डिप्लोमेटिक दिसम्बर
भारत में शीत ऋतु दस्तक दे चुकी है और कैस्पियन सागर की नमी लेते हुए पश्चिमी विक्षोभ अपने तयशुदा मार्ग के जरिये भारत में प्रवेश कर गया है ,अगर सब कुछ "आशानुरूप रहा "तो यह तो यह सर्द माह भारतीय राजनय और सामरिक हितों के रूप से बेहद गर्माहट भरा रहेगा और जिसकी गर्मी को वास्तविक नियंत्रण रेखा और नियंत्रण रेखा वाले हमारे पड़ोसी स्पष्ट रूप से महसूस करेंगे।
कोविड19 महामारी के नए वैरियंट ऑफ कंसर्न ओमिक्रोन से दुनिया भर में दहशत और मचे हड़कम्प से बेफ़िक्र रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर अपने संक्षिप्त दौरे पर सोमवार को नई दिल्ली आ रहे हैं।
वैश्विक राजनय और सामरिक विशेषज्ञों की तिरछी नजर तो इस यात्रा पर रहेगी ही,वहीं इस्लामाबाद- रावलपिंडी के साथ गलबहियां करते चीन की बेचैनी किसी से छिपी नहीं और बिडेन प्रशासन के खड़े होते कान और फूफा की तरह मुंह फुलाये रहने के बाद,अब इनकी पूरी निगाह राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की महज छः घण्टे की भारत यात्रा और 2+2 वार्ता से निकले अंतिम वक्तव्यों पर ही टिकी रहेगी।
एजेंडा:
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत की आधिकारिक यात्रा पर सोमवार को दिल्ली पहुंचेंगे। जहां वे 21वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हिस्सा लेंगे। दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों की व्यापक संभावनाओं की समीक्षा और परीक्षा करेंगे तथा साथ साथ सामरिक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के विभिन्न उपायों पर चर्चा करेंगे।
यह सम्मेलन दोनो देशों के आपसी हित के क्षेत्रीय,बहुपक्षीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचारों का प्रतिनिधिमंडल स्तरीय आदान-प्रदान होगा।
इसी कड़ी में दोनों नेता बंद कमरे में आमने-सामने बातचीत भी करेंगे।
सोमवार को जब रूस के रक्षा और विदेश मंत्री भारत में अपने समकक्षों के साथ मंच साझा करेंगे तो यह भारत के टू प्लस टू फ्रेमवर्क में आने वाले चौथा देश होगा। अब तक इस तरह की वार्ता में अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।
रूस में तेजी से बढ़ते कोरोना के मामले और यूक्रेन सीमा पर भारी सैन्य जमावड़े के बीच राष्ट्रपति पुतिन का भारत आने का फैसला दोनो देशों के रिश्तों के लिए बेहद सकारात्मक संकेत है।
संभवत: घरेलू संकट और अपनी अन्य व्यस्तताओं की वजह से संभवतः राष्ट्रपति पुतिन ने भारत सिर्फ कुछ घंटे गुजारने का फैसला किया ,लेकिन राष्ट्रपति पुतिन की यह यात्रा भारत व रूस के पारंपरिक रिश्तों में ढलान आने के विरोधियों के तमाम कयासों को विराम देने वाली सिद्ध होगी।
यह कयास खासकर तब ज्यादा बलवती हो गयी थी जब पुतिन की तरफ से दिसंबर 2019 की प्रस्तावित यात्रा को टाल देना, विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का बतौर रूस के विदेश मंत्री पहली बार पाकिस्तान की यात्रा करना, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन को रूसी साथ अमेरिका से भारत की बढ़ती सामरिक नजदीकियां, क्वाड का औपचारिक गठन आदि के चलते विरोधियों के बीच यह कयास लगाए जा रहे थे कि भारत व रूस के बीच रिश्तों में अब वह पुरानी गर्माहट नहीं रहेगी।
भारत रूस के राजनय,सामरिक और रणनीतिक सम्बन्धों की दृष्टि से यह सम्मेलन वर्षांत का सबसे बड़ा राजनीतिक जमावड़ा है। । राष्ट्रपति पुतिन की कोविड-19 के बाद यह उनकी इन-पर्सन यह पहली विदेश यात्रा है।इससे पहले वे राष्ट्रपति बिडेन से हेलसिंकी में आमने सामने मुलाकात की थी।
भारत और रूस संबंध।
भारत और रूस के संबंधों को सामान्यतया ऐतिहासिक, आपसी विश्वास और आपसी एवं पारस्परिक समझ पर आधारित है और बिना किसी "लाभ हानि"की चिंता किये ये दोनों देश समय के क्रूर पहिये पर पड़ोसी की "आल वेदर फ्रेंडशिप" के फ़र्ज़ी दावे से कहीं सुदूर "अपने आप मे अनूठी "(sui generis) दोस्ती को दर्शाती है।
दूसरे शब्दों में आप "भारत और रूस के बीच एक विशिष्ट और विशेषाधिकार प्राप्त साझेदारी हैं"के रूप में देख सकते हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के भारत के साथ संबंधों का जिक्र करते हुए कहा था कि..
