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Wednesday, June 24, 2020

गलवां घाटी का सामरिक महत्व: चीन कि दुःखती रग


गलवां नदी के विभिन्न पहलुओ को समझने से पहले एक नजर चीन की फाइव फिंगर पॉलिसी पर क्योंकि यहीं से चीन के साथ सभी विवादों की शुरुआत होती है।

माओ के दिमागी उपज और डेंग शिया पिंग  द्वारा समर्थित इस नीति में माओ ने Xizang( तिब्बत) को चीन का दायीं हथेली माना और कहा कि चीन की जिम्मेदारी बनती है कि इसे यानि तिब्बत को liberate (मुक्त) कराए।

यह स्वाभिक है जब हथेली है तो उसमें उंगलियां होंगी, इस हथेली की उंगलियों में लद्दाख,नेपाल,सिक्किम,भूटान,और नेफा(अरुणाचल प्रदेश) पांच राज्य /देश शामिल थे/हैं। नक्शे पर अगर देखा जाए तो चीन की नजर हिमालय के विस्तार पर है जो पश्चिम से पूर्व की ओर है जो भारत म्यांमार सीमा पर अराकान योमा पहाड़ी स्थित Syntaxial Bend पर जाकर समाप्त होता है। इस पूरे हथेली नीति में  तीन त्रिजंक्शन क्षेत्र है जिसमे भारत चीन, नेपाल,भूटान और म्यांमार के साथ अपने सीमा साझा करते है। 


गलवां नदी: यह सिंधु नदी तंत्र का हिस्सा है,जो काराकोरम रेंज के पूर्वी भाग में स्थित  और चीन के अवैध कब्जे वाले भारतीय क्षेत्र अक्साई चिन के समजूंगलिंग से उद्गम के साथ पश्चिम मार्गी हो श्योक नदी में मिल जाती है जो स्कार्दू के केरी के समीप सिंधु के साथ संगम करती है। गलवां एक अत्यधिक तेज बहाव वाली ,करीब 80 किलोमीटर लंबी  नदी है।

इसे सबसे पहले कैप्टन फ्रांसिस एडवर्ड यंगहस्बैंड    (capt.Francis Edward Younghusband) के तिब्बत (पामीर)/ यारकंद अभियान  में शामिल लद्दाख़ के लेह के प्रसिद्ध गाइड और पर्वतारोही गुलाम रसूल गलवां ने सर्वप्रथम 1899 में  खोजा था और गलवां के नाम पर ही इस नदी और घाटी का नाम पड़ा। है। प्रख्यात लेखक पैट्रिक फ़्रेंच कैप्टन यंग हस्बैंड को "द लास्ट ग्रेट इम्पीरियल एडवेंचरर"की उपमा से नवाजते हैं

इस घाटी पर चीन की विशेष नजर रहने के कई कारण है।
जिसमे सबसे महत्वपूर्ण है इसका ऊंची और दुरूह रिजलाइन,जिसके जरिये चीन को सामरिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण श्योक नदी और उसके आस पास के पूरे क्षेत्र पर अपनी "नजर" रख सकता है। इसलिये चीन इस क्षेत्र को हथियाने के लिए ललायित है,दूसरी तरफ उसे पूरा डर है कि अगर भारत इसी तरह अपना सामरिक अवसंरचना का दायरा बढ़ाता रहा तो उसके अवैध कब्जे वाले अक्साई चिन क्षेत्र में बढ़त ले सकता है.।
गलवां घाटी का सामरिक महत्व की अन्य बातों में  यह घाटी की अवस्थित इसे बेहद खास बनाती है जो सामरिक रूप से इसके पश्चिम में लद्दाख तो पूर्व में अक्साई चिन है,यह भारतीय क्षेत्र फिलहाल अवैध रूप से चीन के कब्जे में है,जो चीन की दुःखती रग  जिसे चीन शिंजियांग उईगुर स्वायत्त क्षेत्र का नाम देता है।

इसके पश्चिमी भाग में "मृत्य की नदी" कही जाने वाली श्योक है और इसके पश्चिमी छोड़ पर श्योक और 255 किलोमीटर लंबी डार्बुक श्योक दौलत बेग ओल्दी बारहमासी मेटालिक रोड ( Darbuk-Shyok-Daulet Beg Oldie (DSDBO) है। यह सड़क लगभग वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के साथ साथ चलती है और काराकोरम रेंज में अवस्थित आधार शिविर तक जाती है। इस रोड के कारण लेह से DBO तक का सफर महज छः घंटे में पूरा किया जा सकता है जो पहले कम से कम दो दिनों का था।

यहाँ दुनिया के सबसे ऊंचे एडवांस्ड लैंडिंग ग्राउंड(ALG) को भारतीय वायुसेना का दौलत बेग ओल्दी(DBO) में संचालित करती है। सेना के सब सेक्टर नार्थ (SSN) में अवस्थित DBO का सामरिक महत्व वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के बेहद नजदीक होना है जो वायुसेना के एरियल सप्लाई लाइन (ASL) का अहम हिस्सा है।
गलवां के पूर्वी क्षेत्र रणनीतिक रूप से बेहद अहम है क्योंकि यह चीन के सबसे महत्वपूर्ण और सामरिक महत्व के शिंजियांग तिब्बत रोड,जिसे G219 राजमार्ग कहा जाता है,उसे जोड़ता है,
यही वजह है कि चीन इस पूरे क्षेत्र में भारतीय पक्ष से न के बराबर और किसी तरह के अवसंरचनात्मक कार्य  का  अवैध और पुरजोर विरोध करते रहता है।

