भारत चीन के सीमान्त संबंधी विवाद के 45वें दिन यानी 15 और 16 जून की दरम्यानी रात एक हिंसक झड़प का रूप ले लिया जिसमें चीनी पीएलए से अपने संप्रभुता की रक्षा करते हुए 16 बिहार के कमान अधिकारी कर्नल बी संतोष बाबू समेत 20 जवान शहीद हो गए जबकि मीडिया में आई रिपोर्ट में 43 चीनी सैन्यकर्मी भी हताहत हुए । अति दुर्गम और उच्च तुंगता वाले क्षेत्र करीब चार घंटे चली इस शारीरिक दमखम की लड़ाई में,बिना एक गोली चलाये भारतीय जवानों ने अपने कमांडिंग ऑफिसर की शहादत का ऐसा बदला लिया जिसे चीनी ताउम्र याद रखेंगे।
कहाँ कहाँ हुआ विवाद।
इस विवाद कि शुरुआत सबसे पहले पश्चिमी सेक्टर में जॉनसन लाइन पर अवस्थित गलवां घाटी में आश्चर्यजनक रूप से हुआ जो आम तौर पर 1962 के बाद लगभग पूरी तरह शांत था फिर यह विवाद पूर्वी सेक्टर में मैकमोहन लाइन पर उत्तरी सिक्किम के नाकू ला (ला':दर्रा) में देखने को मिला फिर विवाद ने क्या जॉनसन क्या मैकमोहन लाइन सब एक कर दिया ।
मीडिया ने इसे स्टैंड ऑफ /फेस ऑफ का नाम दिया।
इससे पहले पश्चिमी सेक्टर और पूर्वी सेक्टर में दोनो पक्ष ने बिना एक भी गोली चलाये अपने कसरती बदन का पूरा प्रदर्शन किया जाहिर से अखाड़े में चित पट चलता रहता है,यहाँ भी कुछ ऐसा ही हुआ,मैकमोहन लाइन पर चीनियों की चपटी नाक टूटी तो जॉनसन पर हमारे सिर लेकिन गोली चलाने की जुर्रत दोनो ने नहीं कि यहां कोविड 19 से बचने के लिए सबसे स्पेशल शस्त्र सोशल डिस्टेंसिंग की दोनो ने जम कर धज्जियाँ उड़ाई लेकिन शीर्ष राजनीतिक और राजनयिक पक्ष ने सोशल डिस्टेंसिंग पूरा पालन किया।
शुरूआत में भारतीय राजनयिकों ने चीनी अतिक्रमण को कोई तवज्जो ही नहीं दियाऔर मामले को स्थानीय सैन्य कमांडरों को निपटाने के लिए छोड़ दिया जो डीविजन स्तर पर मेजर जनरल और ब्रिगेड स्तर पर ब्रिगेडियर स्तर के अधिकारी इसके लिए अधिकृत होते हैं विवाद का बिगड़ता स्वरूप देख दोनो देशों ने कोर कमांडर स्तर की वार्ता का रुख किया जिसे भारतीये पक्ष से ले जन हरिंदर सिंह की अगुवाई में चीन के मोल्दो के BPM में लंबी वार्ता हुई नतीजा ढाक के तीन पात रहा।
इससे पहले ये सैन्य अधिकारी सीमा विवाद से बचने के लिए विभिन्न बैठकों में तयशुदा मानक प्रक्रियाओं,जैसे सबसे लोकप्रिय बैनर ड्रिल आदि के माध्यम से आपसी विवादों को सुलझाते आते रहें थे लेकिन इस दफे ऐसा नहीं हुआ जिसकी गंभीर परिणीति गलवां घाटी खून से लाल हुई।
हालिया भारत चीन विवाद कई मायनों में अपने आप मे अनोखा है,या दूसरे शब्दों में यूं कहें कि इतिहास दुहराया जाता है,जैसी बात पूरी तरह सिद्ध हुई।
1.चीन ने पहली बार एक साथ तीनो सेक्टरों में विवाद की शरुआत की,लेकिन विवाद के कारण पुराने थे भारत द्वारा अपनी सीमा अवसंरचना को दुरुस्त करने में चीन की आपत्ति है।
2.गलवां घाटी,जहां चीनी 1962 में बुरी तरह पिटे थे,पेंगोंग झील के किनारे,हॉट स्प्रिंग,डेमचोक के साथ पूर्वी सेक्टर में नाकू ला,ये तमाम स्थान पूरी तरह शांत माने जाते थे और हो सकता है कि इन क्षेत्रों पर अपेक्षाकृत कम निगाह रहीं हो,लेकिन सामरिक रूप से ये तमाम क्षेत्र बेहद महत्वपूर्ण थे,हैं और रहेंगे।
