिक समावेशन तथा भूख और गरीबी के विरुद्ध लड़ाई' विषय पर एक सत्र को संबोधित किया तथा इससे निपटने भारत के अनूठे अनुभवों और सफलता को रेखांकित करते हुए इस गठबंधन को भारत का समर्थन दिया।
लक्ष्य/उद्देश्य:
इस वैश्विक गठबंधन का मुख्य लक्ष्य सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप 2030 तक भुखमरी और गरीबी को जड़ से मिटाना है ।
इसका मुख्य उद्देश्य सहयोग और संसाधन जुटाने को बढ़ावा देते हुए सभी देशों को एफएओ भूख मानचित्र से हटाना है।
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https://www.fao.org/interactive/hunger-map-2024-embed-light/en/
गरीबी,भुखमरी से निजात और समग्र पोषण मानव विकास और कल्याण के लिए एक मूलभूत शर्त है। पर्याप्त और संतोषप्रद भोजन और भोजन तक आसान पहुंच को न्यायविद नैसर्गिक मानव अधिकार की श्रेणी में रखते है। समग्र पोषण मानव और सामाजिक पूंजी में निवेश का प्रतिनिधित्व करता है।
इन तीनों समस्या से मुक्त होकर ही किसी देश में मानव पूंजी की ठोस स्थापना और घरेलू और सामुदायिक कल्याण का एक अहम निर्धारक तत्व बन सकता है,जो राष्ट्र के समावेशी विकास का आधार बनता है।
इटली की राजधानी रोम में 1996 में आयोजित विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन में,विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों ने इसी कड़ी में मानव विकास को अवरुद्ध करने वाले अवयव "भूख और उसके विभिन्न प्रकारों" से लड़ने पर अपनी सामूहिक सहमति व्यक्त की। इस शिखर सम्मेलन के संकल्प के रूप में, 2015 तक भूख और भुखमरी को आधा करने लक्ष्य बनाया था जिसे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास की अवधारणा में 2030 तक पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया है।
भूख और गरीबी के खिलाफ वैश्विक गठबंधन: यह मुख्य रूप से यह सरकारों,अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, गैर सरकारी संगठनों और अन्य हितधारकों का एक स्वैच्छिक गठबंधन है जो संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों के गरीबी (SDG 1) भुखमरी (SDG 2) को मिटाने,तथा असमानताओं को कम करने (SDG 10) और अन्य परस्पर जुड़े SDG का समर्थन करने की दिशा में कार्य कर रहा है।
इसके लिए महत्वपूर्ण स्तंभ हैं – ज्ञान, वित्त और ज्ञान।
जबकि इसके उद्देश्य पर सूक्ष्मता से गौर करें तो यह राजनीतिक प्रतिबद्धता,संसाधन जुटाना,घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय समर्थन को एक साथ लाना,मार्गदर्शक रूपरेखा रेखांकित करना और इसके उन्मूलन के विविध रणनीतियाँ को साझा करने के सिद्धांत पर कार्य करेगा
इसमें सहयोग की बात की जाय तो : यह गठबंधन सभी इच्छुक संयुक्त राष्ट्र सदस्य और पर्यवेक्षक राज्यों, विभिन्न विकास साझेदारों तथा ज्ञान आधारित संस्थानों के लिये खुला है। इसके प्रमुख योगदानकर्त्ताओं जैसे खाद्य और कृषि संगठन (FAO), यूनिसेफ, विश्व खाद्य कार्यक्रम, विश्व बैंक और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने अपनी सहमति देते हुए इसमें शामिल होने की हामी भरी है।
वर्तमान संघर्षरत विश्व में यह गठबंधन वैश्विक सरकारों को ऐसी नीतियों को लागू करने के लिये निश्चित रूप से प्रोत्साहित करेगी जो तमाम सामाजिक सुरक्षा,खाद्य सुरक्षा,गरीबी,भुखमरी सबके लिए समग्र पोषण जैसे पंचभुजीय नैसर्गिक मूल अधिकार को सुनिश्चित करती है और सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूप जिससे व्यापक वैश्विक स्थिरता एजेंडे में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।
