देश के तमाम हिस्से बीते जून में जहां प्रचण्ड गर्मी से जूझ रहे थे,वहीं पूर्वोत्तर हिस्से में भारी बाढ़ का कहर जारी था,सम्भवतः इसी कारण भारत को चरम मौसमीय दशाओं वाला देश कहा जाता है।
असम के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ के चपेट से उबरे अभी एक माह भी नहीं पूरा हुआ,बाढ़ प्रभावित लोग अपने घरों को अभी सही से दुरुस्त भी नहीं कर पाए थे कि बीते जून में बाढ़ का दूसरा दौर आ गया,यह पहले दौर से काफी तेज़,व्यापक जनहानि लिए था।
असम में बाढ़ का आना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार समय से पहले अत्याधिक बारिश की वजह से कई इलाकों में अप्रत्याशित स्थिति पैदा हो गई है
इस बार बाढ़ ने असम के मध्य से पश्चिम के निचले असम तक,ब्रह्मपुत्र के कोपभाजन होता रहा। पूरे क्षेत्र में रिकार्ड तोड़ भारी बारिश से लबालब और उफनती हुई नदियों ने कई स्थानों पर अपने सुरक्षात्मक तटबंधों और जान माल की व्यापक पैमाने पर क्षति पहुंचाई।
प्रभावित जिले।
राज्य के नगांव,होजई,मोरीगांव (मध्य असम, ब्रह्मपुत्र के दक्षिण तट पर),दीमा हसाओ, कार्बी आंगलोंग (पहाड़ी जिले), कछार (बराक घाटी), कामरूप (दोनों दक्षिण और उत्तर तट),नलबाड़ी, बजली, बारपेटा, बोंगाईगांव, बक्सा, तामूलपुर,कोकराझार (निचला असम डिवीजन, ब्रह्मपुत्र का उत्तरी तट),ग्वालपारा (पश्चिम असम, ब्रह्मपुत्र का दक्षिणी तट) व्यापक रूप से असम के बाढ़ प्रभावित जिले हैं।
राजधानी गुवाहाटी कि स्थिति भी खराब रही,घरों में जलजमाव,कई जगहों पर भूस्खलन भी हुआ है।
सात दशक में सबसे विनाशकारी बाढ़।
राज्य में बारिश का आलम यह रहा कि ग्रामीणों ने कई जगह पर गांवों को नदियों को बाढ़ से बचाने के लिए बनाए गए तटबंध तोड़ दिए। ग्रामीणों पर यह आरोप लगा कि दक्षिणी असम में बराक नदी के खतरे के निशान पर पहुंचने के साथ उन्होंने अपने गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए बेधुकांडी बाघ के एक बड़े हिस्से काट दिया
इससे बराक नदी के तटबंध में बड़ा छिद्र हो गया और असम का दूसरा बड़ा शहर सिलचर बाढ़ की चपेट में आ गया। सिलचर के निवासियों के मुताबिक यह शहर पूरे 18 दिनों तक कमर तक पानी में डूबा रहा। यह सत्तर साल में सबसे भीषण जलीय आपदा थी। पूरा शहर आवश्यक मानवीय सुविधाओं से पूरी तरह वंचित रहा। इस मानवजनित-प्राकृतिक आपदा से त्रस्त असहाय और बेबस आबादी कोस्वच्छ पेयजल और भोजन उपलब्ध कराने के लिए कछार जिला प्रशासन को भारतीय वायु सेना की मदद लेनी पड़ी।
असम में बाढ़ : ब्रह्मपुत्र और बराक की भूमिका।
असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार असम की कमोबेश सभी नदियां अपने तीव्रतम वेग और बाढ़ के लिए जानी जाती है।
वहीं,दूसरी ओर असम में कम समय में बहुत ज्यादा और तीव्रता लिए बारिश होती है, जिसके चलते इन नदियों में बाढ़ की स्थिति बन जाती है,लेकिन बाढ़ से सबसे अधिक विनाशकारी नुकसान ब्रह्मपुत्र और बराक के सहायक और उप सहायक नदियों के कारण होती है।
असम की इन तीव्रगामी नदियों की वजह से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भूमि क्षरण और कटाव भी बहुत तेजी से होता है। बाढ़ की दृ़ष्टि से असम की ब्रह्मपुत्र घाटी देश को प्रमुख खतरनाक क्षेत्र माना जाता है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत जमीन (32 लाख हेक्टेयर) बाढ़ की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है।
ब्रह्मपुत्र घाटी, विश्व में सबसे अधिक बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में से एक है,जिसके बाद बराक घाटी का स्थान आता है। भूगोलविदों के अनुसार लगभग 100 सहायक और उप-सहायक नदियों का पानी बह्मपुत्र और बराक में मिलता है ,इन दोनों नदियों का असम को बाढ़ की चपेट में लाने में 40 फीसद योगदान है।
राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक असम के कुल भूमि क्षेत्र का 31.05 लाख हेक्टेयर (लगभग 39.58% ) बाढ़ प्रवण क्षेत्र है, जो देश के कुल बाढ़ संभावित क्षेत्र का 10.2 फीसद है। असम में 1953 से हर साल बाढ़ आती है और हर साल कम से कम 2000 से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में आते हैं।
असम में हर साल आने वाले बाढ़ से चिंतित जल संसाधन पर संसदीय समिति की 2020-21 की रिपोर्ट में इस पर विस्तृत विचार विमर्श किया गया है।
अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने बताया है कि असम में 1954 के बाद से लेकिन अब तक बाढ़ की वजह से 4,27,000 हेक्टेयर भूमि का क्षरण हो चुका है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग सात फीसद है और सालाना भूमि कटाव की दर 8,000 हेक्टेयर प्रति वर्ष रही है।
बाढ़ आयोग की इस रिपोर्ट में चौंकाने वाली तथ्य शामिल है कि पिछली शताब्दी में ब्रह्मपुत्र नदी का क्षेत्रफल लगभग दोगुना हो गया है। यानी असम की जमीन का एक बड़ा हिस्सा ब्रह्मपुत्र ने अपने आगोश में ले लिया है।
यह क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन का हिस्सा है, जो दुनिया की सबसे बड़ी नदी प्रणालियों में से एक है। यह पूरा क्षेत्र भारत,नेपाल,तिब्बत,बांग्लादेश और भूटान में बंटा हुआ है, जो लगभग 1.7 मिलियन वर्ग किलोमीटर रकबा और इसमें 60 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ब्रह्मपुत्र और बराक नदी घाटी में बाढ़ पहले से ही आती रही है, लेकिन हालिया वर्षों में हुए इस अभूतपूर्व विनाशकारी बाढ़ के लिए मुख्य रूप से दोषपूर्ण बाढ़ नियंत्रण उपायों, अत्यधिक जनसंख्या दबाव,स्थानीय जलाशयों का न होना अथवा संकुचन, अनियंत्रित और अवैध निर्माण और अवैज्ञानिक विकास रणनीतियों को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
मौसमविदों ने बीते जून में हुए इस अभूतपूर्ण बारिश और बाढ़ के बाद पूर्वोत्तर राज्यों यथा असम,अरुणाचल प्रदेश नागालैंड और मणिपुर में हुए विनाशकारी भूस्खलन को दुर्लभ घटना बताया है।
विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ला नीना और हिंद महासागर में एक नेगेटिव बाई पोलर डाइपोल(नकारात्मक द्विध्रुवीय संयोजन ) ने बंगाल की खाड़ी में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहने वाली समुद्री हवाओं को और मजबूत किया जिससे बंगाल की खाड़ी में ये तेज मानसूनी हवाएं अब पहले से कहीं अधिक नमी ला सकती हैं।
भौतिकी और उष्मागतिकी के सिद्धांत के अनुसार बढ़ते तापमान के साथ वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ जाती है,क्योंकि गर्म हवा लंबे समय तक अधिक नमी रख सकती है। इसलिए बीते जून की यह भारी बारिश संभवतः जलवायु परिवर्तन के चरम मौसमी दशाओं के कारण हो सकती है।
राज्य में बीते 19 जून, 2022 तक 53.4 मिलीमीटर वर्षण दर्ज की गई। जून के पहले 12 दिनों में कुल 528.5 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 109 फीसद अधिक थी।
वसुंधरा के सबसे नम क्षेत्र मेघालय में जून में 1215.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य से 185 फीसद अधिक वर्षा दर्ज की गई। भारी बारिश के चलते असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में दर्जनों भूस्खलन की घटनाएं सामने आई है।
इनमे सबसे दुःखद मणिपुर के नोनी जिले में जिरीबाम-इंफाल रेलवे सेक्शन पर हुआ भारी भूस्खलन रहा।
इस भूस्खलन का पूरा मलबा,यहाँ मौजूद प्रादेशिक सेना(टेरिटोरियल आर्मी) कैंप पर गिरा और ईजेई नदी का रास्ता बंद हो गया,इससे वहां जलाशय बन गया,जिससे निचले इलाकों में बाढ़ आने का खतरा पैदा हो गया।
