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Friday, June 25, 2021

Roar of रशियन बीअर

 काला सागर में ब्रिटिश डेस्ट्रॉयर ने रूसी समुद्री सीमा का अतिक्रमण और रूस की कठोर कार्रवाई से यूरोप में बवाल मच गया।

रूस और ब्रिटेन के बीच काला सागर में पानी गर्म होने के साथ साथ रूस और ब्रिटेन के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है और अब रूस ने दो टूक शब्द में कहा है कि अगर काला सागर में ब्रिटेन ने दोबारा अपना नौसैनिक पोत भेजने की जुर्रत की तो इस बार रूस चेतावनी नहीं बल्कि ब्रिटिश जहाज को डूबो देगा।


रूस ने मास्को में ब्रिटिश राजदूत को औपचारिक तौर पर
 तलब किया और कहा कि ब्लैक सागर पर रूस का अधिकार है, जबकि यूरोपीय देशों का कहना है कि काला सागर पर यूक्रेन का अधिकार है और काला सागर को लेकर रूस के साथ ब्रिटेन और अमेरिका के बीच भारी तनाव है।

बहरहाल, शीत युद्ध के बाद यह पहली दफा है जब रूस ने ब्रिटिश युद्धपोत को रोकने के लिए बमबारी की है।यह घटना रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाती है।


पृष्ठभूमि: रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि काला सागर में ब्रिटिश विध्वंसक पोत बीते बुधवार तमाम रूसी चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए रूसी जल सीमा में करीब तीन नॉटिकल मील तक अंदर घुस आया था। इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद इस क्षेत्र में पहले से सजग और गश्त लगा रहे 
रूसी एफसबी कोस्ट गार्ड(FSB Coast Guard)के गश्ती जहाजों और रूसी लड़ाकू बमबर्षक Su-24M और Su-30SM ने ब्रिटिश विध्वंसक पोत (डेस्ट्रॉयर) एचएमएस डिफ़ेंडर को चेतावनी देते हुए और उसके मार्ग में बम बरसाए जिससे ब्रिटिश पोत एचएमएस डिफेंडर को  रूसी जल सीमा से बाहर जाने पर विवश कर दिया।
रूस ने कहा कि यह ब्रिटिश विध्वंसक केप फियोलेंट के नजदीक लगभग तीन किलोमीटर तक उसकी सीमा में आ गया था।




केप फियोलेंट क्रीमिया के दक्षिणी तट पर एक अहम सामरिक महत्व का स्थान है।यह सेवास्तोपोल के नजदीक है, जहां रूसी नौसेना के काला सागर बेड़े (ब्लैक सी फ्लीट )का मुख्यालय है।
पुरातन ग्रीक मिथकों के अनुसार केप फियोलेंट वह स्थान है जहां समुद्र का शुद्धतम नभोनील जलराशि चट्टान से टकराकर बेहद खूबसूरत दृश्य का निर्माण करते हैं,जिसे अंतरिक्ष से मल्टी स्पेक्ट्रल सुदूर संवेदन उपग्रहों के माध्यम से स्पष्ट देखा जा सकता है।


वहीं ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने रूसी दावों का खंडन करते हुए कहा कि ब्रिटिश जहाज एचएमएस डिफ़ेंडर पर रूसी नौसेना की तरफ से कोई हमला नहीं किया गया है।





ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्वीट करते हुए कहा है कि एचएमएस डिफेंडर पर कोई चेतावनी शॉट नहीं दागा गया है। रॉयल नेवी जहाज अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार यूक्रेन की जल सीमा के अंदर से अपना संचालन कर रहा है।


https://twitter.com/DefenceHQ/status/1408044685034205185?s=19



रूस ने दावा किया है कि अपनी जल-सीमा से ब्रिटेन के एक युद्धक पोत को भगाने के लिए उसके रास्ते में बम गिराये गए और गोलियां दागी गईं वहीं ब्रिटेन ने इन दावों को गलत बताया है।


रूस ने दावा किया है कि ब्रिटिश जहाज क्रीमिया प्रायद्वीप के इलाके में उसकी जल-सीमा के भीतर था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ब्रिटेन की इस मासूमियत भरे समझ को भी दाद देनी पड़ेगी जिसमे ब्रिटिश नौसेना का कहना है कि उसने दागी गई गोलियों को रूस का अभ्यास माना था, जिसकी पहले से जानकारी दी गई थी,ब्रिटिश अधिकारियों ने किसी तरह के बम गिराए जाने के दावे को भी गलत बताया है, हालांकि ब्रिटेन ने इस बात की पुष्टि की है कि उसका युद्धक पोत एचएमएस डिफेंडर यूक्रेन की जल सीमा से गुजरा था.

