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Wednesday, September 06, 2023

आसियान-10 और भारत

 प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित होने वाले 20वें आसियान-भारत शिखर सम्मेलन और 18वें पूर्व एशिया शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए आगामी बुधवार इंडोनेशिया के लिए रवाना होंगे। इस वर्ष प्रधानमन्त्री की यह दूसरी इंडोनेशिया यात्रा है। इंडोनेशिया दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संगठन (आसियान) शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है। प्रधानमंत्री आगामी सात सितंबर को शिखर सम्मेलन में हिस्सा लेंगे। नई दिल्ली में आयोजित होने वाले जी-20 शिखर सम्मेलन के आयोजन की वजह से प्रधानमन्त्री का यह बेहद संक्षिप्त दौरा होगा।

आसियान दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे प्रभावशाली और केंद्रीय समूह है इसके दस सदस्य देश है जिन्हे आसियान-10 कहा जाता है।

ये देश हैं : इंडोनेशिया,ब्रूनेई,कंबोडिया,फिलीपींस,लाओस,मलेशिया,म्यांमार,, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम।

इसके आठ डायलॉग पार्टनर देश हैं: रूस अमेरिका चीन, भारत,जापान,ऑस्ट्रेलिया न्यूज़ीलैंड और दक्षिण कोरिया।

आसियान-भारत: साझा मूल्य, समान नियति’ 

भारत-आसियान साझेदारी भले ही सिर्फ तीस साल पुरानी हो, लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के साथ भारत के रिश्‍ते दो सहस्राब्दियों से भी अधिक पुराने हैं। शांति एवं मित्रता,धर्म व संस्कृति,कला एवं वाणिज्य,भाषा और साहित्य के क्षेत्रों में अत्‍यंत प्रगाढ़ हो चुके ये चिरस्थायी रिश्‍ते अब भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया की शानदार विविधता के हर पहलू में मौजूद हैं जिससे हमारे लोगों के बीच सहूलियत और अपनेपन का एक अनूठा आवरण बन गया है।


इसलिए  विदेशमंत्री एस जयशंकर ने बीते जुलाई में अपनी इंडोनेशिया के यात्रा के दौरान कहा कि "आसियान भारत की एक्ट ईस्ट नीति और हिंद प्रशांत के व्यापक दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। यह हिंद प्रशांत को आगे बढ़ाने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और भारत दृढ़ता के साथ आसियान का समर्थन करता है।"


इससे पूर्व भारत आसियान वर्ष 2018 में अपने गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित आसियान राष्ट्रप्रमुखों की मेजबानी कर चुका है।


आसियान-भारत शिखर सम्मेलन नियमित रूप से हर वर्ष आयोजित किया जाता है और यह भारत और आसियान के जुड़ाव को उच्चतम स्तर पर जुड़ने का अवसर प्रदान करता है।

बीते वर्ष 2022 में एसोसिएशन ऑफ साउथ ईस्ट एशियन नेशंस (आसियान)- भारत मैत्री वर्ष मनाया गया, जो भारत के आसियान के साथ संवाद संबंधों की स्थापना की 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में मनाया गया और इसकी जिसकी परिणति आसियान- भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी (सीएसपी) के लिए रणनीतिक साझेदारी को बढ़ाने के रूप में हुई। वर्तमान में  दोनो पक्ष 2021-2025 के लिए नई आसियान- भारत कार्ययोजना पर कार्य कर रहे हैं

प्राचीन काल से भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच मौजूद गहरे सभ्यतागत,सांस्कृतिक,आर्थिक संबंध रहे हैं

आसियान-भारत रणनीतिक साझेदारी दोनो पक्षों के साझा भौगोलिक,ऐतिहासिक और सामाजिक विकास के संबंधों की मजबूत नींव पर निर्मित है। आसियान समूह के देश भारतीय राजनय में "एक्ट ईस्ट नीति" और "हिंद प्रशांत नीति "में आसियान समूह एक  व्‍यापक परिकल्‍पना का केन्द्रबिंदू है। 

बीते वर्ष 2022 में आसियान-भारत के साझेदारी संबंधों के 30 वर्ष पूरे हो गए हैं।


भारत की एक्ट ईस्ट नीति आसियान समूह के साथ एक त्रिभुजाकार बिंदुओं पर केंद्रित है जो संयोजकता,व्यापार और संस्कृति पर जोर देती है । 


भारत और आसियान में अनेक संवाद तंत्र हैं जो नियमित रूप से वार्ता करते हैं, जिसमें एक शिखर सम्मेलन, मंत्रिस्तरीय बैठकें और वरिष्ठ अधिकारियों की बैठकें शामिल हैं।



व्यापार और वाणिज्य:आसियान,भारत का चौथा बड़ा व्यापारिक सहयोगी है और भारत के कुल व्यापार का करीब दस फीसद हिस्सेदार है। भारत ने बीते 2022 से आसियान सदस्य देशों के साथ पारस्परिक सहयोग के 30 साल का सफर पूरा किया। भारत और आसियान के बीच वर्ष 2022-23 में 131.5 अरब अमेरिकी डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार हुआ। वर्ष 2022-23 में भारत के कुल वैश्विक व्यापार में आसियान के साथ हुए व्यापार की हिस्सेदारी 11.3% थी।


भारत की एक्ट ईस्ट नीति के कारण पिछले दशक के दौरान व्यापार और निवेश संबंध भी बढ़े हैं। 2021-22 की अवधि के दौरान भारत और आसियान देशों के बीच व्यापारिक व्यापार बढ़कर 110.40 बिलियन $ हो गया। कुछ प्रमुख समझौते हुए हैं जो भारत-आसियान व्यापार संबंधों को बढ़ावा देने से जुड़े हैं।


भारत आसियान व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए)

ब्रुनेई, कंबोडिया, इंडोनेशिया, लाओस, मलेशिया, म्यांमार, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम के साथ वस्तुओं, सेवाओं और निवेश में व्यापार समझौता किया है ।



जबकि भारत सिंगापुर व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (सीईसीए) 2005 में सिंगापुर के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद से भारत ने द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है।


भारत थाईलैंड एफटीए - अर्ली हार्वेस्ट स्कीम (ईएचएस)।भारत और थाईलैंड ने मुक्त व्यापार समझौते पर चल रही बातचीत के दौरान टैरिफ में कमी के लिए विशिष्ट उत्पादों की पहचान करने के लिए 2006 में अर्ली हार्वेस्ट स्कीम (ईएचएस) लागू की है। इसे प्रस्तावित व्यापक एफटीए का प्रारंभिक चरण माना जाता है।


भारत मलेशिया व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता (MICECA)MICECA पर 2011 में भारत और मलेशिया के बीच हस्ताक्षर किए गए थे। इस समझौते में कुछ वस्तुओं, सेवाओं, निवेशों और प्राकृतिक व्यक्तियों के आवागमन के व्यापार के लिए टैरिफ में रियायतें और कटौती शामिल है।


ऑलवेज फर्स्ट रिस्पांडर: भारत.


भारत ,आसियान समूह के लिए किसी भी प्रकार के आपदा और उससे निपटने के लिए सदैव फर्स्ट रेस्पांडर की भूमिका के निर्वहन के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़ा है। भारत अपने करीबी तथा दूर स्थित पड़ोसी देशों में संकट के समय सबसे पहले सहायता देने वाले देशों में से एक है। मानवीय सहायता और आपदा राहत (एचएडीआर) अभियानों या हेड्स ऑफ एशियन कोस्टगार्ड एजेंसीज़ मीटिंग (एचएसीजीएएम) के संस्थापक सदस्य के रूप में भारत समुद्री खोज और बचाव के क्षेत्रों में सहयोग के माध्यम से इस क्षेत्र में सदैव क्षमता निर्माण को बढ़ाना चाहता है।


क्षेत्रीय एवं वैश्विक चुनौतियां 


कोविड-19 महामारी के बहुआयामी प्रभावों, दक्षिण चीन सागर में विभिन्न आसियान देशों के साथ तनाव,जलवायु परिवर्तन, वैश्विक वित्तीय बाजार में अत्यधिक अस्थिरता, महंगाई के दबाव और भू-राजनीतिक और रणनीतिक तनाव पर अपने-अपने विचारों का आदान-प्रदान किया। दोनों ही पक्षों ने आपसी सहयोग के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों के रूप में मजबूत आपूर्ति श्रृंखलाओं, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा,स्वास्थ्य और वित्तीय स्थिरता की पहचान के साथ साथ हालिया चीन का अपना नया नक्शा जारी करने के बाद आसियान देशों से आती कठोर प्रतिक्रिया के बीच दोनो पक्षों को अपने संबंधों को एक नई दिशा देने की आवश्कता है


हिंद प्रशांत क्षेत्र और आसियान : भौगोलिक रूप से आसियान समूह के देश हिन्द–प्रशांत क्षेत्र के केंद्र में स्थित है, जो पूर्व की तुलना में वर्तमान परिस्थितियों अत्यधिक विवादित और वैश्विक शक्तियों के बीच संघर्षों का तप्त स्थल बनता जा रहा है । आसियान समूह द्विपक्षीय,क्षेत्रीय और बहुपक्षीय स्तरों पर हिन्द–प्रशांत देशों के साथ कार्य कर रहा है। हिन्द–प्रशांत के प्रति चीन की अति संवेदनशीलता को देखते हुए दक्षिण पूर्व एशिया के देश अध्रुवीकृत थे और अनमने ढंग से अनाधिकारिक रूप से इस अवधारणा का समर्थन करने को अनिच्छुक भी थे।


हालांकि,बीते एक दशकों से जब उनकी संप्रभुता को नए सुरक्षा खतरों के साथ साथ उभरती नई भू– सामरिक और राजनीतिक चुनौतियों का जब सामना करना पड़ रहा है तो आसियान समूह को हिन्द–प्रशांत संरचना के विकास के प्रति अपने दृष्टिकोण को नए सिरे से विचार करने को प्रेरित किया है।


चीन का संपूर्ण दक्षिण चीन सागर पर ऐतिहासिक रूप बेतुके दावों पर आसियान समूह ने चीन के शुरुआती दावे को बेहद हल्के में लिया नतीजतन हालिया चीन द्वारा जारी किए गए नए नक्शे को लेकर दक्षिण चीन सागर अपना हिस्सा जताने वाले आसियान समूह के देशों में खलबली मची हुई है।


मौजूदा समय में आसियान समूह को हिन्द–प्रशांत की नई भू–सामरिक राजनीति के लिए व्यापक और बहुआयामी रणनीतिक दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है वह भी तब चीन का वुल्फ  वारियर राजनय और समुद्र में लापरवाह और आक्रामक रणनीति से संबद्ध देश पीड़ित हो रहे हैं ।