इस घटना में एक लेफ्टिनेंट कर्नल सहित सेना के दर्ज़नो जवानों ने शहादत दी। भारतीय सेना की 107वीं प्रादेशिक सेना के ये कार्मिक मणिपुर के नोनी जिले में तुपुल रेलवे स्टेशन के पास जिरीबाम से इंफाल तक एक निर्माणाधीन रेलवे लाइन की सुरक्षा के लिए तैनात थे। मणिपुर में हुए हुए भूस्खलन में मरने वालों की संख्या अब 27 हो गई, और 40 से अधिक लोग अभी भी लापता है।
आखिर क्यों आती है असम में बार बार बाढ़।
1.भौगोलिक अवस्थिति: भूगर्भिक दृष्टि से देखा जाय तो असम अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से ही बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इसका कारण,असम घाटी अंग्रेजी के "यू" (U) अक्षर सरीखी घाटी है,जिसकी औसतन चौड़ाई महज 80 से 90 किलोमीटर है।
जबकि इस घाटी में बहने वाली नदियों की चौड़ाई अमूमन आठ से दस किलोमीटर है,इसके अतिरिक्त तिब्बत, भूटान और अरुणाचल प्रदेश,असम के मुकाबले ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है वहां की ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से पानी की निकासी का एकमात्र रास्ता असम होकर ही है ।
चूंकि ,पूरा हिमालय ही न्यू यंग फोल्ड माउंटेन के समूह में है और पूर्वोत्तर हिमालय तो और भी कोमल है,इसी कारण राज्य की जमीन के अपेक्षाकृत कम कठोर होने के कारण,यहां तीव्रगामी नदियों द्वार भूमि कटाव अत्यधिक तीव्रता के साथ होता है,साथ ही तेज बारिश पानी के प्रवाह की गति बाढ़ के असर को और गंभीर बना देती है।
भूगोलविदों की माने तो ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों और पहाड़ियों से आने वाला पानी ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का जलस्तर अचानक तीव्रता के साथ बढ़ा देता है जिससे राज्य में बाढ़ की समस्या साल-दर-साल गंभीर होते जा रही है।
इसके अतिरिक्त भौगोलिक रूप से असम ऐसे जोन में है जहां मानसून के दौरान तो देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा बारिश होती है।
असम की भूगर्भिक बनावट "कटोरे के समान या U आकार "का है तो उसकी जलवायुवीय संरचना "कीप नुमा" (Funnel Shape) है।
इस क्षेत्र में भारी बारिश बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक नमी कारण हुई है। क्योंकि असम और पड़ोसी राज्य ऊंची पहाड़ियों से घिरे हुए हैं।
बंगाल की खाड़ी पर कोई भी मौसम संबंधी गड़बड़ी क्षेत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। क्योंकि बंगाल की खाड़ी में नमी लिये ये पवन इस कीपनुमा संरचना में उलझ जाती है और पूरी तरह यहां बरस उठती है।
विशेषज्ञों के अनुसार राज्य की सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र में काफी हद तक गाद भर गई है,तिब्बत के पहाड़ से आने वाली गाद और पत्थरों ने नदी की गहराई काफी कम कर दी है,नतीजतन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में हल्की बारिश ही असम के मैदानी इलाकों जलमग्न करने के लिए काफी है।
2.भूकंप/भूस्खलन:असम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के अन्य क्षेत्र मुख्यत: उच्च भूकंप ज़ोन यानि ज़ोन पांच में अवस्थित है,जो यहाँ भूस्खलन का कारण बनता है।भूस्खलन और भूकंप के कारण नदियों के तलछटों में अवसादों/गाद के जमाव से नदियों की तलहटी ऊपर उठ जाती है,फलस्वरूप नदियों की जल वहन क्षमता में व्यापक रूप से कमी आती है।
3.तटीय कटाव:ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक और उप सहायक नदियां, अपनी उग्र और तीव्र बहाव के लिए जानी जाती है, ये अपनी तीव्र बहाव से बड़े पैमाने पर भूमि का कटाव करती है। ब्रह्मपुत्र नदी के तटों के कटाव के कारण इस घाटी की चौड़ाई 15 किमी. तक बढ़ गई है।
