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Thursday, September 12, 2019

व्लादिवोस्तक-चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर : इंडो रशियन मेरीटाइम सिल्क रोड

व्लादिवोस्तक में सम्पन्न ईस्टर्न इकनोमिक फोरम में भारत ने रूस के साथ बहुप्रतीक्षित व्लादिवोस्तोक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) को मूर्त रूप देने की घोषणा की।
 भारत के इस कदम से रूस भारत के आर्थिक संबंधो नई दिशा मिलेगी वहीँ रूस के सुदूर पूर्व को एक व्यापक बाजार मिलेगा जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए लालायित सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगा. भारत, चीन से पहले ही स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड,न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझते हुए उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए  चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा।

 दूसरी तरफ़ भारत के इस कदम से जहाँ  चीनी आक्रामक नौसैनिक गतिविधि पर अंकुश लगने की उम्मीद जगी है वहीँ भारत, जापान के साथ "फोर लिटिल ड्रेगन" ("दक्षिण कोरिया सिंगापुर  ताइवान  और हांगकांग ) के साथ भारत रूस के साथ मिलकर चीनी प्रभुत्व वाले क्षेत्र में  जहाँ अपनी तगड़ी उपस्थिति दर्शायेगा और चीनी स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स  के जहर   की प्रभावी काट को सामने रख सकेगा ।
भारत का दक्षिण कोरिया,सिंगापुर के साथ गहरे नौसैनिक संबंध है इसमे सिंगापुर का चांगी बंदरगाह को तो भारतीय नौसेना को पोर्ट ऑफ कॉल से कहीं ज्यादा इस्तेमाल करने की अनुमति है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का के देशों के साथ भारत जे विश्वनीय नौसिनिक संबंध है,चूंकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का चीनी सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन का सबसे अहम ''चॉक पॉइंट" है।यहां पर भी भारत अपनी एक्ट ईस्ट और इंडो पैसिफिक नीति के तहत मलेशिया,इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ नौसिनिक राजनय के तहत गहरे रणनीतिक सम्बन्ध बनाने में सफल रहा है। उपरोक्त तमाम देशों के साथ दक्षिणी चीनी सागर को लेकर नौसिनिक विवाद व्याप्त है

व्लादिवोस्तक: इसे रूस का सैन फ्रांसिस्को कहा जाता है। यह रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र का एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है रूसी ट्रान्स साइबेरियन रेलवे का पूर्वी और अंतिम छोर व्लादिवोस्तक जिसे "रूलर ऑफ द ईस्ट"भी कहा जाता है । यह रूस के सुदूर पूर्वी भाग और उत्तर कोरिया के उत्तर में "गोल्डन हॉर्न की खाड़ी" में यह में अवस्थित है। इसकी सीमा चीन से भी समीपता दर्शाती है।

यहां रूसी नौसेना के प्रशांत बेड़े का मुख्यालय और प्रशांत महासागर में रूस का सबसे बड़ा बन्दरगाह है।
व्लादिवोस्तक के विशाल बारहमासी बन्दरगाह ,जिसमे नौवहन औऱ व्यावसायिक मत्स्यन की भरपूर संभावनाएं विद्यमान है। व्लादिवोस्तक से चेन्नई के बीच 5600 नॉटिकल मील या 10,300 किलोमीटर की समुद्री मार्ग में दक्षिण से जापान सागर,कोरियाई प्रायद्वीप,ताइवान,फिलीपींस,दक्षिणी चीन सागर,सिंगापुर होते हुए मलक्का की खाड़ी से निकलकर बंगाल की खाड़ी के अंडमान सागर होते हुए चेन्नई तक जाता है। यह दूरी को तय करने में विशाल कन्टेनर शिप जो 20-25 नॉट प्रति घंटे की गति से चलती है उसे 10- 12 दिन लगेंगे ।

रूस की चाहत
 भारत ने रूस के साथ अपनी बेहतर सामरिक समझदारी के साथ इंडो प्रशांत क्षेत्र में एक सम्मानित नौसैन्य प्रतिष्ठा प्रदान की साथ ही इस क्षेत्र में "रूस की हिंद महासागर" नीति की पुष्टि कर दी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत के साथ मिलकर  "बेहद दूरदर्शितापूर्ण " कार्रवाई  से जहां एक ओर बीजिंग को स्पष्ट संकेत मिला है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों को अंकुश लगाने के लिये रूसी इशारा है। हिन्द महासागर से रोमांस करने की रूसी चाहत कोई नई नहीं है,दरअसल रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी 1971 से ही लुभा रहा है,लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर वह बैकफुट पर ही रहा।