हिन्द प्रशांत में नियम आधारित क्षेत्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए, हिन्द प्रशांत पर आसियान के दृष्टिकोण (एओआईपी) जिसे बीते जून 2019 में अपनाया गया था। 


एओआईपी के तहत  हिन्द–प्रशांत क्षेत्र पर व्यापक दृष्टिकोण और आसियान समूह ने अपने भौगोलिक रूप से अपने पत्ते खोलते हुए स्पष्ट किया कि -

पहला,आसियान,हिन्द प्रशांत को एशिया प्रशांत क्षेत्र के साथ हिन्द महासागर क्षेत्र के रूप में देखता है।

दूसरा,हिन्द महासागर क्षेत्र और प्रशांत महासागर क्षेत्र को आसियान द्वारा केवल निकटस्थ प्रादेशिक स्थान नहीं माना जाता है बल्कि वे दोनो घनिष्ठतम रूप से एकीकृत और परस्पर जुड़ा हुआ क्षेत्र माना जाता है जिसमें आसियान समूह की केंद्रीय, रणनितिक और सामरिक भूमिका है।

इसके अतिरिक्त  हिन्द प्रशांत पर आसियान समूह  के दृष्टिकोण को अमली जामा पहनाने के लिए एओआईपी ने उच्च प्राथमिकता वाले चार क्षेत्रों पर ध्यान केंद्रित किया – ये हैं समुद्री सहयोग;कनेक्टिविटी; संयुक्त राष्ट्र के एसडीजी 2030; एवं आर्थिक और सहयोग के अन्य क्षेत्र।


भारत के लिए आसियान की केंद्रीयता न केवल इसकी लुक ईस्ट एवं एक्ट ईस्ट नीतियों को उपज है बल्कि यह क्षेत्रीय शांति और समृद्धि के हिन्द प्रशांत दृष्टिकोण का अभिन्न अंग भी है। 


इसी क्रम में बीते 12 नवंबर 2022 को जारी आसियान– भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी पर संयुक्त बयान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र में विकसित क्षेत्रीय संरचना में आसियान समूह  की केंद्रीयता के लिए समर्थन को दोहराया गया है,जो क्षेत्रीय शांति, सुरक्षाऔर समृद्धि के लिए महत्वपूर्ण  होगा।


 इस कड़ी में 4 नवंबर, 2019 को 14वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा घोषित हिन्द प्रशांत महासागर पहल (आईपीओआई ) में एक सुरक्षित, और स्थिर समुद्री क्षेत्र सुनिश्चित करने के लिए इच्छुक राष्ट्रों के बीच सहयोगात्मक संरचना बनाने का प्रस्ताव दिया।


इसका मुख्य उद्देश्य हिन्द प्रशांत क्षेत्र में उभरते तमाम मतभेदों एवं चुनौतियों पर एक आम सहमति के माध्यम से आपसी सहयोग का निर्माण करना है। 


भारत द्वारा अवधारित आईपीओआई  की बुनियादी अवधारणा समुद्री सहयोग और सहयोग के सात बुनियादी पहलुओं की पहचान करता है जो एओआईपी के सहयोग के व्यापक क्षेत्रों के साथ इसकी पूरकता को साझा करता है।


आईपीओआई समुद्री सहयोग और सहयोग के इन सात बुनियादी पहलुओं को चिन्हित करता है । 

 (1) समुद्री सुरक्षा

 (2) समुद्री पारिस्थितिकी

 (3) समुद्री संसाधन

 (4) क्षमता निर्माण और संसाधन साझा करना

(5) आपदा जोखिम न्यूनीकरण और प्रबंधन।

(6) विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अकादमिक सहयोग और

 (7) व्यापार संपर्क और समुद्री परिवहन ।


आईपीओआई के माध्यम से परिकल्पित सहकारी ढांचे में एओआईपी के सहयोग के व्यापक क्षेत्रों के साथ पूरकता को साझा किया गया है जिसमें समुद्री सहयोग, संयोजकता, संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्य 2030 और आर्थिक और सहयोग के अन्य क्षेत्र शामिल हैं।

28 अक्टूबर 2021 को 18वें आसियान भारत शिखर सम्मेलन में अपनाए गए क्षेत्र में शांति,स्थिरता एवं समृद्धि के लिए हिन्द–प्रशांत पर आसियान दृष्टिकोण पर सहयोग पर आसियान–भारत संयुक्त वक्तव्य में कहा गया है कि एओआईपी और आईपीओआई दोनों “.. शांति एवं सहयोग को बढ़ावा देने हेतु प्रासंगिक मूलभूत सिद्धांतों को साझा करें”। भारत की आईपीओआई और आसियान समूह को एओआईपी के बीच तालमेल, जिसमें मुक्त व्यापार और समुद्री संसाधनों के सतत उपयोग के लिए साझेदारी बनाने पर जोर दिया गया है जिससे सहयोग के दायरे में महत्त्वपूर्ण वृद्धि होगा जो कोविड 19 महामारी पश्चात आर्थिक सुधार में महत्वपूर्ण होगा।


संयुक्त राज्य अमेरिका और आसियान

जिसने आसियान के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी के स्तर को व्यापक रूप से बढ़ाया है,जो वर्तमान में  हिन्द प्रशांत की उभरती सामरिक संरचना में इसकी केंद्रीय स्वरूप का समर्थन करता है। 

अमेरिका की व्यापक हिन्द–प्रशांत रणनीति में, इसे हिन्द–प्रशांत कार्य योजना के हिस्से के रूप में 'दस प्रमुख प्रयासों' का उल्लेख है  जिनमें से सबसे प्रमुख  है 

इंडो पैसेफिक इकोनॉमिक फ्रेमवर्क फॉर प्रॉस्पेरिटी (आईपीईएफ) इसकी  घोषणा 2022 में की गई थी इसमें एएमएस के सात सदस्य देश आईपीईएफ में शामिल हो गए हैं जो व्यापक रूप से साझा शांतिपूर्ण हिन्द प्रशांत रणनीति में योगदान करते हुए दक्षिणपूर्व एशिया के साथ अमेरिकी आर्थिक संबंधों को मजबूत करने में मदद करता है।    


पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और भारत ।


पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन भारत-प्रशांत में प्रमुख नेताओं के नेतृत्व वाला मंच है।

 2005 में अपनी स्थापना के बाद से यह संगठन पूर्वी एशिया के रणनीतिक और भू-राजनीतिक विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में

10 आसियान सदस्य देशों और रूस,संयुक्त राज्य अमेरिका,भारत,चीन,जापान,दक्षिण कोरिया,ऑस्ट्रेलिया,न्यूजीलैंड शामिल हैं।


भारत, पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन का संस्थापक सदस्य होने के नाते,पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन को मजबूत करने और समकालीन चुनौतियों से निपटने के लिए इसे और अधिक प्रभावी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। 


यह आसियान आउटलुक ऑन इंडो पैसिफिक (एओआईपी) और इंडो-पैसिफिक ओशन इनीशिएटिव (आईपीओआई) के जुड़ने से संबंधित हिंद-प्रशांत में व्यावहारिक सहयोग को आगे बढ़ाने के लिए यह एक बेहद महत्वपूर्ण मंच है। 


पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन की अवधारणा और संकल्पना को मलेशिया के तत्कालीन प्रधानमंत्री महाथिर बिन मोहम्मद ने 1991 में प्रस्तुत किया था और करीब डेढ़ दशक के बाद इसे संगठनात्मक रूप देते हुए इसका पहला शिखर सम्मेलन लेशिया की राजधानी कुआलालम्पुर में 14 दिसंबर 2005 को आयोजित हुआ ।


जी -20 की पहली बार मेजबानी में व्यस्त भारत इस मंच को कितनी अहमियत देता है इसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इस सम्मेलन में हिस्सा लेने के फैसले से ही समझा जा सकता है,अपने व्यस्ततम कार्यक्रम के बीच प्रधानमंत्री आसियान और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भागीदारी के लिए इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता की यात्रा करेंगे।

यह प्रधानमंत्री मोदी की एक साल के भीतर यह दूसरी इंडोनेशिया यात्रा होगी जी-20 के सम्मेलनों में पिछले और भावी अध्यक्षों की भी भूमिका भी होती है, इस लिहाज से इंडोनेशिया आसियान और जी-20 दोनों में बेहद महत्पूर्ण भूमिका में है।

इससे पहले भी कोविड- 19 महामारी के दौरान प्रधानमंत्री 27 अक्टूबर, 2021 को होने वाले 16वें पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में भी वर्चुअली शामिल हुए थे और उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने नवंबर 2022 में आयोजित 17वें शिखर सम्मेलन में हिस्सा लिया था।





व्यापक संबंध के अन्य क्षेत्र: 


आसियान और भारत  व्यापक रणनीतिक साझेदारी के लिए  मौजूदा रणनीतिक साझेदारी मेकेनिज्म को और मजबूत बनाने की आवश्यकता है । इसी कड़ी में  हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति,स्थिरता,समुद्री सुरक्षा और खुला और उन्मुक्त नौवहन की स्वतंत्रता और ओवरफ्लाइट को बनाए रखने और इसे बढ़ावा देने के महत्व की पुष्टि करना शामिल है। भारत और आसियान देश जैव संपदा की दृष्टि से बेहद संपन्न हैं। 


इसके अतिरिक्त समुद्री गतिविधियों,जापान द्वारा फुकुशिमा हादसे के शोधित विकरणीय जल को समुद्र में विसर्जित करने के बाद इस समूह को नीली अर्थव्यस्था के आवश्यक क्षेत्रों जैसे स्वच्छ समुद्र, समुद्री पारिस्थितिकी और जैव विविधता पर विशेष ध्यान देने की आवश्कता है।


इसके अतरिक्त नार्को आतंकवाद का मुकाबला, अंतर्राष्ट्रीय अपराध, साइबर सुरक्षा,डिजिटल अर्थव्यवस्था,क्षेत्रीय संपर्क,स्मार्ट कृषि और कृषकीय नवाचार, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, पर्यटन और हॉस्पिटलिटी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारत-आसियान सहयोग बढ़ाने की असीम संभावना है जिसे तलाशने की शीर्ष स्तर अप आगामी शिखर सम्मेलन में हम इनकी प्रतिबद्धता को देख सकेंगे।