दोनों देेशों के दावे अलग अलग

ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी कहा कि

"अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत यह पोत बहुत ही अहानिकर तरीके से यूक्रेन के क्षेत्रीय समुद्री सीमा से गुजर रहा था.”

https://twitter.com/DefenceHQ/status/1408044685034205185?s=19





विवाद बढ़ने का संकेत

सैन्य मामलों के विशेषज्ञों ने कहा है कि दोनों पक्षों में से जिसकी बात भी सही हो, यह घटना पश्चिमी देशों और रूस के बीच समुद्री सीमा को लेकर विवाद बढ़ने का संकेत है.
रूस के विदेश मंत्रालय ने ब्रिटिश युद्धक पोत के उस इलाके से गुजरने को खुल्लम-खुल्ला उकसाने की कार्रवाई बताया। रुस ने कहा कि इस मामले के लिए आधिकारिक राजनयिक प्रतिरोध के लिए मास्को में ब्रिटिश राजदूत और रक्षा अताशे को औपचारिक 'कूटनीतिक डांट' के लिए तलब किया।

रूसी संप्रभुता उल्लंघन न करे कोई।

रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने बीते गुरुवार को कहा कि कोई रूस की सीमा का उल्लंघन न करे। उन्होंने कहा कि रूसी सम्प्रभुता की रक्षा हर तरीके से की जाएगी, चाहे वह राजनयिक राजनीतिक हो या जरूरत पड़ने पर सैन्य तरीके ही क्यों न अपनाना पड़े। इस घटनाक्रम के बाद रयाबकोव चेतावनी दी कि ''जो लोग हमारी ताकत की परीक्षा लेना चाहते हैं वे खतरा मोल लेंगे।

केंद्र में यूक्रेन:दक्षिणी चीन सागर बनाम काला सागर।


काले सागर पर रूस के दावों की तुलना दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावों से करते हुए पश्चिमी विशेषज्ञों का मानना है कि :

"रूस अपनी सच्चाइयों को जमीन पर उतार रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन सच्चाईओं की स्वीकार्यता की कोशिश कर रहा है ताकि उसके कब्जे पर दुनिया की मुहर लग जाए फिर भी, रूस की प्रतिक्रिया बहुत तीखी थी, कूटनीति के एकदम उलट और जरूरत से कहीं ज्यादा.”।

यूरोपीय देशों को समझना पड़ेगा कि इस तरह के बचकानी हरकत से मास्को को कोई फर्क़ नहीं पड़ने वाला है और क्रीमिया मुद्दे को रूस के द्वारा "कब्जाने" जैसी शब्दावली के प्रयोग से मामला सुलझने के बजाय बिगड़ता चला जायेगा।

क्रीमिया: क्रीमिया प्रायद्वीप के इलाके को रूस ने 2014 में यूक्रेन से सीमित संघर्ष के बाद रूसी संघ में विलय कर लिया और कहा था कि उसने 1816 की ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त कर लिया है। इससे रूस के क्षेत्रीय समुद्री सीमा का विस्तार काला सागर के तटीय इलाकों तक हो गया है। लेकिन रूसी दावों के विपरीत पश्चिमी देश क्रीमिया को यूक्रेन का हिस्सा मानते हैं और रूस के समुद्री सीमा के दावे को गलत बताते हैं।




क्रीमिया अपने अप्रितम प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है यहाँ के बालाक्लावा में दिल के आकार का ब्लू क्वैरी झील बेहद खूबसूरत नजारा पेश करता है। यह सेवस्तोपोल के निकट समुद्र तल से महज 14 मीटर नीचे है। 



