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Monday, August 29, 2022

वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य और जॉन लॉक

आज महान अंग्रेज राजनीतिक विचारक, उदारवाद के जनक और राजनीतिक पुरोधा जॉन लॉक की 390वीं जयंती है।


उनकी जयंती हम उस समय मना रहे हैं,जब "कैंसल/कैंसिल कल्चर " की भावना से ओतप्रोत हुए वर्तमान वैश्विक राजनीतिक विचारधारा उन्हें इतिहास के कूड़ेदान में बेहद गहरे तक दफन करने के भरपूर जतन किये जा रही है।

जॉन लॉक (1632-1704) सत्रहवीं शताब्दी का प्रसिद्ध अंग्रेज़ विचारक थे। इनकी मुख्य कृतियां हैं: 'लैटर ऑन टॉलरेशन' (सहिष्णुता का स्वरूप) (चार निबंध 1689,1690,1692,1704),
टू ट्रीटीजेस ऑन सिविल गवर्नमेंट'(नागरिक शासन पर दो निबंध)(1690), और 'ऐस्से कंसर्निंग ह्यूमन अंडरस्टैंडिंग' (मानवीय ज्ञान का आधार) (1690)

जॉन लॉक को उदारवाद का जनक (Father of Liberalism) माना जाता है। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि आधुनिक युग के आरंभिक दौर में उदारवाद और औद्योगिक क्रांति (Industrial Revolution) ने एक-दूसरे को बढ़ावा दिया और इसकी शुरुआत इंग्लैंड से हुई।

यह लॉक का ही जादू था कि उदारवाद का मूल प्रवर्तक इंग्लैंड में पैदा हुआ जबकि इस क्रांति का प्रभाव यूरोप के अन्य देशों और अमरीका में फैल गया और इन देशों में भी उदारवाद को बढ़ावा मिला,और वे सब उदारवाद की मुख्य धारा में आकर मिल गए।

जॉन लॉक की गिनती विश्व के उन महान राजनीतिक दार्शनिकों में होती है, जिन्होंने राजनीति के केंद्र में उस सबसे निचले तबके पर मौजूद "आम" आदमी को लाकर खड़ा किया। जो पहले सिर्फ "शासित और शोषित" था। इस आम आदमी के हाथ में न उसका ''वर्तमान" था और न ही "भविष्य''।

आम आदमी के इन हालात में जॉन लॉक ने लोगों के लिए "अधिकार" की बात की। उन्होंने कहा कि "किसी भी व्यक्ति का अपने जीवन पर प्राकृतिक और नैसर्गिक अधिकार है।"
उन्होंने बेहद मजबूती से स्पष्ट किया कि जिस किसी ने अपनी मेहनत से जो भी "संपदा" अर्जित की है, उस पर "पहला हक" उसी का है,किसी सामंत या राजा-महाराजा का नहीं।

 यह बात सबसे पहले जॉन लॉक ने ही कही। उनकी जिस बात ने राजनीति की पूरी सोच बदल दी, वह थी "शासन वही होना चाहिए, जो जनता को स्वीकार्य हो"

लॉक ने सिर्फ उदारवाद की नींव ही नहीं रखी उनके विचारों से प्रभावित होकर 1789 की फ्रांस की क्रांति भी इसी नींव पर खड़ी हुई ।
यह उदारवाद ही था जिसने औद्योगिक क्रांति के अनुप्रयोग और उससे उत्पन्न सारी जरूरतों को पूरा करने के सपनों को आश्वासन में तब्दील कर दिया। जिसने "मानव अधिकारों और "नागरिक अधिकारों " को  सभ्यता का 'केंद्रीय तत्व"में परिणित किया  जिसकी अगली मंजिल "संवैधानिक लोकतंत्र'' था जिसे सम्पूर्ण मानव विकास की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि माना जाता है।


*क्या समझते है औद्योगिक क्रांति से*:

ब्रिटिश अर्थव्यस्था में उन परिवर्तनों की श्रृंखला जिनके फलस्वरूप वह एक कृषि प्रधान देश से उद्योग-प्रधान देश में परिणत हो गया। ये परिवर्तन 1760-1840 के दौरान अपने पूर्ण उत्कर्ष पर पहुँच गए। इन परिवर्तनों का आरंभ वस्त्र उद्योग के मशीनीकरण से हुआ, और बाद में खनन, परिवहन तथा औद्योगिक संगठन के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण परिवर्तन हुए। इसी क्रम में अनेक औद्योगिक नगर विकसित हो गए नहरों, पुलों, रेलमार्गों और जहासों का निर्माण हुआ। कालांतर में औद्योगिक क्रांति का प्रभाव पूरे यूरोप और विश्व के अन्य हिस्सों तक फैल गया।
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उदारवाद के विकास में जॉन लॉक की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए प्रख्यात राजनीतिक दार्शनिक एम. सेलिंगर लिखते है कि ‘“जॉन लॉक पहला ऐसा राजनीति-दार्शनिक था जिसने आधुनिक उदारवाद को विस्तृत और प्रभावशाली चिंतन पद्धति के रूप में प्रस्तुत किया।" जबकि सी बी मैक्फर्सन ने अपनी कालजयी कृति "द पॉलिटिकल थ्योरी ऑफ पोजेसिव इंडिविजुअलिज़्म(1962)"में लिखा कि "लॉक वास्तव में अंग्रेजी उदारवाद का मूल स्रोत था"।

यहाँ यह बेहद दुःखद है कि 21वीं सदी में भी यह मूलभूत नागरिक अधिकार दुनिया के कई देशों के लोगों की अभी भी मृग तृष्णा के समान हसरत हैं।

पिछले तकरीबन तीन दशक यानी उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के बाद के दौर में हम एक ऐसी स्थिति में पहुंच गए हैं, जहां "उदारवाद" को अधिकतर समस्याओं की "जड़ बताया जाने लगा है।
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इस विचारधारा के प्रबल विरोधियों में एक हैं,और रूस के दृष्टिकोण से यह शायद सही भी हो।




उदारवाद यहर किसी को व्यवस्था में एक नई संभावना सौंपने वाले दर्शन के रूप में जाना जाता है। हद तो तब हो गयी जब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी उदारवाद को पानी पी-पीकर कोसते थे। जबकि रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन ने पिछले दिनों कहा था कि उदारवाद के विचार अब गुजरे जमाने की चीज होकर रह गए हैं।


उदारवाद के ख़िलाफ़ मुखालफती स्वर को  हमने कनाडा पोलैंड, यूक्रेन, हंगरी, जापान, यूनान, पुर्तगाल, स्पेन और इंग्लैंड में भी देखा है,जो निश्चित रूप से बेहद चिंताजनक है।


यहां गौर करना होगा कि 17वीं सदी के प्रतिपादित लॉक के समस्त राजनीतिक दर्शन से उत्पन्न विचार उदारवाद की मुख्य मान्यताओं साथ अंतरंग रूप से गर्भनाल की भांति जुड़े हुए हैं
जैसे
वह मनुष्य को एक विवेकशील प्राणी (Rational Being) मानता था।

वह मनुष्य की तर्कबुद्धि या विवेक (Reason) को समस्त  चिन्तन का आधार मानता था  न कि इतिहास को ।

वह व्यक्ति के प्राकृतिक अधिकारों (Natural Rights) को मान्यता देता था।

वह निजी संपत्ति (Private Property) को "व्यक्ति के अधिकारों" का सार तत्त्व मानता था जो प्राकृतिक कानून (Law of Nature) पर आधारित थे।

