महाशिवरात्रि शीत ऋतु के समाप्ति के समीप कृष्ण पक्ष के चतुर्दशी तिथि को मनाई जाती है। यह उन चंद त्योहारों में एक है जो कृष्ण पक्ष में मनाया जाता है।
स्कंदपुराण की माने तो प्रत्येक मास की चतुर्दशी की तिथि शिवरात्रि होती है,पर फाल्गुन मास की यह तिथि शिव को कुछ ज्यादा ही भाता है इसलिये इस तिथि को "महाशिवरात्रित" कहलाती है।भारतीय प्राचीन ज्योतिष विज्ञान में चतुर्दशी तिथि के स्वामी स्वयं शिव है और कृष्णपक्षः शिवप्रियः की अवधारणा के कारण महादेव को यह तिथि का प्रिय होना निश्चित है।
पदम्,गरुड़, अग्नि पुराण और शिव संहिता में इस तिथि को संवत्सर का प्रमुख दिन कहा गया है। महाशिवरात्रि शिव को इतना पसंद है कि वे शिवपुराण में कहते हैं कि "मैं शिवरात्रि पर न स्नान,न वस्त्र,न धूप, न पूजा और न ही पुष्प से इतना प्रसन्न होता हूँ जितना कि इस दिन के व्रत या उपवास रखने पर " शिव चारों जगत सर्जक के साथ साथ प्रहर के स्वामी है जो इन आठ रूपों में यथा भव,शर्व,रुद्र,पशुपति,उग्र,महान, भीम और ईशान के रूप में इन प्रहरों में विराजते हैं ।
भगवान शिव एक मात्र ऐसे देवता हैं जिसे आप जीवन के हर क्षण बिना किसी दिखावे के ,बेहद सादगी के साथ अपने आराध्य बना सकते है।श्मशान में जब औघड़ को देखकर आपको डर लगता है तब यही शिव जो औघड़ों के भी आराध्य हैं,वे आपकी इन औघड़ों और श्मशान में व्याप्त भय से आपकी रक्षा करते है।
आधुनिक युग मे इतना कस्टमाइज देवता शायद ही आप पा सके।भारतीय धर्म-दर्शन में शिव-पार्वती को समस्त विश्व का माता-पिता माना गया है। आप शिव को जिस रूप में,जिस स्थितियों में पूजना चाहते है पूज सकते हैं । कोकिल कवि विद्यापति ने शिव को "उगना" के रूप में पूजा तो सती ने पति रूप में, अर्जुन को किरात रूप मे दर्शन हुए तो महिषासुरमर्दनी ने शिव को महिषासुर के समर्थकों से वार्तालाप करने ही भेज दिया और शिवदूती नाम से प्रसिद्ध हुईं वहीं काली के प्रचंड और रौद्र रूप से सम्पूर्ण ब्रह्मांड को बचाने के लिए शिव स्वयं रणभूमि में उनके मार्ग में ही लेट गए, राजनीति के प्रकांड विद्वान और योद्धा रावण की भक्ति की शक्ति इतनी थी वह उन्हें कैलाश और सपत्नीक समेत लंका करीब करीब ले ही जा चुका था। राम को लंका विजय क दरकार हुई तो रामेश्वरम में शिव का सुमिरन करना पड़ा,वहीं महाभारत में अर्जुन के श्रेष्ठ धनुर्धर होने का दम्भ तोड़ने और उसके युद्ध कौशल की लम्बी परीक्षा के पश्चात ही उसे पाशुपातास्त्र प्रदान किया।
शिवभक्तों को आत्म-आनंद प्रदान करने वाली रात्रि शिवरात्रि कहलाती है। इस दिन चन्द्रमा सूर्य के निकट होता है। इस कारण उसी समय जीवरूपी चन्द्रमा का परमात्मारूपी सूर्य के साथ योग होता है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को की गई पूजा-अर्चना व साधना से जीवात्मा का विकास तथा आत्मिक शुद्धि होती है। शिव केवल कर्मकांड या रुढ़ि नहीं है,वे तो कर्म-दर्शन का ज्ञानयज्ञ हैं।
शिव आदिदेव हैं।
शिव को कृष्ण पक्ष में पूजना अपारंपरिक है इसमें कोई अचरज नहीं कि वे स्वयं अपारंपरिक देव हैं,वे एकमात्र ऐसे देवता हैं जो श्रृंगार नहीं करते,अपने शरीर पर भभूत लगाते है,हाथी और बाघ के चर्म को शरीर लपेटे घूमते हैं,उनका श्रृंगार सर्प,जंगली धतूरे और उसके फूल और रुद्राक्ष से होता है। अपने निवास बर्फीले कैलाश पर वे नंदी और अपने भयंकर गण के साथ रहते हैं। उनकी ललाट पर अर्धचंद्र जो दक्ष प्रजापति के शाप से अपने अपक्षय से भयभीत होकर शिव की शरण में आए थे शायद यही वजह है कि कृष्ण पक्ष की 13वीं रात शिव के लिए पूजनीय है,यही शिवरात्रि को दिखाई भी देता है।
इसके पीछे मान्यता है कि चन्द्र का विवाह दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियों के साथ हुआ ,ये पुत्रियां ही 27 स्त्री नक्षत्रों हैं।इसके अतिरिक्त के पुरुष नक्षत्र अभिजीत भी है।तंत्र विद्या में चंद्र की प्रकृति शीतल,अस्थिर के साथ आज्ञाकारी पहलू के प्रतीक हैं इसलिए उन्हें केवल रोहिणी से ही प्यार था, चन्द्र देव के ऐसे व्यवहार को स्त्री नक्षत्रों ने दक्ष प्रजापति से शिकायत किया की चन्द्र उनके साथ पति का कर्त्तव्य नहीं निभाते,प्रजापति ने चंद्र को सुधरने की चेतावनी दी,पर रोहिणी के प्यार में डूबे चन्द्र ने अपने श्वसुर की तमाम चेतावनियों को पूरी तरह दरकिनार कर दिया,चंद्र की अति की सीमा पार होते ही दक्ष प्रजापति ने चंद्र को क्षय जैसे भयंकर रोग होने का शाप दिया,जिससे चंद्र का शरीर अपक्षय होने लगा,बीतते समय के साथ चन्द्र की चमक धीरे धीरे कम होती गई,कहा जाता है कि कृष्ण पक्ष की शुरुआत यहीं से हुई।