3. चीन की तरफ से फिर से locust doctrin (टिड्डी डॉक्ट्रिन) को अपनाते हुए तेजी से अपने सीमा में भारी सैन्य तैनाती,जो अपेक्षाकृत पेज से बाहर थे,मजबूरन भारतीय पक्ष को स्थिति प्रतिसंतुलित करने के लिए "जरूरी कदम" उठाने पड़े,चीनी लड़ाकू हेलीकॉप्टर सीमा के आसपास मंडराए तो सुखोई 30 को उनकी हाल खबर लेने के लिए फौरन रवाना किया गया।
4.बात भारतीय रणनीति की करें तो भारतीय पक्ष खुलकर सामने न आके एक बार फिर अपने शीर्ष नेतृत्व पर भरोसा जताने के साथ साथ समांतर जहां एक तरफ " वर्चुअल "शिखर डिप्लोमेसी" summit diplomacy का रास्ता खोला तो बीजिंग में विक्रम मिश्री ने अपने कार्य को अंजाम देना शुरू किया ,अगले ही दी लेह स्थित 14वीं कोर के प्रमुख ले जन हरिंदर सिंह के नेतृत्व में चीन के मोल्दो में दोनो पक्षों ने सैन्य वार्ता शुरू की।
यह पहली बार हुआ जब दोनो देशों के बीच "कॉर्प्स(कोर) स्तर" पर वार्ता हुई,भारत की स्पष्ट मांग थी चीन पहले वाली "यथास्थिति बरकरकार"रखे तभी कोई सार्थक बातचीत का प्रतिफल निकल कर आएगा जो गलवां घाटी में हुई हिसंक झड़प के बाद भी जारी है और रहनी चाहिए.
चीन भली भांति जनता है कि वर्तमान व्यवस्था 1962 की नहीं है जहां माओ भारत को झन्नाटेदार झापड़ मारने की बात करते हैं और न ही भारत माओ की गाय है।गलवां घाटी के बाद शायद ही चीन कभी भारत के गाय समझने की जुर्रत करेगा,अगर ऐसा करेगा तो एक बार इस घटना में मारे गए अपने सैनिको के" चेहरे"की तस्वीरों पर उसे जरूर गौर करना चाहिए।
नेपाल की "दोहरी" भूमिका।
मध्य सेक्टर में नेपाल के साथ चीनी गठजोड़ ,भारत को सबसे ज्यादा चौंकाने वाली घटना रही ,हालांकि इस क्षेत्र में चीनी सैन्य तैनाती में वृद्धि हुई तो भारत ने भी उनकी आगवानी के लिए अपने जरूरी इंतजाम किए।
बेहद तेजी से घटे घटनाक्रम में राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने संविधान संशोधन को मंजूरी दिया जिसके बाद लिम्पियधुरा,लिपुलेख और कालापानी नेपाल के सुदूर अंचल दार्चुला के हिस्से है।
भारत के बार बार अनुरोध के वावजूद बीजिंग-काठमांडो-रावलपिंडी ने तमाम भारतीय अनुरोध को उफनते त्रिशूली में प्रवाहित कर दिए।
चीन इस दफे कार्टोग्राफिक वारफेयर में खुद शरीक न होकर नेपाल को सामने किया, गुजराल डॉक्ट्रिन के कमियों और नकारात्मक विश्लेषण से कंठ फूटे नेपाल ने जम कर नक़्शेबाज़ी को खूब उछाला,भारतीयों के लिए शायद नेपाल से यह उम्मीद नहीं होगी,वे क्षण भर के लिए चकित और निःशब्द रहे होंगे लेकिन नेपाल ने चीनी नमक का बेहतर शरीयत दी।
वैसे भी इतिहास गवाह है नेपाली "नाम नमक और निशान" के प्रति बेहद वफ़ादार होते हैं,उन्हें कोई फर्क नहीं पडता कि ये किनका है,
नेपाली गोरखाओं की वफादारी को 1857 की विद्रोह
को कुचलने और बाद के वर्षों में यूनियन जैक की रक्षा करने में,जलियांवाला बाग नरसंहार,मोपला विद्रोह को कुचलने में उनकी वहशियाना अंदाज और वहशीपन का इतिहास साक्षी है,इसलिए अगर नेपाल ने यहां चीन का साथ दिया तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए,चूंकि नमक सब जगह सर्व सुलभ है,बस ब्रांड बदलने की जरूरत होती है टाटा न मिला तो दूसरा ही सही, नमक है न !
