ईरान के ओपनहाइमर कहे जाने वाले,प्रख्यात नाभिकीय विज्ञानी और ईरानी नाभिकीय कार्यक्रम के जनक डाक्टर मोहसेन फकीरिज़ादेह (Mohsen Fakhrizadeh) अज्ञात बन्दूकधारियों के एक लक्षित हमले में मारे गए।
वर्ष 2020 ईरान के लिए बेहद मातमी वर्ष सिद्ध हो रहा है,साल के शुरुआत में ही रिवोल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में मौत,वहीं बीती गर्मियों में ईरानी परमाणु संयंत्र में संदेहास्पद जबर्दस्त विस्फोट,और अब डॉ.फकीरिज़ादेह की हत्या।
एम्बुश अटैक :
बीते 27 नवंबर को जब डॉ.फकीरिज़ादेह तेहरान के अबसर्द शहर के ग्रामीण इलाके दमावन्द में (राजधानी तेहरान के 65 किमी पूर्व में) जब अपनी कार से सफर कर थे थे उनपर पहले से घात लगाए तीन से चार बंदूकधारियों ने उनकी कार पर ताबड़तोड़ हमलों में उनकी मृत्यु हो गयी,
ईरानी विदेशमंत्री जावेद जरीफ ने अपने ट्वीट में इसकी जानकारी देते हुए,इन हमलों के पीछे इजरायल के हाथ बताया और आतंकवाद के मसले पर अंतरराष्ट्रीय बिरादरी को ईरान के साथ आने का आह्वान किया,वहीं उन्होंने यूरोपीय संघ को इस मसले पर दोहरा मानदंड अपनाने पर जम कर लताड़ लागायी।
https://twitter.com/JZarif/status/1332345633425022976?s=19
कौन थे डाक्टर मोहसेन फकीरिज़ादेह :
ये ईरान की नाभिकीय कार्यक्रम के प्रमुख थे। इन्हें ईरान के परमाणु कार्यक्रम का जनक कहा जाता है। डॉ.फकीरिज़ादेह को इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (IRGC) में ब्रिगेडियर जनरल का ओहदा प्राप्त था। नाभिकीय इंजीनियरिंग में डॉक्टरेट फकीरिज़ादेह राजधानी तेहरान के इमाम हुसैन विश्वविद्यालय में प्राध्यापक थे। वे बैलेस्टिक मिसाइल विशेषज्ञ भी थे,जो ईरान के मिसाइल कार्यक्रम में पूरी तन्मयता के साथ सम्बद्ध थे।
इनका जन्म मध्य ईरान में स्थित शियाओं के पवित्र शहर कौम में 1958 में हुआ था।डॉ. फकीरिज़ादेह ईरान के सबसे अधिक सुरक्षित व्यक्तियों में एक थे,जिन्हे अंगरक्षकों की पूरी टोली उन्हे सुरक्षा प्रदान करती थी।
पश्चिमी मीडिया डॉ.फकीरीज़ादेह की तुलना महान भौतिकविद और अमेरिकी नाभिकीय कार्यक्रम के जनक रॉबर्ट ओपेनहाइमर 1^ से करती है। रॉबर्ट ओपेनहाइमर कैलिफोर्निया विश्विद्यालय, बार्कले में थियरीटिकल भौतिकी प्राध्यापक,और अमेरिकी प्रोजेक्ट मैनहट्टन और ट्रिनिटी टेस्ट के कर्ता धर्ता रहे थे।
ईरानी नाभिकीय वैज्ञानिकों के हत्या का सिलसिला जारी।
ईरानी नाभिकीय/मिसाइल वैज्ञानिकों की हत्या का एक पैटर्न देखने को मिलता है, विभिन्न हमलों में मारे गए वैज्ञानिक या अपने कार्यस्थल पर जा रहे थे या वापस आ रहे थे, तभी उनपर लक्षित हमला हुआ।बीते दशक में ईरान ने कम से कम छः परमाणु वैज्ञानिकों की हत्या हुई है।
2010 में मसूद अली मोहम्मदी(Masoud Ali Mohammadi) पार्टिकल फिजिक्स के विशेषज्ञ,जिसे मोटरसाइकिल सवार द्वारा रिमोट नियंत्रित बम विस्फोट में मृत्यु हो गयी।
2011 में नाभिकीय वैज्ञानिक,माज़िद शहरियारी(Majid Shahriari) की कार बम विस्फोट में मौत और फिरदौन अब्बासी दवानी(FereidoonAbbasi Davani)जो उस
वक्त परमाणु कार्यक्रम के प्रमुख थे,उनपर भी जानलेवा हमला,जिसमे वे बाल बाल बच गए थे । जो बाद में मारे गए।
