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Wednesday, November 27, 2019

श्रीलंकाई राजनीति में राजपक्षे बंधु 2.0 का आगाज़।

बीते सप्ताह भारत के निकटतम पड़ोसी देश श्रीलंका में  सम्पन्न राष्ट्रपति चुनाव और उसके अंतिम नतीजों ने वैश्विक ध्यान खींचा है।21 अप्रैल 2019 श्रीलंका के तीन शहरों में ईस्टर के मौके पर चर्च में हुए कोऑर्डिनेटेड सुसाइडल अटैक के बाद इस चुनाव में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को मुख्य चुनावी एजेंडा बना कर सत्ता में वापसी करने वाले पूर्व रक्षा सचिव और श्रीलंका पोडुजूना पार्टी(एसएलपीपी) के उम्मीदवार गोटाबया राजपक्षे की सत्ता में वापसी हुई है उन्होने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, पूर्व राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के पुत्र और न्यू डेमोक्रेटिक फ्रंट के उम्मीदवार साजित प्रेमदासा को 13 लाख मतों के प्रभावी अंतर से मात दिया।


श्रीलंका में इस बार चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए कुल 35 उम्मीदवार हैं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार साजित प्रेमदासा,जो सिरीसेना सरकार में आवास मंत्री थे  वे पूर्व राष्ट्रपति रणसिंह प्रेमदासा के पुत्र हैं। जिनकी 1993 में तमिल टाइगर के आत्मघाती दस्ते  ने हत्या कर दी थी।

साजित प्रेमदासा ने नब्बे के दशक में  राजनीति में प्रवेश किया, फिर 2000 में संसद में पहुंचे और बाद में देश के स्वास्थ्य मंत्री बने। अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रेमदासा ने गरीबों की मदद करने वाली परियोजनाओं के माध्यम से अपनी छवि बनाई,लेकिन ईस्टर के हमलों के बाद उन्होंने इस हमले लिए न्याय की मांग के बीच, उन्होंने अपने चुनाव अभियान में सुरक्षा पर जोर दिया। आतंकवाद से निजी रूप से पीड़ित प्रेमदासा ने संकल्प लिया और कहा कि "हम आतंकवाद और उग्रवाद के सभी रूपों को खत्म करने के लिए मजबूत कानूनी कदम उठाएंगे।जबकि गोटाबया के रक्षा और सुरक्षा के प्रभि राजनीतिक रिकॉर्ड का मुकाबला करने के लिए उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सरथ फोंसेका को रक्षा मंत्री बनाने की घोषणा की थी लेकिन गोटाबया के जादू के समक्ष उनकी एक नहीं चली तथा वे प्रभावी अंतर से पराजित हुए।


श्रीलंका में एक सदनीय संसदीय प्रकिया का पालन होता है और अर्द्ध अध्यक्षात्मक प्रणाली के तहत शासन चलाया जाता है यानी"Head of State और Head Of Government" की शक्तियां राष्ट्रपति में अंतर्निहित होती है।राष्ट्रपति की सहायता के लिए यहां प्रधानमंत्री और कैबिनेट का गठन का प्रावधान है ।

गोटाबया राजपक्षे ने पद और गोपनीयता के शपथ के फौरन बाद देश में संसदीय चुनाव कराने की घोषणा कर दी और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया,विक्रमसिंघे के इस्तीफे के तुरंत ही राष्ट्रपति गोटाबया ने विपक्ष के नेता, अपने भाई  और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को देश का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया ।अब वह सम्भवतःआगामी अप्रैल 2020 में आम चुनाव होने तक कार्यवाहक मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री के रूप में टेम्पल ट्री में निवास करेंगे ,महिंदा राजपक्षे को वित्त और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण  मंत्रालय का भी मुखिया बनाया गया है।
इस चुनाव में विपक्ष के खराब प्रदर्शन और जनता से मिले प्रचंड जनमत औऱ राजपक्षे बंधुओं की चौकड़ी के दम पर  कुल मिलाकर राष्ट्रपति गोटाबया के पास सत्ता की एकछत्र बागडोर  है।

जीवन वृत्ति :

सत्तर वर्षीय लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत) गोटबया राजपक्षे, श्रीलंका सेना के एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं । उन्होंने 1971 में अपने कैरियर की शुरुआत कैडेट ऑफिसर के रूप में किया और सिग्नल रेजिमेंट में उन्हें प्रारंभिक कमीशन मिला। पाकिस्तान के रावलपिंडी और 1983 भारत में ऊटी के डिफेंस सर्विस कॉलेज वेलिंग्टन, जैसे प्रतिष्ठित सैन्य संस्थान से प्रशिक्षित  गोटाबया  ने 1974 में इन्फेंट्री को वरीयता दी और सिंहा रेजिमेंट में पदस्थापित हुए औऱ  ग़ज़बा रेजिमेंट के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और प्रथम ग़ज़बा बटालियन के कमान अधिकारी के दायित्व का निर्वहन किया। पूर्व सेना प्रमुख फील्ड मार्शल शरथ फोंसेका (तब कमांडिंग ऑफिसर ,प्रथम सिंहा बटालियन )औऱ  लेफ्टिनेंट कर्नल गोटाबया( कमांडिंग ऑफिसर प्रथम ग़ज़बा बटालियन) समक्ष थे के जाफना किले में लिट्टे के विरुद्ध की गई सैन्य कार्रवाई को श्रीलंका सेना की सबसे सफलतम सैन्य कार्रवाई  माना जाता है। लिट्टे के सफाये के सारा श्रेय  लिए तत्कालीन सेनाध्यक्ष ले. जन शरथ फोंसेका ,रक्षा सचिव गोटाबया और राष्ट्रपति महिंदा की तिड़की  को दिया जाता है।