उन्हें सिर्फ"कस्तो राम्रो छ" बोलने भर की जरूरत है,उन्हें इस बार तो चीन से नमक के साथ साथ स्वाद बढ़ाने के लिए "अजीनोमोटो" भी मुफ्त में मिल रहा है,भला यह चोखा सौदा नेपाल क्यों नहीँ करना चाहेगा। आज नेपाल में अपने नक्शे में शामिल किए लिम्पियधुरा,लिपुलेख और कालापानी के मौसम का हाल अपने एफएम रेडियो पर प्रसारित किया अब वह इन जगह पर सीमा चौकी बनाने की दिशा में कार्य करेगा,तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
फैक्टर 219.
चीन को वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत के ढांचागत सुधार से सख्त आपत्ति है,ऐसा नहीं है कि उसने अपने क्षेत्र में सड़क सहित अन्य अवसंरचना का विकास नहीं किया,चीन ने एलएसी पर जबर्दस्त संस्थागत अवसंरचना विस्तार किया है।
भारत की तरफ से छोटी कोशिश भी चीन को फूटी आंख नहीं सुहाती है,भारत ने चीनी विरोध को दरकिनार करते हुए समरिक रूप से महत्वपूर्ण ठिकाने को दुरुस्त करते हुए दुर्गम माने जाने वाले श्योक नदी सहित अन्य स्थानों पर सड़क अवसंरचना सुदृढ की जिससे भारत की पहुंच शिनजियांग से ल्हासा को जोड़ने वाली राजमार्ग संख्या 219 हो सकेगी।ये पश्चिमी चीनी क्षेत्र चीन की दुखती रग है जो राज्य प्रायोजित क्रूरता और गम्भीर मानवाधिकार के उलंघन से ग्रस्त है है,तो चीन की भौं तनी जिसका तात्कालिक अंत हम देख रहे हैं।
गलवां घाटी प्रकरण के बाद भी चीन के रवैये में कोई बदलाव देखने को नहीं मिला,अब उन्हें गलवां घाटी भी उनका हिस्सा नजर आता है इसलिए चीन के कथन और कारण पर बिल्कुल यकीन नहीं करना चाहिए
क्योंकि इतिहास गवाह है कि "चीनी जो कहते हैं वे बिल्कुल नहीं करते,गाहे बगाहे ऐतिहासिक दावा करते है,अपनी गलती पर इतनी तेजी से माफी मांगते है कि "चमेलियन" शर्म से लाल और पानी पानी हो जाता है। वे सुन ज़ू और कन्फ्यूसियस को एक साथ मानते है, जरूरत पड़ने पर बुद्ध को सामने करते हुए मानवता की बात करते है लेकिन वे अपना मुख्य कार्य कभी नहीं भूलते । इसलिए चीन को आप महाभारत के "मारीच"प्राणियों में "चमेलियन" की श्रेणी में रख कर उनके बारे में अपनी राय बनाये।
क्या करे भारत
1. 2019 में चीनी श्वेत पत्र जिसका शीर्षक "China National Defence in New Era के अध्ययन से स्पष्ट हो जाता है कि शी जिंगपिंग के दिमाग मे बहुत कुछ दौड़ रहा है,जहां सम्पूर्ण विश्व कोविड 19से जूझ रहा है
तो चीन भारत सहित अपने अन्य पड़ोसी देशों के साथ स्थल नभ और जल तीनो जगहों पर सीमा अतिक्रमण करने में तुला हुआ है।
आधुनिक चीन में यह युग जिनपिंग युग है जहां माओ,डेंग और जियांग जेमिन तिकड़ी के चीन को कछुआ बनना सिखाया तो जिनपिंग ने "मोर्चे पर आगे निकल कर नेतृत्व करने का प्रण"ले लिया है यह वही स्वप्न को पूरा करने की दिशा में उठाया जा रहा वह कदम है जिसे जिंगपिंग में 2014 में कज़ाकस्तान में देखा था।
अरबों डॉलर के द ग्रेट चाइनीज ड्रीम का जिसे वे 2049 चीन के मुक्ति के सौ वर्ष पूरे होने पर न्यू मैरीटाइम सिल्क रोड,हेल्थ सिल्क रोड और बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव के जरिये सम्पूर्ण एशिया,अफ्रीका और यूरोप के साथ आर्कटिक जनवादी चीन का लाल झंडा लहराना चाहते हैं।
