आज महान अंग्रेज राजनीतिक विचारक, उदारवाद के जनक और राजनीतिक पुरोधा जॉन लॉक की 390वीं जयंती है।
उनकी जयंती हम उस समय मना रहे हैं,जब "कैंसल/कैंसिल कल्चर " की भावना से ओतप्रोत हुए वर्तमान वैश्विक राजनीतिक विचारधारा उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में बेहद गहरे तक दफन करने के भरपूर जतन किये जा रही है।
जॉन लॉक (1632-1704) सत्रहवीं शताब्दी का प्रसिद्ध अंग्रेज़ विचारक थे। इनकी मुख्य कृतियां हैं: 'लैटर ऑन टॉलरेशन' (सहिष्णुता का स्वरूप) (चार निबंध 1689,1690,1692,1704),
टू ट्रीटीजेस ऑन सिविल गवर्नमेंट'(नागरिक शासन पर दो निबंध)(1690), और 'ऐस्से कंसर्निंग ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग' (मानवीय ज्ञान का आधार) (1690)
जॉन लॉक को उदारवाद का जनक (Father of Liberalism) माना जाता है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि आधुनिक युग के आरंभिक दौर में उदारवाद और औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ने एक-दूसरे को बढ़ावा दिया और इसकी शुरुआत इंग्लैंड से हुई।
यह लॉक का ही जादू था कि उदारवाद का मूल प्रवर्तक इंग्लैंड में पैदा हुआ जबकि इस क्रांति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों और अमरीका में फैल गया और इन देशों में भी उदारवाद को बढ़ावा मिला,और वे सब उदारवाद की मुख्य धारा में आकर मिल गए।
जॉन लॉक की गिनती विश्व के उन महान राजनीतिक दार्शनिकों में होती है, जिन्होंने राजनीति के केंद्र में उस सबसे निचले तबके पर मौजूद "आम" आदमी को लाकर खड़ा किया। जो पहले सिर्फ "शासित और शोषित" था। इस आम आदमी के हाथ में न उसका ''वर्तमान" था और न ही "भविष्य''।
आम आदमी के इन हालात में जॉन लॉक ने लोगों के लिए "अधिकार" की बात की। उन्होंने कहा कि "किसी भी व्यक्ति का अपने जीवन पर प्राकृतिक और नैसर्गिक अधिकार है।"
उन्होंने बेहद मजबूती से स्पष्ट किया कि जिस किसी ने अपनी मेहनत से जो भी "संपदा" अर्जित की है, उस पर "पहला हक" उसी का है,किसी सामंत या राजा-महाराजा का नहीं।
उन्होंने बेहद मजबूती से स्पष्ट किया कि जिस किसी ने अपनी मेहनत से जो भी "संपदा" अर्जित की है, उस पर "पहला हक" उसी का है,किसी सामंत या राजा-महाराजा का नहीं।
यह बात सबसे पहले जॉन लॉक ने ही कही। उनकी जिस बात ने राजनीति की पूरी सोच बदल दी, वह थी "शासन वही होना चाहिए, जो जनता को स्वीकार्य हो"
लॉक ने सिर्फ उदारवाद की नींव ही नहीं रखी उनके विचारों से प्रभावित होकर 1789 की फ्रांस की क्रांति भी इसी नींव पर खड़ी हुई ।
यह उदारवाद ही था जिसने औद्योगिक क्रांति के अनुप्रयोग और उससे उत्पन्न सारी जरूरतों को पूरा करने के सपनों को आश्वासन में तब्दील कर दिया। जिसने "मानव अधिकारों और "नागरिक अधिकारों " को सभ्यता का 'केंद्रीय तत्व"में परिणित किया जिसकी अगली मंजिल "संवैधानिक लोकतंत्र'' था जिसे सम्पूर्ण मानव विकास की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना जाता है।
*क्या समझते है औद्योगिक क्रांति से*:
ब्रिटिश अर्थव्यस्था में उन परिवर्तनों की श्रृंखला जिनके फलस्वरूप वह एक कृषि प्रधान देश से उद्योग-प्रधान देश में परिणत हो गया। ये परिवर्तन 1760-1840 के दौरान अपने पूर्ण उत्कर्ष पर पहुँच गए। इन परिवर्तनों का आरंभ वस्त्र उद्योग के मशीनीकरण से हुआ, और बाद में खनन, परिवहन तथा औद्योगिक संगठन के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इसी क्रम में अनेक औद्योगिक नगर विकसित हो गए नहरों, पुलों, रेलमार्गों और जहासों का निर्माण हुआ। कालांतर में औद्योगिक क्रांति का प्रभाव पूरे यूरोप और विश्व के अन्य हिस्सों तक फैल गया।