यूक्रेन नाटो जुगलबंदी से रूस ख़फ़ा।

सामरिक पृष्ठभूमि में देखा जाय तो रूस इस क्षेत्र में नाटो की बढ़ती भूमिका को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। जबकि अमेरिका सहित अन्य यूरोपीय देश यूक्रेन को फ़्लैश पॉइंट बनाने पर तुले हुए हैं जो सीधा रूसी सम्प्रभुता का उल्लंघनकारी रवैया है।
अमेरिका,ब्रिटेन सहित अन्य नाटो समूह के देश रूस पर जासूसी, हैकिंग, चुनावी दखल, ब्रेग्जिट, यूक्रेन, बेलारूस और अलेक्सी नावेलिनी और मानवाधिकारों पर विवादों के मुद्दे पर गाहे बगाहे घेरते रहते हैं।

यूक्रेन के मुताबिक रूस की काला सागर और उसके नजदीक अजोव सागर के इलाके में रूस की ‘आक्रामक और उत्तेजक' सामरिक गतिविधियां यूक्रेन और उसके सहयोगी देशों के लिए हमेशा खतरा बनी रहती हैं।

रूसी आक्रमकता से निजात पाने के लिए यूक्रेन ने इस इलाके में मदद के लिए नाटो से अपील भी की,इसीब कड़ी में सम्भवतः ब्रिटिश युद्धक जहाज इसी हफ्ते ओडेसा बंदरगाह गया था, जहां ब्रिटेन और यूक्रेन के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए जिसके तहत ब्रिटेन ने यूक्रेनी नौसेना की मदद का भी वादा किया था ।
पश्चिमी देश इस हफ्ते काला सागर में एक सैन्य अभ्यास कर रहे हैं जिसे सी ब्रीज नाम दिया गया है. बुधवार की घटना से कुछ घंटे पहले ही वॉशिंगटन स्थित रूसी दूतावास ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से यह सैन्य अभ्यास रद्द करने का आग्रह किया था.

फ़्लैश पॉइंट : काला सागर, जिसका उपयोग रूस भूमध्य सागर में अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए करता है, सदियों से रूस और उसके पारंपरिक प्रतिस्पर्धियों जैसे तुर्की, फ्रांस, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक फ्लैश पॉइंट रहा है।
डबल एजेंट सर्गेई स्क्रिपल को नर्व एजेंट नोविचोक दिए जाने के बाद 2018 से ही लंदन और मॉस्को के बीच संबंध बर्फ पिघली नहीं थी कि यह डेस्ट्रॉयर वाली घटना सामने आ गयी।



रूस-ब्रिटेन में बढ़ते राजनयिक तकरार की पृष्ठभूमि

मार्च 2018 में ब्रिटेन ने रूस पर आरोप लगाए हैं कि रूसी एजेंटों ने सेल्सबरी में एक पूर्व रूसी जासूस और डबल एजेंट सर्गेई स्क्रिरपाल और उसकी बेटी को ब्रिटेन में नर्व एजेंट निविचोक के ज़रिए मारने की कोशिश की थी।

इस मसले पर तिलमिलाए हुए ब्रिटेन ने पहले 23 रूसी राजनयिकों को निष्कासित किया था,जवाब में मॉस्को ने भी फौरन जवाबी कार्रवाई करते हुए 23 ब्रितानी राजनयिक को स्वदेश वापस जाने फरमान सुना दिया था।
इसके बाद सेंट पीटर्सबर्ग में ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास काम करना बंद कर दिया था।

ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने संसद को बताया कि निष्कासित रूसी राजनयिक दरअसल में अघोषित रूसी जासूस थे.

दोनो देशों में इस मुद्दे पर तल्खी इस कदर बढ़ी की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने रूसी विदेश मंत्री के फ़ीफ़ा विश्व कप के लिए भेजे निमंत्रण को भी ख़ारिज कर दिया।उन्होंने कहा था कि 2018 में रूस में होने वाले फुटबॉल विश्वकप में शाही परिवार हिस्सा नहीं लेगा।

रूस का पक्ष
रूस लगातार अपने ऊपर लग रहे आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहताहै कि ब्रिटेन तमाम आरोपों के संबंध में पुख़्ता सबूत पेश करे।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने उस समय कहा था कि "मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि रूस पर लगाए जा रहे तमाम आरोप निराधार हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है."


