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Monday, December 06, 2021

रूस: भारत का विशिष्ट साझेदार

डिप्लोमेटिक दिसम्बर

भारत में शीत ऋतु दस्तक दे चुकी है और कैस्पियन सागर की नमी लेते हुए पश्चिमी विक्षोभ अपने तयशुदा मार्ग के जरिये भारत में प्रवेश कर गया है ,अगर सब कुछ "आशानुरूप रहा "तो यह  तो यह सर्द माह भारतीय राजनय और सामरिक हितों के रूप से बेहद गर्माहट भरा रहेगा और जिसकी गर्मी को वास्तविक नियंत्रण रेखा और नियंत्रण रेखा वाले हमारे पड़ोसी स्पष्ट रूप से महसूस करेंगे।

कोविड19 महामारी के नए वैरियंट ऑफ कंसर्न ओमिक्रोन से दुनिया भर में दहशत और मचे हड़कम्प से बेफ़िक्र रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर अपने संक्षिप्त दौरे पर सोमवार को नई दिल्ली आ रहे हैं।


वैश्विक राजनय और सामरिक विशेषज्ञों की तिरछी नजर तो इस यात्रा पर रहेगी ही,वहीं इस्लामाबाद- रावलपिंडी के साथ गलबहियां करते चीन की बेचैनी किसी से छिपी नहीं और बिडेन प्रशासन के खड़े होते कान और फूफा की तरह मुंह फुलाये रहने के बाद,अब इनकी पूरी निगाह राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन की महज छः घण्टे की भारत यात्रा और 2+2 वार्ता से निकले  अंतिम वक्तव्यों पर ही टिकी रहेगी।




एजेंडा:

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत की आधिकारिक यात्रा पर सोमवार को दिल्‍ली पहुंचेंगे। जहां वे 21वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ हिस्सा लेंगे। दोनों नेता द्विपक्षीय संबंधों की व्यापक संभावनाओं की समीक्षा और परीक्षा करेंगे तथा साथ साथ सामरिक रणनीतिक साझेदारी को और मजबूत करने के विभिन्न उपायों पर चर्चा करेंगे।

 यह सम्मेलन दोनो देशों के आपसी हित के क्षेत्रीय,बहुपक्षीय और अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर विचारों का प्रतिनिधिमंडल स्तरीय  आदान-प्रदान होगा।

 इसी कड़ी में दोनों नेता बंद कमरे में आमने-सामने बातचीत भी करेंगे।

सोमवार को जब रूस के रक्षा और विदेश मंत्री भारत में अपने समकक्षों के साथ मंच साझा करेंगे तो यह भारत के टू प्लस टू फ्रेमवर्क में आने वाले चौथा देश होगा। अब तक इस तरह की वार्ता में अमेरिका,जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।



रूस में तेजी से बढ़ते कोरोना के मामले और यूक्रेन सीमा पर भारी सैन्य जमावड़े के बीच राष्‍ट्रपति पुतिन का भारत आने का फैसला दोनो देशों के रिश्तों के लिए बेहद सकारात्मक संकेत है।

संभवत: घरेलू संकट और अपनी अन्य व्यस्तताओं की वजह से संभवतः राष्ट्रपति पुतिन ने भारत सिर्फ कुछ घंटे गुजारने का फैसला किया ,लेकिन राष्ट्रपति पुतिन की यह यात्रा भारत व रूस के पारंपरिक रिश्तों में ढलान आने के विरोधियों के तमाम कयासों को विराम देने वाली सिद्ध होगी।

यह कयास खासकर तब ज्यादा बलवती हो गयी थी जब पुतिन की तरफ से दिसंबर 2019 की प्रस्तावित यात्रा को टाल देना, विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव का बतौर रूस के विदेश मंत्री पहली बार पाकिस्तान की यात्रा करना, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन को रूसी साथ  अमेरिका से भारत की बढ़ती सामरिक नजदीकियां, क्वाड का औपचारिक गठन आदि के चलते विरोधियों के बीच यह कयास लगाए जा रहे थे कि भारत व रूस के बीच रिश्तों में अब वह पुरानी गर्माहट नहीं रहेगी।


भारत रूस के राजनय,सामरिक और रणनीतिक  सम्बन्धों की दृष्टि से यह सम्मेलन वर्षांत का सबसे बड़ा राजनीतिक जमावड़ा है। । राष्ट्रपति पुतिन की कोविड-19 के बाद यह उनकी इन-पर्सन यह पहली विदेश यात्रा है।इससे पहले वे राष्ट्रपति बिडेन से हेलसिंकी में आमने सामने मुलाकात की थी।



भारत और रूस संबंध।

भारत और रूस के संबंधों को सामान्यतया ऐतिहासिक, आपसी विश्वास और आपसी एवं पारस्परिक समझ पर आधारित है और बिना किसी "लाभ हानि"की चिंता किये ये दोनों देश समय के क्रूर पहिये पर पड़ोसी की "आल वेदर फ्रेंडशिप" के फ़र्ज़ी दावे से कहीं सुदूर  "अपने आप मे अनूठी "(sui generis) दोस्ती को दर्शाती है।

दूसरे शब्दों में आप "भारत और रूस के बीच एक विशिष्ट और विशेषाधिकार प्राप्त साझेदारी हैं"के रूप में देख सकते हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस के भारत के साथ संबंधों का जिक्र करते हुए कहा था कि..


"भारत का हर व्यक्ति और बच्चा तक यह जानता है कि रूस भारत का महानतम मित्र है।"

और .
"रुस और भारत के रिश्ते सरकार और राजनेताओं के नहीं, दोनों देश की जनता के दिल के रिश्ते हैं "

वहीं  राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी दोनो देशों के आपसी रिश्तों को लेकर कहा था कि...
"हम भारत की कीमत पर किसी से दोस्ती नहीं कर सकते' ब्लादिमीर पुतिन।

"समय बदला है, लेकिन भारत के साथ हमारी दोस्ती में कोई बदलाव नहीं आया है"-राष्ट्रपति पुतिन.

जबकि भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने दोनो देशों के रिश्तों के बारे में एक कार्यक्रम में कहा था कि...

''विश्व बदल रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनय में भारत और रूस के संबंध समय पर खरे,सदैव अचर,स्थिर,और स्थाई रहें हैं।

महाशक्तियों की आंखों में खटकता यह रिश्ता:आखिर क्या कहलाता है।

इन दोनो देशों के इस अनूठे सम्बन्धो को बिगाड़ने,तोड़ने,मरोड़ने,खटास पैदा करने,के साथ साथ धमकाने,आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने,तक जैसी ओछी हरकत करने से पश्चिमी देश और अमेरिकी नीत महाशक्तियां और इनके पुछल्ले देश बाज़ नहीं आये लेकिन भारत रूस के यह समय आधारित और विश्वसनीय संबध इन सबकी कुटिल चालों से सदा ऊपर उठकर रही।


ऐतिहासिक रूप से देखें तो यह संबंध तो 1468 से 1472 के बीच जब रूसी यात्री अफनसे निकितिन ने फारस और  ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्र से होते हुए भारत की यात्रा की और अपनी कृति khozheniye za tri morya (द जर्नी बियॉन्ड थ्री सी) लिखा तब से ही व्यापक हो चुके थे। मॉस्को,सेंट पीटर्सबर्ग, व्लादिवोस्तक,सेंट पीटर्सबर्ग यकेतेरिनबेर्ग और नोवोसिबिर्स्क,अस्त्रखान से हमारे बहुआयामी सम्बन्ध तो आदि काल से रहे है।
जिसे हमने गंगा- वोल्गा ब्रह्मपुत्र -मस्कवा ,रुपये-रूबल,टैगोर-गोर्की,चेखोव-प्रेमचंद
दिनकर-पुश्किन,राहुल-दोस्तव्स्की,इसरो-रॉस्कोसमोस,बार्क-रॉसएटम,एचएएल-रोसोबोरोनएक्सपोर्ट,के जरिये सांस्कृतिक,साहित्यिक, सामरिक,तकनीकी और आर्थिक सम्बन्ध को मजबूत बनाया है।
रांची,भिलाई,बोकारो,हल्दिया,मथुरा सहित कई अन्य औद्योगिक शहर,के औद्योगिकीकरण में कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी,बस आप नाम लेकर आप अपनी आंखें बंद कीजिए रूस का योगदान आपके जेहन में बर बस सामने आएगा।

नेहरू-निकिता,शास्त्री इंदिरा-ब्रेझनेव,राजीव,राव-येल्तसिन,बाजपेयी-प्रिमिकोव सुषमा-लावरोव-
जयशंकर ,अलेक्जेंडर कदाकिन के साथ अब नरेंद्र मोदी व्लादिमीर पुतिन के साथ इस अनन्य राजनीतिक और राजनयिक सम्बन्धों को आगे बढ़ा रहे हैं। व्लादिमीर पुतिन तत्कालीन अस्थिर राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन से कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन और फिर अब स्थिर भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शीर्ष नेतृत्व को देख,समझ और परख चुके हैं

मास्को के प्रसिद्ध सर्कस,लचीली जिम्नास्ट,राज कपूर की लाल टोपी, विश्वनाथन आनन्द और गैरी कास्पोरोव, मरात साफ़िन,दिनारा सफ़ीना,अन्ना कुर्निकोवा से मारिया शारापोवा,एके 101 और वर्तमान एके 203,असॉल्ट राइफल, सुखोई 30,ईल्युशिन,कामोव,टुपोलोव अंटोनोव श्रेणी की चौकड़ी,भीष्म,पिनाका,अरिहंत,विक्रमादित्य,चक्र औऱ मिग बाइसन-अभिनंदन के साथ  सबसे उन्नत वायु रक्षक प्रणाली एस-400 की जोड़ी
दोनो देशों के सांस्कृतिक,सामरिक एवं रणनीतिक संबंधों को बयां करती ।


ये चंद उदाहरण है जिसे आप भारतीय विदेश मंत्री के उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि होती है और इस विशेष सम्बन्धों वाले दोनों देशों की रिश्ते से चिढ़ कर अपना सर नोचने वाले पश्चिमी और अपने पड़ोसी देशो के लिये भारत रूस के सम्बन्ध, एक सीख है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक में राजनय और दोस्ती को कैसे साथ लेकर चला जाय।


अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनय की कॉपी बुक स्टाइल तो यही कहती है कि "जो आप कहते है उससे कहीं ज्यादा ध्यान उस पर दिया जाना चाहिए जो आप नहीं कहते है"भारत के साथ रूस की कमोबेश यही स्थिति बरकरार रही है।
वैश्विक राजनय में रूसी वापसी।

ग्लॉसनोस्त और पेरेस्त्रोइका से आगे निकलते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन की "वोस्तानॉवलेनये (रिस्टोरेशन )की  अभिनव  नीति और अपने सुदूर पूर्व पूर्वी क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध कार्यक्रम के साथ साथ बदलते विश्व में,साइबर प्री एम्प्टेशन,रिमोट संचालित ड्रोन वारफेयर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित रोबोटिक वेपन सिस्टम,स्पेस बेस्ड वेपन प्लेटफार्म,हाईपरसोनिक ग्लाइड मिसाइल,क्लीन माइक्रो थर्मोन्यूक्लिअर बम और हाइब्रिड वारफेयर के दौर में रूस ने अपनी कामयाबी को "प्रिमिकोव डॉक्ट्रिन और ग्रसिमोव  डॉक्ट्रिन" के जरिये हासिल किया है,।


चाहे,सीरिया में रूसी वायुसेना नौसेना और स्पेतज़नाज़  की तैनाती हो या फिर साथ बशर अल असद का अमेरिकी कोप से बचाव हो,या फिर क्रीमिया और काला सागर में रूसी नौसैनिक प्रभुत्व,पूरे यूरोप की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाली नोर्ड स्ट्रीम-2 गैस पाइप लाइन की सफलतापूर्वक शुरुआत, अफगानिस्तान के मसले पर चतुराई भरी रणनीतिऔर अब यूक्रेन की सीमा पर भारी सैन्य तैनाती और हालिया जापान से लगे अपनी सीमा साझा करती क्यूराइल द्वीप समूह पर आण्विक मुखास्त्र तैनात करने का मसला हो , या आर्कटिक क्षेत्र में अमेरिकी धौंस अब रूस अमेरिका सहित उसके पुच्छले देशों को सिर्फ आंख ही नहीं दिखता बल्कि क्षेत्र से खदेड़ने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ता है।

रूसी चाहत

रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी सदा लुभाता रहा है।चेन्नई -व्लादिवोस्तक मार्ग के संचालित होने के बाद प्रशांत महासागर का हिन्द महासागर में मिलन हो सकेगा और चीन रूस के आगोश में शांति से रह सकेगा।इस समुद्री मार्ग के जरिये ही भारत -वियतनाम -रूस की त्रिपक्षीय नवीन संकल्पना को मूर्त प्रदान किया जा सकेगा। इससे आसियान देशों के लिए भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एक्सटेंडेड ईस्ट पॉलिसी में रूसी सहयोग बढ़ेगा। ये दोनों देश ब्रिक्स,एससीओ,आरआईसी आदि सहयोगी मंचो पर विद्यमान है।इसी कड़ी में रूस का आसियान देशों के साथ हालिया नौसैनिक सहयोग भी बेहद अहम है।

सम्बन्ध सुधारने की और जरूरत.

रूस के साथ द्विपक्षीय संबंध को गति देने के लिए भारत को रणनीतिक आण्विक और सामरिक सम्बन्ध के साथ साथ अन्य आर्थिक व्यापारिक गतिविधि को और बढ़ावा देना पड़ेगा। दोनो देशों के बीच कई मुद्दों पर अभी और भी सक्रियता के साथ इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार से कहीं ऊपर उठकर क्रियान्वयन करने की जरूरत है। इन मुद्दों में सबसे प्रमुख हैं व्यापारिक कनेक्टिविटी ,भौगोलिक दूरी,विदेशी निवेश संबंधी कानून,कमजोर बैंकिंग व्यवस्था,नीतिगत विषमता,रूस की वीजा रेस्ट्रिक्ट नीति आदि मसलों पर ध्यान देने की विशेष जरूरत है। 

भौगौलिक दूरी दोनो देशों के बीच व्यापार और व्यापार असंतुलन की सबसे बड़ी बाधा है,जिसे इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग पर तीव्रता से व्यापारिक रूप से व्यवहारिक बनाना होगा जिससे स्वेज नहर पर इनकी निर्भरता कम हो सके और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता,मुक्त व्यापार मंच जैसे यूरेशियन इकनोमिक यूनियन आदि मसलों पर बेहद संजीदगी के साथ पेश आना होगा।
ट्रेड वॉर,अमेरिकी कड़े होते वीजा नीति, अमेरिकी डिग्लोबलाइजेशन नीति,अमेरिका की रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और संरक्षणवाद,चीन की ग्लोबलाइजेशन 2.0 विथ चाइनीज करेक्टर के इस दौर भारत और रूस को चाहिए कि बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य में साथ मिलकर आगे आते हुए इन आर्थिक अवसरों लाभ  उठाने की आवश्यकता है।

हिन्द प्रशान्त क्षेत्र की बदलती जरूरतें,अफगानिस्तान में अमेरिकी वापसी और इस क्षेत्र में बढ़ता रूसी वर्चस्व,
पश्चिम एशिया में सीरिया पर प्रभावी रूसी करवाई,ईरान के साथ अमेरिकी टकराहट,यूक्रेन की सीमा पर भारी सैन्य जमावड़ा आदि मसलों पर रूस को भारत की सख्त जरूरत होगी ।

विथ लव फ्रॉम इंडिया : रसियन रोमांस.