संपर्क के अन्य क्षेत्र: भारत और आसियान :  सूचना और संचार प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में उभरते क्षेत्र, क्षमता निर्माण और ज्ञान साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अगली पीढ़ी के स्मार्ट शहर और समाज 5.0 में आईओटी और एआई का अनुप्रयोग ,पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में ,भविष्य के लिए सतत डेटा और परिवहन नेटवर्क और इनका मानक और अनुप्रयोग,आईओटी के लिए 5डी प्रौद्योगिकियां और भविष्य के रुझान, डिजिटल स्वास्थ्य और सुरक्षा संरक्षण के कार्यान्वयन में आईसीटी की भूमिका और भविष्य के नेटवर्क के लिए मूल्यांकन शामिल है। डिजीटल प्रौद्यौगिकी,डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास,स्टार्टअप ईकोसिस्टम और ओपन टेक्नॉलजी के विस्तार और विकास से एक दूसरे की पूरक ताकत का लाभ उठाकर भारत और आसियान के बीच सहयोग को मजबूत करेंगे


विज्ञान और प्रौद्योगिकी:

भारत मानता है कि विज्ञानऔर प्रौद्योगिकी समाज की अब तक अपूर्ण रही आवश्यकताओं को पूरा करने और हम सभी के सामने आने वाली वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने में सक्षम उपकरण बनेगी। 

इसलिए इस क्षेत्र में समावेशी विकास, रोजगार सृजन के लिए सस्ती एवं लागत प्रभावी  प्रौद्योगिकियों पर ध्यान केंद्रित करने के साथ ही शहरी और ग्रामीण अंतर के बीच असमानताओं को पाटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी से  अधिक लाभ उठाने की आवश्यकता है।''

इसी कड़ी में आसियान-भारत विज्ञान और प्रौद्योगिकी विकास कोष (एआईएसईएएन -इंडिया साइंस एंड टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड- एआईएस टीडीएफ) 

शांति, प्रगति और साझा समृद्धि के लिए कार्य योजनाओं के माध्यम से परस्पर सहयोग करना, ब्ल्यू इकॉनमी ,स्वास्थ्य सेवा,जलवायु परिवर्तन और कार्रवाई और सतत विकास जैसे विभिन्न क्षेत्रों तक फैला हुआ है। इसका मुख्य उद्देश्य सस्ती लगात प्रभावी प्रौद्योगिकियों के विकास पर विशेष ध्यान देने के ही शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के बीच असमानताओं को पाटने के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाना है जिससे आसियान-भारत व्यापक रणनीतिक साझेदारी’ से दोनों ही पक्षों को विशेषकर महामारी के बाद के दौर में सार्थक लाभ प्राप्‍त हो सके।




आसियान-भारत के महत्त्वपूर्ण टाइम लाइन ।


•भारत 1996 में आसियान वार्ता का भागीदार देश बना।

•आसियान और भारत के बीच द्विपक्षीय  व्यापार 2019 में 77.0 बिलियन $ पहुंच गया जबकि भारत से कुल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का प्रवाह 2.0 बिलियन $ था।


 •इसने भारत को आसियान के छठे सबसे बड़े व्यापारिक भागीदार और आसियान के बीच एफडीआई के आठवें सबसे बड़े स्रोत के रूप में स्थापित किया।  


•संवाद भागीदार के रूप में 2003 में दूसरे आसियान-भारत शिखर सम्मेलन में, नेताओं ने व्यापक आर्थिक सहयोग पर आसियान-भारत फ्रेमवर्क समझौते पर हस्ताक्षर किए


•इस फ्रेमवर्क समझौते ने आसियान-भारत मुक्त व्यापार क्षेत्र (एफटीए) की स्थापना के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया, जिसमें वस्तुओं, सेवाओं और निवेश में मुक्त व्यापार समझौता शामिल है।


•आसियान-भारत माल व्यापार समझौता (एआईटीआईजीए) एक जनवरी 2010 को लागू हुआ जबकि 13 अगस्त 2009 को बैंकॉक में AITIGA पर हस्ताक्षर से 1.9 बिलियन से अधिक जनसंख्यां और 5.36 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर की संयुक्त जीडीपी के साथ दुनिया के सबसे बड़े मुक्त व्यापार क्षेत्रों में से एक के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया।



•आसियान-भारत सेवा व्यापार समझौते पर 13 नवंबर 2014 को सभी देशों ने हस्ताक्षर किए गए थे और यह एक जुलाई 2015 से लागू हुआ था।


•वर्तमान में इन समझौते को सभी पक्षों द्वारा अनुमोदित किया गया है। इस बीच, 12 नवंबर 2014 को सभी पक्षों द्वारा आसियान-भारत निवेश समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इन समझौतों को बीते 1 जुलाई 2015 को लागू किया जा चुका है,फिलहाल कंबोडिया को छोड़कर इसके सभी पक्षों द्वारा इसका अनुमोदन किया है।



नार्को टेररिज्म और आसियान।

"नार्को टेररिज्म "शब्द का पहले पहल इस्तेमाल अमेरिका में तब किया गया जब बोलीविया, कोलंबिया पेरू, निकारागुआ और अन्य मध्य अमेरिकी देशों में ड्रग्स तस्करों ने संगठित होकर इस गैर कानूनी व्यापार को संगठित किया और समानांतर सत्ता स्थापित कर लिया था।


आसियान समूह के देशों में नार्को टेररिज्म एक गंभीर चुनौती का रुख अख्तियार कर रहा है,यहां मौजूद गोल्डन क्रेसेंट या स्वर्णिम अर्धचंद्रकार भाग या सीएलएमटी देश यानि चीन म्यांमार, लाओस और थाईलैंड है। 

मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान,नई  दिल्ली की एक रिपोर्ट के मुताबिक म्यांमार का "शान प्रांत"  इस चौकड़ी में ड्रग्स का सबसे बड़ा उत्पादन करता है। 

यह चीन के साथ एक ट्राई जंक्शन बनाता है।

इन तीनों देशों में भारत की सीमा म्यांमार से साझा है जिसका सीधा असर पूर्वोत्तर भारत सहित देश के अन्य भाग में जूझना पड़ता है।



गोल्डन क्रीसेंट के लिए भारत जमीनी रूप से  ईरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान समूह वाले गोल्डन ट्राइएंगल में प्रवेश करने का महत्त्वपूर्ण हॉट स्पॉट है। 

भारत  गोल्डन ट्राइंगल या स्वर्णिम त्रिभुज और गोल्डन क्रीसेंट को आपस में जोड़ने वाला तप्त स्थल बन गया है जिसे समय रहते पूरी तरह जड़ मूल के साथ समाप्त करने की चुनौती है।

इन क्षेत्र में अवैध ड्रग्स का बेहिसाब और अनियंत्रित उत्पादन और तस्करी जिससे सामाजिक समस्या, युवाओं में नशे की लत लगना जिससे युवा पीढ़ी पूरी तरह बर्बाद हो जाती है।

इसके अतिरिक्त अंतर्राष्ट्रीय अपराध,हवाला,धन अपशोधन के जरिए देश में आतंकवादी गतिविधियां संचालित करने के लिए टेरर फाइनेंस के जरिए धन को अनवरत रूप से मुहैया किया जाता रहा है।

आखिर कैसे रोका जाय इन्हे :मनोहर पर्रिकर रक्षा अध्ययन एवं विश्लेषण संस्थान,नई  दिल्ली की एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों के साथ बहुआयामी मल्टीलेटरल सहयोग को बढ़ाते हुए इस समस्या का समाधान संभव है,जिसमे भारत के लिए आसियान समूह के देशों की सहायता बेहद महत्त्वपूर्ण है।


आसियान केंद्रीयता।

दक्षिण चीन सागर  और आसियान देशों के साथ चीन के बढ़ते क्षेत्रीय दबदबे के साथ,‘आसियान केंद्रीयता’ की संकल्पना ने  और गति पकड़ी है। दक्षिण चीन सागर में चीन का बे सिर पैर,गैरवाजिब,बेतुका और आक्रामक व्यवहार जिसके जद में आए दिन आसियान के कई सदस्य-देश चीन के साथ समुद्री क्षेत्रीय विवादों में उलझते नजर आते हुए हैं। फिलहाल ये समूह चीन के जारी किए गए नक्शों और दावे किए क्षेत्रों पर अपने तीखे सवाल जवाब में उलझा पड़ा है ।

 इस क्षेत्र में अमेरिका-चीन की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा तेज़ होने के कारण भी बढ़ी है हाल की कुछ घटनाओं से पता चलता है कि आने वाले महीनों और सालों में आसियान की केंद्रीयता पर बहस तेज़ होने की संभावना है. इस महीने की शुरुआत में, भारत-प्रशांत क्षेत्र के चार लोकतांत्रिक देश ऑस्ट्रेलिया,जापान,भारत और संयुक्त राज्य अमेरिका, यानी ‘क्वॉड’ ने इस क्षेत्र में ‘आसियान केंद्रीयता’ पर ज़ोर देने की बात कही।भारत हिंद-प्रशान्त में आसियान की केन्द्रीयता की पुष्टि करता है तथा पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन को मजबूती देने की बात करता


क्वाड और आसियान।

‘क्वॉड’ द्वारा आसियान की पुन: पुष्टि के बावजूद, विशेषज्ञ आसियान पर ‘क्वॉड’ देशों के दीर्घकालिक प्रभाव को नज़रअंदाज़ नहीं कर रहे है क्योंकि हिंद प्रशांत की संकल्पना और  ‘क्वॉड’ का बढ़ता महत्व लंबे समय में, आसियान की“एकजुट करने और प्रभाव क़ायम करने की शक्ति” को कमज़ोर बना सकता है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के चार सदस्यीय ‘क्वॉड’  और अन्य भागीदारों को शामिल करने वाली ‘क्वॉड-प्लस’ की अवधारणा को आसियान के नेतृत्व वाले मंचों के “समानांतर तंत्र” के रूप में देखा गया है। 


बीते कुछ समय से, ‘क्वॉड’ सदस्य इस पहल में आसियान और उसके सदस्य देशों को शामिल करना चाहते हैं जिसमे इंडोनेशिया और वियतनाम व्यापक रूप से बेहद मुखरता के साथ इस मंच के संभावित प्रमुख साझेदारों के रूप में उल्लिखित किए जाते रहे हैं।

भारतीय पक्ष बीते जुलाई में विदेशमंत्री एस जयशंकर ने स्पष्ट रूप से कहा की क्वाड समूह आसियान का पूरक रहेगा, उन्होंने कहा कि चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (क्वाड) हमेशा आसियान का पूरक रहेगा। एओआईपी क्वाड की परिकल्पना में योगदान देता है।