वह अनुबंध या समझौते (Contract) को राजनीतिक सत्ता का न्यायिक आधार मानता था;
वह नागरिक समाज (Civil Society) को कृत्रिम उपकरण (Artificial Device) मानता था जो मनुष्यों की सुविधा के लिए बनाया गया है, और
वह नागरिक सत्ता (Civil Authority) को अखंड या अविभाज्य (Indivisible) नहीं मानता था, बल्कि स्थापित राजनीतिक सत्ता के प्रति "विरोध के अधिकार (Right to Resistance)" को मान्यता देता था।


सही मायने में सामाजिक अनुबंध का अधिकार के जनक के रूप में हम थॉमस/टॉमस हॉब्स को मानते है लेकिन उनके विचारों को सही सही उदारवादी आधार प्रदान करने में जॉन लॉक की महती भूमिका
रही है

सामाजिक अनुबंध के सिद्धातंकार के रूप में लॉक का नाम विशेष रूप से विख्यात है। इस विषय पर लॉक के विचार उसकी प्रसिद्ध कृति 'टू ट्रीटिजेस ऑफ़ सिविल गवर्नमेंट' (शासन प दो निबंध) (1690) के अंतर्गत मिलते हैं।

 सबसे पहले सामाजिक अनुबंध का विचार अंग्रेज दार्शनिक टॉमस हॉब्स (1588-1679) ने रखा था, परंतु उसे सही-सही उदारवादी आधा प्रदान करने में लॉक ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस विचार के प्रवर्तकों ने अपने-अपने ढंग राज्य के निर्माण की प्रक्रिया का विवरण दिया है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत राज्य के निर्माण पहले 'प्राकृतिक दशा' (State of Nature) की कल्पना की गई है और कहा कि
"मनुष्य मूलतः  शालीन,अनुशासनप्रिय,विवेकशील प्राणि है जो  स्वभाव से नैतिक नियमों का पालन करता है। यह शालीन अनुशासनप्रिय और सौजन्यपूर्ण हैं; वे अपने ऊपर शासन करने  में समर्थ हैं।

उन्होंने  "प्राकृतिक दशा" को साधारणतः 'शांति, सद्भावना,परस्पर सहायता और रक्षा' (Peace, Good Will, Mutual Assistance and Preservation) की दशा के रूप में वर्णित किया। इसमे समस्या तब होती है जब कुछ स्वार्थी लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए नैतिकता के नियमों का हनन और अवहेलना कर दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण करने लगते हैं जिससे प्राकृतिक दशा की शांति और सुरक्षा भंग हो जाती है और उसकी जगह शत्रुता,वैमनस्य,हिंसा और परस्पर विनाश (Hostility,Malice, Violence & Mutual Destruction) का वातावरण पैदा हो जाता है जो विधिवत सत्ता के लिए नासूर के समान होता है।


इनके विचारों को हम आधुनिक लोकतंत्र और राजव्यवस्था के विभिन्न अवयवों में तलाश कर सकते हैं।

बीते 2020 में अंग्रेजी की प्रसिद्ध पत्रिका "न्यूजवीक" ने इस मसले पर एक बहस भी छापी थी, जिसका शीर्षक था 'सारा दोष जॉन लॉक पर ही मढ़ा जाए?'

सत्रहवीं सदी में उत्पन्न इस विचार को राज्य की आधारभूत संरचना और समाज के साथ उसके सम्बन्ध को एक नई राह दिखाई । जिसका अनुप्रयोग " समाज की स्थापना" और "सरकार की स्थापना" में अंतर,संवैधानिक शासन, नैसर्गिक अधिकार, अनुबंध से न्यास की ओर,सरकार के प्रति विधिसम्मत विरोध का अधिकार,शक्ति का पृथक्करण, और शक्ति के केंद्रीयकरण से बचाव जैसी महत्वपूर्ण
डॉक्ट्रिन को आधुनिक राजव्यवस्था में समावेशित किया।

वर्तमान राजनीतिक चिंतक और विश्लेषकों के लिए यह गम्भीर चुनौती है कि आखिर उदारवाद के मूल तत्वों में अचानक यह क्रांतिकारी बदलाव कैसे होया ? जिस  विचारधारा को भविष्य का वायुमंडल और प्राणवायु माना जा रहा था,वह अचानक ही कटघरे में कैसे खड़ा हो गया ?


जॉन लॉक के विचारों की सबसे बेहतरीन झलक अगर आप देखना चाहें तो आप इन्हें संयुक्त राज्य अमेरिका में संविधान में देख सकते हैं जहां इसकी विस्तृत व्याख्या मिलती है,जो विश्व का प्रथम लिखित संविधान है।
यह लॉक ही हैं जिनके उदावादी विचारों को समैकलीन उदारवादियों में सर्वश्रेष्ठ जॉन रॉल्स(1921-2002) ने इनके सामाजिक अनुबंध सिद्धांत का अनुसरण करते हुए न्याय का विस्तृत सिद्धान्त A Theory of justice में प्रतिपादित किया जो आधुनिक न्यायशास्त्र का मूल आधार है।
लॉक के विचारों को बढ़ावा देने में मैक्फर्सन,जे एस मिल,टी एच ग्रीन रॉबर्ट नॉज़िक सबसे महत्वपूर्ण है।

एन्ड ऑफ हिस्ट्री के जनक और प्रसिद्ध अमेरिकी राजनीतिक  चिंतक फ्रांसिस फुकुयामा ने अलग ही समीकरण को पेश किया उन्होने कहा कि "वैश्वीकरण के चक्कर में दुनिया ने राष्ट्रवाद से मुंह मोड़ लिया इसलिए उदारवाद को भी ठुकरा दिया गया"।

 वैसे गौर करें तो नए विचारों का सामने आना और पुराने विचारों का समाप्त हो जाना मानव इतिहास के लिए कोई नयी बात नहीं है।

इसलिए सदियों पुराने "उदारवाद" से दिल लगाने की फिलहाल कोई वजह तो नहीं दिख रही है लेकिन यहीं सबसे बड़ी दिक्कत भी है क्योंकि हमारे पास पूर्णतः सभी मोर्चे पर खरा उतरा कोई नया विचार नहीं है और न ही कोई नया विमर्श। जिसे हम अपने राजनीतिक चिंतन में शामिल कर सकें।


हां,यह सच है कि जॉन लॉक ने अपना चिंतन इतिहास के जिस दौर में प्रस्तुत किया,उस समय वह उभरते हुए पूंजीवाद को बढ़ावा देने के लिए आवश्यक था। परंतु आज के 21वीं सदी के युग में हम उनकी सारी मान्यताओं को स्वीकार नहीं कर सकते। लॉक ने संपत्ति के अधिकार इतना पावन और शक्तिशाली बना दिया कि उसके बाद के युग में धनवान और निर्धन वर्गों की लड़ाई सारी राजनीति का केंद्र बन गई जो वर्तमान आधुनिक लोककल्याणकारी राजनीतिक चिंतन से मेल नहीं खाती है।


आज 390वीं जयंती पर जॉन लॉक को भले ही उन्हें कोई श्रद्धांजलि न दे लेकिन उनके विचारों को या उनसे शुरू हुई परंपरा को तिलांजलि देने का जो खतरनाक वैश्विक सिलसिला देखने को रहा है, वह हमें अपने किसी भी रूप में हमारे अच्छे भविष्य का कोई आश्वासन नहीं देता है। 

Wednesday, July 06, 2022

प्रलयंकारी बाढ़ से जूझता असम

देश के तमाम हिस्से बीते जून में जहां प्रचण्ड गर्मी से जूझ रहे थे,वहीं पूर्वोत्तर हिस्से में भारी बाढ़ का कहर जारी था,सम्भवतः इसी कारण भारत को चरम मौसमीय दशाओं वाला देश कहा जाता है। 

