वर्तमान वैश्विक व्यवस्था राजनीति शास्त्र में पढ़े जाने वाले गूढ़ शब्दों यथा बहुपक्षीय और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की संकल्पना,दक्षिण दक्षिण सहयोग,ग्लोबल साउथ आदि शब्दों को जमीनी हकीकत पर उतरते देख रहा है। पूरी दुनिया की निगाहें बीते दिनों दक्षिण अफ्रीका में आयोजित और संपन्न हुए 15वें ब्रिक्स देशों के सम्मेलन पर टिकी रही।
एक प्रसिद्ध वैश्विक वित्तीय संस्थान गोल्डमैन सैक्स की 2001 में प्रकाशित "बिल्ड बेटर ग्लोबल इकोनॉमिक ब्रिक" शीर्षक की एक रिपोर्ट में ब्राजील,रूस,भारत और चीन को मिलाकर ‘ब्रिक’ की संकल्पना को प्रस्तावित किया गया था।
2009 के येकेतेरिनबर्ग से 2023 के जोहांसबर्ग सम्मेलन के बीच बीते दो दशकों के कालखंड में यह संकल्पना वर्तमान में एक प्रमुख मंच के रूप में स्थापित,मुखर,पूरी तरह परिपक्व और आज विस्तारित हो कर ब्रिक्स-11 का रूप ले चुकी है।
मौजूदा दौर में ब्राजील, रूस,भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के साथ साथ ब्रिक्स समूह में अब छः नए सदस्य देश शामिल होने जा रहे हैं। इनमें एशिया से तीन ईरान,संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब, अफ्रीका से दो मिस्र और इथोपिया और दक्षिण अमेरिका से अर्जेंटीना शामिल हैं।
इसकी घोषणा मेज़बान दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति ने ब्रिक्स के नए सदस्य देशों के नाम का ऐलान किया है। इन नए देशों की सदस्यता आगामी एक जनवरी 2024 से प्रभावी होगी।
ब्रिक्स के विस्तार के वैश्विक मंच पर मायने।
फिलहाल ब्रिक्स समूह को चीन और रूस के इर्द गिर्द देखा जाता रहा था,क्योंकि ये दोनो देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्य के साथ साथ अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के नीतिगत मसलों पर धुर विरोधी रहे हैं और ब्रिक्स को वे अमेरिका नीत देश तथा संगठनों की आलोचना करने के लिए एक प्लेटफार्म के तौर पर इस्तेमाल करने से कभी नहीं चुके।
इसके ठीक इतर ब्रिक्स के अन्य देश भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने अपनी स्वतंत्र राजनय का परिचय देते रहे हैं। बात अगर भारत की करें तो भारत ने ब्रिक्स समूह को व्यापक तवज्जो देते हुए चीन रूस और अमेरिका के साथ अपनी पेशेवर राजनय और कूटनीतिक दक्षता का परिचय दिया और अपनी संप्रभु विदेश नीति को प्रदर्शित किया।
2010 में दक्षिण अफ़्रीका को शामिल करने के बाद इस ब्रिक्स का सबसे बड़ा विस्तार है जिसके भू: आर्थिक,भू:राजनैतिक और भू: रणनीतिक महत्व के साथ साथ ऊर्जा सुरक्षा की संकल्पना और नए मायने को नए सिरे से समझने की अवश्यकता होगी न कि भारत रूस और चीन के इर्द गिर्द रहने की। ब्रिक्स के विस्तार के भौगोलिक पहलुओं को देखें तो हम पाते हैं कि इसका विस्तार अटलांटिक महासागर से आर्कटिक महासागर वाया प्रशांत महासागर,बाल्टिक सागर,काला सागर,लाल सागर के साथ स्वेज नहर,हारमुज की खाड़ी,अरब सागर विस्तारित हिंद महासागर से दक्षिण चीन सागर तक है । इसमे समुद्री व्यापार के बेहद महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन(एसएलओसी) मौजूद है जो पूरी तरह वैश्विक समुद्री व्यापार को नियंत्रित करती है। ग्यारह ब्रिक्स देशों की कुल जनसंख्या करीब 3.7 बिलियन है। पांच पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक देशों के साथ अन्य छः विभिन्न राजव्यवस्था वाले देश इस अनूठे समूह में समाहित है,जिसमे एशिया से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ ईरान तो अफ्रीका से इथोपिया और मिस्र और दक्षिण अमेरिका से अर्जेंटीना शामिल हैं।
