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Sunday, December 08, 2024

इसरो की अनूठी सफलता।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने बीते गुरुवार यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) के बहुप्रतीक्षित प्रोबा- 3 (PROBA-3) अंतरिक्षयान को अपने सबसे भरोसेमंद बाहुबली कहे जाने वाले पीएसएलवी C-59 प्रक्षेपण यान की सहायता से पूरी सटीकता के साथ उसके निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक प्रमोचित किया।

प्रोबा 3 विश्व का प्रथम उन्नत सटीक फॉर्मेशन फ्लाइंग मिशन (Advanced Precision Formation Flying Techniques) है।



इसरो इस मिशन को बीते  बुधवार सायं 4 बजकर 8 मिनट पर लॉन्च करने वाला था, लेकिन इसके प्रोपल्शन सिस्टम में आई विसंगति का समय रहते पता चलने के कारण इसके प्रक्षेपण को एक दिन के लिए टाल दिया गया था।

Due to an anomaly detected in PROBA-3 spacecraft PSLV-C59/PROBA-3 launch rescheduled to tomorrow at 16:12 hours.


इन उपग्रहों को भारत के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से पीएसएलवी-XL लॉन्चर के माध्यम से "स्टैक कॉन्फ़िगरेशन" में एक साथ ESA के प्रोबा-3 उपग्रहों को उच्च अण्डाकार कक्षा में सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया। 


लॉन्चर से अलग होने के लगभग तुरंत बाद इसने ऑस्ट्रेलिया में "यथारग्गा"स्थित स्पेस स्टेशन ने इससे संकेत प्राप्त करना शुरू कर दिया। टेलीमेट्री संबंधित आंकड़े बेल्जियम में ईएसए के मिशन नियंत्रण केंद्र में प्राप्त होना शुरू हो गया है। 




इसरो ने यह उड़ान अपनी वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (NSIL) और ईएसए के सहयोग से सफलतापूर्वक पूरा किया। इसमें PSLV-C59/PROBA-3, जो ISRO,NSIL और ESA का सहयोग है।

PSLV-C59/Proba-3 Mission - Liftoff, PSOM Separation, Stage Ignition & Satellite Separation Video


प्रोबा, जो 'ऑनबोर्ड एनाटॉमी के लिए परियोजना' को संदर्भित करता है, का लैटिन में अर्थ "आओ प्रयास करें" भी है, जो इसरो और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के बीच नए सहयोग के लिए एक उपयुक्त शब्द है।


प्रोबा-3 मिशन के जरिए वैज्ञानिक सूर्य के अंदरूनी और बाहरी कोरोना के बीच बने काले घेरे का। अध्ययन करेंगे। 


सूर्य के कोरोना का तापमान 20 लाख डिग्री फेरनहाइट तक जाता है। सालाना उठने वाले सोलर फ्लेयर्स की चपेट में आकर अंतरिक्ष  में उपग्रह संचार, नौवहन प्रणाली और पृथ्वी पर पावर ग्रिडों को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं। ये सौर तूफान मुख्य रूप से सूर्य के कोरोना के कारण से ही उत्पन्न होते हैं, जो सूर्य की सतह से कहीं ज़्यादा गर्म है।


सूर्य का कोरोना सूर्य के वायुमंडल का सबसे बाहरी हिस्सा है। कोरोना आमतौर पर सूर्य की सतह की चमकदार रोशनी से छिपा रहता है। इसलिए विशेष उपकरणों का उपयोग किए बिना इसे देखना मुश्किल होता है। हालाँकि, कोरोना को पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान देखा जा सकता है ।


पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान, चंद्रमा पृथ्वी और सूर्य के बीच से गुजरता है। जब ऐसा होता है, तो चंद्रमा सूर्य की चमकदार रोशनी को रोक लेता है। तब ग्रहणग्रस्त सूर्य के चारों ओर चमकता हुआ सफ़ेद कोरोना देखा जा सकता है।


वैज्ञानिकों के मुताबिक कोरोना, सूर्य से भी ज्यादा गर्म है और यहीं से अंतरिक्षीय वातावरण की उत्पत्ति होती है।


प्रोबा-3 मिशन, इसरो के क्रमशः 2001 और 2009 में प्रक्षेपित प्रोबा-1 और प्रोबा-2 पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों की अगली कड़ी के रूप में आया है।


PROBA-3 मिशन वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष मौसम के बारे में हमारे ज्ञान को और बेहतर बनाएगा और इन सौर प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा।


प्रोबा-3 (प्रोजेक्ट फॉर ऑनबोर्ड ऑटोनोमी) में दो उपग्रह हैं, जिनमें 2 अंतरिक्ष यानो ने एक साथ सफलतापूर्वक उड़ान भरी।


इस मिशन का उद्देश्य भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों का प्रदर्शन करना है।


PROBA-3 ESA का और दुनिया का पहला सटीक "फॉर्मेशन फ्लाइंग" मिशन है।

इस मिशन का मुख्य उद्देश्य 

दो अंतरिक्ष यानों को एक निश्चित संरचना में "बड़े कठोर ढांचे" की तरह उड़ाने का परीक्षण और प्रदर्शन करने में उसकी सहायता प्रदान करेगा ।


 ESA का लक्ष्य उन तकनीकों को भी प्रमाणन करना है ताकि भविष्य में फॉर्मेशन फ्लाइंग जैसी तकनीकों को और उपयोग में लाया जा सके।


इन दोनो उपग्रहों के  सूर्य के बाहरी कोरोना या सौर किरीट के कमजोर हिस्सों का अध्ययन करने के लिए किया जाएगा, खासतौर पर सौर रिम के पास। यह इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य है। 


Proba 3 एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन है जिसे जनरल सपोर्ट टेक्नोलॉजी प्रोग्राम(GSTP) के माध्यम से वित्त पोषित किया गया है।


मिशन का प्रक्षेपण: इस मिशन का नेतृत्व यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) कर रही है, जिसे दिसंबर 2024 में लॉन्च किया जाना है, इस मिशन को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) के PSLV-XL रॉकेट द्वारा किया गया।



मिशन का उद्देश्य: इसका मुख्य उद्देश्य सूर्य के कोरोना के अभूतपूर्व अवलोकन को सक्षम करते हुए सटीक फॉर्मेशन फ्लाइंग का प्रदर्शन करना है।


घटक: प्रोबा-3 मिशन में दो छोटे उपग्रह कोरोनाग्राफ अंतरिक्ष यान (Coronagraph Spacecraft) और ऑकुल्टर अंतरिक्ष यान (Occulter Spacecraft) शामिल हैं।


इस मिशन का उद्देश्य भविष्य के अंतरिक्ष अभियानों के लिए महत्वपूर्ण तकनीकों का प्रदर्शन करना है।

PROBA-3 ESA का और दुनिया का पहला सटीक "फॉर्मेशन फ्लाइंग" मिशन है। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य 

दो अंतरिक्ष यानों को एक निश्चित संरचना में "बड़े कठोर ढांचे" की तरह उड़ाने का परीक्षण और प्रदर्शन करने में उसकी सहायता प्रदान करेगा ।


 ESA का लक्ष्य उन तकनीकों को भी प्रमाणन करना है ताकि भविष्य में फॉर्मेशन फ्लाइंग जैसी तकनीकों को और उपयोग में लाया जा सके।


इन दोनो उपग्रहों के  सूर्य के बाहरी कोरोना या सौर किरीट के कमजोर हिस्सों का अध्ययन करने के लिए किया जाएगा, खासतौर पर सौर रिम के पास। यह इस मिशन का प्रमुख लक्ष्य है। 


Proba 3 एक प्रौद्योगिकी प्रदर्शन मिशन है जिसे जनरल सपोर्ट टेक्नोलॉजी प्रोग्राम(GSTP) के माध्यम से वित्त पोषित किया गया है.