कोविड 19 के बाद के विश्व मे जिंगपिंग के राह में कोई रुकावट नहीं दिख रही ,एशिया में भारत और भूटान के अलावा कोई इसे रोकने वाला नहीं लेकिन भारत के प्रश्न पर यहीं जिंगपिंग पूरी तरह फंसते हुए नजर आते है फिर उन्हें मलक्का डिलेमा नजर आता है तो इंडो पैसिफिक और क्वाड की संकल्पना से खतरे में उनकी सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन के साथ चूर चूर होते उनके अरमान । आखिर वे गलवां घाटी जैसे कदम पूरे सोच समझ कर उठा रहे हैं ,भारत ने चीन के साथ बहुत "हैंड इन हैंड " अभ्यास किया अब सही समय है चीन से आंख से आंख मिलाने का,बढ़ते चीनी छद्म गुरुर को तोड़ने का।
2.वर्तमान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र और हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती चीनी चुनौती और "स्ट्रिंग आफ पर्ल" के वे मोती जो चीनी मांझे में पिरोये हुए है और ग्वादर से कॉक्सबाजार से म्यांमार के क्याकप्यू तक विस्तृत होते धागे भारत के गले को लगातार कस रहे है तो कभी ढील दी जा रही है।
भारत - चीन के बीच विवाद जमीन पर होता है तो उसका असर समुद्र के भीतर होता है। इन विपरीत परिस्थितियों में आज भारत को जरूरत है कि हिंदमहासागर की "सुरक्षा अर्चिटेक्चर "को और प्रभावी रूप से चाक चौबंद करे, इसके लिए भारत को अपने विस्तृत तट से लेकर अपने "अनन्य आर्थिक क्षेत्र "की सुरक्षा सुनिश्चित करने की फौरी आवश्यकता है।
नए लिस्निंग पोस्ट, आधुनिक फ़ास्ट अटैक इंटरसेप्टर और गहरे समुद्र में पनडुब्बियों की गश्त पर आक्रामकता के साथ पेश आना होगा, इसके अतिरिक्त अधूरे और लम्बित पड़े तमाम। नौसैनिक प्रोजेक्ट में और तेजी लाने की आवश्यकता है, जरूरत पुराने हो चुके काम चलाऊ तकनीकी उपकरण को फेज आउट करते हुए अत्यधुनिक सोनार और स्टील्थ खोजी प्रणाली विकसित करें/खरीद करें।
3.भारतीय नौसेना को आधुनिक तकनीक और उत्कृष्ट मानव बल चाहिए तभी यह बेहतरीन परिणाम देती है। भारत को एन्टी सबमरीन वारफेयर सिस्टम को और अत्यधुनिक बनाते हुए उसे दुरुस्त करने और उसमे महारथ हासिल करें,अत्यधुनिक सोनार बीपिंग सिस्टम क्षमता को और मजबूत बनाये, नए पीढ़ी के नौसैनिक साउंड सेंसर को मरीन टोपोग्राफी के उन अनछुए जगहों पर लगाया जाए जहाँ से चीनी घुसपैठ कर सकते है,साथ ही नॉइज सिग्नेचर डिवाइस को और आधुनिक करें,पारंपरिक नेवल माइन से आगे निकलते हुए आधुनिक और बेहद धीमी से धीमी इंफ्रासोनिक साउंड को पहचानने वाले एकॉस्टिक डेटोनॉटिंग माइंस बिछाएं जाएं। आज जरुरत न सिर्फ़ मरीन टोपोग्राफी पर महारथ हासिल करने से है बल्कि आपको और पी 81आई जैसे और एन्टी सबमरीन वारफेयर में महारथ हासिल टोही विमान और कमोव सीरीज के हेलीकॉप्टर की त्वरित खरीद और तैनाती करने की है। इन सब उपायों के अतिरिक्त गहन गश्ती से ही भारतीय सामुद्रिक और अनन्य सामुद्रिक हित पूरी तरह सुरक्षित हो सकेंगे।
4.चीनी नौसेना ने आज तक आमने सामने की लड़ाई नहीं किया है ,जो कुछ किया है,अभ्यास या संयुक्त अभ्यास किया है,भारतीय नौसेना को यहां "लीड और एज"मिलता है जो हर परिस्थिति में हमे बुलन्दी तक पहुंचाएगा लेकिन इसके किये शांति काल मे भी "काफी पसीना बहाने की जरूरत है,और रहेगी".
इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती साख से चीन खासा चिंतित है
भारत की तैयारी पर नजर डालें तो भारत ने इस क्षेत्र में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण और मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक इंडोनेशिया के सबांग डीप सी पोर्ट के उपयोग करने का समझौता कर चीन के "मल्लक्का डिलेमा" को और बढ़ा दिया है और ओमान के डूक़ुम पोर्ट पर उपयोग के अधिकार को प्राप्त कर लिया है ।अमेरिका के साथ LEOMA समझौते के बाद भारत इस क्षेत्र में अमेरिका की डिएगो गार्सिया नौसैन्य अड्डा भी आधिकारिक रूप से उपयोग में ला सकता है। क्वाड के संकल्पना के साथ साथ और "पेरिस-नई दिल्ली-कैनबरा" की संकल्पना से भी चीन पर असर हुआ है। हालिया मोदी और मॉरिसन के वर्चुअल बातचीत और खिचड़ी डिप्लोमसी के जरिये दोनो देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का उपयोग कर सकेंगे,जो निश्चित रूप से चीनियों को नहीं सुहायेगा।
5.हमें यहां चीन से बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है, हिंदमहासागर क्षेत्र में चीनी गतिविधियों में "कमी" देखने को मिली है,पर यह "पूरी तरह समाप्त " नहीं हुई है.
चीन लम्बे समय से " स्टील्थ क्षमता वाले पनडुब्बियों " और आधुनिक अंडर वाटर ड्रोन के विकास और तैनाती में जुटा हुआ है,
जिसे बीते जनवरी में हिंद महासागर में इन ड्रोन के एकॉस्टिक्स को सोनार ने पकड़ा था, चीन अपने स्टील्थ पनडुब्बियों को और उन्नत बना रहा है। ऐसा हो सकता है कि ये स्टील्थ पनडुब्बी मेरे लेख लिखे जाने समय में हिन्द महासागर के गर्भ में कहीं खूंखार "कैट फिश"की तरह सागर की तलहटी में दम साधे किसी अपना कार्य कर रही हो।
हिन्द महासागर क्षेत्र में फ्रीडम ऑफ नेविगेशन और जोन ऑफ पीस की संकल्पना पर भारतीय नेतृत्व पूरी तरह प्रतिबद्घ है और चोल कालीन राज्य से हिन्द महासागर हमारा अभिन्न अंग और सांस्कृतिक विरासत रहा था,है, और इसे हर हाल में बरकरार रखना है ।भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को गंभीरता से लेता है। जो नैसर्गिक रूप से इस क्षेत्र में सभी परिस्थितियों में 'फर्स्ट रेस्पांडर" है।
भारत को क्वाड की संकल्पना में नए सिरे से
दिल्ली - जाकर्ता - केनबरा के नए त्रिकोण के साथ साथ दिल्ली -टोक्यो- पेरिस के नवीन त्रिकोणात्मक संकल्पना को मूर्त रूप देने में कोताही नहीं बरतनी चाहिए ,जो क्वाड के संकल्पना के साथ कभी इस क्षेत्र के बेताज बादशाह रहे ब्रिटेन को साथ लेने में न हिचकना चाहिए।
6. भारत को चीन के साथ न सिर्फ नौसैनिक वरन अपने वायुसैनिक क्षमता विस्तार में कोई कटौती नहीं करनी चाहिए,वायुसेनाध्यक्ष भदौरिया के डिंडीगुल में एयरफोर्स के पासिंग आउट परेड के बाद दिए संबोधन,और उससे पूर्व गलवां घाटी झड़प के बाद वायुसेना की तैयारियों का जायजा लेने फौरन लेह रवानगी बिना कहे सुने बहुत कुछ कह जाता है।भारतीय वायुसेना को इस क्षेत्र में भौगौलिक रूप से उच्चतम सामरिक लाभ प्रदान है,जो चीनी वायुसेना को नहीं है,भारतीय वायुसेना के उपकरण,प्रशिक्षण और उसकी मारक क्षमता पर शायद ही किसी को संदेह हो। प्रधानमंत्री और रक्षा मन्त्री स्पष्ट कर चुके हैं कि एलएसी पर सेना को खुली छूट है,स्थानीय सैन्य कमाण्डर अपने विवेक से इस क्षेत्र के मसले को सुलझाएं,यह एक बेहद महत्वपूर्ण और सधा हुआ राजनीतिक कदम है,जिससे सेना का मनोबल बढ़ेगा और वे बिना किसी रुकावट के साथ अपने अभियान को अंजाम दे सकेगी।
