प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित होने वाले 20वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन और 18वें पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आगामी बुधवार इंडोनेशिया के लिए रवाना होंगे। इस वर्ष प्रधानमन्त्री की यह दूसरी इंडोनेशिया यात्रा है। इंडोनेशिया दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। प्रधानमंत्री आगामी सात सितंबर को शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। नई दिल्ली में आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन की वजह से प्रधानमन्त्री का यह बेहद संक्षिप्त दौरा होगा।
आसियान दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे प्रभावशाली और केंद्रीय समूह है इसके दस सदस्य देश है जिन्हे आसियान-10 कहा जाता है।
ये देश हैं : इंडोनेशिया,ब्रूनेई,कंबोडिया,फिलीपींस,लाओस,मलेशिया,म्यांमार,, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम।
इसके आठ डायलॉग पार्टनर देश हैं: रूस अमेरिका चीन, भारत,जापान,ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड और दक्षिण कोरिया।
आसियान-भारत: साझा मूल्य, समान नियति’
भारत-आसियान साझेदारी भले ही सिर्फ तीस साल पुरानी हो, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के रिश्ते दो सहस्राब्दियों से भी अधिक पुराने हैं। शांति एवं मित्रता,धर्म व संस्कृति,कला एवं वाणिज्य,भाषा और साहित्य के क्षेत्रों में अत्यंत प्रगाढ़ हो चुके ये चिरस्थायी रिश्ते अब भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की शानदार विविधता के हर पहलू में मौजूद हैं जिससे हमारे लोगों के बीच सहूलियत और अपनेपन का एक अनूठा आवरण बन गया है।
इसलिए विदेशमंत्री एस जयशंकर ने बीते जुलाई में अपनी इंडोनेशिया के यात्रा के दौरान कहा कि "आसियान भारत की एक्ट ईस्ट नीति और हिंद प्रशांत के व्यापक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह हिंद प्रशांत को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और भारत दृढ़ता के साथ आसियान का समर्थन करता है।"
इससे पूर्व भारत आसियान वर्ष 2018 में अपने गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित आसियान राष्ट्रप्रमुखों की मेजबानी कर चुका है।
आसियान-भारत शिखर सम्मेलन नियमित रूप से हर वर्ष आयोजित किया जाता है और यह भारत और आसियान के जुड़ाव को उच्चतम स्तर पर जुड़ने का अवसर प्रदान करता है।
बीते वर्ष 2022 में एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस (आसियान)- भारत मैत्री वर्ष मनाया गया, जो भारत के आसियान के साथ संवाद संबंधों की स्थापना की 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया गया और इसकी जिसकी परिणति आसियान- भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी (सीएसपी) के लिए रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने के रूप में हुई। वर्तमान में दोनो पक्ष 2021-2025 के लिए नई आसियान- भारत कार्ययोजना पर कार्य कर रहे हैं
प्राचीन काल से भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच मौजूद गहरे सभ्यतागत,सांस्कृतिक,आर्थिक संबंध रहे हैं
आसियान-भारत रणनीतिक साझेदारी दोनो पक्षों के साझा भौगोलिक,ऐतिहासिक और सामाजिक विकास के संबंधों की मजबूत नींव पर निर्मित है। आसियान समूह के देश भारतीय राजनय में "एक्ट ईस्ट नीति" और "हिंद प्रशांत नीति "में आसियान समूह एक व्यापक परिकल्पना का केन्द्रबिंदू है।
बीते वर्ष 2022 में आसियान-भारत के साझेदारी संबंधों के 30 वर्ष पूरे हो गए हैं।
भारत की एक्ट ईस्ट नीति आसियान समूह के साथ एक त्रिभुजाकार बिंदुओं पर केंद्रित है जो संयोजकता,व्यापार और संस्कृति पर जोर देती है ।