ग्रेट पैसिफिक रिम की संकल्पना के बाद "पाइवोट ऑफ एशिया/यूरेशिया" चीन की आक्रमक मेरीटाइम नीति,और बदले हुए  'इंडो पैसिफिक अवधारणा "और रूस अमेरिका के बीच आईएनएफ संधि के बाद खटास होते रिश्ते के,भारत पर रूसी सैन्य हार्डवेयर न खरीदने का अमेरिकी दवाब में भारत का न आना और अत्याधुनिक वायु रक्षक प्रणाली एस 400 को तयशुदा समय पर भारत को सौंपने का रूसी संकल्प निश्चित रूप से इमरान-जिंगपिंग की कुशासन और बिडेन प्रशासन की आंखों की नींद हराम कर चुका है।


भारत और रूस की अत्याधुनिक वायु रक्षा प्रणाली
एस-400 सौदे पर बिडेन प्रशासन खिन्‍न और कुपित है। इससे पूर्व में अमेरिका ने तुर्की द्वारा एस 400 के खरीद पर कई तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन भारत के खिलाफ बिडेन प्रशासन की लाख जतन के बाद भी उनकी दाल नहीं गली,तरह तरह के अमेरिकी दबाव की के बाद भी भारत को जल्द ही एस 400 की दो बैटरी की जल्द ही आपूर्ति होने की प्रबल सँभावना है।
इस मुद्दे पर भारत ने अमेरिका को स्पष्ट रूप से कहा ही यह मिसाइल डिफेंस प्रणाली आक्रमक चीन की नापाक हरकतों को रोकने के लिए बेहद अवश्यम्भावी है। इसकी वजह यह है कि चीन को काबू में रखने के लिए इस भारत की फौरीजरूरत है जिसके बाद अमेरिका के पास कुछ बचता नहीं था।जिसे वह भारत का नाराज करने का जोखिम नहीं ले सकता था। चीन ने भी भारत को एस-400 आपूर्ति पर विरोध दर्ज किया  था,लेकिन, इस मामले में रूस ने उसे स्पष्ट कर दिया था कि भारत और रूस के  बीते सात दशकों  पुराने सैन्य रिश्ते हैं, लिहाजा रूस एस-400 मिसाइल डिफेंस प्रणाली भारत को अवश्य मुहैय्या कराएगा।

अमेरिकी काटसा के विभिन्न प्रावधानों को धता बताते और अमेरिकी प्रतिबन्धों को तवज्जो न देते हुए  भारत ने एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम पर अपने पूर्व में लिए फैसले को कायम  रखा। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार हो सकता है कि इस वार्ता के एस 400 के अति उन्नत और परिष्कृत सँस्करण एस-500 का उपयोग करने वाला भारत सम्भवतः प्रथम देश बन जाय।

इन्ही वजहों से तमाम विशेषज्ञों द्वारा राष्ट्रपति पुतिन की इस यात्रा और रूसी- भारतीय प्रतिबद्धता को बेहद "व्यापक अर्थों " में देखा जा रहा है।

वे मुद्दे जिन पर थोड़ी सी है रूसी असहजता।

रूस क्वॉड से क्यों असहज है.?

विशेषज्ञों के राय में इसके लिए संभवतः दो मुख्य कारण  हो सकते हैं।


1.रूस के हिसाब से भारत का इस समूह में शामिल होना रूस के लिहाज से थोड़ा अटपटा और अनैतिक जैसा  है क्योंकि ऑस्ट्रलिया को एकबारगी छोड़ भी दें तो उसके जापान और अमेरिका से सदैव छत्तीस का आंकड़ा रहा है।

2.संभवतःरूस ऐसा महसूस कर रहा हो  कि ये गठबंधन आगे चल रूस के लिए भी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ख़तरा साबित हो सकता है.'' इस लिए भारत में रूस के राजदूत निकोल कुदशेव ने बीते वर्ष हिंद महासागर में यूरेशियन साझेदारी की पेशकश की थी।

अमेरिका और रूस शीत युद्धकालीन समय से एक दूसरे के धुर विरोधी हैं।अमेरिका क्वॉड में प्रमुख देश के रूप में शामिल है जिसके साथ भारत के विशेष रणनीतिक समझौते शामिल है,सबसे मजेदार बात यह है कि क्वाड के चारों देश चीन की बढ़ती विस्तारवादी नीति और उसकी वुल्फ वारियर राजनय से अनाधिकारिक रूप से सशंकित हैं। चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक,वाणिज्यिक,और ऊर्जा सुरक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा साझेदार देश है,वैचारिक रूप से कभी समानता लिए दोनो देश सामरिक और रणनीतिक क्षेत्र की साझेदारी में कहीं पीछे नहीं हैं।

क्वाड के गठन के बाद से ही रूस को ऐसा लग  रहा था कि भारत के साथ उसके सम्बन्धों में गिरावट आएगी। हमें समझना होगा कि भारत रूस के अपने आप में अनूठे सम्बन्ध समय की तकाज़ा पर बेहद अनुशासन के साथ पुष्पित और पल्लवित हुए है,जिसे हम किसी क्वाड या अन्य गठबंधन की जद में नहीं देख सकते है।
आज रूस सहित तमाम देश मानते हैं कि विश्व का स्वरूप द्विध्रुवीय से कहीं बाहर निकलकर बहुध्रुवीय हो चुका  है और सभी छोटे बड़े देशों की अपनी अपनी भूमिका है।


क्वॉड को लेकर रूस को संभवतः यह भी आशंका है कि यह गठबंधन कहीं अमेरिका नीत न बन जाये और इस समूह का नियत्रंण अमेरिका के हाथ में हो।
जिससे कहीं भारत ''एंटी-रूस ख़ेमे "का हिस्सा न बन जाए और  इंडो-पैसेफ़िक में जो रूसी समुद्री बेड़े  के लिए ख़तरा पैदा हो जाय है"।


यहां रूस को समझना होगा कि भारत के रहते इस क्षेत्र में  रूसी बेड़े की सुरक्षा को लेकर उसे किसी तरह आशंकित होना चाहिए, ,क्वाड में भारत के अलावा तीनो देश रूस भारत के रणनीतिक रिश्तों से भली भांति परिचित है,जिसके कारण अगर उनके मन में अगर कभी ऐसी खुराफाती दुस्साहस करने का मन भी किया तो भी वे भारत को देखकर शांत रहेंगे।  व्यक्तिगत तौर पर मुझे नहीं लगता कि भारत कभी भी रूस विरोधी गतिविधि में शामिल होने के लिए तैयार होगा।

कई विशेषज्ञों की राय में क्वॉड को पूर्णत: चीन से निपटने के लिए बनाया गया है और भारत क्वॉड को इसी रूप में देखता है लेकिन खुल कर कभी भी आधिकारिक रूप से इस बात को नहीं कहता है।

फिर भी अगर किसी तरह की मनमुटाव की थोड़ी सी संभावना नजर आए तो उसे पूरी तरह  मिटाते हुए
यहां शीर्ष नेतृत्व को  स्पष्ट कर देना चाहिए कि...


"अगर,भारत अपने सामरिक,राजनयिक और रणनीतिक संबंध इजराइल,अमेरिका,फ्रांस और अन्य पश्चिमी देशों के साथ प्रगाढ़ कर रहा है तो इसका यह कतई मतलब नहीं कि भारत रूस को दरकिनार कर रहा है। रूस भी अपनी तरफ से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत के साथ जो उसके संबंध हैं जिसे वह उनको गंभीरता से लेता है और चीन के साथ उसके झुकाव को ले संबंध भारत की कीमत पर नहीं फल फूल  सकता है।

हिमालयन क्वाड की चीनी सँकल्पना।

क्वाड की  चुनौती से परेशान चीन अब  "हिमालयन क्वाड"की संकल्पना को मूर्त रूप देने की फिराक़ में है।


बेलारशियन इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रेटेजिक रिसर्च के विश्लेषक यूरी यार्मोलिनस्की ने बीते अप्रैल में एक लेख में कहा कि चीन ‘हिमालय क्वैड’ बनाने की तरफ जा रहा है, जिसमें उसके अलावा नेपाल, पाकिस्तान और अफगानिस्तान शामिल होंगे। चीन इसमें रूस की भी सक्रिय भूमिका चाहता है,जिसे मास्को से अभी तक आधिकारिक अनुमति नहीं मिली है।

भारत रूस और वैश्विक राजनय।

बीते सात दशकों के अगर अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य पर गौर किया जाय तो हम देखते  हैं कि कई देश गृह युद्ध की चपेट  में झुलस गए और बाकी छोड़िए अमेरिकी-फ्रांस जैसे परम् मित्र देशों के रिश्तों में "पीठ में छुरा मारने" वाली गिरावट आई लेकिन,भारत और रूस आज तक बिना खटास के साथ अपनी विशेषीकृत मित्रता निभा रहे हैं।

सर्वविदित है कि भारत के हर मुश्किल में रूस खड़ा रहा है। दुनिया की परवाह किए बिना रूस ने वैश्विक मंच पर भी अपनी दोस्ती निभाई है।

भारत अगर अपने संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ और प्रगाढ़ कर रहा है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रूस को दरकिनार कर देगा. रूस भी अपनी तरफ से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत के साथ जो उसके संबंध हैं वह उनको गंभीरता से लेता है।
चीन के साथ उसके संबंध भारत की कीमत पर नहीं बढ़ रहे हैं।



भारत और मल्टीलेटेरिज्म की संकल्पना।

भारत  और रूस मौजूदा विश्व व्यवस्था में मल्टीलेटेरिज्म और उसके विभिन्न पहलुओं की भूमिका को बदलती विश्व व्यवस्था में बेहद अहम मानते है ,इन मुद्दों पर भी भारत को रूस का साथ मिलने की पूरी गुंजाइश नजर आती है।

जहां भारत का मानना है कि 'सुधारित बहुपक्षवाद' इन समयों में आगे बढ़ने का मार्ग है - विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सुधार। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों पर विचार-विमर्श सदा के लिए एक अभ्यास नहीं हो सकता है जबकि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और वैधता का क्षरण लगातार जारी है।
भारत कमोबेश सभी मंचो से मुखर स्वर में यह सदैव कहता रहा है।


भारत अगर अपने संबंध अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ और प्रगाढ़ कर रहा है तो इसका यह मतलब नहीं कि वह रूस को दरकिनार कर देगा.रूस भी अपनी तरफ से यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि भारत के साथ जो उसके संबंध हैं वह उनको गंभीरता से लेता है और चीन के साथ उसके संबंध भारत की कीमत पर नहीं बढ़ रहे हैं।

यहां एक बात पर गौर किया जाना है कि स्वर्णिम विजय वर्ष में राष्ट्रपति पुतिन की बेहद संक्षिप्त भारत यात्रा,बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में रूस की भूमिका किसी से छिपी नहीं है,वहीं संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस ने 1961 में अपने 99वें वीटो का इस्तेमाल भारत के लिए किया था जो गोवा के मसले पर था। वहीं 22 जून, 1962 को रूस ने अपने सौवें वीटो का भी इस्तेमाल कश्मीर मुद्दे पर भारत के समर्थन में किया।


ओले होल्स्ती का प्रसिद्ध कथन है कि  "अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों के सिद्धान्त रंगीन धूप के चश्में की एक जोड़ी के रूप में कार्य करते हैं, जो उसे पहनने वाले व्यक्ति को केवल मुख्य सिद्धान्त के लिए प्रासंगिक घटनाओं को देखने की अनुमति देता है "

हम जानते हैं कि अंतर्राष्ट्रीय राजनीति का स्वरूप बेहद परिवर्तनशील होता है। वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के परिवेश, ट्विटर डिप्लोमेसी के चलते इनके बदले कारकों व तेजी से बदलते घटनाक्रम में व्यापक परिवर्तन आया है।

जिस तरह इन दोनो देशों के राजनय व्यवहार,कार्यप्रणाली एवं दृष्टिकोणों में भी आमूलचूल परिवर्तन आये है,वहां यह समझने की आवश्यकता है कि यह परिवर्तन स्थाई न होकर निरंतर परिवर्तनशील है,क्योंकि अंतराष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता है,केवल हित,राष्ट्रहित सर्वोपरि होता है। पुतिन और मोदी का राष्ट्र प्रेम किसी से छिपी हुई अवधारणा नहीं है,इसलिए हम इन दोनों राजनेताओं से एक बेहतर भविष्य की कामना कर सकते हैं,चूंकि राष्ट्रीय हित साधारण,दीर्घकालीन तथा निरंतर बना रहने वाला उद्देश्य है,जिसे राष्ट्र इस हित की सिद्धि के लिए अनवरत प्रयासरत रहते हैं ।










Friday, June 25, 2021

Roar of रशियन बीअर

 काला सागर में ब्रिटिश डेस्ट्रॉयर ने रूसी समुद्री सीमा का अतिक्रमण और रूस की कठोर कार्रवाई से यूरोप में बवाल मच गया।

रूस और ब्रिटेन के बीच काला सागर में पानी गर्म होने के साथ साथ रूस और ब्रिटेन के बीच तनाव अपने चरम पर पहुंच गया है और अब रूस ने दो टूक शब्द में कहा है कि अगर काला सागर में ब्रिटेन ने दोबारा अपना नौसैनिक पोत भेजने की जुर्रत की तो इस बार रूस चेतावनी नहीं बल्कि ब्रिटिश जहाज को डूबो देगा।


रूस ने मास्को में ब्रिटिश राजदूत को औपचारिक तौर पर
 तलब किया और कहा कि ब्लैक सागर पर रूस का अधिकार है, जबकि यूरोपीय देशों का कहना है कि काला सागर पर यूक्रेन का अधिकार है और काला सागर को लेकर रूस के साथ ब्रिटेन और अमेरिका के बीच भारी तनाव है।

बहरहाल, शीत युद्ध के बाद यह पहली दफा है जब रूस ने ब्रिटिश युद्धपोत को रोकने के लिए बमबारी की है।यह घटना रूस और पश्चिमी देशों के बीच बढ़ते तनाव को दर्शाती है।


पृष्ठभूमि: रूस के रक्षा मंत्रालय ने कहा कि काला सागर में ब्रिटिश विध्वंसक पोत बीते बुधवार तमाम रूसी चेतावनियों को नजरअंदाज करते हुए रूसी जल सीमा में करीब तीन नॉटिकल मील तक अंदर घुस आया था। इस नाटकीय घटनाक्रम के बाद इस क्षेत्र में पहले से सजग और गश्त लगा रहे 
रूसी एफसबी कोस्ट गार्ड(FSB Coast Guard)के गश्ती जहाजों और रूसी लड़ाकू बमबर्षक Su-24M और Su-30SM ने ब्रिटिश विध्वंसक पोत (डेस्ट्रॉयर) एचएमएस डिफ़ेंडर को चेतावनी देते हुए और उसके मार्ग में बम बरसाए जिससे ब्रिटिश पोत एचएमएस डिफेंडर को  रूसी जल सीमा से बाहर जाने पर विवश कर दिया।
रूस ने कहा कि यह ब्रिटिश विध्वंसक केप फियोलेंट के नजदीक लगभग तीन किलोमीटर तक उसकी सीमा में आ गया था।




केप फियोलेंट क्रीमिया के दक्षिणी तट पर एक अहम सामरिक महत्व का स्थान है।यह सेवास्तोपोल के नजदीक है, जहां रूसी नौसेना के काला सागर बेड़े (ब्लैक सी फ्लीट )का मुख्यालय है।
पुरातन ग्रीक मिथकों के अनुसार केप फियोलेंट वह स्थान है जहां समुद्र का शुद्धतम नभोनील जलराशि चट्टान से टकराकर बेहद खूबसूरत दृश्य का निर्माण करते हैं,जिसे अंतरिक्ष से मल्टी स्पेक्ट्रल सुदूर संवेदन उपग्रहों के माध्यम से स्पष्ट देखा जा सकता है।


वहीं ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने रूसी दावों का खंडन करते हुए कहा कि ब्रिटिश जहाज एचएमएस डिफ़ेंडर पर रूसी नौसेना की तरफ से कोई हमला नहीं किया गया है।





ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता ने ट्वीट करते हुए कहा है कि एचएमएस डिफेंडर पर कोई चेतावनी शॉट नहीं दागा गया है। रॉयल नेवी जहाज अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुसार यूक्रेन की जल सीमा के अंदर से अपना संचालन कर रहा है।


https://twitter.com/DefenceHQ/status/1408044685034205185?s=19



रूस ने दावा किया है कि अपनी जल-सीमा से ब्रिटेन के एक युद्धक पोत को भगाने के लिए उसके रास्ते में बम गिराये गए और गोलियां दागी गईं वहीं ब्रिटेन ने इन दावों को गलत बताया है।


रूस ने दावा किया है कि ब्रिटिश जहाज क्रीमिया प्रायद्वीप के इलाके में उसकी जल-सीमा के भीतर था। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ब्रिटेन की इस मासूमियत भरे समझ को भी दाद देनी पड़ेगी जिसमे ब्रिटिश नौसेना का कहना है कि उसने दागी गई गोलियों को रूस का अभ्यास माना था, जिसकी पहले से जानकारी दी गई थी,ब्रिटिश अधिकारियों ने किसी तरह के बम गिराए जाने के दावे को भी गलत बताया है, हालांकि ब्रिटेन ने इस बात की पुष्टि की है कि उसका युद्धक पोत एचएमएस डिफेंडर यूक्रेन की जल सीमा से गुजरा था.

