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Monday, April 13, 2020

कोविड-19 के प्रकोप के बीच जलियांवाला हत्याकांड के 101वर्ष।


आज जालियांवाला बाग़ हत्याकांड को पूरे एक सौ एक वर्ष हो गए है। कोविड-19 से ग्रस्त विश्व में आज शायद इस पर थोड़ा कम ध्यान दिया जाय लेकिन भारतीय इतिहास में यह दिन अंग्रेजी औपनिवेशिक मानसिकता से  ग्रस्त और व्हाइट मेन बर्डनशिप का बोझ लिए झूमते बीते अंग्रेजी राज के अत्याचार को बयां करता है,जिसके बूटों तले हमारी समृद्ध विरासत,ज्ञान और संस्कृति पूरी तरह कुचली गयी।जिसे भूलना किसी भी भारतीयों के लिए नामुमकिन होगा।

पैक्स ब्रिटेनिका के मद  में चूर ब्रिटिशों ने मैली टेम्स को पावन हुगली के जल से पूरी तरह कायाकल्प किया गया और हुगली को प्रदूषित और मैला बना दिया,कभी लंदन से हर मामले में अत्यधिक समृद्ध रहा मुर्शिदाबाद ,वर्तमान की अपने अस्तित्व की हालत बयां करने लायक नहीं बचा है।लार्ड मैकाले और मिल्स की  थ्योरी ऑफ डाउनवार्ड फिल्टरेशन के जरिए अंग्रेज़ी कम्पनी और क्राउन ने हमे मिट्टी में मिलाने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई थी।


इस त्रासदी की  गंभीरता को महज प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के गत वर्ष दिए गए वक्तव्य से समझा जा सकता है। उन्होंने ने कहा कि

‘‘भारत की आज़ादी का संघर्ष बहुत लम्बा है, बहुत व्यापक है, बहुत गहरा है, अनगिनत शहादतों से भरा हुआ है। पंजाब से जुड़ा एक और इतिहास है। 2019 में जलियांवाला बाग की उस भयावह घटना के भी 100 साल पूरा हो रहा है इस  घटना ने पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया"

बेशक,दुनिया के दूसरे हिस्से के लिए महज़ यह सालाना जलसा हो सकता है,पर बीते सौ सालों के बाद भी उन अंग्रेजों के अमानुष अत्याचार,अन्याय से हमारे जख्म आज भी हरे हैं और साल दर साल यह जख्म और भी हरे होते रहेंगे।

भला हो उन सबल्टर्न भारतीय इतिहासकारों का,जिन्होंने सही तथ्यों को अपने लेखनी में जगह दी, नहीं तो स्काउटिश स्कॉच पीते हुए भारतीय इतिहास को लिखने वाले भारतीय/ब्रिटिश इतिहासकारों का वश चलता तो ये जालियाँवाला हत्याकांड को ही गायब कर देते, ये महज कोरा आरोप नहीं हैं,वस्तुतः इस कुकृत्यस के  लिए ये जाने जाते है,सच को बाहर कीजिये और अफ़वाहों को जगह दीजिये जिससे इनके फूट डालो और राज करो कि  नीति अनवरत चलती रहे।

सबल्टर्न भारतीय इतिहासकारों पढ़ते हुए हमारे कान आज भी उन बेबस,निहत्थे और लाचार बच्चे बूढ़े,स्त्री पुरुष जो बाग़ में शांतिपूर्वक जमा थे,उन पर बरसती मशीनगन की गोलियों के बीच उनकी चीख को महसूस कर सकते हैं।

ब्रिटिश सरकार और उनके मंत्री कई दफे इस लोमहर्षक हत्याकांड पर अफसोस तो जता चुके हैं 2019 में भी तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे  ने इस घटना पर अफसोस जताया है ।

वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कोविड 19 से ग्रस्त थे ,वे कल ही गहन चिकित्सा कक्ष से बाहर आये है और फ़िलहाल  सिनेमा देखनेऔर पहेलियां सुलझाने में व्यस्त है। अगर वे स्वस्थ रहते और कोविड19 का प्रकोप न रहता तो वे भी अपने पूर्ववर्ती के राह पर चलने में किंचित संकोच नहीं करते, कहते हैं न आखिर वचन से क्यों दरिद्र होऊँ,अफसोस ही तो जताना है।

लेक़िन आज भी किसी भी ब्रिटिश राजनेता को रत्ती भर शर्म नहीं आयी है कि वे भारतीय जनता से  जलियांवाला हत्याकांड पर माफ़ी मांगने की कोई जहमत उठाएं।


क्या था रौलेट एक्ट ?

भारत मे बढ़ते क्रांतिकारियों के प्रभाव को जड़ से समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने 1917 में ब्रिटिश जज सर सिडनी रौलेट की अगुवाई वाली समिति का गठन किया। इस समिति का मुख्य कार्य यह पता लगाना था कि

"1.भारत मे  किस स्तर तक क्रांतिकारी आंदोलन संबंधी षड्यंत्र फैले हुए हैं।
2.इन षड़यंत्र का प्रभावी रूप से मुकाबला करने के लिए किस प्रकार के कानूनों की आवश्यकता है।

ब्रिटिश सरकार भारत मे बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों से बुरी तरह त्रस्त थी और  कठोर "भारतीय रक्षा क़ानून" की मियाद पूरी हो रही थी।

समिति ने 1918 में अपनी रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी,समिति कीअनुसंशा पर केंद्रीय विधानमंडल ने आनन फानन में फरवरी 1919 में दो विधेयक पेश किया जिसमें एक को तो वापस ले लिया गया  लेकिन दूसरे जिसे " क्रांतिकारी एवं अराजकतावादी अधिनियम या Anarchical and Revolutionary Crimes Act,1919  को  18 मार्च 1919 को  पारित कर दिया।

इस दमनकारी कानून की  की अवधि तीन साल रखी गई। इसे ही रौलेट एक्ट या काला कानून कहा जाता है। इस कानून को तमाम भारतीय नेताओं और आम जनमानस से तीखे विरोध का सामना करना पड़ा, भारतीयों ने इसे "काला बिल"/आतंकी अपराध अधिनियम कहा, भारतीय नेताओं ने इसके विरोध में केंद्रीय विधानमंडल से अपना इस्तीफा दे दिया,पर असंवेदनशील ब्रिटिश सरकार पर कोई असर नहीं हुआ।

यहां यह ध्यान रखना बेहद जरूरी होगा कि  यह दौर महात्मा गांधी के सफलतम "सत्याग्रह ",क्रांतिकारियों के "सूरत फूट" के बाद उनकी तीव्र और प्रभावी क्रांतिकारी गतिविधि ,और तुर्की के खलीफा को लेकर उपजे ख़िलाफ़त आंदोलन का था।।

रौलेट एक्ट के प्रावधान।

इस विधेयक के प्रावधानों के  तहत भारत मे नागरिक अधिकार को कुचलने के लिए  तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को असीम शक्ति प्रदान की गयी थी। इसके तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति/सरकार की नजर में आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का संदेहास्पद व्यक्ति को बिना कारण बताये अनिश्चितकाल के लिए कारावास में रख कर दंडित कर सकती थी।

जिसमे सुनवाई कम से कम दो साल तक तो संभव नहीं थी,इस अधिनियम में ब्रिटिश भारतीय पुलिस को कई मानवाधिकार विरोधी शक्तियां मिली थी जिसका वे बेजा इस्तेमाल कर सकती थी।

इसकी जद में मीडिया,आम निर्दोष व्यक्ति,बच्चे ,महिला आदि  शामिल थे। दूसरे शब्दों में इसके प्रावधान पश्चिमी देशों के उपज "प्राकृतिक और नैसर्गिक न्याय" का पूरी तरह  मखौल उड़ा रहे थे।इसे "बिना वकील,बिना अपील और बिना दलील का कानून" भी कहा जाता था।