श्रीलंका सेना के वर्तमान प्रमुख ले.जन.शवेंद्र सिल्वा,गोटाबया के अधीन प्रथम ग़ज़बा बटालियन में एक युवा अधिकारी के रूप में साथ कार्य  कर चुके है

राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा श्रीलंका का राष्ट्रपति चुनाव:

इस वर्ष ईस्टर के दिन श्रीलंका में चर्च पर हुए आत्मघाती हमले और 269 बेकसूरों की मौत तत्पश्चात वहाँ लगे आपातकाल के बाद हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो जाता है कि सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनाव का अहम मसला है। 2019 के मई में पहले भारत, फिर बांग्लादेश, भूटान और अब श्रीलंका के चुनावी नतीजों नतीजों  ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रवाद  और राष्ट्रीय सुरक्षा घरेलू राजनीति का अहम मसला बन चुका है।

श्रीलंका की राजनीति में आतंकवाद की समस्या एक अहम भूमिका निभाई है। राष्ट्रपति प्रेमदासा आत्मघाती हमले में मारे गए थे जबकि चंद्रिका कुमारतुंगा को अपनी एक आँख आत्मघाती हमले में गंवानी पड़ी । लगभग एक दशक से श्रीलंका में आतंकवादी हमलों में व्यापक गिरावट देखी गयी है लेकिन ईस्टर पर हुए बम हमले के बाद देश मे स्थिति चुनौतपूर्ण हो गयी थी।

इस बार भी आतंकवाद फैक्टर ने गोटबया को जीत हासिल करने में अच्छी खासी मदद दी।

श्रीलंका चुनाव पर चीन की प्रतिक्रिया।

"China and Sri Lanka are strategic cooperative partners with sincere mutual assistance and ever-lasting friendship. On the basis of mutual respect, equality and mutual benefit, China stands ready to work with the new leadership and government of Sri Lanka for high-quality BRI cooperation and greater progress in China-Sri Lanka relations to deliver more tangible benefits to our countries and peoples."
https://www.fmprc.gov.cn/mfa_eng/xwfw_665399/s2510_665401/2511_665403/t1716772.shtml

गोटबया राजपक्षे को छीन की झुकाव वाले नेता के रूप में माना जाता है।  श्रीलंका में लिट्टे टाइगर्स  के सफाये के दौरान उनका चीनी प्रेम जग जाहिर है महिंदा राजपक्षे सरकार में  रक्षा सचिव रहते हुए उन्होंने उन्नत चीनी हथियारों और परिष्कृत राडारों  और संचार सहायता श्रीलंकाई सेना को लैस किया और प्रभाकरन की अगुवाई वाले लिट्टे के सफाये के लिए  निर्ममता के साथ आतंक के खिलाफ अभियान चलाया। चीन का यह कर्ज़ दोनो भाई( तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा और उनके रक्षा सचिव गोटाबया )आज भी चीन की "Debt  Trap Diplomacy"के  रूप में अपने क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को चीन की सरकार प्रयोजित कंपनियों के हाथों गिरवी तथा बेच कर चुका रहे हैं।


चीन का "Game of Loans" और हम्बनटोटा :श्रीलंका की दुखती रग ।

इस कड़ी में सबसे पहला झटका दिसंबर 2017 में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हम्बनटोटा बन्दरगाह  के अधिकतर( 71फीसद) इक्विटी हिस्सेदारी 99 साल के लीज पर चीनी कम्पनी को  दे दी गयी। सेंटर फॉर ग्लोबल डेवेलपमेंट  के आंकड़ो पर ध्यान दें तो श्रीलंका पर चीन का कर्ज $3.85 बिलियन हो चुका है।

चीन श्रीलंका को  "Concessional Financing" और  "Commercial Loans" के तरीकों से ऋण उपलब्ध कराता है जबकि श्रीलंका को विकास सहायता (Developing Assistance)  के लिए  ExIm Bank, China Development Bank, और Industrial & Commercial  Bank of China के माध्यम विकासात्मक ऋण, वहीं चीनी वाणिज्य मंत्रालय के माध्यम से   अनुदान(Grants) ब्याज मुक्त ऋण(interest Free Loan) मुहैय्या कराता है।

ऋण अनुदान और ब्याज मुक्त ऋण के माध्यम से चीन, श्रीलंका की आर्थिक और वाणिज्यिक संप्रभुता को पूरी तरह अपने कब्जे में ले चुका है। चीन की यह नवीन आर्थिक उपनिवेशवाद की नीति का शिकार अफ्रीका के तीव्र विकास के लालायित देश तथा सार्क के भूटान अफगानिस्तान और भारत छोड़ अन्य देश हो चुके हैं।
श्रीलंका के विस्तृत ,दंतुरित और प्रचुर सामुद्रिक संसाधन पर चीन का "अनकहा" कब्जा हो चुका है, श्रीलंकाई शीर्ष नेतृत्व चीन के साथ अपने संबंधों और उसके आर्थिक मॉडल पर भारत सहित अन्य देशों और मंचो पर कितनी भी सफाई क्यों न दें लेकिन जमीनी हक़ीक़त कुछ अलग ही बयां करती है।

Map of the Sri Lankan Exclusive Economic Zone (EEZ) .

(Source: Maritime Boundaries Geodatabase, Flanders Marine Institute.