डॉ.फकीरीज़ादेह एकाएक उस वक्त चर्चा में आ गए जब 2018 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेत्यन्याहू में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के दौरान
ट्रम्प प्रशासन तकनीकी और प्रभावी रूप से आगामी 19 जनवरी 2021 तक अमेरिकी राष्ट्रपति हैं,इस हैसियत से वे तमाम कार्य कर सकते है,यहां तक कि युद्ध की घोषणा भी।
जग जाहिर है कि नए नवेले डेमोक्रेट्स ईरान के साथ अपने सम्बन्ध सुधारने के लिये प्रतिबद्ध है।
वे ओबामा प्रशासन द्वारा किये गए ईरान के साथ उस परमाणु समझौते को प्रवर्तनीय बनाना चाहते है,जिसे ट्रम्प प्रशासन ने 2018 में सिरे से,एकतरफा ख़ारिज कर दिया था।
ईरान के प्रति डेमोक्रेट्स का यह रुख न तो इज़रायल और न हीं सऊदी क्राउन मुहमद बिन सलमान को पसंद है,भले ही वर्तमान में इस्राइल और सऊदी के बीच कोई राजनययिक सम्बन्ध न हो।
यह वही सऊदी अरब है,जो अरब लीग का अगुवा बन इजराइल के साथ "छह दिन का युद्ध " किया था,जिसमे अरब लीग को इजरायल के हाथों मुँह की खानी पड़ी थी।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का चिरसम्मत सिद्धांत है कि: इसके बिसात पर न तो कोई स्थायी मित्र अथवा शत्रु होता है,राष्ट्रहित सर्वोच्च और सर्वोपरि होते हैं यही कुछ सऊदी और इजराइल के साथ देखने को मिल रहा है।
ईरान के मसले में इजरायल का कठोर रवैय्या रहा है,वे पूरा जोर लगाएंगे की कुछ ऐसा हो जिससे अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध हो जाय,जिससे पश्चिम एशिया में अमेरिका का प्राकृतिक सहयोगी के रूप में इजरायल पूरा दखल दे,मजबूरी में सऊदी अरब को भी अमेरिका इजरायल का साथ देना पड़े।
गमगीन ईरान की रणनीतिक धैर्य की परीक्षा :
अपने वैज्ञानिकों के हत्या से शोकाकुल और मातम मनाते ईरान को अपने कदम फूंक फूंक कर रखने की जरूरत है । ईरान का सर्वोच्च धार्मिक,शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने इस हत्याकांड पर सम स्वर से कड़ी निंदा और निश्चित रूप से बदला लेने की बात की है।
1.अगर ईरान में जल्दबाजी दिखाते हुए इस्राएल या सऊदी या फारस /होरमुज की खाड़ी में तैनात अमेरिकी बलों,या अड्डो को अपना निशाना बनाया,अथवा हॉरमुज की खाड़ी को बंद किया,"जो ईरान के लिए आधे ग्लास पानी पीने जैसा है" तो पूरे क्षेत्र में एक नई समस्या खड़ी होगी,जिसका अंत युद्ध में परिणित होगा
2.इस्रायल चाहेगा कि तेहरान ऐसी कोई गलती करे,जिससे उसे पलटवार करने का जायज़ मौका मिले।
3.सऊदी अरब भले ही वैचारिक और धार्मिक रूप से ईरान का विरोधी रहा हो,लेकिन ईरान पर हमले के बाद ईरानी पलटवार से वह खुद कितना बचा पायेगा यह भविष्य के गर्भ में होगा। वर्तमान में सऊदी अरब सर्वांगीण विकास और विभिन्न सामाजिक सुधारों की राह पर चल रहा है,ऐसे हालात में उसके लिए ईरान के साथ युद्ध करना किसी भी सूरत में लाभ का सौदा नहीं होगा।
4.वर्तमान में ईरान प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा था,बीते जनवरी में मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद भी यही देखने को मिला था,लेकिन साल में दो दफे भारी भरकम चोट खाने के बाद ईरान की धैर्य की परीक्षा लेना, ईरानी राजनीतिक और सैन्य शीर्ष नेतृत्व के लिए बेहद कठिन कार्य होगा।