"भारत का हर व्यक्ति और बच्चा तक यह जानता है कि रूस भारत का महानतम मित्र है।"
और .
"रुस और भारत के रिश्ते सरकार और राजनेताओं के नहीं, दोनों देश की जनता के दिल के रिश्ते हैं "
वहीं राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी दोनो देशों के आपसी रिश्तों को लेकर कहा था कि...
"हम भारत की कीमत पर किसी से दोस्ती नहीं कर सकते' ब्लादिमीर पुतिन।
"समय बदला है, लेकिन भारत के साथ हमारी दोस्ती में कोई बदलाव नहीं आया है"-राष्ट्रपति पुतिन.
जबकि भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने दोनो देशों के रिश्तों के बारे में एक कार्यक्रम में कहा था कि...
''विश्व बदल रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनय में भारत और रूस के संबंध समय पर खरे,सदैव अचर,स्थिर,और स्थाई रहें हैं।
महाशक्तियों की आंखों में खटकता यह रिश्ता:आखिर क्या कहलाता है।
इन दोनो देशों के इस अनूठे सम्बन्धो को बिगाड़ने,तोड़ने,मरोड़ने,खटास पैदा करने,के साथ साथ धमकाने,आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने,तक जैसी ओछी हरकत करने से पश्चिमी देश और अमेरिकी नीत महाशक्तियां और इनके पुछल्ले देश बाज़ नहीं आये लेकिन भारत रूस के यह समय आधारित और विश्वसनीय संबध इन सबकी कुटिल चालों से सदा ऊपर उठकर रही।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो यह संबंध तो 1468 से 1472 के बीच जब रूसी यात्री अफनसे निकितिन ने फारस और ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्र से होते हुए भारत की यात्रा की और अपनी कृति khozheniye za tri morya (द जर्नी बियॉन्ड थ्री सी) लिखा तब से ही व्यापक हो चुके थे। मॉस्को,सेंट पीटर्सबर्ग, व्लादिवोस्तक,सेंट पीटर्सबर्ग यकेतेरिनबेर्ग और नोवोसिबिर्स्क,अस्त्रखान से हमारे बहुआयामी सम्बन्ध तो आदि काल से रहे है।
जिसे हमने गंगा- वोल्गा ब्रह्मपुत्र -मस्कवा ,रुपये-रूबल,टैगोर-गोर्की,चेखोव-प्रेमचंद
दिनकर-पुश्किन,राहुल-दोस्तव्स्की,इसरो-रॉस्कोसमोस,बार्क-रॉसएटम,एचएएल-रोसोबोरोनएक्सपोर्ट,के जरिये सांस्कृतिक,साहित्यिक, सामरिक,तकनीकी और आर्थिक सम्बन्ध को मजबूत बनाया है।
रांची,भिलाई,बोकारो,हल्दिया,मथुरा सहित कई अन्य औद्योगिक शहर,के औद्योगिकीकरण में कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी,बस आप नाम लेकर आप अपनी आंखें बंद कीजिए रूस का योगदान आपके जेहन में बर बस सामने आएगा।
नेहरू-निकिता,शास्त्री इंदिरा-ब्रेझनेव,राजीव,राव-येल्तसिन,बाजपेयी-प्रिमिकोव सुषमा-लावरोव-
जयशंकर ,अलेक्जेंडर कदाकिन के साथ अब नरेंद्र मोदी व्लादिमीर पुतिन के साथ इस अनन्य राजनीतिक और राजनयिक सम्बन्धों को आगे बढ़ा रहे हैं। व्लादिमीर पुतिन तत्कालीन अस्थिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और फिर अब स्थिर भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व को देख,समझ और परख चुके हैं
मास्को के प्रसिद्ध सर्कस,लचीली जिम्नास्ट,राज कपूर की लाल टोपी, विश्वनाथन आनन्द और गैरी कास्पोरोव, मरात साफ़िन,दिनारा सफ़ीना,अन्ना कुर्निकोवा से मारिया शारापोवा,एके 101 और वर्तमान एके 203,असॉल्ट राइफल, सुखोई 30,ईल्युशिन,कामोव,टुपोलोव अंटोनोव श्रेणी की चौकड़ी,भीष्म,पिनाका,अरिहंत,विक्रमादित्य,चक्र औऱ मिग बाइसन-अभिनंदन के साथ सबसे उन्नत वायु रक्षक प्रणाली एस-400 की जोड़ी