असम के विभिन्न हिस्सों में बाढ़ के चपेट से उबरे अभी एक माह भी नहीं पूरा हुआ,बाढ़ प्रभावित लोग अपने घरों को अभी सही से दुरुस्त भी नहीं कर पाए थे कि बीते जून में बाढ़ का दूसरा दौर आ गया,यह पहले दौर से काफी तेज़,व्यापक जनहानि लिए था। 

असम में बाढ़ का आना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार समय से पहले अत्याधिक बारिश की वजह से कई इलाकों में अप्रत्याशित स्थिति पैदा हो गई है

इस बार बाढ़ ने असम के मध्य से पश्चिम के निचले असम तक,ब्रह्मपुत्र के कोपभाजन होता रहा। पूरे क्षेत्र में रिकार्ड तोड़ भारी बारिश से लबालब और उफनती हुई नदियों ने कई स्थानों पर अपने सुरक्षात्मक तटबंधों और जान माल की व्यापक पैमाने पर क्षति पहुंचाई।


प्रभावित जिले।

राज्य के नगांव,होजई,मोरीगांव (मध्य असम, ब्रह्मपुत्र के दक्षिण तट पर),दीमा हसाओ, कार्बी आंगलोंग (पहाड़ी जिले), कछार (बराक घाटी), कामरूप (दोनों दक्षिण और उत्तर तट),नलबाड़ी, बजली, बारपेटा, बोंगाईगांव, बक्सा, तामूलपुर,कोकराझार (निचला असम डिवीजन, ब्रह्मपुत्र का उत्तरी तट),ग्वालपारा (पश्चिम असम, ब्रह्मपुत्र का दक्षिणी तट) व्यापक रूप से असम के बाढ़ प्रभावित जिले हैं।

राजधानी गुवाहाटी  कि स्थिति भी खराब रही,घरों में जलजमाव,कई जगहों पर भूस्खलन भी हुआ है। 

 सात दशक में सबसे विनाशकारी बाढ़।

राज्य में बारिश का आलम यह रहा कि ग्रामीणों ने कई जगह पर गांवों को नदियों को बाढ़ से बचाने के लिए बनाए गए तटबंध तोड़ दिए। ग्रामीणों पर यह आरोप लगा कि दक्षिणी असम में बराक नदी के खतरे के निशान पर पहुंचने के साथ उन्होंने अपने गांवों को बाढ़ से बचाने के लिए बेधुकांडी बाघ के एक बड़े हिस्से काट दिया

इससे बराक नदी के तटबंध में बड़ा छिद्र हो गया और असम का दूसरा बड़ा शहर सिलचर बाढ़ की चपेट में आ गया। सिलचर के निवासियों के मुताबिक यह शहर पूरे 18 दिनों तक कमर तक पानी में डूबा रहा। यह सत्तर साल में सबसे भीषण जलीय आपदा थी। पूरा शहर आवश्यक मानवीय सुविधाओं से पूरी तरह वंचित रहा। इस मानवजनित-प्राकृतिक आपदा से त्रस्त असहाय और बेबस आबादी कोस्वच्छ पेयजल और भोजन उपलब्ध कराने के लिए कछार जिला प्रशासन को भारतीय वायु सेना  की मदद लेनी पड़ी। 

असम में बाढ़ : ब्रह्मपुत्र और बराक की भूमिका। 

असम राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार असम की कमोबेश सभी नदियां अपने तीव्रतम वेग और बाढ़ के लिए जानी जाती है। 

वहीं,दूसरी ओर असम में कम समय में बहुत ज्यादा और तीव्रता  लिए बारिश होती है, जिसके चलते इन नदियों में बाढ़ की स्थिति बन जाती है,लेकिन बाढ़ से सबसे अधिक विनाशकारी नुकसान ब्रह्मपुत्र और बराक के सहायक और उप सहायक नदियों के कारण होती है। 

असम की इन तीव्रगामी नदियों की वजह से बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में भूमि क्षरण और कटाव भी बहुत तेजी से होता  है। बाढ़ की दृ़ष्टि से असम की ब्रह्मपुत्र घाटी देश को प्रमुख खतरनाक क्षेत्र माना जाता है। एक अनुमान के अनुसार लगभग 40 प्रतिशत जमीन (32 लाख हेक्टेयर) बाढ़ की वजह से बुरी तरह प्रभावित हो चुकी है। 

ब्रह्मपुत्र घाटी, विश्व में सबसे अधिक बाढ़ प्रवण क्षेत्रों में से एक है,जिसके बाद बराक घाटी का स्थान आता है। भूगोलविदों के अनुसार लगभग 100 सहायक और उप-सहायक नदियों का पानी बह्मपुत्र और बराक में मिलता है ,इन दोनों नदियों का असम को बाढ़ की चपेट में लाने में 40 फीसद योगदान है। 

राष्ट्रीय बाढ़ आयोग की एक रिपोर्ट के मुताबिक असम के कुल भूमि क्षेत्र का 31.05 लाख हेक्टेयर (लगभग 39.58% ) बाढ़ प्रवण क्षेत्र है, जो देश के कुल बाढ़ संभावित क्षेत्र का 10.2 फीसद है। असम में 1953 से हर साल बाढ़ आती है और हर साल कम से कम 2000 से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में आते हैं।

असम में हर साल आने वाले बाढ़ से चिंतित जल संसाधन पर संसदीय समिति की 2020-21 की रिपोर्ट में इस पर विस्तृत विचार विमर्श किया गया है।

अपनी रिपोर्ट में राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने बताया है कि असम में 1954 के बाद से लेकिन अब तक बाढ़ की वजह से 4,27,000 हेक्टेयर भूमि का क्षरण हो चुका है, जो राज्य के कुल क्षेत्रफल का लगभग सात फीसद है और सालाना भूमि कटाव की दर 8,000 हेक्टेयर प्रति वर्ष रही है। 

बाढ़ आयोग की इस रिपोर्ट में  चौंकाने वाली तथ्य शामिल है कि पिछली शताब्दी में ब्रह्मपुत्र नदी का क्षेत्रफल लगभग दोगुना हो गया है। यानी असम की जमीन का एक बड़ा हिस्सा ब्रह्मपुत्र ने अपने आगोश में  ले लिया है। 


यह क्षेत्र गंगा-ब्रह्मपुत्र-मेघना बेसिन का हिस्सा है, जो दुनिया की सबसे बड़ी नदी प्रणालियों में से एक है। यह पूरा क्षेत्र भारत,नेपाल,तिब्बत,बांग्लादेश और भूटान में बंटा हुआ है, जो लगभग 1.7 मिलियन वर्ग किलोमीटर रकबा और इसमें 60 करोड़ से अधिक लोग निवास करते हैं।

विशेषज्ञों के मुताबिक, ब्रह्मपुत्र और बराक नदी घाटी में बाढ़ पहले से ही आती रही है, लेकिन हालिया वर्षों में हुए इस अभूतपूर्व विनाशकारी बाढ़ के लिए मुख्य रूप से दोषपूर्ण बाढ़ नियंत्रण उपायों, अत्यधिक जनसंख्या दबाव,स्थानीय जलाशयों का न होना अथवा संकुचन, अनियंत्रित और अवैध निर्माण और अवैज्ञानिक विकास रणनीतियों को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। 


मौसमविदों ने बीते जून में हुए इस अभूतपूर्ण बारिश और बाढ़ के बाद पूर्वोत्तर राज्यों यथा असम,अरुणाचल प्रदेश नागालैंड और मणिपुर में हुए विनाशकारी भूस्खलन को दुर्लभ घटना बताया है। 