भारत और आसियान में अनेक संवाद तंत्र हैं जो नियमित रूप से वार्ता करते हैं, जिसमें एक शिखर सम्मेलन, मंत्रिस्तरीय बैठकें और वरिष्ठ अधिकारियों की बैठकें शामिल हैं।
व्यापार और वाणिज्य:आसियान,भारत का चौथा बड़ा व्यापारिक सहयोगी है और भारत के कुल व्यापार का करीब दस फीसद हिस्सेदार है। भारत ने बीते 2022 से आसियान सदस्य देशों के साथ पारस्परिक सहयोग के 30 साल का सफर पूरा किया। भारत और आसियान के बीच वर्ष 2022-23 में 131.5 अरब अमेरिकी डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ। वर्ष 2022-23 में भारत के कुल वैश्विक व्यापार में आसियान के साथ हुए व्यापार की हिस्सेदारी 11.3% थी।
भारत की एक्ट ईस्ट नीति के कारण पिछले दशक के दौरान व्यापार और निवेश संबंध भी बढ़े हैं। 2021-22 की अवधि के दौरान भारत और आसियान देशों के बीच व्यापारिक व्यापार बढ़कर 110.40 बिलियन $ हो गया। कुछ प्रमुख समझौते हुए हैं जो भारत-आसियान व्यापार संबंधों को बढ़ावा देने से जुड़े हैं।
भारत आसियान व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए)
ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम के साथ वस्तुओं, सेवाओं और निवेश में व्यापार समझौता किया है ।
जबकि भारत सिंगापुर व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए) 2005 में सिंगापुर के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद से भारत ने द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।
भारत थाईलैंड एफटीए - अर्ली हार्वेस्ट स्कीम (ईएचएस)।भारत और थाईलैंड ने मुक्त व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत के दौरान टैरिफ में कमी के लिए विशिष्ट उत्पादों की पहचान करने के लिए 2006 में अर्ली हार्वेस्ट स्कीम (ईएचएस) लागू की है। इसे प्रस्तावित व्यापक एफटीए का प्रारंभिक चरण माना जाता है।
भारत मलेशिया व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (MICECA)MICECA पर 2011 में भारत और मलेशिया के बीच हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते में कुछ वस्तुओं, सेवाओं, निवेशों और प्राकृतिक व्यक्तियों के आवागमन के व्यापार के लिए टैरिफ में रियायतें और कटौती शामिल है।
ऑलवेज फर्स्ट रिस्पांडर: भारत.
भारत ,आसियान समूह के लिए किसी भी प्रकार के आपदा और उससे निपटने के लिए सदैव फर्स्ट रेस्पांडर की भूमिका के निर्वहन के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़ा है। भारत अपने करीबी तथा दूर स्थित पड़ोसी देशों में संकट के समय सबसे पहले सहायता देने वाले देशों में से एक है। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) अभियानों या हेड्स ऑफ एशियन कोस्टगार्ड एजेंसीज़ मीटिंग (एचएसीजीएएम) के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत समुद्री खोज और बचाव के क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से इस क्षेत्र में सदैव क्षमता निर्माण को बढ़ाना चाहता है।
क्षेत्रीय एवं वैश्विक चुनौतियां
कोविड-19 महामारी के बहुआयामी प्रभावों, दक्षिण चीन सागर में विभिन्न आसियान देशों के साथ तनाव,जलवायु परिवर्तन, वैश्विक वित्तीय बाजार में अत्यधिक अस्थिरता, महंगाई के दबाव और भू-राजनीतिक और रणनीतिक तनाव पर अपने-अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। दोनों ही पक्षों ने आपसी सहयोग के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा,स्वास्थ्य और वित्तीय स्थिरता की पहचान के साथ साथ हालिया चीन का अपना नया नक्शा जारी करने के बाद आसियान देशों से आती कठोर प्रतिक्रिया के बीच दोनो पक्षों को अपने संबंधों को एक नई दिशा देने की आवश्कता है
