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Sunday, February 14, 2021

अजेय,अचूक,अभेद्य और अभिनव : अर्जुन मार्क 1ए.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को चेन्नई में सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को स्वदेशी रूप से विकसित पहला अर्जुन मार्क–1ए मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) सौंपा और अर्जुन ने प्रधानमंत्री को शानदार गन सैल्यूट दिया।

https://twitter.com/DrJitendraSingh/status/1360858048143630337?s=19

इसके साथ ही इसे सेना को सौंपने की औपचारिकता पूरी की जाएगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) ने भारतीय सेना को जमीनी युद्ध में "हंटर किलर" माने जाने वाली इस अत्यधिक घातक और शत्रु सेना और उसके प्रतिष्ठानों के लिए "निर्दय" "निर्मम"और "निष्ठुर" माने जाने वाले स्वदेशी मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन मार्क 1A को सेना को सौंपा।


इस टैंक को डीआरडीओ के एकक संग्राम वाहन अनुसंधान तथा विकास संस्थापन (CVRDE) और अन्य संस्थानों ने मिलकर डिजाईन किया है  टैंक का डिजाइन और उत्पादन करेगा। यह रक्षा क्षेत्र में भारत की "आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना" और "मेक इन इंडिया" के महत्वाकांक्षी पहल के तहत बनने वाला अत्याधुनिक टैंक है।

रक्षा विशेषज्ञ भारतीय सेना के इस अर्जुन मार्क 1A टैंक को "और तेज',"अत्यधिक विनाशकारी" और "शत्रु खेमे में वज्र माफिक प्रहार" करने वाला आधुनिक संस्करण मानते हैं।


अर्जुन मार्क-1ए संस्करण में 71 अतिरिक्त फीचर जोड़े गए हैं, जो इस टैंक को दुनिया के सभी श्रेष्ठ टैंकों के समकक्ष खड़ा करते हैं। हालिया रक्षा मंत्रालय के रक्षा अधिग्रहण समिति के फैसले में सेना के बेड़े में 118 उन्नत अर्जुन टैंक शामिल करने को मंजूरी दी गई थी। 

इन अर्जुन मार्क1ए टैंकों की कुल निर्माण लागत लगभग ₹8500 करोड़ होगी।जिससे करीब 200 उद्योगों और 8000 से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा जो आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को अभिवर्द्धन करेगा।

इसके साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जिसके पास अपने मुख्य युद्धक टैंक और हल्के लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता है। भारत  रक्षा उपकरण, डिजाइन, विकास और विनिर्माण में ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल ने एक और प्रमुख मील का पत्थर हासिल किया है।

इस उपलब्धि के साथ अर्जुन मार्क1ए,ऑस्ट्रियाई लेपर्ड 2 ,ब्रिटेन की चैलेंजर2,दक्षिण कोरिया की के2 ब्लैक पैंथर ,इस्रायल की मेरकवा ,जापान की टाइप 10,फ्रेंच एएमएक्स टैंक(AMX Char Leclerc Battle ) इटली की सी1अरिएट, चीन की टाइप 99 या ZTZ99,तुर्की की अल्टेय बैटल टैंक,रूसी मूल की T-80,T-90 अर्माटा,पोलैंड की पीटी-91 और ईरान की जुल्फिकार,अमेरिका की एम60 या 120एस, एम1एब्रम्स के साथ शामिल हो गया
है।

चार क्रू सदस्यों (टैंक कमांडर,गनर,लोडर व चालक ) वाले इस बख्तरबंद टैंक की गतिशीलता,चपलता और विचलनता का कोई जोड़ नहीं है।
अपने नाम के अनुरूप सटीक,प्रभावी और अचूक लक्ष्य भेदन क्षमता है,साथ ही यह निम्न ग्राउंड प्रेशर,उच्च क्षमता वाले भार अनुपात,पावर पैक और ग़जब की फायर पावर प्रदर्शन के लिए अत्याधुनिक और बेहद प्रभावी संचार संसाधन,इसमें फिन स्टेबलाइजड आर्मर पियर्सिंग डिस्कार्डिंग सिस्टम (FSAPDS) और हाई एक्सप्लोसिव स्क्वाश हेड (HESH),थर्मोबारिक(TB) और पेनेट्रेशन सह ब्लास्ट (PCB) एम्मयूनिशन,कन्टेनराइजेड एम्मयूनिशन बिन विथ इंडिविजुअल शटर(CABIS) जैसे अत्याधुनिक तकनीक से युक्त है।जो इसे एक संपूर्ण मुख्य युद्धक टैंक बनाते है।

आर्मामेंट: इसमें एक 120 एमएम मुख्य गन सिस्टम,एक 12.7mm का रिमोट वेपन सिस्टम और 7.62mm वाले कोएक्सियल मशीन गन शामिल है।

फायर एक्सेसीरीज : लेजर रेंज फाइंडर, कंप्यूटरीकृत फायर नियंत्रण प्रणाली,ऑक्सिलरी पावर यूनिट,थर्मल नाईट विजन,लेजर वार्निंग और
काउंटरमेजर्स सिस्टम,उन्नत नौवहन प्रणाली,नाभिकीय,जैविक,रासायनिक हमलों से निपटने के लिए प्रणाली, फ्यूम एक्सट्रेक्टर और इंटेग्रेटेड फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम।
अत्याधुनिक "कंचन " और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर सिस्टम से निर्मित इस बख्तरबंद टैंक को छोटे तथा मध्यम आकार वाले हथियारों से गोलीबारी, ग्रेनेड के शेल स्पिलंटर के हमलों से बचाता है।

लगभग 11मीटर लम्बी,3.18 मीटर ऊंची,और 3.95 मीटर चौड़े इस आकर्षक और शत्रु खेमे में विनाशकारी क्षमता युक्त अर्जुन टैंक का कोई सानी नहीं है। लगभग 68000 किलोग्राम के युद्धक भार क्षमता वाले इस मुख्य युद्धक टैंक की रेंज 500 किलोमीटर और हमला करने की अधिकतम गति 57 - 70 किलोमीटर/घण्टा है।

भारतीय सेना अब इस अजेय और दुर्जेय टैंक की दो और रेजीमेंट बनाने वाली है जो अगले छह महीनों में सेना में शामिल कर ली जाएंंगी। प्रत्येक रेजीमेंट में 59 अर्जुन टैंक होंगे। 16 साल पहले सेना में शामिल किए गए 124 ‘अर्जुनों’ की तुलना में मार्क-1ए टैंक में बेहतर मारक क्षमता, गतिशीलता और सुरक्षा है। एक रक्षा वैज्ञानिक के अनुसार प्रत्येक मार्क-1ए टैंक की कीमत 54 करोड़ रुपये होगी।

अर्जुन मार्क-1ए टैंक की खासियत

यह टैंक "अपने लक्ष्य को स्वयं तलाश करने " में सक्षम है। यह स्वयं तेजी से आगे बढ़ते हुए दुश्मन के लगातार "गतिशील लक्ष्यों "पर भी सटीक प्रहार कर सकने में सक्षम है। 
 
माइन प्लॉयविंग: टैंक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि रणक्षेत्र में बिछाई गई माइंस को साफ करते हुए आसानी से आगे बढ़ सकता है।
इसके अलावा इसमें कई नए फीचर्स शामिल किए गए हैं, जो इस टैंक को न केवल बेहद मजबूत बनाते हैं बल्कि सटीक प्रहार करने में इसका कोई सानी नहीं है।

CVRDE ने इसके पूर्ववर्ती अर्जुन मार्क 1 में सेना के इच्छानुसार और भविष्य की जरूरतों के लिए कुल 89 बदलाव किए। इन तमाम बदलाव,आधुनिकीकरण और परियोजना के विकास पर नजर रखने के लिए अर्जुन कोर कमिटी के गठन किया गया। इसमें Directorate General of Quality Assurance (DGQA), the Corps of Electronics & Mechanical Engineers (EME) और सेना की सहभागिता होती थी।यह समिती मासिक रिपोर्ट की समीक्षा करती थी।

मुख्य बदलाव.