दोनों देेशों के दावे अलग अलग

ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने एक बयान जारी कहा कि

"अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत यह पोत बहुत ही अहानिकर तरीके से यूक्रेन के क्षेत्रीय समुद्री सीमा से गुजर रहा था.”

https://twitter.com/DefenceHQ/status/1408044685034205185?s=19





विवाद बढ़ने का संकेत

सैन्य मामलों के विशेषज्ञों ने कहा है कि दोनों पक्षों में से जिसकी बात भी सही हो, यह घटना पश्चिमी देशों और रूस के बीच समुद्री सीमा को लेकर विवाद बढ़ने का संकेत है.
रूस के विदेश मंत्रालय ने ब्रिटिश युद्धक पोत के उस इलाके से गुजरने को खुल्लम-खुल्ला उकसाने की कार्रवाई बताया। रुस ने कहा कि इस मामले के लिए आधिकारिक राजनयिक प्रतिरोध के लिए मास्को में ब्रिटिश राजदूत और रक्षा अताशे को औपचारिक 'कूटनीतिक डांट' के लिए तलब किया।

रूसी संप्रभुता उल्लंघन न करे कोई।

रूस के उप विदेश मंत्री सर्गेई रयाबकोव ने बीते गुरुवार को कहा कि कोई रूस की सीमा का उल्लंघन न करे। उन्होंने कहा कि रूसी सम्प्रभुता की रक्षा हर तरीके से की जाएगी, चाहे वह राजनयिक राजनीतिक हो या जरूरत पड़ने पर सैन्य तरीके ही क्यों न अपनाना पड़े। इस घटनाक्रम के बाद रयाबकोव चेतावनी दी कि ''जो लोग हमारी ताकत की परीक्षा लेना चाहते हैं वे खतरा मोल लेंगे।

केंद्र में यूक्रेन:दक्षिणी चीन सागर बनाम काला सागर।


काले सागर पर रूस के दावों की तुलना दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावों से करते हुए पश्चिमी विशेषज्ञों का मानना है कि :

"रूस अपनी सच्चाइयों को जमीन पर उतार रहा है और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उन सच्चाईओं की स्वीकार्यता की कोशिश कर रहा है ताकि उसके कब्जे पर दुनिया की मुहर लग जाए फिर भी, रूस की प्रतिक्रिया बहुत तीखी थी, कूटनीति के एकदम उलट और जरूरत से कहीं ज्यादा.”।

यूरोपीय देशों को समझना पड़ेगा कि इस तरह के बचकानी हरकत से मास्को को कोई फर्क़ नहीं पड़ने वाला है और क्रीमिया मुद्दे को रूस के द्वारा "कब्जाने" जैसी शब्दावली के प्रयोग से मामला सुलझने के बजाय बिगड़ता चला जायेगा।

क्रीमिया: क्रीमिया प्रायद्वीप के इलाके को रूस ने 2014 में यूक्रेन से सीमित संघर्ष के बाद रूसी संघ में विलय कर लिया और कहा था कि उसने 1816 की ऐतिहासिक भूल को दुरुस्त कर लिया है। इससे रूस के क्षेत्रीय समुद्री सीमा का विस्तार काला सागर के तटीय इलाकों तक हो गया है। लेकिन रूसी दावों के विपरीत पश्चिमी देश क्रीमिया को यूक्रेन का हिस्सा मानते हैं और रूस के समुद्री सीमा के दावे को गलत बताते हैं।




क्रीमिया अपने अप्रितम प्राकृतिक सौंदर्य के लिए भी जाना जाता है यहाँ के बालाक्लावा में दिल के आकार का ब्लू क्वैरी झील बेहद खूबसूरत नजारा पेश करता है। यह सेवस्तोपोल के निकट समुद्र तल से महज 14 मीटर नीचे है। 



यूक्रेन नाटो जुगलबंदी से रूस ख़फ़ा।

सामरिक पृष्ठभूमि में देखा जाय तो रूस इस क्षेत्र में नाटो की बढ़ती भूमिका को कतई बर्दाश्त नहीं करेगा। जबकि अमेरिका सहित अन्य यूरोपीय देश यूक्रेन को फ़्लैश पॉइंट बनाने पर तुले हुए हैं जो सीधा रूसी सम्प्रभुता का उल्लंघनकारी रवैया है।
अमेरिका,ब्रिटेन सहित अन्य नाटो समूह के देश रूस पर जासूसी, हैकिंग, चुनावी दखल, ब्रेग्जिट, यूक्रेन, बेलारूस और अलेक्सी नावेलिनी और मानवाधिकारों पर विवादों के मुद्दे पर गाहे बगाहे घेरते रहते हैं।

यूक्रेन के मुताबिक रूस की काला सागर और उसके नजदीक अजोव सागर के इलाके में रूस की ‘आक्रामक और उत्तेजक' सामरिक गतिविधियां यूक्रेन और उसके सहयोगी देशों के लिए हमेशा खतरा बनी रहती हैं।

रूसी आक्रमकता से निजात पाने के लिए यूक्रेन ने इस इलाके में मदद के लिए नाटो से अपील भी की,इसीब कड़ी में सम्भवतः ब्रिटिश युद्धक जहाज इसी हफ्ते ओडेसा बंदरगाह गया था, जहां ब्रिटेन और यूक्रेन के बीच एक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए जिसके तहत ब्रिटेन ने यूक्रेनी नौसेना की मदद का भी वादा किया था ।
पश्चिमी देश इस हफ्ते काला सागर में एक सैन्य अभ्यास कर रहे हैं जिसे सी ब्रीज नाम दिया गया है. बुधवार की घटना से कुछ घंटे पहले ही वॉशिंगटन स्थित रूसी दूतावास ने अमेरिका और उसके सहयोगियों से यह सैन्य अभ्यास रद्द करने का आग्रह किया था.

फ़्लैश पॉइंट : काला सागर, जिसका उपयोग रूस भूमध्य सागर में अपनी शक्ति को प्रदर्शित करने के लिए करता है, सदियों से रूस और उसके पारंपरिक प्रतिस्पर्धियों जैसे तुर्की, फ्रांस, ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक फ्लैश पॉइंट रहा है।
डबल एजेंट सर्गेई स्क्रिपल को नर्व एजेंट नोविचोक दिए जाने के बाद 2018 से ही लंदन और मॉस्को के बीच संबंध बर्फ पिघली नहीं थी कि यह डेस्ट्रॉयर वाली घटना सामने आ गयी।



रूस-ब्रिटेन में बढ़ते राजनयिक तकरार की पृष्ठभूमि

मार्च 2018 में ब्रिटेन ने रूस पर आरोप लगाए हैं कि रूसी एजेंटों ने सेल्सबरी में एक पूर्व रूसी जासूस और डबल एजेंट सर्गेई स्क्रिरपाल और उसकी बेटी को ब्रिटेन में नर्व एजेंट निविचोक के ज़रिए मारने की कोशिश की थी।

इस मसले पर तिलमिलाए हुए ब्रिटेन ने पहले 23 रूसी राजनयिकों को निष्कासित किया था,जवाब में मॉस्को ने भी फौरन जवाबी कार्रवाई करते हुए 23 ब्रितानी राजनयिक को स्वदेश वापस जाने फरमान सुना दिया था।
इसके बाद सेंट पीटर्सबर्ग में ब्रिटिश वाणिज्य दूतावास काम करना बंद कर दिया था।

ब्रिटेन की तत्कालीन प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने संसद को बताया कि निष्कासित रूसी राजनयिक दरअसल में अघोषित रूसी जासूस थे.

दोनो देशों में इस मुद्दे पर तल्खी इस कदर बढ़ी की प्रधानमंत्री टेरीज़ा मे ने रूसी विदेश मंत्री के फ़ीफ़ा विश्व कप के लिए भेजे निमंत्रण को भी ख़ारिज कर दिया।उन्होंने कहा था कि 2018 में रूस में होने वाले फुटबॉल विश्वकप में शाही परिवार हिस्सा नहीं लेगा।

रूस का पक्ष
रूस लगातार अपने ऊपर लग रहे आरोपों को ख़ारिज करते हुए कहताहै कि ब्रिटेन तमाम आरोपों के संबंध में पुख़्ता सबूत पेश करे।
रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने उस समय कहा था कि "मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि रूस पर लगाए जा रहे तमाम आरोप निराधार हैं, उनमें कोई सच्चाई नहीं है."


रूसोफ़ोबिया से ग्रस्त ब्रिटेन

ब्रिटेन में रूसी हस्तक्षेप की जाँच के लिए गठित इंटेलिजेंस एवं सिक्योरिटी कमेटी (आईएससी) ने अपनी बहु प्रतिक्षित रिपोर्ट,जिसे जुलाई 2020 में जारी किया गया था ।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ब्रिटिश सरकार ने ब्रेग्ज़िट जनमत संग्रह के दौरान रूसी हस्तक्षेप की जाँच को “सक्रिय रूप से नज़रअंदाज़” किया और ब्रेग्ज़िट जनमतसंग्रह में रूसी हस्तक्षेप की जाँच करने की भी सरकार ने कोई कोशिश नहीं की.
रिपोर्ट के मुताबिक़, ब्रिटेन,रूस के लिए अमरीका और नाटो के बाद सबसे बड़ा टारगेट है और इसका मुख्य कारण ब्रिटेन की अमरीका से नज़दीकी है।

वर्तमान विश्व मे रूस: बराबरी की हैसियत वाले प्रतिस्पर्धी'।

शीत युद्ध एक दो ध्रुवीय दुनिया की देन थी जिसमें दो महाशक्तियां अपने आर्थिक और सैन्य दमख़म के साथ वैश्विक राजनीति को शक्ल देने के लिए एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही थीं."

वर्तमान में रूस किस तरह की शक्ति है ?

पश्चिमी देशों का मानना है कि अब भी रूस " एक कमजोर महान शक्ति है जिसे लगातार कम आंका जा रहा है क्योंकि ये ऐतिहासिक रूप से पश्चिम की तुलना में तकनीक, राजनीति और आर्थिक विशेषज्ञता में पिछड़ती रही है,लेकिन अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य में मॉस्को लगातार अपने आर्थिक प्रभाव से ज़्यादा असरदार रहा है
लेकिन कई थिंक टैंक इसके ठीक उलट रूस एक कमजोर क्षेत्रीय शक्ति नहीं है बल्कि इसकी स्थिति इसके ठीक विपरीत मानते है।"दरअसल, आतंरिक संतुलन, तीव्र सैन्य सुधार और आधुनिकीकरण के एक दौर के बाद रूस अपने ऐतिहासिक रूप में ज़्यादा सुदृढ़ है।
 
रूस ने बीते 15 सालों में बेहद बुद्धिमानी से इस क्षेत्र में निवेश किया है।ऐसे में ये इसके पास कुछ खास क्षमताएं विकसित की हैं जो इसे एक बढ़त देती है।

चंद उदाहरण के लिए,नाटो देशों के पास रूस के इस्कंदर टैक्टिकल आण्विक मिसाइल और एस 400 मिसाइल डिफेंस सिस्टम का असली तोड़ नहीं है ऐसे में नाटो कमांडरों के सामने एक नई उलझन पैदा करती है कि रूस के साथ संधि की जाए या संघर्ष को आगे बढ़ाया जाए जैसे रूस के पास आर्टिलरी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर में भी जबर्दस्त क्षमता और दक्षता हासिल है।
पूरे यूरोप में रूस ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला एकमात्र भरोसेमंद देश के रूप में भी उभर चुका है,जिसके आयातक अधिकतर नाटो समूह के देश हैं।

पश्चिमी देशों और अमेरिका को रूस की साईबर और सूचना युद्ध में जबर्दस्त क्षमता से परिचय हो चुका है जो इन देशों के लिए अहम चुनौतियां पैदा करती है।बीते वर्षों में मीडिया और सामरिक थिंक टैंक नए चलन हाईब्रिड वॉरफेयर पर चर्चा कर रहे हैं, जो शांति और युद्ध के बीच एक धुंधली स्थिति होती है और विशेषज्ञ इस क्षेत्र में रूस को जाना माना और प्रतिष्ठित खिलाड़ी मानते है।


काला सागर: अत्यधिक सामरिक महत्व का क्षेत्र

काला सागर,अटलांटिक महासागर का सीमांत सागर है,यह पूर्वी यूरोप और पश्चिम एशिया के बीच विस्तृत है।
यह एजियन सागर और कई खाड़ियों के माध्यम से होते हुए भूमध्य सागर में जा मिलती है।

जहां बॉस्फोरस की खाड़ी इसे मरमरा सागर से , तो डर्डेनल्स की खाड़ी, एजियन सागर से, और कर्च कि खाड़ी के माध्यम से आज़ोव सागर से जोड़ती है।

इसके किनारे छः देश अवस्थित हैं जिसमे पश्चिम में रोमानिया और बुल्गारिया, उत्तर और पूर्व में यूक्रेन,रूस और जॉर्जिया और दक्षिण में तुर्की शामिल है।
इसमें पांच यूरोपीय नदियां अपना जल विसर्जित करती है जिसमे सबसे प्रसिद्ध नदी डेन्यूब भी शामिल है।अन्य नदियों में नीपर,और डॉन है।

काला सागर 436,400 वर्ग किमी (आज़ोव के सागर को छोड़कर)का क्षेत्र है,जिससे यह दुनिया का सबसे बड़ा अंतर्देशीय जलराशि है।

यह थ्री सीज़ इनिशिएटिव (3SI), जिसे बाल्टिक, एड्रियाटिक, ब्लैक सी (BABS) इनिशिएटिव के रूप में भी जाना जाता है, 3SI यूरोपीय संघ में बारह राज्यों का एक मंच है, जो उत्तर- बाल्टिक सागर से एड्रियाटिक सागर और मध्य और पूर्वी यूरोप में काला सागर तक विस्तृत है।