हिंद प्रशांत क्षेत्र और आसियान : भौगोलिक रूप से आसियान समूह के देश हिन्द–प्रशांत क्षेत्र के केंद्र में स्थित है, जो पूर्व की तुलना में वर्तमान परिस्थितियों अत्यधिक विवादित और वैश्विक शक्तियों के बीच संघर्षों का तप्त स्थल बनता जा रहा है । आसियान समूह द्विपक्षीय,क्षेत्रीय और बहुपक्षीय स्तरों पर हिन्द–प्रशांत देशों के साथ कार्य कर रहा है। हिन्द–प्रशांत के प्रति चीन की अति संवेदनशीलता को देखते हुए दक्षिण पूर्व एशिया के देश अध्रुवीकृत थे और अनमने ढंग से अनाधिकारिक रूप से इस अवधारणा का समर्थन करने को अनिच्छुक भी थे।
हालांकि,बीते एक दशकों से जब उनकी संप्रभुता को नए सुरक्षा खतरों के साथ साथ उभरती नई भू– सामरिक और राजनीतिक चुनौतियों का जब सामना करना पड़ रहा है तो आसियान समूह को हिन्द–प्रशांत संरचना के विकास के प्रति अपने दृष्टिकोण को नए सिरे से विचार करने को प्रेरित किया है।
चीन का संपूर्ण दक्षिण चीन सागर पर ऐतिहासिक रूप बेतुके दावों पर आसियान समूह ने चीन के शुरुआती दावे को बेहद हल्के में लिया नतीजतन हालिया चीन द्वारा जारी किए गए नए नक्शे को लेकर दक्षिण चीन सागर अपना हिस्सा जताने वाले आसियान समूह के देशों में खलबली मची हुई है।
मौजूदा समय में आसियान समूह को हिन्द–प्रशांत की नई भू–सामरिक राजनीति के लिए व्यापक और बहुआयामी रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है वह भी तब चीन का वुल्फ वारियर राजनय और समुद्र में लापरवाह और आक्रामक रणनीति से संबद्ध देश पीड़ित हो रहे हैं ।
हिन्द प्रशांत में नियम आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए, हिन्द प्रशांत पर आसियान के दृष्टिकोण (एओआईपी) जिसे बीते जून 2019 में अपनाया गया था।
एओआईपी के तहत हिन्द–प्रशांत क्षेत्र पर व्यापक दृष्टिकोण और आसियान समूह ने अपने भौगोलिक रूप से अपने पत्ते खोलते हुए स्पष्ट किया कि -
पहला,आसियान,हिन्द प्रशांत को एशिया प्रशांत क्षेत्र के साथ हिन्द महासागर क्षेत्र के रूप में देखता है।
दूसरा,हिन्द महासागर क्षेत्र और प्रशांत महासागर क्षेत्र को आसियान द्वारा केवल निकटस्थ प्रादेशिक स्थान नहीं माना जाता है बल्कि वे दोनो घनिष्ठतम रूप से एकीकृत और परस्पर जुड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है जिसमें आसियान समूह की केंद्रीय, रणनितिक और सामरिक भूमिका है।
इसके अतिरिक्त हिन्द प्रशांत पर आसियान समूह के दृष्टिकोण को अमली जामा पहनाने के लिए एओआईपी ने उच्च प्राथमिकता वाले चार क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया – ये हैं समुद्री सहयोग;कनेक्टिविटी; संयुक्त राष्ट्र के एसडीजी 2030; एवं आर्थिक और सहयोग के अन्य क्षेत्र।
भारत के लिए आसियान की केंद्रीयता न केवल इसकी लुक ईस्ट एवं एक्ट ईस्ट नीतियों को उपज है बल्कि यह क्षेत्रीय शांति और समृद्धि के हिन्द प्रशांत दृष्टिकोण का अभिन्न अंग भी है।
इसी क्रम में बीते 12 नवंबर 2022 को जारी आसियान– भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर संयुक्त बयान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र में विकसित क्षेत्रीय संरचना में आसियान समूह की केंद्रीयता के लिए समर्थन को दोहराया गया है,जो क्षेत्रीय शांति, सुरक्षाऔर समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण होगा।
इस कड़ी में 4 नवंबर, 2019 को 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित हिन्द प्रशांत महासागर पहल (आईपीओआई ) में एक सुरक्षित, और स्थिर समुद्री क्षेत्र सुनिश्चित करने के लिए इच्छुक राष्ट्रों के बीच सहयोगात्मक संरचना बनाने का प्रस्ताव दिया।
इसका मुख्य उद्देश्य हिन्द प्रशांत क्षेत्र में उभरते तमाम मतभेदों एवं चुनौतियों पर एक आम सहमति के माध्यम से आपसी सहयोग का निर्माण करना है।
भारत द्वारा अवधारित आईपीओआई की बुनियादी अवधारणा समुद्री सहयोग और सहयोग के सात बुनियादी पहलुओं की पहचान करता है जो एओआईपी के सहयोग के व्यापक क्षेत्रों के साथ इसकी पूरकता को साझा करता है।