सामरिक-दृष्टि से भारत के नजरों में आसियान।

व्यापार वाणिज्य, कारोबार और भू- सामरिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से भारत के लिए आसियान महत्वपूर्ण भूमिका है और यह भारत की 'एक्ट ईस्ट पॉलिसी' का महत्वपूर्ण पड़ाव है।

चीन की दुखती रग "मलक्का दुविधा" की नैसर्गिक अवस्थिति लिए आसियान समूह के देशों के साथ भारतीय नौसेना इस स्थिति में है कि वह चीन के पूरे सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन के यातायात पर पैनी निगाह रख सकेगा।

भारतीय नौसेना के युद्धपोत और पनडुब्बीरोधी पी-8आई  विमान अब बेफ्रिकी के साथ दक्षिण चीन सागर में नियमित गश्त लगाते हैं और उड़ानें भरते हैं जिससे  हमारे युद्ध पोतों की पहुँच सुदूर पूर्व तक हो गई है।

भारत ने हाल ही में वियतनाम,फिलीपींस, मलेशिया और इंडोनेशिया के साथ अपने रणनीतिक सामरिक रिश्ते को सुदृढ़ किया है। भारत इस क्षेत्र में एक ऐसे सुरक्षा एवं सामरिक-साझेदार के रूप में पहचान बना रहा है, जिस पर आंख मूंदकर कर भरोसा किया जा सकता है।

फिलीपींस भारत और रूस का संयुक्त उपक्रम से निर्मित ब्रह्मोस मिसाइलें खरीदने के लिए मुहर लगा चुका है, जबकि वियतनाम  फिलीपींस के  राह पर चल चुका।

 वियतनाम को हमने युद्धपोत उपहार स्वरूप दिए है,भारत ने वियतनामी सैन्य अधिकारियों को पनडुब्बियों और लड़ाकू विमानों का संचालन करने वाले प्रशिक्षण के अतिरिक्त साईबर सुरक्षा और इलेक्ट्रॉनिक युद्धक प्रणाली जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा दिया है । जबकि क्वाड समूह पहले ही कह चुका है कि आसियान। हमारा पूरक है। इंडोनेशिया के साथ भारत की रक्षा साझेदारी भी बढ़ रही है,जहां भारतीय नौसेना को किलो-श्रेणी की भारतीय पनडुब्बी ने बीते फ़रवरी 2023 में पहली बार इंडोनेशिया का दौरा किया।

बीते मई में  भारत और आसियान का पहला समुद्री युद्धाभ्यास संपन्न हुआ ।

पूर्वोत्तर भारत में उग्रवाद और चरमपंथी घटनाओं का सामना करने और उन्हें समूल नाश के लिए, जैसे मामलों के लिए आसियान देशों के साथ सहयोग आवश्यक है।


भारत आसियान के साथ गहरा जुड़ाव रखता है और उसने, विशेष रूप से आसियान के नेतृत्व वाले तंत्रों जैसे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन, आसियान क्षेत्रीय मंच और एडीएमएम-प्लस के माध्यम से, क्षेत्रीय शांति और स्थिरता में योगदान देने वाले कई क्षेत्रों में अपने सक्रिय संबंध जारी रखे हैं।


भारत-आसियान रणनीतिक साझेदारी को समृद्ध सांस्कृतिक और सभ्यतागत संबंधों और लोगों के बीच सहयोग बढ़ाने के आधार पर मजबूत किया गया है। 


भारत एक मुक्त,खुले एवं समावेशी हिंद-प्रशांत क्षेत्र की वकालत करता है और सभी देशों की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हुए विवादों के शांतिपूर्ण समाधान का आह्वान करता है।



अपनी पुस्तक ‘द आसियान मिरेकल: ए कैटेलिस्ट फॉर पीस’ में किशोर महबूबानी और जेफ्रेग एसएनजी ने तर्क दिया है, कि 20वीं शताब्दी में आसियान की सफलता के पीछे एक कारक मौजूद था वह था ‘भू-राजनीतिक भाग्य’ऐसी कई भू-राजनीतिक घटनाएं हुईं,जिनसे आसियान को एक विश्वसनीय क्षेत्रीय ब्लॉक के रूप में उभरने में मदद मिली वह यहां एक सवाल भी पूछते है  क्या 21वीं सदी में भी आसियान का अपना ‘भू-राजनीतिक भाग्य’ होगा।


भारतीयों ने पूरब की तरफ हमेशा एक पोषण करने वाले सूर्योदय और प्रकाश के अवसरों के लिये देखा है अब,पहले की ही तरह, पूरब या हिंद-प्रशान्त क्षेत्र भारत के भविष्य और हमारी साझा नियति के लिये अपरिहार्य है। आसियान-भारत साझेदारी इन दोनों के लिये ही एक निर्णायक भूमिका अदा करेगी।









Saturday, September 02, 2023

इसरो का सूर्य नमस्कार

भारतीय अन्तरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने अपने बहुप्रतीक्षित सूर्य के बाहरी आवरण के अध्ययन और अनुसंधान के लिए समर्पित आदित्य-एल 1 मिशन का सफल प्रक्षेपण किया। इसरो ने अपने विश्वसनीय और बाहुबली प्रमोचन वाहन ध्रुवीय उपग्रह प्रक्षेपन यान पीएसएलवी सी- 57एक्सएल के जरिए सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र ,श्रीहरिकोटा से आज अपने निर्धारित समय 11.50 मिनट पर सफलतापूर्वक प्रमोचित किया। 


ऋग्वेद के एक श्लोक में सूर्य को कुछ इस तरह वर्णित किया गया है

उतेशिषे प्रसवस्य त्वमेक इदुत पूषा भवसि देव यामभिः। उतेदं विश्वं भुवनं वि राजसि श्यावाश्वस्ते सवितः स्तोममानशे ॥५॥

(ऋग्वेद-मण्डल »5;सूक्त »81; मन्त्र »5)


सका भावार्थ इस प्रकार है- "देवाधिपति सूर्य रचयिता, पोषक और सविता है,समस्त लोकों को यह आलोकित करता है। इस प्रकार अत्रिकुल का श्यावश्य सविता को आत्मसत्ता के अंदर एक ऐसे आलोक प्रदाता सत्य के रूप में प्रतिष्ठित करने में सफल हो चुका है, जो रचयिता है- प्रगतिशील है- मानव मात्र का पोषक है- मनुष्य को अहंभाव की सीमा से निकालकर विश्वव्यापी बना देता है, ससीम से असीम कर देता है।


सूर्य के आभामंडल को चूमने के लिए आदित्य एल 1 मिशन पूर्ण रूप से स्वदेश निर्मित इसरो का पहला मल्टी वेवलेंथ,मल्टी इंस्ट्रूमेंट,मल्टी डायरेक्शनल और वेधशाला/ऑब्जर्वेटरी क्लास सौर मिशन है ,इस मिशन के पूर्ण सफल होने पर इसरो सूर्य के अनछुए,अनसुलझे और गूढ़तम रहस्यों को समझने और उसकी बह्यतम सतह की पूरी तरह पर्यवेक्षण करने में सक्षम हो पाएगा।

भारतीय वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि आदित्य एल-1 मिशन से उन्हें सौर अंतरिक्ष में उसकी मौसम की गतिशीलता, सूर्य के बाह्यतम सतह कोरोना के तापमान, सौर चुम्बकीय तूफान, सौर तूफान व उत्सर्जन,पराबैगनी किरणों के धरती पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन में काफी मदद मिलेगी और इससे जुड़ी समस्याओं का समाधान किया जा सकेगा।

विज्ञान और सूर्य

सूर्य बेहद गर्म गैसों से बना एक गोला है जिसके केन्द्र का तापमान 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस है।सूर्य मुख्यतः हाइड्रोजन और हीलियम से मिलकर बना हुआ है। यह हमारे सौर मंडल का एकमात्र तारा है और  हमारे सौरमंडल का केंद्र है और इसका दानवी और परम शक्तिशाली गुरुत्वाकर्षण ही सौरमंडल को एक साथ बांधे रखता है।
हर्ट्जस्प्रंग-रसेल आरेख के अनुसार वर्णक्रम आधारित वर्गीकरण के अनुसार सूर्य  G-वर्ग का मुख्य अनुक्रम का तारा है। इसे अनौपचारिक तौर से पीला वामन तारा भी कहते है।

सूर्य में असीम ऊर्जा के स्रोत।

सूर्य एक गैस और प्लाज्मा का एक गोला है। इसका लगभग 91 फीसद हाइड्रोजन गैस है। परमाणु संलयन की प्रक्रिया से इसमें हाइड्रोजन, हीलियम में चिरकाल से अनवरत तब्दील होता रहता और प्लाज्मा रूपी सूर्य का तापमान इतना गर्म होता है और इसमें इतनी ऊर्जा होती है कि आवेशित कण तारे के गुरुत्वाकर्षण से बचकर अंतरिक्ष में उड़ते हैं जिसे सौर पवन/सोलर फ्लेयर्स कहा जाता है ।

हाइड्रोजन और हीलियम के अलावा, वैज्ञानिकों ने सूर्य में कम से कम 65 अन्य तत्वों का पता लगाया है। इनमें से सबसे प्रचुर मात्रा में ऑक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन, सिलिकॉन, मैग्नीशियम, नियॉन, लोहा और सल्फर आदि शामिल हैं।
सूर्य की विभिन्न परतें: सूर्य के दो मुख्य क्षेत्र है

1.आंतरिक
2.बाह्य क्षेत्र

आंतरिक क्षेत्र सौर केंद्रक (सोलर कोर) तथा उसके पश्चात क्रमश: विकिरण क्षेत्र तथा संवहण  क्षेत्र से निर्मित है।
सौर केंद्रक मे ताप नाभिकीय प्रक्रियायें अनवरत चलती रहती है। यही प्रक्रियायें ही सूर्य की प्रचुर ऊर्जा का स्रोत है। इसके आंतरिक क्षेत्र के बाहर का क्षेत्र सौर वातावरण है, जिसके भाग है फोटोस्फेयर,क्रोमोस्फेयर,संक्रमण क्षेत्र और प्रभामंडल,किरीट या कोरोना।
वर्तमान इसरो का सौर मिशन कोरोना और लैंगरेंज प्वाइंट का अध्ययन करेगा।

कोराेना : सौर वर्णमंडल के सबसे वाह्यतम भाग को सौर किरीट या कोरोना कहते हैं। यह क्रोमोस्फेयर का सहज विस्तार है लेकिन गुणधर्मो में अत्याधिक भिन्न है।
इसका विस्तार बाहरी अंतरिक्ष में लाखों किलोमीटर तक फैला है और इसे पूर्ण सूर्य ग्रहण के दौरान श्वेत वर्ण के रूप में आसानी से देखा जा सकता है। इस क्षेत्र के बाह्य भाग सूर्य की डिस्क से बहुत दूर तक ग्रहों के मध्य के अंतरिक्ष तक देखा जा सकता है।जहां एफ - कोरोना धूल के कणों से निर्मित होती हैं वहीं ई - कोरोना प्लाज्मा में मौजूद आयनों द्वारा निर्मित होती है। इस प्रकार की घटनाओं का विस्तृत अध्ययन अब तक नहीं किया जा सका है। इसका अनुमानित तापमान दस लाख डिग्री केल्विन तक होने की संभावना व्यक्त की जाती रही है।

वैज्ञानिक अध्ययन : 1869 मे अमरीका के खगोलशास्त्री डब्लू हार्कनेस और सी ए यंग ने पहली बार सौर प्रभामंडल के वर्णक्रम का अध्ययन किया।
इसके बाद 1930 मे फ़्रेंच भौतिकविद बी लायट ने क्रोनोग्राफ़ उपकरण के द्वारा सौर प्रभामंडल का प्रथम चित्र लिया और इस क्षेत्र में उत्पन्न सौर ज्वाला जैसी संरचनाओं का अध्ययन किया।

सूर्य का तापमान?