इसका वजन 62 टन से बढ़ा 67 टन किया गया,इसके साथ इसके ग्लेसिस प्लेट और टरेट(Turret) पर ट्रैक विड्थ,माइन प्लो,और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर(ERA) लगाया गया। रेगिस्तानी युद्ध में प्रभावी प्रदर्शन के लिए MTU इंजन और RENK ट्रांसमिशन सिस्टम से सुसज्जित किया गया है।
टैंक के भीतर तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है,इससे क्रू मेंबर की सुविधा के लिए एयर फिल्टरेशन और उन्नत कूलिंग सिस्टम को लगाया गया है ताकि बाहर की हवा अंदर प्रवेश न कर सके। क्रू मेंबर के लिए ऑक्सीजन के लिए बेहतरीन फिल्टर लगाए गए हैं। उन्नत सस्पेंसन प्रदान करने के लिए इसमें नई "हल"(Hull) लगाया गया है।

इन बदलाव के बाद यह मुख्य युद्धक टैंक मिसाइल फायरिंग में सक्षम हो गया है,जो अर्जुन मार्क 1 में नहीं थी। इस्रायली LAHAT मिसाइल सिस्टम, टैंक के टरेट पर लगा उन्नत रिमोट संचालित शस्त्र प्रणाली शामिल है।


टैंक कमांडर के लिए नाईट विजन,हंटर किलर क्षमता वाली उन्नत पैनोरोमिक साईट है जो कमांडर को गनर और लोडर के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में सहायक होती है।
रूसी मूल के टी श्रृंखला के टैंक में ऑक्सिलरी पावर यूनिट(एपीयू) का आभाव है।जिससे अत्यधिक ऊर्जा खपत होती है,अर्जुन मार्क 1ए में इस प्रणाली का उपयोग कुया गया है।जिससे टी श्रृंखला के मुकाबले कारीब आधी ऊर्जा की खपत होती है।

इससे पहले सरकार ने 118 उन्नत अर्जुन टैंक खरीदने को 2012 में मंजूरी दी गई थी और 2014 में रक्षा खरीद समिति ने इसके लिए 6600 करोड़ रुपये भी आवंटित किये थे लेकिन सेना ने इसकी "फायर क्षमता" समेत कई पक्षों पर सेना ने जरूरी सुधार की मांग रखा, साथ साथ सेना ने अपनी मौजूदा क्षमता को बरकरार रखने के लिए रक्षा मंत्रालय ने 2015 में रूस से 14000 करोड़ रुपये में 464 मध्यम वजनी टी-90 टैंक की खरीद का सौदा को अंतिम रूप दिया था। सेना की जरूरी बदलाव आधार पर उन्नत किए जाने के बाद अर्जुन टैंक मार्क-1ए को 2020 में हरी झंडी मिली थी।


भारतीय सेना के आर्टिलरी बेड़े में भारी भरकम 124 अर्जुन टैंकों की एक रेजीमेंट पहले से ही साल 2004 में शामिल की जा चुकी है, जिसे पश्चिमी सीमा सहित अन्य स्थानों पर तैनात किया जाता रहा है। । इन पुराने टैंको की ऑपरेशनल समीक्षा के बाद डीआरडीओ ने इस नए संस्करण को तैयार किया है। अब शामिल किए जा रहे 118 अर्जुन टैंक अतिरिक्त फीचर वाले हैं और पहले से ज्यादा मारक क्षमता वाले हैं। इनके लिए एक और बख्तरबंद रेजीमेंट बनाई जाएगी।


अर्जुन सीरीज का आखिरी बैच।

118 अर्जुन मार्क-1ए टैंक संभवतः इस सीरीज का आखिरी बैच होेंगे। भारतीय सेना इन 68 टन वजनी होने को एक परिचलगत समस्या मानती है क्योंकि इसे एयरलिफ्ट करने में खासी दिक्कत होती है। खासतौर पर चीन के खिलाफ लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में इस टैंक की तैनाती बेहद दुरूह हो जाती है। यहां माउंटेन वारफेयर के लिए सेना पहले ही 20 से 25 टन के हल्के और 30  से 50 टन वजन के मध्यम टैंक की आवश्यकता जता चुकी है।जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर फौरन तैनाती की जा सके

Wednesday, February 10, 2021

पेट्रोलियम शोधन के जटिल तकनीक में आत्मनिर्भर होता भारत

 प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बीते सात फरवरी को पश्चिम बंगाल के हल्दिया में अवस्थित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन संयंत्र में देश की दूसरी कैटेलेटिक डि वैक्सिंग इकाई का आधारशिला रखी।

इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊर्जा गंगा पाइपलाइन का एक और बड़ा हिस्सा जनता की सेवा में समर्पित किया। इस परियोजना के लगभग 350 किलोमीटर की डोभी-दुर्गापुर पाइपलाइन बनने से पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बिहार और झारखंड के 10 जिलों को सीधा लाभ होगा। 

https://twitter.com/narendramodi/status/1358459430648483840?s=19

पेट्रोलियम पदार्थों के शोधन में मोम (वैक्स)का पृथक्करण (सेपरेशन) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है
पेट्रोलियम पदार्थों के शोधन(रिफाइनिंग) और भंजन(भंजन) की इस तकनीक में अभी तक हम आत्मनिर्भर नहीं हो सके थे।
 इस संयंत्र के स्थापना से भारत पेट्रोलियम शोधन क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इस तकनीक के उत्पाद और उप उत्पादों से पर्यावरणीय धारणीयता के साथ सतत, समावेशी और संपोषणीय विकास के अवधारणा की प्रक्रिया से स्वच्छ और हरित भारत की अवधारणा को अमली जामा पहनाने की दिशा में सकारात्मक पहल होगी।

क्या होती है डि वैक्सिंग प्रक्रिया
: पेट्रोलियम शोधन में यह एक जटिल रासायनिक अभिक्रिया है जिसमे उत्प्रेरक(catalyst) के रूप मे मॉलिक्यूलर सीव जिओलाइट( Molecular sieve catalysts (zeolites)) का प्रयोग किया जाता है।जिसके तहत लम्बी श्रृंखला वाले एन पैराफिन (n-paraffins) से वैक्स को बाहर किया जाता है और एन-पैराफिन के भंजन(क्रैकिंग) के दौरान इसके उप उत्पाद के रूप में गैसोलीन/पेट्रोल की प्राप्ति होती है।

इसके अनुप्रयोग: कैटेलेटिक डि वैक्सिंग तकनीक का अनुप्रयोग आइसोमेरिक (समावयवी)स्ट्रेट चेन वाले पाराफिंस के कोल्ड फ्लो प्रॉपर्टीज को कम करना और इसके उत्पादन में बढ़ोत्तरी करना होता है,
कोल्ड फ्लो प्रॉपर्टीज जो बेस आयल उत्पादन के दौरान काफ़ी बढ़ा हुआ रहता है।

पैराफिन (Paraffin wax) :

यह एक रंगहीन या कहें सफेद / ट्रांसलूसेंट कठोर मोम की संरचना वाले स्ट्रेट चेन वाले हाइड्रोकार्बन हैं।
इसे पेट्रोलियम शोधन के दौरान ऑयल स्टॉक से डि वैक्सिंग लाइट ल्युब्रिकेंट प्रणाली से अलग किया जाता है। इसका गलनांक (मेल्टिंग पॉइंट) 48° to 66° C (120° to 150° F)है।
अगर सामान्य जन जीवन मे इसके अनुप्रयोगों की बात करें तो मोमबत्ती, वैक्स पेपर,कॉस्मेटिक्स पदार्थ के निर्माण में,वार्निश और पॉलिशिंग एजेंट, और इलेक्ट्रिकल्स इंसुलेटर में किया जाता है

व्यावसायिक तौर पर ऑयल स्टॉक से डि वैक्सिंग करने की दो मुख्य प्रक्रिया है जिसमे पारम्परिक सॉल्वेंट प्रॉसेस,इसमें फ्रीजिंग साल्वेंट ट्रांस्पोर्ट माध्यम से वैक्स का पृथक्करण करते है और दूसरी अत्याधुनिक कैटेलिटिक प्रक्रिया जिसके तहत रासायनिक अभिक्रिया के तहत लम्बी श्रृंखला वाली एन-अलकेन्स ( n-alkanes) में सेलेक्टिव रिऐक्शन के माध्यम से वैक्स को बाहर करते है।

कैटेलिटिक डि वैक्सिंग में बेस ऑयल के द्वितीयक और तृतीयक श्रेणी के उच्च गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में किया जाता है। उपरोक्त दोनो श्रेणियों के बेस ऑयल उत्पादन की काफी दुरूह प्रक्रिया है,जिसमे प्रीट्रीटिंग,डि वैक्सिंग और हाइड्रोफ़िनिशिंग जैसी प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिए अत्यधिक तकनीकी ज्ञान ,अनुप्रयोग,कौशल और दक्षता की जरूरत होती है।
अभी तक इस जटिल शोधन प्रतिक्रिया के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन में बहुराष्ट्रीय पेट्रोलियम कंपनी का बोलबाला था,जिसमे शेल,एक्सॉन मोबिल प्रमुख हैं।


क्षमता : हल्दिया में स्थापित इस अत्याधुनिक संयंत्र जिसकी उत्पादन क्षमता 270,000 टन/वर्ष है । इस इकाई के निर्माण की कुल लागत करीब ₹1,019 करोड़ है। इस संयंत्र में तृतीयक समूह वाले उच्च ल्यूब्स ऑयल बेस स्टॉक( Advanced Group III Lubes Oil Base Stock (LOBS))का उत्पादन होगा,जो देश में अपने आप का प्रथम संयंत्र होगा
वर्तमान में लगभग 70 फीसद LOBS की आपूर्ति आयात द्वारा की जाती है,जिससे भारी विदेशी मुद्रा की खपत होती है।

हल्दिया पेट्रोलियम शोधन संयंत्र के इस नवीन उत्पादन प्रणाली के पूर्ण रूप से कार्यशील होने पर देश को LOBS के आयात पर निर्भरता घटकर महज आठ फीसद रह जायेगी,जिससे करीब 185 मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा की सालाना बचत होगी।

हल्दिया,पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता करीब 136 दूर पूर्वी मिदनापुर जिले में हुगली और हल्दी नदी के संगम पर अवस्थित है।
हल्दिया पेट्रोलियम शोधन संयंत्र का परिचालन 1975 में शुरू हुआ था। करीब 500 हेक्टेयर में विस्तृत इस पेट्रोलियम शोधन संयंत्र में कुल चार ब्लॉक हैं जिसे ईंधन ऑयल,ल्यूब ऑयल,ओएचसीयू(OHCU) और डीएचडीएस(DHDS)ब्लॉक है।

हल्दिया में निर्मित और उत्पादित पेट्रोलियम उत्पाद को पूर्वी भारत में व्यापक खपत है,जिसे हल्दिया -मोरीगांव- राजबन्द पाइपलाइन(Haldia-Mourigram-Rajband Pipeline (HMRBPL)और हल्दिया- बरौनी -कानपुर पाइपलाइन Haldia-Barauni-Kanpur Pipeline (HBKPL) द्वारा आपूर्ति की जाती है.।

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की हल्दिया तेलशोधन संयंत्र देश की तटीय क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र एकमात्र तेल एवं गैस कम्पनी,जिसकी कुल क्षमता 275 TMTPA के साथ समूह I, II और III के बेस ऑयल( base oils) है जो ल्युब्रिकेंट बेस स्टॉक का उत्पादन करती है।



















अफगानिस्तान: निकटस्थ पड़ोसी से कहीं अधिक...