आईपीओआई समुद्री सहयोग और सहयोग के इन सात बुनियादी पहलुओं को चिन्हित करता है ।
(1) समुद्री सुरक्षा
(2) समुद्री पारिस्थितिकी
(3) समुद्री संसाधन
(4) क्षमता निर्माण और संसाधन साझा करना
(5) आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन।
(6) विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अकादमिक सहयोग और
(7) व्यापार संपर्क और समुद्री परिवहन ।
आईपीओआई के माध्यम से परिकल्पित सहकारी ढांचे में एओआईपी के सहयोग के व्यापक क्षेत्रों के साथ पूरकता को साझा किया गया है जिसमें समुद्री सहयोग, संयोजकता, संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य 2030 और आर्थिक और सहयोग के अन्य क्षेत्र शामिल हैं।
28 अक्टूबर 2021 को 18वें आसियान भारत शिखर सम्मेलन में अपनाए गए क्षेत्र में शांति,स्थिरता एवं समृद्धि के लिए हिन्द–प्रशांत पर आसियान दृष्टिकोण पर सहयोग पर आसियान–भारत संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है कि एओआईपी और आईपीओआई दोनों “.. शांति एवं सहयोग को बढ़ावा देने हेतु प्रासंगिक मूलभूत सिद्धांतों को साझा करें”। भारत की आईपीओआई और आसियान समूह को एओआईपी के बीच तालमेल, जिसमें मुक्त व्यापार और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग के लिए साझेदारी बनाने पर जोर दिया गया है जिससे सहयोग के दायरे में महत्त्वपूर्ण वृद्धि होगा जो कोविड 19 महामारी पश्चात आर्थिक सुधार में महत्वपूर्ण होगा।
संयुक्त राज्य अमेरिका और आसियान
जिसने आसियान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी के स्तर को व्यापक रूप से बढ़ाया है,जो वर्तमान में हिन्द प्रशांत की उभरती सामरिक संरचना में इसकी केंद्रीय स्वरूप का समर्थन करता है।
अमेरिका की व्यापक हिन्द–प्रशांत रणनीति में, इसे हिन्द–प्रशांत कार्य योजना के हिस्से के रूप में 'दस प्रमुख प्रयासों' का उल्लेख है जिनमें से सबसे प्रमुख है
इंडो पैसेफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी (आईपीईएफ) इसकी घोषणा 2022 में की गई थी इसमें एएमएस के सात सदस्य देश आईपीईएफ में शामिल हो गए हैं जो व्यापक रूप से साझा शांतिपूर्ण हिन्द प्रशांत रणनीति में योगदान करते हुए दक्षिणपूर्व एशिया के साथ अमेरिकी आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में मदद करता है।
पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और भारत ।
पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन भारत-प्रशांत में प्रमुख नेताओं के नेतृत्व वाला मंच है।
2005 में अपनी स्थापना के बाद से यह संगठन पूर्वी एशिया के रणनीतिक और भू-राजनीतिक विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में
10 आसियान सदस्य देशों और रूस,संयुक्त राज्य अमेरिका,भारत,चीन,जापान,दक्षिण कोरिया,ऑस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड शामिल हैं।
भारत, पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का संस्थापक सदस्य होने के नाते,पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन को मजबूत करने और समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
यह आसियान आउटलुक ऑन इंडो पैसिफिक (एओआईपी) और इंडो-पैसिफिक ओशन इनीशिएटिव (आईपीओआई) के जुड़ने से संबंधित हिंद-प्रशांत में व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए यह एक बेहद महत्वपूर्ण मंच है।
पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन की अवधारणा और संकल्पना को मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महाथिर बिन मोहम्मद ने 1991 में प्रस्तुत किया था और करीब डेढ़ दशक के बाद इसे संगठनात्मक रूप देते हुए इसका पहला शिखर सम्मेलन मलेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में 14 दिसंबर 2005 को आयोजित हुआ ।