गलवां घाटी सड़क मार्ग द्वारा सामरिक रूप से महत्वपूर्ण  चुशूल और दौलत बेग ओल्दी के साथ साथ दक्षिण में  अवस्थित पेंगोंग त्सो झील से भी जोड़ती है,जो हालिया विवाद के तप्तस्थलों में एक है।इस घाटी के कब्जे में लेने का सीध अर्थ है कि श्योक नदी के किनारे बने सड़क पर नियंत्रण ,अक्साई चिनऔर शिंजियांग तिब्बत राजमार्ग पर अपना नियंत्रण स्थापित करने जैसा है।

भारत श्योक नदी के किनारे एक फीडर रोड का निर्माण कर रहा है जिसके जरिये डार्बुक श्योक गांव और दौलत बेग ओल्दी (DS -DBO)को जोड़ सके,ये सड़क भारत के लिए क्रिटिकल लाइन ऑफ कम्युनिकेशन के रूप में देखी जा रही है।
वास्तविक नियन्त्रण रेखा  श्योक और गलवां नदी के संगम के पूर्व दिशा में अवस्थित है,इन दोनों नदी घाटी क्षेत्र में भारत और चीन के सुरक्षा बल  गश्त लगाते हैं।
श्योक नदी: यह नदी काराकोरम रेंज के रिमो हिमनद से उद्गमित होती है,यह सिंधु नदी की प्रमुख सहायक नदी में एक है। भू गर्भीय वैज्ञानिक मानते है कि श्योक नदी  लगभग 2.58 मिलियन वर्ष  पुरानी है,दूसरे शब्दों में कहें तो यह क्वार्टरनरी काल की नदी है ,इसके अवसादों से वैज्ञानिकों को पृथ्वी पर जीवन की उत्त्पत्ति के साक्ष्य ढूंढने में सहायता मिलती है
श्योक एक ट्रान्सबाउंड्री नदी के रूप में जानी जाती है जो चीन/तिब्बत,भारत,पाकिस्तान में बहती है और अंत मे स्कार्दू के नजदीक केरी में सिंधु नदी में संगम करती है।
श्योक के सहायक नदियों में  चांग चेन मो ,गलवां,नुब्रा और साल्टोरो नदी प्रमुख है।
श्योक को मृत्य की नदी ( “The River of Death”) भी कहा जाता है।




भास्कर।
24/06/2020.
नई द






Tuesday, June 23, 2020

गलवां घाटी के शूरवीर।

गलवां घाटी में क्या हुआ था उस रात।

भारत, चीन को एलएसी पर यथास्थिति बरकरकार रखने यानी 5 मई से पहले की स्थिति पर वापस जाने के लिए सैन्य एवं राजनय दोनो स्तरों पर वार्ता का मार्ग खुला रखा था,दोनो पक्ष रजामंद भी हुए थे,चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर वापस जाने के लिए रजामंद हुआ था,लेकिन गलवां घाटी में स्थिति जस की तस थी।

कर्नल बी संतोष बाबू की अगुवाई वाले 16 बिहार रेजिमेंट की जिम्मेवारी थी कि वे गलवां में अनाधिकृत रूप से घुसे चीनियों को वापस भेजे,चूंकि  शीर्ष स्तर पर वार्ता का दौर जारी था इसलिए  यह उम्मीद की जा रही थी कि चीनी वापस जाएंगे,लेकिन चीनी कुत्सित मंशा वाली इंच दर इंच हड़पने की डॉक्ट्रिन के साथ बने हुए थे, उन्हें गलवां और श्योक नदी के संगम पर बने पुल के ढांचे,श्योक नदी के किनारे बने बारहमासी आल वेदर मेटालिक रोड जो सीधी दौलत बेग ओल्दी DBO को जोड़ती है,इनका मोह चीनी छोड़े नहीं छोड़ पा रहे थे।

कर्नल बाबू ने अपनी कम्पनी स्तर के टुकड़ियों के साथ उस जगह पहुंचे जंहा चीनी जमे हुए थे,जबकि बात उनकी यहां से हटने की हुई थी,जैसे ही कर्नल बाबू वहां पहुंचे और हटने की बात दुहरायी चीनी मानो हमले के लिए तैयार बैठे थे।

 चीनियों ने भारतीय टुकड़ी पर अप्रत्याशित हमला कर दिया, चूंकि भारतीय टुकड़ी महज कम्पनी स्तर की थी और चीनी टिड्डे के माफ़िक़ यहां जमा थे इसलिए वे कर्नल बाबू की टुकड़ी पर भारी परे लेकिन इन्होंने चीनियों का जम कर मुकाबला किया,और बिना कोई गोली चलाये,पूरी वीरता के साथ लड़ते हुए कर्नल संतोष बाबू शहीद हुए।

‌सैन्य बलों में  कहा जाता है कि सैनिकों के लिए कमान अधिकारी का कथन/वचन/कमांड/इशारा "ब्रह्मलकीर" होता है,वे अपने कमांडिंग अफसर की बात के अलावा किसी की भी नहीं किसी कीमत पर नहीं सुनत,चाह जो हो जाय,कमांडिंग ऑफिसर इन अधिकारी और जवानों लिए पिता,दोस्त,भाई और भगवान समान होता है,इसलिये वे अपने कमान अधिकारी की तौहीन बिल्कुल बर्दाश्त नहीं करते,लेकिन गलवां में तो इनके कमान अधिकारी ही चीनी धोखेबाजी की भेंट चढ़ गए थे।