5.अभी ट्रम्प प्रशासन के पास लगभग पचास दिनों का समय शेष है,ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अमेरिकी बल ईरान के नाभिकीय प्रतिष्ठानों को अपना निशाना बनाये,ईरानी प्रत्युत्तर की बात काल के गर्भ और बाइडेन के किस्मत पर छोड़ दें, और फिर राष्ट्रपति ट्रम्प व्हाइट हाउस से विदा लें।
6.अगर ट्रम्प ऐसा करने में सफल होते हैं तो नए नियुक्त राष्ट्रपति बाइडेन के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण और बदतर परिस्थिति के बीच राष्ट्रपति का पद एक महज कांटो का भरा ताज ही होगा।
ऐसी प्रबल संभावना है कि अगर किसी भी पक्ष की तरफ़ से किसी तरह की दुस्साहस की कोशिश हुई तो एक सीमित युद्ध की अवधारणा परिवर्तित होकर पूर्ण युद्ध में निश्चित रूप से तब्दील हो जाएगी,जिसे सम्भवतः कोई पक्ष पसन्द नहीं करेगा।
7.अगर ईरान ने आवेश में आकर किसी तरह की जबाबी कार्रवायी को अंजाम दिया तो फिर वापस लौटना बेहद मुश्किल होगा,फिर उसे रणनीतिक गठबंधन कि चोट और अन्य तमाम तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।
इसी बीच क्षेत्र में तेजी से बिगड़ते हालात और किसी भी अवाँछित स्थिति से निबटने के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्रालय(पेंटागन) ने अपने परमाणु क्षमता संपन्न वाले सुपरकैरियर/विमानवाहक पोत यूएसएस निमित्ज़(CVN-68)को फारस की खाड़ी की तरफ मोड़ दिया है ।
उपरोक्त पेंचीदगी भरे घटनाक्रम और आशंकाओं के बीच,वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बेहतर माहौल और समस्या के समाधान की उम्मीद को कभी नहीं छोड़ना चाहिए,कहते भी हैं कि हर समस्या का समाधान उस समस्या में ही छिपा होता है।
1^1^https://www.atomicheritage.org/profile/j-robert-oppenheimer
ऐसा माना जाता है कि ये दोनों भी डॉ फकीरीजदेह के साथ कार्यरत थे।
2011 में ही डारियश रेज़ाईनेजाद (Darioush Rezaeinejad) जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम से सम्बद्ध थे एक मोटरसाइकिल सवार बंदूकधारी हमले में मारे गए।
जबकि 2012 में मुस्तफ़ा अहमदी रोशन (Mostafa Ahmadi Roshan) जो ईरान के नतांज़ स्थित यूरेनियम संवर्धन केंद्र,के उप प्रमुख थे, वे मैग्नेटिक बम हमले में मारे गए और अब हालिया डॉ.फकीरीजादेह ने आतंकी और लक्षित हमलों में अपनी जान गंवाई है।
ईरान भले ही अपने नाभिकीय वैज्ञानिकों की मौत के लिए इज़रायल ,सऊदी अरब और अमेरिका को जिम्मेदार मानता हो,उनपर आरोप लगाता हो लेकिन इसके पक्ष में उसने वैश्विक मंचो पर कभी कोई ठोस सबूत /साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किये है।
2012 में तेहरान में आयोजित गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन स्थल के मुख्य द्वार पर विभिन्न हमलों में मारे गए अपने नाभिकीय वैज्ञानिकों के कार को प्रदर्शित कर अपने रोष का इज़हार किया था। इसे तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के आदेश पर इन कारों को समारोहस्थल पर लगाया गया था।
इजराइल की लिस्ट में.