प्रोबा-3 मिशन में दो उपग्रह शामिल हैं: 


1. कोरोनाग्राफ अंतरिक्षयान :सोलर कोरोनाग्राफ़ एक ऑप्टिकल उपकरण है जो एक ऑकल्टिंग डिस्क के ज़रिए कृत्रिम अंधेरे ग्रहण की स्थितियों को पुन: पेश करता है।

इसका वजन 340 किलोग्राम है। उच्च स्तरीय परिष्कृत उपकरणों से लैस,यह अंतरिक्ष यान कोरोना की उच्च-रिजॉल्यूशन वाली तस्वीरें लेगा, जिससे वैज्ञानिकों को इसकी जटिल संरचनाओं, गतिशीलता और सौर विस्फोटों जैसे कि: कोरोनल मास इजेक्शन (Coronal Mass Ejections-CME) को संचालित कर प्रक्रियाओं का अध्ययन करने में मदद मिलेगी।


---- कोरोनाग्राफ सूरज की दिशा में खड़ा होगा और लेजर और विजुअल बेस्ड टारगेट को निर्धारित करेगा जिसमें ASPIICS यानी एसोसिएशन ऑफ स्पेसक्राफ्ट फॉर पोलैरीमेट्रिक और इमेंजिंग इन्वेस्टिंगेशन ऑफ कोरोना ऑफ द सन को माउंट किया गया है।


 ----इसके अलावा इसमें 3DEES यानी 3डी इनरजेटिक इलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रोमीटर भी लगाया गया है जो सूर्य के बाहरी और अंदरूनी कोरोना के बीच के गैप का अध्ययन करेगा।



महत्त्व: कोरोनाग्राफ अंतरिक्ष यान कोरोना का विस्तार से निरीक्षण करके वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष मौसम के पीछे के तंत्र को बेहतर ढंग से समझने में मदद करेगा, जिसका पृथ्वी की तकनीक और बुनियादी ढाँचे पर महत्त्वपूर्ण प्रभाव पड़ सकता है।



2.ओक्ल्टर अंतरिक्षयान  240 किलोग्राम वजनी,प्रोबा-3 एक डिस्क के आकार वाला ,जिसे कोरोनाग्राफ अंतरिक्ष यान के लिए सूर्य को ब्लॉक करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

यह स्पेसक्राफ्ट कोरोनाग्राफ के ठीक पीछे रहेगा,जैसे ग्रहण में सूरज के सामने चंद्रमा और उसके पीछे धरती रहती है । इसमें लगाया गए DARA यानी डिजिटल एब्सोल्यूट रेडियोमीटर साइंस एक्सपेरीमेंट इंस्ट्रूमेंट कोरोना से मिलने वाले आकंड़े ,सोलर हवाओं और कोरोनल मास इजेक्शन का अध्ययन करेगा।

इस उपग्रह की मदद से वैज्ञानिक अंतरिक्ष के मौसम और सौर हवाओं के रुख और स्वभाव की जांच पड़ताल कर सकेंगे जिससे यह पता चल सके की  सूर्य का सोलर डायनेमिक्स क्या है? इसका हमारी धरती पर क्या असर होता है?


कोरोना के उच्च-रिजॉल्यूशन अवलोकन को सक्षम करने में ऑकल्टर अंतरिक्ष यान की महत्त्वपूर्ण भूमिका से वैज्ञानिकों को सौर भौतिकी और अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान में भी अपना महती योगदान देगी।


ऑकुल्टर’ अंतरिक्ष यान सूर्य की सौर डिस्क को अवरुद्ध कर 

एक ग्रहण जैसी घटना उत्पन्न करेगा,

जिससे ‘कोरोनाग्राफ’ को वैज्ञानिक अवलोकन के लिए सूर्य के कोरोना या आसपास के वातावरण का अध्ययन करने में वैज्ञानिकों को और बेहतर समझ और मदद मिलेगी,जो अंतरिक्ष के मौसम को नियंत्रित करता है। जहां एक उपग्रह सूर्य के चमकते हिस्से को अवरुद्ध करेगा,वहीं दूसरा जिससे दूसरे को सूर्य के बाहरी वातावरण या 'कोरोना' का विस्तारित अध्ययन करने में मदद मिलेगी।


सालाना उठने वाले सोलर फ्लेयर्स की चपेट में आकर अंतरिक्ष  में उपग्रह संचार, नौवहन प्रणाली और पृथ्वी पर पावर ग्रिडों को बुरी तरह प्रभावित कर सकती हैं। ये सौर तूफान मुख्य रूप से सूर्य के कोरोना के कारण से ही उत्पन्न होते हैं, जो सूर्य की सतह से कहीं ज़्यादा गर्म है।

PROBA-3 मिशन वैज्ञानिकों को अंतरिक्ष मौसम के बारे में हमारे ज्ञान को और बेहतर बनाएगा और इन सौर प्रक्रियाओं में महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर्दृष्टि प्रदान करेगा।


 प्रोबा-3 मिशन, इसरो के क्रमशः 2001 और 2009 में प्रक्षेपित प्रोबा-1 और प्रोबा-2 पृथ्वी अवलोकन उपग्रहों की अगली कड़ी के रूप में आया है।


सूरज के चारों तरफ मौजूद एक विशाल गैप का अध्ययन करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी ।


ये दोनों उपग्रह एकसाथ एक रेखीय समरूप 150 मीटर की दूरी पर पृथ्वी का घूर्णन करते  हुए सूर्य के बाह्यतम भाग का अध्ययन करेंगे।

सूर्य के बाह्यतम भाग को अगर सूक्ष्मता से निरीक्षण किया जाए तो आप यहां पर दो तरह के कोरोना को देख सकते हैं।


जिसे तकनीकी तौर पर हाई कोरोना और लो कोरोना कहा जाता है, जिसका फिलहाल कई उपग्रह इसका अध्ययन कर रहे हैं लेकिन इनके बीच के गैप का अध्ययन यानी उस काले हिस्से की समुचित जांच पड़ताल प्रोबा-03 करेगा।

प्रोबा-03 में लगा ASPIICS इंस्ट्रूमेंट की वजह से इस काले गैप का अध्ययन आसान हो जाएगा।