 भारत और अफगानिस्‍तान के द्विपक्षीय समझौते में बीते मंगलवार को एक नया आयाम "हाइड्रो-डिप्लोमेसी" के रूप में जुड़ा। भारत ने काबुल नदी के सहायक नदी पर निर्मित होने वाले शहतूत डैम परियोजना से जुड़े समझौते पर विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बातचीत और समझौते के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए ।

भारत के निकटस्थ पड़ोसी अफगानिस्तान के सम्बन्धों में यह तारीख को एक सुखद दिन के रूप में याद किया जाएगा। यह परियोजना अफगानिस्तान के समावेशी विकास और भावी जल प्रबंधन के दिशा में अत्यधिक महत्वपूर्ण होगी।

विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सम्पन्न हुए इस ऐतिहासिक सम्मेलन में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति श्री अशरफ़ गनी ने भारत की भूरि भूरि प्रसंशा करते हुए कहा कि "यह परियोजना अफगानिस्तान के नागरिकों और काबुल वासियों के लिए "जीवन रेखा का उपहार " है जिसमे प्रगतिशील वैश्विक व्यवस्था में भारतीय मूल्यों का समावेश,लोकतंत्र,मानवता,पारस्परिक समझ,आपसी सम्मान,परस्पर विश्वास के तत्व शामिल है"।

कोविड-19 महामारी के कारण यह समारोह "वर्चुअल समिट" में हुआ, अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौलाना जलालुद्दीन रूमी को उद्धृत करते हुए कहा कि "रुमी ने नदियों के शक्तिशाली सभ्यतागत संबंध के बारे में कहा था कि, "जो नदी तुममें बहती है, वह मुझमें भी बहती है"। नदियाँ विश्व की महान सभ्यताओं की वाहक रही हैं। इसी भाव से जुड़कर भारत की मदद से 300 मिलियन डॉलर के खर्च पर सलमा बांध बनाया गया है , जो अफगानिस्तान को जल संकट से उबारने में मील का पत्थर साबित होगा। कुछ वर्ष पहले बने 'मैत्री बाँध' से हेरात में बिजली और सिंचाई की प्रणाली सुदृढ़ हुई है। इसे 1500 भारतीय और अफ़ग़ान इंजीनियरों ने मिलकर निर्मित किया था ।

https://twitter.com/narendramodi/status/1359051020911845379?s=09

विथ लव फ्रॉम इंडिया।

शहतूत डैम : 236 मिलियन डॉलर की लागत वाले इस डैम का निर्माण को भारतीय अभियांत्रिकी के बेजोड़ नमूने के रूप में हम देख सकेंगे । इसे लालंदर बांध के नाम से भी जाना जाता है।      
भारत,काबुल नदी बेसिन में एक सिंचाई नेटवर्क का विकास भी  द्वारा किया जाएगा ।यह डैम अफगानिस्तान के जल प्रबंधन को नया आयाम देते हुए उसे " नवीन सक्षम जलीय अवसंरचनात्मक ढांचा " विकसित करने में मदद करेगा।

अफगानिस्तान के काबुल प्रान्त के चाहर आसियाब(Chahar Asiab)जिले में मैदान नदी(Maidan River) पर इस महत्वाकांक्षी डैम का निर्माण किया जाएगा । यह नदी,काबुल नदी की ऊपरी सहायक नदी है। इस डैम की कुल जल संग्रहण क्षमता 147लाख घन फुट(MCM) होगी।

इसका निर्माण अफ़ग़ानिस्तान के काबुल प्रान्त केे दो सूखे ग्रस्त  जिले, खैराबाद और चाहर आसियाब में उपजे गम्भीर जल संकट से निजात दिलाने और 4000 हेक्टेयर की सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त करने के मकसद से की गई है।
 इस डैम से न सिर्फ काबुल प्रान्त और उसके बाहरी भाग में बसाए जा रहे शहर डेह सब्ज (Deh Sabz) के लगभग 20 लाख लोगों को स्वच्छ पेयजल मुहैय्या कराने में अपनी केंद्रीय भूमिका निभाएगा। 

https://twitter.com/rtaworld/status/1359037724347543556?s=19

काबुल नदी : इस नदी का उद्गम मध्यवर्ती अफगानिस्तान में अवस्थित हिंदुकुश पर्वत से होता है,लगभग 700 किलोमीटर लम्बी काबुल नदी के किनारे बसे शहरों में काबुल,सुरोभी और जलालाबाद है। जलालाबाद के पूर्व में काबुल नदी में इसकी मुख्य सहायक नदी कुन्नर मिलती है,जो पाकिस्तान से उद्गमित होती है,जहां इसे चित्राल नदी के रूप में जाना जाता है।
पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तूनख्वा प्रान्त को सिंचित करती हुई काबुल नदी पेशावर में प्रवेश करती है और इस्लामाबाद के उत्तर पश्चिम में अवस्थित एटोक में सिंधु नदी में मिल कर अपनी यात्रा को विराम देती है।
दोनो देशों में काबुल नदी का अत्यधिक महत्व है, इसके बेसिन में अफ़ग़ानिस्तान के नौ और पाकिस्तान के दो प्रान्त है जिसमें 25 मिलियन जनसंख्या निवास करती है। काबुल नदी और इसकी सहायक नदियां अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सात मिलियन जनसंख्या के पेयजल का एक मात्र स्रोत है।

इस डैम का महत्व :शहतूत डैम का महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दशक से लगातार सूखे और गम्भीर जल संकट का सामना कर रहे राजधानी काबुल और आसपास के लिए यह डैम, भू जल रिचार्ज,सूखे और जल संकट से निजात दिलाने में वरदान सिद्ध होगा।
राजधानी काबुल में जलसंकट का होना इसके भौगोलिक अवस्थिति के कारण है,अफगानिस्तान जैसे विशिष्ट भूआवेष्टित देश की यह राजधानी एक सूखे प्रदेश में अवस्थित है,जहां महज 350-70 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। बढ़ती जनसंख्या और रोजगार की तलाश में अन्य प्रांतों से यहां आती भारी जनसंख्या का दवाब, गहरे कुंए,बोरिंग और गहरे बोरवेल की खुदाई,और लगातार गिरते भू:जलस्तर को बेहतर बनाने के लिए पूरी अफगानी सभ्यता के लिए सही सही मायने में "विथ लव फ्रॉम इंडिया"होगा



पाकिस्तान का बेजा विरोध।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान, काबुल नदी के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम बेसिन में बसे देश हैं
इसी कारण पाकिस्तान, अफगानिस्तान द्वारा काबुल नदी पर किसी भी तरह के अधोसंरचना निर्माण पर अपना विरोध जताता रहता है।
भारत-अफ़ग़ान मैत्री पाकिस्तान को फूटी आंख नहीं सुहाती है,अफगानिस्तान में विभिन्न भारतीय परियोजनाओं पर उसकी वक्र दृष्टि बनी रहती है।
भारत द्वारा अवसंरचना एवं अधोसंरचना निर्माण,डैम,पेयजल और सड़क परियोजना की मंशा पर पाकिस्तानी नेतृत्व और मीडिया लगातार उल जुलूल सवाल खड़े करता रहता है।

अफगानिस्तान के नव निर्माण में भारत का केंद्रीय महत्व और पाकिस्तान का गिरता कद, पाकिस्तानी हुक्मरानों के आंखों की नींद और दिल का चैन,दोनो ही उड़ गई है

यहां गौर करने वाली बात है कि विगत वर्ष पूर्व तक अफगानिस्तान में भारतीय पदचिह्न,पूरी तरह पाकिस्तान के रहमोकरम पर निर्भर था,जिसे ईरान के मकरान तट पर अवस्थित और भारत द्वारा निर्मित चाबाहार बन्दरगाह परियोजना ने अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी भौगौलिक प्रभुत्व को छिन्न भिन्न कर दिया,इस बन्दरगाह के परिचालन से भारत
डेलाराम जरांज़ राजमार्ग,के जरिये जिसे रूट 606 या A71 कहा जाता है,अफगान मुख्य भूमि से सीधा जुड़ जाएगा।
यह राजमार्ग ईरान अफगानिस्तान के सीमवर्ती शहर डेलराम को निमरुज प्रान्त के जरांज़ को चाबहार बन्दरगाह से जोड़ता है। तकरीबन 200 किलोमीटर लंबी और 600 करोड़ रुपये वाली इस राजमार्ग परियोजना को भारत ने पूर्ण वित्तीयन किया है।
सीमा सड़क संगठन(BRO) ने 2005 में इस परियोजना का निर्माण शुुरु किया और 2009 में इसे आम अफगानी नागरिकों को सौंप दिया।
 अफ़ग़ानिस्तान के पुर्ननिर्माण और उसके क्षमता विकास सहित अन्य मोर्चो पर भारत अपना "निकटस्थ पड़ोसी" के विकास के लिए अपना दायित्व पूरी शिद्दत के साथ निभा रहा है।