प्रजापति शापित चंद्र को इंद्र और ब्रह्मा ने शाप से मुक्ति के लिए शिव की आराधना करने की सलाह दी,चंद्र में सलाह पर अमल किया जिससे शिवजी ने उन्हें अपने जटा में जगह दिया जिससे चंद्र का तेज वापस आने लगा जिससे शुक्ल पक्ष का निर्माण हुआ,चूंकि दक्ष "प्रजापति" थे इसलिए चंद्र उनके शाप से पूरी तरह मुक्त नहीं हो सकते थे इसलिये उनके शाप में केवल बदलाव हो सकता था। इसलिये चन्द्र को बारी बारी से दक्ष निर्मित शुक्लपक्ष और शिव निर्मित कृष्णपक्ष में आना जाना पड़ता है। शिव के ललाट पे अर्धचंद्र का होना यह दर्शाता है कि जो मृत्यु से भयभीत,जीवन की नश्वरता के कटु सत्य से परिचित होना नहीं चाहते उन्हें शिव की शरण बेहद भाता है क्योंकि शिव जीवन मरण के नश्वर और शास्वत चक्र से परे है।
महान परोपकारकारी शिव।
दक्षिण भारतीय शिव के आख्यानों पर गौर किया जाय तो शिवरात्रि को ही क्षीरसागर से उत्पन्न हलाहल (विष) के प्रभाव से जगत को बचाने के लिए शिव ने विषपान किया पर पार्वती नहीं चाहती थी कि शिव विष को अपने शरीर के अंदर जाने दे ,इसलिये उन्होंने शिव का गला पकड़ लिया,वहीं देवता कतई नहीं चाहते थे कि शिव विष को बाहर निगले इसलिए उन्होंने शिव की स्तुति शुरू कर दी,शिव ने दोनों पक्षों को निराश किये बिना अपने गले मे चिरंतन काल के लिए गरल को समाहित कर लिया। विष के प्रभाव से शिव का कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाये।
शिव को ''महेशान्नापरो देवः"कहा जाता है अर्थात शिव से परे कोई देवता नहीं। वे इतने सरल की कोई भी व्यक्ति चार दाने चावल,आक के फूल, बिल्व पत्र और एक लोटा जल चढ़ा दे महादेव प्रसन्नं हो जाते है।शिव एक मात्र ऐसे देवता माने जाते है जिनकी पूजा आप संभोग से समाधि तक ,रणभूमि से रंगभूमि, दसों दिशाओं के किसी भी स्थान से,प्रचंड तूफान और गहरे समुद्र में क्षतिग्रस्त जलपोत से हिंसक जन्तु के बीच घिरे होने पर, कारागार से घोर शारिरिक और मानसिक कष्ट से जूझ रहे व्यक्ति को शिव उसके कष्टों का बगैर किसी मोल भाव किये सदैव निराकरण करते है।
इसलिए उनके भक्तों में अर्जुन से राम जैसे देव पुरुष और परशुराम,सहस्त्रार्जुन जैसे महापराक्रमी,रावण,अंधकासुर,बाणासुर महिसासुर पुत्र गजासुर जैसे घोर पराक्रमी दैत्य/असुर उनके भक्त है।
महाप्रतापी और प्रकांड विद्वान रावण तो शिव को श्रद्धा से अपना मस्तक की बलि चढ़ाने से भी पीछे नहीं हटते थे।
शिव को एक महान जुझारू योद्धा,एक गुरु,रचियता जो संसार मे रजोगुण के साथ संसार की सृष्टि करते है।
सतगुणो से सम्पन्न होकर जगत का पालन पोषण करते है,वहीं तमोगुण से युक्त होते हुए वे सबका संहार करते है वहीं त्रिगुणमयी माया को लांघ कर अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित रहते है। शिवजी देव असुर दानव ,दैत्य,देवगण,गंधर्व,यक्ष,किन्नर, सिद्धों,साधको,भक्तों ,योगियों,कवियों,धनुर्धरों,कलाकारों और गृहस्थों के आराध्य देव और आदर्श देवता हैं।
आशुतोष, शशांक शेखर ,चंद्रमौलि चिदम्बरा,निरंकार,निर्विकार,ओंकार,अविनाशी जगत, सर्जक, प्रलयकर्ता,सत्यम शिवम सुंदरम और जटाधर अभ्यंकर की अवधारणा लिए जगत में एक मात्र शिव ही हैं जिनकी गृहस्थी परम सुख व शांति से परिपूर्ण है और हम सभी सांसारिक गृहस्थ अपनी संपन्नता के लिए शिव और उमा की शरण में जाते है,विद्यार्थी अपने मनोवांछित विद्या के लिए,धनुर्धर अपनी प्रवीणता और दक्षता हासिल करने के लिए,नृत्य साधना में जीवन अर्पण करने वाले नृत्यांगना उनके नटराज स्वरूप को रत्ती भर प्राप्त करने के लिए,तांत्रिक,औघड़ औऱ लोकुलीश उनके सानिध्यको पाने ले लिए
युद्ध के आतुर शूरवीर अपने विजय के लिए,कुंवारी कन्याएं मनोवांछित वर प्राप्ति के लिए,कामातुर युगल अपने चरम संभोग के उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए ,सुहागिनें अपने अखंड सौभाग्य के लिए शिव के विभिन्न स्वरूपों पूजते और अपना आराध्य मानते हैं