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उदारवाद के विकास में जॉन लॉक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए प्रख्यात राजनीतिक दार्शनिक एम. सेलिंगर लिखते है कि ‘“जॉन लॉक पहला ऐसा राजनीति-दार्शनिक था जिसने आधुनिक उदारवाद को विस्तृत और प्रभावशाली चिंतन पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया।" जबकि सी बी मैक्फर्सन ने अपनी कालजयी कृति "द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ पोजेसिव इंडिविजुअलिज़्म(1962)"में लिखा कि "लॉक वास्तव में अंग्रेजी उदारवाद का मूल स्रोत था"।
यहाँ यह बेहद दुःखद है कि 21वीं सदी में भी यह मूलभूत नागरिक अधिकार दुनिया के कई देशों के लोगों की अभी भी मृग तृष्णा के समान हसरत हैं।
पिछले तकरीबन तीन दशक यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के बाद के दौर में हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां "उदारवाद" को अधिकतर समस्याओं की "जड़ बताया जाने लगा है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस विचारधारा के प्रबल विरोधियों में एक हैं,और रूस के दृष्टिकोण से यह शायद सही भी हो।
उदारवाद यहर किसी को व्यवस्था में एक नई संभावना सौंपने वाले दर्शन के रूप में जाना जाता है। हद तो तब हो गयी जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उदारवाद को पानी पी-पीकर कोसते थे। जबकि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने पिछले दिनों कहा था कि उदारवाद के विचार अब गुजरे जमाने की चीज होकर रह गए हैं।
उदारवाद के ख़िलाफ़ मुखालफती स्वर को हमने कनाडा पोलैंड, यूक्रेन, हंगरी, जापान, यूनान, पुर्तगाल, स्पेन और इंग्लैंड में भी देखा है,जो निश्चित रूप से बेहद चिंताजनक है।
यहां गौर करना होगा कि 17वीं सदी के प्रतिपादित लॉक के समस्त राजनीतिक दर्शन से उत्पन्न विचार उदारवाद की मुख्य मान्यताओं साथ अंतरंग रूप से गर्भनाल की भांति जुड़े हुए हैं
जैसे
★ वह मनुष्य को एक विवेकशील प्राणी (Rational Being) मानता था।
★ वह मनुष्य की तर्कबुद्धि या विवेक (Reason) को समस्त चिन्तन का आधार मानता था न कि इतिहास को ।
★ वह व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों (Natural Rights) को मान्यता देता था।
★ वह निजी संपत्ति (Private Property) को "व्यक्ति के अधिकारों" का सार तत्त्व मानता था जो प्राकृतिक कानून (Law of Nature) पर आधारित थे।
★वह अनुबंध या समझौते (Contract) को राजनीतिक सत्ता का न्यायिक आधार मानता था;
★वह नागरिक समाज (Civil Society) को कृत्रिम उपकरण (Artificial Device) मानता था जो मनुष्यों की सुविधा के लिए बनाया गया है, और
★ वह नागरिक सत्ता (Civil Authority) को अखंड या अविभाज्य (Indivisible) नहीं मानता था, बल्कि स्थापित राजनीतिक सत्ता के प्रति "विरोध के अधिकार (Right to Resistance)" को मान्यता देता था।
सही मायने में सामाजिक अनुबंध का अधिकार के जनक के रूप में हम थॉमस/टॉमस हॉब्स को मानते है लेकिन उनके विचारों को सही सही उदारवादी आधार प्रदान करने में जॉन लॉक की महती भूमिका
रही है
सामाजिक अनुबंध के सिद्धातंकार के रूप में लॉक का नाम विशेष रूप से विख्यात है। इस विषय पर लॉक के विचार उसकी प्रसिद्ध कृति 'टू ट्रीटिजेस ऑफ़ सिविल गवर्नमेंट' (शासन प दो निबंध) (1690) के अंतर्गत मिलते हैं।