PROBA-3 उपग्रह पर मौजूद कोरोनाग्राफ को ASPIICS कहा जाता है, जिसे  बेल्जियम, चेक गणराज्य, ग्रीस, इटली, आयरलैंड, पोलैंड और रोमानिया के यूरोपीय संस्थानों और अंतरिक्ष उद्योगों के एक समूह द्वारा विकसित किया गया है। ASPIICS का अभूतपूर्व दृश्य क्षेत्र इसे सौर कोरोना के अध्ययन के लिए अद्वितीय बनाता है, क्योंकि यह सौर EUV इमेजर्स और पारंपरिक अंतरिक्ष कोरोनाग्राफ के दृश्य क्षेत्रों के बीच के महत्वपूर्ण अवलोकनीय अंतर को समाप्त करने में संभवतः सक्षम हो सकेगा






 प्रोबा-3 यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ESA) का एक सटीक फॉर्मेशन फ्लाइंग मिशन है, जो कक्षा में दो उपग्रहों को इस तरह संरेखित करता है कि सूर्य के सामान्य रूप से अदृश्य सौर कोरोना का भी विस्तारित दृश्यता प्राप्त  किया जा सके। इनका परीक्षण  बेल्जियम के रेडवायर में प्री-फ्लाइट परीक्षण में किया गया है।


यह  "डुअल-सैटेलाइट"अब तक के सबसे महत्वाकांक्षी Proba परिवार के मिशनों में से एक है। दोनों उपग्रह एक साथ एकजुट होकर उड़ान भरी और उनकी स्थिति मिलीमीटर के हिस्से वाले भाग तक सटीक रहेगी।इस प्रक्षेपण में दो उपग्रह, कोरोनाग्राफ और ऑकुल्टर,एक दूसरे से महज 150 मीटर की दूरी पर एक साथ यात्रा कर रहे हैं,जो अपने आप एक अनूठी वैज्ञानिक उपलब्धि है ।


इन उपग्रहों पर लगे उपकरण सौर परिधि की एक बार में लगभग छह घंटे यात्रा करेंगे और प्रत्येक अंतरिक्ष यान पृथ्वी की कक्षा में 19.7 घंटे की परिक्रमा करेगा इसमें 60,530 किमी का हाई अर्थ ऑर्बिट यानि अप भू: (पृथ्वी से सबसे दूरस्थ बिंदु) और 600 किमी का उप भू:(पृथ्वी से सबसे निकटतम बिंदु) होगा।




पीएसएलवी ही क्यों: इसरो ने संभवतः PSLV को इसकी अतिउत्कृष्ट सफलता दर और न्यून विफलता दर के कारण चुना गया है।पीएसएलवी इसरो का चार चरणों वाला प्रमोचन यान है, जिसे सूर्य-समकालिक कक्षा (Sun Synchronus Orbit) और भू-स्थानांतरण कक्षा (Ground Transfer Orbit) में उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। इसके शानदार प्रदर्शन पर गौर करें तो हम पाते हैं कि यह ठोस और तरल प्रणोदन चरणों का उपयोग करता है जो इसे अत्यधिक विश्वसनीय और सफल मिशनों का साबित ट्रैक रिकॉर्ड है जो एक साथ कई उपग्रहों को लॉन्च करने में सक्षम है।

इसके माध्यम से अब तक किए गए 60 प्रक्षेपण में से  57 सफल रहे हैं, जिससे यह छोटे और मध्यम पे लोड/उपग्रहों के लिए राइड शेयर सेवाओं का प्रमुख प्रदाता बन गया है।






कोरोनल मास इजेक्शन :(Coronal Mass Ejections-CME) :.


*CME सूर्य के कोरोना से अंतरिक्ष में प्लाज्मा और चुंबकीय क्षेत्रों का बड़े पैमाने पर उत्सर्जन है।

कारण: वे सूर्य के चुंबकीय क्षेत्रों के अचानक पुनर्गठन से ट्रिगर होते हैं, जिससे ऊर्जा का विस्फोटक उत्सर्जन होता है।


आवृत्ति : CME सूर्य के सौर चक्र के चरम के दौरान अधिक बार होते हैं।,एक  सौर चक्र लगभग 11-वर्षीय होता है।


विशेषताएँ: CME में अरबों टन आवेशित कण (प्लाज्मा) अपने में समावेशित किए होते हैं, जो सैकड़ों से लेकर हजारों किलोमीटर प्रति सेकंड की गति से यात्रा करते हैं।



पृथ्वी पर प्रभाव।


उपग्रह व्यवधान: CME उपग्रह इलेक्ट्रॉनिक्स और संचार,दूरसंचार प्रणालियों को नुकसान पहुँचा सकते हैं और GPS तथा संचार प्रणालियों को प्रभावित कर सकते हैं।


भू-चुंबकीय तूफान: CME भू-चुंबकीय तूफान उत्पन्न कर सकते हैं, जो क्रिटिकल अवसंरचना जैसे  बिजली ग्रिड और रेडियो और उपग्रह आधारित टेलीविजन संचार प्रणालियों को को बाधित करते हैं।

Solar Storm Impact on the Solar System arguably more so every other planet than earth.


ऑरोरा: CME ऑरोरा को तीव्र करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप ध्रुवों के पास शानदार दिखने वाले रंग बिरंगे प्रकाश का दीदार  होते है।


प्रोबा-3 मिशन के उद्देश्य की बात करें तो इसे भविष्य के मल्टी-सैटेलाइट कॉन्फ़िगरेशन मिशनों के लिए दो उपग्रहों की सटीक संयुक्त उड़ान को सफलतापूर्वक प्रदर्शित करने योग्य बनाया गया है।




आगे की राह

इस अभियान के जरिए वैज्ञानिक एक लंबे समय से चले आ रहे इस सोलर कोरोना के अबूझ रहस्य को सुलझाना है जैसे सौर कोरोना सूर्य से भी अधिक गर्म क्यों है? 

यह सूर्य की सतह के बहुत करीब होने वाली संरचना, गतिशीलता और तापन प्रक्रिया का अवलोकन करना। 

यह सूर्य और उसके वायुमंडल के बीच की अंतःक्रिया के बारे में हमारी समझ को और परिष्कृत करेगा।


ASPIICS (Association of Spacecraft for Polarimetry and Imaging Investigation of the Corona of the Sun) कोरोनल मास इजेक्शन (CME) का अध्ययन करने में भी सक्षम बनाएगा। सूर्य की ओर गर्म पदार्थ के ये विशाल इजेक्शन अंतरिक्ष के मौसम को कैसे नियंत्रित करते हैं और क्या पृथ्वी तक इनका नगण्य प्रभाव हो सकता है?