कूटनीतिक मंचो पर पाकिस्तान की धूर्तता जग जाहिर है, इस परियोजना के जरिये भी भारत ने पाकिस्तान को "वाटर डिप्लोमेसी" में भी जबर्दस्त पटखनी दी है,पहले सिंधु नदी के सहायक नदियों पर विभिन्न परियोजनाओं की शुरुआत के भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने इरादे स्पष्ट किये है।

दक्षिण एशिया के समृद्धि,संबद्धता और स्थायित्व के लिए सम्प्रभु,शांतिपूर्णऔर एकजुट अफगानिस्तान का होना अतिआवश्यक है, और यह बात रावलपिंडी और इस्लामाबाद को समझ नहीं आती है।

अफगानिस्तान: निकटस्थ पड़ोसी से कहीं अधिक:

यह डैम भारत अफगानिस्तान के मैत्री का नया प्रतिमान स्थापित करेगा और हाइड्रो डिप्लोमेसी के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
अफगानिस्तान में कई अवसंरचनात्मक विकास कार्यों में भारत पूरी सक्रियता के साथ अफगान समाज के नव निर्माण में अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए एक सक्षम,समर्थ और सहभागी देश की जिम्मेदारी का बख़ूबी निर्वहन कर रहा है।
इसी कड़ी में 2015 में भारत अफगानिस्तान मैत्री डैम जिसे "सलमा डैम" भी कहा जाता है और अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक "संसद भवन" का निर्माण का कार्य पूरा किया है।




अफगानिस्तान को लैंड लॉक्ड देश से लैंड ब्रिज देश बनाने में मदद :

अफगानिस्तान की सड़क अवसंरचना को उन्नत बनाने और उसे "लैंड लॉक्ड देश से लैंड ब्रिज देश"बनाने अफगानी शीर्ष नेतृत्व के लक्ष्य को नई दिशा देते हुए 218 किलोमीटर लम्बी डेलराम - जरांज़ सड़क परियोजना,जो ईरान के चाबहार बन्दरगाह को बारहमासी संपर्क प्रदान करती है, को अंतिम रूप दे रहा है।
इसी कड़ी में रेल मार्गों का विकास,उच्च क्षमता वाले विद्युत पारेषण(ट्रांसमिशन)लाइन का विस्तार शामिल है। बीते नवम्बर में सम्पन्न "अफगानिस्तान 2020 कांफ्रेंस" जिसमें संयुक्त राष्ट्र,यूरोपीय संघ नीत सम्मेलन में भारत ने अफगानिस्तान में 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर की कुल 150 परियोजनाओं को शुरू करने का निर्णय लिया था।

वर्तमान में अफगानिस्तान में भारतीय सहायता :

* अफगानिस्तान में भारत उच्च क्षमता निर्माण वाले सामुदायिक विकास के चौथे चरण को अपनी विभिन्न स्तरों पर अपनी सहायता प्रदान कर रहा है।

* आम अफगानी नागरिकों को सुचारू और निर्बाध विद्युत आपूर्ति प्रदान करने के लिए 202 किलोमीटर लम्बी पुल ए खुमरी(Pul e Khumri )पारेषण लाइन जा निर्माण कर चुका है।
इसके अलावा भारत, 

बामियान प्रांत में बंद-ए-अमीर तक सड़क संपर्क, परवान प्रांत में चारिकार शहर के लिये जलापूर्ति नेटवर्क,

मजार-ए-शरीफ में पॉलीटेक्नीक कॉलेज के निर्माण , 
कंधार में अफगान राष्ट्रीय कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ANASTU) की स्थापना में तकनीकी सहयोग का भरोसा दिलाया है।
मई,2017 में प्रक्षेपित दक्षिण एशियाई उपग्रह में अफगानिस्तान की भागीदारी से भारत रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों में अफगानिस्तान की मौसम विज्ञान प्राद्योगिकी में सहायता कर रहा है।

इसके अतिरिक्त ; इंदिरा गाँधी शिशु स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण, काबुल में हबीबी स्कूल की स्थापना आदि में महत्त्वपूर्ण सहायता दी है।भारत-अफगानिस्तान में कृषि, बैंकिंग, कंप्यूटर, खनन, स्वास्थ्य क्षेत्र आदि में सहायता के लिए बार-बार प्रतिबद्धता व्यक्त की है.


अफगानिस्तान के लिये भारतीय नीति

भारत,अफगानिस्तान के विकास कार्यो में अपनी "पांच सूत्री रणनीति " में एक नया "वैक्सीन डिप्लोमेसी" को जोड़ते हुए अपनी छः सूत्री रणनीति को जमीनी हकीकत प्रदान करता है। ये हैं

* विशाल अधोसंरचना और अवसंरचनात्मक परियोजना का निर्णाण करना।
* मानव संसाधनों का विकास और क्षमता निर्माण करना।
* मानवीय सहायता मुहैया
* उच्च क्षमता और प्रभाव वाले सामुदायिक विकास
* व्यापार,व्यवसाय और निवेश को नई दिशा देना,और इसके लिए वायु और सड़क सम्पर्क को और बेहतर बनाना।
*कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए व्यापक बॉयो मेडिकल सहायता और भारत निर्मित वैक्सीन मुहैया कराना।
विगत 2001 से भारत अफगानिस्तान के नवनिर्माण में तीन अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि को इस मद में आवंटित कर चुका है ।

भारत के लिए अफगानिस्तान महज "निकटस्थ पड़ोसी"से कहीं बढ़कर है,इससे हमारे  सभ्यतागत,सांस्कृतिक,आर्थिक,सामरिक,रणनीतिक हित और महत्व है। भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचो पर अफगानिस्तान के विकास के सभी मोर्चे पर अपनी व्यापक भूमिका को पूरी जिम्मेवारी को संजीदगी से निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत एक एकीकृत, संप्रभु, लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण, स्थिर, समृद्ध और बहुलवादी अफगानिस्तान के निर्माण में निरंतर सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।












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Friday, February 05, 2021

हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती भारत की भूमिका -2.

 गतांक से आगे...2/2.(अंतिम)

इन क्षेत्रों में चीन की अत्यधिक रुचि और इसकी सामरिक लालसा निश्चित रूप से भारत और इसकी तटीय संप्रभुता पर गम्भीर खतरा है,चीन ने जिस तरह हॉर्न ऑफ अफ्रीका के जिबूती से बंगाल की खाड़ी में अवस्थित बांग्लादेश के कॉक्स बाजार तक जिस तरह भारी पैमाने पर सैन्य अधोसंरचनात्मक को सुदृढ़ करने का निवेश किया है,वह भारत के लिए बेहद चिंताजनक है।

उदाहरणस्वरूप
मालदीव के बिखरे हुए द्वीप और श्रीलंका के तटीय क्षेत्र दोनों देशों के पर्यटन और सेवा क्षेत्र में अहम भूमिका निभाता है तो दूसरी ओर दूसरे देशों को अपनी ठोस रणनीतिक स्थिति  बनाने में मदद करता है।
चीन इसी कारण से मालदीव के पूर्वर्ती सरकार से कई द्वीपों पर पर्यटन विकसित करने के झांसे में खरीद चुका या सौदे को अंतिम रूप दे चुका है,अगर ऐसा हुआ तो यहां पर्यटन को छोड़कर बाकी वह सब कुछ होगा जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते है। यही हाल श्रीलंका की,कोलम्बो हम्बनटोटा और अन्य तटीय क्षेत्रों में अवसंरचनात्मक क्षेत्रों में भारी चीनी निवेश  और बंदरगाहों  का उन्नयन कुछ इसी दिशा में संकेत देता है,गौरतलब है कि चीन ने हम्बनटोटा बन्दरगाह को 99 वर्ष के पट्टे पर ले रखा है।
यह अलहदा है कि भारतीय और अंतरराष्ट्रीय दवाब के कारण  श्रीलंका की नौसेना ने अपना दक्षिणी कमान को हम्बनटोटा में ले जाने का निर्णय किया है,और चीन को ''सामरिक महत्व" के किसी तरह के कार्यों से दूर रहने का "अनुरोध"किया है ।वैसे हम चीन के कारनामों को पहले भी दक्षिणी चरण सागर में स्पार्टले द्वीप समूह पर पर  देख चुके हैं ।
 

आइओआर देशों में भारत की पहल:


भारत को चाहिए इन देशों को छोटी छोटी समस्या, जो हमारे लिए सामान्य लगे लेकिन इन छोटे द्वीपीय देशों लिए संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता का खतरा बन जाती है,उन पर विशेष ध्यान दें ।
ट्रैक 1 औऱ 2 डिप्लोमेसी के अलावा विभिन्न पारम्परिक और गैर पारम्परिक राजनय  के जरिये इन देशों "सभी मोर्चो पर" सदा जुड़ाव बनाये रखे।