किसी भी गठबंधन के सफलता के लिए एक मजबूत और टिकाऊ वित्तपोषण तंत्र की आवश्यकता होती है,जो इस गठबंधन के लिए भी जरूरी है फिलहाल मौजदा संसाधन जुटाना,मिश्रित वित्तपोषण,रियायती सह-वित्तपोषण और साझेदारी जैसे नवीन वित्तपोषण दृष्टिकोणों जैसे मॉडलों के जरिए इस गठबंधन की नीतियों के कार्यान्वयन का समर्थन करने के लिये प्रोत्साहित किया जा साथ है।
इसके अतिरिक्त आधिकारिक विकास सहायता (ODA),बहुपक्षीय विकास बैंक (MDB),वैश्विक कृषि एवं खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम (GAFSP),विशेष आहरण अधिकार (SDR) की सहायता लेने की आवश्यकता होगी क्योंकि ये तमाम मंच गरीबी,भुखमरी और कुपोषण के उच्च स्तर का सामना कर रहे देशों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये विशेष कोष और वित्त मुहैया कराते हैं,बशर्ते विकसित देश इसमें अड़ंगा न डाले।
इससे पूर्व अमेरिकी प्रभुत्व वाले विकसित देशों के समूहों ने इतिहास में इस तरह के खूब अड़ंगे अटकाए हैं जिसे इतिहास में पढ़ा जा सकता है।
इसलिए विकसित देशों से यह विशेष आग्रह किया जाता है कि वे गरीबी, भुखमरी और कुपोषण के उच्च स्तर का सामना कर रहे तथाकथित तीसरी दुनिया देश जो सही मायने में वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देश है,की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अपनी आधिकारिक विकास सहायता प्रतिबद्धताओं का पूर्णतः पालन करें क्योंकि ये देश ही आने वाले समय इन नवउपनिवेशी मानसिकता वाले विकसित देशों का विस्तृत बाजार बनेगा।
भारत के प्रयास
भारत,जो कभी खाद्यान्नों का शुद्ध आयातक था, वर्तमान में अब विशुद्ध रूप से निर्यातक देश बन चुका है। कोविड- 19 महामारी के दौरान, भारत ने अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से कुशलतापूर्वक खाद्यान्न वितरित किया, जिससे परिवारों को आपातकालीन सहायता मिली हालाँकि,भारत को कुपोषण और जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है।
अगर वैश्विक स्तर पर भारत की बात की जाय तो...
--- भारत ने पिछले एक दशक में 250 मिलियन लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। 800 मिलियन से अधिक लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न दिया जा रहा है।
--- 550 मिलियन लोग दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। अगर स्वास्थ्य क्षेत्र में देखा जाय तो 70 वर्ष से अधिक आयु के 60 मिलियन वरिष्ठ नागरिक भी मुफ्त स्वास्थ्य बीमा का लाभ उठा सकेंगे।
--- महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास और सामाजिक समावेश पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए, सूक्ष्म क्षेत्र की 300 मिलियन से अधिक महिला उद्यमियों को बैंकों से जोड़ा गया है और उन्हें ऋण तक पहुंच की सुविधा प्रदान की गई है।
--- दुनिया की सबसे बड़ी फसल बीमा योजना के तहत, 40 मिलियन से अधिक किसानों को 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर का लाभ मिला है।
--- किसान योजना के तहत, 110 मिलियन किसानों को 40 बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता दी गई है।
किसानों को 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संस्थागत ऋण दिया जा रहा है।