विशेषज्ञों के अनुसार प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में ला नीना और हिंद महासागर में एक नेगेटिव बाई पोलर डाइपोल(नकारात्मक द्विध्रुवीय संयोजन ) ने बंगाल की खाड़ी में दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर बहने वाली समुद्री हवाओं को और मजबूत किया जिससे बंगाल की खाड़ी में ये तेज मानसूनी हवाएं अब पहले से कहीं अधिक नमी ला सकती हैं। 

भौतिकी और उष्मागतिकी के सिद्धांत के अनुसार बढ़ते तापमान के साथ वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ जाती है,क्योंकि गर्म हवा लंबे समय तक अधिक नमी रख सकती है। इसलिए बीते जून की यह भारी बारिश संभवतः जलवायु परिवर्तन के चरम मौसमी दशाओं के कारण हो सकती है।

राज्य में बीते 19 जून, 2022 तक 53.4 मिलीमीटर वर्षण दर्ज की गई। जून के पहले 12 दिनों में कुल 528.5 मिलीमीटर बारिश हुई, जो सामान्य से 109 फीसद अधिक थी।

वसुंधरा के सबसे नम क्षेत्र मेघालय में जून में 1215.5 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो सामान्य से 185 फीसद अधिक वर्षा दर्ज की गई। भारी बारिश के चलते असम, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर में दर्जनों भूस्खलन की घटनाएं सामने आई है।

इनमे सबसे दुःखद मणिपुर के नोनी जिले में जिरीबाम-इंफाल रेलवे सेक्शन पर हुआ भारी भूस्खलन रहा।

इस भूस्खलन का पूरा मलबा,यहाँ मौजूद प्रादेशिक सेना(टेरिटोरियल आर्मी) कैंप पर गिरा और ईजेई नदी का रास्ता बंद हो गया,इससे वहां जलाशय बन गया,जिससे निचले इलाकों में बाढ़ आने का खतरा पैदा हो गया। 

इस घटना में एक लेफ्टिनेंट कर्नल सहित सेना के दर्ज़नो जवानों ने शहादत दी। भारतीय सेना की 107वीं प्रादेशिक सेना के ये कार्मिक मणिपुर के नोनी जिले में तुपुल रेलवे स्टेशन के पास जिरीबाम से इंफाल तक एक निर्माणाधीन रेलवे लाइन की सुरक्षा के लिए तैनात थे। मणिपुर में हुए हुए भूस्खलन में मरने वालों की संख्या अब 27 हो गई, और 40 से अधिक लोग अभी भी लापता है। 


आखिर क्यों आती है असम में बार बार बाढ़। 

1.भौगोलिक अवस्थिति: भूगर्भिक दृष्टि से देखा जाय तो असम अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से ही बाढ़ के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है। इसका कारण,असम घाटी अंग्रेजी के "यू" (U) अक्षर सरीखी घाटी है,जिसकी औसतन चौड़ाई महज 80 से 90 किलोमीटर है। 

जबकि इस घाटी में बहने वाली नदियों की चौड़ाई अमूमन आठ से दस किलोमीटर है,इसके अतिरिक्त तिब्बत, भूटान और अरुणाचल प्रदेश,असम के मुकाबले ज्यादा ऊंचाई पर स्थित है वहां की ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से पानी की निकासी का एकमात्र रास्ता असम होकर ही है ।

चूंकि ,पूरा हिमालय ही न्यू यंग फोल्ड माउंटेन के समूह  में है और पूर्वोत्तर हिमालय तो और भी कोमल है,इसी कारण राज्य की जमीन के अपेक्षाकृत कम कठोर होने के कारण,यहां तीव्रगामी नदियों द्वार भूमि कटाव अत्यधिक तीव्रता के साथ होता है,साथ ही तेज बारिश पानी के प्रवाह की गति बाढ़ के असर को और गंभीर बना देती है।

भूगोलविदों की माने तो ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों और पहाड़ियों से आने वाला पानी ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों का जलस्तर अचानक तीव्रता के साथ बढ़ा देता है जिससे राज्य में बाढ़ की समस्या साल-दर-साल गंभीर होते जा रही है।

इसके अतिरिक्त भौगोलिक रूप से असम ऐसे जोन में है जहां मानसून के दौरान तो देश के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा बारिश होती है।

असम की भूगर्भिक बनावट "कटोरे के समान या U आकार "का है तो उसकी जलवायुवीय संरचना "कीप नुमा" (Funnel Shape) है।

इस क्षेत्र में भारी बारिश बंगाल की खाड़ी में अत्यधिक नमी कारण हुई है। क्योंकि असम और पड़ोसी राज्य ऊंची पहाड़ियों से घिरे हुए हैं।

बंगाल की खाड़ी पर कोई भी मौसम संबंधी गड़बड़ी क्षेत्र को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। क्योंकि बंगाल की खाड़ी में नमी लिये ये पवन इस कीपनुमा संरचना में उलझ जाती है और पूरी तरह यहां बरस उठती है।

विशेषज्ञों के अनुसार राज्य की सबसे बड़ी नदी ब्रह्मपुत्र में काफी हद तक गाद भर गई है,तिब्बत के पहाड़ से आने वाली गाद और पत्थरों ने नदी की गहराई काफी कम कर दी है,नतीजतन ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों में हल्की बारिश ही असम के मैदानी इलाकों जलमग्न करने  के लिए काफी है। 

2.भूकंप/भूस्खलन:असम और उत्तर-पूर्वी क्षेत्र के अन्य क्षेत्र मुख्यत: उच्च भूकंप ज़ोन यानि ज़ोन पांच में अवस्थित है,जो यहाँ भूस्खलन का कारण बनता है।भूस्खलन और भूकंप के कारण नदियों के तलछटों में अवसादों/गाद के जमाव से नदियों की तलहटी ऊपर उठ जाती है,फलस्वरूप नदियों की जल वहन क्षमता में व्यापक रूप से कमी आती है। 


3.तटीय कटाव:ब्रह्मपुत्र तथा उसकी सहायक और उप सहायक नदियां, अपनी उग्र और तीव्र बहाव के लिए जानी जाती है, ये अपनी तीव्र बहाव से बड़े पैमाने पर भूमि का कटाव करती है। ब्रह्मपुत्र नदी के तटों के कटाव के कारण इस घाटी की चौड़ाई 15 किमी. तक बढ़ गई है। 


4.बांधों का निर्माण:असम की नदियों के ऊपरी अपवाह वाले क्षेत्र में बहुद्देश्यीय जलविद्युत परियोजनाओं के लिए अनेक बांधों का निर्माण किया गया है। चीन द्वारा तिब्बत में भी ब्रह्मपुत्र नदी पर कुछ बांध बनाए गए हैं। इन बांधों के जल को छोड़े जाने से असम के घाटी में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।

5.पारिस्थितिकी पर प्रभाव: 

इस क्षेत्र में बाढ़ को बढ़ाने वाले कारकों को समझने की कोशिश करें तो आप समझ सकेंगे कि राज्य में हुई वनों की निर्दयतापूर्ण कटाई इस जलप्रलय के प्रमुख कारणों में से एक है

विशेषज्ञ मानते हैं कि"असम में बाढ़ के प्रमुख कारणों में से एक वनों की कटाई और पहाड़ियों की बेतरतीब कटाई और छंटाई है। यहां आप युवा हिमालय का ख्याल नहीं रख रहे है,वापस में हिमालय से दया मांगना मूर्खतापूर्ण बात होगी