(साभार :incyclopedia britannica)
cdn.britannica.com








Thursday, June 24, 2021

2021: तीसरा सुपर मून आज दिखेगा

आज ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है और आज शाम को आसमान में एक दुर्लभ खगोलीय नज़ारा देखने को मिलेगाआज शाम लगभग सात बजे जब चंद्रमा उदित हो रहा होगा तब उसका आकार सामान्य पूर्णिमा के चंद्रमा की तुलना में बड़ा होगा और उसकी चमक भी सामान्य से अधिक होगी। जिसे खगोलविद इस खगोलीय परिघटना को सुपर मून की संज्ञा दे रहे हैं। यह इस साल का तीसरा सुपरमून है।

इस खगोलीय घटना को "स्ट्राबेरी और हनी मून" भी नाम दिया गया है वहीं इसे पश्चिमी देशों में स्ट्राबेरी की फसल के तोड़ने का मौसम होने के कारण"स्ट्राबेरी मून"नाम दिया गया है।
इसे हनी (शहद ) मून इसलिये भी कहते हैं,क्योंकि इस समय वहां हनी हार्वेस्ट करने के लिये तैयार हो जाता है।
यूरोपीय देशों में इस परिघटना को "जून्स फुलमून"और कहीं कहीं रोजमून भी कहा जाता है।

इसका यह नाम उदित होते फुल मून के लालिमा के कारण तथा कुछ क्षेत्रों में इस समय खिलने वाले गुलाब के कारण दिया गया है।आज चन्द्रमा पृथ्वी के पास आ जाने के कारण यह अन्य माइक्रो मून पूर्णिमा की तुलना में 14 प्रतिशत बड़ा और 30 प्रतिशत अधिक चमकदार दिखाई देगा।


क्या होता है सुपरमून।

जिस समय चंद्रमा अपनी कक्षा में पृथ्वी के सर्वाधिक नजदीक होता है, और साथ ही अपने पूर्ण आकार में होता है, तब इस स्थिति को ‘सुपर मून’ (Supermoon) कहा जाता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो जब चन्द्रमा, पृथ्वी की परिक्रमा अंडाकार पथ पर करते हुये 3 लाख 61 हजार 885 किलोमीटर से कम दूरी पर रहता है तो उस समय पूर्णिमा का चांद सुपरमून कहलाता है।

पृथ्वी के सर्वाधिक नजदीक होने की वजह से, इस स्थिति में चंद्रमा अपने सामान्य आकार से अधिक बड़ा दिखाई देता है। किसी एक विशिष्ट वर्ष में, लगातार दो से चार पूर्ण सुपरमून (Full Supermoons) तथा दो से चार नए सुपरमून (New Supermoons) की घटनाएँ हो सकती हैं।

उपभू: चंद्रमा द्वारा पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान, एक ऐसी स्थिति आती है, जिसमे दोनों के मध्य दूरी सबसे कम (औसतन लगभग 360,000 किमी) होती है, अर्थात चंद्रमा और पृथ्वी एक-दूसरे के सर्वाधिक नजदीक होते है। इस स्थिति को ‘उपभू’ अथवा पेरिजी (Perigee) कहा जाता है। 

पृथ्वी की परिक्रमा के दौरान चंद्रमा, जब पृथ्वी से सर्वाधिक दूरी (लगभग 405,000 किमी) पर होता है, तो इसे ‘अपभू’ अथवा ऐपोजी (Apogee) कहा जाता है ।


सबसे नजदीकी सुपरमून

26 जनवरी 1948 को पड़े सुपरमून के बाद चंद्रमा और पृथ्वी के बीच सबसे कम दूरी का अनुभव करने के लिये हमें आगामी 25 नवम्बर 2034 तक का इंतजार करना होगा।




इस तरह की अन्य खगोलीय परिघटनाओं को समझने के लिए उपयोगी टर्मिनोलॉजी

*जब पूर्ण चन्द्र ग्रहण होता हो तो उस समय चन्द्र को "ब्लड मून" (Blood Moon) कहा जाता है।

सुपर ब्लू मून (Super Blue Moon) : ब्लू मून (Blue Moon), सुपर मून (Super Moon) और पूर्ण ग्रहण (Total Eclipse) का संयोजन है और ये तीन दुर्लभ घटनाएं हैं।
ब्लड मून (Blood Moon) की विशेषता यह है कि इसमें चन्द्रमा सफेद रंग की बजाय यह लाल या गाढ़े भूरे रंग का होता है।

"ब्लू मून" (Blue Moon) : जब किसी माह में पूर्णिमा दो बार आती है और चांद पूरा निकलता है,यह लगभग 28 दिनों से कम समय में ऐसा होता है क्योंकि चन्द्रमा को पृथ्वी की एक चक्कर लगाने में लगभग 27 दिन लगता है।इसलिए,हर तीन साल में अधिकतर ब्लू मून देखने को मिलता है


ग्रहण क्या है और कैसे होता है?

ग्रहण एक खगोलीय अवस्था है जिसमें कोई खगोलीय पिंड जैसे ग्रह या उपग्रह किसी प्रकाश के स्रोत जैसे सूर्य और दूसरे खगोलीय पिंड जैसे पृथ्वी के मध्य आ जाता है इससे पिंड पर प्रकाश का कुछ समय के लिये अवरोध हो जाता है।

मुख्य रूप से पृथ्वी के साथ जो ग्रहण होते हैं वह इस प्रकार हैं:

1.चंद्रग्रहण (Lunar Eclipse) - इस ग्रहण में चंद्रमा और सूर्य के बीच पृथ्वी आ जाती है.। ऐसी स्थिति में चाँद पृथ्वी की छाया से होकर गुजरता है। ऐसा आमतौर पर सिर्फ पूर्णिमा के दिन संभव होता है.

2.सूर्यग्रहण (Solar Eclipse):

जब पृथ्वी तथा सूर्य के मध्य चंद्रमा आ जाता है जिससे सूर्य का प्रकाश पृथ्वी तक नहीं पहुँच पाता और पृथ्वी की सतह के कुछ हिस्से पर दिन में अँधेरा छा जाता है। इस स्थिति को सूर्य ग्रहण कहते हैं।
जब चंद्रमा एक निश्चित वृत्तीय कक्षा तथा समान कक्षीय समतल पर परिक्रमा कर रहा होता तो प्रत्येक अमावस्या को सूर्य ग्रहण की स्थिति बनती।
लेकिन चंद्रमा का कक्षीय समतल (Orbital Plane) पृथ्वी के कक्षीय समतल (Ecliptic Plane) से पांच डिग्री का कोण बनाता है जिसके कारण चंद्रमा की परछाई पृथ्वी पर हमेशा नहीं पड़ती।
सूर्य ग्रहण तभी होता है जब चंद्रमा अमावस्या को पृथ्वी के कक्षीय समतल के निकट होता है और ऐसा सिर्फ अमावस्या के दिन होता है।
पूर्ण सूर्य ग्रहण (Total Eclipse) - जब चंद्रमा की परछाई सूर्य के पूरे भाग को ढकने की बजाय किसी हिस्से को ही ढक ले तो इसे आंशिक सूर्य ग्रहण कहते है।

सूर्य की तुलना में चंद्रमा का आकार 400 गुना छोटा है लेकिन दोनों समान आकार के दिखाई देते हैं क्योंकि पृथ्वी से चंद्रमा की दूरी पृथ्वी से सूर्य की दूरी की तुलना में 400 गुना कम होती है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण (Annular Solar Eclipse):

इस तरह के ग्रहण की स्थिति आमतौर पर तब बनती है जब चंद्रमा पृथ्वी से दूर होता है और इसका आकार छोटा दिखाई देता है,जिससे चंद्रमा, सूर्य को पूरी तरह ढक नहीं पाता और सूर्य एक अग्नि वलय (Ring of Fire) की भाँति प्रतीत होता है।

सूर्य ग्रहण के दौरान निर्मित ‘अग्नि वलय (Ring of Fire) क्या है।
सभी प्रकार के सूर्य ग्रहण के दौरान अग्नि वलय का निर्माण नहीं दिखाई देता।यह केवल उस स्थिति में होता है : जब सूर्य का केंद्र ,चंद्रमा से इस प्रकार ढक जाए कि सूर्य का केवल बाहरी किनारा ही दिखाई दे।


इस प्रकार दिखाई देने वाला सूर्य का बाहरी किनारा एक आग के छल्ले की भाँति प्रतीत होता है जिसे अग्नि वलय कहते हैं।


वलयाकार सूर्य ग्रहण से निर्मित अग्नि वलय पृथ्वी पर स्थित सभी स्थानों से नहीं दिखाई देता। इसलिये यह अलग-अलग स्थानों पर आंशिक सूर्य ग्रहण की भाँति दिखाई देता है।

वलयाकार सूर्य ग्रहण कब बनता है?

सभी सूर्य ग्रहणों में अग्नि वलय का निर्माण नहीं होता है। वलयाकार सूर्य ग्रहण के निर्माण के लिये निम्नलिखित तीन परिस्थितियाँ अनिवार्य हैं-

1.अमावस्या।

चंद्रमा की स्थिति चंद्र नोड (Lunar Nod) पर या उसके निकट हो ताकि सूर्य, पृथ्वी तथा चंद्रमा एक सीधी रेखा में हों और चंद्रमा पृथ्वी से दूरस्थ बिंदु (Apogee) पर स्थित हो।

2.Umbra.
3.Penumbra.

सूर्य ग्रहण की स्थिति में पृथ्वी पर चंद्रमा की दो परछाइयाँ बनती हैं जिसे छाया (Umbra) तथा उपच्छाया (Penumbra) कहते हैं।

छाया(Umbra): इसका आकार पृथ्वी पर पहुँचते हुए छोटा होता जाता है तथा इस क्षेत्र में खड़े व्यक्ति को पूर्ण सूर्य ग्रहण दिखाई देता है।

उपच्छाया:(Penumbra) इसका आकार पृथ्वी पर पहुँचते हुए बड़ा होता जाता है तथा इस क्षेत्र में खड़े व्यक्ति को आंशिक सूर्य ग्रहण दिखाई देता है।

सूर्य की बाहरी परत कोरोना के अध्ययन के लिये वलयाकार सूर्य ग्रहण एक आदर्श स्थिति होती है क्योंकि चंद्रमा के बीच में आ जाने से सूर्य की तेज़ रोशनी अवरोधित हो जाती है तथा खगोलीय यंत्रों द्वारा इसका अध्ययन आसानी से किया जा सकता है।


आंशिक ग्रहण (Partial eclipse) - इस ग्रहण की स्थिती में प्रकाश का स्रोत पूरी तरह अवरुद्ध नहीं होता है.


चन्द्र ग्रहण दो प्रकार का होता है:

पूर्ण चन्द्र ग्रहण और आंशिक चन्द्र ग्रहण।

जब चंद्रमा और सूर्य पृथ्वी के ठीक विपरीत किनारे पर होते हैं तब पूर्ण चंद्र ग्रहण होता है वहीं आंशिक चंद्र ग्रहण में, चंद्रमा का केवल एक हिस्सा पृथ्वी की छाया में प्रवेश करता है और यह सूर्य, पृथ्वी और चंद्रमा की स्थिति पर निर्भर करता है कि वे किस कदर रेखांकित होते हैं.

ब्लू मून (Blue Moon) क्या होता है?


जब चंद्रग्रहण पर पूर्ण चंद्रमा दिखता है तो चांद की निचली सतह से नीले रंग की रोशनी बिखरती है और तब चन्द्रमा को ब्लू मून (Blue Moon) कहते है।


चंद्रमा लाल क्यों हो जाता है या इसे ब्लड मून (Blood Moon) के रूप में क्यों जाना जाता है?

चंद्रग्रहण के दौरान चंद्रमा का सुर्ख लाल हो जाने को ब्लड मून (Blood Moon) कहते हैं. ऐसा कब होता है? जब पृथ्वी की छाया पूरे चांद को ढक देती है उसके बाद भी सूर्य की कुछ किरणें चंद्रमा तक पहुंचती हैं. लेकिन चांद तक पहुंचने के लिए उन्हें धरती के वायुमंडल से गुजरना पड़ता है. इसके कारण सूर्य की किरणें बिखर जाती हैं. पृथ्वी के वायुमंडल से बिखर कर जब किरणें चांद की सतह पर पड़ती हैं तो सतह पर एक लालिमा बिखेर देती हैं. जिससे चांद लाल रंग का दिखने लगता है

Sunday, March 28, 2021

होली:हमारी सांस्कृतिक विरासत 2

 भारतीय शास्त्रीय संगीत और होली:


भारतीय शास्त्रीय संगीत में धमार का होली से गहरा संबंध है। ध्रुपद, धमार, छोटे व बड़े ख्याल और ठुमरी में भी होली के गीतों का सौंदर्य देखते ही बनता है ।

कथक नृत्य के साथ होली, धमार और ठुमरी पर प्रस्तुत की जाने वाली अनेक सुंदर बंदिशें आज भी अत्यंत लोकप्रिय हैं –

चलो गुंइयाँ आज खेलें होरी कन्हैया घर।

इसी प्रकार संगीत के एक और अंग ध्रुपद में भी होली के सुंदर वर्णन मिलते हैं।

ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल देखिए-

“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।

भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”

धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। 

इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं – आज पिया होरी खेलन आए

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं। बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं। बसंत राग पर आधारित –

“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।

बहार राग पर आधारित “छम छम नाचत आई बहार”
और राग काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।”प्रसिद्ध बंदिशें हैं।


ध्रुपद में गाये जाने वाली एक लोक के बोल तो देखिए-

“खेलत हरी संग सकल, रंग भरी होरी सखी, कंचन पिचकारी करण, केसर रंग बोरी आज।
भीगत तन देखत जन, अति लाजन मन ही मन, ऐसी धूम बृंदाबन, मची है नंदलाल भवन।”

धमार संगीत का एक अत्यंत प्राचीन अंग है। गायन और वादन दोनों में इसका प्रयोग होता है। यह ध्रुपद से काफी मिलता जुलता है पर एक विशेष अंतर यह है कि इसमें वसंत, होली और राधा कृष्ण के मधुर गीतों की अधिकता है। इसे चौदह मात्रा की धमार ही नाम की ताल के साथ विशेष रूप से गाया जाता है।

इसमें निबद्ध एक प्रसिद्ध होली के बोल हैं –

"आज पिया होरी खेलन आए"

भारतीय शास्त्रीय संगीत में कुछ राग ऐसे हैं जिनमें होली के गीत विशेष रूप से गाए जाते हैं।

 बसंत, बहार,हिंडोल और काफी ऐसे ही राग हैं

बसंत राग पर आधारित –प्रसिद्ध बंदिशें पर गौर फरमाइए।
“फगवा ब्रज देखन को चलो रे,
फगवे में मिलेंगे, कुँवर कां
जहाँ बात चलत बोले कागवा।

इसे पंडित भीमसेन जोशी जी सम्मोहित करने वाले स्वर में सुनिए सब कुछ भूल जाएंगे।

https://youtu.be/eL2BHFaieqM

जबकि बहार राग पर आधारित
“छम छम नाचत आई बहार”

लता दीदी की सुरीली आवाज में ।

https://youtu.be/ny1WO8nM2DA

और काफी में –
“आज खेलो शाम संग होरी
पिचकारी रंग भरी सोहत री।”

https://youtu.be/tsXFSWZD7RM



मुगलकालीन,उर्दू,सूफी साहित्य में होली।

अमीर खुसरो ने होली को अपने सूफ़ीयाना अंदाज़ में कुछ ऐसे देखा है-

दैय्या रे मोहे भिजोया री, शाह निजाम के रंग में
कपड़े रंग के कुछ न होत है, या रंग में तन को डुबोया री।