सबसे पहले सामाजिक अनुबंध का विचार अंग्रेज दार्शनिक टॉमस हॉब्स (1588-1679) ने रखा था, परंतु उसे सही-सही उदारवादी आधा प्रदान करने में लॉक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विचार के प्रवर्तकों ने अपने-अपने ढंग राज्य के निर्माण की प्रक्रिया का विवरण दिया है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत राज्य के निर्माण पहले 'प्राकृतिक दशा' (State of Nature) की कल्पना की गई है और कहा कि
"मनुष्य मूलतः शालीन,अनुशासनप्रिय,विवेकशील प्राणि है जो स्वभाव से नैतिक नियमों का पालन करता है। यह शालीन अनुशासनप्रिय और सौजन्यपूर्ण हैं; वे अपने ऊपर शासन करने में समर्थ हैं।
उन्होंने "प्राकृतिक दशा" को साधारणतः 'शांति, सद्भावना,परस्पर सहायता और रक्षा' (Peace, Good Will, Mutual Assistance and Preservation) की दशा के रूप में वर्णित किया। इसमे समस्या तब होती है जब कुछ स्वार्थी लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए नैतिकता के नियमों का हनन और अवहेलना कर दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने लगते हैं जिससे प्राकृतिक दशा की शांति और सुरक्षा भंग हो जाती है और उसकी जगह शत्रुता,वैमनस्य,हिंसा और परस्पर विनाश (Hostility,Malice, Violence & Mutual Destruction) का वातावरण पैदा हो जाता है जो विधिवत सत्ता के लिए नासूर के समान होता है।
"मनुष्य मूलतः शालीन,अनुशासनप्रिय,विवेकशील प्राणि है जो स्वभाव से नैतिक नियमों का पालन करता है। यह शालीन अनुशासनप्रिय और सौजन्यपूर्ण हैं; वे अपने ऊपर शासन करने में समर्थ हैं।
उन्होंने "प्राकृतिक दशा" को साधारणतः 'शांति, सद्भावना,परस्पर सहायता और रक्षा' (Peace, Good Will, Mutual Assistance and Preservation) की दशा के रूप में वर्णित किया। इसमे समस्या तब होती है जब कुछ स्वार्थी लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए नैतिकता के नियमों का हनन और अवहेलना कर दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने लगते हैं जिससे प्राकृतिक दशा की शांति और सुरक्षा भंग हो जाती है और उसकी जगह शत्रुता,वैमनस्य,हिंसा और परस्पर विनाश (Hostility,Malice, Violence & Mutual Destruction) का वातावरण पैदा हो जाता है जो विधिवत सत्ता के लिए नासूर के समान होता है।
इनके विचारों को हम आधुनिक लोकतंत्र और राजव्यवस्था के विभिन्न अवयवों में तलाश कर सकते हैं।
बीते 2020 में अंग्रेजी की प्रसिद्ध पत्रिका "न्यूजवीक" ने इस मसले पर एक बहस भी छापी थी, जिसका शीर्षक था 'सारा दोष जॉन लॉक पर ही मढ़ा जाए?'
सत्रहवीं सदी में उत्पन्न इस विचार को राज्य की आधारभूत संरचना और समाज के साथ उसके सम्बन्ध को एक नई राह दिखाई । जिसका अनुप्रयोग " समाज की स्थापना" और "सरकार की स्थापना" में अंतर,संवैधानिक शासन, नैसर्गिक अधिकार, अनुबंध से न्यास की ओर,सरकार के प्रति विधिसम्मत विरोध का अधिकार,शक्ति का पृथक्करण, और शक्ति के केंद्रीयकरण से बचाव जैसी महत्वपूर्ण
डॉक्ट्रिन को आधुनिक राजव्यवस्था में समावेशित किया।
वर्तमान राजनीतिक चिंतक और विश्लेषकों के लिए यह गम्भीर चुनौती है कि आखिर उदारवाद के मूल तत्वों में अचानक यह क्रांतिकारी बदलाव कैसे होया ? जिस विचारधारा को भविष्य का वायुमंडल और प्राणवायु माना जा रहा था,वह अचानक ही कटघरे में कैसे खड़ा हो गया ?