16 बिहार,जिसके साथ,पंजाब,मीडियम और फील्ड रेजिमेंट अटैच्ड  थे,कर्नल बाबू और उनके टुकड़ी की शहादत की मिली खबर के बाद इन जवानों और अधिकारियों का खून खौल उठा,उसके बाद जो उन्होंने 15 /16 जून की अंधेरी रात में गलवां में घुसपैठ किये चीनियों पर जो मौत तांडव मचाया उसे देख काल भी भयाक्रांत हो उठा होगा,  शायद ही विश्व के सैन्य इतिहास में यह एक ऐसी लड़ाई हुयी होगी जिसमें पूरे सैन्य साजो सामान से युक्त किसी सेना ने बिना कोई गोली चलाये गैर पारंपरिक सैन्य अस्त्र   मसलन ,रॉड,डंडे,बल्ली,बेसबॉल स्टिक में लिपटे कंटीले तार,पत्थर, आदि से ऐसी लड़ाई लड़ी हो।

लड़ाई की शुरुआत पूरे योजनाबद्ध तरीके से चीनियों ने किया तो भारतीय संख्या बल में कम होने के वावजूद पूरे शारीरिक,मानसिक दमखम और अपने कमांडिंग ऑफिसर की शहादत की बदले लेकर  पूरे जोश ओ खरोश से लबरेज थे।

ये भारतीय सेना के ''घातक टुकड़ी" के जवान,जिन्हें क्लोज क्वार्टर कॉम्बैट फाइट,और शॉकिंग अटैक में महारथ हासिल है,वे रेजिमेंट की युद्धघोष (वॉर क्राई) का जयघोष करते हुए महाकाल की भांति शत्रु चीनियों पर टूट पड़े,उन्होंने चीनियों के उपयोग में लाये जा रहे  डंडों,कंटीले तार से लिपटे रॉड जो चीनी अभी तक प्रयोग कर रहे थे उनसे छीन कर ,उनके ही इस साजोसमान आदि से इन चीनियों को खदेड़ खदेड़ कर  उनके कमांडिंग ऑफिसर,सहित अधिकारियों और जवानों को यमलोक का रास्ता दिखाया ।

आदिम युग या पाषान कालीन इतिहास में शायद इस तरह की लड़ाईया हुई होंगी,आधुनिक विश्व सैन्य इतिहास में इस तरह की संकल्पना को शायद कोई न माने पर ऐसा गलवां में हुआ अपने अधिकारी  शहादत के बदले की आग में जल रहे भारतीय जवानों ने चीनियों के सामने नृशंसता, बर्बरता और क्रूरता का वह खौफ़नाक मंजर पेश किया, उनके सैनिकों की गर्दन,हाथ,पैर,ही हड्डियों को क्षत विक्षत किया,उनके कम से कम 18 जवानों/अधिकारियों के चेहरे का वह हाल किया जिन्हें पहचाना नामुमकिन था।



भारतीयो ने अपने 'रेजिमेंट क्राई " जय बजरंगबली का उद्घोष करते है जान बचाकर भागते चीनियों को सबक सिखाने  क्रम मे 10 भारतीय अफ़सर और जवान को चीनियों ने धोखे से बंधक बना लिया जो करीब 60 घण्टे बंधक बनने के सकुशल अपने सीमा में भारी राजनयिक और सैन्य दवाब के बाद वापस लौटे, डीब्रीफिंग के दौरान इन भारतीय अधिकारियों और जवानों ने अपने साथियों की शूरवीरता की कहानी को बयां किया,गलवां में हमने 20 बहादुर अधिकारी और जवान खोए ।

                         
                           

जिसे प्रधानमंत्री ने इंन शब्दो के जरिये उनकी अनुपम, असाधारण, अविश्वसनीय, और चिरस्मरणीय शूरवीरता को याद किया
Pm:

लद्दाख़ के गलवां घाटी में पेट्रोलिंग पॉइंट 14 पर उस अंधेरी रात में  भारतीय जवानों ने अपने कमान अधिकारियों खोने के बाद बाद भी अपने आत्म एवं सैन्य अनुशासन,अपने अधिकारी द्वारा की गई ब्रीफिंग (जिसमे हथियार रहते हुए भी इस्तेमाल न करने की बात शामिल थी,जो दोनो देशों में राजनयिक समझौतों में तय हुआ था),त्वरित समझ बूझ,फौरन निर्णय लेने की क्षमता,विपरीत और एकदम विषम परिस्थितियों में युद्ध कौशल की महारथ भरी क्षमता,असीम शूरवीरता और उच्च तुंगता वाले रणक्षेत्र में असाधारण युद्ध कौशल के साथ अपने कालजयी पराक्रम  का परिचय दिया उसका गवाह  हिमालय,गलवां नदी के साथ साथ  मृत्यु की नदी (रिवर ऑफ डेथ)कही जाने वाली "श्योक नदी" साक्षात रही होगी।


 गलवां से सबक : भारत को चीन के साथ विभिन्न मोर्चो पर पूरी सतर्कता के साथ साथ पूरे आत्मविश्वास से राजनयिक और सैन्य स्तर पर कठोर कदम उठाने होंगे,एलएसी पर 5 मई की स्थिति बरकरकार रखने के अपने दो टूक रवैये पर कायम  ही रहना होगा।
कल रक्षामन्त्री रूस की नाजियों पर विजय  के 75वीं वर्षगाँठ पर मॉस्को के रेड स्क्वायर पर आयोजित होने वाले भव्य विक्ट्री डे परेड का साक्षी बनेंगे साथ ही वे रूस भारत और चीन(RIC) की बैठक में भी हिस्सा लेंगे,रूस भारत और चीन के बीच गलवां घाटी में हुए हिंसक झड़प के बाद बेहद सधी प्रतिक्रिया दे रहा है,इसलिए भारत को मास्को में किसी दवाब में आने की कोई जरूरत नहीं है।