राज्य में /क्षेत्र में जिस तेजी से वनों की कटाई किया जा रहा है उसके कारण,वर्षा अधिक तलछट को बहा ले जाती है और इसे नदी के तल और झीलों में जमा कर देती है। एक बार जब नदी के तल उथले हो जाते हैं, तो यह नदियों को जलस्तर को खतरनाक तरीक़े ऊपर कर देता है जिससे निचले हिस्से/ क्षेत्रों में बाढ़ आ जाती है।" 

वहीं ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों से ही ब्रह्मपुत्र और बराक नदियों की अधिकांश सहायक नदियाँ और उप-सहायक नदियां की पहाड़ियों में उत्पन्न होती हैं,अवसंरचनात्मक विकास और निर्माण के नाम इन पहाड़ियों को काटना,विस्फोटकों से उड़ाना, उसे नग्न करने से इनका मलबा भी इन नदियों के साथ मुख्य नदी में जमा होता है,रही सही कसर इन पहाड़ियों पर वनों को नष्ट कर देने से पूरी हो जाती है।

भूगोलविद असम के इस भारी बारिश को "बोरदोईसिला'' या टी शॉवर का असर मांनते  जिसे असम में मानसून पूर्व ( प्री-मानसून ) हवाएं कहते हैं, जो आमतौर पर कभी-कभार बारिश और गरज के साथ होती हैं। यह ऐतिहासिक रूप से वसंत के मौसम की शुरुआती गर्मी से राहत दिलाने के लिए जाना जाता है। लेकिन इस साल 'बोरदोईसिला' ने राज्य में तबाही ला दी है।

बोरदोईसिला(Bordoisila) को आप,बंगाल के काल बैसाखी(Kaal Baisakhi') या फिर कर्नाटक और केरल के चेरी ब्लॉसम या कॉफी शॉवर (Cherry Blossom showers or Coffee Showers ),कर्नाटक ,कोंकण, गोवा और तटीय केरल में आम्र वर्षा (Mango Shower ) से तुलना कर सकते हैं





आगे की राह: सिक्के का दूसरा पहलू 


1.संपोषणीय विकास पर जोर: 

केंद्र और राज्य सरकार को चाहिए कि इस मसले को दलगत राजनीतिक से परे रख,राष्ट्रीय सुरक्षा को केंद्रबिंदु में रखते हुए निराकार भाव से तमाम सुरक्षात्मक उपायों पर अपना ध्यान केंद्रित करे।

राज्य सरकार और संबंधित एजेंसियों को तटबंध बनाने की मौजूदा नीति की नए सिरे और नवोन्मेषी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समीक्षा करने की ज़रूरत है, बाढ़ निरोधी अवरोधित परियोजनाओं को तेज़ी से क्रियान्वित करने की दिशा में कार्य करना चाहिये


2.हिमालय की सुरक्षा के साथ अवसंरचनात्मक विकास: किसी भी अवसंरचनात्मक और विकासात्मक कार्य से पहले इन नव यौवन लिए पहाड़ो और मिट्टी की संरचना और इनकी प्रतिरोधक क्षमता का मूल्यांकन अवश्य करना चाहिये अन्यथा इसके दूरगामी और विनाशकारी परिणाम होंगे।हिमालय के भौगोलिक स्थलाकृतियों को ध्यान में रखते हुए यहां बहुद्देश्यीय जल परियोजनाओं और बांधों का निर्माण, स्थानीय जल संरक्षण प्रबंधन प्रणालियों,जो सदियों से आजमायी हुई है और  स्थानीय लोगों/आदिवासियों की भागीदारी आधारित परियोजनाओं में व्यापक निवेश को प्रोत्साहित करना चाहिये। 


3.नदीय जल उपयोग संबंधी आँकड़ों (Hydrographic data sharing) का समुचित साझेदारी:भारत को चीन,भूटान तथा अन्य पड़ोसी देशों के साथ नदीय जल उपयोग संबंधी आँकड़ों के साझाकरण की दिशा में समुचित और सामूहिक पहल किये जाने की आवश्यकता है।भारत की केंद्रीय जल आयोग,इसकी सर्वोच्च निकाय है। 


4.तीव्र,समावेशी और स्थानिक वनीकरण पर जोर: हाल के दशकों में पूरे क्षेत्र में वनों की स्थिति लगातार बदतर हुई है,इसके लिए पेड़ों का काटने की घटनाओं में वृद्धि हुई है जिसका सीधा प्रभाव पूरे पारिस्थितिकी तन्त्र पर पड़ता है। इस तरह के जलीय आपदाओं से निपटने के लिये हमें एक समावेशी और संपोषणीय रोड मैप बनाने की आवश्यकता है, जिसमे आने वाले समय को ध्यान में रखकर तीव्र,समावेशी,संपोषणीय और स्थानिक वनीकरण पर बड़े पैमाने पर जोर देना होगा।

बाढ़ के खतरे को रोकने के लिए,हमें पहाड़/पहाड़ियों और पेड़ों को काटने से रोकने की फौरी आवश्यकता है। नदियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्रों और दीर्घकालिक समाधान के लिए प्रमुख रूप से  तीव्र और युद्धस्तर पर वनीकरण अभियान चलाया जाना चाहिए।

राज्य की भौगोलिक अवस्थिति,अरुणाचल प्रदेश और उससे सटे तिब्बत में ब्रह्मपुत्र और उसकी सहायक नदियों पर चीन द्वारा बड़े पैमाने पर बांधों के निर्माण के अलावा पूरे क्षेत्र में तेजी से बढ़ते शहरीकरण को भी इस विनाशकारी बाढ़ के लिए जिम्मेदार ठहराया जाएगा। 


5.नियमित रूप से हो नदियों की तलछट की सफाई(Dredging):भारत,तिब्बत,भूटान और बांग्लादेश यानी चार देशों से गुजरने वाली ब्रह्मपुत्र नदी असम को दो हिस्सों में बांटती है और इसकी दर्जनों सहायक और उप सहायक नदियां भी शामिल हैं। तिब्बत के पठार से निकलने वाली यह नदी असम के घाटी तक अपने साथ भारी मात्रा में गाद लेकर आती है,और यही गाद धीरे-धीरे असम के मैदानी इलाकों में जमा होता रहता है।

फलस्वरूप इससे नदी की गहराई कम होती है. इससे पानी बढ़ने पर बाढ़ और तट कटाव की गंभीर समस्या पैदा हो जाती है।



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अपनी बेहतर समझ और विकसित करने के लिए: 



1.नदी बेसिन :भूमि का वह क्षेत्र होता है जिस पर एक नदी और उसकी सभी सहायक नदियों द्वारा सतही जल प्रवाहित किया जाता है। नदी और उसके बेसिन का जल अंततः समुद्रों अथवा झीलों में प्रवाहित हो जाता है।


2.देश में नदी बेसिन की संख्या:

देश में बीस(20)महत्वपूर्ण नदी बेसिन / नदी घाटियों के समूह हैं। 

इनमें से बारह प्रमुख नदी बेसिन हैं जबकि आठ मिश्रित नदी बेसिन के उदाहरण हैं।

बारह प्रमुख नदी बेसिन हैं

(1) सिंधु

( 2 ) गंगा-ब्रह्मपुत्र– मेघना, (3) गोदावरी

(4) कृष्णा

(5) कावेरी

(6) महानदी

(7) पेन्नार

(8) ब्राह्मणी- बैतरणी

( 9 )साबरमती

(10) माही

(11) नर्मदा और

(12) तापी । 


ये नदी बेसिन देश के कुल क्षेत्रफल के लगभग 43% भाग पर विस्तृत हैं। 


प्रमुख नदियाँ और उनकी सहायक नदियाँ बारहमासी और मौसमी प्रवाह के रूप में लगभग 277 मिलियन हेक्टेयर जल ग्रहण क्षेत्र को आच्छादित करती हैं। 