जॉन लॉक के विचारों की सबसे बेहतरीन झलक अगर आप देखना चाहें तो आप इन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में संविधान में देख सकते हैं जहां इसकी विस्तृत व्याख्या मिलती है,जो विश्व का प्रथम लिखित संविधान है।
यह लॉक ही हैं जिनके उदावादी विचारों को समैकलीन उदारवादियों में सर्वश्रेष्ठ जॉन रॉल्स(1921-2002) ने इनके सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का अनुसरण करते हुए न्याय का विस्तृत सिद्धान्त A Theory of justice में प्रतिपादित किया जो आधुनिक न्यायशास्त्र का मूल आधार है।
लॉक के विचारों को बढ़ावा देने में मैक्फर्सन,जे एस मिल,टी एच ग्रीन रॉबर्ट नॉज़िक सबसे महत्वपूर्ण है।
एन्ड ऑफ हिस्ट्री के जनक और प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक चिंतक फ्रांसिस फुकुयामा ने अलग ही समीकरण को पेश किया उन्होने कहा कि "वैश्वीकरण के चक्कर में दुनिया ने राष्ट्रवाद से मुंह मोड़ लिया इसलिए उदारवाद को भी ठुकरा दिया गया"।
वैसे गौर करें तो नए विचारों का सामने आना और पुराने विचारों का समाप्त हो जाना मानव इतिहास के लिए कोई नयी बात नहीं है।
इसलिए सदियों पुराने "उदारवाद" से दिल लगाने की फिलहाल कोई वजह तो नहीं दिख रही है लेकिन यहीं सबसे बड़ी दिक्कत भी है क्योंकि हमारे पास पूर्णतः सभी मोर्चे पर खरा उतरा कोई नया विचार नहीं है और न ही कोई नया विमर्श। जिसे हम अपने राजनीतिक चिंतन में शामिल कर सकें।
हां,यह सच है कि जॉन लॉक ने अपना चिंतन इतिहास के जिस दौर में प्रस्तुत किया,उस समय वह उभरते हुए पूंजीवाद को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक था। परंतु आज के 21वीं सदी के युग में हम उनकी सारी मान्यताओं को स्वीकार नहीं कर सकते। लॉक ने संपत्ति के अधिकार इतना पावन और शक्तिशाली बना दिया कि उसके बाद के युग में धनवान और निर्धन वर्गों की लड़ाई सारी राजनीति का केंद्र बन गई जो वर्तमान आधुनिक लोककल्याणकारी राजनीतिक चिंतन से मेल नहीं खाती है।
आज 390वीं जयंती पर जॉन लॉक को भले ही उन्हें कोई श्रद्धांजलि न दे लेकिन उनके विचारों को या उनसे शुरू हुई परंपरा को तिलांजलि देने का जो खतरनाक वैश्विक सिलसिला देखने को रहा है, वह हमें अपने किसी भी रूप में हमारे अच्छे भविष्य का कोई आश्वासन नहीं देता है।
इसलिए सदियों पुराने "उदारवाद" से दिल लगाने की फिलहाल कोई वजह तो नहीं दिख रही है लेकिन यहीं सबसे बड़ी दिक्कत भी है क्योंकि हमारे पास पूर्णतः सभी मोर्चे पर खरा उतरा कोई नया विचार नहीं है और न ही कोई नया विमर्श। जिसे हम अपने राजनीतिक चिंतन में शामिल कर सकें।
हां,यह सच है कि जॉन लॉक ने अपना चिंतन इतिहास के जिस दौर में प्रस्तुत किया,उस समय वह उभरते हुए पूंजीवाद को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक था। परंतु आज के 21वीं सदी के युग में हम उनकी सारी मान्यताओं को स्वीकार नहीं कर सकते। लॉक ने संपत्ति के अधिकार इतना पावन और शक्तिशाली बना दिया कि उसके बाद के युग में धनवान और निर्धन वर्गों की लड़ाई सारी राजनीति का केंद्र बन गई जो वर्तमान आधुनिक लोककल्याणकारी राजनीतिक चिंतन से मेल नहीं खाती है।
आज 390वीं जयंती पर जॉन लॉक को भले ही उन्हें कोई श्रद्धांजलि न दे लेकिन उनके विचारों को या उनसे शुरू हुई परंपरा को तिलांजलि देने का जो खतरनाक वैश्विक सिलसिला देखने को रहा है, वह हमें अपने किसी भी रूप में हमारे अच्छे भविष्य का कोई आश्वासन नहीं देता है।