रूस,इससे पूर्व भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश के रूप पुर में उसके पहले परमाणु बिजली घर के निर्माण कर रहा है,और बांग्लादेश की "मुक्ति" में उसका निर्णायक योगदान रहा,वीसीएमसी के उसे उभरने का और अमेरिकी हेजेमनी को चुनौती  देने मौका मिल रहा है,जिसे पुतिन शायद ही किसी कीमत पर छोड़ना चाहेंगे।


भारत के लिये इस मार्ग का महत्व 

यह समुद्री मार्ग भारत और सुदूर पूर्वी रूस के बीच दो महत्वपूर्ण पत्तन को जोड़ेगा या यूं कहें कि यह कुडनकुलम से व्लादिवोस्तक के बीच के संबन्धों को और मजबूत करेगा,जो भारत रूस के नाभिकीय रिश्तों में और प्रगाढ़ता लाएगी। ईईएफ के मंच से भारत ने रूस की मदद से 20 नये परमाणु संयंत्र की स्थापना करने के समझौते पर हस्ताक्षर करेगा।
इस मार्ग के व्यवहारिक रूप से क्रियान्वित होने से भारत और रूस की सीधी पहुँच दक्षिण चीन सागर तक हो पायेगी जो अभी तक नहीं है।

इंडो प्रशान्त की संकल्पना में दक्षिणी चीन सागर खासा महत्व रखती है। इस क्षेत्र में रूसी -भारतीय गठजोड़ से चीन व्यवहारिक रूपसे शांत तो नहीं पर शांत होने का दिखावा जरूर करेगा,जिसका इंतज़ार अमेरिका सहित कई देशों को है।
भारत रूस और वियतनाम के संभावित त्रिपक्षीय धुरी से चीन कहीं न कहीं रक्षात्मक मुद्रा में मजबूरी में रहेगा क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भूखे चीन को रूस अबाध ऊर्जा सुरक्षा मुहैय्या कराता है।

व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) कहीं न कहीं शी जिनपिंग की ग्रेट चाइनीज ड्रीम के कहे जाने वाले ट्रिलियन डॉलर वाली वन बेल्ट वन रोड(ओबीओआर) के तहत चाइनीज मेरीटाइम सिल्क रूट(एमएसआर) के कॉउंटरबैलेंस के रूप में देखा जा रहा है,जहां चीन की एमएसआर नीति का प्रमुख उद्देश्य ढांचागत और अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के जरिये चीनी प्रभुत्व को बढ़ावा और एशियाई अफ्रीकी मेरीटाइम मार्ग पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करना है।


व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) जो दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरेगा, यह प्राकृतिक खनिज संपदा और ऊर्जा के असीमित संभावना के दोहन का क्षेत्र है। इस क्षेत्र पर वैश्विक मंचो के इतर चीन अपना "ऐतिहासिक दावा " बताते हुए संपूर्ण दक्षिणी चीन सागर को अपना हिस्सा बताता है।

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय भूराजनीतिक परिदृश्य में यह क्षेत्र चीन के साथ समुद्री सीमा साझा करने वाले देशों के साथ अनकहे शीत युद्ध का अखाड़ा बन चुका है। वियतनाम,फिलीपींस,ब्रूनेई और ताइवान के साथ चीन की झड़प की खबरें सामान्य होती जा रही है। चीन के लिए यह सागर उसकी निर्बाध ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन(एसएलओसी) है।

ये झड़पें अमेरिकी नौसेना को इस क्षेत्र में ओपन सी पॉलिसी और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन(एफओएन) के बहाने दक्षिणी चीन सागर में अपने पैर पसारने का मौका दे रही है।


क्यों इतना महत्वपूर्ण है साउथ चाइना सी.