4.बांधों का निर्माण:असम की नदियों के ऊपरी अपवाह वाले क्षेत्र में बहुद्देश्यीय जलविद्युत परियोजनाओं के लिए अनेक बांधों का निर्माण किया गया है। चीन द्वारा तिब्बत में भी ब्रह्मपुत्र नदी पर कुछ बांध बनाए गए हैं। इन बांधों के जल को छोड़े जाने से असम के घाटी में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
5.पारिस्थितिकी पर प्रभाव:
इस क्षेत्र में बाढ़ को बढ़ाने वाले कारकों को समझने की कोशिश करें तो आप समझ सकेंगे कि राज्य में हुई वनों की निर्दयतापूर्ण कटाई इस जलप्रलय के प्रमुख कारणों में से एक है
विशेषज्ञ मानते हैं कि"असम में बाढ़ के प्रमुख कारणों में से एक वनों की कटाई और पहाड़ियों की बेतरतीब कटाई और छंटाई है। यहां आप युवा हिमालय का ख्याल नहीं रख रहे है,वापस में हिमालय से दया मांगना मूर्खतापूर्ण बात होगी
राज्य में /क्षेत्र में जिस तेजी से वनों की कटाई किया जा रहा है उसके कारण,वर्षा अधिक तलछट को बहा ले जाती है और इसे नदी के तल और झीलों में जमा कर देती है। एक बार जब नदी के तल उथले हो जाते हैं, तो यह नदियों को जलस्तर को खतरनाक तरीक़े ऊपर कर देता है जिससे निचले हिस्से/ क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है।"
वहीं ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से ही ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों की अधिकांश सहायक नदियाँ और उप-सहायक नदियां की पहाड़ियों में उत्पन्न होती हैं,अवसंरचनात्मक विकास और निर्माण के नाम इन पहाड़ियों को काटना,विस्फोटकों से उड़ाना, उसे नग्न करने से इनका मलबा भी इन नदियों के साथ मुख्य नदी में जमा होता है,रही सही कसर इन पहाड़ियों पर वनों को नष्ट कर देने से पूरी हो जाती है।
भूगोलविद असम के इस भारी बारिश को "बोरदोईसिला'' या टी शॉवर का असर मांनते जिसे असम में मानसून पूर्व ( प्री-मानसून ) हवाएं कहते हैं, जो आमतौर पर कभी-कभार बारिश और गरज के साथ होती हैं। यह ऐतिहासिक रूप से वसंत के मौसम की शुरुआती गर्मी से राहत दिलाने के लिए जाना जाता है। लेकिन इस साल 'बोरदोईसिला' ने राज्य में तबाही ला दी है।
बोरदोईसिला(Bordoisila) को आप,बंगाल के काल बैसाखी(Kaal Baisakhi') या फिर कर्नाटक और केरल के चेरी ब्लॉसम या कॉफी शॉवर (Cherry Blossom showers or Coffee Showers ),कर्नाटक ,कोंकण, गोवा और तटीय केरल में आम्र वर्षा (Mango Shower ) से तुलना कर सकते हैं
आगे की राह: सिक्के का दूसरा पहलू
1.संपोषणीय विकास पर जोर:
केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि इस मसले को दलगत राजनीतिक से परे रख,राष्ट्रीय सुरक्षा को केंद्रबिंदु में रखते हुए निराकार भाव से तमाम सुरक्षात्मक उपायों पर अपना ध्यान केंद्रित करे।
राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को तटबंध बनाने की मौजूदा नीति की नए सिरे और नवोन्मेषी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समीक्षा करने की ज़रूरत है, बाढ़ निरोधी अवरोधित परियोजनाओं को तेज़ी से क्रियान्वित करने की दिशा में कार्य करना चाहिये
2.हिमालय की सुरक्षा के साथ अवसंरचनात्मक विकास: किसी भी अवसंरचनात्मक और विकासात्मक कार्य से पहले इन नव यौवन लिए पहाड़ो और मिट्टी की संरचना और इनकी प्रतिरोधक क्षमता का मूल्यांकन अवश्य करना चाहिये अन्यथा इसके दूरगामी और विनाशकारी परिणाम होंगे।हिमालय के भौगोलिक स्थलाकृतियों को ध्यान में रखते हुए यहां बहुद्देश्यीय जल परियोजनाओं और बांधों का निर्माण, स्थानीय जल संरक्षण प्रबंधन प्रणालियों,जो सदियों से आजमायी हुई है और स्थानीय लोगों/आदिवासियों की भागीदारी आधारित परियोजनाओं में व्यापक निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिये।