विस्तारित ब्रिक्स: दुनिया के विकास का ग्रोथ इंजन।
राजनयिक और कारोबारी जगत ब्रिक्स समूह को दुनिया के विकास के इंजन के रूप में स्वीकार कर रहा है,इस समूह के देशों में विनिर्माण प्रक्रिया में उल्लेखनीय बदलाव के साथ संगठन की अर्थव्यवस्था जी-7 देशों की संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बराबर पहुंचने वाली है। जिसका संकेत पीयूष गोयल ने बीते सोमवार को ब्रिक्स विनिर्माण कारोबार सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए इस तथ्य को सामने पेश किया।
ब्रिक्स देश मौजूदा वैश्विक जनसंख्या के 46 फीसद हिस्सेदारी के साथ चालू वर्ष 2023 में जहां मूल रूप से ब्रिक्स देशों की संकलित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वैश्विक हिस्सेदारी 27.6ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ 26.3 फीसद थी जो इन छह नए सदस्यों के शामिल होने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 30.8 ट्रिलियन डॉलर और जीडीपी की वैश्विक हिस्सेदारी बढ़कर 29.3 फीसद हो गई है जो इस समूह की बहुध्रुवीय वैश्विक मंचो पर इनकी महत्ता को दर्शाती है।
मिस्र और ई- ब्रिक्स की संकल्पना : मिस्र के लिए ब्रिक्स की चाहत बहुत पुरानी है, हालांकि उसे इस समूह में एक दशक के बाद इस समूह में शामिल होने का अवसर मिला है। 2013 में मिस्र के तत्कालीन और दिवंगत राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी, राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान भारत के दौरे पर उन्होंने ब्रिक्स समूह में शामिल होने की इच्छा जाहिर करते हुए "ई- ब्रिक्स"की संकल्पना को साझा किया,और कहा कि यहां "ई "का मतलब "इजिप्ट"से है। उन्होंने कहा था कि "मैं उम्मीद करता हूं की ब्रिक्स, "इ-ब्रिक्स " बनेगा,जहां "इ"का मतलब "इजिप्ट"से है,और मिस्र उम्मीद करता है कि उसे इस समूह में शामिल किया जाएगा" मिस्र को सर्वप्रथम ब्रिक्स के 2013 में आयोजित डर्बन बैठक आमंत्रित किया गया था,जहां उसने इस समूह की सदस्यता की अपनी मंशा जाहिर की थी।
खाड़ी के देश : ब्रिक्स और ऊर्जा सुरक्षा
इसमें कोई शक-ओ-शुब्हा नहीं है की वर्तमान सुदृढ अर्थव्यवस्था आदि वैश्विक व्यवस्था की संकल्पना में ऊर्जा सुरक्षा की सुनिश्चितता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में एक है फिलहाल पुराने ब्रिक्स में ऊर्जा संपन्न खाड़ी देशों की भागीदारी नहीं थी।
भारत सहित ब्रिक्स के अन्य देशों में इस्लाम को मानने वाले समुदाय की बड़ी आबादी रहती है ऐसे में इस संगठन में एक तरह की असंतुलित व्यवस्था थी, जिसे खत्म करने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि एशिया और अफ्रीका के चार इस्लामिक देशों को इस संगठन से जुड़ने के लिए न्यौता भेजने का फैसला किया गया है। इनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात,ईरान और मिस्र शामिल हैं।
इन देशों के ब्रिक्स में शामिल होने से वे सदस्य देश जिनके पास "ऊर्जा असुरक्षा" है वैसे सदस्य देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ करने और अनवरत ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराने के लिए यह मंच बेहद उपयोगी सिद्ध होगा। वैसे कच्चे तेल उत्पादन के लिहाज से देखा जाए तो दो शीर्ष देश रूस और सऊदी अरब अब ब्रिक्स समूह के सदस्य है,गौरतलब कि सऊदी अरब की वैश्विक तेल उत्पादन में अकेले 12.9 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि तेल निर्यातक देशों के समूह (ओपेक) के ईरान,सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल है।