घातक कमांडो : "यह एक स्पेशलाइज्ड इलीट इन्फैन्ट्री प्लाटून साइज फ़ोर्स है।जो कमोबेश हर इन्फैंट्री बटालियन में मौजूद रहती है।
इनका मुख्य कार्य अपने अभियान के दौरान त्वरित गति से शत्रु को संभलने का बिना मौका दिए बिना किसी अन्य सैन्य सहायता के उसपर अप्रत्याशित हमला करना है, दूसरे शब्दो में हम इन्हें युद्ध के लिए सबसे पहले और तत्पर यूनिट कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

घातक टुकड़ी को ही घातक कमांडो कहा जाता है ये कर्नाटक के बेलगाम कमांडो स्कूल से प्रशिक्षित, तीस वर्ष से कम उम्र के ये जवान होते है।
ये अपने इन्फैंट्री बटालियन में सबसे चुस्त दुरुस्त,अतिआत्मविश्वासी,पराक्रमी और जबरदस्त शारीरिक दमखम वाले,काउन्टर इंसर्जेंसी काउंटर टेररिज्म अभियान में महारथ,क्लोज़ क्वार्टर कॉम्बैट,अस्त्र शस्त्र चलाने ने दक्ष,उच्च कोटि के स्पॉटर और स्नाइपर, डेमोलिशन और मेडिक एक्सपर्ट,हेलीबॉर्न ऑपरेशन,माउंटेन वारफेयर,में विशेषज्ञता वाले जवान होते हैं।
जिनसे शांति काल मे सेना प्रशासनिक और लॉजिस्टिकल भूमिका का निर्वहन कराती है।

आम तौर पर इस पलटन 20 जवान होते हैं जिसमे एक
 कमांडिंग कैप्टन और दो नॉन कमीशन रैंक और 17 अन्य रैंक के जवान होते हैं।

ये सेना के विशेष बल(SF)से पूरी तरह भिन्न होते है, हालांकि इनका काम भी आतंकवाद निरोधी अभियानों में भाग लेना,अपने ठिकाने सुरक्षित करना होता है, लेकिन इनमे प्रशिक्षण और अन्य नीतिगत भिन्नता होती है, विशेष बल चाहे तो इन घातक टुकड़ियों को अपने सैन्य अभियान में भागीदार बना सकता है,और कई बार  बनाता भी है

घातक पलटन का बेयनॉट(संगीन )"की लड़ाई में कोई जोड़ नहीं है,येआतंकवादियों के साथ "घोंप निकाल" और आमने सामने की जबरदस्त हाथापाई में माहिर होते है।

ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव,परमवीर चक्र, ले नवदीप सिंह,ले.बलवान सिंह(अब कर्नल),महावीर चक्र इसी घातक पलटन का हिस्सा थे

Sunday, June 21, 2020

गलवां के बाद क्या करे भारत।



भारत चीन के सीमान्त संबंधी विवाद के 45वें दिन यानी 15 और 16 जून की दरम्यानी रात एक हिंसक झड़प का रूप ले लिया जिसमें चीनी पीएलए से अपने संप्रभुता की रक्षा करते हुए 16 बिहार के कमान अधिकारी कर्नल बी संतोष बाबू समेत 20 जवान शहीद हो गए जबकि मीडिया में आई रिपोर्ट में 43 चीनी सैन्यकर्मी भी हताहत हुए ।  अति दुर्गम और उच्च तुंगता वाले क्षेत्र करीब चार घंटे चली इस शारीरिक दमखम की लड़ाई में,बिना एक गोली चलाये भारतीय जवानों ने अपने कमांडिंग ऑफिसर की शहादत का ऐसा बदला लिया जिसे चीनी ताउम्र याद रखेंगे।


कहाँ कहाँ हुआ विवाद।

इस विवाद कि शुरुआत सबसे पहले पश्चिमी सेक्टर में जॉनसन लाइन  पर अवस्थित गलवां घाटी में आश्चर्यजनक रूप  से हुआ जो आम तौर पर 1962 के बाद लगभग पूरी तरह शांत था फिर यह विवाद  पूर्वी सेक्टर में मैकमोहन लाइन पर उत्तरी सिक्किम के  नाकू ला (ला':दर्रा) में देखने को मिला फिर विवाद ने क्या  जॉनसन क्या मैकमोहन लाइन सब एक कर दिया ।
मीडिया ने इसे स्टैंड ऑफ /फेस ऑफ का नाम दिया।

इससे पहले पश्चिमी सेक्टर और पूर्वी सेक्टर में दोनो पक्ष ने बिना एक भी गोली चलाये अपने कसरती बदन का पूरा प्रदर्शन किया जाहिर से अखाड़े में चित पट चलता रहता है,यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ,मैकमोहन लाइन पर चीनियों की चपटी नाक टूटी तो जॉनसन पर हमारे सिर लेकिन गोली चलाने की जुर्रत दोनो ने नहीं कि यहां कोविड 19 से बचने के लिए सबसे  स्पेशल शस्त्र सोशल डिस्टेंसिंग  की  दोनो ने जम कर धज्जियाँ उड़ाई लेकिन शीर्ष  राजनीतिक और राजनयिक पक्ष ने  सोशल  डिस्टेंसिंग  पूरा पालन किया।

शुरूआत में भारतीय राजनयिकों ने चीनी अतिक्रमण को कोई तवज्जो ही नहीं दियाऔर मामले को स्थानीय सैन्य कमांडरों को निपटाने के लिए छोड़ दिया जो डीविजन स्तर पर मेजर जनरल और ब्रिगेड स्तर पर ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी इसके लिए अधिकृत होते हैं विवाद का बिगड़ता स्वरूप देख दोनो देशों ने  कोर कमांडर स्तर की वार्ता का रुख किया जिसे भारतीये पक्ष से ले जन हरिंदर सिंह की अगुवाई में चीन के मोल्दो के BPM में लंबी वार्ता हुई नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
इससे पहले ये सैन्य अधिकारी सीमा विवाद से बचने के लिए  विभिन्न बैठकों में तयशुदा मानक प्रक्रियाओं,जैसे सबसे लोकप्रिय बैनर ड्रिल आदि के माध्यम से आपसी विवादों को सुलझाते आते रहें थे लेकिन इस दफे ऐसा नहीं हुआ जिसकी गंभीर परिणीति गलवां घाटी  खून से लाल हुई।