भारत इस क्षेत्र में सिर्फ रणनीतिक महत्व को न तलाशते हुए अन्य मसलों यथा

●लोकतांत्रिक प्रक्रिया और इससे जुड़े तमाम संस्थाओं को भरपूर तवज्जों देना।

●विभिन्न द्वीपों पर पानी और सफाई की व्यवस्था।

● छोटे और लघु उद्योगों के लिए पर्याप्त वित्त की व्यवस्था;
●अवसंरचना और अधोसंरचनात्मक विकास।

● बंदरगाहों और एयरपोर्ट का विकास।

● कांफ्रेंस और कम्युनिटी सेंटर्स का निर्माण।

● खेल/क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण।

● आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं।

● स्वास्थ्य और एम्बुलेंस सेवा।

● तटीय सुरक्षा,आपदा प्रबंधन सुनिश्चित करना।

● आउटडोर फिटनेस सेंटर की व्यवस्था।

● ड्रग डिटॉक्स सेंटर।

● सुनम्य स्टूडेंट वीजा, विदेश मंत्रालय की आइ-टेक(I-TEC) के छात्र एक्सचेंज और छात्रवृत्ति में और अधिक वृद्धि करना और कौशल विकास कार्यक्रम का आदान प्रदान।

● कृषि ,कृषि नवाचार और मशीनीकरण और मत्स्य पालन में सहयोग।

● शिक्षा, अनुसंधान और विकास के साथ नवाचार,नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यटन में व्यापक भागीदारी।

● मेरीटाइम सिक्यूरिटी,आपदा प्रबंधन,पुलिस,सुरक्षा और सैन्य बलों के लिए भारत के संस्थानों में प्रशिक्षण,इन देशों में अत्याधुनिक प्रशिक्षण संस्थान खोलने में विभिन्न स्तरों पर विशेषीकृत सहायता। 

इन देशों के बीच सामरिक भागीदारी के तहत ही भारत ने मालदीव के तटीय क्षेत्रों में तटीय रडार तन्त्र को और मजबूत किया है जिससे हमारे राडार और लिसनिंग पोस्ट जो पहले से भी इन क्षेत्र में मौजूद है,रक्षा बलों में क्षमता निर्माण और बेहतर समन्वय कर सकेंगे।

क्यों सक्रिय होना चाहिए भारत को।


इन देशों में सक्रिय भारतीय मदद की इसलिये भी जरूरत है क्योंक चीन की चेक बुक राजनय और उसकी डेब्ट ट्रैप राजनय से ये देश बुरी तरह ऋणग्रस्त हो चुके हैं। इन देशों को अब यह एहसास हो रहा है कि उन्होंने उच्च वृद्धि दर प्राप्त करने के हसीन सपनों के चक्कर मे अपनी संप्रभुता के साथ तात्कालिक समझौता कर लिया है ,जो सिर्फ अपने कोमल पैर पर स्वयं से कुल्हाड़ी का तेज प्रहार करने जैसा है। इन देशों की नीति न सिर्फ चीन को आईओआर क्षेत्र में प्रवेश देने का मार्ग प्रशस्त किया बल्कि क्षेत्र की पूरी "सुरक्षा आर्किटेक्चर"को बिगाड़ कर रख दिया है।

चूंकि भारत अपने निकट पड़ोस में घटित हो रहे इन तमाम घटनाओं पर धृतराष्ट्र कि भाँति आंख मूंदे नहीं सकता जबकि द्रौपदी का सामूहिक चीरहरण होता रहे,नेपाल,भूटान,बंगलादेश,मालदीव और श्रीलंका से लेकर सेशेल्स से मेडागास्कर तक हमारे विस्तृत पड़ोसी हैं जो सही मायने में हमारी विदेश नीति की "राष्ट्रीय अस्मिता,इज्जत और सम्मान"है इनपर किसी तरह की धीमी से धीमी आंच और हल्का सा खरोंच हमें बर्दाश्त से बाहर होना चाहिए। इनपर खरोंच का सीधा मतलब हमारी एकता और अखंडता के साथ क्षेत्रीय संप्रभुता से है ,और अपनी संप्रभुता की रक्षा करना भारत का नैसर्गिक अधिकार है।




आईओआर में भारत का संकल्प 

"भारत हिन्द महासागरीय देशों के साथ अपने संबंधों को सबसे अधिक महत्व देता है,जो एक दूसरे के साथ एक गहरी और मजबूत साझेदारी चाहते हैं। भारत मानता है कि इस क्षेत्र में एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व का माहौल पूरे क्षेत्र के हित में है।

इस क्षेत्र के देशों के लिए भारत हर परिस्थितियों में नैसर्गिक रूप से सदैव प्रथम /ऑलवेज फर्स्ट रेस्पांडर के रूप में "हर संभव "सहायता करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है। जिसका जिक्र देश का शीर्षस्थ नेतृत्व विभिन्न मंचो से कई बार कह चुका है।

इस क्षेत्र के देश और भारत के साथ सम्बनधों को 'हिन्द महासागर "की लहरों ने हजारों वर्षों से मेरीटाइम सबंध, समृद्ध,सांस्कृतिक,व्यापारिक,और सामरिक घनिष्ठता के संबंधों में अपनी लहरों से सींचता आया है है। इस क्षेत्र के देशों के साथ भारत की अटूट मित्रता मुश्किल समय में भी हमारी मार्गदर्शक बनी है।

भारत अपनी शक्ति और क्षमताओं का उपयोग केवल अपनी समृद्धि और सुरक्षा के लिए ही नहीं करेगा बल्कि इस क्षेत्र के अन्य देशों की क्षमता के विकास में, आपदाओं में उनकी सहायता के लिए, तथा सभी देशों की साझा सुरक्षा, संपन्नता और उज्ज्वल भविष्य के लिए करेगा। जो SAGAR की सच्ची संकल्पना है।

Indo-Pacific(भारत- प्रशान्त) क्षेत्र हमारी जीवन रेखा है और व्यापार का राजमार्ग भी है। यह हर मायने में हमारे साझा भविष्य की कुंजी है।  जून 2018 में सिंगापुर में भारतीय शीर्ष नेतृत्व ने एक कार्यक्रम में अपने उद्बोधन में Indo-Pacific Region में खुलेपन, एकीकरण एवं संतुलन कायम करने के लिए सबके साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर दिया था।

प्रधानमंत्री ने कहा था कि "समर्थ, सशक्त और समृद्ध "भारत दक्षिण एशिया और इंडो पैसिफ़िक(भारत-प्रशांत) में ही नहीं, पूरे विश्व में शांति, विकास और सुरक्षा का आधार स्तम्भ होगा हम सामुद्रिक पड़ोसी हैं हम मित्र हैं और दोस्तों में कोई छोटा और बड़ा, कमज़ोर और ताकतवर नहीं होता। शांत और समृद्ध पड़ौस की नींव भरोसे, सद्भावना और सहयोग पर टिकी होती है।

यह बात भारत के "बिग ब्रदर एटीट्यूड "/को नहीं बल्कि भारत के पूर्व विदेश मंत्री दिवंगत श्रीमती सुषमा स्वराज द्वारा प्रतिपादित "Elder Brother Atitude डॉक्ट्रिन को मूर्त रूप प्रदान करता है। अपने श्रीलंका के दौरे पर उंन्होने स्पष्ट रूप से कहा था कि भारत जरूरत के समय अपने दोस्तों को कभी नहीं भूलता" उनके  इस वक्तव्य से चीनी कर्ज़े में डूबते श्रीलंका की स्थिति की विकरालता और गंभीरता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। 

आसन्न सवाल :कैसे निपटेगा भारत

1.श्रीलंका और मालदीव से लेकर ईरान,सेसेल्श मॉरीशस,मेडागास्कर,कोमोरोस से इक्विटोरियल गिनी अपने भौगोलिक अवस्थिति को लेकर हमारे लिए विस्तृत पड़ोसी हैं। तो वहीं श्रीलंका और मालदीव हिन्द महासागर में हमारे दो अनमोल मोती हैं जिन्हें  बेल्ट एंड रोड और मेरीटाइम सिल्क रोड  जैसे अत्यधिक लचीले ,धारदार और बेहद मजबूत चीनी रेशम से इन दोनो मोतियों को चीन अपनी "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स"रणनीति के जरिए पिरो चुका है।

2. पाकिस्तान के "ग्वादर'',मालदीव के 'मराओ" श्रीलंका के "हम्बनटोटा",,म्यामार के "कोको द्वीप समूह" और बांग्लादेश के "कॉक्सबाज़ार,और चटगांव" को अगर नक्शे पर देखें तो चीनी रेशम ने इन सभी स्थानों को एक सूत्र में पिरो दिया है। इन सभी स्थानों पर चीन ने अत्यधिक अधोसंरचना और अवसंरसनात्मक विकास के लिए अत्यधिक निवेश किया है।

इन स्थानों पर चीन ने अपने सामरिक और लॉजिस्टिक क्षमता विकसित की है ,अगर समय रहते इन मालाओं के रेशम को न काटा गया तो तो ये दक्षिण एशिया के राजनीति ने चीनी पदार्पण होगा, हिन्द महासागर  का नीला पानी पहले गर्म और फिर लाल होगा और ये मोतियों की माला हमारी गर्दन पर धीरे धीरे कसती जाएगी, फिर हमारा दम घुटेगा और घुटता जाएगा ।

