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Sunday, March 28, 2021

होली:हमारी सांस्कृतिक विरासत 2

 भारतीय शास्त्रीय संगीत और होली:


भारतीय शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है ।

कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं –

चलो गुंइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया घर।

इसी प्रकार संगीत के एक और अंग ध्रुपद में भी होली के सुंदर वर्णन मिलते हैं।

ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल देखिए-

“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।

भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”

धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। 

इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं – आज पिया होरी खेलन आए

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं। बसंत राग पर आधारित –

“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।

बहार राग पर आधारित “छम छम नाचत आई बहार”
और राग काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।”प्रसिद्ध बंदिशें हैं।


ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल तो देखिए-

“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।
भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”

धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है।

इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं –

"आज पिया होरी खेलन आए"

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं।

 बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं

बसंत राग पर आधारित –प्रसिद्ध बंदिशें पर गौर फरमाइए।
“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।

इसे पंडित भीमसेन जोशी जी सम्मोहित करने वाले स्वर में सुनिए सब कुछ भूल जाएंगे।

https://youtu.be/eL2BHFaieqM

जबकि बहार राग पर आधारित
“छम छम नाचत आई बहार”

लता दीदी की सुरीली आवाज में ।

https://youtu.be/ny1WO8nM2DA

और काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।”

https://youtu.be/tsXFSWZD7RM



मुगलकालीन,उर्दू,सूफी साहित्य में होली।

अमीर खुसरो ने होली को अपने सूफ़ीयाना अंदाज़ में कुछ ऐसे देखा है-

दैय्या रे मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में
कपड़े रंग के कुछ न होत है, या रंग में तन को डुबोया री।

अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के शब्दों में होली की मस्ती का रंग कुछ इस तरह दिखाई देता है

क्यों मोपे मारी रंग की पिचकारी
देख कुंवरजी दूंगी गारी

भाज सकूं मैं कैसे मोसो भाजो नहीं जात
थांडे अब देखूं मैं बाको कौन जो सम्मुख आत

बहुत दिनन में हाथ लगे हो कैसे जाने देऊं
आज मैं फगवा ता सौ कान्हा फेंटा पकड़ कर लेऊं

शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से कौन खेले होरी
मुख बंदे और हाथ मरोरे करके वह बरजोरी


मुंशी ज़काउल्ला ने अपने किताब तहरीक-ए-हिंदुस्तानी में तो इस तथ्य पर ही सवाल उठाया है कि होली सिर्फ हिंदुओं का त्यौहार है,वे लिखते हैं कि मुगल सल्तनत के दिनों में होली का त्योहार कई दिनों तक चलता था।

इसमें जाति,वर्ग एवं धर्म की कोई बंदिश नहीं थी और गरीब से गरीब व्यक्ति भी मुगल बादशाह को रंग से सराबोर करने का हकदारी था।


उर्दू के जाने माने शायर नज़ीर अकबराबादी की कलम से।


"जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।

परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।

वे फिर लिखते हैं

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।


और बशीर बद्र ने क्या खूब कही

सात संदूकों में भरकर दफ्न कर दू नफरतें,
आज इंसा को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत ...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना
 जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ।

और अंत मे बात होली कि हो और इसमें बॉलीवुड को शामिल न करें तो बेमानी होगी:

होली रंगों, आनंद और उल्लास का त्योहार है। बॉलीवुड के होली गीत इसी आनंद और उल्लास से भरे होते हैं।
'होली आई रे कन्हाई' (मदर इंडिया),
अरे जा रे हट नटखट' (नवरंग),
आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली' (कटी पतंग),
'होली के दिन' (शोले),
'रंग बरसे' (सिलसिला),
मल दे गुलाल मोहे,
आई होली आई रे'
(कामचोर),
'अंग से अंग लगाना सजन' (डर)
'होली खेलें रघुवीरा' (बागबान),और
बलम पिचकारी...
होली के कुछ लोकप्रिय गीत हैं।


मदनोत्सव, बसंतोत्सव, कामदेवोत्सव ये सभी हमारे लोकानुरंजन के लिए आवश्यक थे, हैं और रहेंगे।भारतीय समाज अपनी अस्मिता, गौरवशाली अतीत,विशिष्ट और प्राचीन पंरम्पराओं और वसुधैव कुटुम्बकम के लिये जाना जाता है और होली कामकुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है,
इसे पूरे सादगी,पवित्रता,सहजता और गरिमामय उत्सव के रूप में मनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रहे।