रूसोफ़ोबिया से ग्रस्त ब्रिटेन

ब्रिटेन में रूसी हस्तक्षेप की जाँच के लिए गठित इंटेलिजेंस एवं सिक्योरिटी कमेटी (आईएससी) ने अपनी बहु प्रतिक्षित रिपोर्ट,जिसे जुलाई 2020 में जारी किया गया था ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटिश सरकार ने ब्रेग्ज़िट जनमत संग्रह के दौरान रूसी हस्तक्षेप की जाँच को “सक्रिय रूप से नज़रअंदाज़” किया और ब्रेग्ज़िट जनमतसंग्रह में रूसी हस्तक्षेप की जाँच करने की भी सरकार ने कोई कोशिश नहीं की.
रिपोर्ट के मुताबिक़, ब्रिटेन,रूस के लिए अमरीका और नाटो के बाद सबसे बड़ा टारगेट है और इसका मुख्य कारण ब्रिटेन की अमरीका से नज़दीकी है।

वर्तमान विश्व मे रूस: बराबरी की हैसियत वाले प्रतिस्पर्धी'।

शीत युद्ध एक दो ध्रुवीय दुनिया की देन थी जिसमें दो महाशक्तियां अपने आर्थिक और सैन्य दमख़म के साथ वैश्विक राजनीति को शक्ल देने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही थीं."

वर्तमान में रूस किस तरह की शक्ति है ?

पश्चिमी देशों का मानना है कि अब भी रूस " एक कमजोर महान शक्ति है जिसे लगातार कम आंका जा रहा है क्योंकि ये ऐतिहासिक रूप से पश्चिम की तुलना में तकनीक, राजनीति और आर्थिक विशेषज्ञता में पिछड़ती रही है,लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में मॉस्को लगातार अपने आर्थिक प्रभाव से ज़्यादा असरदार रहा है
लेकिन कई थिंक टैंक इसके ठीक उलट रूस एक कमजोर क्षेत्रीय शक्ति नहीं है बल्कि इसकी स्थिति इसके ठीक विपरीत मानते है।"दरअसल, आतंरिक संतुलन, तीव्र सैन्य सुधार और आधुनिकीकरण के एक दौर के बाद रूस अपने ऐतिहासिक रूप में ज़्यादा सुदृढ़ है।
 
रूस ने बीते 15 सालों में बेहद बुद्धिमानी से इस क्षेत्र में निवेश किया है।ऐसे में ये इसके पास कुछ खास क्षमताएं विकसित की हैं जो इसे एक बढ़त देती है।

चंद उदाहरण के लिए,नाटो देशों के पास रूस के इस्कंदर टैक्टिकल आण्विक मिसाइल और एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम का असली तोड़ नहीं है ऐसे में नाटो कमांडरों के सामने एक नई उलझन पैदा करती है कि रूस के साथ संधि की जाए या संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए जैसे रूस के पास आर्टिलरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी जबर्दस्त क्षमता और दक्षता हासिल है।
पूरे यूरोप में रूस ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला एकमात्र भरोसेमंद देश के रूप में भी उभर चुका है,जिसके आयातक अधिकतर नाटो समूह के देश हैं।

पश्चिमी देशों और अमेरिका को रूस की साईबर और सूचना युद्ध में जबर्दस्त क्षमता से परिचय हो चुका है जो इन देशों के लिए अहम चुनौतियां पैदा करती है।बीते वर्षों में मीडिया और सामरिक थिंक टैंक नए चलन हाईब्रिड वॉरफेयर पर चर्चा कर रहे हैं, जो शांति और युद्ध के बीच एक धुंधली स्थिति होती है और विशेषज्ञ इस क्षेत्र में रूस को जाना माना और प्रतिष्ठित खिलाड़ी मानते है।


काला सागर: अत्यधिक सामरिक महत्व का क्षेत्र

काला सागर,अटलांटिक महासागर का सीमांत सागर है,यह पूर्वी यूरोप और पश्चिम एशिया के बीच विस्तृत है।
यह एजियन सागर और कई खाड़ियों के माध्यम से होते हुए भूमध्य सागर में जा मिलती है।

जहां बॉस्फोरस की खाड़ी इसे मरमरा सागर से , तो डर्डेनल्स की खाड़ी, एजियन सागर से, और कर्च कि खाड़ी के माध्यम से आज़ोव सागर से जोड़ती है।