महात्मा गांधी ने इस बिल के प्रावधानों को लेकर पुरजोर विरोध किया। गाँधी ने इसके खिलाफ  06 अप्रैल 1919 को  देशव्यापी हड़ताल  का आह्वान किया, और सत्याग्रह  सभा की  जिसे "रॉलेट सत्याग्रह"भी कहा जाता है।


पंजाब में लगातार बढ़ता विरोध प्रदर्शन का सिलसिला,विफल होता प्रशासन।

पंजाब में विरोध प्रदर्शन की शुरुआत स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में  दिल्ली से हुई जिसमें पुलिस की गोली से पांच आंदोलनकारी मारे गए,देखते ही देखते यह बम्बई,अहमदाबाद, पंजाब और लाहौर को भी अपने आगोश में ले लिया।

स्वामी श्रद्धानंद और डॉ.सत्यपाल के आमंत्रण पर गाँधी पंजाब की तरफ कूच किये लेकिन हरियाणा के पलवल  में उन्हें 8 अप्रैल 1919 को गिरफ्तार कर बम्बई भेज दिया गया और उन्हें पंजाब जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया। गांधी को पंजाब में प्रतिबंध को लेकर आम जनमानस में खासा रोष था।


पंजाब में हिन्दू, सिख और मुस्लिम समुदाय की एकता अंग्रेजों को फूटी आंख नहीं सुहा रही थी। अंग्रेज किसी भी कीमत पर इस एकता को तोड़ने और भारतीय लोगों के मन में से निकल चुके डर को फिर से स्थापित करना चाहते थे। और इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते थे।


इसी बीच तेजी  से बदलते घटनाक्रम में 9 अप्रैल 1919 को  पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉक्टर सत्यपाल और डॉक्टर सैफ़ुद्दीन किचलू को पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर के निर्देश पर अमृतसर के जिला उपायुक्त ने बिना किसी कारण बताये गिरफ्तार कर लिया।

 इस गिरफ़्तारी ने आक्रोश से उबल रहे पंजाब के लोगों की सब्र की सीमा तोड़ दी,फिर भी वे इस गैर कानूनी गिरफ़्तारी को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से सड़कों पर उतर कर जुलूस के शक्ल में अपना अपनी कौमी एकता  को सुदृढ़ करते हुए अपना विरोध दर्ज कराया, यह विरोध इतना जबर्दस्त था कि छह अप्रैल को पूरे पंजाब में हड़ताल रही और 10 अप्रैल 1919 को हिन्दू एवं मुसलमानों ने मिलकर बहुत बड़े स्तर पर रामनवमी के त्योहार का आयोजन किया।


लेकिन पुलिस पहले से ही यह तय कर बैठी थी कि इस जूलूस का दमन करना है। पुलिस ने जुलूस को  को रोकने का असफ़ल प्रयास किया और जुलूस पर बिना चेतावनी दिए गोलीबारी कर दी,जिससे कम से कम दस लोग मारे गए,अब प्रदर्शनकारियों के सब्र का पैमाना टूट गया और उग्र भीड़ ने पुलिस पर पत्थरबाजी के साथ पलटवार किया, उन्होंने कई सरकारी इमारतों में आग लगा दी  और  पांच अंग्रेज को मार दिया और एक अंग्रेजी महिला के साथ हाथापाई की (जिसे बाद में भारतीयों ने ही बचाया)  मामले की गंभीरता ,वक़्त का तकाजा और प्रशासन के हाथों से तेजी से निकलती सरकारी मशीनरी को बचाने के लिए सबसे पहले पंजाब में मार्शल लॉ लगाया गया और अमृतसर शहर का प्रशासन 55 वर्षीय ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर को सौंप दिया गया।