3.भारत में नदी प्रणालियाँ: 

भारत में,नदी प्रणालियों को मुख्य रूप में चार प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है।

(i) हिमालयी नदियाँ

(ii) दक्कन नदियाँ

(iii) तटीय नदियाँ और 

(iv) अंतर्देशीय जल निकासी बेसिन की नदियाँ 


4.हिमालय की नदियाँ: अधिकांशतः बारहमासी नदियाँ हैं जो हिम तथा हिमनदों के पिघलने से निर्मित हुई हैं। इन नदियों में उच्च सतही जल क्षमता विद्यमान है क्योंकि इन्हें मानसूनी वर्षा से व्यापक मात्रा में जल प्राप्त होता है। 


5.महत्वपूर्ण हिमालयी नदी प्रणालियों में 

सिंधु और गंगा-ब्रह्मपुत्र - मेघना प्रणाली शामिल हैं। 


सिंधु नदी तंत्र 3,21,289 वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है जबकि गंगा - ब्रह्मपुत्र मेघना प्रणाली लगभग 1,097,588 वर्ग - किमी को आच्छादित करती है। 


सिंधु नदी तिब्बत में मानसरोवर के पास से निकलती है,भारत और पाकिस्तान से होकर प्रवाहित होती है तथा कराची के पास अरब सागर में मिल जाती है। 


सिंधु की प्रमुख सहायक नदियाँ सतलुज, ब्यास, रावी, चिनाब और झेलम हैं। 


गंगा नदी उत्तराखंड राज्य में गंगोत्री के पास से निकलती है और भागीरथी और अलकनंदा उप- घाटियों का जल लेकर आगे प्रवाहित होती है। यमुना, रामगंगा, घाघरा, गंडक, कोसी, महानंदा और सोन गंगा नदी की महत्वपूर्ण सहायक नदियाँ हैं। चंबल और बेतवा महत्वपूर्ण उप- सहायक नदियाँ हैं जो गंगा में प्रवाहित होने से पूर्व यमुना की सहायक नदियों के रूप में प्रवाहित होती हैं।



ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से निकलती है और भारत के अरुणाचल प्रदेश और असम राज्यों से होकर प्रवाहित होती है। आगे चलकर बांग्लादेश में प्रवाहित होने के बाद यह नदी बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है। 


ब्रह्मपुत्र नदी को तिब्बत में सांगपो और अरुणाचल प्रदेश में दिहांग कहा जाता है। देबांग, लोहित, सुबनसिरी, जिया भरेली,धनसिरी,पुथिमारी, पगलदिया और मानस भारत में ब्रह्मपुत्र की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। 


तीस्ता नदी बांग्लादेश में प्रवाहित होते हुए ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। इसी प्रकार,बांग्लादेश में पद्मा नदी ब्रह्मपुत्र से मिलती है और यह बंगाल की खाड़ी तक पद्मा नदी अथवा गंगा के रूप में प्रवाहित होती है। 


बराक नदी मेघना नदी प्रणाली की मुख्य धारा है। यह मणिपुर की पहाड़ियों से निकलती है। इस नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ मक्कू, ट्रांग तुइवई, जिरी, सोनाई, रुक्नी, कटखल, धलेश्वरी, लंगाचिनी, मडुवा और जैतंगा हैं। 


मेघना चांदपुर जिले में अपनी प्रमुख सहायक नदी पद्मा से मिलती है। 


मेघना की अन्य प्रमुख सहायक नदियों में ढालेश्वरी, गोमती और फेनी शामिल हैं। 

मेघना बांग्लादेश के भोला जिले में बंगाल की खाड़ी में जा गिरती है । 


दक्कन की नदियाँ मूल रूप से वर्षा पर निर्भर करती हैं, इसलिए उन्हें वर्षा आधारित और गैर- बारहमासी नदियाँ कहा जाता है। 



गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, महानदी आदि नदी प्रणालियां पूर्व दिशा में बंगाल की खाड़ी में गिरती हैं। नर्मदा और ताप्ती पश्चिम की ओर अरब सागर में प्रवाहित होने वाली प्रमुख नदियाँ हैं। 


दक्षिण के तटीय क्षेत्रों में अनेक छोटी नदियां धाराओं के रूप में प्रवाहित होती हैं। इनमें से अनेक नदियां गैर-बारहमासी हैं तथा कम दूरी तय करके समुद्र में मिल जाती हैं। इन नदियों का जलग्रहण क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित है। 


पश्चिमी राजस्थान के अंतर्देशीय जल प्रणाली वाली नदियों की संख्या अत्यंत कम है तथा ये नदियाँ अल्पकालिक चरित्र की हैं और इनमें वर्ष के एक निश्चित समय में ही जल उपलब्ध होता है। 


अधिकांश मरुस्थलीय नदियां खारे पानी वाली झीलों में गिरती हैं तथा ये समुद्र तक नहीं पहुंच पाती हैं। 

उदाहरण: सरस्वती, लूनी, माचू, बनास, रूपेन और घग्गर रेगिस्तानी नदियों के कुछ उदाहरण हैं।





































Wednesday, June 29, 2022

मालदीव में योग का बेजा विरोध.


बीते 21 जून को योग दिवस 2022 के अवसर पर मालदीव की राजधानी माले में विश्व योग दिवस 2022 के अवसर पर वैश्विक"गार्जियन रिंग" आयोजन के तहत जारी योगभ्यास को कट्टरपंथी समूहों द्वारा बाधित किया गया। यह अति दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।
भारत के शीर्ष नेतृत्व को इस पूरे घटनाक्रम को बेहद समझदारी,संजीदगी और गंभीरता से लेने की जरूरत है।

मालदीव के कट्टरपंथियों के विरोध के तरीके पर सिरे से सोचने की जरूरत है। ये कट्टरपंथी "इंडिया आउट" की तख्ती लिए एक फ़्लैश मॉब की  तरह आयोजन स्थल तक सफलतापूर्वक पहुंच कर बेहद सौहार्दपूर्ण तरीके से चल रहे इस वैश्विक स्तर पर जारी योगाभ्यास में अवरोध और तोड़फोड़ मचाते हुए उसे बाधित किया। कटरपंथियो की यह कार्रवाई निश्चित रूप से मालदीव के आसूचनागत तन्त्र की पूर्ण विफलता को दर्शाता है और यह पूरा घटनाक्रम  भारत के लिए बेहद चिंताजनक है।

मालदीव की राजधानी माले में भारतीय दूतावास ने एक स्टेडियम में बाकायदे मंजूरी लेकर योग दिवस का आयोजन किया था,जिसमें अधिकारियों सहित अच्छी खासी संख्या में लोग शामिल हुए थे, ये लोग "गार्जियन रिंग"समारोह के तहत योग कर रहे थे,जिसे भारतीय दूतावास ने भारत के लोक प्रसारक दूरदर्शन के डीडी इंडिया और डीडी न्यूज़ के जरिये रियल टाइम टेलीकास्ट भी किया जाना था। योग दिवस पर  "गार्जियन रिंग" समारोह भारतीय विदेश मंत्रालय और आयुष मंत्रालय का एक महत्वपूर्ण समारोह था जिसमे विश्व के 80 स्थानों पर स्थानीय जनता द्वार  योग करते हुए योग परम्परा के महत्व को रेखांकित किया जा रहा था। मालदीव में यह आयोजन भारतीय समयानुसार प्रातः 7.45 से 8.00 के बीच तय था लेकिन अचानक 100 से ज्यादा कट्टरपंथी उपद्रवियों ने स्टेडियम पर धावा बोल दिया और  योगभ्यास कर रहे लोगों के साथ मार पीट धक्का मुक्की कर योग कर रहे लोगों को भगाने लगे।


जहां एक ओर संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष होने के नाते मालदीव के विदेश मंत्री अब्दुल्ला शाहिद न्यूयॉर्क में योग करते हुए भारत का धन्यवाद कर रहे थे ,कमोबेश उसी वक्त मालदीव में यह अफसोसजनक घटना घटित हुई,मालदीव का आसूचना तन्त्र पूरी तरह विफल रहा,स्थानीय पुलिस  ने उपद्रवियों को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस और काली मिर्च के स्प्रे का इस्तेमाल तो किया,पर वे इस कार्यक्रम को बाधित होने से नहीं रोक सके।

महज,सोच कर देखिए कि अगर ये कट्टरपंथी अगर हथियारबंद होते तो क्या होता ? कितनी तबाही और जन माल का नुकसान होता, यह सिर्फ सोच कर ही सिहरन होती है?