---भारत न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि पोषण पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके तहत सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 अभियान, जो एक एकीकृत पोषण सहायता कार्यक्रम है, गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों और किशोरियों के पोषण पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है।
---मिड डे मील योजना के माध्यम से स्कूल जाने वाले बच्चों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारत वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भी योगदान दे रहा है।जिसमें हाल ही में अफ्रीकी देशों मलावी, जाम्बिया और जिम्बाब्वे को मानवीय सहायता प्रदान की है।
भूख और गरीबी के खिलाफ वैश्विक गठबंधन की क्या भूमिका रहेगी।
संयुक्त राष्ट्र की विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (SOFI) 2022 रिपोर्ट के अनुसार: 2030 तक, लगभग 670 मिलियन लोग भूखमरी जबकि विश्व की जनसँख्या का लगभग आठ फीसद लोग पोषण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोविड- 19 के दौरान 2022 में अवरुद्ध विकास ने 148 मिलियन बच्चों को प्रभावित किया और 5 वर्ष से कम आयु के 45 मिलियन बच्चे स्टंटिंग (आयु के अनुपात में कम ऊँचाई) से पीड़ित थे।
इसके अतिरिक्त मध्यम खाद्य असुरक्षा का अनुभव करने वाले लोग आय या संसाधन की कमी के कारण स्वस्थ, संतुलित आहार प्राप्ति के लिए संघर्षरत हैं।
विश्व में 2022 में बढ़ती गरीबी और भुखमरी से पीड़ित लगभग 712 मिलियन लोग अत्यधिक गरीबी में रह रहे थे, जो वर्ष 2019 की तुलना में 23 मिलियन अधिक है और सबसे गरीब देशों (LLDC) में यह दर सबसे अधिक है।
इसके लिए विशेषज्ञ सतत् विकास लक्ष्यों (SDG), विशेष रूप से SDG 1 (गरीबी उन्मूलन) और 2 (भुखमरी को समाप्त करना) को प्राप्त करने के लिये मौजूदा वित्तपोषण में बढ़ता अंतराल और अतिरिक्त संसाधन जुटाने की असमर्थता की तत्काल आवश्यकता को जिम्मेदार मानते है।
इसके अतिरिक्त लिंग आधारित खाद्य असुरक्षा जिसमें पूरे विश्व में महज 26.7% महिलाएँ खाद्य सुरक्षा की स्थिति में हैं, जबकि 25.4% पुरुष पूरे विश्व में लैंगिक अंतर दिखाते हैं।अपर्याप्त प्रतिक्रियाएँ,अप्रभावी नीतियां अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा तथा सीमित संसाधन भुखमरी और कुपोषण के स्तर को बढ़ा रहे हैं, जिससे एक बड़ी सुभेद्य आबादी को उचित भोजन एवं स्वस्थ आहार जैसी मौलिक हक प्राप्त करने में असमर्थता हो रही है।
यहां विशेषज्ञ कई दफे गरीबी, भुखमरी तथा कुपोषण के त्रिकोण को, विशेष रूप से गरीबी का आर्थिक प्रभाव के रूप में विकासशील देशों के परिवारों,स्वास्थ्य प्रणालियों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर विपरीत प्रभावों के बारे में अपनी चिंता व्यक्त कर चुके है जो इसके चक्रीय प्रभाव राष्ट्र की उत्पादकता को कम करता है, सतत् विकास में बाधा डालता है तथा सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को उच्चतम स्तर पर ले जाता और बढ़ाता है।
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वर्तमान विश्व के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष,अस्थिरता और हालिया रूस यूक्रेन के मध्य संघर्ष के बीच नाभिकीय अस्त्रों के प्रयोग की आशंका के बादलों में विश्व में बढ़ती तीव्र खाद्य असुरक्षा, मानवीय संकट और कमज़ोर स्थिति के कारण संकट की रोकथाम, तैयारी एवं लचीलेपन में सुधार की फौरी आवश्यकता है।
खाद्य सुरक्षा और पोषण 2023 पर नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में डेक्कन उच्च स्तरीय सिद्धांत क्या हैं?