7.अफ्रीका के अधिकतर देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स और अब अंडर वाटर ड्रोन की तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को गलवां घाटी के कांड के बाद पूरे गंभीरता के साथ मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को पूरी आक्रमकता के साथ ज़ोन ऑफ पीस की संकल्पना को बरकरार रखना चाहिए और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत अपनी "कॉटन रोड अप्रोच " से प्रतिसन्तुलित करने की दिशा में नए सिरे से पहल करनी चाहिए।
8.समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत अपनी "कॉटन रोड अप्रोच" से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।
9. भारत के लिए जरूरी है भरोसेमंद रूस का
साथ।
भारत को चीन के साथ विवादों को निपटारा करने में अपने सबसे भरोसेमंद साथी को नहीं भूलना चाहिए,आज रूस यह कहने के स्थिति में नहीं है कि "भारत उसका मित्र है तो चीन उसका भाई" .
बीजिंग के खौफनाक हरकतों से मास्को खुद ग़मज़दा है।
अमेरिका चौधरी बनने की इच्छा रखता है पर मॉस्को से हमने ऐसा कभी नहीं सुना है।
यह बेहतर मौका है कि पुतिन को हिन्द महासागर के गर्म पानी में स्वागत किया जाय जिसे उनकी नौसेना ने बीते नवम्बर में हम्बनटोटा के "लाभदायक" हवा पानी का आनंद लिया तो फिर दक्षिण अफ्रीका और चीन के साथ आशा अंतरीप (केप ऑफ गुड होप ) में रूसी नौसेना ने इन दोनों देशों के साथ मिलकर रूसी वोदका,बैले और विथ लव फ्रॉम मॉस्को के खतरनाक कॉकटेल का मुजाहिरा प्रस्तुत किया। हिन्दमहासागर में रूसी उपस्थिति मात्रा से स्थिति प्रतिसंतुलित होने लगेगी जैसा फिलीपींस ने विशालकाय रूसी तेल उत्खनन कंपनी रोसनेफ्ट को चीन के साथ विवादित स्थानों पर हाइड्रोकार्बन और तेल उत्खनन का अधिकार डें दिया,वियतनाम भी इसी राह पर है,अब रूस के समक्ष चीन की अभी इतनी हिम्मत तो नहीं हुई है कि वे रोसनेफ्ट पर पानी फेंके।
चीन को प्रतिसंतुलित करने में भारत को रूस का एक बेहतरीन सहयोग अवश्यम्भावी है,इस बार मौका भी है और दस्तूर
भी, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह मॉस्को के रेड स्क्वायर पर आयोजित होने वाले ऐतिहासिक विक्ट्री डे परेड के भव्य आयोजन में शिरकत करने मास्को जा ही रहें है,उम्मीद तो किया ही जा सकता कि कुछ बेहतर हो।
वर्तमान भूआर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में भारत को चीन के साथ प्रतिस्पर्धा के बीच अफ्रीका एक अहम "डेस्टिनेशन" बन गया है
समय के साथ इस क्षेत्र में भारत को इन देशो के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में को आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से चीन की ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या,सूडान,तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को को अपने परित्यक्त "पीसफुल राइज"नीतियों को इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशनआर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी अपना प्रभाव बढ़ा रही है।भारत को बदलते भू रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है।
इन्ही सामरिक और भू आर्थिक नीतियों को बढ़ावा देते हुुयेे वासुकी , ड्रैगन को मात देने में कामयाब हो सकेगा