दोनो देशों के सांस्कृतिक,सामरिक एवं रणनीतिक संबंधों को बयां करती ।
ये चंद उदाहरण है जिसे आप भारतीय विदेश मंत्री के उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि होती है और इस विशेष सम्बन्धों वाले दोनों देशों की रिश्ते से चिढ़ कर अपना सर नोचने वाले पश्चिमी और अपने पड़ोसी देशो के लिये भारत रूस के सम्बन्ध, एक सीख है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक में राजनय और दोस्ती को कैसे साथ लेकर चला जाय।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनय की कॉपी बुक स्टाइल तो यही कहती है कि "जो आप कहते है उससे कहीं ज्यादा ध्यान उस पर दिया जाना चाहिए जो आप नहीं कहते है"भारत के साथ रूस की कमोबेश यही स्थिति बरकरार रही है।
वैश्विक राजनय में रूसी वापसी।
ग्लॉसनोस्त और पेरेस्त्रोइका से आगे निकलते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन की "वोस्तानॉवलेनये (रिस्टोरेशन )की अभिनव नीति और अपने सुदूर पूर्व पूर्वी क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध कार्यक्रम के साथ साथ बदलते विश्व में,साइबर प्री एम्प्टेशन,रिमोट संचालित ड्रोन वारफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रोबोटिक वेपन सिस्टम,स्पेस बेस्ड वेपन प्लेटफार्म,हाईपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल,क्लीन माइक्रो थर्मोन्यूक्लिअर बम और हाइब्रिड वारफेयर के दौर में रूस ने अपनी कामयाबी को "प्रिमिकोव डॉक्ट्रिन और ग्रसिमोव डॉक्ट्रिन" के जरिये हासिल किया है,।
चाहे,सीरिया में रूसी वायुसेना नौसेना और स्पेतज़नाज़ की तैनाती हो या फिर साथ बशर अल असद का अमेरिकी कोप से बचाव हो,या फिर क्रीमिया और काला सागर में रूसी नौसैनिक प्रभुत्व,पूरे यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली नोर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइप लाइन की सफलतापूर्वक शुरुआत, अफगानिस्तान के मसले पर चतुराई भरी रणनीतिऔर अब यूक्रेन की सीमा पर भारी सैन्य तैनाती और हालिया जापान से लगे अपनी सीमा साझा करती क्यूराइल द्वीप समूह पर आण्विक मुखास्त्र तैनात करने का मसला हो , या आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिकी धौंस अब रूस अमेरिका सहित उसके पुच्छले देशों को सिर्फ आंख ही नहीं दिखता बल्कि क्षेत्र से खदेड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है।
रूसी चाहत।
रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी सदा लुभाता रहा है।चेन्नई -व्लादिवोस्तक मार्ग के संचालित होने के बाद प्रशांत महासागर का हिन्द महासागर में मिलन हो सकेगा और चीन रूस के आगोश में शांति से रह सकेगा।इस समुद्री मार्ग के जरिये ही भारत -वियतनाम -रूस की त्रिपक्षीय नवीन संकल्पना को मूर्त प्रदान किया जा सकेगा। इससे आसियान देशों के लिए भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एक्सटेंडेड ईस्ट पॉलिसी में रूसी सहयोग बढ़ेगा। ये दोनों देश ब्रिक्स,एससीओ,आरआईसी आदि सहयोगी मंचो पर विद्यमान है।इसी कड़ी में रूस का आसियान देशों के साथ हालिया नौसैनिक सहयोग भी बेहद अहम है।
सम्बन्ध सुधारने की और जरूरत.