जी -20 की पहली बार मेजबानी में व्यस्त भारत इस मंच को कितनी अहमियत देता है इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के फैसले से ही समझा जा सकता है,अपने व्यस्ततम कार्यक्रम के बीच प्रधानमंत्री आसियान और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भागीदारी के लिए इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता की यात्रा करेंगे।
यह प्रधानमंत्री मोदी की एक साल के भीतर यह दूसरी इंडोनेशिया यात्रा होगी जी-20 के सम्मेलनों में पिछले और भावी अध्यक्षों की भी भूमिका भी होती है, इस लिहाज से इंडोनेशिया आसियान और जी-20 दोनों में बेहद महत्पूर्ण भूमिका में है।
इससे पहले भी कोविड- 19 महामारी के दौरान प्रधानमंत्री 27 अक्टूबर, 2021 को होने वाले 16वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भी वर्चुअली शामिल हुए थे और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने नवंबर 2022 में आयोजित 17वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था।
व्यापक संबंध के अन्य क्षेत्र:
आसियान और भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी के लिए मौजूदा रणनीतिक साझेदारी मेकेनिज्म को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है । इसी कड़ी में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति,स्थिरता,समुद्री सुरक्षा और खुला और उन्मुक्त नौवहन की स्वतंत्रता और ओवरफ्लाइट को बनाए रखने और इसे बढ़ावा देने के महत्व की पुष्टि करना शामिल है। भारत और आसियान देश जैव संपदा की दृष्टि से बेहद संपन्न हैं।
इसके अतिरिक्त समुद्री गतिविधियों,जापान द्वारा फुकुशिमा हादसे के शोधित विकरणीय जल को समुद्र में विसर्जित करने के बाद इस समूह को नीली अर्थव्यस्था के आवश्यक क्षेत्रों जैसे स्वच्छ समुद्र, समुद्री पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर विशेष ध्यान देने की आवश्कता है।
इसके अतरिक्त नार्को आतंकवाद का मुकाबला, अंतर्राष्ट्रीय अपराध, साइबर सुरक्षा,डिजिटल अर्थव्यवस्था,क्षेत्रीय संपर्क,स्मार्ट कृषि और कृषकीय नवाचार, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यटन और हॉस्पिटलिटी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारत-आसियान सहयोग बढ़ाने की असीम संभावना है जिसे तलाशने की शीर्ष स्तर अप आगामी शिखर सम्मेलन में हम इनकी प्रतिबद्धता को देख सकेंगे।
संपर्क के अन्य क्षेत्र: भारत और आसियान : सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उभरते क्षेत्र, क्षमता निर्माण और ज्ञान साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अगली पीढ़ी के स्मार्ट शहर और समाज 5.0 में आईओटी और एआई का अनुप्रयोग ,पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में ,भविष्य के लिए सतत डेटा और परिवहन नेटवर्क और इनका मानक और अनुप्रयोग,आईओटी के लिए 5डी प्रौद्योगिकियां और भविष्य के रुझान, डिजिटल स्वास्थ्य और सुरक्षा संरक्षण के कार्यान्वयन में आईसीटी की भूमिका और भविष्य के नेटवर्क के लिए मूल्यांकन शामिल है। डिजीटल प्रौद्यौगिकी,डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास,स्टार्टअप ईकोसिस्टम और ओपन टेक्नॉलजी के विस्तार और विकास से एक दूसरे की पूरक ताकत का लाभ उठाकर भारत और आसियान के बीच सहयोग को मजबूत करेंगे
विज्ञान और प्रौद्योगिकी:
भारत मानता है कि विज्ञानऔर प्रौद्योगिकी समाज की अब तक अपूर्ण रही आवश्यकताओं को पूरा करने और हम सभी के सामने आने वाली वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम उपकरण बनेगी।