सेन्टर फ़ॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज(सीएसआईएस) के एक अध्ययन के मुताबिक
यह विश्व के सबसे व्यस्ततम वाणिज्यिक मेरी टाइम कॉरीडोर है। इस मार्ग के जरिये विश्वव्यापी समुद्री व्यापार का तक़रीबन तीस फीसद हिस्सा गुजरता है।
सन 2016 में इस मार्ग से चीन के समुद्री व्यापार का 64 फीसद ($1.47 ट्रिलियन),जापान का 42 फीसद($242 बिलियन)औरअमेरिका का 14प्रतिशत ($208बिलियन), दक्षिण-कोरिया($423बिलियन) इंडोनेशिया($239बिलियन) हिस्सा दक्षिण चीन सागर के अहाते से गुजरा।
जबकि कुल व्यापार मूल्य की बात किया जाय तो इस क्षेत्र लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का व्यापार हुआ,जो विश्वव्यापी व्यापार का कुल  21 फीसद है।



जैवविविधता से परिपूर्ण दक्षिणी चीन सागर।

"कोरल त्रिभुज "  के भाग के नाम से जाने वाला यह क्षेत्र समुद्री जैवविविधता का विश्व में सबसे सम्पन्न क्षेत्र है।यह क्षेत्र उच्च मूल्य पर प्राप्त होने वाली और पर्याप्त न्यूट्रिशन युक्त समुद्री मछलियां जैसे स्पेनिश मॉक्रेल,पैसिफिक कॉड,जायंट ग्रॉउपर और टूना जैसी मछलियों का प्राकृतिक हैचिंग,ब्रीडिंग और कैचिंग ग्राउंड है।अनुवांशिक और जैव भौतिक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ो से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र के स्पार्टली द्वीपसमूह में विस्तृत कोरल रीफ मत्स्यन के लिए  प्राकृतिक रूप से "बायो कनेक्टिविटी"प्रदान करता है।
इससे इस क्षेत्र के मत्स्यन,रोजगार,आय,पोषण,खाद्य सुरक्षा,और विदेशी मुद्रा भंडार का सीधा संबंध है।


हिन्द महासागर में रूस की मजबूत होगी पैठ .
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व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) पर पुतिन और मोदी की मुहर ने सम्पूर्ण इंडो पैसिफिक क्षेत्र की भू सामरिक महत्व और "सिक्योरिटी आर्किटेक्चर" में आमूल चूल परिवर्तन ला दिया है।
हिन्द महासागर के उफनते गर्म पानी पर सर्फिंग और स्कूबा डाइविंग करने की दशकों की चाह को भारत ने एक झटके में पूरा कर दिया। भारत के इस कदम से एक तीर से कई शिकार किये
पहला,इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकन प्रभुत्व को तगड़ी चुनौती दिया क्योंकि अभी तक अमेरिका इस क्षेत्र का निर्विवाद नायक समझता था और क्वाड (QUAD) की संकल्पना के जरिये भारत,अमेरिका,जापान ऑस्ट्रेलिया  को लेकर आक्रमक चीनी मेरीटाइम पॉलिसी को चुनौती देने की योजना बना रहा था।
 भारत इस अमेरिकी नीति पर लंबे समय तक यकीन नहीं कर सकता है क्योंकि ट्रम्प के गैर जिम्मेदार नीतियों और उनके लगातार बदलते फैसलों से हालात बिगड़ सकते हैं।

दूसरा:रूस की दशकों की चाहत को पूरा करते हुए भारत ने चीन और अमेरिका दोनो को कड़ा भू सामरिक संदेश देते हुए खुद को सुरक्षित किया और चीन अमेरिका के बीच उपजे तनाव और असुरक्षा के सुर में रूसी काउंटर बैलेन्स का भरोसा दिलाया । अगर मॉस्को के नजरिये इस क्षेत्र को देखें तो यह रूस की एफ्रो एशियन( हिन्द) महासागर नीति की वापसी है। जहाँ  रूस को हिन्द महासागर में प्रवेश मिलेगा तो वहीं  चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की काट के रूप में भारत जापान सागर में अपनी प्रभुत्व को बरकरार रख सकेगा



, समरिक विशेषज्ञ इस भावी कदम को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के तोड़ के रूप यानी "मिरर रिस्पांस "के रूप में देखते हैं । इससे भारत की ब्लू वाटर नेवी संकल्पना को अमली  जामा पहनाया जा सकेगा। अब इस क्षेत्र में सभी कार्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तीनों स्थायी सदस्यों के बीच "त्रिकोणीय रूपरेखा"पर होगा। विशेषज्ञ की माने तो, रूस ने अमेरिका की चीन केन्द्रित "पाइवोट टू एशिया" और अपनी  "बैलेंसिंग चाइना" नीति को कुशलता के साथ साध लिया है।

courtesy:lowy inst.