हालिया भारत चीन विवाद कई मायनों में अपने आप मे अनोखा है,या दूसरे शब्दों में  यूं कहें कि  इतिहास दुहराया जाता है,जैसी बात पूरी तरह सिद्ध हुई।


1.चीन ने पहली बार एक साथ तीनो सेक्टरों में विवाद की शरुआत की,लेकिन विवाद के कारण पुराने थे भारत द्वारा अपनी सीमा अवसंरचना को दुरुस्त करने में चीन की आपत्ति है।
2.गलवां घाटी,जहां चीनी 1962 में बुरी तरह पिटे थे,पेंगोंग झील के किनारे,हॉट स्प्रिंग,डेमचोक के साथ पूर्वी सेक्टर में नाकू ला,ये तमाम स्थान पूरी तरह शांत माने जाते थे और हो सकता है कि इन क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत कम निगाह रहीं हो,लेकिन सामरिक रूप से ये तमाम क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण थे,हैं और रहेंगे।


3. चीन की तरफ से  फिर से locust doctrin (टिड्डी  डॉक्ट्रिन) को अपनाते हुए तेजी से अपने सीमा में भारी सैन्य तैनाती,जो अपेक्षाकृत पेज से बाहर थे,मजबूरन भारतीय पक्ष को स्थिति प्रतिसंतुलित करने के लिए "जरूरी कदम" उठाने पड़े,चीनी लड़ाकू हेलीकॉप्टर सीमा के आसपास मंडराए तो सुखोई 30 को उनकी हाल खबर लेने के लिए फौरन रवाना किया गया।


4.बात भारतीय रणनीति की करें तो भारतीय पक्ष खुलकर सामने न आके एक बार फिर अपने शीर्ष  नेतृत्व पर भरोसा जताने के साथ साथ समांतर जहां एक तरफ  " वर्चुअल "शिखर डिप्लोमेसी" summit diplomacy का रास्ता खोला तो बीजिंग में विक्रम मिश्री ने अपने कार्य को अंजाम देना शुरू किया ,अगले ही दी लेह स्थित 14वीं कोर के प्रमुख ले जन हरिंदर सिंह के नेतृत्व में चीन के मोल्दो में दोनो पक्षों ने सैन्य वार्ता शुरू की।

यह पहली बार हुआ जब दोनो देशों के बीच  "कॉर्प्स(कोर) स्तर" पर वार्ता हुई,भारत की स्पष्ट मांग थी चीन  पहले वाली "यथास्थिति बरकरकार"रखे तभी कोई सार्थक बातचीत का प्रतिफल निकल कर आएगा जो गलवां घाटी  में हुई हिसंक झड़प के बाद भी जारी है और रहनी चाहिए.

चीन भली भांति जनता है कि वर्तमान व्यवस्था 1962 की  नहीं है जहां माओ भारत को झन्नाटेदार झापड़ मारने की बात करते हैं और न ही भारत माओ की गाय है।गलवां घाटी के बाद शायद ही  चीन कभी भारत के गाय समझने की जुर्रत करेगा,अगर ऐसा करेगा तो एक बार इस घटना में मारे गए अपने सैनिको के" चेहरे"की तस्वीरों पर उसे जरूर गौर करना चाहिए।


नेपाल की "दोहरी" भूमिका।

मध्य सेक्टर में नेपाल के साथ चीनी गठजोड़ ,भारत को सबसे ज्यादा चौंकाने वाली घटना रही ,हालांकि इस क्षेत्र में चीनी सैन्य तैनाती में वृद्धि हुई तो भारत ने भी उनकी आगवानी के लिए अपने जरूरी इंतजाम किए।
बेहद तेजी से घटे घटनाक्रम में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने  संविधान संशोधन को मंजूरी दिया जिसके बाद लिम्पियधुरा,लिपुलेख और कालापानी  नेपाल के सुदूर अंचल दार्चुला के हिस्से है।
भारत के बार बार अनुरोध के वावजूद बीजिंग-काठमांडो-रावलपिंडी ने तमाम भारतीय अनुरोध को उफनते त्रिशूली में प्रवाहित कर दिए।
चीन इस दफे कार्टोग्राफिक वारफेयर में खुद शरीक न होकर नेपाल को सामने किया, गुजराल डॉक्ट्रिन के कमियों और नकारात्मक विश्लेषण से कंठ फूटे नेपाल ने जम कर नक़्शेबाज़ी को खूब उछाला,भारतीयों  के लिए शायद नेपाल से यह उम्मीद नहीं होगी,वे क्षण भर के लिए चकित और निःशब्द रहे होंगे लेकिन नेपाल ने चीनी नमक का बेहतर शरीयत दी। 
वैसे भी इतिहास गवाह है नेपाली "नाम नमक और निशान" के प्रति बेहद वफ़ादार होते हैं,उन्हें कोई फर्क नहीं पडता कि ये किनका है,
नेपाली गोरखाओं की वफादारी को 1857 की विद्रोह 
 को कुचलने और बाद के वर्षों में यूनियन जैक की रक्षा करने में,जलियांवाला बाग नरसंहार,मोपला विद्रोह को कुचलने में उनकी वहशियाना अंदाज और वहशीपन का इतिहास साक्षी  है,इसलिए अगर नेपाल ने यहां चीन का साथ दिया तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए,चूंकि नमक सब जगह सर्व सुलभ है,बस ब्रांड बदलने की जरूरत होती है टाटा न मिला तो दूसरा ही सही, नमक है न !
उन्हें सिर्फ"कस्तो राम्रो छ" बोलने भर की जरूरत है,उन्हें इस बार तो चीन से नमक के साथ साथ स्वाद बढ़ाने के लिए "अजीनोमोटो" भी मुफ्त में मिल रहा है,भला यह चोखा सौदा नेपाल क्यों नहीँ करना चाहेगा। आज नेपाल में  अपने नक्शे में  शामिल किए लिम्पियधुरा,लिपुलेख और कालापानी के मौसम का हाल अपने एफएम रेडियो पर प्रसारित किया अब वह इन जगह पर सीमा चौकी बनाने की दिशा में कार्य करेगा,तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।