यह वैश्विक खाद्य सुरक्षा संकट एवं जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष तथा प्रणालीगत प्रभाव से निपटने को मान्यता देता है।
यह सिद्धांत वर्ष 2030 तक शून्य भूख (SDG 2) को प्राप्त करने के लिये एक ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर भी ज़ोर देता है। चूंकि G-20 समूह में महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था वाले देश हैं जिससे उनकी भूमिका महती हो जाती है खासकर प्रमुख कृषि उत्पादकों,उपभोक्ताओं और निर्यातकों के रूप में G-20 सदस्यों की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे वैश्विक खाद्य सुरक्षा एवं पोषण बढ़ाने के वैश्विक प्रयासों को सुदृढ़ बनाएँ।
यह मुख्यतः सप्तकोणीय सिद्धांत पर आधारित है: इसमें सात सिद्धांत शामिल हैं: मानवीय सहायता,पौष्टिक भोजन की उपलब्धता और पहुँच,जलवायु अनुकूल कृषि,मूल्य शृंखलाओं में अनुकूलन और समावेशिता,एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण: रोगाणुरोधी प्रतिरोध,नवाचार और डिजिटल प्रौद्योगिकी और ज़िम्मेदार निवेश की अवधारणा पर आधारित है।
आर्थिक और मानव क्षमताओं के विकास के उद्देश्यों और जरूरतों को लेकर अनेक विचार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचो पर पिछले चार दशकों में सर्वाधिक दिखाई पड़े हैं। पूंजीवादी मत के अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए संवृद्धि(Growth) को सबसे महत्त्वपूर्ण कारक मानते हैं वहीं समाजवादी झुकाव रखने वाले अर्थशास्त्री मानव क्षमताओं के विकास,जिसमें शिक्षा,स्वास्थ्य आदि शामिल हैं पर जोर देते हैं।
इसी कड़ी में कल्याणकारी राजनीति-आर्थिक विचारकों ने स्पष्ट रूप से माना कि किसी भी लोकतांत्रिक स्वस्थ और समावेशी समाज में भूख, कुपोषण और गरीबी के त्रिकोणीय दुष्चक्र से होने वाली मौतें केवल सरकार नहीं,समाज के लिए भी बेहद शर्म का विषय हैं क्योंकि ऐसा नहीं है कि भूख और बदहाली के हालात एक रात में ही पैदा हुए हैं।
इस तमाम मुद्दों से हमारी जंग तो बहुत पुरानी है हमें तो अंग्रेजी उपनिवेशवादियों द्वारा गरीबी,भुखमरी और कुपोषण अंग्रेजी विरासत में मिली थी।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज ने अपनी पुस्तक ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी’ में लिखते है कि "औपनिवेशिक काल में भारत की गरीबी, जो शायद इस देश की सर्वज्ञात बात थी, इतनी थी कि यूरोप और अमेरिका में माता-पिता अपने बच्चों को हिदायत देते थे कि भूखे मर रहे भारतीयों के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी की खातिर वे अपनी प्लेट में जूठन न छोड़ें। "
वहीं देश में कुपोषण और स्वास्थ्य के हालात को बताते हुए अर्थशास्त्री एंगस डीटन ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट स्केप हेल्थ वेल्थ एंड द ओरिजिन्स ऑफ इनइक्वलिटी’ में कहा है कि "यह संभव है कि सदी के मध्य के आसपास जन्मे भारतीयों का बचपन उतना ही अभावग्रस्त रहा हो, जितना इतिहास के नवपाषाण काल और उससे भी पहले आखेटकों के काल में,बड़े समूहों के बच्चों का था।"
ये तमाम उद्धरण बताते हैं कि आजाद भारत के सामने "भूख,गरीबी और कुपोषण" ही सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर मुंह बाये खड़ी थी, जिसे आजादी के बाद के चालीस सालों के सतत,पर सुस्त आर्थिक विकास और 1990 के बाद के तीव्र आर्थिक विकास के दौर में खत्म करने की कई कोशिशें हुई हैं। उसके बावजूद समस्या आज भी गहरी और जटिल बनी हुई है जिसे सरकार अत्यधिक संजीदगी के साथ इस कुचक्र से निकलने के लिए विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस "त्रिकोणीय दुष्चक्र" के चक्रव्यूह को एक भगीरथ संकल्प के साथ अनवरत रूप से वेधना चाह रही है।
समावेशी और लोक कल्याणकारी अर्थशास्त्र के अनुसार तमाम कल्याणकारी कार्य जिसमें "भूख, कुपोषण और गरीबी के बहुआयामी त्रिकोणीय दुष्चक्र" भी शामिल है,इसे रातों रात समाप्त नहीं किया जा सकता है, दरअसल यह एक ऐसा भगीरथ प्रयास है जो अनवरत चलता रहेगा तब तक जब तक एक भी व्यक्ति इसके दुष्चक्र से प्रभावित रहेगा।
