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Tuesday, August 11, 2020

अमर शहीद खुदीराम बोस।

 भारत के आजादी की लड़ाई में सबसे युवा शहीदों में एक खुदीराम बोस को आज ही के दिन 1908 में मुजफ्फरपुर जेल में फांसी दी गई थी ,उम्र थी महज साढ़े 18 साल थी।  (18 वर्ष सात महीने और 11दिन)।

खुदी राम बोस को जब अदालत ने फांसी की सजा सुनाई, तो वे हंसने लगे,जज ने समझा की कम उम्र के बोस सजा की गंभीरता को शायद समझ नहीं पा रहे हैं तो जज ने उनसे हंसने की वजह पूछी, तो बोस ने कहा, "अगर मेरे पास मौका होता, तो मैं आपको भी बम बनाने का तरीका बताता"।


कांग्रेस के नरमपंथी बनाम गरमपंथी गुटों के बीच उपजे मतभेद के बीच 1907 में कांग्रेस का विभाजन हो गया जिसे हम
"सूरत फूट" के नाम से जानते हैं,इसके बाद देश ने अंग्रेजी हुकूमत के अन्यायपूर्ण कारगुजारियों के बाद क्रांतिकारी आतंकवाद का उदय हुआ,इस कड़ी में किंग्सफोर्ड हत्या का षड्यंत्र बेहद महत्वपूर्ण है। 
फिरंगी हुकूमत से बेइंतिहा नफ़रत करने वाले इन युवाओं ने तय किया कि, किसी भी कीमत पर फिरंगी हुकूमत को जड़ से उखाड़ फेंकना है,इसके लिए जो तरीका अपनाना पड़े,चाहे जितना बल लगाना पड़े लगाएंगे। इसी क्रम में अनुशीलन और युगान्तरकारी दल के क्रांतिकारी अंग्रेजो के प्रति बदले की भावना से पूरी तरह ओत प्रोत थे । दल ने गुप्त रूप से क्रांतिकारियों के प्रति अमानवीय रवैया रखने वाले मुजफ्फरपुर के बदनाम और कुख्यात जिला जज किंग्सफोर्ड की उसकी हत्या का संकल्प लिया और इसको अंजाम देने का जिम्मा खुदीराम बोस व प्रफुल्लकुमार चाकी को सौंपा।

खुदीराम बोस ने अपने सहयोगी प्रफुल्ल चाकी के साथ मिलकर मुजफ्फरपुर(बिहार) के बदनाम जज किंग्सफोर्ड को मौत के घाट उतारने को सोची।अपने अभियान को अंजाम देने का दिन मुुुक़र्रर किया 30 अप्रैल 1908।

अपने  इस अंजाम को अमली जामा पहनाने के लिए दोनों क्रांतिकारी दस दिन पहले मुजफ्फरपुर पहुंचे,जहां बोस हरेन सरकार और चाकी ने दिनेश चंद्र रॉय के छद्म नाम से एक धर्मशाला में ठहरे ,जो इनका अपना "सेफ हॉउस" था यहीं से वे किंग्सफोर्ड के पूरे दिनचर्या की पूरी सूक्ष्मता के साथ "रेकी" किया करते थे
कुछ इतिहासकारों का मानना है कि जब ये दोनों किंग्सफोर्ड की अदालत में जाकर उसे, उसकी लाल बग्घी व उसके घोड़ों का रंग पहचानने में ही लगे थे कि अंग्रेजी गुप्तचरों ने उनके मंशा का पता लगा लिया था,फलस्वरूप किंग्सफोर्ड की सुरक्षा बढ़ा दी गयी।अतुलनीय देश प्रेम और अद्भुत शौर्य के धनी इन दोनों क्रान्तिकारियों पर कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा वे अपने कार्य को अंजाम देने के लिए प्रतिबद्ध थे।
किंग्सफोर्ड की कोठी से थोड़ी दूरी पर एक क्लब था, जहां किंग्सफोर्ड व अन्य अंग्रेज अधिकारी आया-जाया करते थे अंततः खुदीराम और प्रफुल्ल चाकी निर्णय लिया जब किंग्सफोर्ड देर शाम अपनी लाल बग्घी पर चढ़कर क्लब से कोठी की ओर जाएगा, तभी उस पर बम से हमला कर उसकी हत्या कर दी जाएगी।
सब कुछ उनके योजनानुसार हो रहा था,तय समय लाल बग्घी आई और घने अंधेरे में अपने शिकार को दबोचने के लिए घात लगाकर बैठे इन दोनों क्रांतिकारियों ने यह समझकर कर 
कि बग्घी में किंग्सफोर्ड बैठा है, पर ताबड़तोड़ बम बरसाने शुरू किए,पर उनका अंदाज़ा गलत निकला और इनके हमले में सम्भ्रांत अंग्रेजी लेखिका और बैरिस्टर प्रिंगल कैनेडी और उनकी बेटी मारी गयी,जहां प्रिंगल ने घटनास्थल पर तो उसकी बेटी ने दो मई को अस्पताल में दम  तोड़ा।
किंग्सफोर्ड अपनी पत्नी के साथ ब्रिज(ताश) खेलने के क्रम में कुछ देर ज्यादा रुक गया था,और हमले के कुछ देर बाद ही वह सपत्नीक समेत मिलती जुलती बग्घी से दूसरे छोड़ से बाहर निकला था जिससे वह इस हमले में बाल बाल बच गया 