सूर्य का कोर यानी केंद्र सूर्य का सबसे गर्म भाग होता है, जिसका औसतन तापमान पायरोमीट्रिक तापमापी से लगभग 1.5 करोड़ डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया है । सौर केंद्र से असाधारण मात्रा में ऊर्जा उत्सर्जित होती है जो ऊर्जा और प्रकाश के रूप में अनवरत उत्सर्जित होता रहता है। आप हैरान होंगे कि सूर्य के कोर में उत्पन्न ऊर्जा को सूर्य के सबसे बाहरी परत यानि कोरोना तक पहुंचने में करीब दस लाख वर्ष तक का समय लगता है। इस समय तापमान यहां गिरकर लगभग 20 लाख डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है और सतह पर आते आते इसका तापमान नाटकीय रूप से करीब छह  हजार डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है लेकिन यह अभी भी इतना अधिक गर्म होता है कि पृथ्वी की सबसे कठोर वस्तु माने जाने वाले हीरा, इसमें आसानी से उबल जाए।
वैज्ञानिकों का मानना जय कि जैसे-जैसे सूर्य के केंद्र से दूरी बढ़ती जाएगी, तापमान में गिरावट आने की उम्मीद होगी। सौर वायुमंडल में तापमान में यह नाटकीय वृद्धि सबसे बड़ी  अबूझ और अनसुलझी गुत्थी रहस्यों में से एक है। इसरो का आदित्य-एल1 मिशन के उद्देश्यों में एक इसके तापमान भिन्नता को पता लगाना भी शामिल है।

सारा द्रव्यमान समेटे हमारे सौरमंडल का करीब 99.86 फीसदी द्रव्यमान केवल सूर्य में ही है। इसका आसान अर्थ यह है कि बाकी 0.14 फीसदी में ही सभी ग्रह और आकाशीय पिंड समाए हैं। आकाशगंगा में सूर्य करीब 220 किलोमीटर प्रति सेंकड की गति से यात्रा करता है और सूर्य को पूरी आकाशगंगा का एक चक्कर लगाने में सूर्य को संभवतः 22 से 25 करोड़ साल लगेंगे।

इसके दानवी गुरूत्वाकर्षण का असर यह है कि सूर्य में धरती के आकार के लगभग 10 लाख पिंड समा सकते है मतलब अगर धरती पर किसी 70 किलोग्राम वाले व्यक्ति का भार सूर्य की सतह पर करीब 1960 किलोग्राम होगा। इसका वैज्ञानिक कारण यह है कि सूर्य पर गुरूत्वाकर्षण बल धरती के मुकाबले करीब 28 गुना ज्यादा होता है और सूर्य की सतह पर एक दिन धरती के 25.38 दिनों के बराबर होता है।

इसरो के मुताबिक,आदित्य-एल1 राष्ट्रीय संस्थानों की भागीदारी वाला पूरी तरह से स्वदेशी प्रयास है.
इसरो को उम्मीद है कि आदित्य एल -1 मिशन से सूर्य के तापमान,पराबैगनी किरणों के धरती, खासकर ओजोन परत पर पड़ने वाले प्रभावों और अंतरिक्ष में मौसम की गतिशीलता का अध्ययन किया जा सकेगा

आखिर क्या है  L1 प्वाइंट ?

एल - 1 या लैग्रेंज पॉइंट का नाम प्रख्यात  फ्रेंच- इतालवी नक्षत्रविज्ञानी,गणितज्ञ,भौतिकविद और सेलेस्टियल मेकेनिक्स के पुरोधा जोसेफ-लुई लैग्रेंज के सम्मान में रखा गया है। जिसे सोलर एस्ट्रोफिजिक्स की शब्दावली में एल-1 के नाम से जाना जाता है। 

पृथ्वी और सूर्य के बीच कुल जमा पांच ऐसे बिंदू हैं जहां सूर्य और पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल संतुलित अवस्था में आ जाता है और यहां अपकेंद्रीय बल की स्थिति बन जाती है।
इसे आसान अर्थ में समझा जाय तो एल-1 ऐसा पॉइंट है जहां पर कोई भी वस्तु सूर्य और धरती से बराबर दूरी पर स्थिर रह सकता है और ऐसे  इस बिंदु  पर अगर किसी वस्तु को रखा जाता है तो वह आसानी से दोनों के बीच स्थिर रहता है और ऊर्जा भी कम लगती है। लैग्रेंज बिंदू को और आसान शब्दों में समझने के लिए  आप कह सकते हैं कि - गहरे अन्तरिक्ष में लैग्रेंजियन बिंदु एक ऐसा जगह है जहां दो पिंडों के बीच प्रभावी रूप से कार्य करने वाले सभी गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को निष्प्रभावी कर देते हैं। इसरो को यहां सूर्य के अध्ययन के लिए बिना किसी रुकावट के साथ सूर्य का अध्ययन संभव हो सकेगा,चूंकि यहां वायुमंडल का आभाव है इसलिए आदित्य एल 1 बेहद स्थिरता को प्राप्त कर अपनी वैज्ञानिक गतिविधियों को अंजाम दे सकेगा।

पहला लैग्रेंज पॉइंट(एल 1) धरती और सूर्य के बीच 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर है। वैज्ञानिकों के अनुसार कुल पांच लैग्रेंज पॉइंट हैं जिसे एल1,एल2, एल 3 ,एल4 और एल5 के नाम से जाना जाता है।

आदित्य एल- 1 मिशन को सूर्य-पृथ्वी की व्यवस्था के लाग्रेंज बिंदु 1 (एल - 1) के चारों ओर एक प्रभामंडल कक्षा में रखा जाएगा,जो पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर अवस्थित है। यह दूरी इसलिए जरूरी है है क्योंकि इस बिंदु  से सूर्य को बिना किसी व्यवधान या ग्रहण से मुक्त अवस्था में इसे लगातार पर्यवेक्षण और समीक्षा करने मौका मिलेगा।  इस बिंदु से इसरो सूर्य के बाहरी आवरण पर  होने वाली तमाम छोटी बड़ी हरकतों को रियल टाइम मॉनिटर कर सकने में पूरी तरह सक्षम होगा ।

 
इसरो के इस मिशन से उम्मीद की जा रही है कि आदित्य एल 1 के पेलोड से कोरोनल हीटिंग, कोरोनल मास इजेक्शन, प्री-फ्लेयर और फ्लेयर की विशेषताओं, सौर आवरण में कणीय गतिशीलता और अन्तरिक्ष के मौसम को समझने के लिए सटीक जानकारी मुहैय्या कराएगा।

अंतरिक्ष में आदित्य एल-1 जिस स्थान पर जाएगा वो स्थान पृथ्वी से 15 लाख किलोमीटर की दूरी पर स्थित है जिसे यह 125से127 दिन में पूरी करेगा। पृथ्वी से सूर्य की दूरी 150 मिलियन लाख किलोमीटर है। आदित्य-एल1 मिशन, जिसका उद्देश्य एल 1 के चारों ओर की कक्षा से सूर्य का अध्ययन करना है। यह सूर्य की विभिन्न तरंग दैर्ध्य वाले बैंड्स में प्रकाशमंडल, क्रोमोस्फीयर और सूर्य की सबसे बाहरी परत यानि कोरोना  का निरीक्षण और पर्यवेक्षण करने के लिए सात पेलोड ले गया है।

इसके लिए इसरो ने दो तरह यानि सुदूर संवेदन /रिमोट सेंसिंग और इन सीटू अध्ययन के लिए  सात विशेष किस्म के उपकरणों को इस कार्य के लगाया है । सुदूर संवेदन /रिमोट सेंसिंग श्रेणी में इसरो ने चार उपकरण ऑन बोर्ड लगाए हैं।

1.कोरोना क्षेत्र के स्पेक्ट्रोस्कोपिक इमेजिंग के लिए। विजिबल एमिसन लाइन कोरोनाग्राफ (वी इ एल सी), इसे भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान,बैंगलुरु ने विकसित किया है।

2.नैरो और ब्रॉडबैंड स्तर पर फोटोस्फेयर और क्रोमॉस्फेयर के अध्ययन के लिए सोलर अल्ट्रावायलेट इमेजिंग टेलीस्कोप (एस यू आई टी )। इसे इंटर यूनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजिक्स,पुणे ने विकसित किया है,

3.सूर्य को तारे के रुप में अध्ययन और सॉफ्ट एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर से आंकड़े प्राप्त करने के लिए सोलर लो एनर्जी एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर (एस ओएल ई एक्स एस) इसे यू आर राव सैटेलाइट सेंटर, बेंगलुरु ने विकसित किया है,

4.सूर्य को तारे के रुप में अध्ययन और हार्ड एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर से आंकड़े प्राप्त करने के लिए हाई एनर्जी एल 1ऑर्बिटिंग एक्स रे स्पेक्ट्रोमीटर (एच ई एल1ओ एस) इसे यू आर राव सैटेलाइट सेंटर, बैंगलोर ने विकसित किया है।

जबकि इन - सीटू श्रेणी के तीन उपकरणों का मुख्य कार्य एल 1 बिंदू के स्थानीय पर्यावरण का खास रूप से नजर रखते हुए आवश्यक आंकड़े को जुटाना है ।

1.आदित्य सोलर विंड पार्टिकल एक्सपेरिमेंट (एएसपीईएक्स) सौर पवन  और उत्पन्न प्रोटॉन्स और भारी आयंस की कणीय गति की निगरानी करेगा ।इसे भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला,अहमदाबाद ने विकसित किया है,