युद्ध के आतुर शूरवीर अपने विजय के लिए,कुंवारी कन्याएं मनोवांछित वर प्राप्ति के लिए,कामातुर युगल अपने चरम संभोग के उत्कर्ष को प्राप्त करने के लिए ,सुहागिनें अपने अखंड सौभाग्य के लिए शिव के विभिन्न स्वरूपों पूजते और अपना आराध्य मानते हैं
हरि और हर की अवधारणा।
विष्णु को "हरि" कहते है और इनके विपरीत शिवजी जिन्हें "हर" कहते है। विष्णु और शिव में मुख्य अंतर उनके विचारधारा और प्रकृति को लेकर है जहां विष्णु आर्थिक व्यवस्था से जुड़े रहते है,वे रंगभूमि के सरताज है, वहीं शिवजी इनसे परे हैं,वे आदि योगी,ऋषि,तपस्वी है जो रणभूमि,पहाड़ों,गुफाओं,कन्दराओं श्मशान और भूमि पर निवास करते है,वे दिगंबर स्वरूप लिए अपने शरीर में विभूति या राख या भस्म लगाते हैं।वे बाघ के छाल को अपना आसन बनाते है।शिवजी का कोई श्रृंगार नहीं है यथा राख निर्माण के लिये किसी उद्योग की आवश्यकता नहीं होती ,लकड़ी,गोबर या शव जलाने के पश्चात राख सहज उपलब्ध हो जाती है और शिव प्रेम से उसे अपने शरीर में लगा लेते है,भोजन में भी उन्हें किसी विशेष सामग्री की मांग नहीं है तभी तो उन्हें कच्चा दूध या गन्ने का रस चढ़ाया जाता है,भांग,विषैले प्रकृति के धतूरे,करीब करीब सभी भौगोलिक क्षेत्रे ने पाए जाने वाले आक के फूल,विल्व पत्र ,हरी दूब(दुर्बा दल),अक्षत,शिवजी कैलाश पर बैठे हर,भूख से परे तपस्या में लीन रहते है।
वहीं
विष्णु को राजसी ठाट बात पसन्द है ,जो सीधा अर्थव्यवस्था से जुड़ा मसला है।वे सदा क्षीरसागर में विराजते हैं,उन्हें उप उत्पाद पसंद है जिसमे खासा श्रम की दरकार होती है यथा दूध के उप उत्पाद जैसे घी ,मक्खन,पका हुआ दूध,रबड़ी बेहद प्रिय है,नदियों के तट बेहद भाता है(राम-सरयू,कृष्ण-यमुना),इनका सीधा जुड़ाव मधु वन और अरण्य वन से है,वे पीतांबर पहनते है जिनके लिए जुलाहे,किसानों और धोबी समुदाय की दरकार होती है। वे बेशकीमती आभूषण पहनते है ,जिसे बनाने के किये स्वर्णकार और जौहरी की आवश्यकता होती है उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट होता है कि अर्थव्यवस्था और कर्म से विष्णु का सीधा संबंध है। कैलाश पर तपस्या में लीन शिव से शक्ति कहती हैं ठीक है कि आपको भूख प्यास नहीं लगती लेकिन आपके भक्तों को तो लगती है,इसलिए वे जिद कर शिवजी को काशी विश्वनाथ बनाकर काशी ले आती है क्योंकि काशी में ही बाजार है । शिव की अर्थव्यवस्था में हमे भूख से छुटकारा मिलता है,जिसके लिए हम योग करते हैं तो विष्णु की अर्थतन्त्र से हमारी भूख मिटती है, इस प्रकार हर और हरि की सामंजस्य से अर्थव्यवस्था में खुशहाली देखने को मिलती है।
वहीं
विष्णु को राजसी ठाट बात पसन्द है ,जो सीधा अर्थव्यवस्था से जुड़ा मसला है।वे सदा क्षीरसागर में विराजते हैं,उन्हें उप उत्पाद पसंद है जिसमे खासा श्रम की दरकार होती है यथा दूध के उप उत्पाद जैसे घी ,मक्खन,पका हुआ दूध,रबड़ी बेहद प्रिय है,नदियों के तट बेहद भाता है(राम-सरयू,कृष्ण-यमुना),इनका सीधा जुड़ाव मधु वन और अरण्य वन से है,वे पीतांबर पहनते है जिनके लिए जुलाहे,किसानों और धोबी समुदाय की दरकार होती है। वे बेशकीमती आभूषण पहनते है ,जिसे बनाने के किये स्वर्णकार और जौहरी की आवश्यकता होती है उपरोक्त उदाहरण से स्पष्ट होता है कि अर्थव्यवस्था और कर्म से विष्णु का सीधा संबंध है। कैलाश पर तपस्या में लीन शिव से शक्ति कहती हैं ठीक है कि आपको भूख प्यास नहीं लगती लेकिन आपके भक्तों को तो लगती है,इसलिए वे जिद कर शिवजी को काशी विश्वनाथ बनाकर काशी ले आती है क्योंकि काशी में ही बाजार है । शिव की अर्थव्यवस्था में हमे भूख से छुटकारा मिलता है,जिसके लिए हम योग करते हैं तो विष्णु की अर्थतन्त्र से हमारी भूख मिटती है, इस प्रकार हर और हरि की सामंजस्य से अर्थव्यवस्था में खुशहाली देखने को मिलती है।
शिव से मनोवांछित फल पाने के लिए उनके भक्त उन्हें विभिन्न प्रकार के पदार्थों से महाभिषेक करते हैं जिससे उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। जैसे गाय के दूध से अभिषेक करने पर पुत्र की, गन्ने के रस से लक्ष्मी की तथा दही से पशु की प्राप्ति होती है,वहीं घी से असाध्य रोगों से मुक्ति, शर्करा मिश्रित जल से विद्या व बुद्धि, कुश मिश्रित जल से रोगों की शांति, शहद से धन प्राप्ति तथा सरसों के तेल से महाभिषेक करने से शत्रु का शमन होता है।