श्रीलंका के पास फिलहाल और आने वाले वर्षों में उतनी आर्थिक संवृद्धि नहीं हो पाएगी कि वह ड्रैगन के भीमकाय कर्जे को चुका सके इसलिए चीन प्रयोजित एवं निर्मित सभी परियोजनाओं को या तो चीन को सौंपना पड़ेगा या फिर चीनी शर्तो पर क्रियान्वित करना पड़ेगा,जैसा कि हम्बनटोटा मामले में हुआ।
" Industrialization  and  further  development  of  Hambantota  Air  Sea  Hub  in  southern Sri  Lanka.  Hambantota  is  a  smaller  harbor  than  Colombo  and  Trincomalee,  built using  a  loan  from  China’s  EXIM  Bank.  Due  to  our  debt-situation  we  have  decided  to lease  Hambantota  to  a  Joint  Venture  Company  comprising  China  Merchants Company and Sri Lanka  Ports Authority"

हर्ष डि सिल्वा,श्रीलंका के उप विदेश मंत्री,तिरुवनंतपुरम में आयोजित ओशन डायलॉग -2017 के अपने व्याख्यान के दौरान।
उपरोक्त बयान से चीनी कर्ज़ को न चुका पाने  की श्रीलंकाई सरकार की मजबूरी स्पष्ट हो जाती है।


चीन श्रीलंका द्विपक्षीय सम्बन्ध

21वीं शताब्दी में चीन श्रीलंका के उत्तरोत्तर विकसित होते संबंधों को  हम क्षेत्रीय और वैश्विक परिदृश्य में देखें  और दोनो देशों के समझौते के आधिकारिक शब्दों पर गौर करें तो मामला और इनकी मंशा पूरी तरह साफ हो जाती है।राइस एंड रबर पैक्ट से शुरू हुए राजनय सम्बन्धो  की नई शुरुआत

2005 में तत्कालीन चीन के प्रधानमंत्री/प्रीमियर वेन जियाबाओ की श्रीलंका दौरे कोदोनो देशों ने

" China Srilanka All Round Cooperation Partnership of Sincere Mutual Support and Ever Lasting Friendship"

का नाम दिया तो  मई 2013 में तत्कालीन  श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की चीन यात्रा का दौरान  दोनों देशों ने इस संबंध में सामरिक और रणनीतिक महत्व का तड़का लगाते हुए इसे
"China SriLanka relationship to the Strategic Cooperative Partnership of Sincere Mutual Support and Ever Lasting Friendship"का नाम दिया।

वन बेल्ट वन रोड और श्रीलंका

 चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग्रेट चाइनीज ड्रीम यानी चार ट्रिलियन डॉलर वाली  वन बेल्ट वन रोड  जिसे वे 2049 तक  यसनी चीन के 100 साल होने तक सम्पूर्ण विश्व व्यवस्था में प्रभावी चीनी पदचिह्न की अवसंरचनात्मक परियोजना मानते हैं।
  चीन की वन बेल्ट वन रोड तथा इससे सम्बद्ध परियोजना में श्रीलंका का अति महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्द महासागर क्षेत्र में बीचों बीच मौजूदगी और अपने भू रणनीतिक और सामरिक महत्व के कारण श्रीलंका चीन की  खाड़ी देशों से असीमित ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति और अफ्रीका से आने वाली खनिज सुरक्षा में सबसे अहम भूमिका निभाता है।
अपने प्राकृतिक,विशाल, दंतुरित और गहरे समुद्री तट वाले श्रीलंका के तटों को पोर्ट ऑफ कॉल, हब और लॉजिस्टिक फैसिलिटी केंद्र, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों  से आने वाले माल के लिए ट्रांज़िट गुड्स  केंद्र के रूप में विकसित किये जाने की असीम रणनीतिक संभावना है जिसे चीन विकसित करने में किसी कीमत पर कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता है।

चीन के श्रीलंका ओबीओआर परियोजना में हार्ड और सॉफ्ट पावर डिप्लोमसी के कुल पांच मुख्य लक्ष्य उभर कर सामने आए  है।

1 पॉलिसी कोऑर्डिनेशन
2 कनेक्टिविटी
3 निर्बाध व्यापार
4 फाइनेंशियल इंटेग्रेशन
5 पीपुल टू पीपुल  कॉन्टेक्ट जिसके तहत  सांस्कृतिक,साहित्यक, अकादमिक क्षेत्र को बढ़ावा देना।


इसके तहत  चीन श्रीलंका की निम्न विकास दर, से उच्च विकास दर पाने की चाह, आधुनिक अवसंरचनात्मक विकास  की आकांक्षा और तथाकथित आधुनिकतम जीवन शैली निर्माण के झांसा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इसी कड़ी में चीन पूरे आक्रमकता के साथ  ओबीओआर के घटक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बीआरआई  के तहत आठ बिलियन डॉलर वहीं एशियाई अवसंरचनात्मक  बैंक  से 32 बिलियन डॉलर की राशि श्रीलंका के  अवसंरचनात्मक  विकास में खर्च करेगा जिसमे 269 हेक्टयर में निर्मित  कोलंबो इंटरनेशनल फाइनेंशिल  सिटी में 13बिलियन डॉलर का निवेश करेगा,जो श्रीलंका ने अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) है।
चीन के ऊर्जा और खनिज सुरक्षा के लिए हम्बनटोटा का एक महत्वपूर्ण  स्थान  है
वहीं दूसरी ओर भारत की संप्रभुता के लिए श्रीलंका में  चीनी निवेश  "बेहद खतरनाक "है।
श्रीलंका को अपने निकटतम पड़ोसी और  हिन्द महासागर में भारतीय हितों का ख्याल रखना भी वर्तमान सरकार की "जिम्मेदारी" है। गोटाबया यह मानते हैं कि  तत्कालीन  सरकार का चीन को हंबनटोटा बंदरगाह
Source.indiatimes.com
का नियंत्रण देने को फैसला एक गलत  नीतिगत कदम था लेकिन इस बन्दरगाह  निर्माण के लिए चीन को आमंत्रण  तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने दिया था।। "