2.जबकि प्लाज्मा  एनालाइजर पैकेज फॉर आदित्य (पीएपीए/पापा) सौर पवन और उत्पन्न इलेक्ट्रॉन्स और भारी आयन की कणीय गति की निगरानी करेगा। इसे अंतरिक्ष भौतिकी प्रयोगशाला, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, तिरुवनंतपुरम ने विकसित किया है।

3.सूर्य के इस क्षेत्र में उत्पन्न इन- सीटू  बी एक्स,बी वाई और बी जेड स्तर के चुम्बकीय क्षेत्र के समुचित अध्ययन के लिए एडवांस्ड ट्राई एक्सियल हाई रेजोल्यूशन डिजीटल मैग्नेटोमीटर मौजूद है। इसे इलेक्ट्रो ऑप्टिक्स सिस्टम प्रयोगशाला,बेंगलुरु में विकसित किया गया है

आदित्य-एल1 मिशन का लक्ष्य एल1 के चारों ओर की कक्षा से सूर्य का अध्ययन करना है क्योंकि  सूरज से प्रचुर मात्रा में पराबैंगनी किरणें निकलती है और इसे 2000-4000 एंगस्ट्रॉम के रेंज वाली तरंगदैर्ध्य की पराबैंगनी किरणों का अध्ययन किया जायेगा। इससे पहले दुनिया में इस स्तर की पराबैंगनी किरणों का पहले पहल अध्ययन नहीं किया जा सका था।

इस मिशन से संबंधित सबसे महत्वपूर्ण पेलोड विजिबल लाइन इमिसन कोरोनाग्राफ (VELC) है,जिसे बेंगलुरु अवस्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एस्ट्रोफिजिक्स (IIA) ने विकसित किया है और छह पेलोड्स इसरो और अन्य भारतीय संस्थानों ने बनाया है।

अल्ट्रा वायलेट (यूवी)पेलोड का इस्तेमाल कोरोना और सोलर क्रोमोस्फीयर पर,जबकि एक्स-रे पेलोड का इस्तेमाल सूर्य की लपटों (सोलर फ्लेयर्स )को देखने समझने और इसके अध्ययन के लिए किया जाएगा,

पार्टिकल डिटेक्टर और मैग्नेटोमीटर पेलोड,चार्ज्ड पार्टिकल के हेलो ऑर्बिट तक पहुंचने वाली चुम्बकीय क्षेत्र के बारे में बेहतर जानकारी देंगे।

ये पेलोड सूर्य के प्रकाशमंडल,वर्णमंडल और सबसे बह्यतम परत कोरोना का अध्ययन करेंगे। इन सात में से चार पेलोड लगातार सूर्य की तमाम गतिविधियों पर नजर रखेंगे जबकि अन्य तीन पेलोड परिस्थितियों के हिसाब से कणों और इसके चुम्बकीय क्षेत्र और उसके प्रभाव का अध्ययन करेंगे।

कैसे कार्य करेगा यह मिशन

इसरो के मुताबिक सबसे पहले उपग्रह को पृथ्वी के निचली कक्षा में प्रक्षेपित किया जाएगा फिर शनै शैनै उसके अंडाकार कक्षा में प्रमोचित किया जाता रहेगा।


आसान तरीके से समझे तो हर दूसरी कक्षा पहली कक्षा से ज्यादा अंडाकार और पृथ्वी से दूर होती जाएगी और तयशुदा वक्त के बाद में इसे लैग्रेंज पॉइंट की तरफ भेजा जाएगा। यह एक ऐसा बिंदु है जहां सूर्य और पृथ्वी दोनों का गुरुत्वाकर्षण बल एक-दूसरे को संतुलित करता है फलस्वरूप उपग्रह  को न ही सूरज अपनी तरफ खींचेगा और न ही पृथ्वी उसे अपनी तरफ नतीजा ... ईंधन की  खपत बेहद कम होगी और उपग्रह एल 1 बिंदू के चारों ओर के कक्षा में चक्कर लगाता रहेगा।

पृथ्वी के चारों ओर चक्कर लगाने के बाद जब उपग्रह  एल 1 की ओर अग्रसर होगा तो यह पृथ्वी के गुरुत्वीय प्रभाव के घेरे या अर्थ ग्रेविटेशनल स्फीयर ऑफ इनफ्लूएंस,जिसे सोलर फिजिक्स की भाषा में एसओआई कहते है,उससे पूरी तरह से बाहर निकल जाएगा।

एसओआई अवस्था से बाहर आने के बाद इस मिशन का क्रूज़ फेज़ शुरू होगा। इस अवस्था में उपग्रह पृथ्वी से दूर और एल 1 बिंदु की तरफ जाएगा और यहां उपग्रह के प्रणोदक का इस्तेमाल होगा जो इसे जरूरी थ्रस्ट मुहैय्या कराएगा।

क्रूज़ अवस्था को सफलतम प्राप्त करने के पश्चात उपग्रह को एल 1 बिंदू के चारो ओर की कक्षा में उपग्रह को प्रक्षेपित किया जाएगा। आदित्य मिशन के प्रक्षेपण से उसे निर्धारित एल -1 के कक्षा में पहुंचने तक करीब चार माह का वक़्त लगेगा।
यहां यह स्पष्ट रूप से समझने की जरूरत है कि
आदित्य एल - 1 मिशन के तहत उपग्रह पृथ्वी से करीब 15 लाख किलोमीटर दूरी के लिए प्रक्षेपित की जाएगी. यह दूरी पृथ्वी से चांद तक की दूरी से करीब 4 गुना ज्यादा  है ।

सूर्य का अध्ययन क्यों है जरूरी?

इसरो के मुताबिक, सूर्य का अध्ययन करके हम अपनी आकाशगंगा के तारों के साथ-साथ ब्रह्मांड में मौजूद अन्य आकाशगंगाओं और तारों के संबंध में विस्तृत जानकारी जुटा सकते ।

सूर्य एक अत्यंत गतिशील और उच्चतम तापमान वाला तारा है ,यह फिलहाल हमारे मौजूदा विज्ञान की  समझ से कहीं परे है । सूर्य इसमें कई विस्फोटकारी घटनाएं होती हैं यानी कोरोनल मास इजेक्शन इसमें सूर्य में होने वाले सबसे शक्तिशाली विस्फोट होता है जो सौर ज्वाला के रूप में सीधे पृथ्वी की ओर आते है और इसके अल्पतम प्रभाव मात्र से ही हमारे संचार व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है, उपग्रह आधारित संचार व्यवस्था सालाना इस परिघटना यानी "सन आउटेज"का शिकार होती है।

इसके अतिरिक्त सौर विस्फोट और अन्य प्रकार की सौर हलचल से सौर मंडल में भारी मात्रा में ऊर्जा भी उत्सर्जित होती है जिसका सीधा असर पृथ्वी के सबसे बाह्यतम सुरक्षा कवच यानि ओजोन परत को भुगतना पड़ता है और यह वैश्विक तापन यानि ग्लोबल वार्मिंग जैसे संकल्पना को बढावा देता है।

सूर्य के आन्तरिक और बाह्यतम वातावरण में नियमित रूप से असंख्य तापीय और चुंबकीय  परिघटनाएं घटनाएं घटती है जिनका स्वरूप प्रचंड प्रकृति की होती है और ये दर्ज नहीं की जा सकी है। वैज्ञानिकों के लिए  सूर्य इन परिघटनाओं  को समझने के लिए सर्वोत्तम प्राकृतिक प्रयोगशाला/वेधशाला की सुविधा प्रदान करता है क्योंकि इनका अध्य्यन पृथ्वी पर उपलब्ध  प्रयोगशाला में अध्ययन नहीं किया जा सकता है।

आदित्य एल 1 मिशन की विशिष्टता•

•पहली बार निकट अल्ट्रा वायलेट/यूवी बैंड में स्थानिक रूप से विभेदित सौर डिस्क का अध्ययन करने में सक्षम हो सकेगा इसरो

• कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई) की गतिशीलता सौर डिस्क के करीब (~ 1.05 सौर त्रिज्या से) और इस प्रकार सीएमई के त्वरण की जानकारी जुटाना जिसे लगातार नहीं देखा जा सकता  है।

• अनुकूलित अवलोकन और जरूरी डेटा वॉल्यूम के लिए सीएमई और सौर फ्लेयर्स का पता लगाने के लिए ऑन-बोर्ड इंटेलिजेंस।

• बहु दिशा आयामी अवलोकन का उपयोग और प्राप्त जानकारी को सौर पवन की दिशात्मक और ऊर्जा अनिसोट्रॉपी करने में सक्षम हो सकेंगे।

पाठकों के लिए यह स्पष्ट कर दें कि यह उपग्रह सूर्य की सतह तक नहीं जाएगा,फिलहाल ऐसी कोई तकनीक विकसित नहीं हुई कि जो सूर्य की सतह या उसके बेहद निकटतम बिंदु पर भी कोई उपग्रह एकदम सही से या उसके नजदीक भी पहुंच सके क्योंकि सूर्य का अथाह तापमान में उस उपग्रह की स्थिति सम्पाती माफिक हो जायेगी ।

इस मिशन का सूर्य  के पास पहुंचने का मतलब,सूर्य तक पहुंचना बिल्कुल नहीं है क्योंकि सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी लगभग 15 करोड़ किलोमीटर है और आदित्य-एल 1 मिशन, सूर्य की दिशा में इस दूरी का केवल सौवें हिस्से की दूरी पर अवस्थित होगा और अपना जरूरी वैज्ञानिक कार्य करेगा।

आदित्य-एल1 मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्य

इसरो द्वारा उपलब्ध कराए गए इस मिशन संबंधी दस्तावेज के अध्ययन से  प्राप्त जानकारी के अनुसार यह मिशन
•सौर ऊपरी वायुमंडलीय यानि सूर्य के क्रोमोस्फीयर और कोरोना के गतिकी और तापमान संबंधी का अध्ययन करेगा। या सामान्य अन्य शब्दों में कोरोनल हीटिंग और सौर पवन त्वरण को समझना।

•क्रोमोस्फेयर और कोरोना के तापमान के साथ साथ  आंशिक रूप से आयनित प्लाज्मा की भौतिकी, कोरोनल मास इजेक्शन की शुरुआत और सोलर फ्लेयर्स का भी अध्ययन करेगा

•सौर कण की गतिशीलता के अध्ययन के लिए डेटा प्रदान करने वाले  कण और प्लाज्मा वातावरण का पर्यवेक्षण करेगा