यह घटना हर लिहाज से बेहद दुखद है,इसकी जितनी भी भर्त्सना की जाय वह बेहद कम है
इन कट्टरपंथियों को भारत या भारतीय ज्ञान के बारे में जो अधकचरा ज्ञान है, यह नाहक हंगामा उसका ही एक ताजा नमूना ज्ञात होता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात मालदीव में यह योग दिवस पहली बार नहीं मनाया गया था। वर्ष 2015 से वहां योग दिवस मनाया जाता है।

इन विध्वंसकारी मानसिकता वाले नासमझ कट्टरपंथियों को ने योग को इस्लाम के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए योगभ्यास के बीच इसके ख़िलाफ़ अरबी भाषा में लिखी इससे संबंधित तख्तियां लहराई

यहां यह बेहद मौजू सवाल है आखिर ये कौन लोग हैं, जो योग और योगभ्यास को लेकर ऐसी संकीर्ण और कुंठित मानसिकता के साथ देख रहे हैं?
इसी कुत्सित मानसिक और शारीरिक संकीर्णता की वजह से  विश्व योग दिवस घोषित होने में करीब सात दशक लग गए।

आज पूरे विश्व में लोग धर्म और क्षेत्र से परे,भूगोल और सीमाई बन्धन को  किनारे रखते हुए भारतीय योग परम्परा के महत्व को दिल से आत्मसात कर समझने लगे हैं, पर यह बेहद दुर्भाग्यजनक है कि आर्टीफिशियल इंटेलिजेंस और मशीन लर्निंग़ वाले 21वीं सदी में आज अभी भी ऐसे कुंठित, विकृत और अतिधर्मान्ध मानसिकता वाले लोग मौजूद है जो भारतीय योग परम्परा को महज एक धर्म तक सीमित कर देखते हैं। जरूरत है ऐसे धर्मान्ध व्यक्तियों,संगठनों और इन्हें प्रायोजित और प्रसारित करने वालों के ख़िलाफ़ बेहद सख़्ती के साथ निपटा जाय।
बेशक,मालदीव में इस्लाम राजकीय धर्म है,पर वह 2015 से योग दिवस का आयोजन कर रहा है जिसमे स्थानीय लोगों की व्यापक भागीदारी भी रही है, इस भारत विरोधी घटना के बाद वहां की सरकार की छवि को व्यापक नुकसान पहुंचा है,भारत सदैव एक संप्रभु,शांतिपूर्ण,समृद्ध और सद्भावपूर्ण मालदीव के लिये प्रतिबद्ध रहा है,साथ ही वह "आल टाइम फर्स्ट रेस्पांडर" भी है।


इसलिये वहां की सरकार की जिम्मेदारी है कि वह अपने उन लोगों को समझाए, जो योग को एक धार्मिक कृत्य मानते हैं।

यहाँ इस घटना से  हमें 2010 में मालदीव के तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद नशीद के इस बयान को एक बार फिर से याद करना बेहद प्रासंगिक होगा,जिसमे उन्होंने कहा था कि,"ये बहुत दुःख की बात है कि मालदीव के कुछ युवा पाकिस्तान स्थित मदरसों में पढ़ाई कर अतिवादी विचारधारा को अपना रहे हैं और जब यही छात्र मालदीव लौटते हैं तो उस अतिवादी विचारधारा को फैलाते हैं।"

उनके विगत एक दशक पूर्व दिए बयान और योग मोहत्सव को बाधित करने वाली कुत्सित कृत्यों में संभवतः इन्ही कट्टरपंथियों का दिमाग हो सकता है। इस तरह से इस्लामिक चरमपंथ बढ़ रहा है और ये एक मुद्दा है, लेकिन आप इसे कैसे सुलझाते हैं ये अलग विषय है.

मालदीव एक बेहद खूबसूरत द्वीपीय देश है,जो अपनी लंबे लम्बे और दूर दूर तक फैले समुद्री बीच,कोरल रीफ के लिए जाना जाता है।
 यह देश अपनी प्राकृतिक नैसर्गिक सुंदरता और द्वीपीय पर्यटन के लिए विश्व प्रसिद्व है । मालदीव बिना की भूमि सीमा साझा किए भारत के बेहद करीब है। मालदीव की यही करीबी इस्लामाबाद और बीजिंग, दोनो को आंखों में खटकती रहती है,यहां पर भारत की उपस्थिति उन्हें अपने गले में फंसे हुए मछली के कांटे के समान लगती है। 

इसलिए अगर जांच के पश्चात इस विरोध प्रदर्शन में इन दोनों देश की किसी भी तरह की भूमिका का पर्दाफाश हो,तो किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।
इसलिये मालदीव में हुए भारत विरोधी हरकत को स्वाभाविक ही किसी गम्भीर समस्या के प्रति पूर्व चेतावनी स्वरूप समझनी चाहिए।
हालिया वर्षो में मालदीव में भारत की बढ़ती भूमिका और उसकी मालदीव के साथ उसकी रणनीतिक भागीदारी रावलपिंडी और बीजिंग को निश्चित रूप से चिंतित करती होगी।

मालदीव में चीन ने अपनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स नीति और बेल्ट और रोड पहल के तहत व्यापक अधोसंरचनात्मक और अवसंरचनात्मक क्षेत्र में व्यापक पूंजी निवेश कर चुका है,वह अपनी "डेब्ट ट्रैप
डिप्लोमेसी"के जरिये इस खूबसूरत देश को अपनी ऋण ग्रस्तता का शिकार बनाना चाहता है।
मालदीव के मारायो/मराओ बन्दरगाह पर उसकी बहुत पहले से नजर है,यह उसके स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की नीति में ग्वादर के बाद अहम पड़ाव है। भारत इस क्षेत्र का नैसर्गिक नेतृत्वकर्ता है और यहां पर चीन की मौजूदगी हमें निश्चित रूप से नागवार गुज़रेगी क्योंकि चीन की मौजूदगी सीधे तौर पर हमारी संप्रभुता पर सवाल उठातीहै।

मालदीव भारत के लिए सामरिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है,और यहां होने वाली सामान्य सी हलचल और  उथल पुथल भारत के लिये चिन्ता का सबब बनता है।सामरिक विशेषज्ञों का मानना है कि 2008 में समुद्र के रास्ते मुंबई पर हुए पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवादी हमले जैसी दूसरी घटना मालदीव के रास्ते से भी संभव है। इसलिये नैसर्गिक रूप से दोनो देश अपने सुरक्षा को लेकर खासे सजग और सतर्क रहते है।
हालांकि मालदीव का शीर्ष नेतृत्व ने बार बार भारत को आश्वस्त किया है कि मालदीव की धरती का इस्तेमाल कभी भी भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं हो सकता।