फैक्टर 219.

चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत के ढांचागत सुधार से सख्त आपत्ति है,ऐसा नहीं है कि उसने अपने क्षेत्र में  सड़क सहित अन्य अवसंरचना का विकास नहीं किया,चीन ने एलएसी पर जबर्दस्त संस्थागत अवसंरचना विस्तार किया है। 

भारत की तरफ से छोटी कोशिश भी चीन को फूटी आंख नहीं सुहाती है,भारत ने चीनी विरोध को दरकिनार करते हुए समरिक रूप से महत्वपूर्ण  ठिकाने को दुरुस्त करते हुए दुर्गम माने जाने वाले श्योक नदी सहित अन्य स्थानों पर सड़क अवसंरचना सुदृढ की जिससे भारत की पहुंच शिनजियांग से ल्हासा को जोड़ने वाली राजमार्ग संख्या 219 हो सकेगी।ये पश्चिमी चीनी क्षेत्र  चीन की दुखती रग है जो राज्य प्रायोजित क्रूरता और गम्भीर मानवाधिकार के उलंघन से ग्रस्त है है,तो चीन की भौं तनी जिसका तात्कालिक अंत हम देख रहे हैं।
गलवां घाटी प्रकरण के बाद भी चीन के रवैये में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला,अब उन्हें गलवां घाटी भी उनका हिस्सा नजर आता है इसलिए चीन के कथन और कारण पर बिल्कुल यकीन नहीं करना चाहिए
क्योंकि इतिहास गवाह है कि "चीनी जो कहते हैं वे बिल्कुल नहीं करते,गाहे बगाहे ऐतिहासिक दावा करते है,अपनी गलती पर इतनी तेजी से माफी मांगते है कि "चमेलियन" शर्म से लाल और पानी पानी हो जाता है। वे  सुन ज़ू  और कन्फ्यूसियस को एक साथ मानते है, जरूरत पड़ने पर बुद्ध को सामने करते हुए मानवता की बात करते है लेकिन वे अपना मुख्य कार्य कभी नहीं भूलते । इसलिए चीन को आप महाभारत के "मारीच"प्राणियों में "चमेलियन"  की श्रेणी में रख कर उनके बारे में अपनी राय बनाये।
क्या करे भारत

1. 2019 में चीनी श्वेत पत्र जिसका शीर्षक  "China National Defence in New Era के अध्ययन से स्पष्ट हो  जाता है कि शी जिंगपिंग के दिमाग मे बहुत कुछ दौड़ रहा है,जहां सम्पूर्ण  विश्व कोविड 19से   जूझ रहा है
तो चीन भारत सहित अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ स्थल नभ और जल तीनो जगहों पर सीमा अतिक्रमण करने में तुला हुआ है।

आधुनिक चीन में यह युग जिनपिंग युग है जहां  माओ,डेंग और जियांग जेमिन  तिकड़ी के चीन को कछुआ बनना सिखाया तो  जिनपिंग ने "मोर्चे पर आगे निकल कर नेतृत्व करने का प्रण"ले लिया है यह वही स्वप्न को पूरा करने की दिशा में उठाया जा रहा वह कदम है जिसे जिंगपिंग में 2014 में कज़ाकस्तान में देखा था।
अरबों डॉलर के द ग्रेट चाइनीज ड्रीम का जिसे वे 2049 चीन के  मुक्ति के सौ वर्ष पूरे होने पर न्यू मैरीटाइम सिल्क रोड,हेल्थ सिल्क रोड और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिये सम्पूर्ण एशिया,अफ्रीका और यूरोप के साथ आर्कटिक जनवादी चीन का लाल झंडा लहराना चाहते हैं।

कोविड 19 के बाद के विश्व मे जिंगपिंग के राह में कोई रुकावट नहीं दिख रही ,एशिया में भारत और भूटान के अलावा कोई इसे रोकने वाला नहीं  लेकिन भारत के प्रश्न पर यहीं जिंगपिंग पूरी तरह फंसते हुए नजर आते है फिर उन्हें मलक्का डिलेमा  नजर आता है तो इंडो पैसिफिक और क्वाड की संकल्पना से खतरे में उनकी सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन के साथ चूर चूर होते उनके अरमान । आखिर वे गलवां घाटी जैसे कदम पूरे सोच समझ कर उठा रहे हैं ,भारत ने  चीन के साथ बहुत "हैंड इन हैंड " अभ्यास किया अब सही समय है चीन से आंख से आंख मिलाने का,बढ़ते चीनी छद्म गुरुर को तोड़ने का।