शिव को उनके अनेक स्वरूप के अतिरिक्त उनके कुछ अनूठे स्वरूप ,जैसे कृत्तिवासा गजांतक,त्रिपुरांतक,,वीरशैव,लिंगायत,लोकुलीश और किरातार्जुनीयम के स्वरूप में पूजा जाता है।
1.कृत्तिवासा: शक्ति के हाथों महिषासुर वध के पश्चात उसके पुत्र गजासुर ने अपने पिता के मौत के पीछे देवताओं का हाथ माना,और बदले की भावना को लेकर उसने ब्रह्मा की घोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया और उसे वरदान मिला कि वह 'किसी भी कामवश स्त्री या पुरुष के हाथों उसकी मौत नहीं होगी,वह महाबली और अजेय होगा। इस वरदान को पाकर वह आतातायी शिव ने अपने त्रिशूल से उसका संहार किया और उसके
अनुरोध जिसमे उसने कहा कि शिव के त्रिशूल से पवित्र हुए उसके चर्म को सदा धारण करें तत्पश्चात उसे यह वर दें कि उनका नाम कृत्तिवास(चर्म) रहे। शिव ने उसके अनुरोध को मान लिया इसलिए वे कृत्तिवास कहलाये।
अनुरोध जिसमे उसने कहा कि शिव के त्रिशूल से पवित्र हुए उसके चर्म को सदा धारण करें तत्पश्चात उसे यह वर दें कि उनका नाम कृत्तिवास(चर्म) रहे। शिव ने उसके अनुरोध को मान लिया इसलिए वे कृत्तिवास कहलाये।
गजांतक: शिव का यह अनूठा स्वरूप भारत के दक्षिण भाग के मंदिरों में देखा जाता है,ऐसा कहा जाता है कि शिवजी ने गजासुर नामक असुर की छाल जीवित अवस्था मे छील दी थी और उसके छीले हुए चर्म को अपने शरीर मे लगाकर भ्रमण करने लगे थे,गजांतक की यह हाथी रूपी वासना के विनाश का प्रतीक है।गजासुर का सिर काटने के बाद गजांतक ने वह सिर को अपने पुत्र गणेश के शरीर पर लगा दिया जिससे गणेश को अभयदान मिला,इसलिए गणेश को शिवरूपी गजान्तक के पुत्र गजानन कहा जाता है।
2.त्रिपुरान्तक शिव: राज राजा काल में उर्वर कावेरी डेल्टा के दक्षिण पश्चिम छोर पर अवस्थि तंजावुर में शिव को समर्पित और निर्मि भव्य बृहदेश्वर मंदिर की दीवारों पर शिव के अनेक रूपों भंगिमाओं का निरूपण हुआ है। जिसमे नटराज,हरिहर, लिंगोद्भव,अर्धनारीश्वर, तथा भैरव शामिल है फिर भी शिव के त्रिपुरांतक स्वरूप का निरूपण कई दृष्टियों से अन्ययतम है। इस तरह की मूर्तियों में युद्ध के अभियान की घोषणा स्वरुप प्रत्यन्चा खींचकर प्रत्यालीढ़ मुद्रा में खड़े शिव का अंकन किया गया है उनकी वीभत्स या रौद्र भाव में अभिव्यक्ति नहीं की गई है। इस तरह का भाव सिर्फ मुण्डों की माला तथा प्रत्यालीढ़ मुद्रा से होता है। शिव का वह स्वरूप उस पौराणिक कथाका सांकेतिक प्रस्तुतिकरण है।
साभार: उपिंदर सिंह।
कार्तिकेय द्वारा तारकासुर के वध के पश्चात उसके तीनों पुत्रों यथा तारकाक्ष,विद्युन्माली और कमलाक्ष के घोर तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा ने तारकपुत्रों को त्रिपुर अर्थात स्वर्ण(स्वर्ग) रजत (अंतरिक्ष)और लौह(पृथ्वी) का वरदान दिया जिससे ये तीनो भाई त्रिलोक को आतंकित करने लगे,कालांतर में ब्रह्मा विष्णु और देवों की संयुक्त व्यथा सुनकर शिव ने त्रिपुर वध को उद्दत हुए औरउन्होने पशुपति रूप धारण कर महज एक बाण से वैभवशाली त्रिपुर को भस्म कर दिया।
चोल काल के पूर्व मंदिर प्रतिमा संयोजन में त्रिपुरान्तक शिव को प्रसिद्धि नहीं मिली थी,वहीं बृहदेश्वर मंदिर में हम उन्हें इसके विमान के दीवारों के सम्पूर्ण ऊपरी हिस्सो में उत्कीर्ण देख सकते है। चार भुजाओं वाले शिव के स्वरूप को एक धनुर्धर के रूप में दर्शाया गया है किंतु धनुष बाण अदृश्य है। त्रिपुरान्तक शिव का राजनीतिक महत्व भी था संभवतः राजराजा ने इसे अपने राज्य शक्ति का प्रतीक माना।
शिव भक्ति की प्रमुख कृति तीवरम में त्रिपुरान्तक शिव की कथा का वर्णन है,इस उपाख्यान में बह्मा को शिव का सारथी और अग्नि को बाण, वेदो को रथ पहिये,और मंदारपर्वत को शिव के धनुष,नागराज वासुकी को प्रत्यंचा के रूप में वर्णित किया गया है।विष्णु अपनी माया मोह से तीनों असुरों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट करते हैं । तीनो नगरों को नष्ट करने के पश्चात शिव ने दो अपने द्वारपाल के रूप में और एक को ढोल बजाने के लिए नियुक्त कर लिया । त्रिपुरान्तक शिव ने त्रिपुर विजय का उल्लास व्यक्त करते हुए नृत्य किया था अतएव उनका नाम हर्ष तथा शिखर का नाम हर्षगिरि हो गया।