अगले दिन 600 सैनिकों की टुकड़ी अमृतसर पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया, रेगीनाल्ड डायर ने आते ही जम कर गिरफ्तारियां की और  पूरे शहर में निषेधाज्ञा लगा दिया, जिससे  धरना प्रदर्शन तो दूर, तीन व्यक्ति एक साथ इकट्ठे नहीं हो सकते थे।

आखिर क्या हुआ  बैशाखी के दिन

अमृतसर में उपजे हालात से बेख़बर आस पड़ोस जिले क करीब 10 से 15 हज़ार लोग पवित्र बैशाखी का त्योहार मनाने  चारों तरफ से विशाल दीवारों से घिरे जलियांवाला बाग ,जो एक सामाजिक मेल जोल का प्रसिद्ध स्थल था, जमावड़ा होने शुरु होने लगा था।

यह सभा जलियांवाला बाग में शाम करीब 4:30 बजे होने को थी। मौसम विभाग के अनुसार उस दिन आसमान मौसम साफ था,हवा थोड़ी ठंडक लिए मन्द गति से चल रही थी लोग अपने प्रिय नेता की गिरफ्तारी से व्यथित,उग्र,और परेशान थे।

जब रेगीनाल्ड डायर को इन श्रद्धालुओं को आने की खबर मिली तो वह आगबबूला हो उठा,उसने अपने मातहत से कहा कि निषेधाज्ञा लगे होने के वावजूद ये लोग उसके आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते है।

उसने फौरन अपना निर्णय लिया और मुख्यतः गोरखा और कुछ बलूची सैनिकों और 7.92 एमएम मशीनगन लगे बख्तरबंद वाहन के साथ जालियांवाला बाग पहुंच कर पूरे मैदान की घेरेबन्दी कर दी। इसके बाहर निकलने के पांचों तंग रास्ते को बंद कर दिया और अपने  सैनिकों को मैदान के दीवारों पर मोर्चा संभालने का आदेश दिया और 150 गज से भी कम दूरी से सभा में शामिल निहत्थे ,स्त्री पुरूष, बुज़ुर्ग, बच्चों को सभा से जाने, सभा से निषेधाज्ञा का उल्लंघन होने की चेतावनी दिए बिना उसने अपने सैनिकों से अन्तिम गोली समाप्त होने तक इन निहत्थे लोगो पर गोलीबारी करने का आदेश दिया ।

ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आंकड़ो में दस मिनट में  कुल 1650 राउण्ड की गोलीबारी हुई जिसमें कम से कम 379 लोग मारे गए,1137 लोग बुरी तरह जख़्मी हुए, डायर के कलेजे को शांति मिली कि शायद ही एक भी गोली बर्बाद गयी।


ब्रिगेडियर डायर के सैनिकों ने पहले चेतावनी देने के लिए न हवा में गोली चलाई,और न ही पैरों पर, सैनिकों ने सभा कर रहे लोगो के सिर,चेहरे,छाती और महिलाओं के पेट और गर्भ पर गोलियां मारी,।
सैनिक अपनी राइफल की मैगज़ीन खाली करते और दूसरी लगाते हुए करीब दस मिनट तक चले रक्तपात से रक्तपिपासु डायर को क्षणिक शांति दे गया

डायर द्वारा किये  नरसंहार में मरने वालों की संख्या ब्रिटिश सरकार ने 379 बताई, जबकि भारतीय कांग्रेस की रिपोर्ट के अनुसार इसमें एक हजार से अधिक लोग मारे गए।
जलियांवाला बाग में गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं, जो अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी कहते नजर आते हैं।

जालियां वाला हत्याकांड एक पागल ,सनकी,वहशी व्यक्ति का करतूत नहीं बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता और नस्लभेद से ग्रस्त दिमाग की उपज थी।इसमे किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि दोनो डायर ख़ूनी हत्यारा है।