आइये इस कोविड 19 कालीन होली पर यह शपथ लें कि होली को पूरी सादगी,शालीनता और गरिमापूर्ण ढंग के साथ मनाएंगे 

होली:हमारी सांस्कृतिक विरासत-1

 उर से कुछ उच्छवास उठेंगे,

चिर भूखे भुज पाश उठेंगे,

कंठों में आ रुक जाएगी मेरे करुण प्रणय की बोली!
विश्व मनाएगा कल होली !
                                 ~ हरिवंशराय बच्चन

प्राचीन भारत होली को बसंतोत्सव,मदनोत्सव कामोत्सव,और कौमुदी महोत्सव के रूप मेंं जाना जाता, यानि रंग ही रंग, उमंग ही उमंग यानि रंगों को त्योहार होली।

देश मे रंगों के त्योहार होली को अन्य नाम से भी जाना जाता है।

इनमें सबसे पहले बात चुनावी रंग में सरोबार पश्चिम बंगाल में डोल यात्रा या डोल पूर्णिमा,तमिलनाडु में कामन पोडिगई,
जबकि होला मोहल्ला (पंजाब), 
कामना हब्बा (कर्नाटक), फगुआ (बिहार), 
रंगपंचमी (महाराष्ट्र),शिमगो (गोवा), 
धुलेंडी (हरियाणा),गोविंदा होली (गुजरात), 
योसांग होली (मणिपुर) प्रसिद्ध है।

प्राचीनकाल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूप का विस्तृत वर्णन वर्णित है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में रस के समूह रास का वर्णन है वहीं अन्य रचना में 'रंग' नामक उत्सव का जिक्र है जिसमे हर्ष प्रियदर्शिका रत्नावली, वैदर्भी रीति के कवि कालिदास कृत कुमारसंभवम् और मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं ।
कालिदास रचित ऋतुसंहार में तो पूरा एक सर्ग 'वसन्तोत्सव' के लिए समर्पित कर दिया है।
संस्कृत साहित्य के ""रत्नावली" में मदनपूजा का विषद है, "हर्षचरित" और "दशकुमारचरित्र" में मदनोत्सव का वर्णन है । इस त्योहार पर राजा और आम नागरिक सभी बराबर हैं ।

मदनोत्सव का वर्णन तो कालिदास ने अपने महाकाव्य "ऋतुसंहार" के षष्ठ सर्ग में बसंत,होली और उसके प्रभावों का मनोहारी वर्णन किया है।कालिदास इसे ऋतु-उत्सव कहते हैं,वे लिखते हैं

"इन दिनों कामदेव भी स्त्रियों की मदमाती आंखों की चंचलता में,उनके गालों में पीलापन, कमर में गहरापन और नितंबों में मोटापा बनकर बैठ जाता है काम से स्त्रियां अलसा जाती हैं । मद से चलना बोलना भी कठिन हो जाता है और टेढ़ी भौंहों से चितवन कटीली जान पड़ती है ।

सम्राट हर्ष कृत "रत्नावली" तथा "नागानंद" में "ऋतु-उत्सव यानि मदनोत्सव" का विशद वर्णन किया है ।
हर्ष ने नागानंद नामक नाटक नें एक वृद्धा के विवाह का विशद और रोचक वर्णन किया गया है ।
वाल्मिकी रामायण में भी बसंतोत्सव का वर्णन मिलता है । दंडी ने अपने नाट्यकाव्य दशकुमारचरित में कामदेव की पूजा के लिए आवश्यक ऋतुओं को बताया है ।

" वासवदत्ता" नामक नाटक में सुबंधु ने बसंत के आगमन की खुशी में राजा उदयिन तथा राजकुमारी वासवदत्ता के माध्यम से बसंतोत्सव का वर्णन किया है ।जैन कवि राजशेखर की "काव्य-मीमांसा" में भी ऋतु वर्णन है ।