इसलिए मालदीव में भारत की उपस्थिति चीन को प्रतिसन्तुलित करने के लिए बेहद जरूरी है।
योग और योग परम्परा भारतीय राजनय की सॉफ्ट पावर डिप्लोमेसी का एक अभिन्न अवयव है जिससे सभ्यतागत और सांस्कृतिक मेल जोल को बढ़ावा मिलता है। यहाँ यह जांच का विषय है कि  ऐसे कौन लोग हैं, जो योग के मामले में लोगों को बहका रहे हैं। भारत या भारतीय उत्पाद,ज्ञान विरोधी मानसिकता रखने वाले लोग संगठन या कोई देश को इस मसले पर भी भारत को इनसे प्रभावी रूप से निपटने की जरूरत है। हम उम्मीद करते हैं कि इस मसले पर भी हमारी सरकार पर्याप्त रूप से सक्रिय है।

यह सर्वविदित है कि पूरी दुनिया में लोग योग और इसके महत्व को समझने लगे हैं,यह सांस्कृतिक विरासत किसी धर्म या पन्थ के खिलाफ नहीं है। आज योग और उसके महत्व को बिना किसी रंगीन चश्मे से कहीं ऊपर उठ कर देखने की जरूरत है।

इसके अतिरिक्त योग का और बेहतर प्रसार के  लिए पूरी दुनिया के साथ भारत को योग पर एक बेहतर और प्रभावी संवाद स्थापित करना चाहिए।साथ ही गार्जियन ऑफ रिंग जैसे महोत्सव को और बड़े पैमाने पर मनाये जाने की जरूरत है।

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#बीजिंग#बेल्ट_एंड_रोड #अब्दुल्ला शाहिद 
#इंडिया_आउट"

Sunday, January 23, 2022

Abide with me से ए मेरे वतन के लोगों...

हर बात को गांधी बापू से जोड़ दीजिये,काम खत्म,विवाद शुरू। यह अब नहीं चलेगा।

वैसे भी #बीटिंग_रिट्रीट समारोह या कोई और समारोह  में हमारी धुन क्या हो यह रायसीना की पहाड़ियां निर्णय करेगी न कि टेम्स का बिग बेन और देश में मौजूद अंग्रेजीदां लोग। वैसे भी "हम"{WE..} निर्विवाद रूप से पूरी सक्षम और संप्रभु हैं अपनी धुन सहित अन्य तमाम फैसले लेने के लिए।


बहुत सुना हमने मातमी #abide with me...को, मान भी लिए इस धुन की वैश्विक सैन्य जगत में इसकी लोकप्रियता को,चलिए ठीक है।

....लीजिये अब आप सुनिए कवि प्रदीप की अमर कृति और #लता दीदी की मखमली,चिर अविस्मरणीय और ओजपूर्ण स्वर में "#ऐ_मेरे_वतन_के_लोगों... और गर्व कीजिये खुद पर भारतीय होने का, पूरी तरह वशीभूत हो जाइए इसके मार्मिक बोल पर और डूब जाइये इस गीत में और हो सके तो खुद को संभाल लीजिये कि इस दौरान आपके आंखों से आंसू का एक कतरा न छलके, प्रयास कीजियेगा। 

पूरी गारंटी के साथ कह सकता हूँ कि इस गीत पर आप पूरी तरह खुद पर जम कर इतरा सकते हैं और याद कर सकते हैं उन शूरवीर जांबाजों के असाधारण,अनुपम,अनुकरणीय बलिदान को,आगे क्या ही कहूँ,भावविह्वल और भावविभोर भावनाओं को स्वयं में महसूस कीजिये..इनकी तो ..कलम भी जय बोलती है।

हमारा अपना गौरवपूर्ण संगीत का अतीत है इसलिए हम अपना धुन स्वयं चुनेंगे। इसपर किसी को कोई गिला शिकवा होना ही बेईमानी है और मातम मनाना निरा मूर्खतापूर्ण कार्य।

हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि अंग्रेजी कुशासन ने भारत पर जुल्मों सितम ढाने की इन्तिहां कर दी।

 इनकी कुव्यवस्था,निर्दयतापूर्ण कुशासन और मक्कार आर्थिक नीतियों के त्रिभुजाकार शासन व्यवस्था ने आज तक पूरे देश को गर्त में धकेला हुआ है,जिससे हम उबरने की पूरी जद्दोजहद कर रहे हैं।

औपनिवेशिक ब्रिटिश कुशासन ने अपनी द्वेषपूर्ण,मक्कारी और कुटिल चाल और निर्दयतापूर्ण तरीके से समृद्ध,स्वच्छ, निर्मल और अविरल हुगली के पूरे पानी को विशाल औपनिवेशिक ब्रिटिश स्पंज से सोख कर मैली,प्रदूषित टेम्स को साफ कर दिया। इसलिए तो कहा भी जाता है कभी लंदन से ज्यादा समृद्ध मुर्शिदाबाद था। कमबख्त,औपनिवेशिक अंग्रेजी कुशासन भारत को आखिरकार पूरी तरह लूट खसोट कर चले तो गए और छोड़ गए अंग्रेजियत जिसे आज भी हम भारतीय आये दिन सामना करते रहते है।

भारत में अंग्रेज अपने सफेद झूठ,कपटपूर्ण कार्य,मक्कारी से भरी हुई नीतियों की वजह से कुख्यात रहे हैं। ब्रिटिशों ने भारत के समृद्ध और गौरपूर्ण इतिहास ,संस्कृति, आर्थिक और सामाजिक ताने बाने और पूरे भौगोलिक संरचनाओं को स्कॉच के नशे में धुत्त होकर इसे बलत्कृत किया,जिसका दंश आज तक हम भुगत रहें हैं और पता नहीं ,कब तक और कितनी आने वाली पीढ़ी इसे भुगतेगी।

अंग्रेज आखिर कर भारत से चले तो गए पर इन्होंने हमारी विलक्षण सभ्यता को नाश करने में कोई कोताही नहीं बरती,इतिहास गवाह है इनके काली करतूतों का,बहुत ज़ख्म दिए हैं । अंग्रेजों ने हमारे देश को जो आजादी के सात दशक बीतने के बाद भी उतने ही हरे हैं।
यह कभी न भूलने वाली बात है,यकीन मानिए जिस दिन आपने इसे भुलाया,उस दिन से आप परतंत्रता की बेड़ियों की अग्रसर होने की राह पर नङ्गे पांव चल पड़ेंगे।

इन्होंने हमारी सांस्कृतिक आचरण को भी बुरी तरह प्रदूषित किया,हमारी अधोसंरचना में इनके रक्तबीज माफ़िक उत्प्रेरक अभिलक्षण को आप आज भी देख सकते हैं, संभवतः आये दिन जूझते भी हों। इतिहास से सीख लीजिये,सबक लीजिये,अंग्रेजी कुशासन ने हमें क्या दिया इसका आकलन आप बिना किसी के झांसे में आते हुए स्वयं कीजिये,आत्मचिंतन और मंथन कीजिये सब समझ में आ जायेगा।

अंत में आप भारत के अक्षांश और देशांतर पर भी गर्व कर सकते हैं, महज फ़र्ज़ कीजियेगा कि अगर आप इस खास "अक्षांश और देशांतर"के इतर के नागरिक होते। तो,नक्शे पर दौड़ाइये अपनी नज़रों को और खुद महसूस कीजिये फ़र्क़ को।