भारतीय शास्त्रीय संगीत और होली:
भारतीय शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है ।
कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं –
चलो गुंइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया घर।
इसी प्रकार संगीत के एक और अंग ध्रुपद में भी होली के सुंदर वर्णन मिलते हैं।
ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल देखिए-
“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।
भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”
धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है।
इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं – आज पिया होरी खेलन आए
भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं। बसंत राग पर आधारित –
“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।
बहार राग पर आधारित “छम छम नाचत आई बहार”
और राग काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।”प्रसिद्ध बंदिशें हैं।
ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल तो देखिए-
“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।
भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”
धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है।
इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं –
"आज पिया होरी खेलन आए"
भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं।
बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं।
बसंत राग पर आधारित –प्रसिद्ध बंदिशें पर गौर फरमाइए।
“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।
इसे पंडित भीमसेन जोशी जी सम्मोहित करने वाले स्वर में सुनिए सब कुछ भूल जाएंगे।
https://youtu.be/eL2BHFaieqM
जबकि बहार राग पर आधारित
“छम छम नाचत आई बहार”
लता दीदी की सुरीली आवाज में ।
https://youtu.be/ny1WO8nM2DA
और काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।”
https://youtu.be/tsXFSWZD7RM
मुगलकालीन,उर्दू,सूफी साहित्य में होली।
अमीर खुसरो ने होली को अपने सूफ़ीयाना अंदाज़ में कुछ ऐसे देखा है-
दैय्या रे मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में
कपड़े रंग के कुछ न होत है, या रंग में तन को डुबोया री।
अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के शब्दों में होली की मस्ती का रंग कुछ इस तरह दिखाई देता है
क्यों मोपे मारी रंग की पिचकारी
देख कुंवरजी दूंगी गारी
भाज सकूं मैं कैसे मोसो भाजो नहीं जात
थांडे अब देखूं मैं बाको कौन जो सम्मुख आत
बहुत दिनन में हाथ लगे हो कैसे जाने देऊं
आज मैं फगवा ता सौ कान्हा फेंटा पकड़ कर लेऊं
शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से कौन खेले होरी
मुख बंदे और हाथ मरोरे करके वह बरजोरी
मुंशी ज़काउल्ला ने अपने किताब तहरीक-ए-हिंदुस्तानी में तो इस तथ्य पर ही सवाल उठाया है कि होली सिर्फ हिंदुओं का त्यौहार है,वे लिखते हैं कि मुगल सल्तनत के दिनों में होली का त्योहार कई दिनों तक चलता था।
इसमें जाति,वर्ग एवं धर्म की कोई बंदिश नहीं थी और गरीब से गरीब व्यक्ति भी मुगल बादशाह को रंग से सराबोर करने का हकदारी था।
"जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।
हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।
और बशीर बद्र ने क्या खूब कही
सात संदूकों में भरकर दफ्न कर दू नफरतें,
आज इंसा को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत ...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना
जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ।
और अंत मे बात होली कि हो और इसमें बॉलीवुड को शामिल न करें तो बेमानी होगी:
होली रंगों, आनंद और उल्लास का त्योहार है। बॉलीवुड के होली गीत इसी आनंद और उल्लास से भरे होते हैं।
'होली आई रे कन्हाई' (मदर इंडिया),
अरे जा रे हट नटखट' (नवरंग),
आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली' (कटी पतंग),
'होली के दिन' (शोले),
'रंग बरसे' (सिलसिला),
मल दे गुलाल मोहे,
आई होली आई रे' (कामचोर),
'अंग से अंग लगाना सजन' (डर)
'होली खेलें रघुवीरा' (बागबान),और
बलम पिचकारी...
होली के कुछ लोकप्रिय गीत हैं।
मदनोत्सव, बसंतोत्सव, कामदेवोत्सव ये सभी हमारे लोकानुरंजन के लिए आवश्यक थे, हैं और रहेंगे।भारतीय समाज अपनी अस्मिता, गौरवशाली अतीत,विशिष्ट और प्राचीन पंरम्पराओं और वसुधैव कुटुम्बकम के लिये जाना जाता है और होली कामकुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है,
इसे पूरे सादगी,पवित्रता,सहजता और गरिमामय उत्सव के रूप में मनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रहे।
आइये इस कोविड 19 कालीन होली पर यह शपथ लें कि होली को पूरी सादगी,शालीनता और गरिमापूर्ण ढंग के साथ मनाएंगे
दैय्या रे मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में
कपड़े रंग के कुछ न होत है, या रंग में तन को डुबोया री।
अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के शब्दों में होली की मस्ती का रंग कुछ इस तरह दिखाई देता है
क्यों मोपे मारी रंग की पिचकारी
देख कुंवरजी दूंगी गारी
भाज सकूं मैं कैसे मोसो भाजो नहीं जात
थांडे अब देखूं मैं बाको कौन जो सम्मुख आत
बहुत दिनन में हाथ लगे हो कैसे जाने देऊं
आज मैं फगवा ता सौ कान्हा फेंटा पकड़ कर लेऊं
शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से कौन खेले होरी
मुख बंदे और हाथ मरोरे करके वह बरजोरी
मुंशी ज़काउल्ला ने अपने किताब तहरीक-ए-हिंदुस्तानी में तो इस तथ्य पर ही सवाल उठाया है कि होली सिर्फ हिंदुओं का त्यौहार है,वे लिखते हैं कि मुगल सल्तनत के दिनों में होली का त्योहार कई दिनों तक चलता था।
इसमें जाति,वर्ग एवं धर्म की कोई बंदिश नहीं थी और गरीब से गरीब व्यक्ति भी मुगल बादशाह को रंग से सराबोर करने का हकदारी था।
उर्दू के जाने माने शायर नज़ीर अकबराबादी की कलम से।
"जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।
वे फिर लिखते हैं
हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।
एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।
जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।
तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।
और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।
नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।
और बशीर बद्र ने क्या खूब कही
सात संदूकों में भरकर दफ्न कर दू नफरतें,
आज इंसा को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत ...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना
जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ।
और अंत मे बात होली कि हो और इसमें बॉलीवुड को शामिल न करें तो बेमानी होगी:
होली रंगों, आनंद और उल्लास का त्योहार है। बॉलीवुड के होली गीत इसी आनंद और उल्लास से भरे होते हैं।
'होली आई रे कन्हाई' (मदर इंडिया),
अरे जा रे हट नटखट' (नवरंग),
आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली' (कटी पतंग),
'होली के दिन' (शोले),
'रंग बरसे' (सिलसिला),
मल दे गुलाल मोहे,
आई होली आई रे' (कामचोर),
'अंग से अंग लगाना सजन' (डर)
'होली खेलें रघुवीरा' (बागबान),और
बलम पिचकारी...
होली के कुछ लोकप्रिय गीत हैं।
मदनोत्सव, बसंतोत्सव, कामदेवोत्सव ये सभी हमारे लोकानुरंजन के लिए आवश्यक थे, हैं और रहेंगे।भारतीय समाज अपनी अस्मिता, गौरवशाली अतीत,विशिष्ट और प्राचीन पंरम्पराओं और वसुधैव कुटुम्बकम के लिये जाना जाता है और होली कामकुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है,
इसे पूरे सादगी,पवित्रता,सहजता और गरिमामय उत्सव के रूप में मनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रहे।
आइये इस कोविड 19 कालीन होली पर यह शपथ लें कि होली को पूरी सादगी,शालीनता और गरिमापूर्ण ढंग के साथ मनाएंगे