अतीत में भी ब्रिटिश सामूहिक नरसंहार के लिए जाने गए हैं, जैसे पीटर लू,बोस्टन कॉमन्स, आयरलैंड के डब्लिन मे ईस्टर रिबेलिएन आदि चंद उदाहरण हैं जिसमे ब्रिटिश औपनिवेश के सैनिक कमांडरों की खून की प्यास  देखने को मिलती है और इन्हें इस नरसंहार पर कोई शर्म नहीं है।

जलियांवाला बाग हत्याकांड की इस घटना से पूरा देश स्तब्ध रह गया। वहशी क्रूरता ने देश को मौन कर दिया। पूरे देश में बर्बर हत्याकांड की भर्त्सना की गयी।


नोबेलजई  रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश महारानी द्वारा दी गई “नाइट”की उपाधि वापस कर दी गई थी। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सर शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा कि "'अब समय आ गया है जब सम्मान के तमगे अपमान के बेतुके संदर्भ में हमारे कलंक को सुस्पष्ट कर देते हैं  जहां तक मेरा प्रश्न है मैं सभी विशेष उपाधियों से रहित होकर अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूँ "

इस शर्मनाक हत्याकांड के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार
थॉमसन और गैरेट ने लिखा  कि "अमृतसर दुर्घटना भारत ब्रिटेन संबंध में युगांतरकारी घटना थी  जैसा कि 1857 का विद्रोह था" वहीं दीनबंधु एफ०एंड्रूज ने हत्याकांड को “”जानबूझकर की गई हत्या”” कहा.


जलियांवाला बाग नरसंहार के कारणों की जांच के लिये 
हंटर कमेटी ।

सरकार ने विवशता में जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच हेतु 1 अक्टूबर 1919 को लार्ड हंटर की अध्यक्षता में एक आठ सदस्यी आयोग का नियुक्ति की थी।

जिसमें पांच अंग्रेज और तीन भारतीय सदस्य थे।

1 . लॉर्ड हंटर , जस्टिस रैस्किन,डब्लू०एफ० राइस ,
मेजर जनरल सर जार्ज बैरो और सर टॉमस स्मिथ ।

जबकि अन्य तीन भारतीय सदस्य थे।

1. सर चिमनलाल सीतलवाड़
2. साहबजादा सुल्तान अहमद
3. जगत नारायण ।


हंटर कमेटी ने मार्च 1920 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थीइसके पहले ही सरकार ने दोषी लोगों को बचाने के लिए "इण्डेम्निटी बिल " पास कर लिया था।


हंटर समिति ने इस पूरे घटनाक्रम पर लीपापोती करने का प्रयास किया , समिति ने सबसे पहले पंजाब के गवर्नर को निर्दोष घोषित किया गया वहीं समिति ने जनरल रेगीनाल्ड डायर पर दोषों का हल्का बोझ डालते हुए कहा कि "डायर ने कर्तव्य को गलत समझते हुए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया  लेकिन जो कुछ किया पूरी निष्ठा से किया "

तत्कालीन भारतीय सचिव मांटेग्यू ने कहा '"जनरल आर०डायर ने जैसा उचित समझा उसके अनुसार बिल्कुल नेक नीयती से कार्य किया था अतः उसे परिस्थिति को ठीक-ठीक समझने में गलती हो गई "

जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ०डायर ने इस कृत्य के संदर्भ में कहा कि
"तुम्हारी कार्यवाही ठीक है गवर्नर इसे स्वीकार करता है।"

डायर को उसके अपराध के लिए ससम्मान और भारी धनराशि के साथ उसे नौकरी से हटाने का दंड दिया गया था लेकिन स्वदेश वापसी के बाद उसका राष्ट्र नायक के रूप में स्वागत किया गया, उसके सम्मान में कशीदे गढ़े गए।

 प्रसिद्ध उपन्यासकार और साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता रूडयार्ड किपलिंग ने जनरल  रेगीनाल्ड डायर की  प्रशँसा  करते हुए कहा कि "Man Who Saved India" .