गोटबया  चीनी श्रीलंका के आपसी संबंध पर चाहे जितनी भी सफाई दें कि उनके चीनी संबध "पिछले कुछ वर्षों में चीन के साथ भागीदारी को विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक "है लेकिन चीन की हिंदमहासागर में कैट फिश जैसे खुराफ़ात किसी से छुपी नहीं है तमाम  भू-रणनीतिक विश्लेषकों ने चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स  के लगातार आक्रामक होते चीनी रुख को भारतीय हित के लिए बेहद खतरनाक बताया है।


श्रीलंकाई परिवारवाद की राजनीति पर भारत की पैनी नजर:

 गोटबया और उनके परिवार की श्रीलंका की राजनीति में मजबूत पकड़ है, बड़े भाई महिंदा को रक्षा और वित्त मंत्रालय की कमान, जबकि  चामल को  कृषि,सिंचाई, आंतरिक व्यापार,और उपभोक्ता कल्याण मंत्रालय, और बासिल राजपक्षे को  पर्दे के पीछे पार्टी का मुख्य रणनीतिकार  माना जाता है। महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री के अतिरिक्त वित्त और रक्षा मंत्रालय का कार्यभार देकर  गोटाबया ने पहला अपने भाई का कर्ज़ चुकाया वहीं चीन को भी  मनचाहा व्यक्ति प्रदान कर अपने दोनों हित साध लिया, प्रखर मार्क्सवादी नेता गुणवर्धने को विदेश मंत्रालय सौंपकर राष्ट्रपति ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़त हासिल कर ली है।

महिंदा का चीनी प्रेम किसी से छुपा नहीं है लेकिन  राजपक्षे 2.0 सरकार को पिछली गलतियों को दुरुस्त करना होगा जो हिन्द महासागर क्षेत्र में  वक़्त की तकाजा है। श्रीलंका को यह मानना होगा कि सम्पूर्ण हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत एक नैसर्गिक और निर्विवाद महाशक्ति के साथ साथ फर्स्ट रेस्पांडर है जिसकी तुलना किसी से न कि जाय तो बेहतर होगा।

गोटबया की जीत के फौरन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्विटर पर उन्हें वैश्विक रूप में सर्वप्रथम बधाई देना और भारत की यात्रा के लिए आमंत्रित करना

https://twitter.com/narendramodi/status/1195960355551268865?s=19

और चुनाव में जीत के महज 16 घण्टे के भीतर सबको चौंकाते हुए  विदेश मंत्री सुब्रह्मयनम जयशंकर का राष्ट्रपति सहित अन्य लोगों से मिलना तथा आगामी 29 नवम्बर को गोटबया राजपक्षे की अपनी पहली राजकीय यात्रा के रूप में भारत को चुनना महज एक संयोग नहीं कहा जा सकता। राजनय हलकों में प्रधानमंत्री के सर्वप्रथम बधाई के ट्वीट और विदेश मंत्री की श्रीलंका यात्रा को अत्यधिक तवज्जो दी जा रही है।

https://twitter.com/DrSJaishankar/status/1196789834536423425?s=19


https://twitter.com/DrSJaishankar/status/1196789839691157504?s=19

गोटबया राजपक्षे ने 25 नवम्बर को ही अपना पहला साक्षात्कार भारत के ऑनलाइन समाचार पोर्टल को दिया।

इस साक्षात्कार में उन्होंने विस्तार से भारत चीन के साथ अपने बेहतर संबंध और भारतीय हितों की प्राथमिकता की मुखालफत की हम्बनटोटा बंदरगाह लीज की समीक्षा की बात की लेकिन इनकी कथनी औऱ करनी से भारत को पूरी तरह सतर्क रहने की आवश्यकता है।

क्या  ड्रेगेन के जहर की काट खोज पाएगा भारत 


भारत के लिए श्रीलंका में राजपक्षे बंधु की वापसी को एक अच्छे संकेत के रूप में नहीं माना जा सकता है। इस  मन्तव्य के पीछे महिंदा राजपक्षे नेतृत्व की पिछली सरकार ने भारत की एकता अखण्डता और संप्रभुता को तार तार करने में कोई कसर नहीं  छोड़ी थी।हिन्द महासागर क्षेत्र में अचानक चीनी नौसेना की बढ़ती गतिविधि और श्रीलंका को अपना शरणस्थली बनने की चीनी मंशा और महिंदा के साथ गोटाबया का साथ को भारत को कभी नही भूलना चाहिये क्योंकि तत्कालीन रक्षामंत्री ही आज श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे इस सप्ताह के अंत में भारत दौरे पर आने वाले हैं। एक साक्षात्कार में राजपक्षे ने कहा है कि
1." उनका देश किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा हो।"

2. उन्होंने भारत सरकार से " निवेश, शिक्षा और प्रौद्योगिकी के विकास में मदद करने का अनुरोध करते हुए कहा कि वे निवेश और मदद चाहते हैं लेकिन किसी सैन्य और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में शामिल नहीं होना चाहते।"

3." भारत, सिंगापुर, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अपने यहां निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। "

4.वंही उन्होने  तत्कालीन महिंदा राजपक्षे सरकार की पिछले कुछ वर्षों में चीन के साथ  भागीदारी को विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक बतलाया "