 इसे एक वैज्ञानिक श्रेणी के उपकरण के रूप में विकसित किया गया है जो पृथ्वी के विकिरण बेल्ट में इलेक्ट्रॉन स्पेक्ट्रा को भी मापेगा।







Sunday, November 24, 2024

भूख और गरीबी के विरुद्ध वैश्विक गठबंधन से दुनिया को आस

बीते दिनों दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील के रियो डि जेनेरियो में सम्पन्न हुए जी- 20 समूह की शिखर बैठक में वैश्विक स्तर पर निर्धनता,और भुखमरी के खिलाफ एक नया वैश्विक गठबंधन ने आकार लिया और इसे "भूख और गरीबी के विरुद्ध वैश्विक गठबंधन" का नाम दिया गया।

ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला दा सिल्वा की दिमागी उपज यह गठबंधन 2023 में सम्पन्न हुए G20 की नई दिल्ली शिखर सम्मेलन 2023 में अपनाए गए खाद्य सुरक्षा और पोषण 2023 पर "डेक्कन उच्च स्तरीय सिद्धांतों " के कार्यान्वयन की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण कदम है। इस पहल का मुख्य ध्येय नकदी हस्तांतरण,स्कूल भोजन और किसानों को सहायता देने पर केंद्रित है।




वैश्विक सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाएँ गरीबी उन्मूलन और सतत विकास के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख पहलों का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये योजनाएँ उन परिवारों को वित्तीय सहायता प्रदान करती हैं, जो शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल और पर्यावरणीय संरक्षण जैसे कार्यों को पूरा करने की शर्तें पूरी करते हैं। ये कार्यक्रम न केवल तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान करते हैं, बल्कि संयुक्त राष्ट्र के शिक्षा(एसडीजी 4), स्वास्थ्य (एसडीजी 3), और गरीबी उन्मूलन (एसडीजी 1) जैसे सतत विकास लक्ष्यों को भी बढ़ावा देते हैं।


रियो में भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 'सामाजिक समावेशन तथा भूख और गरीबी के विरुद्ध लड़ाई' विषय पर एक सत्र को संबोधित किया तथा इससे निपटने  भारत के अनूठे अनुभवों और सफलता को रेखांकित करते हुए इस गठबंधन को भारत का समर्थन दिया।





लक्ष्य/उद्देश्य:

इस वैश्विक गठबंधन का मुख्य लक्ष्य सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के अनुरूप 2030 तक भुखमरी और गरीबी को जड़ से मिटाना है ।

इसका मुख्य उद्देश्य सहयोग और संसाधन जुटाने को बढ़ावा देते हुए सभी देशों को एफएओ भूख मानचित्र से हटाना है। 


पूरी रिपोर्ट/विस्तृत विवरण देखने /पढ़ने के लिए लिए नीचे दिए गए वेब लिंक पर क्लिक करें।

 https://www.fao.org/interactive/hunger-map-2024-embed-light/en/



गरीबी,भुखमरी से निजात और समग्र पोषण मानव विकास और कल्याण के लिए एक मूलभूत शर्त है। पर्याप्त और संतोषप्रद भोजन और भोजन तक आसान पहुंच को न्यायविद नैसर्गिक मानव अधिकार की श्रेणी में रखते है। समग्र पोषण मानव और सामाजिक पूंजी में निवेश का प्रतिनिधित्व करता है।

इन तीनों समस्या से मुक्त होकर ही किसी देश में मानव पूंजी की ठोस स्थापना और घरेलू और सामुदायिक कल्याण का एक अहम निर्धारक तत्व बन सकता है,जो राष्ट्र के समावेशी विकास का आधार बनता है।


इटली की राजधानी रोम में 1996 में आयोजित विश्व खाद्य शिखर सम्मेलन में,विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों और क्षेत्रीय प्रतिनिधियों ने इसी कड़ी में मानव विकास को अवरुद्ध करने वाले अवयव "भूख और उसके विभिन्न प्रकारों" से लड़ने पर अपनी सामूहिक सहमति व्यक्त की। इस शिखर सम्मेलन के संकल्प के रूप में, 2015 तक भूख और भुखमरी को आधा करने लक्ष्य बनाया था जिसे संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास की अवधारणा में 2030 तक पूरी तरह समाप्त करने का संकल्प लिया है।


भूख और गरीबी के खिलाफ वैश्विक गठबंधन: यह मुख्य रूप से यह सरकारों,अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, गैर सरकारी संगठनों और अन्य हितधारकों का एक स्वैच्छिक गठबंधन है जो संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों के गरीबी (SDG 1) भुखमरी (SDG 2) को मिटाने,तथा असमानताओं को कम करने (SDG 10) और अन्य परस्पर जुड़े SDG का समर्थन करने की दिशा में कार्य कर रहा है।


इसके लिए  महत्वपूर्ण स्तंभ हैं – ज्ञान, वित्त और ज्ञान।

जबकि इसके उद्देश्य पर सूक्ष्मता से गौर करें तो यह राजनीतिक प्रतिबद्धता,संसाधन जुटाना,घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय समर्थन को एक साथ लाना,मार्गदर्शक रूपरेखा रेखांकित करना और इसके उन्मूलन के विविध रणनीतियाँ को साझा करने के सिद्धांत पर कार्य करेगा








इसमें सहयोग की बात की जाय तो : यह गठबंधन सभी इच्छुक संयुक्त राष्ट्र सदस्य और पर्यवेक्षक राज्यों, विभिन्न विकास साझेदारों तथा ज्ञान आधारित संस्थानों के लिये खुला है। इसके प्रमुख योगदानकर्त्ताओं जैसे खाद्य और कृषि संगठन (FAO), यूनिसेफ, विश्व खाद्य कार्यक्रम, विश्व बैंक और अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों ने अपनी सहमति देते हुए इसमें शामिल होने की हामी भरी है।


वर्तमान संघर्षरत विश्व में यह गठबंधन वैश्विक सरकारों को ऐसी नीतियों को लागू करने के लिये निश्चित रूप से प्रोत्साहित करेगी जो तमाम सामाजिक सुरक्षा,खाद्य सुरक्षा,गरीबी,भुखमरी सबके लिए समग्र पोषण जैसे पंचभुजीय नैसर्गिक मूल अधिकार को सुनिश्चित करती है और सतत् विकास लक्ष्यों के अनुरूप जिससे व्यापक वैश्विक स्थिरता एजेंडे में अपना महत्वपूर्ण योगदान देती हैं।


किसी भी गठबंधन के सफलता के लिए एक मजबूत और टिकाऊ वित्तपोषण तंत्र की आवश्यकता होती है,जो इस गठबंधन के लिए भी जरूरी है फिलहाल मौजदा संसाधन जुटाना,मिश्रित वित्तपोषण,रियायती सह-वित्तपोषण और साझेदारी जैसे नवीन वित्तपोषण दृष्टिकोणों जैसे मॉडलों के जरिए इस गठबंधन की नीतियों के कार्यान्वयन का समर्थन करने के लिये प्रोत्साहित किया जा साथ है।

इसके अतिरिक्त आधिकारिक विकास सहायता (ODA),बहुपक्षीय विकास बैंक (MDB),वैश्विक कृषि एवं खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम (GAFSP),विशेष आहरण अधिकार (SDR) की सहायता लेने की आवश्यकता होगी क्योंकि ये तमाम मंच गरीबी,भुखमरी और कुपोषण के उच्च स्तर का सामना कर रहे देशों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये विशेष कोष और वित्त मुहैया कराते हैं,बशर्ते विकसित देश इसमें अड़ंगा न डाले।