शिव का महायोगी या लकुलीश स्वरुप।
लकुलीश शिव के 24 वें अवतार माने जाते हैं जिन्होने पाशुपत शैव धर्म की स्थापना की थी।पाशुपत संप्रदाय के अनुयायियों को पंचार्थिक कहा गया, इस मत का सैद्धांतिक ग्रंथ पाशुपत सूत्र है. इनका आविर्भाव दूसरी शताब्दी में बड़ौदा के दभोई जिले के कायावरोहन (आधुनिक कारवण) में माना जाता है।
लकुलीश शिव के 24 वें अवतार माने जाते हैं जिन्होने पाशुपत शैव धर्म की स्थापना की थी।पाशुपत संप्रदाय के अनुयायियों को पंचार्थिक कहा गया, इस मत का सैद्धांतिक ग्रंथ पाशुपत सूत्र है. इनका आविर्भाव दूसरी शताब्दी में बड़ौदा के दभोई जिले के कायावरोहन (आधुनिक कारवण) में माना जाता है।
लकुलीश सम्प्रदाय की लोकप्रियता के साथ-साथ योगीश्वर स्वरुप का बैठे हुए लकुलीश में रुपान्तरण हो गया जिसमें लकुलीश की दो भुजाएँ एक में लकुट तथा दूसरे में मातुलिंग फल अंकित किया जाता है। शिव के लकुलीश तथा योगीश्वर दोनों रुपों में ही तपस्वी के गुणों से युक्त होने के कारण रुपांकन में सम्यता दृष्टिगोचर होती है।लकुलीश के मन्दिर का सबसे प्राचीन उदाहरण चन्द्रभागा ( झालरापाटन,सातवी वीं शताब्दी ) के शीतलेश्वर मंदिर के ललाटबिम्ब पर उत्कीर्ण लकुलीश मूर्ति में मिलता है। इसके आधार पर यह कहा जा सकेगा कि लकुलीश की मूर्तियों का अंकन एवं पूजन सातवीं शताब्दी से प्रारम्भ हो गया था तथा लकुलीश शैव मन्दिरों में प्रमुख देव के रुप में अधिष्ठित होने लगे थे। यद्यपि गर्भगृह का प्रमुख पूजा प्रतीक अभी भी लिंग था।
आठवीं शताब्दी की लकुलीश प्रतिमाएं यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि लकुलीश की पूजा प्रचलित एवं लोकप्रिय थी तथा दसवीं शताब्दी तक रही।
नवीं शताब्दी के प्रारम्भ में लकुलीश की प्रतिमाओं में लकुलीश तथा योगीश्वर शिव दोनों के स्वरुपों को सम्मिलित रुप से अंकित किया जाता था। लकुलीश चार हाथ, जटामुकुट, श्रीवत्स लांछन तथा पद्मासन पर बैठे हुए नासाग्र दृष्टि से युक्त उत्कीर्ण किए जाते थे।
11वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक लकुलीश का प्रतिमा वैज्ञानिक विधान अपने निश्चित रुप को प्राप्त कर चुका था। अब उनकी प्रतिमा तपस्वी के रुप में उत्कीर्ण की जाने लगी थी जो बुद्ध तथा तीर्थंकर की मूर्तियों से साम्यता रखती थी।
शिव एक मात्र ऐसे देवता हैं जिनके लिंग की आराधना की जाती है। इनके आराधना कोई निश्चित समयाविधि हमे प्राप्त नहीं होता है लेकिन ऐसा माना जाता है कि इनकी आराधना अनादिकाल से की जाती रही है। चाहे हड़प्पा के "आदि शिव",हो या दक्षिण भारत के विशाल बृहदेश्वर मंदिर।
आठवीं शताब्दी की लकुलीश प्रतिमाएं यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि लकुलीश की पूजा प्रचलित एवं लोकप्रिय थी तथा दसवीं शताब्दी तक रही।
नवीं शताब्दी के प्रारम्भ में लकुलीश की प्रतिमाओं में लकुलीश तथा योगीश्वर शिव दोनों के स्वरुपों को सम्मिलित रुप से अंकित किया जाता था। लकुलीश चार हाथ, जटामुकुट, श्रीवत्स लांछन तथा पद्मासन पर बैठे हुए नासाग्र दृष्टि से युक्त उत्कीर्ण किए जाते थे।
11वीं शताब्दी के प्रारम्भ तक लकुलीश का प्रतिमा वैज्ञानिक विधान अपने निश्चित रुप को प्राप्त कर चुका था। अब उनकी प्रतिमा तपस्वी के रुप में उत्कीर्ण की जाने लगी थी जो बुद्ध तथा तीर्थंकर की मूर्तियों से साम्यता रखती थी।
शिव एक मात्र ऐसे देवता हैं जिनके लिंग की आराधना की जाती है। इनके आराधना कोई निश्चित समयाविधि हमे प्राप्त नहीं होता है लेकिन ऐसा माना जाता है कि इनकी आराधना अनादिकाल से की जाती रही है। चाहे हड़प्पा के "आदि शिव",हो या दक्षिण भारत के विशाल बृहदेश्वर मंदिर।
पंचमुख लिंग के रुप में प्रस्तुतिकरण ।
रुपमण्डन के अनुसार पंचमुख लिंग के मुखों की संख्या गर्भगृह के द्वारों पर आधारित होती है। एक तीन या चार मुख के शिवलिंग एक द्वार, तीन द्वार या गर्भगृह के मध्य में स्थित होने पर चार मुख वाले उत्कीर्ण करने का प्रावधान है।
मुखलिंग त्रिवक्त्रं वा एकवक्त्रं चतुर्मुखम्।
सम्मुखं चैक वक्त्रंस्यात् त्रिवक्त्रे पृष्ठतोनहि।।
सम्मुखं चैक वक्त्रंस्यात् त्रिवक्त्रे पृष्ठतोनहि।।