5.गोटबया राजपक्षे ने श्रीलंका द्वारा चीन को हंबनटोटा बंदरगाह  का नियंत्रण देने को एक नीतिगत गलती  बताया। "
पर

गोटबया भारत और अन्य इंडो पैसिफ़िक देशों के साथ के साथ सॉफ्ट पावर राजनय की वकालत करते है लेकिन चीन के साथ अपने हार्ड पावर  राजनय, चीनी ऋण कर मसले पर पूरी चतुरायी के साथ बच निकलते है।

भारत को राजपक्षे2.0 की हर एक राजनय और नीतिगत नीतियों का गहन और सूक्ष्मतम विश्लेषण और प्रभावी कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

भारत को श्रीलंकाई राष्ट्रपति के ऐसे विशुद्ध राजनयिक बयान के झांसे में न आने की आवश्यकता है क्योंकि श्रीलंका में जमीनी सच्चाई क्या है ?
 यह सबको मालूम है कि चीनी किस कदर ख़ुराफ़ात हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनय में राष्ट्रीय हित की सर्वोच्चता ही सर्वश्रेष्ठ राजनीति कहलाती है।

 इत्तेफाक से चीन श्रीलंका और भारत ये तीनो अपनी राष्ट्रीय हितों की बात करते है क्योंकि चीन की खनिज और ऊर्जा सुरक्षा के लिए श्रीलंका एक अहम स्थान है दूसरी तरफ तीव्र विकास और दोनों हाथों से खाना खाने की भूख लिए श्रीलंका के चीनी निवेश स्वप्न सरीखा अलादिन का चिराग और बिन मांगे मोती समान है तो भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा के  साथ साथ हमारे भू आर्थिक,सामरिक ,रणनीतिक और संभरिकी हितों में श्रीलंका का अहम स्थान है।

इसलिए भारत को श्रीलंका के मुद्दे पर केवल अपना ध्यान विशुद्ध रूप से अपने राष्ट्रीय हितों की निर्बाध पूर्ति होंने की दिशा में लगाना चाहिए क्योंकि चीन जिस कदर स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की नीति से ऊपर निकल कर भारत को हिन्द महासागर में जिस तरह भारत के गर्दन में मोतियों की माला की कसावट  के रूप में गर्दन कस रही है वह किसी भी सूरत में अच्छे संकेत नहीं  है।

आगामी 29 नवंबर को अपनी पहली राजकीय यात्रा पर भारत आ रहे राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के बयानों पर पूरी निगाहें बनी रहेगी। उनसे उम्मीद रहेगी कि वे अपने भाई महिंदा की पिछ्ली गलतियों को न दोहराएं तथा दोनो देश आपसी समझबूझ,आपसी विश्वास,भाईचारा,तथा एक दूसरे की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों का खयाल रखते हुए हिन्द महासागर की नैसर्गिकता और शांति के क्षेत्र की अवधारणाओं का निश्चित रूप से खयाल रखें क्योंकि स्थाई और शांतिपूर्ण भारत में ही श्रीलंका की समृद्धि और संवृद्धि का बीज छिपा हुआ है।



Wednesday, November 13, 2019

11वें ब्रिक्स सम्मेलन :भारत की बढ़ती भूमिका और जिम्मेदारी

भारत में शरद ऋतु दस्तक दे चुकी है और कैस्पियन सागर की नमी लेते हुए पश्चिमी विक्षोभ अपने तयशुदा मार्ग के जरिये भारत में प्रवेश कर रहा है। इसी कड़ी में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक हलकों में तमाम उठापटक के बीच संभवतः ब्रासिलिया में 11वें ब्रिक्स का यह सम्मेलन वर्षांत का सबसे बड़ा राजनीतिक जमावड़ा है। यह सम्मेलन इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि चीन अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वॉर,अमेरिका द्वारा चीन को "करेंसी मैनीपुलेटर देश घोषित करना, और ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स रिपोर्ट के अनुसार: अगर, चीन और अमेरिकी के बीच हालात न सुधरे तो  वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर अपने सात वर्षों के 2.8 फीसद के निचले स्तर से गिर जाएगी जो आगे विश्वव्यापी मंदी कि राह खोलेगी।

इसी बीच अमेरिका का  रूस के साथ इंटरमीडियट रेंज  न्यूक्लियर फ़ोर्स (आईएनएफ़ ) संधि से एकतरफा बाहर होना, अफगानिस्तान में आसन्न सत्ता परिवर्तन,अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और इराक से अमेरिकी फौज की स्वदेश वापसी,ईरान के साथ अमेरिकी द्विपक्षीय संबंधों में कटुता,तकरार और अविश्वास,हॉरमुज़ की खाड़ी में लगातार बढ़ता सऊदी,ईरान और अमेरिकी त्रिकोणात्मक रणनीतिक विवाद, वेनेज़ुएला में घटता अमेरिकी प्रभुत्व बढ़ता रूसी दबदबा,व्यापार और निवेश नीतियों पर बढ़ते विवाद के बीच अमेरिका द्वारा भारत को  जनरलाइस्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस से मिलने वाले लाभ से वंचित कर देना,एस 400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली के खरीद पर अमेरिका का लगातार नाक भौं सिकोड़ना और राष्ट्रपति ट्रम्प का भारत के प्रति लगातार आते उल जुलूल बयान,भारत द्वारा आरसीईपी में शामिल न होने का नीतिगत  फैसला, सीरिया में रूसी-टर्किश फौज  की वापसी के बाद नए बनते समीकरण, अमेजन के वर्षा वन में लगी बुझती आग,वोलीविया के कद्दावर नेता और लैटिन अमेरिका ने पिंक टाइड सोशलिज्म के आखिरी समर्थकों में एक इवा मोराल्स को अर्जेंटीना में राजनीतिक शरण की खबरें  और आलेख लिखे जाने तक गाज़ा पट्टी में इजरायली फौज के साथ भीषण मुठभेड़ और चिरपरिचित इस्रायली सैन्य करवाई के बीच ब्रिक्स के 11वें सम्मेलन पर सम्पूर्ण विश्व की निगाहें टिकी रहेंगी