2011 में ही डारियश रेज़ाईनेजाद (Darioush Rezaeinejad) जो ईरान के परमाणु कार्यक्रम से सम्बद्ध थे एक मोटरसाइकिल सवार बंदूकधारी हमले में मारे गए।
जबकि 2012 में मुस्तफ़ा अहमदी रोशन (Mostafa Ahmadi Roshan) जो ईरान के नतांज़ स्थित यूरेनियम संवर्धन केंद्र,के उप प्रमुख थे, वे मैग्नेटिक बम हमले में मारे गए और अब हालिया डॉ.फकीरीजादेह ने आतंकी और लक्षित हमलों में अपनी जान गंवाई है।
ईरान भले ही अपने नाभिकीय वैज्ञानिकों की मौत के लिए इज़रायल ,सऊदी अरब और अमेरिका को जिम्मेदार मानता हो,उनपर आरोप लगाता हो लेकिन इसके पक्ष में उसने वैश्विक मंचो पर कभी कोई ठोस सबूत /साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किये है।
2012 में तेहरान में आयोजित गुट निरपेक्ष देशों के सम्मेलन स्थल के मुख्य द्वार पर विभिन्न हमलों में मारे गए अपने नाभिकीय वैज्ञानिकों के कार को प्रदर्शित कर अपने रोष का इज़हार किया था। इसे तत्कालीन राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद के आदेश पर इन कारों को समारोहस्थल पर लगाया गया था।
इजराइल की लिस्ट में.
डॉ.फकीरीज़ादेह एकाएक उस वक्त चर्चा में आ गए जब 2018 में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेत्यन्याहू में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में अपने पावर पॉइंट प्रेजेंटेशन के दौरान
डॉ.फकीरीजादेह की तस्वीर दिखाते हुए कहा था :
"फकीरीजादेह का नाम याद रखियेगा
(“Remember that name, Fakhrizadeh").
अनाधिकृत रूप से प्राप्त समाचारों में डॉ. फकीरीज़ादेह इस्राएल की खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की वांछित सूची में शामिल थे, इस हमले से पहले उनपर कई बार जानलेवा हमला हुआ था जिसमे वे बाल बाल बचे गए थे।
प्रोजेक्ट 111 और अमद कार्यक्रम के अगुआ:
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग (IAEA) की वर्ष 2011 की एक रिपोर्ट के मुताबिक डॉ फकीरीजादेह ईरान के महत्वाकांक्षी "अमद (AMAD) या “Hope” कार्यक्रम के कार्यपालक अधिकारी ("Executive Officer) थे। जिसे ईरान सिरे से ख़ारिज करता है,
पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों का मानना है कि डॉ फकीरीजादेह ईरान के गुप्त नाभिकीय कार्यक्रम के अगुआ है, वे ईरान के रक्षा मंत्रालय की अनुसन्धान और नवोन्मेष संस्थान( Research and Innovation Organization ) जिसे (SPND) कहा जाता है, के प्रमुख भी हैं।
"ईरान के ओपनहाइमर"माने जाने वाले डॉ.फकीरीजादेह पर आरोप है कि वे इस कार्यक्रम के तहत ईरान रणनीतिक और सामरिक रूप के साथ साथ असैन्य उपयोग में आने वाली दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी इनके ही नेतृत्व में विकसित कर रहा था।