,ब्रिटिश अखबारों ने उसे "ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक" बताया वहीं ब्रिटिश संसद के निम्न सदन हाउस ऑफ कॉमन्स ने जहाँ उसके कृत्य की निंदा की

वहीं ब्रिटिश उच्च सदन हाउस ऑफ  लॉर्ड ने उसे "ब्रिटिश साम्राज्य का शेर " कहा था।

ब्रिटिश सरकार ने उसकी सेवाओं के लिए आर०डायर को
"स्वोर्ड ऑफ ऑनर" प्रदान किया गया।

इंग्लैंड के एक अखबार मॉर्निंग पोस्ट ने आर डायर के लिए तीस हज़ार पाउंड की धनराशि इकट्ठा किया था।

प्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद के शब्दों में पंजाब को कमोबेश "शत्रु देश मान लिया गया था जिसे अभी विजित किया गया हो वहां के निवासियों को उपयुक्त सजाएं देकर ऐसा सबक सिखाया गया कि वह सरकार को चुनौती देने और उसकी आलोचना करने के सभी इरादो से बाज आये '

सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने लिखा है कि "जलियांवाला बाग नें देश में आग लगा दी थी"

तहकीकात कमेटी 1919.

जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में एक समिति की नियुक्ति की थी
इस समिति को तहकीकात समिति कहा गया गया अन्य सदस्यों में  महात्मा गांधी , मोतीलाल नेहरु, अब्बास तैय्यबजी सी०आर०दास एंव पुपुल जयकर थे।


इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में ब्रिटिश अधिकारियों के इस बर्बर कार्य के लिए उन्हें निंदा का पात्र बनाया सरकार से दोषी लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने और मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया फलस्वरुप गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाने का निर्णय लिया और  इस प्रकार स्वतंत्रता संघर्ष के तृतीय चरण की शुरुआत हुई और स्वतंत्रता के आंदोलन में गांधीजी का आगमन हुआ। पंजाब को दमन के अकल्पनीय दौर से गुजरना पड़ा था

चार सितंबर 1920 को कोलकाता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन का आयोजन किया गया था किस अधिवेशन में पंजाब और खिलाफत के प्रश्न पर सरकार की कटु आलोचना की गई थी इस कटु आलोचना को करने वाले महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव में कहा गया कि इस कांग्रेस का यह भी मत है कि जब तक अन्याय का प्रतिकार और स्वराज्य की स्थापना नहीं हो जाती है तब तक भारतीय जनता के लिए इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है कि वह क्रमिक अहिंसक असहयोग की नीति का अनुमोदन करें और उसे अंगीकार करें।


जालियांवाला बाग कांड जैसी हिंसक घटना के पीछे के अमर संदेश को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत वर्ष (24 जून)को मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में जलियांवाला बाग हत्याकांड को याद करते हुए मोदी ने कहा, कहा था कि  हिंसा और क्रूरता से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। जीत हमेशा शांति और अहिंसा की होती है, त्याग और बलिदान की होती है।

पीएम ने कहा ‘‘13 अप्रैल,1919 का वो काला दिन कौन भूल सकता है जब शक्ति का दुरुपयोग करते हुए क्रूरता की सारी हदें पारकर निर्दोष, निहत्थे और मासूम लोगों पर गोलियाँ चलाई गयी थीं। इस घटना के 100 वर्ष पूरे होने वाले हैं।

  2020 में इस हत्याकांड के  101 साल पूरे हो गए है,साल दर साल यह संख्या बढ़ती रहेगी आने वाले हर बैशाखी पर अंग्रेजों द्वारा दिये गए न मिटने वाले जुल्मों सितम को हमारी पीढ़ी और आने वाले पीढ़ी याद करेंगी।