रूस के साथ द्विपक्षीय संबंध को गति देने के लिए भारत को रणनीतिक आण्विक और सामरिक सम्बन्ध के साथ साथ अन्य आर्थिक व्यापारिक गतिविधि को और बढ़ावा देना पड़ेगा। दोनो देशों के बीच कई मुद्दों पर अभी और भी सक्रियता के साथ इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार से कहीं ऊपर उठकर क्रियान्वयन करने की जरूरत है। इन मुद्दों में सबसे प्रमुख हैं व्यापारिक कनेक्टिविटी ,भौगोलिक दूरी,विदेशी निवेश संबंधी कानून,कमजोर बैंकिंग व्यवस्था,नीतिगत विषमता,रूस की वीजा रेस्ट्रिक्ट नीति आदि मसलों पर ध्यान देने की विशेष जरूरत है।
भौगौलिक दूरी दोनो देशों के बीच व्यापार और व्यापार असंतुलन की सबसे बड़ी बाधा है,जिसे इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग पर तीव्रता से व्यापारिक रूप से व्यवहारिक बनाना होगा जिससे स्वेज नहर पर इनकी निर्भरता कम हो सके और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता,मुक्त व्यापार मंच जैसे यूरेशियन इकनोमिक यूनियन आदि मसलों पर बेहद संजीदगी के साथ पेश आना होगा।
ट्रेड वॉर,अमेरिकी कड़े होते वीजा नीति, अमेरिकी डिग्लोबलाइजेशन नीति,अमेरिका की रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और संरक्षणवाद,चीन की ग्लोबलाइजेशन 2.0 विथ चाइनीज करेक्टर के इस दौर भारत और रूस को चाहिए कि बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य में साथ मिलकर आगे आते हुए इन आर्थिक अवसरों लाभ उठाने की आवश्यकता है।
हिन्द प्रशान्त क्षेत्र की बदलती जरूरतें,अफगानिस्तान में अमेरिकी वापसी और इस क्षेत्र में बढ़ता रूसी वर्चस्व,
पश्चिम एशिया में सीरिया पर प्रभावी रूसी करवाई,ईरान के साथ अमेरिकी टकराहट,यूक्रेन की सीमा पर भारी सैन्य जमावड़ा आदि मसलों पर रूस को भारत की सख्त जरूरत होगी ।
विथ लव फ्रॉम इंडिया : रसियन रोमांस.