इसलिए इस क्षेत्र में समावेशी विकास, रोजगार सृजन के लिए सस्ती एवं लागत प्रभावी प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही शहरी और ग्रामीण अंतर के बीच असमानताओं को पाटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी से अधिक लाभ उठाने की आवश्यकता है।''
इसी कड़ी में आसियान-भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास कोष (एआईएसईएएन -इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड- एआईएस टीडीएफ)
शांति, प्रगति और साझा समृद्धि के लिए कार्य योजनाओं के माध्यम से परस्पर सहयोग करना, ब्ल्यू इकॉनमी ,स्वास्थ्य सेवा,जलवायु परिवर्तन और कार्रवाई और सतत विकास जैसे विभिन्न क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य सस्ती लगात प्रभावी प्रौद्योगिकियों के विकास पर विशेष ध्यान देने के ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानताओं को पाटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना है जिससे आसियान-भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ से दोनों ही पक्षों को विशेषकर महामारी के बाद के दौर में सार्थक लाभ प्राप्त हो सके।
आसियान-भारत के महत्त्वपूर्ण टाइम लाइन ।
•भारत 1996 में आसियान वार्ता का भागीदार देश बना।
•आसियान और भारत के बीच द्विपक्षीय व्यापार 2019 में 77.0 बिलियन $ पहुंच गया जबकि भारत से कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह 2.0 बिलियन $ था।
•इसने भारत को आसियान के छठे सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार और आसियान के बीच एफडीआई के आठवें सबसे बड़े स्रोत के रूप में स्थापित किया।
•संवाद भागीदार के रूप में 2003 में दूसरे आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में, नेताओं ने व्यापक आर्थिक सहयोग पर आसियान-भारत फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए
•इस फ्रेमवर्क समझौते ने आसियान-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र (एफटीए) की स्थापना के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं और निवेश में मुक्त व्यापार समझौता शामिल है।
•आसियान-भारत माल व्यापार समझौता (एआईटीआईजीए) एक जनवरी 2010 को लागू हुआ जबकि 13 अगस्त 2009 को बैंकॉक में AITIGA पर हस्ताक्षर से 1.9 बिलियन से अधिक जनसंख्यां और 5.36 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की संयुक्त जीडीपी के साथ दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्रों में से एक के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।
•आसियान-भारत सेवा व्यापार समझौते पर 13 नवंबर 2014 को सभी देशों ने हस्ताक्षर किए गए थे और यह एक जुलाई 2015 से लागू हुआ था।
•वर्तमान में इन समझौते को सभी पक्षों द्वारा अनुमोदित किया गया है। इस बीच, 12 नवंबर 2014 को सभी पक्षों द्वारा आसियान-भारत निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों को बीते 1 जुलाई 2015 को लागू किया जा चुका है,फिलहाल कंबोडिया को छोड़कर इसके सभी पक्षों द्वारा इसका अनुमोदन किया है।
नार्को टेररिज्म और आसियान।
"नार्को टेररिज्म "शब्द का पहले पहल इस्तेमाल अमेरिका में तब किया गया जब बोलीविया, कोलंबिया पेरू, निकारागुआ और अन्य मध्य अमेरिकी देशों में ड्रग्स तस्करों ने संगठित होकर इस गैर कानूनी व्यापार को संगठित किया और समानांतर सत्ता स्थापित कर लिया था।
आसियान समूह के देशों में नार्को टेररिज्म एक गंभीर चुनौती का रुख अख्तियार कर रहा है,यहां मौजूद गोल्डन क्रेसेंट या स्वर्णिम अर्धचंद्रकार भाग या सीएलएमटी देश यानि चीन म्यांमार, लाओस और थाईलैंड है।
मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान,नई दिल्ली की एक रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार का "शान प्रांत" इस चौकड़ी में ड्रग्स का सबसे बड़ा उत्पादन करता है।
यह चीन के साथ एक ट्राई जंक्शन बनाता है।