इससे पूर्व अमेरिकी प्रभुत्व वाले विकसित देशों के समूहों ने इतिहास में इस तरह के खूब अड़ंगे अटकाए हैं जिसे इतिहास में पढ़ा जा सकता है।

इसलिए विकसित देशों से यह विशेष आग्रह किया जाता है कि वे गरीबी, भुखमरी और कुपोषण के उच्च स्तर का सामना कर रहे तथाकथित तीसरी दुनिया देश जो सही मायने में वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) के देश है,की मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये अपनी आधिकारिक विकास सहायता प्रतिबद्धताओं का पूर्णतः पालन करें क्योंकि ये देश ही आने वाले समय इन नवउपनिवेशी मानसिकता वाले विकसित देशों का विस्तृत बाजार बनेगा।






भारत के प्रयास

भारत,जो कभी खाद्यान्नों का शुद्ध आयातक था, वर्तमान में अब विशुद्ध रूप से निर्यातक देश बन चुका है। कोविड- 19 महामारी के दौरान, भारत ने अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से कुशलतापूर्वक खाद्यान्न वितरित किया, जिससे परिवारों को आपातकालीन सहायता मिली हालाँकि,भारत को कुपोषण और जलवायु परिवर्तन से संबंधित चुनौतियों का भी सामना करना पड़ रहा है। 


अगर वैश्विक स्तर पर भारत की बात की जाय तो...


--- भारत ने पिछले एक दशक में 250 मिलियन लोगों को गरीबी से बाहर निकाला है। 800 मिलियन से अधिक लोगों को निःशुल्क खाद्यान्न दिया जा रहा है।


--- 550 मिलियन लोग दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना से लाभान्वित हो रहे हैं। अगर स्वास्थ्य क्षेत्र में देखा जाय तो 70 वर्ष से अधिक आयु के 60 मिलियन वरिष्ठ नागरिक भी मुफ्त स्वास्थ्य बीमा का लाभ उठा सकेंगे। 


--- महिलाओं के नेतृत्व वाले विकास और सामाजिक समावेश पर अपना ध्यान केंद्रित करते हुए, सूक्ष्म क्षेत्र की 300 मिलियन से अधिक महिला उद्यमियों को बैंकों से जोड़ा गया है और उन्हें ऋण तक पहुंच की सुविधा प्रदान की गई है।

--- दुनिया की सबसे बड़ी फसल बीमा योजना के तहत, 40 मिलियन से अधिक किसानों को 20 बिलियन अमेरिकी डॉलर का लाभ मिला है।


--- किसान योजना के तहत, 110 मिलियन किसानों को 40 बिलियन डॉलर से अधिक की सहायता दी गई है।

किसानों को 300 बिलियन अमेरिकी डॉलर का संस्थागत ऋण दिया जा रहा है।


---भारत न केवल खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित कर रहा है, बल्कि पोषण पर भी ध्यान केंद्रित कर रहा है। इसके तहत सक्षम आंगनवाड़ी एवं पोषण 2.0 अभियान, जो एक एकीकृत पोषण सहायता कार्यक्रम है, गर्भवती महिलाओं, नवजात शिशुओं, 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों और किशोरियों के पोषण पर विशेष ध्यान केंद्रित करता है। 


---मिड डे मील योजना के माध्यम से स्कूल जाने वाले बच्चों की पोषण संबंधी आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। भारत वैश्विक खाद्य सुरक्षा में भी योगदान दे रहा है।जिसमें हाल ही में अफ्रीकी देशों मलावी, जाम्बिया और जिम्बाब्वे को मानवीय सहायता प्रदान की है।


भूख और गरीबी के खिलाफ वैश्विक गठबंधन की क्या भूमिका रहेगी।


संयुक्त राष्ट्र की विश्व में खाद्य सुरक्षा और पोषण की स्थिति (SOFI) 2022 रिपोर्ट के अनुसार: 2030 तक, लगभग 670 मिलियन लोग भूखमरी जबकि विश्व की जनसँख्या का लगभग आठ फीसद लोग पोषण के लिए संघर्ष कर रहे हैं। कोविड- 19 के दौरान 2022 में अवरुद्ध विकास ने 148 मिलियन बच्चों को प्रभावित किया और 5 वर्ष से कम आयु के 45 मिलियन बच्चे स्टंटिंग (आयु के अनुपात में कम ऊँचाई) से पीड़ित थे।

 इसके अतिरिक्त मध्यम खाद्य असुरक्षा का अनुभव करने वाले लोग आय या संसाधन की कमी के कारण स्वस्थ, संतुलित आहार प्राप्ति के लिए संघर्षरत हैं। 

विश्व में 2022 में बढ़ती गरीबी और भुखमरी से पीड़ित लगभग 712 मिलियन लोग अत्यधिक गरीबी में रह रहे थे, जो वर्ष 2019 की तुलना में 23 मिलियन अधिक है और सबसे गरीब देशों (LLDC) में यह दर सबसे अधिक है। 

इसके लिए विशेषज्ञ सतत् विकास लक्ष्यों (SDG), विशेष रूप से SDG 1 (गरीबी उन्मूलन) और 2 (भुखमरी को समाप्त करना) को प्राप्त करने के लिये मौजूदा वित्तपोषण में बढ़ता अंतराल और अतिरिक्त संसाधन जुटाने की असमर्थता की तत्काल आवश्यकता को जिम्मेदार मानते है।


इसके अतिरिक्त लिंग आधारित खाद्य असुरक्षा जिसमें पूरे विश्व में महज 26.7% महिलाएँ खाद्य सुरक्षा की स्थिति में हैं, जबकि 25.4% पुरुष पूरे विश्व में लैंगिक अंतर दिखाते हैं।अपर्याप्त प्रतिक्रियाएँ,अप्रभावी नीतियां अपर्याप्त सामाजिक सुरक्षा तथा सीमित संसाधन भुखमरी और कुपोषण के स्तर को बढ़ा रहे हैं, जिससे एक बड़ी सुभेद्य आबादी को उचित भोजन एवं स्वस्थ आहार जैसी मौलिक हक प्राप्त करने में असमर्थता हो रही है।

यहां विशेषज्ञ कई दफे गरीबी, भुखमरी तथा कुपोषण के त्रिकोण को, विशेष रूप से गरीबी का आर्थिक प्रभाव के रूप में विकासशील देशों के परिवारों,स्वास्थ्य प्रणालियों और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्थाओं पर विपरीत प्रभावों के बारे में अपनी चिंता व्यक्त कर चुके है जो इसके चक्रीय प्रभाव राष्ट्र की उत्पादकता को कम करता है, सतत् विकास में बाधा डालता है तथा सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को उच्चतम स्तर पर ले जाता और बढ़ाता है।


पूरी रिपोर्ट/विस्तृत विवरण देखने /पढ़ने के लिए लिए नीचे दिए गए वेब लिंक पर क्लिक करें।

https://www.fao.org/publications/home/fao-flagship-publications/the-state-of-food-security-and-nutrition-in-the-world/en


वर्तमान विश्व के विभिन्न हिस्सों में संघर्ष,अस्थिरता और हालिया रूस यूक्रेन के मध्य संघर्ष के बीच नाभिकीय अस्त्रों के प्रयोग की आशंका के बादलों में  विश्व में बढ़ती तीव्र खाद्य असुरक्षा, मानवीय संकट और कमज़ोर स्थिति के कारण संकट की रोकथाम, तैयारी एवं लचीलेपन में सुधार की फौरी आवश्यकता है।


खाद्य सुरक्षा और पोषण 2023 पर नई दिल्ली शिखर सम्मेलन में डेक्कन उच्च स्तरीय सिद्धांत क्या हैं?