व्लादिवोस्टक में संपन्न फॉर ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम के बाद प्रधानमंत्री अपने रूसी समकक्ष राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ इस सम्मेलन में भारत का आगाज़ करेंगे, प्रधानमंत्री गत माह मामल्लपुरम के भारत चीन इनफॉर्मल मीट के बाद चीनी राष्ट्रपति शी शिंगपिंग से भी वार्ता करेंगे। रूस भारत का सबसे भरोसेमंद साझीदार और मित्र देश है।भारत उम्मीद रखता है कि  यह "रूसी साथ और रोमांस" "सदैव"जारी रहेगा।

 11वें ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ब्राजीलिया के खूबसूरत सैन टियागो के Itamraty Palace में अपने समकक्ष नेताओ के साथ द्विपक्षीय मुलाकात करेंगे और  ब्रिक्स बिजनेस फोरम , लीडर्स डायलाग विथ  ब्रिक्स बिजनेस कौंसिल और न्यू डेवलपमेंट बैंक  की बैठकों में भारत का मजबूत पक्ष रखेंगे।

https://twitter.com/narendramodi/status/1194727245094350848?s=09


(सौ:प्रधानमंत्री के ट्विटर हैंडल से)

11वें ब्रिक्स सम्मेलन की थीम : Economic Growth for an Innovative Future रखा गया है।

ब्रिक्स दुनिया की पाँच अग्रणी उभरती अर्थव्यवस्थाओं- ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह के लिये एक संक्षिप्त शब्द (Acronym) है।

BRICS की चर्चा वर्ष 2001 में वित्तीय संस्था गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs )के प्रमुख अर्थशास्री जिम ओ’ नील द्वारा ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के लिये विकास की संभावनाओं पर एक आंतरिक रिपोर्ट में की गई थी।

ब्रिक्स की संरचना

ब्रिक्स कोई अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन नहीं है, न ही यह किसी संधि के तहत स्थापित हुआ है।हम इसे पाँच देशों का एकीकृत प्लेटफॉर्म कहा जा सकता है।
ब्रिक्स देशों के सर्वोच्च नेताओं का तथा अन्य मंत्रिस्तरीय सम्मेलन प्रतिवर्ष आयोजित किये जाते हैं।
ब्रिक्स शिखर सम्मलेन की अध्यक्षता प्रतिवर्ष B-R-I-C-S क्रमानुसार सदस्य देशों के सर्वोच्च नेता द्वारा की जाती है।वैश्विक व्यापार में 30 फीसद हिस्सेदारी के साथ ब्रिक्स लगभग 42 प्रतिशत वैश्विक आबादी को जोड़ता है।

ब्रिक्स की बैठकों पर दुनिया के बाकी हिस्सों द्वारा बारीकी से नजर रखी जाती है और इसके निर्णय को  गहरे वैश्विक और भू सामरिक प्रभाव पैदा करने की क्षमता है। जैसा कि वर्तमान विश्व में  भू-सामरिक,आकृतिक,आर्थिक,रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा को  लेकर परिवर्तन देखे जा रहे हैं जिसका सीधा संबंध वैश्विक शांति और सुरक्षा पर पड़ता है।



भारत का रुख।

भारत शेष विश्व की तरह एशिया में एक नियम-आधारित प्रणाली का समर्थन करता है।
लेकिन आतंकवाद, संघर्ष, अंतर-राष्ट्रीय अपराधों और समुद्री खतरों जैसी अपरिहार्य चुनौतियों का सामना करते ऊर्जा सुरक्षा की कमी, अपर्याप्त कुशल मानव संसाधन और एक तरफावाद सहित स्थायी विकास के ज्वलन्त मुद्दे पर भी अपना सक्रिय, जिम्मेदार और गम्भीर मत रखता है।वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के मौजूदा माहौल में और नियमों पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां - ब्रिक्स देशों को वैश्विक स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

ओसाका संकल्प 2019 से आगे की राह। 

इस संदर्भ में, बीते जुलाई में ओसाका में हुए जी 20 शिखर सम्मेलन के दौरान अंतिम ब्रिक्स नेताओं की अनौपचारिक बैठक में, हमारे प्रधान मंत्री ने ब्रिक्स देशों के बीच अधिक तालमेल के लिए 5 प्रमुख सिफारिशें की थीं - अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में ॑ सुधारित बहुपक्षवाद ’ को बढ़ावा देना; कम लागत पर ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना; एनडीबी (न्यू डेवलपमेंट बैंक) द्वारा बुनियादी ढाँचे और नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी परियोजनाओं को अधिक प्राथमिकता देना; कुशल कर्मियों के आवागमन में आसानी और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए ब्रिक्स की एक मजबूत प्रतिबद्धता है। प्रधानमंत्री के प्रमुख सिफारिशों पर संजीदगी से गौर किये जाने जी आवश्यकता है।