इन तीनों देशों में भारत की सीमा म्यांमार से साझा है जिसका सीधा असर पूर्वोत्तर भारत सहित देश के अन्य भाग में जूझना पड़ता है।
गोल्डन क्रीसेंट के लिए भारत जमीनी रूप से ईरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान समूह वाले गोल्डन ट्राइएंगल में प्रवेश करने का महत्त्वपूर्ण हॉट स्पॉट है।
भारत गोल्डन ट्राइंगल या स्वर्णिम त्रिभुज और गोल्डन क्रीसेंट को आपस में जोड़ने वाला तप्त स्थल बन गया है जिसे समय रहते पूरी तरह जड़ मूल के साथ समाप्त करने की चुनौती है।
इन क्षेत्र में अवैध ड्रग्स का बेहिसाब और अनियंत्रित उत्पादन और तस्करी जिससे सामाजिक समस्या, युवाओं में नशे की लत लगना जिससे युवा पीढ़ी पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।
इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय अपराध,हवाला,धन अपशोधन के जरिए देश में आतंकवादी गतिविधियां संचालित करने के लिए टेरर फाइनेंस के जरिए धन को अनवरत रूप से मुहैया किया जाता रहा है।
आखिर कैसे रोका जाय इन्हे :मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान,नई दिल्ली की एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ बहुआयामी मल्टीलेटरल सहयोग को बढ़ाते हुए इस समस्या का समाधान संभव है,जिसमे भारत के लिए आसियान समूह के देशों की सहायता बेहद महत्त्वपूर्ण है।
आसियान केंद्रीयता।
दक्षिण चीन सागर और आसियान देशों के साथ चीन के बढ़ते क्षेत्रीय दबदबे के साथ,‘आसियान केंद्रीयता’ की संकल्पना ने और गति पकड़ी है। दक्षिण चीन सागर में चीन का बे सिर पैर,गैरवाजिब,बेतुका और आक्रामक व्यवहार जिसके जद में आए दिन आसियान के कई सदस्य-देश चीन के साथ समुद्री क्षेत्रीय विवादों में उलझते नजर आते हुए हैं। फिलहाल ये समूह चीन के जारी किए गए नक्शों और दावे किए क्षेत्रों पर अपने तीखे सवाल जवाब में उलझा पड़ा है ।
इस क्षेत्र में अमेरिका-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज़ होने के कारण भी बढ़ी है हाल की कुछ घटनाओं से पता चलता है कि आने वाले महीनों और सालों में आसियान की केंद्रीयता पर बहस तेज़ होने की संभावना है. इस महीने की शुरुआत में, भारत-प्रशांत क्षेत्र के चार लोकतांत्रिक देश ऑस्ट्रेलिया,जापान,भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका, यानी ‘क्वॉड’ ने इस क्षेत्र में ‘आसियान केंद्रीयता’ पर ज़ोर देने की बात कही।भारत हिंद-प्रशान्त में आसियान की केन्द्रीयता की पुष्टि करता है तथा पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन को मजबूती देने की बात करता
क्वाड और आसियान।
‘क्वॉड’ द्वारा आसियान की पुन: पुष्टि के बावजूद, विशेषज्ञ आसियान पर ‘क्वॉड’ देशों के दीर्घकालिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहे है क्योंकि हिंद प्रशांत की संकल्पना और ‘क्वॉड’ का बढ़ता महत्व लंबे समय में, आसियान की“एकजुट करने और प्रभाव क़ायम करने की शक्ति” को कमज़ोर बना सकता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के चार सदस्यीय ‘क्वॉड’ और अन्य भागीदारों को शामिल करने वाली ‘क्वॉड-प्लस’ की अवधारणा को आसियान के नेतृत्व वाले मंचों के “समानांतर तंत्र” के रूप में देखा गया है।
बीते कुछ समय से, ‘क्वॉड’ सदस्य इस पहल में आसियान और उसके सदस्य देशों को शामिल करना चाहते हैं जिसमे इंडोनेशिया और वियतनाम व्यापक रूप से बेहद मुखरता के साथ इस मंच के संभावित प्रमुख साझेदारों के रूप में उल्लिखित किए जाते रहे हैं।
भारतीय पक्ष बीते जुलाई में विदेशमंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा की क्वाड समूह आसियान का पूरक रहेगा, उन्होंने कहा कि चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वाड) हमेशा आसियान का पूरक रहेगा। एओआईपी क्वाड की परिकल्पना में योगदान देता है।