ग्रेट पैसिफिक रिम की संकल्पना के बाद "पाइवोट ऑफ एशिया/यूरेशिया" चीन की आक्रमक मेरीटाइम नीति,और बदले हुए 'इंडो पैसिफिक अवधारणा "और रूस अमेरिका के बीच आईएनएफ संधि के बाद खटास होते रिश्ते के,भारत पर रूसी सैन्य हार्डवेयर न खरीदने का अमेरिकी दवाब में भारत का न आना और अत्याधुनिक वायु रक्षक प्रणाली एस 400 को तयशुदा समय पर भारत को सौंपने का रूसी संकल्प निश्चित रूप से इमरान-जिंगपिंग की कुशासन और बिडेन प्रशासन की आंखों की नींद हराम कर चुका है।
भारत और रूस की अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली
एस-400 सौदे पर बिडेन प्रशासन खिन्न और कुपित है। इससे पूर्व में अमेरिका ने तुर्की द्वारा एस 400 के खरीद पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत के खिलाफ बिडेन प्रशासन की लाख जतन के बाद भी उनकी दाल नहीं गली,तरह तरह के अमेरिकी दबाव की के बाद भी भारत को जल्द ही एस 400 की दो बैटरी की जल्द ही आपूर्ति होने की प्रबल सँभावना है।
इस मुद्दे पर भारत ने अमेरिका को स्पष्ट रूप से कहा ही यह मिसाइल डिफेंस प्रणाली आक्रमक चीन की नापाक हरकतों को रोकने के लिए बेहद अवश्यम्भावी है। इसकी वजह यह है कि चीन को काबू में रखने के लिए इस भारत की फौरीजरूरत है जिसके बाद अमेरिका के पास कुछ बचता नहीं था।जिसे वह भारत का नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता था। चीन ने भी भारत को एस-400 आपूर्ति पर विरोध दर्ज किया था,लेकिन, इस मामले में रूस ने उसे स्पष्ट कर दिया था कि भारत और रूस के बीते सात दशकों पुराने सैन्य रिश्ते हैं, लिहाजा रूस एस-400 मिसाइल डिफेंस प्रणाली भारत को अवश्य मुहैय्या कराएगा।
अमेरिकी काटसा के विभिन्न प्रावधानों को धता बताते और अमेरिकी प्रतिबन्धों को तवज्जो न देते हुए भारत ने एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम पर अपने पूर्व में लिए फैसले को कायम रखा। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार हो सकता है कि इस वार्ता के एस 400 के अति उन्नत और परिष्कृत सँस्करण एस-500 का उपयोग करने वाला भारत सम्भवतः प्रथम देश बन जाय।
इन्ही वजहों से तमाम विशेषज्ञों द्वारा राष्ट्रपति पुतिन की इस यात्रा और रूसी- भारतीय प्रतिबद्धता को बेहद "व्यापक अर्थों " में देखा जा रहा है।
वे मुद्दे जिन पर थोड़ी सी है रूसी असहजता।
रूस क्वॉड से क्यों असहज है.?
विशेषज्ञों के राय में इसके लिए संभवतः दो मुख्य कारण हो सकते हैं।
1.रूस के हिसाब से भारत का इस समूह में शामिल होना रूस के लिहाज से थोड़ा अटपटा और अनैतिक जैसा है क्योंकि ऑस्ट्रलिया को एकबारगी छोड़ भी दें तो उसके जापान और अमेरिका से सदैव छत्तीस का आंकड़ा रहा है।
2.संभवतःरूस ऐसा महसूस कर रहा हो कि ये गठबंधन आगे चल रूस के लिए भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ख़तरा साबित हो सकता है.'' इस लिए भारत में रूस के राजदूत निकोल कुदशेव ने बीते वर्ष हिंद महासागर में यूरेशियन साझेदारी की पेशकश की थी।
अमेरिका और रूस शीत युद्धकालीन समय से एक दूसरे के धुर विरोधी हैं।अमेरिका क्वॉड में प्रमुख देश के रूप में शामिल है जिसके साथ भारत के विशेष रणनीतिक समझौते शामिल है,सबसे मजेदार बात यह है कि क्वाड के चारों देश चीन की बढ़ती विस्तारवादी नीति और उसकी वुल्फ वारियर राजनय से अनाधिकारिक रूप से सशंकित हैं। चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक,वाणिज्यिक,और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा साझेदार देश है,वैचारिक रूप से कभी समानता लिए दोनो देश सामरिक और रणनीतिक क्षेत्र की साझेदारी में कहीं पीछे नहीं हैं।