3.नदीय जल उपयोग संबंधी आँकड़ों (Hydrographic data sharing) का समुचित साझेदारी:भारत को चीन,भूटान तथा अन्य पड़ोसी देशों के साथ नदीय जल उपयोग संबंधी आँकड़ों के साझाकरण की दिशा में समुचित और सामूहिक पहल किये जाने की आवश्यकता है।भारत की केंद्रीय जल आयोग,इसकी सर्वोच्च निकाय है।
4.तीव्र,समावेशी और स्थानिक वनीकरण पर जोर: हाल के दशकों में पूरे क्षेत्र में वनों की स्थिति लगातार बदतर हुई है,इसके लिए पेड़ों का काटने की घटनाओं में वृद्धि हुई है जिसका सीधा प्रभाव पूरे पारिस्थितिकी तन्त्र पर पड़ता है। इस तरह के जलीय आपदाओं से निपटने के लिये हमें एक समावेशी और संपोषणीय रोड मैप बनाने की आवश्यकता है, जिसमे आने वाले समय को ध्यान में रखकर तीव्र,समावेशी,संपोषणीय और स्थानिक वनीकरण पर बड़े पैमाने पर जोर देना होगा।
बाढ़ के खतरे को रोकने के लिए,हमें पहाड़/पहाड़ियों और पेड़ों को काटने से रोकने की फौरी आवश्यकता है। नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों और दीर्घकालिक समाधान के लिए प्रमुख रूप से तीव्र और युद्धस्तर पर वनीकरण अभियान चलाया जाना चाहिए।
राज्य की भौगोलिक अवस्थिति,अरुणाचल प्रदेश और उससे सटे तिब्बत में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों पर चीन द्वारा बड़े पैमाने पर बांधों के निर्माण के अलावा पूरे क्षेत्र में तेजी से बढ़ते शहरीकरण को भी इस विनाशकारी बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा।
5.नियमित रूप से हो नदियों की तलछट की सफाई(Dredging):भारत,तिब्बत,भूटान और बांग्लादेश यानी चार देशों से गुजरने वाली ब्रह्मपुत्र नदी असम को दो हिस्सों में बांटती है और इसकी दर्जनों सहायक और उप सहायक नदियां भी शामिल हैं। तिब्बत के पठार से निकलने वाली यह नदी असम के घाटी तक अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर आती है,और यही गाद धीरे-धीरे असम के मैदानी इलाकों में जमा होता रहता है।
फलस्वरूप इससे नदी की गहराई कम होती है. इससे पानी बढ़ने पर बाढ़ और तट कटाव की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है।
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अपनी बेहतर समझ और विकसित करने के लिए:
1.नदी बेसिन :भूमि का वह क्षेत्र होता है जिस पर एक नदी और उसकी सभी सहायक नदियों द्वारा सतही जल प्रवाहित किया जाता है। नदी और उसके बेसिन का जल अंततः समुद्रों अथवा झीलों में प्रवाहित हो जाता है।
2.देश में नदी बेसिन की संख्या:
देश में बीस(20)महत्वपूर्ण नदी बेसिन / नदी घाटियों के समूह हैं।
इनमें से बारह प्रमुख नदी बेसिन हैं जबकि आठ मिश्रित नदी बेसिन के उदाहरण हैं।
बारह प्रमुख नदी बेसिन हैं
(1) सिंधु
( 2 ) गंगा-ब्रह्मपुत्र– मेघना, (3) गोदावरी
(4) कृष्णा
(5) कावेरी
(6) महानदी
(7) पेन्नार
(8) ब्राह्मणी- बैतरणी
( 9 )साबरमती
(10) माही
(11) नर्मदा और
(12) तापी ।
ये नदी बेसिन देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 43% भाग पर विस्तृत हैं।
प्रमुख नदियाँ और उनकी सहायक नदियाँ बारहमासी और मौसमी प्रवाह के रूप में लगभग 277 मिलियन हेक्टेयर जल ग्रहण क्षेत्र को आच्छादित करती हैं।
3.भारत में नदी प्रणालियाँ:
भारत में,नदी प्रणालियों को मुख्य रूप में चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
(i) हिमालयी नदियाँ
(ii) दक्कन नदियाँ
(iii) तटीय नदियाँ और
(iv) अंतर्देशीय जल निकासी बेसिन की नदियाँ
4.हिमालय की नदियाँ: अधिकांशतः बारहमासी नदियाँ हैं जो हिम तथा हिमनदों के पिघलने से निर्मित हुई हैं। इन नदियों में उच्च सतही जल क्षमता विद्यमान है क्योंकि इन्हें मानसूनी वर्षा से व्यापक मात्रा में जल प्राप्त होता है।