अंतिम मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के शब्दों में होली की मस्ती का रंग कुछ इस तरह दिखाई देता है

क्यों मोपे मारी रंग की पिचकारी
देख कुंवरजी दूंगी गारी

भाज सकूं मैं कैसे मोसो भाजो नहीं जात
थांडे अब देखूं मैं बाको कौन जो सम्मुख आत

बहुत दिनन में हाथ लगे हो कैसे जाने देऊं
आज मैं फगवा ता सौ कान्हा फेंटा पकड़ कर लेऊं

शोख रंग ऐसी ढीठ लंगर से कौन खेले होरी
मुख बंदे और हाथ मरोरे करके वह बरजोरी


मुंशी ज़काउल्ला ने अपने किताब तहरीक-ए-हिंदुस्तानी में तो इस तथ्य पर ही सवाल उठाया है कि होली सिर्फ हिंदुओं का त्यौहार है,वे लिखते हैं कि मुगल सल्तनत के दिनों में होली का त्योहार कई दिनों तक चलता था।

इसमें जाति,वर्ग एवं धर्म की कोई बंदिश नहीं थी और गरीब से गरीब व्यक्ति भी मुगल बादशाह को रंग से सराबोर करने का हकदारी था।


उर्दू के जाने माने शायर नज़ीर अकबराबादी की कलम से।


"जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की।

परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की।
ख़म शीश-ए-जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की।महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की।

वे फिर लिखते हैं

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम नजीर।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।


और बशीर बद्र ने क्या खूब कही

सात संदूकों में भरकर दफ्न कर दू नफरतें,
आज इंसा को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत ...
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ना
 जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ।

और अंत मे बात होली कि हो और इसमें बॉलीवुड को शामिल न करें तो बेमानी होगी:

होली रंगों, आनंद और उल्लास का त्योहार है। बॉलीवुड के होली गीत इसी आनंद और उल्लास से भरे होते हैं।
'होली आई रे कन्हाई' (मदर इंडिया),
अरे जा रे हट नटखट' (नवरंग),
आज ना छोड़ेंगे बस हमजोली' (कटी पतंग),
'होली के दिन' (शोले),
'रंग बरसे' (सिलसिला),
मल दे गुलाल मोहे,
आई होली आई रे'
(कामचोर),
'अंग से अंग लगाना सजन' (डर)
'होली खेलें रघुवीरा' (बागबान),और
बलम पिचकारी...
होली के कुछ लोकप्रिय गीत हैं।


मदनोत्सव, बसंतोत्सव, कामदेवोत्सव ये सभी हमारे लोकानुरंजन के लिए आवश्यक थे, हैं और रहेंगे।भारतीय समाज अपनी अस्मिता, गौरवशाली अतीत,विशिष्ट और प्राचीन पंरम्पराओं और वसुधैव कुटुम्बकम के लिये जाना जाता है और होली कामकुंठाओं से मुक्त होने का प्राचीन उत्सव है,
इसे पूरे सादगी,पवित्रता,सहजता और गरिमामय उत्सव के रूप में मनाने की कोशिश करनी चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण रहे।

आइये इस कोविड 19 कालीन होली पर यह शपथ लें कि होली को पूरी सादगी,शालीनता और गरिमापूर्ण ढंग के साथ मनाएंगे 

होली:हमारी सांस्कृतिक विरासत-1

 उर से कुछ उच्छवास उठेंगे,

चिर भूखे भुज पाश उठेंगे,

कंठों में आ रुक जाएगी मेरे करुण प्रणय की बोली!
विश्व मनाएगा कल होली !
                                 ~ हरिवंशराय बच्चन

प्राचीन भारत होली को बसंतोत्सव,मदनोत्सव कामोत्सव,और कौमुदी महोत्सव के रूप मेंं जाना जाता, यानि रंग ही रंग, उमंग ही उमंग यानि रंगों को त्योहार होली।

देश मे रंगों के त्योहार होली को अन्य नाम से भी जाना जाता है।

इनमें सबसे पहले बात चुनावी रंग में सरोबार पश्चिम बंगाल में डोल यात्रा या डोल पूर्णिमा,तमिलनाडु में कामन पोडिगई,
जबकि होला मोहल्ला (पंजाब), 
कामना हब्बा (कर्नाटक), फगुआ (बिहार), 
रंगपंचमी (महाराष्ट्र),शिमगो (गोवा), 
धुलेंडी (हरियाणा),गोविंदा होली (गुजरात), 
योसांग होली (मणिपुर) प्रसिद्ध है।

प्राचीनकाल के संस्कृत साहित्य में होली के अनेक रूप का विस्तृत वर्णन वर्णित है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में रस के समूह रास का वर्णन है वहीं अन्य रचना में 'रंग' नामक उत्सव का जिक्र है जिसमे हर्ष प्रियदर्शिका रत्नावली, वैदर्भी रीति के कवि कालिदास कृत कुमारसंभवम् और मालविकाग्निमित्रम् शामिल हैं ।
कालिदास रचित ऋतुसंहार में तो पूरा एक सर्ग 'वसन्तोत्सव' के लिए समर्पित कर दिया है।
संस्कृत साहित्य के ""रत्नावली" में मदनपूजा का विषद है, "हर्षचरित" और "दशकुमारचरित्र" में मदनोत्सव का वर्णन है । इस त्योहार पर राजा और आम नागरिक सभी बराबर हैं ।

मदनोत्सव का वर्णन तो कालिदास ने अपने महाकाव्य "ऋतुसंहार" के षष्ठ सर्ग में बसंत,होली और उसके प्रभावों का मनोहारी वर्णन किया है।कालिदास इसे ऋतु-उत्सव कहते हैं,वे लिखते हैं

"इन दिनों कामदेव भी स्त्रियों की मदमाती आंखों की चंचलता में,उनके गालों में पीलापन, कमर में गहरापन और नितंबों में मोटापा बनकर बैठ जाता है काम से स्त्रियां अलसा जाती हैं । मद से चलना बोलना भी कठिन हो जाता है और टेढ़ी भौंहों से चितवन कटीली जान पड़ती है ।

सम्राट हर्ष कृत "रत्नावली" तथा "नागानंद" में "ऋतु-उत्सव यानि मदनोत्सव" का विशद वर्णन किया है ।
हर्ष ने नागानंद नामक नाटक नें एक वृद्धा के विवाह का विशद और रोचक वर्णन किया गया है ।
वाल्मिकी रामायण में भी बसंतोत्सव का वर्णन मिलता है । दंडी ने अपने नाट्यकाव्य दशकुमारचरित में कामदेव की पूजा के लिए आवश्यक ऋतुओं को बताया है ।

" वासवदत्ता" नामक नाटक में सुबंधु ने बसंत के आगमन की खुशी में राजा उदयिन तथा राजकुमारी वासवदत्ता के माध्यम से बसंतोत्सव का वर्णन किया है ।जैन कवि राजशेखर की "काव्य-मीमांसा" में भी ऋतु वर्णन है ।

"कुट्टनीमतम्" में भी गणिका और वेश्याओं के साथ मदनोत्सव मनाने का विशद वर्णन है।
भविष्य पुराण में बसंत काल में कामदेव और उनकी पत्नी रति की मूर्तियों की स्थापना और पूजा-अर्चना का जिक्र है मदनोत्सव कौमुदी महोत्सव का वर्णन चाणक्य ने भी किया है , वहीं चारूदत्त" में "कामदेवानुमान उत्सव" का जिक्र है, जिसमें कामदेव का जुलूस निकाला जाता था। इसी प्रकार शूद्रक कृत 'मृच्छकटिकम्' में नायिका बसंतसेना का इसी प्रकार के जुलूस में भाग लेने का जिक्र है ।

मदनोत्सव ही बाद में शांति निकेतन में गुरूदेव रविन्द्रनाथ टैगोर के सान्निध्य में "दोलोत्सव "के रूप आज भी मनाया जाता है।

धुरखेल/धुलेंडी का जिक्र  वर्ष-क्रियाकौमुदी में है।
पुस्तक के अनुसार इसी त्योहार में सुबह गाने-बजाने, कीचड़ फेंकने के कार्य संपन्न किये जाते हैं और सायंकाल सज्जित होकर मित्रों से मिलते हैं।

भारवि, माघ और अनेकों संस्कृत कविओं ने वसन्त की सौंदर्य की अपने साहित्य खूब चर्चा की है।

मदनोत्सव का वर्णन केवल साहित्यिक कृतियों में ही नहीं वरण मूर्तिकला, चित्रकला, स्थापत्य आदि के माध्यमों से भी इसे संचित,सिंचित,पल्लवित और पुष्पित किया है।

होली में सबसे अधिक जिक्र कामदेव का हुआ है,यूँ कहें कि यह यह त्योहार उन्ही को समर्पित है, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी
कामदेव को मदन, मन्मथ, कंदर्प, प्रद्युम्न,अनंग,मकरध्वज, रतिपति, पुष्पधन्वा, रतिनायक नाम से भी आदिग्रंथों में वर्णित किया गया है जबकि यूनान में ये "क्यूपिड" है।

आदिकालीन कवि विद्यापति से लेकर भक्तिकालीन सूरदास, रहीम, रसखान, पद्माकर, जायसी, मीराबाई, कबीर और रीतिकालीन बिहारी, केशव, घनानंद जैसे दिग्गज कवि भी मदनोत्सव की छटा से कहाँ बच पाए,उनके लिए होली सबसे प्रिय विषयों में एक रहा।

संस्कृत के महाकवियों और नाटककारों ने इस पर्व के अंतर्गत जिन उत्सवों की चर्चा की है, वह मूलतः छह हैं :

1.नवान्नेष्टि 
2.अशोकोन्तसिका 
3. पुष्प प्रचायिका 
4. वसंतोत्सव या मदनोत्सव 
5. होलिकोत्सव
6. उदक्ष्वेडिका

इन सारे उत्सवों के साथ यह पर्व माघ शुक्ल पंचमी (वसंत पंचमी ) से चैत्र पूर्णिमा तक लगभव ढाई महीने तक मनाया जाता रहा है.

1.नवान्नेष्टि: होली के दिन अग्निहोत्री ब्राह्मण यवाग्रयण नामक यज्ञ करते थे. आज भी कहीं कहीं होली की अग्नि में गेहूं या जौ की बालें भून कर उन्हें प्रसाद के रूप में ग्रहण करने की प्रथा है. रंगों में नहाना शायद यज्ञ के बाद स्नान की विधा रही हो.

२. अशोकोन्तसिका: सुन्दर स्त्रियों के पदाघात से अहोली रंगों, आनंद और उल्लास का त्योहार है। शोक का तथा उन्हीं की मुख मदिरा के सिंचन से वकुल का खिलना संस्कृत साहित्य में ग्रहण किया गया है.

3. पुष्प प्रचायिका:- काम पूजा के लिए फूलों का चयन ही पुष्प प्रचायिका है. इसमें विशेषता यह थी कि हाथ में आयी हुई डाली से फूल ख़ुद चुनने पड़ते थे।इस क्रीड़ा से सम्बंधित एक मार्मिक ग्राम गीत मिलता है. एक गर्भिणी स्त्री अपने गर्भस्थ बालक को सम्बोधित करते हुए कह रही है कि बेटा! तुम चैत्र में मत पैदा होना. सब सखियाँ जब फूल चुनने जाएंगी तब मैं कैसे जाऊँगी।

ये रतनारे होरिलवा! चैत जिनि जनमेउ
सब सखि चुनिहैं कुसुमियाँ चुनन कैसे जाबइ

4. वसंतोत्सव:वसंत उत्सव में आम्र मंजरी से कामदेव की अर्चना की जाती थी. कालिदास ने अपने अभिज्ञान शाकुंतलम नाटक में इसकी ख़ूब चर्चा की है.

5. होलिकोत्सव: होली के उत्सव का वर्णन भविष्योत्तर पुराण में आता है जिसका भावानुवाद यूँ है :
राजन! शीतकाल का अंत है. इस फाल्गुनी पूर्णिमा के पश्चात प्रातः मधुमास होगा.आप सभी को अभय दीजिये जिस से वह निर्भीक हो कर हंसे, खेले. प्रसन्न बालक लकड़ी की तलवारें लेकर अपने बंधुओं से लड़ने के लिए निकल पड़ें. रंग-बिरंगे वस्त्र पहनकर, चन्दन अ’बीर और गुलाल लगाकर ,पान चबाते हुए, एक दूसरे पर रंग डालने के लिए बांस या चमड़े की पिचकारियां लेकर निकलें. एक दूसरे को गालियां देकर हंसे, स्त्रियां नाचें. पुरुष सन्यासी नट तथा योगियों का तथा स्त्रियां वेश्याओं,योगिनियों तथा मोहिनी का स्वांग रचें।जिनके मन में जो आये सो कहे. ऐसे शब्दों से तथा हवन करने से यह पापिनी ढूँढा (होलिका ) नष्ट हो जाती है.

6. उदक्ष्वेडिका:पिचकारियों द्वारा जल प्रक्षेप ही उदक्ष्वेडिका है. यह नवान्नेष्टि यज्ञ के स्नान का स्मृति शेष ही मालूम पड़ती है. युधिष्ठिर के राजसूय यज्ञ की समाप्ति पर यज्ञान्त स्नान का जो वर्णन मिलता है वही इस रंगरोली की फाग का मूलाधार है।

गंध, माला, भूषण तथा वस्त्रों से अलंकृत पुरुष एवं स्त्रियां गंगा में स्नान के लिए गयीं. वहां वे तेल,गोरस, सुगन्धित जल,हल्दी और गहरे रंग की कुमकुम आदि से एक दूसरे को रंगने लगीं. वे चमड़े के यंत्रों से अपने देवरों और प्रियजनों को भिगो रही थीं.