2.वर्तमान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र और हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती चीनी चुनौती और "स्ट्रिंग आफ पर्ल" के वे मोती जो चीनी मांझे में पिरोये हुए है और ग्वादर से कॉक्सबाजार से म्यांमार के क्याकप्यू तक विस्तृत होते धागे भारत के गले को लगातार कस रहे है तो कभी ढील दी जा रही है।
भारत - चीन के बीच विवाद जमीन पर होता है तो उसका असर समुद्र के भीतर होता है। इन विपरीत परिस्थितियों में आज भारत को जरूरत है कि हिंदमहासागर की "सुरक्षा अर्चिटेक्चर "को और प्रभावी रूप से चाक चौबंद करे,  इसके लिए भारत को अपने विस्तृत तट से लेकर अपने "अनन्य आर्थिक क्षेत्र "की सुरक्षा सुनिश्चित करने की फौरी आवश्यकता है।
नए लिस्निंग पोस्ट, आधुनिक फ़ास्ट अटैक इंटरसेप्टर  और गहरे समुद्र में पनडुब्बियों की गश्त पर आक्रामकता के साथ पेश आना होगा, इसके अतिरिक्त  अधूरे और लम्बित पड़े तमाम। नौसैनिक प्रोजेक्ट में और तेजी लाने की आवश्यकता है, जरूरत  पुराने हो चुके काम चलाऊ तकनीकी उपकरण को फेज आउट करते हुए अत्यधुनिक सोनार और स्टील्थ खोजी प्रणाली विकसित करें/खरीद करें।


3.भारतीय नौसेना को आधुनिक तकनीक और उत्कृष्ट मानव बल चाहिए तभी यह बेहतरीन परिणाम देती है। भारत को एन्टी सबमरीन वारफेयर सिस्टम को और अत्यधुनिक बनाते हुए उसे दुरुस्त करने और उसमे महारथ हासिल करें,अत्यधुनिक सोनार बीपिंग सिस्टम क्षमता को और मजबूत बनाये, नए पीढ़ी के नौसैनिक साउंड सेंसर को मरीन टोपोग्राफी के उन अनछुए जगहों पर लगाया जाए जहाँ से चीनी घुसपैठ कर सकते है,साथ ही नॉइज सिग्नेचर डिवाइस को और आधुनिक करें,पारंपरिक नेवल माइन से आगे निकलते हुए आधुनिक और बेहद धीमी से धीमी इंफ्रासोनिक साउंड को पहचानने वाले एकॉस्टिक डेटोनॉटिंग माइंस बिछाएं जाएं। आज जरुरत न सिर्फ़ मरीन टोपोग्राफी  पर महारथ हासिल करने से है बल्कि  आपको और पी 81आई जैसे और एन्टी सबमरीन वारफेयर में महारथ हासिल टोही विमान और कमोव सीरीज के हेलीकॉप्टर की  त्वरित खरीद और तैनाती करने की है।  इन सब  उपायों के अतिरिक्त गहन गश्ती से ही भारतीय सामुद्रिक और अनन्य सामुद्रिक हित पूरी तरह सुरक्षित हो सकेंगे।


4.चीनी नौसेना ने आज तक आमने सामने की लड़ाई नहीं किया है ,जो कुछ किया है,अभ्यास या संयुक्त अभ्यास किया है,भारतीय नौसेना को यहां "लीड और एज"मिलता है जो हर परिस्थिति में हमे बुलन्दी तक पहुंचाएगा लेकिन इसके किये शांति काल मे भी "काफी पसीना बहाने की जरूरत है,और रहेगी".
इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती साख से चीन खासा चिंतित है
भारत की तैयारी पर नजर डालें तो  भारत ने इस क्षेत्र में  सामरिक रूप से महत्वपूर्ण और  मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक इंडोनेशिया के सबांग डीप सी पोर्ट के उपयोग करने का समझौता कर चीन के "मल्लक्का डिलेमा" को और बढ़ा दिया है और ओमान के  डूक़ुम पोर्ट पर उपयोग के अधिकार को प्राप्त कर लिया है ।अमेरिका के  साथ LEOMA समझौते के बाद भारत इस क्षेत्र में अमेरिका की डिएगो गार्सिया नौसैन्य अड्डा भी आधिकारिक रूप से उपयोग में ला सकता है। क्वाड के संकल्पना के साथ साथ और "पेरिस-नई दिल्ली-कैनबरा" की संकल्पना से भी चीन पर असर हुआ है। हालिया मोदी और मॉरिसन के वर्चुअल बातचीत और खिचड़ी डिप्लोमसी के  जरिये दोनो देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकेंगे,जो निश्चित रूप से चीनियों को नहीं सुहायेगा।
5.हमें यहां चीन से बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है, हिंदमहासागर क्षेत्र में चीनी गतिविधियों में "कमी" देखने को मिली है,पर यह "पूरी तरह समाप्त " नहीं हुई है.
चीन लम्बे समय से " स्टील्थ क्षमता वाले पनडुब्बियों " और आधुनिक अंडर वाटर ड्रोन के विकास और तैनाती में  जुटा हुआ है,
जिसे बीते जनवरी में हिंद महासागर में  इन ड्रोन के एकॉस्टिक्स को सोनार ने पकड़ा था, चीन अपने स्टील्थ पनडुब्बियों को और उन्नत बना रहा है। ऐसा हो सकता है कि ये स्टील्थ पनडुब्बी मेरे लेख लिखे जाने समय में  हिन्द महासागर के गर्भ में कहीं खूंखार "कैट फिश"की तरह सागर की तलहटी में  दम साधे किसी अपना कार्य कर रही हो।