यह वैश्विक खाद्य सुरक्षा संकट एवं जलवायु परिवर्तन, भू-राजनीतिक तनाव, संघर्ष तथा प्रणालीगत प्रभाव से निपटने को मान्यता देता है।

यह सिद्धांत वर्ष 2030 तक शून्य भूख (SDG 2) को प्राप्त करने के लिये एक ठोस कार्रवाई की आवश्यकता पर भी ज़ोर देता है। चूंकि G-20 समूह में महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्था वाले देश हैं जिससे उनकी भूमिका महती हो जाती है खासकर प्रमुख कृषि उत्पादकों,उपभोक्ताओं और निर्यातकों के रूप में G-20 सदस्यों की सामूहिक ज़िम्मेदारी बनती है कि वे वैश्विक खाद्य सुरक्षा एवं पोषण बढ़ाने के वैश्विक प्रयासों को सुदृढ़ बनाएँ।


यह मुख्यतः सप्तकोणीय सिद्धांत पर आधारित है: इसमें सात सिद्धांत शामिल हैं: मानवीय सहायता,पौष्टिक भोजन की उपलब्धता और पहुँच,जलवायु अनुकूल कृषि,मूल्य शृंखलाओं में अनुकूलन और समावेशिता,एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण: रोगाणुरोधी प्रतिरोध,नवाचार और डिजिटल प्रौद्योगिकी और ज़िम्मेदार निवेश की अवधारणा पर आधारित है।


आर्थिक और मानव क्षमताओं के विकास के उद्देश्यों और जरूरतों को लेकर अनेक विचार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचो पर पिछले चार दशकों में सर्वाधिक दिखाई पड़े हैं। पूंजीवादी मत के अर्थशास्त्री आर्थिक विकास के लिए संवृद्धि(Growth) को सबसे महत्त्वपूर्ण कारक मानते हैं वहीं समाजवादी झुकाव रखने वाले अर्थशास्त्री मानव क्षमताओं के विकास,जिसमें शिक्षा,स्वास्थ्य आदि शामिल हैं पर जोर देते हैं।

इसी कड़ी में कल्याणकारी राजनीति-आर्थिक विचारकों ने स्पष्ट रूप से माना कि किसी भी लोकतांत्रिक स्वस्थ और समावेशी समाज में भूख, कुपोषण और गरीबी  के त्रिकोणीय दुष्चक्र से होने वाली मौतें केवल सरकार नहीं,समाज के लिए भी बेहद शर्म का विषय हैं क्योंकि ऐसा नहीं है कि भूख और बदहाली के हालात एक रात में ही पैदा हुए हैं।

 इस तमाम मुद्दों से हमारी जंग तो बहुत पुरानी है हमें तो अंग्रेजी उपनिवेशवादियों द्वारा गरीबी,भुखमरी और कुपोषण अंग्रेजी विरासत में मिली थी।


प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन और ज्यां द्रेज ने अपनी पुस्तक ‘एन अनसर्टेन ग्लोरी’ में लिखते है कि "औपनिवेशिक काल में भारत की गरीबी, जो शायद इस देश की सर्वज्ञात बात थी, इतनी थी कि यूरोप और अमेरिका में माता-पिता अपने बच्चों को हिदायत देते थे कि भूखे मर रहे भारतीयों के प्रति अपनी नैतिक जिम्मेदारी की खातिर वे अपनी प्लेट में जूठन न छोड़ें। "


वहीं देश में कुपोषण और स्वास्थ्य के हालात को बताते हुए अर्थशास्त्री एंगस डीटन ने अपनी पुस्तक ‘द ग्रेट स्केप हेल्थ वेल्थ एंड द ओरिजिन्स ऑफ इनइक्वलिटी’ में कहा है कि "यह संभव है कि सदी के मध्य के आसपास जन्मे भारतीयों का बचपन उतना ही अभावग्रस्त रहा हो, जितना इतिहास के नवपाषाण काल और उससे भी पहले आखेटकों के काल में,बड़े समूहों के बच्चों का था।"

ये तमाम उद्धरण बताते हैं कि आजाद भारत के सामने "भूख,गरीबी और कुपोषण" ही सबसे बड़ी चुनौती के तौर पर मुंह बाये खड़ी थी, जिसे आजादी के बाद के चालीस सालों के सतत,पर सुस्त आर्थिक विकास और 1990 के बाद के तीव्र आर्थिक विकास के दौर में खत्म करने की कई कोशिशें हुई हैं। उसके बावजूद समस्या आज भी गहरी और जटिल बनी हुई है जिसे सरकार अत्यधिक संजीदगी के साथ इस कुचक्र से निकलने के लिए विभिन्न जन कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से इस "त्रिकोणीय दुष्चक्र" के चक्रव्यूह को एक भगीरथ संकल्प के साथ अनवरत रूप से वेधना चाह रही है।


समावेशी और लोक कल्याणकारी अर्थशास्त्र के अनुसार तमाम कल्याणकारी कार्य जिसमें "भूख, कुपोषण और गरीबी के बहुआयामी त्रिकोणीय दुष्चक्र" भी शामिल है,इसे रातों रात समाप्त नहीं किया जा सकता है, दरअसल यह एक ऐसा भगीरथ प्रयास है जो अनवरत चलता रहेगा तब तक जब तक एक भी व्यक्ति इसके दुष्चक्र से प्रभावित रहेगा।


इस अनवरत चलने वाली प्रक्रिया में वैश्विक रूप से तमाम सरकार और इससे जड़ से समाप्त करने वाली संस्थाएं,नीति निर्माण और निर्धारक तत्व को पूरे निष्ठा और भौगोलिक बाधाओं को पार करते हुए इससे पार पाना होगा। चूंकि भारत इन चुनौतियों से निपटने में पारंगत हो चुका है और उसकी अवधारणा विश्व बंधुत्व और वसुधैव कुटुंबकम् के मूलमंत्र पर आधारित है और सही मायने भूख,गरीबी और कुपोषण का दंश क्या होता है इसे किसी को ,खासकर पश्चिमी देशों को बताने का रत्ती भर भी नैतिक अधिकार नहीं है। इसलिए वर्तमान विश्व की हालातों के मद्देनजर भारत समर्थित यह वैश्विक गठबंधन में निश्चित रूप से सुभेद्य आबादी की सुरक्षा के लिये लक्षित निवेश और समन्वित प्रतिक्रियाओं को सक्षम करने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगा।