देवलोक की होली।

इसे आप त्रिदेवों की होली कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी,होली का रंग से भला ये तीनो न बच पाए तो औरों का क्या।जहां ब्रजवासी भी होली खेलने के लिए हुरियार बन जाते हैं और ब्रज की नारियाँ हुरियारिनों के रूप में साथ होते हैं और चारों ओर एक ही स्वर सुनाई देता है :-

आज बिरज में होली रे रसिया, होरी रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।
दौड़ मिल फाग परस्पर खेलें, कहि कहि होरी होरी रे रसिया।आज बिरज में होली रे रसिया, होली रे रसिया, बरजोरी रे रसिया।

इतना ही नहीं वह भयाम सखाओं को चुनौती देती है कि होली में जीतकर दिखाओ। उनमें ऐसा अद्भूत उत्साह जागृत होता है कि सब ग्वाल-बालों को अपना चेला बनाकर बदला चुकाना चाहती हैं। 

जिन ब्रज बालों ने अटारी में चढ़ी हुई ब्रजगोपियों को संकोची समझा था, आज वे ही होली खेलने को तैयार हैं। पेश है इस दृश्य की एक बानगी :-

होरी खेलूँगी भयाम तोते नाय हारूँ
उड़त गुलाल लाल भए बादर, भर गडुआ रंग को डारूँ
होरी में तोय गोरी बनाऊँ लाला, पाग झगा तरी फारूँ
औचक छतियन हाथ चलाए, तोरे हाथ बाँधि गुलाल मारूँ।

मृगनयनी को यार नवल रसिया.... जैसे कालजयी कृति को अपने सुरों में साधने वाले पंडित जसराज का क्या कहना,खुद सुनिए और मंत्रमुग्ध होइये।

https://youtu.be/ZY6Ls1_DRtA

राम सीता की होली

अयोध्या में श्रीराम सीता जी के संग होली खेल रहे हैं। एक ओर राम लक्ष्मण भरत और शत्रुघ्न हैं तो दूसरी ओर सहेलियों के संग सीता जी।

केसर मिला रंग घोला गया है। दोनों ओर से रंग डाला जा रहा है। मुँह में रोरी रंग मलने पर गोरी तिनका तोड़ती लज्जा से भर गई है। 

झांझ, मृदंग और ढपली के बजने से चारों ओर उमंग ही उमंग है। देवगण आकाश से फूल बरसा रहे हैं। देखिए इस मनोरम दृश्य की एक झांकी :-

खेलत रघुपति होरी हो, संगे जनक किसोरी
इत राम लखन भरत शत्रुघ्न, उत जानकी सभ गोरी, केसर रंग घोरी।
छिरकत जुगल समाज परस्पर, मलत मुखन में रोरी, बाजत तृन तोरी।
बाजत झांझ, मिरिदंग, ढोलि ढप, गृह गह भये चहुँ ओरी, नवसात संजोरी।
साधव देव भये, सुमन सुर बरसे, जय जय मचे चहुँ ओरी, मिथलापुर खोरी।

नवोदित गायिका मैथिली ठाकुर और ने राम सीता और मिथिला की होली को कुछ यूं प्रस्तुत किया है,सुनिए

https://youtu.be/gXfHsNvdwEA

अवध से ब्रज और ब्रज से काशी हम जैसे ही आतें हैं, हम पातें हैं कि होली का रंग फ़िर एक बार बदल गया है..राम और कृष्ण की जगह अब शिव ने ले लिया है.

उमा महेश्वर की होली

जब राधा-कृष्ण ब्रज में और सीता-राम अयोध्या में होली खेल रहे हैं तो भला हिमालय में उमा-महेश्वर होली क्यों न खेलें, वे भला क्यों किसी से पीछे रहें।
शिव गृहस्थी निभाने कैलाश छोड़ काशी आ गए हैं,महायोगी संसारिक सुखों में रम रहे है, उन्हें काशी भा गयी है तो फिर होली तो बनता है।

काशी में होली फागुन शुक्ल एकादशी से ही शुरु हो जाती है, जिसे हम "रंगभरी एकादशी और आमलकी एकादशी " के नाम से भी जानते है।रंगभरी एकादशी, बनारस।।
मां पार्वती का गौना कराकर वापस लौटते हैं। मान्यता है कि देव लोक के सारे देवी देवता इस दिन स्वर्गलोक से बाबा विश्वनाथ के ऊपर गुलाल फेकते हैं।इस दिन काशी विश्वनाथ मंदिर में भक्तगण जमकर बाबा के साथ होली खेलते हैं। 





काशी में फागुन ने महादेव को अपने आगोश में ले लिया ? हमेशा की तरह आज भी शिव जी होली खेल रहे हैं। उनकी जटा में गंगा निवास कर रही है और पूरे शरीर में चिता भस्म लगा है। वे नंदी की सवारी पर हैं। ललाट पर चंद्रमा, शरीर में लिपटी मृगछाला,चमकती हुई आँखें और गले में लिपटा हुआ सर्प। उनके इस रूप को अपलक निहारती पार्वती अपनी सहेलियों के साथ रंग गुलाल से सराबोर हैं। देखिए इस अद्भुत दृश्य की झाँकी 


आजु सदासिव खेलत होरी
जटा जूट में गंग बिराजे अंग में भसम रमोरी
वाहन बैल ललाट चरनमा, मृगछाला अरू छोरी।

तीनि आँखि सुंदर चमकेला, सरप गले लिपटोरी
उदभूत रूप उमा जे दउरी, संग में सखी करोरी
हंसत लजत मुस्कात चनरमा सभे सीधि इकठोरी
लेई गुलाल संभु पर छिरके, रंग में उन्हुके नारी
भइल लाल सभ देह संभु के, गउरी करे ठिठोरी।

शिव जी के साथ भूत-प्रेतों की जमात भी होली खेल रही है। ऐसा लग रहा है मानो कैलाश पर्वत के ऊपर वटवृक्ष की छाया है। दिशाओं की पीले पर्दे खिंचे हुए हैं जिसकी छवि इंद्रासन जैसी दिखाई देती है। आक,धतूरा, संखिया आदि खूब पिया जा रहा है और सबने एक दूसरे को रंग लगाने की बजाय स्वयं को ही रंग लगा कर अद्भुत रूप बना लिया है, जिसे देखकर स्वयं पार्वती जी भी हँस रही हैं :-

सदासिव खेलत होरी, भूत जमात बटोरी
गिरि कैलास सिखर के उपर बट छाया चहुँ ओरी
पीत बितान तने चहुँ दिसि के, अनुपम साज सजोरी
छवि इंद्रासन सोरी।

आक धतूरा संखिया माहुर कुचिला भांग पीसोरी
नहीं अघात भये मतवारे, भरि भरि पीयत कमोरी
अपने ही मुख पोतत लै लै अद्भूत रूप बनोरी
हँसे गिरिजा मुँह मोरी।

पंडित छन्नूलाल मिश्रा के ओजपूर्ण स्वर में को सुनिए...

न साजन न गोरी,दिगम्बर खेले मसाने में होरी....
नाचत गावत डमरूधारी ,छोड़े सर्प गरल पिचकारी.

https://youtu.be/RBievjUHLfE
https://youtu.be/_jwU8QoJ7qU


भक्ति काल में होली

चंदबरदाई द्वारा रचित हिंदी के प्रथम महाकाव्य पृथ्वीराज रासो में भी होली का वर्णन मिलता है। 

महाकवि सूरदास ने वसन्त एवं होली पर 78 पद लिखे हैं सूरदास जैसे कवि भी फाल्गुनी रंग और गंध की मादक धारों से बच न सके और उनके कृष्ण और राधा बहुत मधुर छेडख़ानी भरी होली खेलते हैं।

हरि संग खेलति हैं सब फाग।
इहिं मिस करति प्रगट गोपी: उर अंतर को अनुराग।।
सारी पहिरी सुरंग, कसि कंचुकी, काजर दे दे नैन।
बनि बनि निकसी निकसी भई ठाढी, सुनि माधो के बैन।।
डफ, बांसुरी, रुंज अरु महुआरि, बाजत ताल मृदंग।
अति आनन्द मनोहर बानि गावत उठति तरंग।।

एक कोध गोविन्द ग्वाल सब, एक कोध ब्रज नारि।
छांडि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि।।

मिली दस पांच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाई।भरि अरगजा अबीर कनक घट, देतिं सीस तैं नाईं।।
छिरकतिं सखि कुमकुम केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि।
सोभित हैं तनु सांझ समै घन, आये हैं मनु पूरि।।

दसहूं दिसा भयो परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद।
सुर बिमान कौतुहल भूले, निरखत स्याम बिनोद


सूर रचित होली के दो पद -

नन्द नन्दन वृषभान किशोरी राधा मोहन खेलत होरी।
श्री वृन्दावन अति ही उजागर वरन-वरन नवदम्पति भोरी।

श्यामा उतय एकल ब्रज वनिता इतै श्याम रस रुप लखौरी।
कंचन की पिचकारी छूटत छिरकत ज्यौ सचु पावै गोरी।झुंडन जोरि रहि चन्द्रावली गोकुल में कुछ खेल मचौरी।
"सूरदास" प्रभु फगवा दीजै चिरजीवौ राधा बरजोरी।


रसखान जैसे रस की खान कहलाने वाले कवि ने तो फाग लीला के अर्न्तगत अनेकों "सवैय्ये" रच डाले हैं।सभी एक से एक रस और रंग से सिक्त _

फागुन लाग्यो जब तें तब तें ब्रजमण्डल में धूम मच्यौ है।नारि नवेली बचैं नहिं एक बिसेख यहै सबै प्रेम अच्यौ है।।
सांझ सकारे वहि रसखानि सुरंग गुलाल ले खेल रच्यौ है।कौ सजनी निलजी न भई अब कौन भटु बिहिं मान बच्यौ है।।


भक्तिकाल के महाकवि घनानंद ने होली की मस्ती को अपने शब्दों में कुछ यों पिरोया है-

प्रिय देह अछेह भरी दुति देह, दियै तरुनाई के तेह तुली।अति ही गति धीर समीर लगै, मृदु हेमलता जिमि जाति डुली।
घनानंद खेल उलैल दतै, बिल सैं, खुल सैं लट भूमि झुली।सुढि सुंदर भाल पै मौंहनि बीच, गुलाल की कैसी खुली टिकुली।

भक्ति काल के महाकवि पद्माकर ने कृष्ण और राधा की होली की मस्ती को कुछ यूँ बयान करते हैं-

फाग की मीर अमीरनि ज्यों, गहि गोविंद लै गई भीतर गोरी,माय करी मन की पद्माकर, ऊपर नाय अबीर की झोरी।

छीन पितंबर कम्मर ते, सुबिदा दई मीड कपोलन रोरी,नैन नचाय मुस्काय कहें, लला फिर अइयो खेलन होरी।

मीराबाई ने इस पद में कहा है –

रंग भरी राग भरी रागसूं भरी री।
होली खेल्यां स्याम संग रंग सूं भरी, री।

उडत गुलाल लाल बादला रो रंग लाल।
पिचकाँ उडावां रंग रंग री झरी, री।।

चोवा चन्दण अरगजा म्हा, केसर णो गागर भरी री।
मीरां दासी गिरधर नागर, चेरी चरण धरी री।।

बिहारी तो संयोग और वियोग निरुपण दोनों में सिध्दहस्त कवि हैं, संयोग हो या वियोग फागुन मास का विशेष महत्व है।प्रिय हैं तो होली मादक है और प्रिय नहीं हैं तो होली जैसा त्यौहार भी रंगहीन प्रतीत होता है और बसन्त ॠतु भी अच्छी नहीं लगती।

बिहारी इसे कुछ यूं अपने शब्दों में पिरोते है,

बन बाटनु पिक बटपरा, तकि बिरहिनु मत मैन।
कुहौ कुहौ कहि कहि उठे, करि करि राते नैन।।

हिय/ और सी हवे गई डरी अवधि के नाम।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम।।

बिहारी ने फागुन को साधन के रूप में लेकर संयोग निरुपण भी किया है। फागुन महीना आ जाने पर जब नायक नायिका के साथ होली खेलता है तो नायिका भी नायक के मुख पर गुलाल मल देती है या फिर पिचकारी से उसके शरीर को रंग में डुबो देती है।

जज्यौं उझकि झांपति बदनु, झुकति विहंसि सतराई।
तत्यौं गुलाब मुठी झुठि झझकावत प्यौ जाई।।

पीठि दियैं ही नैंक मुरि, कर घूंघट पटु डारि।
भरि गुलाल की मुठि सौं गई मुठि सी मारि।।

भारतेंदुजी भी तो 'फगुनिया' जाते हैं और फिर गाते भी हैं-
गले मुझको लगा लो ऐ मेरे दिलदार होली में,
बुझे दिल की लगी मेरी भी ए यार होली में।








क्रमश.......

Sunday, February 14, 2021

अजेय,अचूक,अभेद्य और अभिनव : अर्जुन मार्क 1ए.

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को चेन्नई में सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे को स्वदेशी रूप से विकसित पहला अर्जुन मार्क–1ए मुख्य युद्धक टैंक (एमबीटी) सौंपा और अर्जुन ने प्रधानमंत्री को शानदार गन सैल्यूट दिया।

https://twitter.com/DrJitendraSingh/status/1360858048143630337?s=19

इसके साथ ही इसे सेना को सौंपने की औपचारिकता पूरी की जाएगी। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन(डीआरडीओ) ने भारतीय सेना को जमीनी युद्ध में "हंटर किलर" माने जाने वाली इस अत्यधिक घातक और शत्रु सेना और उसके प्रतिष्ठानों के लिए "निर्दय" "निर्मम"और "निष्ठुर" माने जाने वाले स्वदेशी मुख्य युद्धक टैंक अर्जुन मार्क 1A को सेना को सौंपा।


इस टैंक को डीआरडीओ के एकक संग्राम वाहन अनुसंधान तथा विकास संस्थापन (CVRDE) और अन्य संस्थानों ने मिलकर डिजाईन किया है  टैंक का डिजाइन और उत्पादन करेगा। यह रक्षा क्षेत्र में भारत की "आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना" और "मेक इन इंडिया" के महत्वाकांक्षी पहल के तहत बनने वाला अत्याधुनिक टैंक है।

रक्षा विशेषज्ञ भारतीय सेना के इस अर्जुन मार्क 1A टैंक को "और तेज',"अत्यधिक विनाशकारी" और "शत्रु खेमे में वज्र माफिक प्रहार" करने वाला आधुनिक संस्करण मानते हैं।


अर्जुन मार्क-1ए संस्करण में 71 अतिरिक्त फीचर जोड़े गए हैं, जो इस टैंक को दुनिया के सभी श्रेष्ठ टैंकों के समकक्ष खड़ा करते हैं। हालिया रक्षा मंत्रालय के रक्षा अधिग्रहण समिति के फैसले में सेना के बेड़े में 118 उन्नत अर्जुन टैंक शामिल करने को मंजूरी दी गई थी। 

इन अर्जुन मार्क1ए टैंकों की कुल निर्माण लागत लगभग ₹8500 करोड़ होगी।जिससे करीब 200 उद्योगों और 8000 से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिलेगा जो आत्मनिर्भर भारत की संकल्पना को अभिवर्द्धन करेगा।

इसके साथ भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया जिसके पास अपने मुख्य युद्धक टैंक और हल्के लड़ाकू विमान बनाने की क्षमता है। भारत  रक्षा उपकरण, डिजाइन, विकास और विनिर्माण में ‘आत्मनिर्भर भारत’ पहल ने एक और प्रमुख मील का पत्थर हासिल किया है।

इस उपलब्धि के साथ अर्जुन मार्क1ए,ऑस्ट्रियाई लेपर्ड 2 ,ब्रिटेन की चैलेंजर2,दक्षिण कोरिया की के2 ब्लैक पैंथर ,इस्रायल की मेरकवा ,जापान की टाइप 10,फ्रेंच एएमएक्स टैंक(AMX Char Leclerc Battle ) इटली की सी1अरिएट, चीन की टाइप 99 या ZTZ99,तुर्की की अल्टेय बैटल टैंक,रूसी मूल की T-80,T-90 अर्माटा,पोलैंड की पीटी-91 और ईरान की जुल्फिकार,अमेरिका की एम60 या 120एस, एम1एब्रम्स के साथ शामिल हो गया
है।

चार क्रू सदस्यों (टैंक कमांडर,गनर,लोडर व चालक ) वाले इस बख्तरबंद टैंक की गतिशीलता,चपलता और विचलनता का कोई जोड़ नहीं है।
अपने नाम के अनुरूप सटीक,प्रभावी और अचूक लक्ष्य भेदन क्षमता है,साथ ही यह निम्न ग्राउंड प्रेशर,उच्च क्षमता वाले भार अनुपात,पावर पैक और ग़जब की फायर पावर प्रदर्शन के लिए अत्याधुनिक और बेहद प्रभावी संचार संसाधन,इसमें फिन स्टेबलाइजड आर्मर पियर्सिंग डिस्कार्डिंग सिस्टम (FSAPDS) और हाई एक्सप्लोसिव स्क्वाश हेड (HESH),थर्मोबारिक(TB) और पेनेट्रेशन सह ब्लास्ट (PCB) एम्मयूनिशन,कन्टेनराइजेड एम्मयूनिशन बिन विथ इंडिविजुअल शटर(CABIS) जैसे अत्याधुनिक तकनीक से युक्त है।जो इसे एक संपूर्ण मुख्य युद्धक टैंक बनाते है।