इसके किनारे छः देश अवस्थित हैं जिसमे पश्चिम में रोमानिया और बुल्गारिया, उत्तर और पूर्व में यूक्रेन,रूस और जॉर्जिया और दक्षिण में तुर्की शामिल है।
इसमें पांच यूरोपीय नदियां अपना जल विसर्जित करती है जिसमे सबसे प्रसिद्ध नदी डेन्यूब भी शामिल है।अन्य नदियों में नीपर,और डॉन है।

काला सागर 436,400 वर्ग किमी (आज़ोव के सागर को छोड़कर)का क्षेत्र है,जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा अंतर्देशीय जलराशि है।

यह थ्री सीज़ इनिशिएटिव (3SI), जिसे बाल्टिक, एड्रियाटिक, ब्लैक सी (BABS) इनिशिएटिव के रूप में भी जाना जाता है, 3SI यूरोपीय संघ में बारह राज्यों का एक मंच है, जो उत्तर- बाल्टिक सागर से एड्रियाटिक सागर और मध्य और पूर्वी यूरोप में काला सागर तक विस्तृत है।

(साभार :incyclopedia britannica)
cdn.britannica.com








Thursday, June 24, 2021

2021: तीसरा सुपर मून आज दिखेगा

आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है और आज शाम को आसमान में एक दुर्लभ खगोलीय नज़ारा देखने को मिलेगाआज शाम लगभग सात बजे जब चंद्रमा उदित हो रहा होगा तब उसका आकार सामान्य पूर्णिमा के चंद्रमा की तुलना में बड़ा होगा और उसकी चमक भी सामान्य से अधिक होगी। जिसे खगोलविद इस खगोलीय परिघटना को सुपर मून की संज्ञा दे रहे हैं। यह इस साल का तीसरा सुपरमून है।

इस खगोलीय घटना को "स्ट्राबेरी और हनी मून" भी नाम दिया गया है वहीं इसे पश्चिमी देशों में स्ट्राबेरी की फसल के तोड़ने का मौसम होने के कारण"स्ट्राबेरी मून"नाम दिया गया है।
इसे हनी (शहद ) मून इसलिये भी कहते हैं,क्योंकि इस समय वहां हनी हार्वेस्ट करने के लिये तैयार हो जाता है।
यूरोपीय देशों में इस परिघटना को "जून्स फुलमून"और कहीं कहीं रोजमून भी कहा जाता है।

इसका यह नाम उदित होते फुल मून के लालिमा के कारण तथा कुछ क्षेत्रों में इस समय खिलने वाले गुलाब के कारण दिया गया है।आज चन्द्रमा पृथ्वी के पास आ जाने के कारण यह अन्य माइक्रो मून पूर्णिमा की तुलना में 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत अधिक चमकदार दिखाई देगा।


क्या होता है सुपरमून।

जिस समय चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के सर्वाधिक नजदीक होता है, और साथ ही अपने पूर्ण आकार में होता है, तब इस स्थिति को ‘सुपर मून’ (Supermoon) कहा जाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो जब चन्द्रमा, पृथ्वी की परिक्रमा अंडाकार पथ पर करते हुये 3 लाख 61 हजार 885 किलोमीटर से कम दूरी पर रहता है तो उस समय पूर्णिमा का चांद सुपरमून कहलाता है।

पृथ्वी के सर्वाधिक नजदीक होने की वजह से, इस स्थिति में चंद्रमा अपने सामान्य आकार से अधिक बड़ा दिखाई देता है। किसी एक विशिष्ट वर्ष में, लगातार दो से चार पूर्ण सुपरमून (Full Supermoons) तथा दो से चार नए सुपरमून (New Supermoons) की घटनाएँ हो सकती हैं।

उपभू: चंद्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान, एक ऐसी स्थिति आती है, जिसमे दोनों के मध्य दूरी सबसे कम (औसतन लगभग 360,000 किमी) होती है, अर्थात चंद्रमा और पृथ्वी एक-दूसरे के सर्वाधिक नजदीक होते है। इस स्थिति को ‘उपभू’ अथवा पेरिजी (Perigee) कहा जाता है। 

पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान चंद्रमा, जब पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी (लगभग 405,000 किमी) पर होता है, तो इसे ‘अपभू’ अथवा ऐपोजी (Apogee) कहा जाता है ।