इसी के तहत एसडीजी इंडिया इंडेक्स 2023-24 की रिपोर्ट के अनुसार 

वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत एसडीजी की दिशा में आगे बढ़ रहा है।

नीति आयोग द्वारा जारी राष्ट्रीय बहुआयामी गरीबी सूचकांक के अनुसार 2015-16 से 2019-21 के बीच भारत में रिकॉर्ड 13.5 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी की  जाल से बाहर हुए हैं।

 नीति आयोग द्वारा की गई गणना के अनुसार, देश में 2005-06 के दौरान बहुआयामी गरीबी 55.3 प्रतिशत थी जो 2013-2014 में 29.2 फीसदी हो गई। अगले दस वर्षों यानी 2022-2023 में यह घटकर 11.3 फीसदी रह गई है।


पूरी रिपोर्ट/विस्तृत विवरण देखने /पढ़ने के लिए लिए नीचे दिए गए वेब लिंक पर क्लिक करें।

https://www.niti.gov.in/sites/default/files/2024-07/SDA_INDIA.pdf


वहीं एक अन्य ताजा रिपोर्ट जो संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी “वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक 2024” में कहा गया है कि दुनिया में 110 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी में जीवन काट रहे हैं।रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तान में यह आंकड़ा 9.3 करोड़, इथियोपिया में 8.6 करोड़, नाइजीरिया में 7.4 करोड़ है। वहीं डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो में 6.6 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से जूझ रहे हैं।


रिपोर्ट में इस बात की भी पुष्टि की गई है ,जो बेहद शर्मनाक और चिंताजनक है, कि दुनिया में बहुआयामी गरीबी में जीवन गुजारने वालों में करीब आधे बच्चे हैं।

इसका अर्थ है कि विश्व में 18 वर्ष से कम आयु के करीब 58.4 करोड़ बच्चे बहुआयामी गरीबी का शिकार हैं,जो दुनिया में कुल बच्चों का करीब 28 फीसद है। जबकि दुनिया के 13.5 फीसदी वयस्क बहुआयामी गरीबी की चपेट में हैं।


गौरतलब है कि वैश्विक बहुआयामी गरीबी सूचकांक का यह यह नवीनतम रिपोर्ट संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) और ऑक्सफोर्ड गरीबी और मानव विकास पहल (ओपीएचआई) द्वारा जारी किया गया है। 

2024 के लिए जारी इस रिपोर्ट में 112 देशों से जुड़े आंकड़ों पर आधारित है।


पूरी रिपोर्ट/विस्तृत विवरण देखने /पढ़ने के लिए लिए नीचे दिए गए वेब लिंक पर क्लिक करें।


https://hdr.undp.org/content/2024-global-multidimensional-poverty-index-mpi#/indicies/MPI


पश्चिमी देशों की वैश्विक दबाव समूह की संस्था के रूप में कार्य करने वाले तथाकथित गैरसरकारी संगठन Concern Worldwide and Welthungerhilfe की ओर से प्रकाशित  वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) 2024 में 127 देशों में भारत 105वें स्थान पर रखा है ,जो भूख के 'गंभीर' स्तर को दर्शाता है । उल्लेखनीय है कि इस रिपोर्ट में  आश्चर्यजनक रूप से भारत का जीएचआई स्कोर 27.3 बताया गया है।


भूख और कुपोषण से मुक्ति और यह नया वैश्विक गठबंधन:


एक बहुआयामी दृष्टिकोण के साथ यह नवीन गठबंधन को अपने सभी हितधारकों को एक व्यापक बहुस्तरीय रणनीति निर्माण और उसे जमीनी हकीकत तक पहुंचाने की सबसे बड़ी चुनौती और आवश्यकता है।


इसके लिए इसमें शामिल तमाम सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रम को पर्याप्त वित्तीय सहायता के साथ अमली जामा पहनना सुभेद्य और कमज़ोर जनसँख्या के लिए एक मजबूत सुरक्षा जाल सुनिश्चित करना होगा।


पारिस्थितिकी और पर्यावरण की सुरक्षा करते हुए खाद्य सुरक्षा को बढ़ाने वाली प्रथाओं को बढ़ावा देते हुए संधारणीय कृषि को अपनाना। एक बेहतर और अधिक समावेशी और संधारणीय विश्व का निर्माण करने के लिए

खाद्य जाल और उससे प्रणालियों में परिवर्तन लाना । भूख, गरीबी और कुपोषण के त्रिकोण से निजात पाने और आपदाओं के प्रति लचीलापन बनाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण कृषि में पर्याप्त निवेश करना।


सुभेद्य जनसँख्या,विशेष रूप से बच्चों के लिए सुरक्षा जाल सुनिश्चित करना, ताकि सुरक्षित और पौष्टिक भोजन तक उनकी पहुँच आसानी से बहुआयामी पोषण सुनिश्चित किया जा सके

वर्तमान विश्व को एक समावेशी,संधारणीयऔर सतत खाद्य प्रणालियों की आवश्यकता है जो पोषण को प्राथमिकता दें, अन्न की बर्बादी को कम करें और लचीलेपन को बढ़ावा दें और सबके लिए भोजन उपलब्ध कराए इसके लिए हमें अपनी खाद्य प्रणालियों में परिवर्तन करने की आवश्यकता होगी।


हम उम्मीद करते है कोविड-19 महामारी के बाद और मौजूदा वैश्विक चुनौतियों और संघर्ष के साए में इस तरह के एक वैश्विक गठबंधन की सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी जो भूख और गरीबी उन्मूलन प्रयासों पर नए सिरे से कार्रवाई की इच्छाशक्ति रखता हो और इन मुद्दों से प्रभावी ढंग से निपटने के लिए संसाधनों के साथ देशों को जोड़ता हो।





अब एक नजर वैश्विक स्तर पर जारी सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाओं पर : जो गरीबी उन्मूलन,भुखमरी कुपोषण से निजात दिलाने और सतत विकास के क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की प्रमुख पहलों का महत्वपूर्ण पहल का अभिन्न हिस्सा हैं।


इस कड़ी में सबसे पहले बात राष्ट्रपति लूला के महादेश 

दक्षिण अमेरिका में चल रहे सशर्त नकद हस्तांतरण (CCT) योजनाओं की।


दक्षिण अमेरिका।


ब्राज़ील - बोल्सा फैमिलिया (अब ऑक्सीलियो ब्रासिल) 

(Bolsa Família (now Auxílio Brasil)

केंद्रबिंदु: शिक्षा, स्वास्थ्य,और पोषण। 

क्षेत्र: स्कूल में उपस्थिति,टीकाकरण, और प्रसवपूर्व देखभाल।

मैक्सिको - प्रॉस्पेरा (पूर्व में प्रोग्रेसा और ऑपोर्तुनिडाडेस) Prospera (formerly Progresa and Oportunidades)