आर्मामेंट: इसमें एक 120 एमएम मुख्य गन सिस्टम,एक 12.7mm का रिमोट वेपन सिस्टम और 7.62mm वाले कोएक्सियल मशीन गन शामिल है।

फायर एक्सेसीरीज : लेजर रेंज फाइंडर, कंप्यूटरीकृत फायर नियंत्रण प्रणाली,ऑक्सिलरी पावर यूनिट,थर्मल नाईट विजन,लेजर वार्निंग और
काउंटरमेजर्स सिस्टम,उन्नत नौवहन प्रणाली,नाभिकीय,जैविक,रासायनिक हमलों से निपटने के लिए प्रणाली, फ्यूम एक्सट्रेक्टर और इंटेग्रेटेड फायर डिटेक्शन और सप्रेशन सिस्टम।
अत्याधुनिक "कंचन " और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर सिस्टम से निर्मित इस बख्तरबंद टैंक को छोटे तथा मध्यम आकार वाले हथियारों से गोलीबारी, ग्रेनेड के शेल स्पिलंटर के हमलों से बचाता है।

लगभग 11मीटर लम्बी,3.18 मीटर ऊंची,और 3.95 मीटर चौड़े इस आकर्षक और शत्रु खेमे में विनाशकारी क्षमता युक्त अर्जुन टैंक का कोई सानी नहीं है। लगभग 68000 किलोग्राम के युद्धक भार क्षमता वाले इस मुख्य युद्धक टैंक की रेंज 500 किलोमीटर और हमला करने की अधिकतम गति 57 - 70 किलोमीटर/घण्टा है।

भारतीय सेना अब इस अजेय और दुर्जेय टैंक की दो और रेजीमेंट बनाने वाली है जो अगले छह महीनों में सेना में शामिल कर ली जाएंंगी। प्रत्येक रेजीमेंट में 59 अर्जुन टैंक होंगे। 16 साल पहले सेना में शामिल किए गए 124 ‘अर्जुनों’ की तुलना में मार्क-1ए टैंक में बेहतर मारक क्षमता, गतिशीलता और सुरक्षा है। एक रक्षा वैज्ञानिक के अनुसार प्रत्येक मार्क-1ए टैंक की कीमत 54 करोड़ रुपये होगी।

अर्जुन मार्क-1ए टैंक की खासियत

यह टैंक "अपने लक्ष्य को स्वयं तलाश करने " में सक्षम है। यह स्वयं तेजी से आगे बढ़ते हुए दुश्मन के लगातार "गतिशील लक्ष्यों "पर भी सटीक प्रहार कर सकने में सक्षम है। 
 
माइन प्लॉयविंग: टैंक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि रणक्षेत्र में बिछाई गई माइंस को साफ करते हुए आसानी से आगे बढ़ सकता है।
इसके अलावा इसमें कई नए फीचर्स शामिल किए गए हैं, जो इस टैंक को न केवल बेहद मजबूत बनाते हैं बल्कि सटीक प्रहार करने में इसका कोई सानी नहीं है।

CVRDE ने इसके पूर्ववर्ती अर्जुन मार्क 1 में सेना के इच्छानुसार और भविष्य की जरूरतों के लिए कुल 89 बदलाव किए। इन तमाम बदलाव,आधुनिकीकरण और परियोजना के विकास पर नजर रखने के लिए अर्जुन कोर कमिटी के गठन किया गया। इसमें Directorate General of Quality Assurance (DGQA), the Corps of Electronics & Mechanical Engineers (EME) और सेना की सहभागिता होती थी।यह समिती मासिक रिपोर्ट की समीक्षा करती थी।

मुख्य बदलाव.

इसका वजन 62 टन से बढ़ा 67 टन किया गया,इसके साथ इसके ग्लेसिस प्लेट और टरेट(Turret) पर ट्रैक विड्थ,माइन प्लो,और एक्सप्लोसिव रिएक्टिव आर्मर(ERA) लगाया गया। रेगिस्तानी युद्ध में प्रभावी प्रदर्शन के लिए MTU इंजन और RENK ट्रांसमिशन सिस्टम से सुसज्जित किया गया है।
टैंक के भीतर तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है,इससे क्रू मेंबर की सुविधा के लिए एयर फिल्टरेशन और उन्नत कूलिंग सिस्टम को लगाया गया है ताकि बाहर की हवा अंदर प्रवेश न कर सके। क्रू मेंबर के लिए ऑक्सीजन के लिए बेहतरीन फिल्टर लगाए गए हैं। उन्नत सस्पेंसन प्रदान करने के लिए इसमें नई "हल"(Hull) लगाया गया है।

इन बदलाव के बाद यह मुख्य युद्धक टैंक मिसाइल फायरिंग में सक्षम हो गया है,जो अर्जुन मार्क 1 में नहीं थी। इस्रायली LAHAT मिसाइल सिस्टम, टैंक के टरेट पर लगा उन्नत रिमोट संचालित शस्त्र प्रणाली शामिल है।


टैंक कमांडर के लिए नाईट विजन,हंटर किलर क्षमता वाली उन्नत पैनोरोमिक साईट है जो कमांडर को गनर और लोडर के बीच बेहतर समन्वय स्थापित करने में सहायक होती है।
रूसी मूल के टी श्रृंखला के टैंक में ऑक्सिलरी पावर यूनिट(एपीयू) का आभाव है।जिससे अत्यधिक ऊर्जा खपत होती है,अर्जुन मार्क 1ए में इस प्रणाली का उपयोग कुया गया है।जिससे टी श्रृंखला के मुकाबले कारीब आधी ऊर्जा की खपत होती है।

इससे पहले सरकार ने 118 उन्नत अर्जुन टैंक खरीदने को 2012 में मंजूरी दी गई थी और 2014 में रक्षा खरीद समिति ने इसके लिए 6600 करोड़ रुपये भी आवंटित किये थे लेकिन सेना ने इसकी "फायर क्षमता" समेत कई पक्षों पर सेना ने जरूरी सुधार की मांग रखा, साथ साथ सेना ने अपनी मौजूदा क्षमता को बरकरार रखने के लिए रक्षा मंत्रालय ने 2015 में रूस से 14000 करोड़ रुपये में 464 मध्यम वजनी टी-90 टैंक की खरीद का सौदा को अंतिम रूप दिया था। सेना की जरूरी बदलाव आधार पर उन्नत किए जाने के बाद अर्जुन टैंक मार्क-1ए को 2020 में हरी झंडी मिली थी।


भारतीय सेना के आर्टिलरी बेड़े में भारी भरकम 124 अर्जुन टैंकों की एक रेजीमेंट पहले से ही साल 2004 में शामिल की जा चुकी है, जिसे पश्चिमी सीमा सहित अन्य स्थानों पर तैनात किया जाता रहा है। । इन पुराने टैंको की ऑपरेशनल समीक्षा के बाद डीआरडीओ ने इस नए संस्करण को तैयार किया है। अब शामिल किए जा रहे 118 अर्जुन टैंक अतिरिक्त फीचर वाले हैं और पहले से ज्यादा मारक क्षमता वाले हैं। इनके लिए एक और बख्तरबंद रेजीमेंट बनाई जाएगी।


अर्जुन सीरीज का आखिरी बैच।

118 अर्जुन मार्क-1ए टैंक संभवतः इस सीरीज का आखिरी बैच होेंगे। भारतीय सेना इन 68 टन वजनी होने को एक परिचलगत समस्या मानती है क्योंकि इसे एयरलिफ्ट करने में खासी दिक्कत होती है। खासतौर पर चीन के खिलाफ लद्दाख व अरुणाचल प्रदेश के दुर्गम क्षेत्रों में इस टैंक की तैनाती बेहद दुरूह हो जाती है। यहां माउंटेन वारफेयर के लिए सेना पहले ही 20 से 25 टन के हल्के और 30  से 50 टन वजन के मध्यम टैंक की आवश्यकता जता चुकी है।जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर फौरन तैनाती की जा सके

Wednesday, February 10, 2021

पेट्रोलियम शोधन के जटिल तकनीक में आत्मनिर्भर होता भारत

 प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने बीते सात फरवरी को पश्चिम बंगाल के हल्दिया में अवस्थित इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन संयंत्र में देश की दूसरी कैटेलेटिक डि वैक्सिंग इकाई का आधारशिला रखी।

इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऊर्जा गंगा पाइपलाइन का एक और बड़ा हिस्सा जनता की सेवा में समर्पित किया। इस परियोजना के लगभग 350 किलोमीटर की डोभी-दुर्गापुर पाइपलाइन बनने से पश्चिम बंगाल के साथ-साथ बिहार और झारखंड के 10 जिलों को सीधा लाभ होगा। 

https://twitter.com/narendramodi/status/1358459430648483840?s=19

पेट्रोलियम पदार्थों के शोधन में मोम (वैक्स)का पृथक्करण (सेपरेशन) एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है
पेट्रोलियम पदार्थों के शोधन(रिफाइनिंग) और भंजन(भंजन) की इस तकनीक में अभी तक हम आत्मनिर्भर नहीं हो सके थे।
 इस संयंत्र के स्थापना से भारत पेट्रोलियम शोधन क्षेत्र में आत्मनिर्भर बन सकेगा। इस तकनीक के उत्पाद और उप उत्पादों से पर्यावरणीय धारणीयता के साथ सतत, समावेशी और संपोषणीय विकास के अवधारणा की प्रक्रिया से स्वच्छ और हरित भारत की अवधारणा को अमली जामा पहनाने की दिशा में सकारात्मक पहल होगी।

क्या होती है डि वैक्सिंग प्रक्रिया
: पेट्रोलियम शोधन में यह एक जटिल रासायनिक अभिक्रिया है जिसमे उत्प्रेरक(catalyst) के रूप मे मॉलिक्यूलर सीव जिओलाइट( Molecular sieve catalysts (zeolites)) का प्रयोग किया जाता है।जिसके तहत लम्बी श्रृंखला वाले एन पैराफिन (n-paraffins) से वैक्स को बाहर किया जाता है और एन-पैराफिन के भंजन(क्रैकिंग) के दौरान इसके उप उत्पाद के रूप में गैसोलीन/पेट्रोल की प्राप्ति होती है।

इसके अनुप्रयोग: कैटेलेटिक डि वैक्सिंग तकनीक का अनुप्रयोग आइसोमेरिक (समावयवी)स्ट्रेट चेन वाले पाराफिंस के कोल्ड फ्लो प्रॉपर्टीज को कम करना और इसके उत्पादन में बढ़ोत्तरी करना होता है,
कोल्ड फ्लो प्रॉपर्टीज जो बेस आयल उत्पादन के दौरान काफ़ी बढ़ा हुआ रहता है।

पैराफिन (Paraffin wax) :

यह एक रंगहीन या कहें सफेद / ट्रांसलूसेंट कठोर मोम की संरचना वाले स्ट्रेट चेन वाले हाइड्रोकार्बन हैं।
इसे पेट्रोलियम शोधन के दौरान ऑयल स्टॉक से डि वैक्सिंग लाइट ल्युब्रिकेंट प्रणाली से अलग किया जाता है। इसका गलनांक (मेल्टिंग पॉइंट) 48° to 66° C (120° to 150° F)है।
अगर सामान्य जन जीवन मे इसके अनुप्रयोगों की बात करें तो मोमबत्ती, वैक्स पेपर,कॉस्मेटिक्स पदार्थ के निर्माण में,वार्निश और पॉलिशिंग एजेंट, और इलेक्ट्रिकल्स इंसुलेटर में किया जाता है

व्यावसायिक तौर पर ऑयल स्टॉक से डि वैक्सिंग करने की दो मुख्य प्रक्रिया है जिसमे पारम्परिक सॉल्वेंट प्रॉसेस,इसमें फ्रीजिंग साल्वेंट ट्रांस्पोर्ट माध्यम से वैक्स का पृथक्करण करते है और दूसरी अत्याधुनिक कैटेलिटिक प्रक्रिया जिसके तहत रासायनिक अभिक्रिया के तहत लम्बी श्रृंखला वाली एन-अलकेन्स ( n-alkanes) में सेलेक्टिव रिऐक्शन के माध्यम से वैक्स को बाहर करते है।

कैटेलिटिक डि वैक्सिंग में बेस ऑयल के द्वितीयक और तृतीयक श्रेणी के उच्च गुणवत्तापूर्ण उत्पादन में किया जाता है। उपरोक्त दोनो श्रेणियों के बेस ऑयल उत्पादन की काफी दुरूह प्रक्रिया है,जिसमे प्रीट्रीटिंग,डि वैक्सिंग और हाइड्रोफ़िनिशिंग जैसी प्रक्रिया को सम्पन्न करने के लिए अत्यधिक तकनीकी ज्ञान ,अनुप्रयोग,कौशल और दक्षता की जरूरत होती है।
अभी तक इस जटिल शोधन प्रतिक्रिया के सफलतापूर्वक क्रियान्वयन में बहुराष्ट्रीय पेट्रोलियम कंपनी का बोलबाला था,जिसमे शेल,एक्सॉन मोबिल प्रमुख हैं।


क्षमता : हल्दिया में स्थापित इस अत्याधुनिक संयंत्र जिसकी उत्पादन क्षमता 270,000 टन/वर्ष है । इस इकाई के निर्माण की कुल लागत करीब ₹1,019 करोड़ है। इस संयंत्र में तृतीयक समूह वाले उच्च ल्यूब्स ऑयल बेस स्टॉक( Advanced Group III Lubes Oil Base Stock (LOBS))का उत्पादन होगा,जो देश में अपने आप का प्रथम संयंत्र होगा
वर्तमान में लगभग 70 फीसद LOBS की आपूर्ति आयात द्वारा की जाती है,जिससे भारी विदेशी मुद्रा की खपत होती है।

हल्दिया पेट्रोलियम शोधन संयंत्र के इस नवीन उत्पादन प्रणाली के पूर्ण रूप से कार्यशील होने पर देश को LOBS के आयात पर निर्भरता घटकर महज आठ फीसद रह जायेगी,जिससे करीब 185 मिलियन डॉलर की विदेशी मुद्रा की सालाना बचत होगी।

हल्दिया,पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता करीब 136 दूर पूर्वी मिदनापुर जिले में हुगली और हल्दी नदी के संगम पर अवस्थित है।
हल्दिया पेट्रोलियम शोधन संयंत्र का परिचालन 1975 में शुरू हुआ था। करीब 500 हेक्टेयर में विस्तृत इस पेट्रोलियम शोधन संयंत्र में कुल चार ब्लॉक हैं जिसे ईंधन ऑयल,ल्यूब ऑयल,ओएचसीयू(OHCU) और डीएचडीएस(DHDS)ब्लॉक है।

हल्दिया में निर्मित और उत्पादित पेट्रोलियम उत्पाद को पूर्वी भारत में व्यापक खपत है,जिसे हल्दिया -मोरीगांव- राजबन्द पाइपलाइन(Haldia-Mourigram-Rajband Pipeline (HMRBPL)और हल्दिया- बरौनी -कानपुर पाइपलाइन Haldia-Barauni-Kanpur Pipeline (HBKPL) द्वारा आपूर्ति की जाती है.।

इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन की हल्दिया तेलशोधन संयंत्र देश की तटीय क्षेत्र में सार्वजनिक क्षेत्र एकमात्र तेल एवं गैस कम्पनी,जिसकी कुल क्षमता 275 TMTPA के साथ समूह I, II और III के बेस ऑयल( base oils) है जो ल्युब्रिकेंट बेस स्टॉक का उत्पादन करती है।



















अफगानिस्तान: निकटस्थ पड़ोसी से कहीं अधिक...