3.यह समस्या सिर्फ समुद्र से ही नहीं स्थल खंड पर भी बरक़रार है जिसे हम तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से नेपाल की राजधानी काठमांडो तक प्रस्तावित सीधी रेल सेवा,भूटान के चुम्बी घाटी के जरिये सिलीगुड़ी  कॉररिडोर या संकरी चिकेन नेक पर ड्रैगन की नजर जिसे वह कब्जा कर एक ही झटके में गर्दन दबाते हुए भारतीय मुख्य भूमि से उत्तरपूर्व के आठ राज्यों को काट अपने दक्षिणी तिब्बत में मिलाने की चीनी मंशा जगजाहिर है।

इसलिए समय रहते हुए भारत को चाहिए कि चीनी ड्रैगन के घातक जहर का तत्काल,और प्रभावी और अचूक इलाज ढूंढेते हुए खुद के साथ इन पड़ोसी देशों को भी बचाएं।

4.चीन अपने "फाइव फिंगर पालिसी"में कोई बदलाव नहीं करने जा रहा है,तो ऐसी स्थिति में भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ"गुजराल डॉक्ट्रिन" नेबरहुड फर्स्ट, "एक्ट एंड एक्सटेंडेड एशिया" और "सागर नीति" को नए सिरे से और व्यावहारिक तौर पर हिन्द महासागर के भू रणनीतिक कैनवास पर उकेरना होगा।

5."बिग ब्रदर सिंड्रोम" और" बिग ब्रदर एटीट्यूड"से ग्रस्त अपने इन पड़ोसी देशों को येन केन प्रकारेण यह समझाना होगा कि भारत को "बड़े भाई " के रूप में देखना बन्द करे क्योंकि यह "बिग ब्रदर" शब्द का गलत अंग्रेजी अनुवाद है, सही अर्थों में भारत कि भूमिका सदैव "एल्डर ब्रदर"(elder brother) के रूप में रही है जो बिना किसी हेकड़ी के Helping(मददगार) caring (परवाह  करने वाला)और sharing(साझीदार) की निःस्वार्थ भूमिका निभाता है और रहेगा
जिसे भारत HADR मिशन के अलावा कोविड19 से निपटने के लिए इन देशों के साथ "वैक्सीन मैत्री" जैसी पहल से सफलतापूर्वक अंजाम दे रहा है।

चुनौती।

प्रथम
.,हिन्द महासागर क्षेत्र (​​आईओआर) में वर्तमान समुद्री सुरक्षा परिदृश्य में समुद्री डकैती(पाइरेसी),प्रतिबंधित नारकोटिक्स ड्रग्स​ और हथियारों की तस्करी, मानवीय और आपदा राहत​(HADR), खोज और बचाव (SAR) जैसी कई चुनौतियां हैं।आईओआर देशों के बीच समुद्री सहयोग इन चुनौतियों ​से निपटने ​और क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद कर ​​सकते हैं।​ 
इसलिए हमें आसन्न खतरों को दूरदर्शिता पूर्ण रूप से देखने ​के कंधे को मिलाना होगा,क्योंकि आज एक ​देश ​का खतरा दूसरे ​के लिए कल ​का खतरा बन सकता है। ​

दूसरी, भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ​हिन्द महासागर का सहअस्तित्व के साथ शांतिपूर्ण एवं मुक्त,खुला और समावेशी नौवहनीय समुद्री विस्तार हो जो ​इस क्षेत्र के सभी देशों के ​हित में हो​।
भारत को इन तटवर्ती देशो के लिए खासा सावधान रहने की आवयश्कता है, इस क्षेत्र में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन से है, जहां भारत मालदीव और श्रीलंका को तरजीह दे रहा है तो चीन ,रूस की तरफ़ निगाहें जमा रखा है।

तीसरी, मालदीव और श्रीलंका चीन को "मलक्का डाइलेमा",से मुक्ति प्रदान करने और चीन की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में ये दोनों देश अहम पड़ाव माने जाते है। इस क्षेत्र में भारत की सक्रियता को चीन कभी भी हल्के से नहीं लेगा,हालिया कोलोंबो की ईस्ट कन्टेनर पोर्ट के विकास में भारत को बाहर करने की घटना से किसी गहरी साजिश की बू आती है, इसलिए भारत को सभी मोर्चों पर अत्यधिक चौकन्ना रहने की जरूरत है। 
वर्तमान परिस्थितियों और लद्दाख में आमने सामने डटी दोनो सेनाओं और नौ दौर की उच्चस्तरीय राजनय-सैन्य बातचीत का कोई हल न निकलने की सूचना के बाद आने वाले समय में हिन्द महासागर का पानी और गर्म होगा, उबलेगा, जिसमे हमे अपनी नौसेना और वायुसेना को एक "फ़ोर्स मल्टीप्लायर" के रूप में विकसित करना होगा जिससे इस क्षेत्र में दबाव और प्रतिसंतुलन बरकार रहे। 

चौथी,आज ब्लू ईकॉनमी और पर्ल इकोनॉमी के दौर में  जरूरत इस बात  की है कि भारतीय नौसेना को  "ब्राउन वाटर नेवी " से "ब्लू वाटर नेवी"  में जल्द से जल्द तब्दील करने की दिशा में व्यापक पहल की रणनीतिक जरूरत है क्योंकि ये पहल ही इस क्षेत्र में आगामी वर्षो में होने वाली कड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक झड़पों को सफलतापूर्वक कूटनयिक और रणनीतिक अंजाम देंगे। 
हिन्द महसागर और इसके तटीय देशों में चीनी नौसेना की बढ़ती आक्रमक मौजूदगी भारत की भू राजनीतिक और सुरक्षा के गहरे निहितार्थ है,सम्पूर्ण हिन्द महसागर क्षेत्र में प्रमुख शक्तियों के बीच किसी भी संघर्ष का प्रभाव भारतीय रणनीतिक हित को  व्यापक रूप से प्रभावित करेगा।

निष्कर्षतः इस क्षेत्र ने सुरक्षा की नई अवधारणा को जन्म दिया है, नरेंद्र मोदी की सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में "हिन्द महासागर क्षेत्र "को अपने "रणनीतिक केन्द्रबिन्दू" में रखकर यथार्थवादी भारतीय कूटनीति ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है वह काबिल ए तारीफ है।

वैसे सिक्के के दूसरे पहलू और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध में अस्थाई हित ही सर्वोच्च होते है,यहां न तो कोई स्थायी मित्र,न कोई हित और न कोई शत्रु होता है और जरूरी नहीं कि जो आप देख रहें हो वह हक़ीक़त हो और चीनी इस सिद्धांत पर आंख मूंदकर भरोसा करते हुए अपनी पूरी तैयारी को इसी पर अंजाम देते है

हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती भारत की भूमिका -1

 रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने बीते दिन कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु आयोजित एयरो इंडिया -2021 के अपने संबोधन में कहा कि"भारत के पास विशाल समुद्री तट रेखा है,लेकिन हमारे "हित" इन तटों से कहीं दूर तक जुड़े हैं।इनमें वे भी शामिल हैं जो काम की तलाश में महाद्वीप को पार कर ,विशेषकर हिन्द महासागरीय देशों में बसे है। यह हमारा कर्तव्य है कि हम इन देशों के प्राकृतिक आपदा और अन्य सुरक्षा सम्बन्धी चिंता और जरूरतों का सदा निवारण करें।"

रक्षा मंत्री का संबोधन का यह अंश अपने आप में भारत की हिन्द महासागर क्षेत्र के प्रति दूरदर्शी सोच और 2015 में प्रतिपादित "सागर "( SAGAR : Security and Growth for All in the Region ) के साथ भारतीय मनीषी दर्शन की "वसुधैव कुटुम्बकम" के अवधारणा को इंगित करता है। 

एयरो इंडिया-2021 के दूसरे सत्र में हिन्द महासागर क्षेत्र ​(आईओआर​​) ​के ​​रक्षा मंत्रियों ​का ​​कॉन्क्लेव ​में अपने उद्बोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि: हिन्द महासागर हम सभी की साझी संपत्ति है​, यह अंतर​राष्ट्रीय व्यापार और परिवहन के लिए एक महत्वपूर्ण जीवनरेखा अर्थात सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन (SLOC)है। 
​​​हिन्द महासागर​ ​दुनिया के कंटेनर जहाजों के आवागमन के आधे यातायात का मार्ग है। यह ​मार्ग दुनिया के थोक कार्गो यातायात का एक तिहाई ​और ​दुनिया के तेल लदान और ढुलाई ​का दो तिहाई​ हिस्सा है​​।​

हिन्द महासागर​ क्षेत्र के लिए ​भारत ​की ओर से किये जा रहे प्रयासों में महत्वपूर्ण है सागर​ प्रोजेक्ट के माध्यम से आईओआर देशों के बीच व्यापार और पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न नीतिगत पहल जैसे जैसे सागरमाला, प्रोजेक्ट मौसम और एशिया-अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर आदि।​ आर्थिक सुरक्षा में सहयोग​ के लिए गैर-पारंपरिक खतरे जैसे प्राकृतिक आपदा, समुद्री डकैती, आतंकवाद​ आदि​ के खिलाफ भी कई कदम उठाये गये हैं​।​ 