सामरिक-दृष्टि से भारत के नजरों में आसियान।
व्यापार वाणिज्य, कारोबार और भू- सामरिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत के लिए आसियान महत्वपूर्ण भूमिका है और यह भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का महत्वपूर्ण पड़ाव है।
चीन की दुखती रग "मलक्का दुविधा" की नैसर्गिक अवस्थिति लिए आसियान समूह के देशों के साथ भारतीय नौसेना इस स्थिति में है कि वह चीन के पूरे सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन के यातायात पर पैनी निगाह रख सकेगा।
भारतीय नौसेना के युद्धपोत और पनडुब्बीरोधी पी-8आई विमान अब बेफ्रिकी के साथ दक्षिण चीन सागर में नियमित गश्त लगाते हैं और उड़ानें भरते हैं जिससे हमारे युद्ध पोतों की पहुँच सुदूर पूर्व तक हो गई है।
भारत ने हाल ही में वियतनाम,फिलीपींस, मलेशिया और इंडोनेशिया के साथ अपने रणनीतिक सामरिक रिश्ते को सुदृढ़ किया है। भारत इस क्षेत्र में एक ऐसे सुरक्षा एवं सामरिक-साझेदार के रूप में पहचान बना रहा है, जिस पर आंख मूंदकर कर भरोसा किया जा सकता है।
फिलीपींस भारत और रूस का संयुक्त उपक्रम से निर्मित ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदने के लिए मुहर लगा चुका है, जबकि वियतनाम फिलीपींस के राह पर चल चुका।
वियतनाम को हमने युद्धपोत उपहार स्वरूप दिए है,भारत ने वियतनामी सैन्य अधिकारियों को पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों का संचालन करने वाले प्रशिक्षण के अतिरिक्त साईबर सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है । जबकि क्वाड समूह पहले ही कह चुका है कि आसियान। हमारा पूरक है। इंडोनेशिया के साथ भारत की रक्षा साझेदारी भी बढ़ रही है,जहां भारतीय नौसेना को किलो-श्रेणी की भारतीय पनडुब्बी ने बीते फ़रवरी 2023 में पहली बार इंडोनेशिया का दौरा किया।
बीते मई में भारत और आसियान का पहला समुद्री युद्धाभ्यास संपन्न हुआ ।
पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद और चरमपंथी घटनाओं का सामना करने और उन्हें समूल नाश के लिए, जैसे मामलों के लिए आसियान देशों के साथ सहयोग आवश्यक है।
भारत आसियान के साथ गहरा जुड़ाव रखता है और उसने, विशेष रूप से आसियान के नेतृत्व वाले तंत्रों जैसे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, आसियान क्षेत्रीय मंच और एडीएमएम-प्लस के माध्यम से, क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देने वाले कई क्षेत्रों में अपने सक्रिय संबंध जारी रखे हैं।
भारत-आसियान रणनीतिक साझेदारी को समृद्ध सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों और लोगों के बीच सहयोग बढ़ाने के आधार पर मजबूत किया गया है।
भारत एक मुक्त,खुले एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वकालत करता है और सभी देशों की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हुए विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान करता है।
अपनी पुस्तक ‘द आसियान मिरेकल: ए कैटेलिस्ट फॉर पीस’ में किशोर महबूबानी और जेफ्रेग एसएनजी ने तर्क दिया है, कि 20वीं शताब्दी में आसियान की सफलता के पीछे एक कारक मौजूद था वह था ‘भू-राजनीतिक भाग्य’।ऐसी कई भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं,जिनसे आसियान को एक विश्वसनीय क्षेत्रीय ब्लॉक के रूप में उभरने में मदद मिली वह यहां एक सवाल भी पूछते है क्या 21वीं सदी में भी आसियान का अपना ‘भू-राजनीतिक भाग्य’ होगा।
भारतीयों ने पूरब की तरफ हमेशा एक पोषण करने वाले सूर्योदय और प्रकाश के अवसरों के लिये देखा है अब,पहले की ही तरह, पूरब या हिंद-प्रशान्त क्षेत्र भारत के भविष्य और हमारी साझा नियति के लिये अपरिहार्य है। आसियान-भारत साझेदारी इन दोनों के लिये ही एक निर्णायक भूमिका अदा करेगी।