सबसे नजदीकी सुपरमून

26 जनवरी 1948 को पड़े सुपरमून के बाद चंद्रमा और पृथ्वी के बीच सबसे कम दूरी का अनुभव करने के लिये हमें आगामी 25 नवम्बर 2034 तक का इंतजार करना होगा।




इस तरह की अन्य खगोलीय परिघटनाओं को समझने के लिए उपयोगी टर्मिनोलॉजी

*जब पूर्ण चन्द्र ग्रहण होता हो तो उस समय चन्द्र को "ब्लड मून" (Blood Moon) कहा जाता है।

सुपर ब्लू मून (Super Blue Moon) : ब्लू मून (Blue Moon), सुपर मून (Super Moon) और पूर्ण ग्रहण (Total Eclipse) का संयोजन है और ये तीन दुर्लभ घटनाएं हैं।
ब्लड मून (Blood Moon) की विशेषता यह है कि इसमें चन्द्रमा सफेद रंग की बजाय यह लाल या गाढ़े भूरे रंग का होता है।

"ब्लू मून" (Blue Moon) : जब किसी माह में पूर्णिमा दो बार आती है और चांद पूरा निकलता है,यह लगभग 28 दिनों से कम समय में ऐसा होता है क्योंकि चन्द्रमा को पृथ्वी की एक चक्कर लगाने में लगभग 27 दिन लगता है।इसलिए,हर तीन साल में अधिकतर ब्लू मून देखने को मिलता है


ग्रहण क्या है और कैसे होता है?

ग्रहण एक खगोलीय अवस्था है जिसमें कोई खगोलीय पिंड जैसे ग्रह या उपग्रह किसी प्रकाश के स्रोत जैसे सूर्य और दूसरे खगोलीय पिंड जैसे पृथ्वी के मध्य आ जाता है इससे पिंड पर प्रकाश का कुछ समय के लिये अवरोध हो जाता है।

मुख्य रूप से पृथ्वी के साथ जो ग्रहण होते हैं वह इस प्रकार हैं:

1.चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse) - इस ग्रहण में चंद्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी आ जाती है.। ऐसी स्थिति में चाँद पृथ्वी की छाया से होकर गुजरता है। ऐसा आमतौर पर सिर्फ पूर्णिमा के दिन संभव होता है.

2.सूर्यग्रहण (Solar Eclipse):

जब पृथ्वी तथा सूर्य के मध्य चंद्रमा आ जाता है जिससे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाता और पृथ्वी की सतह के कुछ हिस्से पर दिन में अँधेरा छा जाता है। इस स्थिति को सूर्य ग्रहण कहते हैं।
जब चंद्रमा एक निश्चित वृत्तीय कक्षा तथा समान कक्षीय समतल पर परिक्रमा कर रहा होता तो प्रत्येक अमावस्या को सूर्य ग्रहण की स्थिति बनती।
लेकिन चंद्रमा का कक्षीय समतल (Orbital Plane) पृथ्वी के कक्षीय समतल (Ecliptic Plane) से पांच डिग्री का कोण बनाता है जिसके कारण चंद्रमा की परछाई पृथ्वी पर हमेशा नहीं पड़ती।
सूर्य ग्रहण तभी होता है जब चंद्रमा अमावस्या को पृथ्वी के कक्षीय समतल के निकट होता है और ऐसा सिर्फ अमावस्या के दिन होता है।
पूर्ण सूर्य ग्रहण (Total Eclipse) - जब चंद्रमा की परछाई सूर्य के पूरे भाग को ढकने की बजाय किसी हिस्से को ही ढक ले तो इसे आंशिक सूर्य ग्रहण कहते है।

सूर्य की तुलना में चंद्रमा का आकार 400 गुना छोटा है लेकिन दोनों समान आकार के दिखाई देते हैं क्योंकि पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी पृथ्वी से सूर्य की दूरी की तुलना में 400 गुना कम होती है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण (Annular Solar Eclipse):

इस तरह के ग्रहण की स्थिति आमतौर पर तब बनती है जब चंद्रमा पृथ्वी से दूर होता है और इसका आकार छोटा दिखाई देता है,जिससे चंद्रमा, सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और सूर्य एक अग्नि वलय (Ring of Fire) की भाँति प्रतीत होता है।