ब्रिक्स और आतंकवाद।

ब्रिक्स नेताओं ने हमें क्रमागत ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों में आतंकवाद पर एक मजबूत जनादेश दिया है  ब्रिक्स देशों में  भारत,पाकिस्तान प्रायोजित और समर्थित आतंकवाद से सर्वाधिक ग्रस्त रहा है, पाकिस्तान को विभिन्न मोर्चों पर  सँरा सुरक्षा परिषद के एक सदस्य देश द्वारा नियमित रूप से पाकिस्तानी मामलों पर आंख मूंदकर अनेदखी करने अभयदान मिल जाता है।भारत ब्रिक्स के  जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के तहत काउंटर टेररिज्म सहयोग के लिए उच्च महत्व देता है। भारत ने  ज़ियामेन घोषणा और आतंकवाद से लड़ने के अपने मजबूत सामूहिक संकल्प को प्रतिबिंबित किया था। भारत आतंकवाद पर वैश्विक सम्मेलन के लिए इन देशों के समान समर्थन का अनुरोध करत है। इस तरह के एक वैश्विक सम्मेलन के लिए ब्रिक्स का समर्थन एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय कानूनी आधार पर आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के लिए ब्रिक्स की आंतकवाद निरोधी सक्रिय और मजबूत वचनबद्धता और  प्रतिबद्धता को रेखांकित करेगा ।


उल्लेखनीय है काउंटर टेररिज्म पर ब्रिक्स कार्य समूह की बैठकों में पिछले कुछ वर्षों में अच्छी प्रगति हुई है।
तीसरी सीटीडब्ल्यूजी बैठक में, निम्नलिखित के लिए उप-कार्य समूहों की स्थापना पर विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की गई थी जिसमे

(i) आतंकी वित्तपोषण को संबोधित करना.
 (ii) आतंकी उद्देश्यों के लिए इंटरनेट के उपयोग का मुकाबला करना.
 (iii) क्षमता निर्माण.
 (iv) कट्टरता का मुकाबला करना.
 (v) एफटीएफ का मुकाबला करना.और
(vi) करीबी आसूचना और कानून प्रवर्तन में आपसी सहयोग सहयोग।

इस संबंध में ब्रिक्स देशों इस प्रक्रिया में अपना समर्थन दोहराना होगा और आतंकवाद पर आम दृष्टिकोण को विकसित करना, आतंकवादी खतरे के समाधान में प्रयासों को समन्वित करना,सूचनाओं औऱ आसूचना को साझा करना शामिल है और इन उप-समूहों के कामकाज को ब्रासीलिया शिखर सम्मेलन के परिणामों में से एक के रूप में इस सम्मेलन में इसे जमीनी हक़ीक़त प्रदान करने की आवश्यकता है।


G 20 से आगे की राह आर्थिक अपराध पर वैश्विक प्रहार।

 आज बदलते विश्व मे ब्रिक्स देशों को  आर्थिक अपराधियों और भगोड़ों के खिलाफ एक साथ काम करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा है। प्रधानमंत्री मोदी ने जी 20 ब्यूनस आयर्स समिट में भगोड़े आर्थिक अपराधियों और एसेट रिकवरी के खिलाफ कार्रवाई के लिए नौ-प्वाइंट एजेंडा का सुझाव दिया था। जिसपर ब्रिक्स देशों को भी अमली जामा पहनाने की आवयश्कता है ये नौ विंदू हैं
प्रस्तावित एजेंडा में मजबूत और सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, कानूनी प्रक्रियाओं में सहयोग,प्रत्यर्पण, सूचनाओं का आदान-प्रदान,भगोड़े आर्थिक अपराधियों के लिए प्रवेश और सुरक्षित आश्रय को रोकना आदि शामिल हैं। भारत,ब्रिक्स को अत्यधिक महत्व और तरजीह देता है। भारत ब्रिक्स देशो के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने और मजबूत करने के लिए : आपसी विश्वास, सम्मान और पारदर्शिता की भावना के साथ अपने ब्रिक्स भागीदारों के साथ मिलकर कार्य करने में यकीन करता है। इसके अलावा वित्तीय मुद्दों पर भी यह सहयोग निरन्तर विस्तारित हुआ है जिसे ब्रासीलिया 2019 में इसे और आगे ले जाने की दरकार है।


 ब्रिक्स की तकनीकी उत्कृष्टता के संभावित क्षेत्र।

 प्रौद्योगिकी में प्रगति, डिजिटल क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उत्पादन प्रक्रिया, वैश्विक मूल्य श्रृंखला, कार्यबल की प्रवीणता, काम का भविष्य, डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश आदि से संबंधित चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों का सृजन में असीम संभावना है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी, नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने से आई ब्रिक्स  (iBRICS )नेटवर्क के निर्माण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहयोग, आईसीटी में सहयोग, रिमोट सेंसिंग उपग्रहों का नक्षत्र जैसी नई पहलों के क्षेत्र में अपनी विषेज्ञता दर्शानी होगी।
 इस संबंध में, ब्रिक्स यह भी विचार कर सकता है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और एक खुले, स्वतंत्र, टिकाऊ, मानव-केंद्रित भविष्य के समाज के निर्माण में इन अवसरों का लाभ कैसे उठाया जाए।
साथ ही "ब्लू इकॉनोमी और इसके सहकारी क्षेत्र" और "बीच टूरिज्म"  पर विशेष ध्यान देने की आवयश्कता है क्योंकि इन पांचों देशो की विशाल दंतुरित और खूबसूरत तट इस क्षेत्र में व्यापक भागीदारी की आवश्यकता है।