5.महत्वपूर्ण हिमालयी नदी प्रणालियों में
सिंधु और गंगा-ब्रह्मपुत्र - मेघना प्रणाली शामिल हैं।
सिंधु नदी तंत्र 3,21,289 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है जबकि गंगा - ब्रह्मपुत्र मेघना प्रणाली लगभग 1,097,588 वर्ग - किमी को आच्छादित करती है।
सिंधु नदी तिब्बत में मानसरोवर के पास से निकलती है,भारत और पाकिस्तान से होकर प्रवाहित होती है तथा कराची के पास अरब सागर में मिल जाती है।
सिंधु की प्रमुख सहायक नदियाँ सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम हैं।
गंगा नदी उत्तराखंड राज्य में गंगोत्री के पास से निकलती है और भागीरथी और अलकनंदा उप- घाटियों का जल लेकर आगे प्रवाहित होती है। यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानंदा और सोन गंगा नदी की महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ हैं। चंबल और बेतवा महत्वपूर्ण उप- सहायक नदियाँ हैं जो गंगा में प्रवाहित होने से पूर्व यमुना की सहायक नदियों के रूप में प्रवाहित होती हैं।
ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलती है और भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम राज्यों से होकर प्रवाहित होती है। आगे चलकर बांग्लादेश में प्रवाहित होने के बाद यह नदी बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।
ब्रह्मपुत्र नदी को तिब्बत में सांगपो और अरुणाचल प्रदेश में दिहांग कहा जाता है। देबांग, लोहित, सुबनसिरी, जिया भरेली,धनसिरी,पुथिमारी, पगलदिया और मानस भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।
तीस्ता नदी बांग्लादेश में प्रवाहित होते हुए ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। इसी प्रकार,बांग्लादेश में पद्मा नदी ब्रह्मपुत्र से मिलती है और यह बंगाल की खाड़ी तक पद्मा नदी अथवा गंगा के रूप में प्रवाहित होती है।
बराक नदी मेघना नदी प्रणाली की मुख्य धारा है। यह मणिपुर की पहाड़ियों से निकलती है। इस नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ मक्कू, ट्रांग तुइवई, जिरी, सोनाई, रुक्नी, कटखल, धलेश्वरी, लंगाचिनी, मडुवा और जैतंगा हैं।
मेघना चांदपुर जिले में अपनी प्रमुख सहायक नदी पद्मा से मिलती है।
मेघना की अन्य प्रमुख सहायक नदियों में ढालेश्वरी, गोमती और फेनी शामिल हैं।
मेघना बांग्लादेश के भोला जिले में बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है ।
दक्कन की नदियाँ मूल रूप से वर्षा पर निर्भर करती हैं, इसलिए उन्हें वर्षा आधारित और गैर- बारहमासी नदियाँ कहा जाता है।
गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी आदि नदी प्रणालियां पूर्व दिशा में बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। नर्मदा और ताप्ती पश्चिम की ओर अरब सागर में प्रवाहित होने वाली प्रमुख नदियाँ हैं।
दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में अनेक छोटी नदियां धाराओं के रूप में प्रवाहित होती हैं। इनमें से अनेक नदियां गैर-बारहमासी हैं तथा कम दूरी तय करके समुद्र में मिल जाती हैं। इन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित है।
पश्चिमी राजस्थान के अंतर्देशीय जल प्रणाली वाली नदियों की संख्या अत्यंत कम है तथा ये नदियाँ अल्पकालिक चरित्र की हैं और इनमें वर्ष के एक निश्चित समय में ही जल उपलब्ध होता है।
अधिकांश मरुस्थलीय नदियां खारे पानी वाली झीलों में गिरती हैं तथा ये समुद्र तक नहीं पहुंच पाती हैं।
उदाहरण: सरस्वती, लूनी, माचू, बनास, रूपेन और घग्गर रेगिस्तानी नदियों के कुछ उदाहरण हैं।