तीसरा: भारतीय - रूसी गठजोड़ से पूरे पूर्वी तथा दक्षिण एशिया के आर्थिक और सामरिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव आएगा  जहाँ भारत अपनी एक्ट ईस्ट नीति का विस्तार करते हुए "फार एक्ट ईस्ट नीति"अपना सकेगा वहीं इस क्षेत्र में रूस की पहुंच से न सिर्फ चीनी समुद्री ऐतिहासिक आतंक से त्रस्त "आसियान 10" देशों को राहत मिलेगी,एपेक और ईस्ट एशिया समिट के देशों  को नए कलेवर वाले रूस से भेंट होगी,जो वर्तमान में  बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वक़ालत करते हुए अमेरिकी वर्चस्व को विभिन्न मोर्चों पर जमकर चुनौती दे रहा है। पुतिन के प्रो एक्टिव पैसिफिक पॉलिसी से कहीं न कहीं ट्रम्प और शिंगपिंग को परेशानी में अवश्य डालेगी पर ये दोनों ऐतिहासिक रूसी हक़ीक़त जानते हैं इसलिए ये दोनों अपनी देश अपनी दूसरी योजना पर अवश्य कार्य करेंगे।

चौथा: एक दूरदर्शी दृष्टिकोण से इस परियोजना को देखा जाय तो हम पाते हैं कि इससे सुदूर बर्फ से जमे आर्कटिक महासागर का  गर्म हिन्द महासागर का मिलन होगा जो न केवल सामरिक 
 आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से पूरे क्षेत्र के लिए "गेम चेंजर" होगा।
रूसी आर्कटिक क्षेत्र असीमित प्राकृतिक खनिज,पेट्रोलियम रिज़र्व,बहुमूल्य गैस रिज़र्व औऱ वानिकी संपदाओं से परिपूर्ण है जो जापान सागर,पूर्वी चीन सागर,दक्षिणी चीन सागर,अंडमान सागर होते हुए बंगाल की खाड़ी में बसे सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया के ऊर्जा सुरक्षा के भूखे और उच्च जीडीपी की आकांक्षा लिए इन देशों को निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। वैसे भी यह क्षेत्र समुद्री पाइरेसी से मुक्त है इसलिए निर्बाध व्यापार में कोई समस्या नहीं होगी। इसके इतर रूस के इस क्षेत्र में प्रवेश से चीन और अमेरिका इस क्षेत्र में "सम्मानजनक हरकत" करेंगे और दूसरे देशों के "क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता" का ख़याल रखेंगे।

 पांचवा:बीते समय की अवधारणा होने की रह पर चल पड़ी  भारत जापान की साझी एशिया अफ्रीका  ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)को पुनर्जीवन मिलेगा चूंकि रूस जापान के रिश्ते बेहतर हो रहे है और वे 1905 ,क्यूराइल,सखलिन से इतर देखने की ओर अग्रसर है जिसे हम पुतिन-अबे को हालिया सम्पन्न व्लादिवोस्तक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम की बैठक में देख चुके है। दरअसल एएजीसी की संकल्पना  चीन के ओबीओआर और बीआरआई नीति को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से 2017 में अहमदाबाद में जापान और भारत की संयुक्त पहल थी। रूस के इस क्षेत्र में शीतयुद्धकालीन सम्पर्क व्याप्त रहे है इसलिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ उसे अपने सम्बन्धो को "री सेट"करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।


                एशिया अफ्रीका  ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)


भारत के लिए चुनौती।

भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर,जिसका विस्तार एशिया से अफ्रीका तक है, को ज़ोन ऑफ पीस  घोषित कर चुका है, और क्षेत्रीय सुरक्षा     आर्किटेक्चर को कॉमन,कॉम्प्रिहेंसिव,कोऑपरेटिव और सस्टेनेबल,नियम आबद्ध ,पीसफुल,क्षेत्रीय अखंडता को सम्मान देते हुए ,निर्बाध और मुक्त नौवहन पर विश्वास करता है। रूस के आने से इंडो पैसिफिक क्षेत्र में नौसिनिक हलचलों में इज़ाफ़ा तो अवश्य होगा लेकिन चीनी नौसैनिक आक्रमकता में कमी आएगी क्योंकि आज  की बदली हुई परिस्थिति में चीन किसी भी मसले पर रूस के साथ किसी तरह का टकराव मोल नहीं लेना चाहेगा और जिसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा.