पश्चिमी देशों का यह भी मानना है कि इस प्रोजेक्ट के तहत ईरान ख़ुफ़िया तरीके से नाभिकीय हथियारों का ज़खीरा खड़ा करना चाहता है। ईरान शुरुआत से ही नाभिकीय हथियारों के सामरिक उपयोग की बात को नकारता रहा है।
डॉ.फकीरीज़ादेह की मृत्यु से ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम को निश्चित रूप से मानसिक और पेशेवर रूप में गहरा झटका लगा है।
पश्चिम एशिया में गर्माता माहौल।
बीते जनवरी में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर क़ासिम सुलेमानी ,जो इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गये थे,की हत्या के बाद ईरान की दूसरी सबसे हाई प्रोफाइल मौत है।
इस हत्याकांड से निश्चित रूप से पूरे पश्चिम एशिया की सिक्युरिटी आर्किटेक्चर पर गम्भीर असर पड़ने के पूरे आसार है।
जहां ईरानी सैन्य रणनीतिकार निश्चित रूप से अपने वैज्ञानिक की हत्या में इजरायल का हाथ मानते है वहीं दूसरी तरफ इस हत्याकांड से क्षेत्रीय असन्तुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।
इस क्षेत्र में जहां एकतरफ अमेरिका,इजरायल और सऊदी अरब है तो वहीं दूसरी तरफ बुरी तरह चोट खाया हुआ ईरान।
वर्तमान सामरिक परिस्थितियों पर गौर करें तो निवर्तमान ट्रम्प प्रशासन को ईरान फूटी आंख नहीं सुहाता है,वहीं इनके साथ
अनाधिकृत रूप से प्राप्त समाचारों में डॉ. फकीरीज़ादेह इस्राएल की खुफिया एजेंसी मोसाद और अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की वांछित सूची में शामिल थे, इस हमले से पहले उनपर कई बार जानलेवा हमला हुआ था जिसमे वे बाल बाल बचे गए थे।
प्रोजेक्ट 111 और अमद कार्यक्रम के अगुआ:
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा आयोग (IAEA) की वर्ष 2011 की एक रिपोर्ट के मुताबिक डॉ फकीरीजादेह ईरान के महत्वाकांक्षी "अमद (AMAD) या “Hope” कार्यक्रम के कार्यपालक अधिकारी ("Executive Officer) थे। जिसे ईरान सिरे से ख़ारिज करता है,
पश्चिमी ख़ुफ़िया एजेंसियों का मानना है कि डॉ फकीरीजादेह ईरान के गुप्त नाभिकीय कार्यक्रम के अगुआ है, वे ईरान के रक्षा मंत्रालय की अनुसन्धान और नवोन्मेष संस्थान( Research and Innovation Organization ) जिसे (SPND) कहा जाता है, के प्रमुख भी हैं।
"ईरान के ओपनहाइमर"माने जाने वाले डॉ.फकीरीजादेह पर आरोप है कि वे इस कार्यक्रम के तहत ईरान रणनीतिक और सामरिक रूप के साथ साथ असैन्य उपयोग में आने वाली दोहरे उपयोग की प्रौद्योगिकी इनके ही नेतृत्व में विकसित कर रहा था।
पश्चिमी देशों का यह भी मानना है कि इस प्रोजेक्ट के तहत ईरान ख़ुफ़िया तरीके से नाभिकीय हथियारों का ज़खीरा खड़ा करना चाहता है। ईरान शुरुआत से ही नाभिकीय हथियारों के सामरिक उपयोग की बात को नकारता रहा है।
डॉ.फकीरीज़ादेह की मृत्यु से ईरान के नाभिकीय कार्यक्रम को निश्चित रूप से मानसिक और पेशेवर रूप में गहरा झटका लगा है।
पश्चिम एशिया में गर्माता माहौल।