•कोरोना की भौतिकी और इसका ताप तंत्र,
कोरोना और कोरोनल लूप प्लाज्मा का निदान और तापमान, वेग और घनत्व संबंधी अध्ययन में यह मिशन सक्षम होगा।

•कोरोनल मास इजेक्शन (सी.एम.ई.) का विकास, उसकी गतिशीलता और उत्पत्ति के साथ उन प्रक्रियाओं के क्रम की पहचान करेगा जो कई परतों यानि क्रोमोस्फीयर, बेस और विस्तारित कोरोना में होती हैं और यह अंततः सौर विस्फोट की घटनाओं की ओर ले जाती हैं।

•कोरोना में चुंबकीय क्षेत्र टोपोलॉजी और चुंबकीय क्षेत्र माप सौर पवन  की उत्पत्ति उसकी संरचना और गतिशीलता को भी मापेगा और जरूरी आंकड़े जुटाएगा ।
• सौर वातावरण के युग्मन और गतिशीलता को समझना
• सौर पवन वितरण और तापमान अनिसोट्रॉपी को समझना।

सूर्य के अध्ययन के लिए वर्तमान में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी ,नासा, यूरोपीय स्पेस एजेंसी और जर्मन एयरोस्पेस सेंटर ने अलग अलग और संयुक्त अंतरिक्ष अभियान को सूर्य के अध्ययन के लिए अन्तरिक्ष में भेजा  है। इससे पहले भी सूर्य के अध्ययन के लिए  22 सौर मिशन भेजे जा चुके हैं, जिसमें नासा ने सबसे ज्यादा 14 मिशन सूर्य पर भेजे हैं। जर्मनी, अमरीका और यूरोपियन स्पेस एजेंसी सूर्य मिशन कर चुकी हैं और  अब भारत की बारी है। इन सब मिशनों में सबसे मुख्य भूमिका नासा की रही है जिसमे सूर्य के अध्ययन के लिए तीन कार्यरत तीन मुख्य मिशन हैं-
1.सोहो : सोलर एंड हेलियोस्फ़ेरिक ऑब्जर्वेटरी
2.पार्कर सोलर प्रोब और
3.आइरिस (इंटरफ़ेस रिजन इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफ़)

आदित्य एल 1 के पूर्ववर्ती अन्य देशों के सोलर मिशन 

पायनियर मिशन,हेलिओस यान और स्काईलैब अपोलो टेलिस्कोप माउंट,मैक्सिमम मिशन,योहकोह(जापान),द सोलर एंड हेलिस्फेरिक ऑब्जरवेट्री,द सोलर टेरिस्टियल रिलेशंस ऑब्जरवेट्री,सोलर डायनामिक्स ऑब्जरवेट्री
इंटरफेस रीजन इमेजिंग स्पेक्ट्रोग्राफी,पार्कर सोलर प्रोब

भारत ने चंद्रयान-3 को चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतार अंतरिक्ष महाशक्तियों की कतार में में शामिल कर दिया है। भारत मंगल से जुड़ा मिशन मंगलयान को सफलता पूर्वक प्रक्षेपित कर चुका है और बारी सूर्य से जुड़े अध्ययन  कि है जिसे इसरो अपने बहुप्रतीक्षित मिशन आदित्य एल-1 को प्रक्षेपित कर अपनी साख को सिद्ध किया।

भारतीय वैज्ञानिकों ने अंतरिक्ष विज्ञान के जटिलतम अभियांत्रिकी को अपनी असीम मेधाशक्ति और न्यूनतम संसाधनों में भारत को अन्तरिक्ष महाशक्ति का खिताब से नवाजा है जिसका लोहा दुनिया के तमाम देशों की अंतरिक्ष एजेंसियों ने माना है।





Monday, August 28, 2023

ब्रिक्स-11 : चुनौतियां और उम्मीदें

वर्तमान वैश्विक व्यवस्था राजनीति शास्त्र में पढ़े जाने वाले गूढ़ शब्दों यथा बहुपक्षीय और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की संकल्पना,दक्षिण दक्षिण सहयोग,ग्लोबल साउथ आदि शब्दों को जमीनी हकीकत पर उतरते देख रहा है। पूरी दुनिया की निगाहें बीते दिनों दक्षिण अफ्रीका में आयोजित और संपन्न हुए 15वें ब्रिक्स देशों के सम्मेलन पर टिकी रही।

एक प्रसिद्ध वैश्विक वित्तीय संस्थान गोल्डमैन सैक्स की  2001 में प्रकाशित "बिल्ड बेटर ग्लोबल इकोनॉमिक ब्रिक" शीर्षक की एक रिपोर्ट में ब्राजील,रूस,भारत और चीन को मिलाकर ‘ब्रिक’ की संकल्पना को प्रस्तावित  किया गया था।

 2009 के येकेतेरिनबर्ग से 2023 के जोहांसबर्ग सम्मेलन के बीच बीते दो दशकों के कालखंड में यह संकल्पना वर्तमान में एक प्रमुख मंच के रूप में स्थापित,मुखर,पूरी तरह परिपक्व और आज विस्तारित हो कर ब्रिक्स-11 का रूप ले चुकी है।

मौजूदा दौर में ब्राजील, रूस,भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका के साथ साथ ब्रिक्‍स समूह  में अब छः नए सदस्‍य देश शामिल होने जा रहे हैं। इनमें एशिया से तीन ईरान,संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब, अफ्रीका से दो मिस्र और इथोपिया और दक्षिण अमेरिका से अर्जेंटीना शामिल हैं।

 इसकी घोषणा मेज़बान दक्षिण अफ्रीका के राष्‍ट्रपति ने ब्रिक्‍स के नए सदस्य देशों के नाम का ऐलान किया है। इन नए देशों की सदस्‍यता आगामी एक जनवरी 2024 से प्रभावी होगी।


ब्रिक्स के विस्तार के वैश्विक मंच पर मायने।

फिलहाल ब्रिक्स समूह को चीन और रूस के इर्द गिर्द देखा जाता रहा था,क्योंकि ये दोनो देश संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के स्थाई सदस्य के साथ साथ अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के नीतिगत मसलों पर धुर विरोधी रहे हैं और ब्रिक्स को वे अमेरिका नीत देश तथा संगठनों की आलोचना करने के लिए एक प्लेटफार्म के तौर पर इस्तेमाल करने से कभी नहीं चुके।

इसके ठीक इतर ब्रिक्स के अन्य देश भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका ने अपनी स्वतंत्र राजनय का परिचय देते रहे हैं। बात अगर भारत की करें तो भारत ने ब्रिक्स समूह को व्यापक तवज्जो देते हुए चीन रूस और अमेरिका के साथ अपनी पेशेवर राजनय और कूटनीतिक दक्षता का परिचय दिया और अपनी संप्रभु विदेश नीति को प्रदर्शित किया।

2010 में दक्षिण अफ़्रीका को शामिल करने के बाद इस ब्रिक्स का सबसे बड़ा विस्तार है जिसके भू: आर्थिक,भू:राजनैतिक और भू: रणनीतिक महत्व के साथ साथ ऊर्जा सुरक्षा की संकल्पना और नए मायने को नए सिरे से समझने की अवश्यकता होगी न कि भारत रूस और चीन के इर्द गिर्द रहने की। ब्रिक्स के विस्तार के भौगोलिक पहलुओं को देखें तो हम पाते हैं कि इसका विस्तार अटलांटिक महासागर से आर्कटिक महासागर वाया प्रशांत महासागर,बाल्टिक सागर,काला सागर,लाल सागर के साथ स्वेज नहर,हारमुज की खाड़ी,अरब सागर विस्तारित हिंद महासागर से दक्षिण चीन सागर तक है । इसमे समुद्री व्यापार के बेहद महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन(एसएलओसी) मौजूद है जो पूरी तरह वैश्विक समुद्री व्यापार को नियंत्रित करती है। ग्यारह ब्रिक्स देशों की कुल जनसंख्या करीब 3.7 बिलियन है। पांच पूर्ण रूप से लोकतांत्रिक देशों के साथ अन्य छः विभिन्न राजव्यवस्था वाले देश इस अनूठे समूह में समाहित है,जिसमे  एशिया से सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के साथ ईरान तो अफ्रीका से इथोपिया और मिस्र और दक्षिण अमेरिका से अर्जेंटीना शामिल हैं।

विस्तारित ब्रिक्स: दुनिया के विकास का ग्रोथ इंजन।

राजनयिक और कारोबारी जगत ब्रिक्स समूह को  दुनिया के विकास के इंजन के रूप में स्वीकार कर रहा है,इस समूह के देशों में विनिर्माण प्रक्रिया में उल्लेखनीय बदलाव के साथ संगठन की अर्थव्यवस्था जी-7 देशों की संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के बराबर पहुंचने वाली है। जिसका संकेत पीयूष गोयल ने बीते सोमवार को ब्रिक्स विनिर्माण कारोबार सम्मेलन के उद्घाटन समारोह को संबोधित करते हुए इस तथ्य को सामने पेश किया।

ब्रिक्स देश मौजूदा वैश्विक जनसंख्या के 46 फीसद हिस्सेदारी के साथ चालू वर्ष 2023 में जहां मूल रूप से ब्रिक्स देशों की संकलित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की वैश्विक हिस्सेदारी 27.6ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के साथ 26.3 फीसद थी जो इन छह नए सदस्यों के शामिल होने के बाद यह आंकड़ा बढ़कर 30.8 ट्रिलियन डॉलर और जीडीपी की वैश्विक हिस्सेदारी बढ़कर 29.3 फीसद हो गई है जो इस समूह की बहुध्रुवीय वैश्विक मंचो पर इनकी महत्ता को दर्शाती है।

मिस्र और  ई- ब्रिक्स की संकल्पना : मिस्र के लिए ब्रिक्स की चाहत बहुत पुरानी है, हालांकि उसे इस समूह में एक दशक के बाद इस समूह में शामिल होने का अवसर मिला है। 2013 में मिस्र के तत्कालीन और दिवंगत राष्ट्रपति मुहम्मद मुर्सी, राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के दौरान भारत के दौरे पर उन्होंने ब्रिक्स समूह में शामिल होने की इच्छा जाहिर करते हुए "ई- ब्रिक्स"की संकल्पना को साझा किया,और कहा कि यहां "ई "का मतलब "इजिप्ट"से है। उन्होंने कहा था कि "मैं उम्मीद करता हूं की ब्रिक्स, "इ-ब्रिक्स " बनेगा,जहां "इ"का मतलब "इजिप्ट"से है,और मिस्र उम्मीद करता है कि उसे इस समूह में शामिल किया जाएगा" मिस्र को सर्वप्रथम ब्रिक्स के 2013 में आयोजित डर्बन बैठक आमंत्रित किया गया था,जहां उसने इस समूह की सदस्यता की अपनी मंशा जाहिर की थी।