बदले हुए हालात में चीन अपनी ग्रेट पावर डिप्लोमेसी में तब्दीली लाते हुए संभवतः अपनी चिरपरिचित  चाइनीज भू सामरिक के अपने  तीन पिलर पर अपना कार्य और गंभीरता के साथ शुरु करेगा,जो निम्नलिखित है ।

1.सिक्युरीटाइजेशन  ऑफ सॉवरेनिटी,नेशनल इंट्रेस्ट एंड इंटरनेशनल नॉर्म मेकिंग
2.इफेक्टिव मैनेजमेंट ऑफ ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ पावर।
3 विनिंग ओवर फॉलोवर स्टेबल एंड पीसफुल एनवायरनमेंट.
भारत को चाहिए कि बदले हुए हालात में भी अपनी हिन्द महासागर की नीति पर कठोरता से अमल करे,और आक्रमक चीनी चाल का मुकाबला करने को सदैव तैयार रहे क्योंकि अगर चीन समुद्र में शांत होगा तो इसका यह कतई अर्थ नहीं कि वह भूमि और वायु में भी शांत हो,भारत को चीन के  साथ आर्थिक,पर्यावरणीय,और व्यापारिक मोर्चों पर उसकी कुटिल रणनीति पर खासा चौकन्ना रहने की जरूरत है,खासकर अपने पर्यावरणीय दृष्टि से सुभेद्य और आपदा आसन्न क्षेत्र पर।

रूस के साथ सम्बन्धों को और मजबूत करे भारत.

हिन्द महासागर क्षेत्र में और स्थिरता और स्थायित्व लाने के लिए भारत को  रूस के साथ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) जैसे  मिलिट्री लॉजस्टिक्स समझौते के अंजाम देना चाहिए,इस तरह के समझौतों में दोनों देश एक दूसरे की "सैन्य संस्थाओं/संस्थानों और बेस,पोर्ट आदि का सुगमतापूर्वक इस्तेमाल करते है।भारत, अमेरिका और फ्रांस के साथ इस तरह के समझौते को अमली जामा पहना चुका है।
रूस के साथ इस तरह के समझौते से भारत और रूस के संबंधों में प्रगाढ़ता ही आएगी और दबे स्वर में ही सही रूसी शिकायत कि "भारत का लागातार झुकाव अमेरिका की तरफ हो रहा है" इस तरह के समझौते से रूसी शिकायत का प्रभावी समाधान किया जा सकेगा।

भारत को रूस की शिकायतें अगर कोई है तो उसे बेहद गंभीरता से निपटारा करना होगा,जब आप रूस को अपना अभिन्न(integral) मित्र  बताते हैं तो "किसी तरह की शिकायतों" की कोई गुंजाईश नहीं होनी चाहिए।

बदलते हुए दौर में पाकिस्तान  के साथ रूस का साथ किसी रूप में भारत के लिए "अच्छा नहीं " है, विगत तीन सालों की घटना पर गौर करें  तो 2016 में रूस-पाकिस्तान  के बीच साझा पहला सैन्य अभ्यास हुआ ,मिलिट्री तकनीकी समझौता को 2017 में मूर्त रूप दिया गया जबकि 2018  में  नौसैनिक सयोग समझौता की  पुष्टि हुई. 2014 से  2018  प्राप्त आंकड़ों  पर गौर किया जाय तो रूस पाकिस्तान का तीसरा बड़ा पारम्परिक सैन्य हार्डवेयर निर्यातक बना जो पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का छह फीसद है ।
भारत चाहिए की रूसी सहयोग को और बेहतर करे तथा बदलते सुरक्षा परिदृश्य और अफगानिस्तान में अमेरिकी ढुलमुल रैवये के बीच भी रूस पर अपना नैसर्गिक अधिकार जताते हुए पाकिस्तान  फैक्टर को जड़ से समाप्त करे।

भारत के लिए रूस उन चंद देशों में शामिल है जिसके साथ भारत के त्रिस्तरीय सैन्य अभ्यास, आण्विक त्रिस्कन्द  और अंतरिक्ष सहयोग, हाई एन्ड कटिंग एज तकनीक क्षेत्र में भी बेहतरीन संबंध हैं।

 भारत औऱ रूस के द्विपक्षीय संबंधों को किसी परिभाषा की दरकार नहीं है,ये समय के साथ साथ और घनिष्ठ और आत्मीय होते जा रहे है। तभी तो प्रधानमंत्री ने इईएफ में  कहा कि

"Indo-Russia ties based on the principles of "rules-based order, sovereignty, respect for territorial integrity and is against engaging in the internal matters of other countries".