इस अनवरत चलने वाली प्रक्रिया में वैश्विक रूप से तमाम सरकार और इससे जड़ से समाप्त करने वाली संस्थाएं,नीति निर्माण और निर्धारक तत्व को पूरे निष्ठा और भौगोलिक बाधाओं को पार करते हुए इससे पार पाना होगा। चूंकि भारत इन चुनौतियों से निपटने में पारंगत हो चुका है और उसकी अवधारणा विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम् के मूलमंत्र पर आधारित है और सही मायने भूख,गरीबी और कुपोषण का दंश क्या होता है इसे किसी को ,खासकर पश्चिमी देशों को बताने का रत्ती भर भी नैतिक अधिकार नहीं है। इसलिए वर्तमान विश्व की हालातों के मद्देनजर भारत समर्थित यह वैश्विक गठबंधन में निश्चित रूप से सुभेद्य आबादी की सुरक्षा के लिये लक्षित निवेश और समन्वित प्रतिक्रियाओं को सक्षम करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।
इसी के तहत एसडीजी इंडिया इंडेक्स 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार
वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत एसडीजी की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
नीति आयोग द्वारा जारी राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार 2015-16 से 2019-21 के बीच भारत में रिकॉर्ड 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी की जाल से बाहर हुए हैं।
नीति आयोग द्वारा की गई गणना के अनुसार, देश में 2005-06 के दौरान बहुआयामी गरीबी 55.3 प्रतिशत थी जो 2013-2014 में 29.2 फीसदी हो गई। अगले दस वर्षों यानी 2022-2023 में यह घटकर 11.3 फीसदी रह गई है।
पूरी रिपोर्ट/विस्तृत विवरण देखने /पढ़ने के लिए लिए नीचे दिए गए वेब लिंक पर क्लिक करें।
https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2024-07/SDA_INDIA.pdf
वहीं एक अन्य ताजा रिपोर्ट जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी “वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2024” में कहा गया है कि दुनिया में 110 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी में जीवन काट रहे हैं।रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में यह आंकड़ा 9.3 करोड़, इथियोपिया में 8.6 करोड़, नाइजीरिया में 7.4 करोड़ है। वहीं डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में 6.6 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से जूझ रहे हैं।
रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई है ,जो बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है, कि दुनिया में बहुआयामी गरीबी में जीवन गुजारने वालों में करीब आधे बच्चे हैं।
इसका अर्थ है कि विश्व में 18 वर्ष से कम आयु के करीब 58.4 करोड़ बच्चे बहुआयामी गरीबी का शिकार हैं,जो दुनिया में कुल बच्चों का करीब 28 फीसद है। जबकि दुनिया के 13.5 फीसदी वयस्क बहुआयामी गरीबी की चपेट में हैं।
गौरतलब है कि वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक का यह यह नवीनतम रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल (ओपीएचआई) द्वारा जारी किया गया है।
2024 के लिए जारी इस रिपोर्ट में 112 देशों से जुड़े आंकड़ों पर आधारित है।
पूरी रिपोर्ट/विस्तृत विवरण देखने /पढ़ने के लिए लिए नीचे दिए गए वेब लिंक पर क्लिक करें।
https://hdr.undp.org/content/2024-global-multidimensional-poverty-index-mpi#/indicies/MPI
पश्चिमी देशों की वैश्विक दबाव समूह की संस्था के रूप में कार्य करने वाले तथाकथित गैरसरकारी संगठन Concern Worldwide and Welthungerhilfe की ओर से प्रकाशित वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) 2024 में 127 देशों में भारत 105वें स्थान पर रखा है ,जो भूख के 'गंभीर' स्तर को दर्शाता है । उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट में आश्चर्यजनक रूप से भारत का जीएचआई स्कोर 27.3 बताया गया है।
भूख और कुपोषण से मुक्ति और यह नया वैश्विक गठबंधन:
एक बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ यह नवीन गठबंधन को अपने सभी हितधारकों को एक व्यापक बहुस्तरीय रणनीति निर्माण और उसे जमीनी हकीकत तक पहुंचाने की सबसे बड़ी चुनौती और आवश्यकता है।
इसके लिए इसमें शामिल तमाम सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रम को पर्याप्त वित्तीय सहायता के साथ अमली जामा पहनना सुभेद्य और कमज़ोर जनसँख्या के लिए एक मजबूत सुरक्षा जाल सुनिश्चित करना होगा।
पारिस्थितिकी और पर्यावरण की सुरक्षा करते हुए खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने वाली प्रथाओं को बढ़ावा देते हुए संधारणीय कृषि को अपनाना। एक बेहतर और अधिक समावेशी और संधारणीय विश्व का निर्माण करने के लिए
खाद्य जाल और उससे प्रणालियों में परिवर्तन लाना । भूख, गरीबी और कुपोषण के त्रिकोण से निजात पाने और आपदाओं के प्रति लचीलापन बनाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण कृषि में पर्याप्त निवेश करना।
सुभेद्य जनसँख्या,विशेष रूप से बच्चों के लिए सुरक्षा जाल सुनिश्चित करना, ताकि सुरक्षित और पौष्टिक भोजन तक उनकी पहुँच आसानी से बहुआयामी पोषण सुनिश्चित किया जा सके
वर्तमान विश्व को एक समावेशी,संधारणीयऔर सतत खाद्य प्रणालियों की आवश्यकता है जो पोषण को प्राथमिकता दें, अन्न की बर्बादी को कम करें और लचीलेपन को बढ़ावा दें और सबके लिए भोजन उपलब्ध कराए इसके लिए हमें अपनी खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता होगी।
हम उम्मीद करते है कोविड-19 महामारी के बाद और मौजूदा वैश्विक चुनौतियों और संघर्ष के साए में इस तरह के एक वैश्विक गठबंधन की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी जो भूख और गरीबी उन्मूलन प्रयासों पर नए सिरे से कार्रवाई की इच्छाशक्ति रखता हो और इन मुद्दों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संसाधनों के साथ देशों को जोड़ता हो।
अब एक नजर वैश्विक स्तर पर जारी सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाओं पर : जो गरीबी उन्मूलन,भुखमरी कुपोषण से निजात दिलाने और सतत विकास के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख पहलों का महत्वपूर्ण पहल का अभिन्न हिस्सा हैं।
इस कड़ी में सबसे पहले बात राष्ट्रपति लूला के महादेश
दक्षिण अमेरिका में चल रहे सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाओं की।
दक्षिण अमेरिका।
ब्राज़ील - बोल्सा फैमिलिया (अब ऑक्सीलियो ब्रासिल)
(Bolsa Família (now Auxílio Brasil)
केंद्रबिंदु: शिक्षा, स्वास्थ्य,और पोषण।
क्षेत्र: स्कूल में उपस्थिति,टीकाकरण, और प्रसवपूर्व देखभाल।
मैक्सिको - प्रॉस्पेरा (पूर्व में प्रोग्रेसा और ऑपोर्तुनिडाडेस) Prospera (formerly Progresa and Oportunidades)
केंद्र: शिक्षा, स्वास्थ्य, और पोषण।
क्षेत्र: स्कूल में उपस्थिति और नियमित स्वास्थ्य जांच।
कोलम्बिया - फैमिलियाज एन अक्शन (Familias en Acción)
केंद्र: शिक्षा और स्वास्थ्य।
क्षेत्र: स्कूल में उपस्थिति और बच्चों की वृद्धि की निगरानी।
चिली - चिली सोलिडारियो( Chile Solidario)
केंद्र: व्यापक गरीबी उन्मूलन।
क्षेत्र: परिवार-आधारित सहायता कार्यक्रमों में भागीदारी।
इक्वाडोर - बोनो डे डेसारोलो ह्यूमनोBono de Desarrollo Humano (BDH)
शुरू: 2003
क्षेत्र: बच्चों का स्कूल में नामांकन और उपस्थिति।
होंडुरास - प्रोग्रामा डि असिग्नासिओन फैमिलियर( Programa de Asignación Familiar(PRAF)
शुरू: 1990
क्षेत्र: स्वास्थ्य केंद्र की यात्राएं और स्कूल में नामांकन।
पराग्वे - टेकोपोर(Tekoporã)
शुरू: 2005
क्षेत्र : स्कूल में उपस्थिति और बच्चों के लिए स्वास्थ्य जांच।
निकारागुआ - रेड डि प्रोटेक्शन सोशल Red de Protección Social (RPS)
शुरू: 2000
क्षेत्र: स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण,और स्कूल में उपस्थिति
एशिया
भारत - जननी सुरक्षा योजना (Janni Surakaha Yojna)
शुरू: 2005
शर्तें: संस्थागत प्रसव और माताओं के लिए प्रसवपूर्व देखभाल।