"कुट्टनीमतम्" में भी गणिका और वेश्याओं के साथ मदनोत्सव मनाने का विशद वर्णन है।
भविष्य पुराण में बसंत काल में कामदेव और उनकी पत्नी रति की मूर्तियों की स्थापना और पूजा-अर्चना का जिक्र है मदनोत्सव कौमुदी महोत्सव का वर्णन चाणक्य ने भी किया है , वहीं चारूदत्त" में "कामदेवानुमान उत्सव" का जिक्र है, जिसमें कामदेव का जुलूस निकाला जाता था। इसी प्रकार शूद्रक कृत 'मृच्छकटिकम्' में नायिका बसंतसेना का इसी प्रकार के जुलूस में भाग लेने का जिक्र है ।

मदनोत्सव ही बाद में शांति निकेतन में गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के सान्निध्य में "दोलोत्सव "के रूप आज भी मनाया जाता है।

धुरखेल/धुलेंडी का जिक्र  वर्ष-क्रियाकौमुदी में है।
पुस्तक के अनुसार इसी त्योहार में सुबह गाने-बजाने, कीचड़ फेंकने के कार्य संपन्न किये जाते हैं और सायंकाल सज्जित होकर मित्रों से मिलते हैं।

भारवि, माघ और अनेकों संस्कृत कविओं ने वसन्त की सौंदर्य की अपने साहित्य खूब चर्चा की है।

मदनोत्सव का वर्णन केवल साहित्यिक कृतियों में ही नहीं वरण मूर्तिकला, चित्रकला, स्थापत्य आदि के माध्यमों से भी इसे संचित,सिंचित,पल्लवित और पुष्पित किया है।

होली में सबसे अधिक जिक्र कामदेव का हुआ है,यूँ कहें कि यह यह त्योहार उन्ही को समर्पित है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी
कामदेव को मदन, मन्मथ, कंदर्प, प्रद्युम्न,अनंग,मकरध्वज, रतिपति, पुष्पधन्वा, रतिनायक नाम से भी आदिग्रंथों में वर्णित किया गया है जबकि यूनान में ये "क्यूपिड" है।

आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद जैसे दिग्गज कवि भी मदनोत्सव की छटा से कहाँ बच पाए,उनके लिए होली सबसे प्रिय विषयों में एक रहा।

संस्कृत के महाकवियों और नाटककारों ने इस पर्व के अंतर्गत जिन उत्सवों की चर्चा की है, वह मूलतः छह हैं :

1.नवान्नेष्टि 
2.अशोकोन्तसिका 
3. पुष्प प्रचायिका 
4. वसंतोत्सव या मदनोत्सव 
5. होलिकोत्सव
6. उदक्ष्वेडिका

इन सारे उत्सवों के साथ यह पर्व माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी ) से चैत्र पूर्णिमा तक लगभव ढाई महीने तक मनाया जाता रहा है.

1.नवान्नेष्टि: होली के दिन अग्निहोत्री ब्राह्मण यवाग्रयण नामक यज्ञ करते थे. आज भी कहीं कहीं होली की अग्नि में गेहूं या जौ की बालें भून कर उन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की प्रथा है. रंगों में नहाना शायद यज्ञ के बाद स्नान की विधा रही हो.

२. अशोकोन्तसिका: सुन्दर स्त्रियों के पदाघात से अहोली रंगों, आनंद और उल्लास का त्योहार है। शोक का तथा उन्हीं की मुख मदिरा के सिंचन से वकुल का खिलना संस्कृत साहित्य में ग्रहण किया गया है.

3. पुष्प प्रचायिका:- काम पूजा के लिए फूलों का चयन ही पुष्प प्रचायिका है. इसमें विशेषता यह थी कि हाथ में आयी हुई डाली से फूल ख़ुद चुनने पड़ते थे।इस क्रीड़ा से सम्बंधित एक मार्मिक ग्राम गीत मिलता है. एक गर्भिणी स्त्री अपने गर्भस्थ बालक को सम्बोधित करते हुए कह रही है कि बेटा! तुम चैत्र में मत पैदा होना. सब सखियाँ जब फूल चुनने जाएंगी तब मैं कैसे जाऊँगी।

ये रतनारे होरिलवा! चैत जिनि जनमेउ
सब सखि चुनिहैं कुसुमियाँ चुनन कैसे जाबइ

4. वसंतोत्सव:वसंत उत्सव में आम्र मंजरी से कामदेव की अर्चना की जाती थी. कालिदास ने अपने अभिज्ञान शाकुंतलम नाटक में इसकी ख़ूब चर्चा की है.