बीते साल के 27 जनवरी 2018  को राष्ट्रपति पुतिन, जोसफ स्टालिन के बाद सबसे लम्बे समय तक रूस पर शासन वाले राष्ट्राध्यक्ष बन गए हैं।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी के भारतीय शासन को देखा,समझा और महसूस किया है और मोदी जो पुतिन को अपना परम और अभिन्न मित्र  मानते है और उनकी पर्सनल केमिस्ट्री किसी से छिपी नहीं है।

मोदी का मास्टर स्ट्रोक और पुतिन का साथ

भारत के सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) महत्ता को देखते हुए विशेषज्ञ इसे  "इंडो रशियन मेरीटाइम सिल्क रोड " और  "आर्कटिक टू  इंडियन ओशन" कहते हैं  इसके जरिये भारत "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन पैट्रॉल"के जरिये दक्षिणी चीन सागर में मजबूती के अपनी उपस्थिति  दर्शायेगा इसके साथ भारत चीन के पूर्वी तट पर अपनी  नौसिनिक ताकत में इज़ाफ़ा कर सकेगा,जो अभी तक संभव नही हो पा रहा था।
चीन, रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दारोमदार रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के ऊर्जा बाहुल्य क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर लम्बे समय से गड़ी है और वह इन क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है, इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन को चिंतित करती रही है।अंतर्राष्ट्रीय राजीनति की बिसात पर पुतिन खुद मंझे हुए खिलाडी है वे चीन की सभी चालों से वाकिफ और उसके आसन्न चालों के प्रति चौकन्ने है

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति सबसे निर्मम होती है राष्ट्र हित के सामने सभी हित बेमानी होती है और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति  में इस तथ्य को पुतिन से बेहतर शायद ही कोई नेता समझता हो।
मौजूद दौर में रूस चीन की गठजोड़ वक़्त का तकाज़ा है जिसे पुतिन भली भांति समझते हैं और वे आसन्न चीनी पैंतरे और खतरे प्रति सावधान दिखते हैं।
इसी कड़ी में भारत के साथ चेन्नई व्लादिवोस्तक मेरीटाइम कॉरिडोर,जापान के साथ अपने सम्बन्ध सुधारना ,चीन के साथ सीमा विवाद वाले सभी देशों के साथ रूस के बेहतर सम्बन्ध। प्रिमकोव ट्राइंगल  RIC (रूस भारत और चीन) के बाद अब हालिया
पुतिन ट्राइंगल RIV(रसिया इंडिया,और वियतनाम)की संकल्पना और उसे मूर्त रूप प्रदान करते हुए रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ साथ इस क्षेत्र में चीनी चुनौती की काट खोजना वे भली भांति जानते हैं।

Tuesday, September 03, 2019

टू अमूर फ्रॉम यमुना : ए टाइम टेस्टेड फ्रेंडशिप

भारत रूस के सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता लाने की दिशा  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 सितम्बर से सुदूर रूसी शहर व्लादिवोस्तक यात्रा करेंगे।

भारत और रूस के संबंधों को सामान्यतया ऐतिहासिक, आपसी विश्वास, और आपसी एवं पारस्परिक समझ पर आधारित है और बिना किसी "लाभ हानि"की चिंता किये ये दोनों देश समय के क्रूर पहिये पर पड़ोसी की "आल वेदर फ्रेंडशिप" के फ़र्ज़ी दावे से कहीं सुदूर  "अपने आप मे अनूठी "(sui generis) दोस्ती को दर्शाती है।



तभी तो भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने बीते बुधवार को स्पष्ट किया कि