इस क्षेत्र की समावेशी सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी ​आईओआर ​देशों के लिए​ यह ​समय ​की मांग ​है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था, व्यापार, रणनीतिक और सामरिक सहयोग को उच्च स्तर पर ले जाने की पुरजोर प्रयास करें और इस क्षेत्र की सुरक्षा आर्किटेक्चर को बिगाड़ने वाली हर उस मंशा को पूरी तरह विफल करें।
इस क्षेत्र में सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी ​आईओआर ​देशों के लिए​ ​यह समय ​की मांग ​है कि हम अपनी अर्थव्यवस्था,व्यापार,सांस्कृतिक सम्बन्ध,आपसी समझ बूझ,पर्यावरणीय,तटीय और मेरीटाइम आपदा प्रबंधन और नौसैन्य सहयोग को उच्च स्तर पर ले जाएं।​ 

आईओआर में देशों के वायदे परस्पर जुड़े हुए हैं और इस बात पर निर्भर करते हैं कि हम ​हिन्द महासागर में उभरती चुनौतियों और लाभ उठाने के अवसरों को कित​ने प्रभावी ​ढंग से निपटाते हैं।
हिन्द महासागर क्षेत्र में शांति, स्थिरता और समृद्धि के विकास को बढ़ावा दे सकता है। ​आईओआर क्षेत्र में ​भारत की ​7500 किलोमीटर​ लम्बी विशाल तट रेखा ​है, इसके कारण ​भारत इन ​सभी देशों के ​साथ ​शांतिपूर्ण और समृद्ध सह-अस्तित्व के लिए सक्रिय भूमिका ​निभाना चाहता है​​।


अगर फ़्लैश बैक में जाएं तो हम पाएंगे कि इस पूरे आईओआर क्षेत्र को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कितना तवज्जो देते है, इसे महज इसी बात से समझा जा सकता है कि अपने दूसरे कार्यकाल सम्भालने के महज सप्ताह भर बाद कूटनीतिक गहमागहमी की शुरुआत उन्होंने हिन्द महासागर के गर्म होते पानी और देर से आते मानसून के बीच बीते पचास घंटो में मालदीव और श्रीलंका की अत्यधिक व्यस्तता भरी राजकीय यात्रा से की थी।

आईओआर देशों का सामरिक और रणनीतिक महत्व:

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भूगोल की सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है,यह भूगोल ही जो जो 1200 से ज्यादा बेतरतीब फैले कोरल द्वीपसमूह और महज पांच लाख से कम जनसंख्या वाले मालदीव और छोटे से द्वीप श्रीलंका, मॉरीशस,सेशेल्स,ओमान,जिबूती यमन,सोमालिया आदि द्वीपीय राष्ट्र को 21वीं सदी की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अत्यधिक रणनीतिक महत्व प्रदान करता है।

ये देश विश्व के व्यस्ततम समुद्री नौवहन मार्ग पर अवस्थित है , जो पूरे विश्व को सही मायने में ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं।
जब हम बेतरतीब फैलाव वाले आबादी रहित द्वीपों की बात करते हैं तो यहां प्रशासन चलाना टेढ़ी खीर हो सकती है लेकिन सामरिक,रणनीतिक और लॉजिस्टिक के विभिन्न दृष्टिकोण से इन कटे छंटे द्वीप समूह  बेहद महत्वपूर्ण और मुफ़ीद माने जाते है।

हिन्द महासागर क्षेत्र के कई द्वीपीय देशों के पास उनकी मुख्य भूमि के अतिरिक्त्त अत्यधिक संख्या में कटे छंटे द्वीप है, ये सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण और सुरक्षा की दृष्टि से बेहद सुभेद्य है।
इन तितर बितर द्वीपों पर चीन सहित अन्य महाशक्तियां अपनी पैनी नजर गड़ाये हुए है। अपनी भौगोलिक स्थलाकृतियों और मरीन टोपोग्राफी के कारण ये द्वीप/द्वीपो की श्रृंखला एक बेहतर मत्स्यन क्षेत्र/भंडार, बेहतरीन पर्यटन स्थल, समुद्र में आयोजित होने वाले साहसिक खेल के स्थल जिसमे स्कूबा डाइविंग से पैरासेलिंग तक शामिल है।

लेकिन इसके सामरिक और रणनीतिक पहलू पर गौर करें तो ये दंतुरित द्वीप : एक बेहतरीन नेवल एसेट, सबमरीन हाईड आउट्स (पनडुब्बियों के छुपने के गुप्त स्थान), विशेषीकृत और उच्च सैन्य प्रयोगशाला, केमिकल बायोलॉजिकल और न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा स्थल,विशेष बलों के सेफ हाउस और डिटेंशन सेंटर,सैटेलाइट लिस्निंग स्टेशन,लम्बी दूरी के निगरानी के लिए राडार केंद्र,रणनीतिक मौसम पूर्वानुमान राडार केंद्र, मिसाइल लांच पैड्स ,मिसाइल बैटरी और डिपो,आपातकालीन कॉलिंग ऑन पोर्ट,विशेषीकृत आसूचना केंद्र, एन्टी पाईरेसी अभियान को अंजाम देने वाले विशेष बलों के ठिकाना,कोस्टल रडार सर्विलेंस सिस्टम का आधार शिविर, बेहद गुप्त ( Highly Classified)और एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्टेड संचार के लिए समर्पित केंद्र आदि हो सकते है।

इन द्वीपों की यही खासियत चीन समेत अन्य देशों को लुभाती है जिसके लिए वे हर वक्त तत्पर दिखते हैं, आज भी करीब करीब सभी महाशक्तियों के हम "ओवरसीज टेरिटरी' को आज भी देखा जा सकता है,जिसका बेहतरीन उदाहरण मालदीव के समीपस्थ हिन्द महासागर में अवस्थित ब्रिटिश अमेरिकी एयरफोर्स और नेवी का बेस डिएगो गार्सिया है।

क्रमशः ....(1/2)...



मिशन पोषण 2.0 और बजट 2021-22

 मानव पूंजी और मानव विकास के लिए बेहतर स्वास्थ्य एक आवश्यक शर्त है और बेहतर स्वास्थ्य के लिए बेहतर पोषण का मिलना अति आवश्यक शर्त है। भारत में कुपोषण की चुनौती से निपटने के लिए पोषण को एक महत्वाकांक्षी मिशन के रूप में लेने की आवश्यकता है।

भारत सरकार ने 2021-22 वर्ष के बजट में मिशन पोषण 2.0 की शुरुआत करने की प्रस्ताव/घोषणा की है जिसके तहत पोषणगत मात्रा, डिलीवरी, आउटरीच तथा परिणाम को सुदृढ़ बनाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया।

इसके अतिरिक्त भारत सरकार ने संपूरक पोषण कार्यक्रम और पोषण अभियान का विलय करने का निर्णय वर्ष 2021-22 के बजट में किया है।
इस बजट में पोषणगत परिणामों में व्यापक सुधार लाने के लिये एक सुदृढ़ीकृत कार्यनीति अपनाने की प्रस्ताव दिया गया है।

जिसके तहत सरकार देश के कुल112 आकांक्षी जिलों (एस्पिरेशनल डिस्ट्रिक्ट) में पोषण संबंधी परिणामों को और बेहतर करने के लिए एक गहन रणनीति अपनाएगी।

इसी मद में हालिया प्रस्तुत बजट में महिला और बाल विकास मंत्रालय को आवंटित 24,435 करोड़ रुपये में से सक्षम आंगनवाड़ी और पोषण 2.0 को 20,105 करोड़ रुपये की राशि आवंटित किया गया।

क्या है आकांक्षी जिला कार्यक्रम:
देश में सुशासन
और अभिशासन को मूर्त रूप प्रदान करने की दिशा में एक नवीन संकल्पना है
इस कार्यक्रम के जरिये भारत में व्याप्त क्षेत्रीय विषमता को कम करने तथा आर्थिक विकास में वृद्धि करने की दृष्टि से सरकार की एक महत्त्वपूर्ण पहल है।
यह कार्यक्रम विभिन्न राज्यों एवं ज़िलों के मध्य एक सकारात्मक प्रतिस्पर्द्धा के माध्यम से स्वयं को अधिक विकसित करने पर ज़ोर देकर प्रतिस्पर्द्धात्मक संघवाद पर विशेष बल देता है।


भारत में पोषण अभियान (राष्ट्रीय पोषण मिशन)

भारत सरकार द्वारा "कुपोषण" को समूल जड़ से उखाड़ने के लिए "लाइफ साइकल एप्रोच" कार्यप्रणाली को अपनाकर इसे चरणबद्ध रूप से पोषण अभियान चलाया जा रहा है।

राष्ट्रीय पोषण मिशन का गठन : केंद्र सरकार द्वारा 0 से 06 वर्ष तक के बच्चों एवं गर्भवती एवं धात्री माताओं के स्वास्थ्य एवं पोषण स्तर में समयबद्ध तरीके से सुधार हेतु महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय पोषण मिशन का गठन किया गया है।


विश्व स्वास्थ्य संगठन, विश्व बैंक और यूनिसेफ के नवीनतम अध्ययन के मुताबिक, विश्व में करीब 24 फीसद बच्चे कुपोषित हैं। इन में  90 फीसद कुपोषित बच्चे एशिया और अफ्रीका महाद्वीप में हैं । 
आंकड़ों पर ध्यान दें तो हम पाते हैं कि : कुपोषण की वजह से भारत के 43 फीसदी बच्चे कम वजन और 48 फीसदी बच्चे ठिगनेपन के शिकार हैं।
दुनिया के 10 ठिगनेपन के शिकार बच्चों में तीन बच्चे भारत में हैं। सितंबर 2015 में भारत समेत दुनिया के 193 देशों ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को अंगीकार किया था, इसके तहत वर्ष 2030 तक दुनिया के सभी देशों को कुपोषण की समस्या से मुक्त करने का लक्ष्य रखा गया था।