5. होलिकोत्सव: होली के उत्सव का वर्णन भविष्योत्तर पुराण में आता है जिसका भावानुवाद यूँ है :
राजन! शीतकाल का अंत है. इस फाल्गुनी पूर्णिमा के पश्चात प्रातः मधुमास होगा.आप सभी को अभय दीजिये जिस से वह निर्भीक हो कर हंसे, खेले. प्रसन्न बालक लकड़ी की तलवारें लेकर अपने बंधुओं से लड़ने के लिए निकल पड़ें. रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर, चन्दन अ’बीर और गुलाल लगाकर ,पान चबाते हुए, एक दूसरे पर रंग डालने के लिए बांस या चमड़े की पिचकारियां लेकर निकलें. एक दूसरे को गालियां देकर हंसे, स्त्रियां नाचें. पुरुष सन्यासी नट तथा योगियों का तथा स्त्रियां वेश्याओं,योगिनियों तथा मोहिनी का स्वांग रचें।जिनके मन में जो आये सो कहे. ऐसे शब्दों से तथा हवन करने से यह पापिनी ढूँढा (होलिका ) नष्ट हो जाती है.

6. उदक्ष्वेडिका:पिचकारियों द्वारा जल प्रक्षेप ही उदक्ष्वेडिका है. यह नवान्नेष्टि यज्ञ के स्नान का स्मृति शेष ही मालूम पड़ती है. युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञान्त स्नान का जो वर्णन मिलता है वही इस रंगरोली की फाग का मूलाधार है।

गंध, माला, भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत पुरुष एवं स्त्रियां गंगा में स्नान के लिए गयीं. वहां वे तेल,गोरस, सुगन्धित जल,हल्दी और गहरे रंग की कुमकुम आदि से एक दूसरे को रंगने लगीं. वे चमड़े के यंत्रों से अपने देवरों और प्रियजनों को भिगो रही थीं.


देवलोक की होली।

इसे आप त्रिदेवों की होली कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी,होली का रंग से भला ये तीनो न बच पाए तो औरों का क्या।जहां ब्रजवासी भी होली खेलने के लिए हुरियार बन जाते हैं और ब्रज की नारियाँ हुरियारिनों के रूप में साथ होते हैं और चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है :-

आज बिरज में होली रे रसिया, होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें, कहि कहि होरी होरी रे रसिया।आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।

इतना ही नहीं वह भयाम सखाओं को चुनौती देती है कि होली में जीतकर दिखाओ। उनमें ऐसा अद्भूत उत्साह जागृत होता है कि सब ग्वाल-बालों को अपना चेला बनाकर बदला चुकाना चाहती हैं। 

जिन ब्रज बालों ने अटारी में चढ़ी हुई ब्रजगोपियों को संकोची समझा था, आज वे ही होली खेलने को तैयार हैं। पेश है इस दृश्य की एक बानगी :-

होरी खेलूँगी भयाम तोते नाय हारूँ
उड़त गुलाल लाल भए बादर, भर गडुआ रंग को डारूँ
होरी में तोय गोरी बनाऊँ लाला, पाग झगा तरी फारूँ
औचक छतियन हाथ चलाए, तोरे हाथ बाँधि गुलाल मारूँ।

मृगनयनी को यार नवल रसिया.... जैसे कालजयी कृति को अपने सुरों में साधने वाले पंडित जसराज का क्या कहना,खुद सुनिए और मंत्रमुग्ध होइये।

https://youtu.be/ZY6Ls1_DRtA

राम सीता की होली

अयोध्या में श्रीराम सीता जी के संग होली खेल रहे हैं। एक ओर राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न हैं तो दूसरी ओर सहेलियों के संग सीता जी।

केसर मिला रंग घोला गया है। दोनों ओर से रंग डाला जा रहा है। मुँह में रोरी रंग मलने पर गोरी तिनका तोड़ती लज्जा से भर गई है। 

झांझ, मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग है। देवगण आकाश से फूल बरसा रहे हैं। देखिए इस मनोरम दृश्य की एक झांकी :-

खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।
छिरकत जुगल समाज परस्पर, मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी।
बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोलि ढप, गृह गह भये चहुँ ओरी, नवसात संजोरी।
साधव देव भये, सुमन सुर बरसे, जय जय मचे चहुँ ओरी, मिथलापुर खोरी।

नवोदित गायिका मैथिली ठाकुर और ने राम सीता और मिथिला की होली को कुछ यूं प्रस्तुत किया है,सुनिए

https://youtu.be/gXfHsNvdwEA

अवध से ब्रज और ब्रज से काशी हम जैसे ही आतें हैं, हम पातें हैं कि होली का रंग फ़िर एक बार बदल गया है..राम और कृष्ण की जगह अब शिव ने ले लिया है.