विष्णुधर्मोत्तरपुराण पंचमुख लिंग के पांचों रुपों की विशद व्याख्या दूसरे नामों एवं प्रतीकों के माध्यम से करता है। सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष तथा ईशान के नाम क्रमशः महादेव, उमा, मैख, नन्दिवक्त्र तथा सदाशिव है।
ये पाँचों स्वरुप पंचमुख लिंग पर उत्कीर्ण रहती है। इनमें से चार चारो दिशाओं में तथा पाँचवा इन चार मुखों के ऊपर पाँचवे मुख के रुप में अंकित रहता है। उत्कीर्ण मुखाकृतियाँ अपने नाम व प्रकृति के अनुरुप ही बनी होती है। पाँचवा मुख ईशान (सदाशिव) आकाश का प्रतीक है। अतएव नियमतः इसे उत्कीर्ण नहीं किया जाता। इसका खुला हुआ मुख अघोर के वीभत्स भाव को व्यक्त करता है जबकि वामदेव का मुख मुस्कानयुक्त स्री गुणोचित कोमलता लिए हुए तथा सद्योजात तथा तत्पुरुष मुख शान्ति एवं पवित्रता अभिव्यक्त करते हुए अंकित की गई है।
ये पाँचों स्वरुप पंचमुख लिंग पर उत्कीर्ण रहती है। इनमें से चार चारो दिशाओं में तथा पाँचवा इन चार मुखों के ऊपर पाँचवे मुख के रुप में अंकित रहता है। उत्कीर्ण मुखाकृतियाँ अपने नाम व प्रकृति के अनुरुप ही बनी होती है। पाँचवा मुख ईशान (सदाशिव) आकाश का प्रतीक है। अतएव नियमतः इसे उत्कीर्ण नहीं किया जाता। इसका खुला हुआ मुख अघोर के वीभत्स भाव को व्यक्त करता है जबकि वामदेव का मुख मुस्कानयुक्त स्री गुणोचित कोमलता लिए हुए तथा सद्योजात तथा तत्पुरुष मुख शान्ति एवं पवित्रता अभिव्यक्त करते हुए अंकित की गई है।
कभी-कभी चार मुखों के स्थान पर कुछ अन्य प्रतीक, जो शिव के साथ संयुक्त हैं, भी शिवलिंग के चारों ओर उत्कीर्ण किये जाते थे।इस तरह की शैली के शिवलिंग पर शिव के सादृश्य रखती हुए यक्ष-प्रतिमा, लम्बी गर्दन वाला जल पात्र, स्रीमुख तथा सिंह अंकित है। स्रीमुख तथा सिंह क्रमशः पार्वती तथा उसके वाहन के द्योतक हैं।
प्रतीकों के साथ मानव रुप में प्रस्तुतीकरण
यह अवस्था जिसमें शिव की प्रकृति को प्रस्तुत करने वाले सभी प्रतीकों से युक्त शिवमूर्ति की मानव रुप में संकल्पना की गई है चरम अवस्था मानी जा सकती है। प्रस्तुतीकरण की विधाओं के आधार पर इसे दो भागों में बाँटा जा सकता है।
1. महेश मूर्तिरुप
2. लिंगोद्भव मुर्ति।
2. लिंगोद्भव मुर्ति।
1. महेश मूर्तिरुप।
विकास की प्रक्रिया में लिंग तथा मानव रुप की संयुक्त अवस्था महेश मूर्ति या त्रिमूर्ति के रुप में प्रकट होता है। इस प्रकार की मूर्ति में शिव को मुख इसके ऊपरी भाग पर सामने की ओर अत्यन्त गहराई वाले कटाव में उत्कीर्ण किये जाते हैं, चारों दिशाओं में नहीं अतः लिंग रुप अत्यन्त स्पष्ट नहीं रहता। सामान्यतः इस तरह की कृतियाँ गर्भगृह की पिछली भित्ति से जुड़ी होने के कारण चारों ओर से उत्कीर्ण नहीं की जाती। बीच वाले मुख के शीर्ष का अलंकृत जटामुकुट ही लिंग के गोलाकार शीर्ष का आभाष देता है। कुछ प्रारंभिक विद्वानों ने इसे ब्रम्हा एवं विष्णु की शान्त मुद्रा तथा रुद्र की रौद्र मुद्रा के आधार पर त्रिमूर्ति-ब्रम्हा, विष्णु तथा महेश की संयुक्त मूर्ति का नामकरण दिया था। परन्तु बाद में मूर्ति के तीनों मुखों से शिव की प्रकृति के विभिन्न रुपों का बोध होने पर इसे महेश-मूर्ति के रुप में ही मान्यता दी गई।
त्रिमूर्ति के उदाहरण हमें एलीफेन्टा की महेश मूर्ति के समकालीन ही बाडोली (कोटा) में मिलते हैं । यहाँ की मूर्ति में दक्षिण पार्श्व के मुख की रौद्रता, खुला हुआ मुख, हाथ में सर्प तथा वाम पार्श्व के मुख का स्रीगुणोचित केशविन्यास एवं अलंकरण इसे शिव के रुप अघोर,भैरव तथा वामदेव उमा के रुप में इंगित करता है। यहाँ ब्रम्हा तथा विष्णु पृथक रुप से महेश-मूर्ति के दोनो पार्श्व में ऊपरी कोनों में हाथ जोड़े हुए शिव की उपासना में रत है।
लिंगोद्भव मूर्ति
लिंग-प्रतीक तथा शिव मूर्ति को एक प्रतिमा में प्रस्तुत करने की दूसरी विद्या लक्षण-ग्रंथों में लिंगोद्भव मुर्ति के नाम से वर्णित है। उत्तर भारत में इस प्रकार के कुछ उदाहरण ही प्राप्त हुए हैं
राजस्थान में एकमात्र उदाहरण हर्षनाथ (सीकर) के मंदिर से प्राप्त होता है। यहाँ का शिव मंदिर शैवाचार्यो द्वारा विग्रहराज द्वितीय (956 -973 ई.) के दौरान निर्माण किया गया था। मूर्ति का अंकन पौराणिक कथा के आधार पर कथात्मक शैली में हुआ है जिसमें ब्रम्हा और विष्णु दोनो मानव रुप में बीच में अकस्मात् प्रकटित स्तम्भ को देखकर विस्मयबोधक मुद्रा में अंकित है।