'विश्व बदल रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनय में भारत और रूस के संबंध समय पर खरे,सदैव अचर,स्थिर,और स्थाई रहें हैं।
इन दोनो देशों के इस अनूठे सम्बन्धो को बिगाड़ने,तोड़ने,मरोड़ने,खटास पैदा करने,के साथ साथ धमकाने,आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने,तक जैसी ओछी हरकत करने से ये महाशक्तियां और इनके पुछल्ले देश बाज़ नहीं आये लेकिन भारत रूस के ये संबध इन कुटिल चालों से सदा ऊपर उठकर रही।
यह संबंध तो 1468 से 1472 के बीच जब रूसी यात्री अफनसे निकितिन ने फारस और  ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्र से होते हुए भारत की यात्रा की और अपनी कृति khozheniye za tri morya (द जर्नी बियॉन्ड थ्री सी) लिखा तब से ही व्यापक हो चुके थे। मॉस्को,सेंट पीटर्सबर्ग, अस्त्रखान से हमारे बहुआयामी सम्बन्ध तो आदि काल से रहे है।

जिसे हमने गंगा-मस्कवा ,रुपये-रूबल,टैगोर-गोर्की
दिनकर-पुश्किन,राहुल-दोस्तव्स्की,इसरो-रॉस्कोसमोस,बार्क-रॉसएटम,एचएएल-रोसोबोरोनएक्सपोर्ट,के जरिये सांस्कृतिक,तकनीकी और आर्थिक सम्बन्ध को मजबूत बनाया है।

 रांची,भिलाई,बोकारो,हल्दिया,मथुरा सहित कई अन्य औद्योगिक शहर,के औद्योगिकीकरण में कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी,बस आप नाम लेकर आप अपनी आंखें बंद कीजिए रूस का योगदान जेहन में तैरता नजर आएगा।
नेहरू,शास्त्री इंदिरा,गुजराल,राजीव,राव,बाजपेयी,सुषमा,
जयशंकर के साथ नरेंद्र मोदी इस अनन्य राजनीतिक और राजनयिक सम्बन्धों को आगे बढ़ा रहे हैं।

मास्को के प्रसिद्ध सर्कस,लचीली जिम्नास्ट,राज कपूर की लाल टोपी, विश्वनाथन आनन्द और गैरी कास्पोरोव, मरात साफ़िन,दिनारा सफ़ीना,अन्ना कुर्निकोवा से मारिया शारापोवा और वर्तमान में एके 101 असॉल्ट राइफल, सुखोई 30, भीष्म,पिनाक, विक्रमादित्य,चक्र औऱ मिग बाइसन-अभिनंदन की जोड़ी भी दोनो देशों के सांस्कृतिक रणनीतिक संबंधों को बयां करती ।

ये चंद उदाहरण है जिसे विदेश मंत्री के उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि होती है ,और दोनों देशों की रिश्ते से चिढ़ कर अपना सर नोचने वाले देशो के लिये सबक मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक में राजनय और दोस्ती को कैसे साथ लेकर चला जाय।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनय की कॉपी बुक स्टाइल तो कहती है कि "जो आप कहते है उससे कहीं ज्यादा ध्यान उस पर दिया जाना चाहिए जो आप नहीं कहते है"भारत के साथ रूस की कमोबेश यही स्थिति बरकरार रही है।


भारत के लिए क्यों खास है व्लादिवोस्तक ।

 रूस के रोमानोव वंश के महान योद्धा और शासक अलेक्जेंडर तृतीय जो रूस के सम्राट के साथ साथ ग्रैंड ड्यूक ऑफ फ़िनलैंड और किंग ऑफ पोलैंड भी थे  उनकी प्रसिद्ध उक्ति है
"Russia only has  two allies which are the army and the fleet"
इसी कथन को चरितार्थ करते हुए करीब पांच दशक पहले दिसंबर 1971 के सर्दियों में जब अमेरिकी और ब्रिटिश नौसेना ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत को धमकाते हुए अपने विमानवाहक पोत का रुख पाकिस्तान के समर्थन में बंगाल की खाड़ी की ओर मोड़ दिया था तब तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने प्रशांत बेड़े को परमाणु आयुध से सुसज्जित पनडुब्बी भी थी उसे भारत की सहायता के लिए भेज दिया था।
तत्कालीन सोवियत संघ के इस कदम ने पूरे युद्ध की संरचना ही बदल दी आक्रमक अमेरिकी प्रशासन ने अपने सातवें बेड़े ने युद्ध समाप्ति के फौरन बाद अपनी वापसी करना उचित समझा और ब्रिटिश नौसेना किसी भी सूरत में रूसी नौसेना के साथ कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहती थी।इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र से वापसी में ही अपनी भलाई समझी।