एनर्जी इंस्टिट्यूट स्टेटिस्टिकल रिव्यू ऑफ वर्ल्ड एनर्जी की एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिक्स से विस्तारित ब्रिक्स की कच्चे तेल उत्पादन में हिस्सेदारी 20.4फीसद से बढ़कर 43.1 फीसद हो जायेगी । खाड़ी के दो देशों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास प्रति व्यक्ति आय काफी बेहतर स्थिति में है ,इसके अलावा उनके पास विदेशी मुद्रा भंडार भी अत्यधिक सुदृढ है ऐसे में इन देशों के ब्रिक्स समूह में जुड़ने पर संगठन को आर्थिक ताकत और समृद्धि मिलेगी।विगत वर्षो में देखा जा रहा कि सऊदी अरब अपनी तेल आधारित अर्थव्यव्स्था पर अपनी निर्भरता को कम करते हुए निवेश आधारित अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। ऐसे में ब्रिक्स देशों को परियोजनगत और निवेश आधारित व्यवस्था से लाभ मिलेगा
न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूती देने का समय।
सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों का इस समूह में शामिल होने से ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक को विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विकल्प की तरह और बेहतर रूप में प्रतिस्थापित किया जा सकेगा ।
ब्रिक्स सदस्यों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिलने वाला ऋण,ऋणी देश के लिए बेहद कष्टकारी सिद्ध होता है।ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक में फिलहाल अत्यधिक निवेश की जरूरत है, जिससे वह विकासशील देशों को प्रभावी ढंग से अपना समर्थन दे सकें उम्मीद है कि ब्रिक्स के विस्तार होने के पश्चात इस बैंक की आर्थिक स्थिति में बेहतरी देखने को मिलेगी जिससे यह अपने स्थापित लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।
ब्रिक्स समूह अमेरिका या यूरोपीय देशों के खिलाफ नहीं
यहां यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है की यह समूह किसी देश या दूसरे संगठन के खिलाफ इसलिए नहीं है क्योंकि यह कहीं से भी सैन्य गठजोड़ या गठबंधन का हिस्सा नहीं है। यह एक पूर्ण रूप से आर्थिक राजनितिक समूह है जिसका एकमात्र ध्येय विकासात्मक अवधारणा और आधारित है। भारत के राजनय संबंध अमेरिका और रूस के साथ बेहद परिपक्व अवस्था में है जबकि चीन के साथ सीमा संबंधी विवाद और गलवान के खूनी संघर्ष के बाद,वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनो पक्षों के व्यापक सैन्य जमावड़े के वावजूद संबंध "स्थिर"बने हुए है। जबकि अन्य सदस्य देशों के साथ साथ भारत के संबंध विशेष,आत्मीय ,सद्भावपूर्ण और गर्मजोशी भरे हुए हैं ।
इसी कड़ी में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन का यह बयान यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जिसमें उन्होंने हाल में कहा है कि हम ब्रिक्स को अमेरिका विरोधी संगठन के रूप में नहीं देखते हैं। इसकी एक वजह है कि हमारे मित्र देश भी इस संगठन के मजबूत सदस्य हैं।
ब्रिक्स का विस्तार और भारत : भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि ब्रिक्स के विस्तार से पहले नए सदस्यों की संख्या और उनके लिए समुचित मानदंड होना जरूरी है। रूस ने अब भारत के ब्रिक्स के विस्तार को लेकर रुख का पूरा समर्थन किया है।
भारत ब्रिक्स को एक "ब्रेकिंग बैरियर्स, रिवाइटलाइजिंग इकोनॉमीज,इंस्पायरिंग इनोवेशन,क्रिएटिंग अपॉर्चुनिटी और शेपिंग द फ्यूचर "के रूप में देखता है