खाड़ी के देश : ब्रिक्स और ऊर्जा सुरक्षा

इसमें कोई शक-ओ-शुब्हा नहीं है की वर्तमान सुदृढ अर्थव्यवस्था आदि  वैश्विक व्यवस्था की संकल्पना में ऊर्जा सुरक्षा की सुनिश्चितता सबसे महत्वपूर्ण कारकों में एक है फिलहाल पुराने ब्रिक्स में ऊर्जा संपन्न खाड़ी देशों की भागीदारी नहीं थी।

भारत सहित ब्रिक्स के अन्य देशों में इस्लाम को मानने वाले समुदाय की बड़ी आबादी रहती है ऐसे में इस संगठन में एक तरह की असंतुलित व्यवस्था थी, जिसे खत्म करने की कोशिश की गई है। यही वजह है कि एशिया और अफ्रीका के चार इस्लामिक देशों को इस संगठन से जुड़ने के लिए न्यौता भेजने का फैसला किया गया है। इनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात,ईरान और मिस्र शामिल हैं।

इन देशों के ब्रिक्स में शामिल होने से वे सदस्य देश जिनके पास "ऊर्जा असुरक्षा" है वैसे सदस्य देशों के लिए ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ करने और अनवरत ऊर्जा सुरक्षा मुहैया कराने के लिए यह मंच बेहद उपयोगी सिद्ध होगा। वैसे कच्चे तेल उत्पादन के लिहाज से देखा जाए तो दो शीर्ष देश रूस और सऊदी अरब अब ब्रिक्स समूह के सदस्य है,गौरतलब कि सऊदी अरब की  वैश्विक तेल उत्पादन में अकेले 12.9 फीसद की हिस्सेदारी है जबकि तेल निर्यातक देशों के समूह (ओपेक) के ईरान,सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात शामिल है।

एनर्जी इंस्टिट्यूट स्टेटिस्टिकल रिव्यू ऑफ वर्ल्ड एनर्जी की एक रिपोर्ट के अनुसार ब्रिक्स से विस्तारित ब्रिक्स की कच्चे तेल उत्पादन में हिस्सेदारी 20.4फीसद से बढ़कर 43.1 फीसद हो जायेगी । खाड़ी के दो देशों सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात के पास प्रति व्यक्ति आय काफी बेहतर स्थिति में है ,इसके अलावा उनके पास विदेशी मुद्रा भंडार भी अत्यधिक सुदृढ है ऐसे में इन देशों के ब्रिक्स समूह में  जुड़ने पर संगठन को आर्थिक ताकत और  समृद्धि मिलेगी।विगत वर्षो में देखा जा रहा कि सऊदी अरब अपनी तेल आधारित अर्थव्यव्स्था पर अपनी निर्भरता को कम करते  हुए निवेश आधारित अर्थव्यवस्था पर पूरी तरह अपना ध्यान केंद्रित कर रहा है। ऐसे में ब्रिक्स देशों को परियोजनगत और निवेश आधारित व्यवस्था से लाभ मिलेगा

न्यू डेवलपमेंट बैंक को मजबूती देने का समय।

सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों का इस समूह में शामिल होने से ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक को विश्व बैंक और अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के विकल्प की तरह और बेहतर रूप में प्रतिस्थापित किया जा सकेगा । 

ब्रिक्स सदस्यों का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष से मिलने वाला ऋण,ऋणी देश के लिए बेहद कष्टकारी सिद्ध होता है।ब्रिक्स के न्यू डेवलपमेंट बैंक में फिलहाल अत्यधिक  निवेश की जरूरत है, जिससे वह विकासशील देशों को प्रभावी ढंग से अपना समर्थन दे सकें उम्मीद है कि ब्रिक्स के विस्तार होने के पश्चात इस बैंक की आर्थिक स्थिति में बेहतरी देखने को मिलेगी जिससे यह अपने स्थापित लक्ष्य को प्राप्त कर सकेगा।



ब्रिक्स समूह अमेरिका या यूरोपीय देशों के खिलाफ नहीं

यहां यह समझना बेहद जरूरी हो जाता है की यह समूह किसी देश या दूसरे संगठन के खिलाफ इसलिए नहीं है क्योंकि यह कहीं से भी सैन्य गठजोड़ या गठबंधन का हिस्सा नहीं है। यह एक पूर्ण रूप से आर्थिक राजनितिक समूह है जिसका एकमात्र ध्येय विकासात्मक अवधारणा और आधारित है। भारत के राजनय संबंध अमेरिका और रूस के साथ बेहद परिपक्व अवस्था में है जबकि चीन के साथ सीमा संबंधी विवाद और गलवान के खूनी संघर्ष  के बाद,वास्तविक नियंत्रण रेखा पर दोनो पक्षों के व्यापक सैन्य जमावड़े के वावजूद संबंध "स्थिर"बने हुए है। जबकि अन्य सदस्य देशों के साथ साथ भारत के संबंध विशेष,आत्मीय ,सद्भावपूर्ण और गर्मजोशी भरे हुए हैं ।

इसी कड़ी में अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जेक सुलिवन का यह बयान यह बेहद महत्वपूर्ण है कि जिसमें उन्होंने हाल में कहा है कि हम ब्रिक्स को  अमेरिका विरोधी संगठन के रूप में नहीं देखते हैं। इसकी एक वजह है कि हमारे मित्र देश भी इस संगठन के मजबूत सदस्य हैं।


ब्रिक्स का विस्तार और भारत : भारत ने हमेशा इस बात पर जोर दिया है कि ब्रिक्‍स के व‍िस्‍तार से पहले नए सदस्‍यों की संख्‍या और उनके लिए समुचित मानदंड होना जरूरी है। रूस ने अब भारत के ब्रिक्‍स के विस्‍तार को लेकर रुख का पूरा समर्थन किया है।

भारत ब्रिक्स को एक "ब्रेकिंग बैरियर्स, रिवाइटलाइजिंग इकोनॉमीज,इंस्पायरिंग इनोवेशन,क्रिएटिंग अपॉर्चुनिटी और शेपिंग द फ्यूचर "के रूप में देखता है

भारत का सदा यह मत रहा है कि नए सदस्यों के जुड़ने से ब्रिक्स एक संगठन के रूप में और मज़बूत होगा, तथा हमारे सभी साझा प्रयासों को एक नया बल देने वाला होगा। 

 प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जोहांसबर्ग में अपने संबोधन में स्पष्ट रूप से कहा कि ब्रिक्स के विस्तार से  विश्व के अनेक देशों का बहुध्रुवीय विश्व व्यस्था में विश्वास और सुदृढ़ होगा। उन्होंने  कहा कि "मुझे ख़ुशी है कि हमारी टीम्स ने मिलकर ब्रिक्स के विस्तार के लिए आवश्यक मार्गदर्शक सिद्धांत,मानक, मानदंड और प्रक्रिया पर सहमति बनाई है।"

भारत बेहद मजबूती से मानता रहा है की ब्रिक्स के विस्तार में किसी ख़ास देश के सिर्फ़ इस वजह से शामिल नहीं किया जाए कि उस देश के साथ रूस या चीन के संबंध कितने प्रगाढ़ है। भारत सदैव मानता है कि ब्रिक्स समूह के देश तमाम अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों से निपटने के लिए पूरी तरह परिपक्व और सक्षम है और किसी भी वैश्विक मसले पर नेतृत्व कर सकता है ।



विस्तारित ब्रिक्स के पीछे चीन की मंशा ब्रिक्स को पश्चिम और अमेरिकी नीत गठबंधन वाले देश और वैश्विक संगठनों के विरुद्ध एक भू- आर्थिक और राजनीतिक संगठन के रूप में ढालने की रही है जबकि मूल रूप से यह समूह एक आर्थिक सहयोग का एक मंच रहा है। भारत ने सदैव इस मसले पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए एक परिपक्व विदेश नीति का परिचय देता रहा है। 

यूक्रेन में रूस के विशेष सैन्य अभियान के बाद रूस भी पश्चिमी देशों के निशाने पर आया हुआ है और इस समय वह पश्चिमी देशों के रवैये से बुरी तरह परेशान है, संभव है कि रूस को इस विस्तार से किसी तरह की कोई आपत्ति नहीं हो क्योंकि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन बहुपक्षवाद की मुखालफत कई मंचो से कर चुके हैं जिसमे उन्हे भारत का पूर्ण साथ और समर्थन भी मिला है।

 ब्राजील के साथ पश्चिमी देशों के गर्मजोशी भरे संबंध किसी से छिपे नहीं है इसलिए रियो डि जेनेरियो भी बेहद सतर्कता के साथ अपनी राजनय को प्रदर्शित करता है ।

और बात  दक्षिण अफ्रीका की तो यह चीन के प्रति फिलहाल नरम रुख अख्तियार किए हुए है, जिसकी बानगी हम बीते ब्रिक्स सम्मेलन के दौरान जोहान्सबर्ग आए चीनी राष्ट्रपति की अगुवानी करने के लिए स्वयं दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा हवाई अड्डे पर पूरे लाव लश्कर के साथ मौजूद थे।

मौजूदा वैश्विक परिदृश्य में ब्रिक्स समूह को वैश्विक क्षेत्र में एक आधिकारिक ढांचे के रूप में खुद को स्थापित करने की आवश्यकता है जिससे वैश्विक मामलों में इसका प्रभाव लगातार मजबूत हो सके। 

ब्रिक्स देशों में आपसी सहयोग इनके भविष्य की भागीदारी और  अंतरराष्ट्रीय समुदाय के समावेशी विकास का मुख्य हिस्सा बन सके । 

भारत के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है जब भारत वसुधैव कुटुंबकम्  नजरिए से विश्व बहुमत की आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए अपनी प्रतिबद्धता दर्शाता और सिद्ध करता है।

ब्रिक्स समूह के देश वैश्विक,क्षेत्रीय और द्विपक्षीय एजेंडे,समस्या और सीमा विवाद संबंधी मुद्दों जैसे अहम मसलों को संबोधित और समाधान करने के लिए  संप्रभुता, समानता,साझेदारी,सहयोग और एक-दूसरे के हितों के प्रति उचित सम्मान,क्षेत्रीय अखंडता,सीमा की पवित्रता की नैसर्गिक नीतियों के तहत बिना किसी झिझक के पालन करते हुए समस्याओं का त्वरित समाधान करें जिससे सही मायने में ब्रिक्स की प्रासंगिकता सिद्ध हो सकेगी।