बीते जनवरी में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड के कमांडर क़ासिम सुलेमानी ,जो इराक की राजधानी बगदाद में अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गये थे,की हत्या के बाद ईरान की दूसरी सबसे हाई प्रोफाइल मौत है।
इस हत्याकांड से निश्चित रूप से पूरे पश्चिम एशिया की सिक्युरिटी आर्किटेक्चर पर गम्भीर असर पड़ने के पूरे आसार है।
जहां ईरानी सैन्य रणनीतिकार निश्चित रूप से अपने वैज्ञानिक की हत्या में इजरायल का हाथ मानते है वहीं दूसरी तरफ इस हत्याकांड से क्षेत्रीय असन्तुलन बिगड़ता नजर आ रहा है।
इस क्षेत्र में जहां एकतरफ अमेरिका,इजरायल और सऊदी अरब है तो वहीं दूसरी तरफ बुरी तरह चोट खाया हुआ ईरान।
वर्तमान सामरिक परिस्थितियों पर गौर करें तो निवर्तमान ट्रम्प प्रशासन को ईरान फूटी आंख नहीं सुहाता है,वहीं इनके साथ
"बिबी और एमबीएस"की जोड़ी ट्रम्प के साथ है,जिनकी नजरों में अरसे से ईरान के साथ धार्मिक,वैचारिक और सामरिक मतभेद जग जाहिर है।
ट्रम्प प्रशासन तकनीकी और प्रभावी रूप से आगामी 19 जनवरी 2021 तक अमेरिकी राष्ट्रपति हैं,इस हैसियत से वे तमाम कार्य कर सकते है,यहां तक कि युद्ध की घोषणा भी।
जग जाहिर है कि नए नवेले डेमोक्रेट्स ईरान के साथ अपने सम्बन्ध सुधारने के लिये प्रतिबद्ध है।
वे ओबामा प्रशासन द्वारा किये गए ईरान के साथ उस परमाणु समझौते को प्रवर्तनीय बनाना चाहते है,जिसे ट्रम्प प्रशासन ने 2018 में सिरे से,एकतरफा ख़ारिज कर दिया था।
ईरान के प्रति डेमोक्रेट्स का यह रुख न तो इज़रायल और न हीं सऊदी क्राउन मुहमद बिन सलमान को पसंद है,भले ही वर्तमान में इस्राइल और सऊदी के बीच कोई राजनययिक सम्बन्ध न हो।
यह वही सऊदी अरब है,जो अरब लीग का अगुवा बन इजराइल के साथ "छह दिन का युद्ध " किया था,जिसमे अरब लीग को इजरायल के हाथों मुँह की खानी पड़ी थी।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का चिरसम्मत सिद्धांत है कि: इसके बिसात पर न तो कोई स्थायी मित्र अथवा शत्रु होता है,राष्ट्रहित सर्वोच्च और सर्वोपरि होते हैं यही कुछ सऊदी और इजराइल के साथ देखने को मिल रहा है।
ईरान के मसले में इजरायल का कठोर रवैय्या रहा है,वे पूरा जोर लगाएंगे की कुछ ऐसा हो जिससे अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध हो जाय,जिससे पश्चिम एशिया में अमेरिका का प्राकृतिक सहयोगी के रूप में इजरायल पूरा दखल दे,मजबूरी में सऊदी अरब को भी अमेरिका इजरायल का साथ देना पड़े।
गमगीन ईरान की रणनीतिक धैर्य की परीक्षा :
अपने वैज्ञानिकों के हत्या से शोकाकुल और मातम मनाते ईरान को अपने कदम फूंक फूंक कर रखने की जरूरत है । ईरान का सर्वोच्च धार्मिक,शीर्ष राजनीतिक और सैन्य नेतृत्व ने इस हत्याकांड पर सम स्वर से कड़ी निंदा और निश्चित रूप से बदला लेने की बात की है।