भारत का सदा यह मत रहा है कि नए सदस्यों के जुड़ने से ब्रिक्स एक संगठन के रूप में और मज़बूत होगा, तथा हमारे सभी साझा प्रयासों को एक नया बल देने वाला होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जोहांसबर्ग में अपने संबोधन में स्पष्ट रूप से कहा कि ब्रिक्स के विस्तार से विश्व के अनेक देशों का बहुध्रुवीय विश्व व्यस्था में विश्वास और सुदृढ़ होगा। उन्होंने कहा कि "मुझे ख़ुशी है कि हमारी टीम्स ने मिलकर ब्रिक्स के विस्तार के लिए आवश्यक मार्गदर्शक सिद्धांत,मानक, मानदंड और प्रक्रिया पर सहमति बनाई है।"
भारत बेहद मजबूती से मानता रहा है की ब्रिक्स के विस्तार में किसी ख़ास देश के सिर्फ़ इस वजह से शामिल नहीं किया जाए कि उस देश के साथ रूस या चीन के संबंध कितने प्रगाढ़ है। भारत सदैव मानता है कि ब्रिक्स समूह के देश तमाम अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह परिपक्व और सक्षम है और किसी भी वैश्विक मसले पर नेतृत्व कर सकता है ।
विस्तारित ब्रिक्स के पीछे चीन की मंशा ब्रिक्स को पश्चिम और अमेरिकी नीत गठबंधन वाले देश और वैश्विक संगठनों के विरुद्ध एक भू- आर्थिक और राजनीतिक संगठन के रूप में ढालने की रही है जबकि मूल रूप से यह समूह एक आर्थिक सहयोग का एक मंच रहा है। भारत ने सदैव इस मसले पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए एक परिपक्व विदेश नीति का परिचय देता रहा है।
यूक्रेन में रूस के विशेष सैन्य अभियान के बाद रूस भी पश्चिमी देशों के निशाने पर आया हुआ है और इस समय वह पश्चिमी देशों के रवैये से बुरी तरह परेशान है, संभव है कि रूस को इस विस्तार से किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं हो क्योंकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बहुपक्षवाद की मुखालफत कई मंचो से कर चुके हैं जिसमे उन्हे भारत का पूर्ण साथ और समर्थन भी मिला है।
ब्राजील के साथ पश्चिमी देशों के गर्मजोशी भरे संबंध किसी से छिपे नहीं है इसलिए रियो डि जेनेरियो भी बेहद सतर्कता के साथ अपनी राजनय को प्रदर्शित करता है ।
और बात दक्षिण अफ्रीका की तो यह चीन के प्रति फिलहाल नरम रुख अख्तियार किए हुए है, जिसकी बानगी हम बीते ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान जोहान्सबर्ग आए चीनी राष्ट्रपति की अगुवानी करने के लिए स्वयं दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा हवाई अड्डे पर पूरे लाव लश्कर के साथ मौजूद थे।
मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में ब्रिक्स समूह को वैश्विक क्षेत्र में एक आधिकारिक ढांचे के रूप में खुद को स्थापित करने की आवश्यकता है जिससे वैश्विक मामलों में इसका प्रभाव लगातार मजबूत हो सके।
ब्रिक्स देशों में आपसी सहयोग इनके भविष्य की भागीदारी और अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समावेशी विकास का मुख्य हिस्सा बन सके ।
भारत के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत वसुधैव कुटुंबकम् नजरिए से विश्व बहुमत की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शाता और सिद्ध करता है।
ब्रिक्स समूह के देश वैश्विक,क्षेत्रीय और द्विपक्षीय एजेंडे,समस्या और सीमा विवाद संबंधी मुद्दों जैसे अहम मसलों को संबोधित और समाधान करने के लिए संप्रभुता, समानता,साझेदारी,सहयोग और एक-दूसरे के हितों के प्रति उचित सम्मान,क्षेत्रीय अखंडता,सीमा की पवित्रता की नैसर्गिक नीतियों के तहत बिना किसी झिझक के पालन करते हुए समस्याओं का त्वरित समाधान करें जिससे सही मायने में ब्रिक्स की प्रासंगिकता सिद्ध हो सकेगी।