कौन था किंग्सफोर्ड 

मुजफ्फरपुर का जिला न्यायाधीश डगलस किंग्सफोर्ड दरअसल, 1905 के बंग भंग के समय कलकत्ता के अलीपुर में मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट था और उसने वहां आंदोलन करते हुए पकड़े गए क्रांतिकारियों को जानबूझकर एक से बढ़कर एक क्रूरतम सजाएं सुनाई थी ,इसके एवज में अंग्रेजी हुकूमत ने उसे पदोन्नत करके मुजफ्फरपुर का सत्र न्यायाधीश बना दिया था।

 इस हमले के बाद खुदीराम व चाकी दोनों ही नंगे पैर ही वहां से भागे और 24-25 मील दूर एक रेलवे स्टेशन वानी पहुंचकर
ही दम लिया। हमले के बाद छानबीन में किंग्सफोर्ड की सुरक्षा में तैनात सुरक्षाबलों ने उन्हें पहचान लिया ,घटना वाले दिन ये दोनो,किंग्सफोर्ड के कोर्ट के काफी करीब आ गए थे,जिससे उसके सुरक्षाकर्मियों को उनकी हरकतों पर शक़ भी हुआ था,पर ये दोनो इन सुरक्षाकर्मियों को बहानों में उलझाकर वे वहां बने रहे थे,इसके बाद व्यापक पुलिस छापों के बीच अगले ही दिन खुदीराम पकड़ लिए गए उनके पास से दो पिस्तौल और तीस कारतूस बरामद हुए । प्रफुल्ल कुमार चाकी ने गिरफ्तारी से बचने के लिए खुद को गोली मार कर आत्महत्या कर ली।

11 अगस्त, 1908 को फांसी वाले दिन पूरे  कलकत्ता(कोलकाता) में लोगों का हुजूम लग गया हजारों आंखे नम हुई,ये दोनों अमर बलिदानी हो गए,इनपर लोकगीत लिखे गए और पूरे देश की जनता इसे गुनगुनाने लगी। हालांकि उस वक्त अपनी स्वतंत्रता के लिए संघर्ष कर रहे भारतीय युवाओं को फांसी देना कोई बहुत बड़ी बात नहीं थी, लेकिन इतनी कमसिन उम्र में पूरी संजीदगी के साथ हंसते हंसते मुस्कुराते हुए फांसी के फंदे पर झूल कर अपना सर्वोच्च बलिदान देते हुए खुदीराम बोस अजर अमर हो गए।

उनके फांसी के बाद ब्रिटेन के एक मशहूर अखबार "द इंपायर" अगले दिन लिखा, "खुदीराम बोस को फांसी दे दी गई. बताया जाता है कि वह सीना तान कर सूली पर चढ़ा,वह खुश था और मुस्कुरा रहा था."

खुदीराम बोस का जन्म तीन सितंबर, 1889 को अविभाजित बंगाल के मिदनापुर जिले में हुआ।
बचपन में ही उन्होंने माता लक्ष्मीप्रिया और पिता त्रैलोक्यनाथ दोनों को खो दिया। उनकी बड़ी बहन ने अपने सनिध्य में उनकी स्कूली शिक्षा शुरू ही कराई थी।

• आखिर क्यों अंग्रेज अधिकारियों को निशाना बनाते थे क्रांतिकारी।

1905 के बंग भंग और 1907 में कांग्रेस के विभाजन/"सूरत फूट"के बाद देश मे गरमपंथी बनाम नरमपंथी की अव्यवहारिक होती राजनीति,फिरंगी हुकूमत के कारनामों, और दमनात्मक रवैये से क्षुब्ध बंगाल के युवकों द्वारा व्यक्तिगत वीरता और क्रांतिकारी आतंकवाद की राह की ओर मुड़े, सरकारी अधिकारियों का दम्भ और उनकी अन्याय पूर्ण कार्रवाई ने इन युवकों को विद्रोही बनाया और वे पिस्तौल और बम की राजनीति की राह पकड़े।

इसमे सबसे मुख्य सवाल था कि "बल"का प्रयोग करने का कौन सा सबसे प्रभावी तरीका अपनाया जाए,एक देशव्यापी जनमत तैयार करना,जो एक दीर्घकालीन और कठिन कार्य था। क्रांतिकारी युवको ने इसके लिए उन्होंने आयरलैंड के राष्ट्रवादियों और रूसी निहिलिस्टों व पॉपुलिस्टों के संघर्षों के आजमाए गए तरीकों को अपनाया,इसमे बदनाम,कुख्यात और भ्रष्ट अधिकारियों की हत्या की योजना थी।

क्रांतिकारी गुटों का मानना था कि इससे भारतीय जनमानस को संघर्ष की प्रेरणा मिलेगी और दिल से हुकूमत का डर निकल जायेगा।इस तरह की प्रत्येक हत्या और पकड़े जाने पर क्रांतिकारियों को फांसी देने से संघर्ष और तेज हो जाएगा।
1908 -1918 के बीच लगभग 186 क्रांतिकारियों ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया।

अमर शहीद खुदीराम बोस की यह शहादत लंबे वक्त तक क्रांतिकारी युवकों की प्रेरणा बनी रही ,बंगाल के बुनकर उनके सम्मान में बंगाली सभ्यता का प्रतीक धोतियों के पट्टी/किनारों पर ‘खुदीराम बोस’ लिखते थे,बंगाली नवयुवक ऐसी खुदीराम बोस लिखी धोतियां पहनकर खुद को इस कदर गौरवान्वित अनुभव करते थे कि इन धोतियों का फैशन चल निकला था।
हां, क्रांतिकारी जिस किंग्सफोर्ड को वे मारने में असफल रहे थे, उसके मन-मस्तिष्क पर बोस और चाकी का जबरदस्त बम हमले का ऐसा खौफनाक मंजर छाया रहा कि उसने डर के मारे अपनी नौकरी छोड़ दी।