फिलीपींस - पंताविड पामिल्यांग फिलीपिनो प्रोग्राम(Pantawid Pamilyang Pilipino Program (4Ps)
केंद्र: शिक्षा और स्वास्थ्य।
शर्तें: स्कूल में उपस्थिति, नियमित स्वास्थ्य जांच, और बच्चों के लिए डीवॉर्मिंग।
इंडोनेशिया - प्रोग्राम केलुआर्गा हरपन Program Keluarga Harapan (PKH)
केंद्र: स्वास्थ्य, शिक्षा, और कल्याण।
शर्तें: स्कूल में उपस्थिति,प्रसवपूर्व देखभाल और बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं।
पाकिस्तान - बेनज़ीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम Benazir Income Support Programme (BISP)
केंद्र: शिक्षा और महिलाओं का सशक्तिकरण।
शर्तें: बच्चों का नामांकन और स्कूल में उपस्थिति।
बांग्लादेश - प्राथमिक शिक्षा छात्रवृत्ति परियोजना (Primary Education Stipend Project (PESP)
केंद्र: शिक्षा।
शर्तें: नियमित स्कूल उपस्थिति और न्यूनतम प्रदर्शन स्तर।
श्रीलंका - समृद्धि कार्यक्रम (Samurdhi Program)
शुरू: 1995
शर्तें: परिवारों को शिक्षा और स्वरोजगार कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।
कंबोडिया - मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए CCT for Maternal and Child Health (MCCT)
शुरू: 2016
शर्तें: माताओं और छोटे बच्चों के लिए स्वास्थ्य और पोषण सेवाएं।
थाईलैंड - शिक्षा और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम (Education and Poverty Reduction Programs)
लक्ष्य: स्कूल नामांकन और उपस्थिति में सुधार के लिए।
नेपाल - बाल अनुदान कार्यक्रम (Child Grant Program)
शुरू: 2009
क्षेत्र: बच्चों के पोषण और स्कूल नामांकन में सुधार के लिए।
पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व
तुर्की - सशर्त नकद हस्तांतरण कार्यक्रम Conditional Cash Transfer Program (CCTP)
शुरू: 2001
शर्तें: स्कूल में उपस्थिति और स्वास्थ्य जांच।
अफ्रीका
केन्या - अनाथ और सुभेद्य बच्चों के लिए नकद हस्तांतरणCash Transfer for Orphans and Vulnerable Children (CT-OVC)
शुरू: 2004
शर्तें: अनाथों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा।
दक्षिण अफ्रीका - बाल सहायता अनुदान(Child Support Grant (CSG)
शुरू: 1998
शर्तें: पहले बिना शर्त,बाद में स्कूल उपस्थिति से जोड़ा गया।
मलावी - सामाजिक नकद हस्तांतरण कार्यक्रम(Social Cash Transfer Programme (SCTP)
शुरू: 2006
शर्तें: पोषण और शिक्षा परिणामों में सुधार।
घाना - गरीबी के खिलाफ आजीविका सशक्तिकरणLivelihood Empowerment Against Poverty (LEAP)
शुरू: 2008
शर्तें: स्वास्थ्य जांच और स्कूल नामांकन।
ज़ाम्बिया - सामाजिक नकद हस्तांतरण योजना (Social Cash Transfer Scheme)
शुरू: 2003
शर्तें: स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी, सबसे गरीब परिवारों को लक्षित करती है।
इथियोपिया - Productive Safety Net Program (PSNP)
शुरू: 2005
शर्तें: सार्वजनिक कार्य या स्वास्थ्य और शिक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति।
नाइजीरिया - गृहस्थ उत्थान कार्यक्रम - सशर्त नकद हस्तांतरण Household Uplifting Programme - Conditional Cash Transfer (HUP-CCT)
शुरू: 2016
शर्तें: स्कूल में उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच।
युगांडा - सामाजिक संरक्षण कार्यक्रम(Expanding Social Protection Program (ESPP)
शुरू: 2010
केंद्र: कमजोर परिवार।
मिस्र - तकाफुल और करामा(Takaful and Karama)
शुरू: 2015
शर्तें: शिक्षा में भागीदारी और मातृ स्वास्थ्य देखभाल।
उच्च आय वाले देश।
संयुक्त राज्य अमेरिका - जरूरतमंद परिवारों के लिए अस्थायी सहायता कार्यक्रम(Temporary Assistance for Needy Families (TANF)
शुरू: 1996
शर्तें: रोजगार,शिक्षा,प्रशिक्षण।
ऑस्ट्रेलिया - मूलनिवासियों के लिए सशर्त आय सहायता कार्यक्रम(Aboriginal Conditional Income Support Programs)
शर्तें: स्वदेशी आबादी में शिक्षा और स्वास्थ्य।
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