लिंग-प्रतीक तथा शिव मूर्ति को एक प्रतिमा में प्रस्तुत करने की दूसरी विद्या लक्षण-ग्रंथों में लिंगोद्भव मुर्ति के नाम से वर्णित है। उत्तर भारत में इस प्रकार के कुछ उदाहरण ही प्राप्त हुए हैं
राजस्थान में एकमात्र उदाहरण हर्षनाथ (सीकर) के मंदिर से प्राप्त होता है। यहाँ का शिव मंदिर शैवाचार्यो द्वारा विग्रहराज द्वितीय (956 -973 ई.) के दौरान निर्माण किया गया था। मूर्ति का अंकन पौराणिक कथा के आधार पर कथात्मक शैली में हुआ है जिसमें ब्रम्हा और विष्णु दोनो मानव रुप में बीच में अकस्मात् प्रकटित स्तम्भ को देखकर विस्मयबोधक मुद्रा में अंकित है।
शिव की प्रकृति का सौम्य पक्ष
शिव की सौम्य मूर्तियों में पौराणिक कथाओं पर आधारित विषयों में से केवल रावण-अनुग्रह विषय , सौम्य पक्ष की वे मूर्तियाँ जिनका पौराणिक आधार नहीं है, उनमें उमा-माहेश्वर तथा कल्याण-सुन्दर विषय प्रमुख है।
रावण-अनुग्रह मूर्ति
रावण अनुग्रह मूर्ति से सम्बद्ध कथा यह है कि जब शिव ने रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था तब अपने अभिमान में उसने शिव सहित उनके आवास कैलाश पर्वत को ही उठा लिया था।
मूर्तिकारों ने इस कल्पना को कई रुपों में अभिव्यक्त करने की कोशिश की है जिससे उनमें एक विविधता तथा स्वाभाविकता है।
इस तरह की प्रतिमाओं में भी मूर्तियाँ भय और विस्मय के संवेगों की मिलीजुली अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है। नागदा (उदयपुर ) में बनी दसवीं सदी की एक प्रतिमा में शिव और पार्वती बैठे हुए है जिसमें पार्वती भयभीत होकर शिव का सहारा लेती है। रावण उन्हें आसन सहित उठाये हुए अंकित किया गया है, कैलाश पर्वत को नहीं। यही उसकी विशेषता है।
शिव की सौम्य मूर्तियों में पौराणिक कथाओं पर आधारित विषयों में से केवल रावण-अनुग्रह विषय , सौम्य पक्ष की वे मूर्तियाँ जिनका पौराणिक आधार नहीं है, उनमें उमा-माहेश्वर तथा कल्याण-सुन्दर विषय प्रमुख है।
रावण-अनुग्रह मूर्ति
रावण अनुग्रह मूर्ति से सम्बद्ध कथा यह है कि जब शिव ने रावण की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे वरदान दिया था तब अपने अभिमान में उसने शिव सहित उनके आवास कैलाश पर्वत को ही उठा लिया था।
मूर्तिकारों ने इस कल्पना को कई रुपों में अभिव्यक्त करने की कोशिश की है जिससे उनमें एक विविधता तथा स्वाभाविकता है।
इस तरह की प्रतिमाओं में भी मूर्तियाँ भय और विस्मय के संवेगों की मिलीजुली अभिव्यक्ति प्रस्तुत करती है। नागदा (उदयपुर ) में बनी दसवीं सदी की एक प्रतिमा में शिव और पार्वती बैठे हुए है जिसमें पार्वती भयभीत होकर शिव का सहारा लेती है। रावण उन्हें आसन सहित उठाये हुए अंकित किया गया है, कैलाश पर्वत को नहीं। यही उसकी विशेषता है।
उमा-माहेश्वर मूर्ति।
यह शिव की सौम्य मूर्तियों में सर्वाधिक प्रिय विषय माना जाता है। उमा-माहेश्वर की प्रारंभिक मूर्तियों में शिव का अंकन प्रायः दो भुजाओं वाली मूर्ति में होता है जबकि बाद की मूर्तियों में सदैव चार-भुजाएँ बनाई जाने लगी। उमा-माहेश्वर मूर्ति में शिव मात्र दो भुजाओं युक्त अंकित किये गये हैं जबकि बाद की अधिकांश प्रतिमाएँ रुपमण्डल तथा विष्णुधर्मोत्तर पुराण जैसे लक्षण ग्रंथों के आधार पर निर्मित है।
कल्याण-सुन्दर या विवाह-मूर्ति।
कल्याण-सुन्दर मूर्ति का विषय शिव-पार्वती के विवाह का चित्र है। यह विषय गुप्तकाल से अधिक लोकप्रिय हो गया। प्रारंम्भिक काल की मूर्तियों में हिमालय तथा मैना का वर को कन्यादान करते हुए चित्रित किया गया है जबकि बाद की मूर्तियों में हिमालय के स्थान पर विष्णु कन्यादान करते हुए चित्रित किए गये हैं।
कल्याण-सुन्दर मूर्ति का विषय शिव-पार्वती के विवाह का चित्र है। यह विषय गुप्तकाल से अधिक लोकप्रिय हो गया। प्रारंम्भिक काल की मूर्तियों में हिमालय तथा मैना का वर को कन्यादान करते हुए चित्रित किया गया है जबकि बाद की मूर्तियों में हिमालय के स्थान पर विष्णु कन्यादान करते हुए चित्रित किए गये हैं।
शिव की प्रकृति का घोर स्वरुप।