 भारत और अफगानिस्‍तान के द्विपक्षीय समझौते में बीते मंगलवार को एक नया आयाम "हाइड्रो-डिप्लोमेसी" के रूप में जुड़ा। भारत ने काबुल नदी के सहायक नदी पर निर्मित होने वाले शहतूत डैम परियोजना से जुड़े समझौते पर विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये बातचीत और समझौते के ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए ।

भारत के निकटस्थ पड़ोसी अफगानिस्तान के सम्बन्धों में यह तारीख को एक सुखद दिन के रूप में याद किया जाएगा। यह परियोजना अफगानिस्तान के समावेशी विकास और भावी जल प्रबंधन के दिशा में अत्यधिक महत्वपूर्ण होगी।

विडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये सम्पन्न हुए इस ऐतिहासिक सम्मेलन में अफगानिस्तान के राष्ट्रपति श्री अशरफ़ गनी ने भारत की भूरि भूरि प्रसंशा करते हुए कहा कि "यह परियोजना अफगानिस्तान के नागरिकों और काबुल वासियों के लिए "जीवन रेखा का उपहार " है जिसमे प्रगतिशील वैश्विक व्यवस्था में भारतीय मूल्यों का समावेश,लोकतंत्र,मानवता,पारस्परिक समझ,आपसी सम्मान,परस्पर विश्वास के तत्व शामिल है"।

कोविड-19 महामारी के कारण यह समारोह "वर्चुअल समिट" में हुआ, अपने संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मौलाना जलालुद्दीन रूमी को उद्धृत करते हुए कहा कि "रुमी ने नदियों के शक्तिशाली सभ्यतागत संबंध के बारे में कहा था कि, "जो नदी तुममें बहती है, वह मुझमें भी बहती है"। नदियाँ विश्व की महान सभ्यताओं की वाहक रही हैं। इसी भाव से जुड़कर भारत की मदद से 300 मिलियन डॉलर के खर्च पर सलमा बांध बनाया गया है , जो अफगानिस्तान को जल संकट से उबारने में मील का पत्थर साबित होगा। कुछ वर्ष पहले बने 'मैत्री बाँध' से हेरात में बिजली और सिंचाई की प्रणाली सुदृढ़ हुई है। इसे 1500 भारतीय और अफ़ग़ान इंजीनियरों ने मिलकर निर्मित किया था ।

https://twitter.com/narendramodi/status/1359051020911845379?s=09

विथ लव फ्रॉम इंडिया।

शहतूत डैम : 236 मिलियन डॉलर की लागत वाले इस डैम का निर्माण को भारतीय अभियांत्रिकी के बेजोड़ नमूने के रूप में हम देख सकेंगे । इसे लालंदर बांध के नाम से भी जाना जाता है।      
भारत,काबुल नदी बेसिन में एक सिंचाई नेटवर्क का विकास भी  द्वारा किया जाएगा ।यह डैम अफगानिस्तान के जल प्रबंधन को नया आयाम देते हुए उसे " नवीन सक्षम जलीय अवसंरचनात्मक ढांचा " विकसित करने में मदद करेगा।

अफगानिस्तान के काबुल प्रान्त के चाहर आसियाब(Chahar Asiab)जिले में मैदान नदी(Maidan River) पर इस महत्वाकांक्षी डैम का निर्माण किया जाएगा । यह नदी,काबुल नदी की ऊपरी सहायक नदी है। इस डैम की कुल जल संग्रहण क्षमता 147लाख घन फुट(MCM) होगी।

इसका निर्माण अफ़ग़ानिस्तान के काबुल प्रान्त केे दो सूखे ग्रस्त  जिले, खैराबाद और चाहर आसियाब में उपजे गम्भीर जल संकट से निजात दिलाने और 4000 हेक्टेयर की सिंचाई व्यवस्था दुरुस्त करने के मकसद से की गई है।
 इस डैम से न सिर्फ काबुल प्रान्त और उसके बाहरी भाग में बसाए जा रहे शहर डेह सब्ज (Deh Sabz) के लगभग 20 लाख लोगों को स्वच्छ पेयजल मुहैय्या कराने में अपनी केंद्रीय भूमिका निभाएगा। 

https://twitter.com/rtaworld/status/1359037724347543556?s=19

काबुल नदी : इस नदी का उद्गम मध्यवर्ती अफगानिस्तान में अवस्थित हिंदुकुश पर्वत से होता है,लगभग 700 किलोमीटर लम्बी काबुल नदी के किनारे बसे शहरों में काबुल,सुरोभी और जलालाबाद है। जलालाबाद के पूर्व में काबुल नदी में इसकी मुख्य सहायक नदी कुन्नर मिलती है,जो पाकिस्तान से उद्गमित होती है,जहां इसे चित्राल नदी के रूप में जाना जाता है।
पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तूनख्वा प्रान्त को सिंचित करती हुई काबुल नदी पेशावर में प्रवेश करती है और इस्लामाबाद के उत्तर पश्चिम में अवस्थित एटोक में सिंधु नदी में मिल कर अपनी यात्रा को विराम देती है।
दोनो देशों में काबुल नदी का अत्यधिक महत्व है, इसके बेसिन में अफ़ग़ानिस्तान के नौ और पाकिस्तान के दो प्रान्त है जिसमें 25 मिलियन जनसंख्या निवास करती है। काबुल नदी और इसकी सहायक नदियां अफगानिस्तान और पाकिस्तान की सात मिलियन जनसंख्या के पेयजल का एक मात्र स्रोत है।

इस डैम का महत्व :शहतूत डैम का महत्व का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दशक से लगातार सूखे और गम्भीर जल संकट का सामना कर रहे राजधानी काबुल और आसपास के लिए यह डैम, भू जल रिचार्ज,सूखे और जल संकट से निजात दिलाने में वरदान सिद्ध होगा।
राजधानी काबुल में जलसंकट का होना इसके भौगोलिक अवस्थिति के कारण है,अफगानिस्तान जैसे विशिष्ट भूआवेष्टित देश की यह राजधानी एक सूखे प्रदेश में अवस्थित है,जहां महज 350-70 मिलीमीटर वार्षिक वर्षा होती है। बढ़ती जनसंख्या और रोजगार की तलाश में अन्य प्रांतों से यहां आती भारी जनसंख्या का दवाब, गहरे कुंए,बोरिंग और गहरे बोरवेल की खुदाई,और लगातार गिरते भू:जलस्तर को बेहतर बनाने के लिए पूरी अफगानी सभ्यता के लिए सही सही मायने में "विथ लव फ्रॉम इंडिया"होगा



पाकिस्तान का बेजा विरोध।

अफगानिस्तान और पाकिस्तान, काबुल नदी के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम बेसिन में बसे देश हैं
इसी कारण पाकिस्तान, अफगानिस्तान द्वारा काबुल नदी पर किसी भी तरह के अधोसंरचना निर्माण पर अपना विरोध जताता रहता है।
भारत-अफ़ग़ान मैत्री पाकिस्तान को फूटी आंख नहीं सुहाती है,अफगानिस्तान में विभिन्न भारतीय परियोजनाओं पर उसकी वक्र दृष्टि बनी रहती है।
भारत द्वारा अवसंरचना एवं अधोसंरचना निर्माण,डैम,पेयजल और सड़क परियोजना की मंशा पर पाकिस्तानी नेतृत्व और मीडिया लगातार उल जुलूल सवाल खड़े करता रहता है।

अफगानिस्तान के नव निर्माण में भारत का केंद्रीय महत्व और पाकिस्तान का गिरता कद, पाकिस्तानी हुक्मरानों के आंखों की नींद और दिल का चैन,दोनो ही उड़ गई है

यहां गौर करने वाली बात है कि विगत वर्ष पूर्व तक अफगानिस्तान में भारतीय पदचिह्न,पूरी तरह पाकिस्तान के रहमोकरम पर निर्भर था,जिसे ईरान के मकरान तट पर अवस्थित और भारत द्वारा निर्मित चाबाहार बन्दरगाह परियोजना ने अफगानिस्तान पर पाकिस्तानी भौगौलिक प्रभुत्व को छिन्न भिन्न कर दिया,इस बन्दरगाह के परिचालन से भारत
डेलाराम जरांज़ राजमार्ग,के जरिये जिसे रूट 606 या A71 कहा जाता है,अफगान मुख्य भूमि से सीधा जुड़ जाएगा।
यह राजमार्ग ईरान अफगानिस्तान के सीमवर्ती शहर डेलराम को निमरुज प्रान्त के जरांज़ को चाबहार बन्दरगाह से जोड़ता है। तकरीबन 200 किलोमीटर लंबी और 600 करोड़ रुपये वाली इस राजमार्ग परियोजना को भारत ने पूर्ण वित्तीयन किया है।
सीमा सड़क संगठन(BRO) ने 2005 में इस परियोजना का निर्माण शुुरु किया और 2009 में इसे आम अफगानी नागरिकों को सौंप दिया।
 अफ़ग़ानिस्तान के पुर्ननिर्माण और उसके क्षमता विकास सहित अन्य मोर्चो पर भारत अपना "निकटस्थ पड़ोसी" के विकास के लिए अपना दायित्व पूरी शिद्दत के साथ निभा रहा है।

कूटनीतिक मंचो पर पाकिस्तान की धूर्तता जग जाहिर है, इस परियोजना के जरिये भी भारत ने पाकिस्तान को "वाटर डिप्लोमेसी" में भी जबर्दस्त पटखनी दी है,पहले सिंधु नदी के सहायक नदियों पर विभिन्न परियोजनाओं की शुरुआत के भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने इरादे स्पष्ट किये है।

दक्षिण एशिया के समृद्धि,संबद्धता और स्थायित्व के लिए सम्प्रभु,शांतिपूर्णऔर एकजुट अफगानिस्तान का होना अतिआवश्यक है, और यह बात रावलपिंडी और इस्लामाबाद को समझ नहीं आती है।

अफगानिस्तान: निकटस्थ पड़ोसी से कहीं अधिक:

यह डैम भारत अफगानिस्तान के मैत्री का नया प्रतिमान स्थापित करेगा और हाइड्रो डिप्लोमेसी के क्षेत्र में मील का पत्थर सिद्ध होगा।
अफगानिस्तान में कई अवसंरचनात्मक विकास कार्यों में भारत पूरी सक्रियता के साथ अफगान समाज के नव निर्माण में अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए एक सक्षम,समर्थ और सहभागी देश की जिम्मेदारी का बख़ूबी निर्वहन कर रहा है।
इसी कड़ी में 2015 में भारत अफगानिस्तान मैत्री डैम जिसे "सलमा डैम" भी कहा जाता है और अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक मूल्यों का प्रतीक "संसद भवन" का निर्माण का कार्य पूरा किया है।




अफगानिस्तान को लैंड लॉक्ड देश से लैंड ब्रिज देश बनाने में मदद :

अफगानिस्तान की सड़क अवसंरचना को उन्नत बनाने और उसे "लैंड लॉक्ड देश से लैंड ब्रिज देश"बनाने अफगानी शीर्ष नेतृत्व के लक्ष्य को नई दिशा देते हुए 218 किलोमीटर लम्बी डेलराम - जरांज़ सड़क परियोजना,जो ईरान के चाबहार बन्दरगाह को बारहमासी संपर्क प्रदान करती है, को अंतिम रूप दे रहा है।
इसी कड़ी में रेल मार्गों का विकास,उच्च क्षमता वाले विद्युत पारेषण(ट्रांसमिशन)लाइन का विस्तार शामिल है। बीते नवम्बर में सम्पन्न "अफगानिस्तान 2020 कांफ्रेंस" जिसमें संयुक्त राष्ट्र,यूरोपीय संघ नीत सम्मेलन में भारत ने अफगानिस्तान में 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर की कुल 150 परियोजनाओं को शुरू करने का निर्णय लिया था।

वर्तमान में अफगानिस्तान में भारतीय सहायता :

* अफगानिस्तान में भारत उच्च क्षमता निर्माण वाले सामुदायिक विकास के चौथे चरण को अपनी विभिन्न स्तरों पर अपनी सहायता प्रदान कर रहा है।

* आम अफगानी नागरिकों को सुचारू और निर्बाध विद्युत आपूर्ति प्रदान करने के लिए 202 किलोमीटर लम्बी पुल ए खुमरी(Pul e Khumri )पारेषण लाइन जा निर्माण कर चुका है।
इसके अलावा भारत, 

बामियान प्रांत में बंद-ए-अमीर तक सड़क संपर्क, परवान प्रांत में चारिकार शहर के लिये जलापूर्ति नेटवर्क,

मजार-ए-शरीफ में पॉलीटेक्नीक कॉलेज के निर्माण , 
कंधार में अफगान राष्ट्रीय कृषि विज्ञान और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय (ANASTU) की स्थापना में तकनीकी सहयोग का भरोसा दिलाया है।
मई,2017 में प्रक्षेपित दक्षिण एशियाई उपग्रह में अफगानिस्तान की भागीदारी से भारत रिमोट सेंसिंग प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोगों में अफगानिस्तान की मौसम विज्ञान प्राद्योगिकी में सहायता कर रहा है।

इसके अतिरिक्त ; इंदिरा गाँधी शिशु स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण, काबुल में हबीबी स्कूल की स्थापना आदि में महत्त्वपूर्ण सहायता दी है।भारत-अफगानिस्तान में कृषि, बैंकिंग, कंप्यूटर, खनन, स्वास्थ्य क्षेत्र आदि में सहायता के लिए बार-बार प्रतिबद्धता व्यक्त की है.


अफगानिस्तान के लिये भारतीय नीति

भारत,अफगानिस्तान के विकास कार्यो में अपनी "पांच सूत्री रणनीति " में एक नया "वैक्सीन डिप्लोमेसी" को जोड़ते हुए अपनी छः सूत्री रणनीति को जमीनी हकीकत प्रदान करता है। ये हैं

* विशाल अधोसंरचना और अवसंरचनात्मक परियोजना का निर्णाण करना।
* मानव संसाधनों का विकास और क्षमता निर्माण करना।
* मानवीय सहायता मुहैया
* उच्च क्षमता और प्रभाव वाले सामुदायिक विकास
* व्यापार,व्यवसाय और निवेश को नई दिशा देना,और इसके लिए वायु और सड़क सम्पर्क को और बेहतर बनाना।
*कोविड-19 महामारी से निपटने के लिए व्यापक बॉयो मेडिकल सहायता और भारत निर्मित वैक्सीन मुहैया कराना।
विगत 2001 से भारत अफगानिस्तान के नवनिर्माण में तीन अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक की राशि को इस मद में आवंटित कर चुका है ।

भारत के लिए अफगानिस्तान महज "निकटस्थ पड़ोसी"से कहीं बढ़कर है,इससे हमारे  सभ्यतागत,सांस्कृतिक,आर्थिक,सामरिक,रणनीतिक हित और महत्व है। भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचो पर अफगानिस्तान के विकास के सभी मोर्चे पर अपनी व्यापक भूमिका को पूरी जिम्मेवारी को संजीदगी से निभाने के लिए प्रतिबद्ध है।
भारत एक एकीकृत, संप्रभु, लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण, स्थिर, समृद्ध और बहुलवादी अफगानिस्तान के निर्माण में निरंतर सहयोग के लिए प्रतिबद्ध है।












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