क्वाड के गठन के बाद से ही रूस को ऐसा लग रहा था कि भारत के साथ उसके सम्बन्धों में गिरावट आएगी। हमें समझना होगा कि भारत रूस के अपने आप में अनूठे सम्बन्ध समय की तकाज़ा पर बेहद अनुशासन के साथ पुष्पित और पल्लवित हुए है,जिसे हम किसी क्वाड या अन्य गठबंधन की जद में नहीं देख सकते है।
आज रूस सहित तमाम देश मानते हैं कि विश्व का स्वरूप द्विध्रुवीय से कहीं बाहर निकलकर बहुध्रुवीय हो चुका है और सभी छोटे बड़े देशों की अपनी अपनी भूमिका है।
क्वॉड को लेकर रूस को संभवतः यह भी आशंका है कि यह गठबंधन कहीं अमेरिका नीत न बन जाये और इस समूह का नियत्रंण अमेरिका के हाथ में हो।
जिससे कहीं भारत ''एंटी-रूस ख़ेमे "का हिस्सा न बन जाए और इंडो-पैसेफ़िक में जो रूसी समुद्री बेड़े के लिए ख़तरा पैदा हो जाय है"।
यहां रूस को समझना होगा कि भारत के रहते इस क्षेत्र में रूसी बेड़े की सुरक्षा को लेकर उसे किसी तरह आशंकित होना चाहिए, ,क्वाड में भारत के अलावा तीनो देश रूस भारत के रणनीतिक रिश्तों से भली भांति परिचित है,जिसके कारण अगर उनके मन में अगर कभी ऐसी खुराफाती दुस्साहस करने का मन भी किया तो भी वे भारत को देखकर शांत रहेंगे। व्यक्तिगत तौर पर मुझे नहीं लगता कि भारत कभी भी रूस विरोधी गतिविधि में शामिल होने के लिए तैयार होगा।
कई विशेषज्ञों की राय में क्वॉड को पूर्णत: चीन से निपटने के लिए बनाया गया है और भारत क्वॉड को इसी रूप में देखता है लेकिन खुल कर कभी भी आधिकारिक रूप से इस बात को नहीं कहता है।
फिर भी अगर किसी तरह की मनमुटाव की थोड़ी सी संभावना नजर आए तो उसे पूरी तरह मिटाते हुए
यहां शीर्ष नेतृत्व को स्पष्ट कर देना चाहिए कि...
"अगर,भारत अपने सामरिक,राजनयिक और रणनीतिक संबंध इजराइल,अमेरिका,फ्रांस और अन्य पश्चिमी देशों के साथ प्रगाढ़ कर रहा है तो इसका यह कतई मतलब नहीं कि भारत रूस को दरकिनार कर रहा है। रूस भी अपनी तरफ से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत के साथ जो उसके संबंध हैं जिसे वह उनको गंभीरता से लेता है और चीन के साथ उसके झुकाव को ले संबंध भारत की कीमत पर नहीं फल फूल सकता है।
हिमालयन क्वाड की चीनी सँकल्पना।
क्वाड की चुनौती से परेशान चीन अब "हिमालयन क्वाड"की संकल्पना को मूर्त रूप देने की फिराक़ में है।
बेलारशियन इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक रिसर्च के विश्लेषक यूरी यार्मोलिनस्की ने बीते अप्रैल में एक लेख में कहा कि चीन ‘हिमालय क्वैड’ बनाने की तरफ जा रहा है, जिसमें उसके अलावा नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल होंगे। चीन इसमें रूस की भी सक्रिय भूमिका चाहता है,जिसे मास्को से अभी तक आधिकारिक अनुमति नहीं मिली है।
भारत रूस और वैश्विक राजनय।
बीते सात दशकों के अगर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर गौर किया जाय तो हम देखते हैं कि कई देश गृह युद्ध की चपेट में झुलस गए और बाकी छोड़िए अमेरिकी-फ्रांस जैसे परम् मित्र देशों के रिश्तों में "पीठ में छुरा मारने" वाली गिरावट आई लेकिन,भारत और रूस आज तक बिना खटास के साथ अपनी विशेषीकृत मित्रता निभा रहे हैं।
सर्वविदित है कि भारत के हर मुश्किल में रूस खड़ा रहा है। दुनिया की परवाह किए बिना रूस ने वैश्विक मंच पर भी अपनी दोस्ती निभाई है।