राष्ट्रीय पोषण मिशन का उद्देश्य एवं लक्ष्य : राष्ट्रीय पोषण मिशन के अर्न्तगत देशव्यापी कुपोषण को चरणबद्ध तरीके से दूर करने के लिए आगामी 03 वर्षों के लिए लक्ष्य निर्धारित किये गये हैं-

1. दो से छः वर्ष के बच्चों में ठिगनेपन से बचाव एवं इसमें कुल 6 प्रतिशत,(प्रति वर्ष 2%की दर से) कमी लाना।

2. दो से छः वर्ष के बच्चों का अल्प पोषण से बचाव एवं इसमें कुल 6 प्रतिशत,( प्रति वर्ष 2%की दर से) कमी लाना ।

3. छः से 59 माह के बच्चों में एनीमिया के प्रसार में कुल 9 प्रतिशत( प्रति वर्ष 3%की दर से) कमी लाना।

4.15 से 49 वर्ष की किशोरियों, गर्भवती एवं धात्री माताओं में एनीमिया के प्रसार में कुल नौ प्रतिशत( प्रति वर्ष 3%की दर से )कमी लाना ।

5. कम वजन के साथ जन्म लेने वाले बच्चों की संख्या में कुल छह प्रतिशत( प्रति वर्ष 2%की दर से) कमी लाना ।


राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएचएफएस) के  पहले चरण के दौरान सर्वेक्षण के आंकड़ों में देश के 22 राज्यों में से 16 राज्यों में 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों कम वजन और उम्र के अनुसार कम लंबाई एवं शारीरिक वृद्धि दर्ज की गई। 

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) 2019-20 के पहले चरण के आंकड़ों में 17 राज्यों की बाल कुपोषण की स्थिति स्पष्ट की गयी है। कई राज्य बाल कुपोषण (पांच वर्ष के नीचे) के कई मानकों में नीचे चले गए हैं।

बाल कुपोषण के ये मानक निम्नलिखित हैं -

चाइल्ड स्टंटिंग, चाइल्ड वेस्टिंग, चिल्ड्रेन अंडरवेट और चाइल्ड मॉर्टलिटी रेट (शिशु मृत्यु दर)। उल्लेखनीय है कि बाल कुपोषण के उक्त मानकों का ग्लोबल हंगर इंडेक्स जैसे कई वैश्विक सूचकांकों में उपयोग किया जाता है।

चाइल्ड वेस्टिंग (बच्चों में दुबलापन) मानक में बच्चों की लंबाई के अनुपात में उसका वजन (बॉडी मास इंडेक्स-BMI) मापा जाता है।
भारत में चाइल्ड वेस्टिंग की दर पहले से ही ज्यादा रही है। विभिन्न उपायों के बावजूद भारत में चाइल्ड वेस्टिंग की दर कम होने की बजाय बढ़ रही है।
कई राज्यों जैसे तेलंगाना, केरल, बिहार, असम और केंद्र शासित प्रदेश जम्मू-कश्मीर प्रदेश में चाइल्ड वेस्टिंग की दर में इजाफा हुआ है।

चाइल्ड स्टंटिंग (बच्चों में नाटापन या कम लम्बाई) मानक में उम्र के अनुपात में बच्चों की वृद्धि मापी जाती है। सर्वेक्षण के आँकड़ों के मुताबिक तेलंगाना, गुजरात, केरल, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में चाइल्ड स्टंटिंग का अनुपात बढ़ा है।

इन्फेंट मॉर्टलिटी रेट (शिशु मृत्यु दर) : प्रति 1000 जीवित जन्मे बच्चों में से एक वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मौत की संख्या को प्रदर्शित करता है।
यह जन्म (1-5 आयु वर्ग) पर होने वाली मौत की संख्या है। सर्वेक्षण के आँकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2015-19 की अवधि में इस मानक में भी कोई खास सुधार नहीं हुआ है।


चिल्ड्रेन अंडरवेट (बच्चों की लम्बाई की तुलना में कम वजन) के मामले में बच्चों की लंबाई के अनुपात में उसका वजन जिसे बॉडी मास इंडेक्स-BMI में मापा जाता है। इसमें भी कई बड़े राज्य जैसे गुजरात, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, असम और केरल में बढ़ोतरी दर्ज हुई है।

यूनिसेफ के अनुसार दुनिया भर में एक साल में पैदा होने वाले कुल 2.5 करोड़ बच्चों का लगभग पांचवां हिस्सा भारत में जन्म लेता है। इन शिशुओं में से हर मिनट एक शिशु की मृत्यु हो जाती है।

सभी मातृ मृत्युओं में से लगभग 46 प्रतिशत और नवजात शिशुओं की 40 प्रतिशत मृत्यु, प्रसव के दौरान या प्रसव के बाद 24 घंटे के अंदर होती है।

नवजात शिशुओं की मृत्यु के प्रमुख कारणों में समय से पहले प्रसव (35 फीसदी), नवजात शिशु को संक्रमण (33 फीसदी), प्रसव के दौरान दम घुटना (20 फीसदी) और जन्मजात विकृतियां (9 फीसदी) हैं।

भारत में लगभग 35 लाख बच्चे असामयिक (सही समय से पहले) जन्म लेते हैं, 15 लाख बच्चे विकार लेकर पैदा होते हैं, और हर साल 10 लाख बच्‍चों को विशेष नवजात शिशु देखभाल इकाइयों (एसएनसीयू) से छुट्टी दी जाती है। ऐसे नवजात शिशुओं को मृत्यु, स्टंटिंग और विकास में देरी का बहुत अधिक जोखिम होता है

भारत में इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन के मुताबिक़ स्टंटिंग की समस्या ज़िले स्तर पर अलग-अलग है। 40% जिलों में स्टंटिंग का स्तर 40% से ऊपर है इसमें उत्तर प्रदेश इस सूची में अव्वल ।

वहीं इंडिया स्टेट लेवल डिज़ीज बर्डन इनिशिएटिव’’ रिपोर्ट में किये एक अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2000 से भारत में पांच साल की उम्र तक के बच्चों में मृत्युदर 49 प्रतिशत घटी है लेकिन राज्यों के बीच इसमें छह गुना तक और जिलों में 11 गुना तक अंतर है। रिपोर्ट मुताबिक, वर्ष 2017 में भारत में पांच साल से कम उम्र के 10.4 लाख बच्चों की मौत हुई जिनमें से 5.7 लाख शिशु थे।

ओआरएफ के आंकड़ों के अनुसार: 

भारत में 5 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत का एक बड़ा कारण कुपोषण बना हुआ है।
इससे वर्ष 2015 में लगभग पांच लाख मौतें हुई। भारत दूसरे दक्षिण एशियाई देशों के मुकाबले भी पोषण के लिहाज से काफी पीछे है जैसा कि हमें नीचे के ग्राफ- ठिगनापन (उम्र के मुकाबले कम लंबाई) में देख सकते हैं।
भारत में ठिगनापन तो कुपोषण की गंभीर समस्या का महज एक पहलू है। 

महिलाओं में व्यापक तौर  एनीमिया, दुबलापन, बहुत बड़ी संख्या में बच्चों का कम वजन के साथ पैदा होना, ज्यादा वजन और मोटापे की तेजी से बढ़ती समस्या तथा छह महीने तक सिर्फ स्तनपान पाने वाले बच्चों की कम संख्या इस समस्या को और विकराल बना देते हैं।

भारत में पोषण संबंधी नीति के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में कुपोषण और सूक्ष्म पोषक तत्व की कमी की समस्या को दूर करना के साथ ही अधिक पोषण की वजह से पैदा हो रही 
लाइलाज बीमारियों की तेजी से बढ़ती समस्या भी है। 

नीति संबंधी दस्तावेज मानते हैं कि कम पोषण की वजह से बच्चों में मानसिक विकास कमजोर पड़ सकता है और आगे चल कर उनकी उत्पादकता प्रभावित हो सकती है।

जरूरत है कि भारत में पोषण की स्थिति को बेहतर करने के लिए खास तौर पर उन कारकों पर ध्यान देना होगा जिनकी वजह से पोषण की स्थिति तय होती है। 

पोषण से जुड़े एसडीजी लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पोषण से सीधे जुड़े और इसे प्रभावित करने वाले मामलों में तेज रफ्तार से दखल देना होगा।

इससे भारत को अपने बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने में मदद मिलेगी। युवा लाभांश की वजह से जो बढ़त हासिल है, उसका वास्तविक लाभ उठाने का मौका मिल सकेगा। यह बेहद जरूरी है कि स्वास्थ्य और पोषण संबंधी नीतियां शासन के हर स्तर पर आपस में जुड़ी हुई हों। इसके साथ ही पोषण को प्राथमिकता में लाने के लिए बेहतर प्रशासन और मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति भी जरूरी है।

 उम्मीद है कि आने वाले वर्षों के दौरान में सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) के रूप में भारत के सामने एक मौका है जहां वह पोषण को ले कर अपनी रणनीति में आमूल चूल बदलाव लाते हुए आने वाले दशकों में स्वस्थ्य,संपन्न समृद्ध और नूतन युवा जनसांख्यिकी लाभांश युक्त सशक्त मेधावी और प्रतिभा सम्पन्न भारत का निर्माण कर सके ।