1.अगर ईरान में जल्दबाजी दिखाते हुए इस्राएल या सऊदी या फारस /होरमुज की खाड़ी में तैनात अमेरिकी बलों,या अड्डो को अपना निशाना बनाया,अथवा हॉरमुज की खाड़ी को बंद किया,"जो ईरान के लिए आधे ग्लास पानी पीने जैसा है" तो पूरे क्षेत्र में एक नई समस्या खड़ी होगी,जिसका अंत युद्ध में परिणित होगा
2.इस्रायल चाहेगा कि तेहरान ऐसी कोई गलती करे,जिससे उसे पलटवार करने का जायज़ मौका मिले।
3.सऊदी अरब भले ही वैचारिक और धार्मिक रूप से ईरान का विरोधी रहा हो,लेकिन ईरान पर हमले के बाद ईरानी पलटवार से वह खुद कितना बचा पायेगा यह भविष्य के गर्भ में होगा। वर्तमान में सऊदी अरब सर्वांगीण विकास और विभिन्न सामाजिक सुधारों की राह पर चल रहा है,ऐसे हालात में उसके लिए ईरान के साथ युद्ध करना किसी भी सूरत में लाभ का सौदा नहीं होगा।
4.वर्तमान में ईरान प्रतिशोध की अग्नि में जल रहा था,बीते जनवरी में मेजर जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या के बाद भी यही देखने को मिला था,लेकिन साल में दो दफे भारी भरकम चोट खाने के बाद ईरान की धैर्य की परीक्षा लेना, ईरानी राजनीतिक और सैन्य शीर्ष नेतृत्व के लिए बेहद कठिन कार्य होगा।
5.अभी ट्रम्प प्रशासन के पास लगभग पचास दिनों का समय शेष है,ऐसी आशंका जताई जा रही है कि अमेरिकी बल ईरान के नाभिकीय प्रतिष्ठानों को अपना निशाना बनाये,ईरानी प्रत्युत्तर की बात काल के गर्भ और बाइडेन के किस्मत पर छोड़ दें, और फिर राष्ट्रपति ट्रम्प व्हाइट हाउस से विदा लें।
6.अगर ट्रम्प ऐसा करने में सफल होते हैं तो नए नियुक्त राष्ट्रपति बाइडेन के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण और बदतर परिस्थिति के बीच राष्ट्रपति का पद एक महज कांटो का भरा ताज ही होगा।
ऐसी प्रबल संभावना है कि अगर किसी भी पक्ष की तरफ़ से किसी तरह की दुस्साहस की कोशिश हुई तो एक सीमित युद्ध की अवधारणा परिवर्तित होकर पूर्ण युद्ध में निश्चित रूप से तब्दील हो जाएगी,जिसे सम्भवतः कोई पक्ष पसन्द नहीं करेगा।
7.अगर ईरान ने आवेश में आकर किसी तरह की जबाबी कार्रवायी को अंजाम दिया तो फिर वापस लौटना बेहद मुश्किल होगा,फिर उसे रणनीतिक गठबंधन कि चोट और अन्य तमाम तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा।
इसी बीच क्षेत्र में तेजी से बिगड़ते हालात और किसी भी अवाँछित स्थिति से निबटने के लिए अमेरिकी रक्षा मंत्रालय(पेंटागन) ने अपने परमाणु क्षमता संपन्न वाले सुपरकैरियर/विमानवाहक पोत यूएसएस निमित्ज़(CVN-68)को फारस की खाड़ी की तरफ मोड़ दिया है ।
उपरोक्त पेंचीदगी भरे घटनाक्रम और आशंकाओं के बीच,वर्तमान अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बेहतर माहौल और समस्या के समाधान की उम्मीद को कभी नहीं छोड़ना चाहिए,कहते भी हैं कि हर समस्या का समाधान उस समस्या में ही छिपा होता है।
1^1^https://www.atomicheritage.org/profile/j-robert-oppenheimer