उमा महेश्वर की होली

जब राधा-कृष्ण ब्रज में और सीता-राम अयोध्या में होली खेल रहे हैं तो भला हिमालय में उमा-महेश्वर होली क्यों न खेलें, वे भला क्यों किसी से पीछे रहें।
शिव गृहस्थी निभाने कैलाश छोड़ काशी आ गए हैं,महायोगी संसारिक सुखों में रम रहे है, उन्हें काशी भा गयी है तो फिर होली तो बनता है।

काशी में होली फागुन शुक्ल एकादशी से ही शुरु हो जाती है, जिसे हम "रंगभरी एकादशी और आमलकी एकादशी " के नाम से भी जानते है।रंगभरी एकादशी, बनारस।।
मां पार्वती का गौना कराकर वापस लौटते हैं। मान्यता है कि देव लोक के सारे देवी देवता इस दिन स्वर्गलोक से बाबा विश्वनाथ के ऊपर गुलाल फेकते हैं।इस दिन काशी विश्वनाथ मंदिर में भक्तगण जमकर बाबा के साथ होली खेलते हैं। 





काशी में फागुन ने महादेव को अपने आगोश में ले लिया ? हमेशा की तरह आज भी शिव जी होली खेल रहे हैं। उनकी जटा में गंगा निवास कर रही है और पूरे शरीर में चिता भस्म लगा है। वे नंदी की सवारी पर हैं। ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला,चमकती हुई आँखें और गले में लिपटा हुआ सर्प। उनके इस रूप को अपलक निहारती पार्वती अपनी सहेलियों के साथ रंग गुलाल से सराबोर हैं। देखिए इस अद्भुत दृश्य की झाँकी 


आजु सदासिव खेलत होरी
जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।

तीनि आँखि सुंदर चमकेला, सरप गले लिपटोरी
उदभूत रूप उमा जे दउरी, संग में सखी करोरी
हंसत लजत मुस्कात चनरमा सभे सीधि इकठोरी
लेई गुलाल संभु पर छिरके, रंग में उन्हुके नारी
भइल लाल सभ देह संभु के, गउरी करे ठिठोरी।

शिव जी के साथ भूत-प्रेतों की जमात भी होली खेल रही है। ऐसा लग रहा है मानो कैलाश पर्वत के ऊपर वटवृक्ष की छाया है। दिशाओं की पीले पर्दे खिंचे हुए हैं जिसकी छवि इंद्रासन जैसी दिखाई देती है। आक,धतूरा, संखिया आदि खूब पिया जा रहा है और सबने एक दूसरे को रंग लगाने की बजाय स्वयं को ही रंग लगा कर अद्भुत रूप बना लिया है, जिसे देखकर स्वयं पार्वती जी भी हँस रही हैं :-

सदासिव खेलत होरी, भूत जमात बटोरी
गिरि कैलास सिखर के उपर बट छाया चहुँ ओरी
पीत बितान तने चहुँ दिसि के, अनुपम साज सजोरी
छवि इंद्रासन सोरी।

आक धतूरा संखिया माहुर कुचिला भांग पीसोरी
नहीं अघात भये मतवारे, भरि भरि पीयत कमोरी
अपने ही मुख पोतत लै लै अद्भूत रूप बनोरी
हँसे गिरिजा मुँह मोरी।

पंडित छन्नूलाल मिश्रा के ओजपूर्ण स्वर में को सुनिए...