सूर्य ग्रहण के दौरान निर्मित ‘अग्नि वलय (Ring of Fire) क्या है।
सभी प्रकार के सूर्य ग्रहण के दौरान अग्नि वलय का निर्माण नहीं दिखाई देता।यह केवल उस स्थिति में होता है : जब सूर्य का केंद्र ,चंद्रमा से इस प्रकार ढक जाए कि सूर्य का केवल बाहरी किनारा ही दिखाई दे।


इस प्रकार दिखाई देने वाला सूर्य का बाहरी किनारा एक आग के छल्ले की भाँति प्रतीत होता है जिसे अग्नि वलय कहते हैं।


वलयाकार सूर्य ग्रहण से निर्मित अग्नि वलय पृथ्वी पर स्थित सभी स्थानों से नहीं दिखाई देता। इसलिये यह अलग-अलग स्थानों पर आंशिक सूर्य ग्रहण की भाँति दिखाई देता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण कब बनता है?

सभी सूर्य ग्रहणों में अग्नि वलय का निर्माण नहीं होता है। वलयाकार सूर्य ग्रहण के निर्माण के लिये निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ अनिवार्य हैं-

1.अमावस्या।

चंद्रमा की स्थिति चंद्र नोड (Lunar Nod) पर या उसके निकट हो ताकि सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा एक सीधी रेखा में हों और चंद्रमा पृथ्वी से दूरस्थ बिंदु (Apogee) पर स्थित हो।

2.Umbra.
3.Penumbra.

सूर्य ग्रहण की स्थिति में पृथ्वी पर चंद्रमा की दो परछाइयाँ बनती हैं जिसे छाया (Umbra) तथा उपच्छाया (Penumbra) कहते हैं।

छाया(Umbra): इसका आकार पृथ्वी पर पहुँचते हुए छोटा होता जाता है तथा इस क्षेत्र में खड़े व्यक्ति को पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देता है।

उपच्छाया:(Penumbra) इसका आकार पृथ्वी पर पहुँचते हुए बड़ा होता जाता है तथा इस क्षेत्र में खड़े व्यक्ति को आंशिक सूर्य ग्रहण दिखाई देता है।

सूर्य की बाहरी परत कोरोना के अध्ययन के लिये वलयाकार सूर्य ग्रहण एक आदर्श स्थिति होती है क्योंकि चंद्रमा के बीच में आ जाने से सूर्य की तेज़ रोशनी अवरोधित हो जाती है तथा खगोलीय यंत्रों द्वारा इसका अध्ययन आसानी से किया जा सकता है।


आंशिक ग्रहण (Partial eclipse) - इस ग्रहण की स्थिती में प्रकाश का स्रोत पूरी तरह अवरुद्ध नहीं होता है.


चन्द्र ग्रहण दो प्रकार का होता है:

पूर्ण चन्द्र ग्रहण और आंशिक चन्द्र ग्रहण।

जब चंद्रमा और सूर्य पृथ्वी के ठीक विपरीत किनारे पर होते हैं तब पूर्ण चंद्र ग्रहण होता है वहीं आंशिक चंद्र ग्रहण में, चंद्रमा का केवल एक हिस्सा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है और यह सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है कि वे किस कदर रेखांकित होते हैं.

ब्लू मून (Blue Moon) क्या होता है?


जब चंद्रग्रहण पर पूर्ण चंद्रमा दिखता है तो चांद की निचली सतह से नीले रंग की रोशनी बिखरती है और तब चन्द्रमा को ब्लू मून (Blue Moon) कहते है।


चंद्रमा लाल क्यों हो जाता है या इसे ब्लड मून (Blood Moon) के रूप में क्यों जाना जाता है?

चंद्रग्रहण के दौरान चंद्रमा का सुर्ख लाल हो जाने को ब्लड मून (Blood Moon) कहते हैं. ऐसा कब होता है? जब पृथ्वी की छाया पूरे चांद को ढक देती है उसके बाद भी सूर्य की कुछ किरणें चंद्रमा तक पहुंचती हैं. लेकिन चांद तक पहुंचने के लिए उन्हें धरती के वायुमंडल से गुजरना पड़ता है. इसके कारण सूर्य की किरणें बिखर जाती हैं. पृथ्वी के वायुमंडल से बिखर कर जब किरणें चांद की सतह पर पड़ती हैं तो सतह पर एक लालिमा बिखेर देती हैं. जिससे चांद लाल रंग का दिखने लगता है