भारत अगर अपने संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ और प्रगाढ़ कर रहा है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रूस को दरकिनार कर देगा. रूस भी अपनी तरफ से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत के साथ जो उसके संबंध हैं वह उनको गंभीरता से लेता है।
चीन के साथ उसके संबंध भारत की कीमत पर नहीं बढ़ रहे हैं।
भारत और मल्टीलेटेरिज्म की संकल्पना।
भारत और रूस मौजूदा विश्व व्यवस्था में मल्टीलेटेरिज्म और उसके विभिन्न पहलुओं की भूमिका को बदलती विश्व व्यवस्था में बेहद अहम मानते है ,इन मुद्दों पर भी भारत को रूस का साथ मिलने की पूरी गुंजाइश नजर आती है।
जहां भारत का मानना है कि 'सुधारित बहुपक्षवाद' इन समयों में आगे बढ़ने का मार्ग है - विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सुधार। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों पर विचार-विमर्श सदा के लिए एक अभ्यास नहीं हो सकता है जबकि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और वैधता का क्षरण लगातार जारी है।
भारत कमोबेश सभी मंचो से मुखर स्वर में यह सदैव कहता रहा है।
भारत अगर अपने संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ और प्रगाढ़ कर रहा है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रूस को दरकिनार कर देगा.रूस भी अपनी तरफ से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत के साथ जो उसके संबंध हैं वह उनको गंभीरता से लेता है और चीन के साथ उसके संबंध भारत की कीमत पर नहीं बढ़ रहे हैं।
यहां एक बात पर गौर किया जाना है कि स्वर्णिम विजय वर्ष में राष्ट्रपति पुतिन की बेहद संक्षिप्त भारत यात्रा,बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में रूस की भूमिका किसी से छिपी नहीं है,वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने 1961 में अपने 99वें वीटो का इस्तेमाल भारत के लिए किया था जो गोवा के मसले पर था। वहीं 22 जून, 1962 को रूस ने अपने सौवें वीटो का भी इस्तेमाल कश्मीर मुद्दे पर भारत के समर्थन में किया।
ओले होल्स्ती का प्रसिद्ध कथन है कि "अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के सिद्धान्त रंगीन धूप के चश्में की एक जोड़ी के रूप में कार्य करते हैं, जो उसे पहनने वाले व्यक्ति को केवल मुख्य सिद्धान्त के लिए प्रासंगिक घटनाओं को देखने की अनुमति देता है "
हम जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप बेहद परिवर्तनशील होता है। वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के परिवेश, ट्विटर डिप्लोमेसी के चलते इनके बदले कारकों व तेजी से बदलते घटनाक्रम में व्यापक परिवर्तन आया है।
जिस तरह इन दोनो देशों के राजनय व्यवहार,कार्यप्रणाली एवं दृष्टिकोणों में भी आमूलचूल परिवर्तन आये है,वहां यह समझने की आवश्यकता है कि यह परिवर्तन स्थाई न होकर निरंतर परिवर्तनशील है,क्योंकि अंतराष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है,केवल हित,राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है। पुतिन और मोदी का राष्ट्र प्रेम किसी से छिपी हुई अवधारणा नहीं है,इसलिए हम इन दोनों राजनेताओं से एक बेहतर भविष्य की कामना कर सकते हैं,चूंकि राष्ट्रीय हित साधारण,दीर्घकालीन तथा निरंतर बना रहने वाला उद्देश्य है,जिसे राष्ट्र इस हित की सिद्धि के लिए अनवरत प्रयासरत रहते हैं ।