केंद्र: शिक्षा, स्वास्थ्य, और पोषण।

क्षेत्र: स्कूल में उपस्थिति और नियमित स्वास्थ्य जांच।


कोलम्बिया - फैमिलियाज एन अक्शन (Familias en Acción)

केंद्र: शिक्षा और स्वास्थ्य। 

क्षेत्र: स्कूल में उपस्थिति और बच्चों की वृद्धि की निगरानी।


चिली - चिली सोलिडारियो( Chile Solidario)


केंद्र: व्यापक गरीबी उन्मूलन। 

क्षेत्र: परिवार-आधारित सहायता कार्यक्रमों में भागीदारी।


इक्वाडोर - बोनो डे डेसारोलो ह्यूमनोBono de Desarrollo Humano  (BDH) 


शुरू: 2003 

क्षेत्र: बच्चों का स्कूल में नामांकन और उपस्थिति।


होंडुरास - प्रोग्रामा डि असिग्नासिओन फैमिलियर( Programa de Asignación Familiar(PRAF) 


शुरू: 1990 

क्षेत्र: स्वास्थ्य केंद्र की यात्राएं और स्कूल में नामांकन।


पराग्वे - टेकोपोर(Tekoporã)

 शुरू: 2005 

क्षेत्र : स्कूल में उपस्थिति और बच्चों के लिए स्वास्थ्य जांच।


निकारागुआ - रेड डि प्रोटेक्शन सोशल Red de Protección Social (RPS)

शुरू: 2000 

क्षेत्र: स्वास्थ्य जांच, टीकाकरण,और स्कूल में उपस्थिति


एशिया

भारत - जननी सुरक्षा योजना (Janni Surakaha Yojna) 

शुरू: 2005 

शर्तें: संस्थागत प्रसव और माताओं के लिए प्रसवपूर्व देखभाल।


फिलीपींस - पंताविड पामिल्यांग फिलीपिनो प्रोग्राम(Pantawid Pamilyang Pilipino Program (4Ps)

 केंद्र: शिक्षा और स्वास्थ्य। 

शर्तें: स्कूल में उपस्थिति, नियमित स्वास्थ्य जांच, और बच्चों के लिए डीवॉर्मिंग।


इंडोनेशिया - प्रोग्राम केलुआर्गा हरपन Program Keluarga Harapan (PKH)

 केंद्र: स्वास्थ्य, शिक्षा, और कल्याण। 

शर्तें: स्कूल में उपस्थिति,प्रसवपूर्व देखभाल और बच्चों के लिए स्वास्थ्य सेवाएं।


पाकिस्तान - बेनज़ीर इनकम सपोर्ट प्रोग्राम Benazir Income Support Programme (BISP)

केंद्र: शिक्षा और महिलाओं का सशक्तिकरण। 

शर्तें: बच्चों का नामांकन और स्कूल में उपस्थिति।


बांग्लादेश - प्राथमिक शिक्षा छात्रवृत्ति परियोजना (Primary Education Stipend Project (PESP) 

केंद्र: शिक्षा। 

शर्तें: नियमित स्कूल उपस्थिति और न्यूनतम प्रदर्शन स्तर।


श्रीलंका - समृद्धि कार्यक्रम (Samurdhi Program)

शुरू: 1995 

शर्तें: परिवारों को शिक्षा और स्वरोजगार कार्यक्रमों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है।


कंबोडिया - मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए CCT for Maternal and Child Health (MCCT)

शुरू: 2016

शर्तें: माताओं और छोटे बच्चों के लिए स्वास्थ्य और पोषण सेवाएं।


थाईलैंड - शिक्षा और गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम (Education and Poverty Reduction Programs)

लक्ष्य: स्कूल नामांकन और उपस्थिति में सुधार के लिए।


नेपाल - बाल अनुदान कार्यक्रम (Child Grant Program)

शुरू: 2009 

क्षेत्र: बच्चों के पोषण और स्कूल नामांकन में सुधार के लिए।


पश्चिम एशिया/मध्य पूर्व

तुर्की - सशर्त नकद हस्तांतरण कार्यक्रम Conditional Cash Transfer Program (CCTP) 

शुरू: 2001

 शर्तें: स्कूल में उपस्थिति और स्वास्थ्य जांच।


अफ्रीका

केन्या - अनाथ और सुभेद्य बच्चों के लिए नकद हस्तांतरणCash Transfer for Orphans and Vulnerable Children (CT-OVC)

शुरू: 2004 

शर्तें: अनाथों के लिए स्वास्थ्य और शिक्षा।


दक्षिण अफ्रीका - बाल सहायता अनुदान(Child Support Grant  (CSG) 

शुरू: 1998 

शर्तें: पहले बिना शर्त,बाद में स्कूल उपस्थिति से जोड़ा गया।


मलावी - सामाजिक नकद हस्तांतरण कार्यक्रम(Social Cash Transfer Programme  (SCTP)

शुरू: 2006 

शर्तें: पोषण और शिक्षा परिणामों में सुधार।

घाना - गरीबी के खिलाफ आजीविका सशक्तिकरणLivelihood Empowerment Against Poverty (LEAP) 

शुरू: 2008 

शर्तें: स्वास्थ्य जांच और स्कूल नामांकन।


ज़ाम्बिया - सामाजिक नकद हस्तांतरण योजना (Social Cash Transfer Scheme)

शुरू: 2003

 शर्तें: स्वास्थ्य और शिक्षा से जुड़ी, सबसे गरीब परिवारों को लक्षित करती है।


इथियोपिया - Productive Safety Net Program (PSNP) 

शुरू: 2005 

शर्तें: सार्वजनिक कार्य या स्वास्थ्य और शिक्षा आवश्यकताओं की पूर्ति।


नाइजीरिया - गृहस्थ उत्थान कार्यक्रम - सशर्त नकद हस्तांतरण Household Uplifting Programme - Conditional Cash Transfer (HUP-CCT) 

शुरू: 2016

 शर्तें: स्कूल में उपस्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच।


युगांडा - सामाजिक संरक्षण कार्यक्रम(Expanding Social Protection Program (ESPP) 

शुरू: 2010 

केंद्र: कमजोर परिवार।


मिस्र - तकाफुल और करामा(Takaful and Karama)

 शुरू: 2015

 शर्तें: शिक्षा में भागीदारी और मातृ स्वास्थ्य देखभाल।



उच्च आय वाले देश।


संयुक्त राज्य अमेरिका - जरूरतमंद परिवारों के लिए अस्थायी सहायता कार्यक्रम(Temporary Assistance for Needy Families  (TANF) 

शुरू: 1996 

शर्तें: रोजगार,शिक्षा,प्रशिक्षण।


ऑस्ट्रेलिया - मूलनिवासियों के लिए सशर्त आय सहायता कार्यक्रम(Aboriginal Conditional Income Support Programs)

 शर्तें: स्वदेशी आबादी में शिक्षा और स्वास्थ्य।






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