शिव के भयंकर रुप को प्रस्तुत करने वाली मूर्तियाँ अधिक प्रचलित नहीं थी। हमें इस तरह की मूर्तियों का उदाहरण कम मिलता है।
उत्तर भारत विशेषकर राजस्थान के शैव मंदिरों में शिव के त्रिपुरान्तक तथा भैरव रुप को प्रस्तुत करती हुई मूर्तियां मिलती है लेकिन वे सीमित हैं। उत्तर भारत मे त्रिपुरान्तक मूर्ति नीलकंठ ( अलवर), बाडोली(कोटा) तथा रामगढ़ (कोटा) के शैव मंदिरों से प्राप्त होती है।
उत्तर भारत विशेषकर राजस्थान के शैव मंदिरों में शिव के त्रिपुरान्तक तथा भैरव रुप को प्रस्तुत करती हुई मूर्तियां मिलती है लेकिन वे सीमित हैं। उत्तर भारत मे त्रिपुरान्तक मूर्ति नीलकंठ ( अलवर), बाडोली(कोटा) तथा रामगढ़ (कोटा) के शैव मंदिरों से प्राप्त होती है।
3. मानव रुप में शिव की अन्य मूर्तियाँ।
शिव की प्रकृति का एक अन्य रुप है उनकी सभी ललित कलाओं, ज्ञान तथा योग में पूर्ण दक्षता। लेकिन इन विषयों पर दक्षिण भारत की तुलना में भारत के हिस्सों में नृत्य के अतिरिक्त इस तरह की अन्य सभी मूर्तियाँ अत्यन्त दुर्लभ है। वीणाधर, ज्ञान एवं योग दक्षिणा मूर्ति आदि का तो उत्तर-पश्चिमी भारत में कोई उल्लेख विरले ही मिलता है।
शिव की नृत्त- मूर्तियाँ।
इस शैली में शिव के सुकुमार नृत्य को प्रस्तुत करने वाली मूर्तियाँ प्रचुरता से प्राप्त होती है दूसरी तरफ उनके घोर रुप की द्योतक मूर्तियों का पूर्णतः अभाव है। नटराज शिव की मूर्तियाँ चतुर, ललित, करिसम, सूचिभेद तथा उर्ध्वजानु करणों में उत्कीर्ण हैं। इन मूर्तियों में शिव की घोर प्रकृति का बोध उनके खुले हुए मुँह तथा बाहर निकली हुई द्रष्टाओं द्वारा होता है परन्तु चरण-तल के नीचे अपस्मार पुरुष अनुपस्थित रहता है जो दक्षिण भारत की मूर्तियों में अनिवार्य रुप से उत्कीर्ण किया जाता है। उत्तर भारत की मूर्तियों में नन्दी, गण्, वाद्य बजाते हुए अनुचर आदि अनिवार्य रुप से उत्कीर्ण किये जाते हैं।
उत्तर भारत की नटराज प्रतिमाओं की सभी विशेषताएँ हैं। नृत्य की मुद्रा में स्थित इस मूर्ति का एक पैर "समपाद' स्थिति में तथा बायें हाथ की करिहस्त मुद्रा दूसरे पैर की उध्र्वाजानु स्थिति की द्योतक है तथा टूटा पैर जिसका चरण समपाद स्थिति का द्योतक है अवश्य ही कुचितकरण में होगा। इस मूर्ति की सोलह भुजाएँ है जिनमें विविध आयुध उत्कीर्ण है। शिव अपनी सहज भुजाओं द्वारा चतुर करण प्रस्तुत कर रहे हैं। भुजाओं के तीन जोड़े उर्रामण्डल मुद्रा में उत्कीर्ण है। संगीत वाद्यों में दो मृदंग आड़े रखे हुए तथा वादक भी नृत्य की मुद्रा में अंकित किया गया है। पार्वती विस्मय तथा भय के संयुक्त भावों को व्यक्त करती हुई किंकर्त्तव्यकवमूढ़ शिव के प्रति आकर्षित सी अंकित है। खुले हुए मुख से बाहर निकली दष्ट्राओं द्वारा नटराज की घोर प्रकृति व्यक्त होती है।
शिव पुराण में शिव के दशावतारों के अलावा अन्य का वर्णन मिलता है।
यह दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैं।
यह दसों अवतार तंत्रशास्त्र से संबंधित हैं।
जिसमे महाकाल,तारा,भुवनेश,षोडश,भैरव,छिन्नमस्तक गिरिजा धूम्रवान,बगलामुखी,मातंग और कमल।
जबकि शिव के अन्य ग्यारह अवतारों में:
कपाली , पिंगल ,भीम ,विरुपाक्ष ,विलोहित
शास्त ,अजपाद, आपिर्बुध्य ,शम्भ ,चण्ड और भव
शास्त ,अजपाद, आपिर्बुध्य ,शम्भ ,चण्ड और भव
शामिल हैं और अब बात शिव और उनके प्रिय त्योहार में एक फगुआ(होली) की।
दरअसल ,इस त्योहार का विष्णु,कृष्ण और शिव से सीधा संबंध गया शिवरात्रि के ठीक पंद्रहवे दिन होली मनाई जाती है,हालांकि शिव वैरागी थे,वे विवाह करना नहीं चाहते थे,पर देवता चाहते कि शिव गृहस्थ जीवन व्यतीत करें,कामदेव को इस कार्य के लिए तैयार किया गया,कैलाश पर ध्यानरत महादेव के समक्ष कामदेव ने शिव की काम वासना को जगाने की पुरजोर कोशिश की,शिव की साधना को विघ्न पहुंचा क्रोधित शिव ने अपनी तीसरी आंख खोली और कामदेव को भस्म कर दिया होली की पूर्व संध्या पर होली जलाने के सम्बंध कामदेव के भस्म होने की घटना से जोड़ी जाती है,क्रोध समाप्ति के पश्चात उन्होंने प्रकृति में कामदेव की महत्ता को समझा और देवी और कामदेव की पत्नी रति की प्रार्थना पर कामदेव और रति को नया जीवन प्रदान किया,कामदेव के पुनर्जन्म की घटना के प्रतीक को होली के रंगों से जोड़ कर देखा जाता है।