ब्रिक्स का उद्देश्य

ब्रिक्स का उद्देश्य अधिक स्थायी, न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से लाभकारी विकास के लिये समूह के साथ-साथ, अलग-अलग देशों के बीच सहयोग को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाना है जिसमे ब्रिक्स द्वारा अपने प्रत्येक सदस्य की आर्थिक स्थिति और विकास को ध्यान में रखा जाता है ताकि संबंधित देश की आर्थिक ताकत के आधार पर संबंध बनाए जाएँ और जहाँ तक संभव हो सके प्रतियोगिता से बचा जाए।
ब्रिक्स विभिन्न वित्तीय उद्देश्यों के साथ एक नए और आशाजनक राजनीतिक-राजनयिक इकाई के रूप में उभर रहा है जो वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार के मूल उद्देश्य से परे है।

सहयोग के क्षेत्र

1. आर्थिक सहयोग

ब्रिक्स देशों में कई क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग की गतिविधियों के साथ-साथ व्यापार और निवेश तेज़ी से बढ़ रहा है। ब्रिक्स समझौतों से आर्थिक और व्यापारिक सहयोग, नवाचार सहयोग, सीमा शुल्क सहयोग, ब्रिक्स व्यापार परिषद, आकस्मिक रिज़र्व समझौते और न्यू डेवलपमेंट बैंक के बीच रणनीतिक सहयोग आदि सामने आए हैं।ये समझौते आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने और एकीकृत व्यापार तथा निवेश बाज़ारों को बढ़ावा देने के साझा उद्देश्यों की प्राप्ति में योगदान देते हैं।
2. पीपुल-टू-पीपुल एक्सचेंज।

3. राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग सुर और बहुपक्षवाद दक्षिण-दक्षिण सहयोग शमिल हैं।

4.वैश्विक संस्थागत सुधारों पर ब्रिक्स का प्रभाव

BRICS देशों के बीच सहयोग शुरू करने का मुख्य कारण वर्ष 2008 का वित्तीय संकट था। इस वित्तीय संकट के कारण डॉलर के प्रभुत्व वाली मौद्रिक प्रणाली की स्थिरता पर संदेह उत्पन्न हुआ था।
BRICS ने बहुपक्षीय संस्थानों के सुधार के क्रम में वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन और तेज़ी से उभरते हुए बाज़ार (जो केंद्रीय भूमिका निभाते हैं) को दर्शाया है।


न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB):

शंघाइ स्थित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को वर्ष 2012 में नई दिल्ली में आयोजित चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचा और सतत विकास परियोजनाओं के लिये एक  की स्थापना पर विचार किया गया। सन 2014 के फोर्टालेजा घोषणा में कहा गया कि NDB ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को मज़बूत करेगा और वैश्विक विकास के लिये बहुपक्षीय तथा क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों के प्रयासों को पूरा करके स्थायी और संतुलित विकास में योगदान देगा।
NDB के संचालन के प्रमुख क्षेत्र हैं- स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, अवसंरचना, सिंचाई, स्थायी शहरी विकास और सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग।
NDB सभी सदस्य देशों के समान अधिकारों के साथ ब्रिक्स सदस्यों के बीच एक परामर्श तंत्र पर काम करता है।
आकस्मिक रिज़र्व व्यवस्था(Contingent Reserve Arrangement)
अपनी प्रारंभिक क्षमता 100 बिलियन डॉलर के साथ शुरुआत किये इस कोष के नतीजे उत्साहवर्द्धक रहे है।
यह वैश्विक वित्तीय सुरक्षा नेट को मज़बूत करने और मौजूदा वित्तीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को मज़बूत करने में योगदान देगा।

न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) पर इस सम्मेलन में विशेष सत्र का आयोजन किया जा रहा है,इससे इसके महत्व को समझा जा सकता है।

 समावेशी विकास पर भारतीय दृष्टिकोण।

भारत का मानना है कि विकास को वैश्विक व्यापार के लिए केंद्रीय रहना चाहिए और इसके लिए समान लाभ साझाकरण, रोजगार सृजन और समावेशी विकास अभिन्न होने चाहिए।
भारत ने हमेशा ब्रिक्स को एक जन-केंद्रित उद्यम बनाने पर जोर दिया हैऔर ब्रिक्स के भीतर गरीबी, भुखमरी, रोजगार सृजन और महिलाओं के सशक्तीकरण से निपटने के लिए सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को साकार करने और ऐसे किसी भी उपाय का समर्थन करने पर होना चाहिए,जो सामूहिक रूप से वैश्विक समुदाय द्वारा सहमत इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में उपयोगी हो।


भारत और मल्टीलेटेरिज्म की संकल्पना।

भारत का  मानना है कि 'सुधारित बहुपक्षवाद' इन समयों में आगे बढ़ने का मार्ग है - विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सुधार। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों पर विचार-विमर्श सदा के लिए एक अभ्यास नहीं हो सकता है जबकि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और वैधता का क्षरण लगातार जारी है।
भारत कमोबेश सभी मंचो से मुखर स्वर में यह सदैव कहता रहा है कि सभी को यह सुनिश्चित करने के लिए एक साथ काम करना चाहिए कि : एक नियम-आधारित विश्व व्यवस्था बनाए रखी जाए जिससे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, यूएनएफसीसीसी, आईएमएफ, विश्व बैंक आदि जैसे बहुपक्षीय संस्थान प्रासंगिक बने रहें और समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित  करते रहे।

ब्रिक्स देशों को भी भारत कि इस संबंध में  "न्यायिक मांग" को स्वीकार करते हुए  अंतर्राष्ट्रीय शासन के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में खुद को विभाजित करने के बजाय एक मजबूत,मुखर और समवेत स्वर में अपनी आवाज  बुलन्द करनी चाहिये