हिन्द महासागर क्षेत्र में फ्रीडम ऑफ नेविगेशन और जोन ऑफ पीस की संकल्पना पर भारतीय नेतृत्व पूरी तरह प्रतिबद्घ है और चोल कालीन राज्य से हिन्द महासागर हमारा अभिन्न अंग और सांस्कृतिक विरासत रहा था,है, और इसे हर हाल में बरकरार रखना है ।भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और  SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को गंभीरता से लेता है। जो नैसर्गिक रूप से इस क्षेत्र में सभी परिस्थितियों में  'फर्स्ट रेस्पांडर" है।
 भारत को क्वाड की संकल्पना में नए सिरे से
दिल्ली - जाकर्ता - केनबरा के नए त्रिकोण के साथ साथ दिल्ली -टोक्यो- पेरिस के नवीन त्रिकोणात्मक संकल्पना को मूर्त रूप देने में  कोताही नहीं बरतनी चाहिए ,जो क्वाड के संकल्पना के साथ कभी इस क्षेत्र के बेताज बादशाह रहे ब्रिटेन को साथ लेने में न हिचकना चाहिए।


6. भारत को चीन के साथ न सिर्फ नौसैनिक वरन अपने वायुसैनिक क्षमता विस्तार में कोई कटौती नहीं करनी चाहिए,वायुसेनाध्यक्ष भदौरिया के डिंडीगुल में एयरफोर्स के पासिंग आउट परेड के बाद दिए संबोधन,और उससे पूर्व गलवां घाटी झड़प के बाद वायुसेना की तैयारियों का जायजा लेने फौरन लेह रवानगी बिना कहे सुने बहुत कुछ कह जाता है।भारतीय वायुसेना को इस क्षेत्र में भौगौलिक रूप से उच्चतम सामरिक लाभ प्रदान है,जो चीनी वायुसेना को नहीं है,भारतीय वायुसेना के उपकरण,प्रशिक्षण और उसकी मारक क्षमता पर शायद ही किसी को संदेह हो। प्रधानमंत्री और रक्षा मन्त्री स्पष्ट कर चुके हैं कि एलएसी पर सेना को खुली छूट है,स्थानीय सैन्य कमाण्डर अपने विवेक से इस क्षेत्र के मसले को सुलझाएं,यह एक बेहद महत्वपूर्ण और सधा हुआ राजनीतिक कदम है,जिससे सेना का मनोबल बढ़ेगा और वे बिना किसी रुकावट के साथ अपने अभियान को अंजाम दे सकेगी।


7.अफ्रीका के अधिकतर देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की  पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी  की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर  चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स और अब अंडर वाटर ड्रोन की तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को  गलवां घाटी के कांड के बाद पूरे गंभीरता के साथ मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को पूरी आक्रमकता के साथ ज़ोन ऑफ पीस की संकल्पना को  बरकरार रखना चाहिए और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत  अपनी "कॉटन रोड अप्रोच " से प्रतिसन्तुलित करने की दिशा में नए सिरे से पहल करनी चाहिए।

8.समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर  चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे  और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत  अपनी "कॉटन रोड अप्रोच" से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।


9. भारत के लिए जरूरी है भरोसेमंद रूस का
साथ।

भारत को चीन के साथ विवादों को निपटारा करने में अपने सबसे भरोसेमंद साथी को नहीं भूलना चाहिए,आज रूस यह कहने के स्थिति में नहीं है कि "भारत उसका मित्र है तो चीन उसका भाई" .
बीजिंग के खौफनाक  हरकतों से मास्को खुद ग़मज़दा है।
अमेरिका चौधरी बनने की इच्छा रखता है पर मॉस्को से हमने ऐसा कभी नहीं सुना है।
यह बेहतर मौका है कि पुतिन को हिन्द महासागर के गर्म पानी में स्वागत किया जाय जिसे उनकी नौसेना ने बीते नवम्बर में हम्बनटोटा के "लाभदायक" हवा पानी का आनंद लिया तो फिर  दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ आशा अंतरीप (केप ऑफ गुड होप ) में रूसी नौसेना ने इन दोनों देशों के साथ मिलकर रूसी वोदका,बैले और विथ लव फ्रॉम मॉस्को के खतरनाक कॉकटेल का मुजाहिरा प्रस्तुत किया। हिन्दमहासागर में रूसी उपस्थिति मात्रा से स्थिति प्रतिसंतुलित होने लगेगी जैसा फिलीपींस ने विशालकाय रूसी तेल उत्खनन कंपनी रोसनेफ्ट को चीन के साथ  विवादित स्थानों पर हाइड्रोकार्बन और तेल उत्खनन का अधिकार डें दिया,वियतनाम भी इसी राह पर है,अब रूस के समक्ष चीन की अभी इतनी हिम्मत तो नहीं हुई है कि वे रोसनेफ्ट पर पानी फेंके।

चीन को प्रतिसंतुलित करने में भारत को रूस का एक बेहतरीन सहयोग अवश्यम्भावी है,इस बार मौका भी है और दस्तूर
भी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मॉस्को के रेड स्क्वायर पर आयोजित होने वाले ऐतिहासिक विक्ट्री डे परेड के भव्य आयोजन में शिरकत करने मास्को जा ही रहें है,उम्मीद तो किया ही जा सकता कि कुछ बेहतर  हो।


वर्तमान भूआर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में भारत को चीन  के साथ प्रतिस्पर्धा के बीच अफ्रीका एक अहम "डेस्टिनेशन" बन गया है
समय के साथ इस क्षेत्र में भारत को  इन देशो के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में को आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से  चीन की  ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या,सूडान,तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को  को  अपने परित्यक्त  "पीसफुल राइज"नीतियों को  इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशनआर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी  अपना प्रभाव बढ़ा रही है।भारत को  बदलते भू  रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है।
इन्ही  सामरिक और भू आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देते  हुुयेे वासुकी , ड्रैगन को मात देने में कामयाब हो सकेगा