न साजन न गोरी,दिगम्बर खेले मसाने में होरी....
नाचत गावत डमरूधारी ,छोड़े सर्प गरल पिचकारी.

https://youtu.be/RBievjUHLfE
https://youtu.be/_jwU8QoJ7qU


भक्ति काल में होली

चंदबरदाई द्वारा रचित हिंदी के प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में भी होली का वर्णन मिलता है। 

महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं सूरदास जैसे कवि भी फाल्गुनी रंग और गंध की मादक धारों से बच न सके और उनके कृष्ण और राधा बहुत मधुर छेडख़ानी भरी होली खेलते हैं।

हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।
डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।

एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।।

मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई।भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।।

दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद


सूर रचित होली के दो पद -

नन्द नन्दन वृषभान किशोरी राधा मोहन खेलत होरी।
श्री वृन्दावन अति ही उजागर वरन-वरन नवदम्पति भोरी।

श्यामा उतय एकल ब्रज वनिता इतै श्याम रस रुप लखौरी।
कंचन की पिचकारी छूटत छिरकत ज्यौ सचु पावै गोरी।झुंडन जोरि रहि चन्द्रावली गोकुल में कुछ खेल मचौरी।
"सूरदास" प्रभु फगवा दीजै चिरजीवौ राधा बरजोरी।


रसखान जैसे रस की खान कहलाने वाले कवि ने तो फाग लीला के अर्न्तगत अनेकों "सवैय्ये" रच डाले हैं।सभी एक से एक रस और रंग से सिक्त _

फागुन लाग्यो जब तें तब तें ब्रजमण्डल में धूम मच्यौ है।नारि नवेली बचैं नहिं एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है।।
सांझ सकारे वहि रसखानि सुरंग गुलाल ले खेल रच्यौ है।कौ सजनी निलजी न भई अब कौन भटु बिहिं मान बच्यौ है।।


भक्तिकाल के महाकवि घनानंद ने होली की मस्ती को अपने शब्दों में कुछ यों पिरोया है-

प्रिय देह अछेह भरी दुति देह, दियै तरुनाई के तेह तुली।अति ही गति धीर समीर लगै, मृदु हेमलता जिमि जाति डुली।
घनानंद खेल उलैल दतै, बिल सैं, खुल सैं लट भूमि झुली।सुढि सुंदर भाल पै मौंहनि बीच, गुलाल की कैसी खुली टिकुली।

भक्ति काल के महाकवि पद्माकर ने कृष्ण और राधा की होली की मस्ती को कुछ यूँ बयान करते हैं-

फाग की मीर अमीरनि ज्यों, गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी,माय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी।

छीन पितंबर कम्मर ते, सुबिदा दई मीड कपोलन रोरी,नैन नचाय मुस्काय कहें, लला फिर अइयो खेलन होरी।

मीराबाई ने इस पद में कहा है –

रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।

उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँ उडावां रंग रंग री झरी, री।।

चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।

बिहारी तो संयोग और वियोग निरुपण दोनों में सिध्दहस्त कवि हैं, संयोग हो या वियोग फागुन मास का विशेष महत्व है।प्रिय हैं तो होली मादक है और प्रिय नहीं हैं तो होली जैसा त्यौहार भी रंगहीन प्रतीत होता है और बसन्त ॠतु भी अच्छी नहीं लगती।

बिहारी इसे कुछ यूं अपने शब्दों में पिरोते है,

बन बाटनु पिक बटपरा, तकि बिरहिनु मत मैन।
कुहौ कुहौ कहि कहि उठे, करि करि राते नैन।।

हिय/ और सी हवे गई डरी अवधि के नाम।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम।।

बिहारी ने फागुन को साधन के रूप में लेकर संयोग निरुपण भी किया है। फागुन महीना आ जाने पर जब नायक नायिका के साथ होली खेलता है तो नायिका भी नायक के मुख पर गुलाल मल देती है या फिर पिचकारी से उसके शरीर को रंग में डुबो देती है।

जज्यौं उझकि झांपति बदनु, झुकति विहंसि सतराई।
तत्यौं गुलाब मुठी झुठि झझकावत प्यौ जाई।।

पीठि दियैं ही नैंक मुरि, कर घूंघट पटु डारि।
भरि गुलाल की मुठि सौं गई मुठि सी मारि।।

भारतेंदुजी भी तो 'फगुनिया' जाते हैं और फिर गाते भी हैं-
गले मुझको लगा लो ऐ मेरे दिलदार होली में,
बुझे दिल की लगी मेरी भी ए यार होली में।








क्रमश.......