सोवियत संघ की नौसेना का यह प्रशांत बेड़ा रूस के सुदूर पूर्वी भाग व्लादिवोस्तक के गोल्डन हॉर्न खाड़ी में स्थित था । रूस के इस कदम ने 1971 की युद्ध की दशा और दिशा ही बदल दी,यह बेड़ा युद्ध समाप्त होने के बाद लम्बे अरसे तक इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा ताकि इस क्षेत्र में अमेरिका प्रतिरोध को समाप्त किया जा सके।विश्व इतिहास में यह शायद पहला मौका था जब दो आण्विक महाशक्तियां एक दूसरे के खिलाफ आमने सामने किसी अन्य देश के लिए हुए थे फलस्वरूप आज मुक्त बांग्लादेश को हम नक़्शे पर देख पा रहे है।इस घटना के बाद "व्लादिवोस्तक"के लिए भारतीयों के दिल और दिमाग मे अपना विशेष स्थान बना चुका है।

ग्लॉसनोस्त और पेरेस्त्रोइका से आगे निकलते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन की  वोस्तानॉवलेनये (रिस्टोरेशन) की  अभिनव  नीति  और अपने सुदूर पूर्व पूर्वी क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध कार्यक्रम  ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम(ईईएफ)2019 के लिए इस साल राष्ट्रपति पुतिन ने जब भारतीय प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि के रूप मे आमन्त्रित किया तो बरबस ऐसा लग रहा है कि भारत को व्लादिवोस्तक के कर्ज़ को चुकाने के सुनहरे मौका मिला है जिसे चुकाया जाय।हालांकि इस रूसी कर्ज़ को,जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता है,पर,हां उसके संवृद्धि और विकास कार्य मे दिल से भागीदार बनकर उसके उन्नति में अपना योगदान तो दिया ही जा सकता है।

इसी क्रम में भारत ने व्लादिवोस्तक के महत्व को बहुत पहले ही पहचान लिया था और भारत पहला ऐसा देश था जिसने 1992 में यहां अपना महावाणिज्य दूतावास को खोला था। इस क्षेत्र में इरकुटस्क क्षेत्र जहां भारत के लिए मिग और सुखोई श्रेणी के लड़ाकू विमानों विनिर्माण होता है। सखालिन क्षेत्र में प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड(ओ एन जी सी) के अनुषंगी कंपनी ओवीएल ने प्राकृतिक गैस उत्खनन के लिए भारी निवेश किया है।

ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम (ईईएफ) 2019.

रूस के कुल छह औद्योगिक क्षेत्र है जिसमे छठा औरअंतिम "सुदूर पूर्व औद्योगिक केंद्र(The Russian Far East Industrial Centre) का मुख्यालय " व्लादिवोस्तक है जिसे रूस के सैन फ्रांसिसको कहा जाता है। यह रूस के एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है।
उत्तरी प्रशांत महासागर के जापान सागर के मुहाने पर स्थित व्लादिवोस्तक सामरिक और प्राकृतिक संसाधन से सम्पन्न क्षेत्र  होने के वावजूद अपनी दुरूह भौगौलिक स्थिति के कारण इसका विकास नहीं हो पाया था,राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी Pivot of Asia रणनीति के तहत इस समस्या से निपटने के लिए 2012 में एक अलग मंत्रालय, विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया,और 2015 से  इस क्षेत्र के विकास के लिए सालाना  ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम(ईईएफ) का आयोजन व्लादिवोस्तक में होना सुनिश्चित किया।अब इस सम्मेलन में ईईएफ से इतर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था,क्षेत्रीय एकता, नवीन औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्र के नवाचार से जुड़े मुद्दों पर विचार विमर्श का एक बेहतरीन प्लेटफार्म माना जाता है जो पूरे यूरेशियन और आर्कटिक राजनय  के लिए अति महत्वपूर्ण है।

द ग्रेट यूरेशियन गेम।

व्लादिवोस्तक रणनीतिक रूप से कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित है जो रूस को उत्तरी और दक्षिण कोरिया और जापान के मुख्य द्वीपों साथ  जोड़ता है। यह क्षेत्र जिसे सुदूर पूर्व फेडरेल डिस्ट्रिक्ट कहा जाता है जो क्षेत्रफल में  भारत से दोगुना है और जनसंख्या मात्र 6.3 मिलियन।इसमे कुल आठ डिस्ट्रिक्ट हैं जो बहुमूल्य खनिज और प्राकृतिक संसाधनों (कोयला डायमंड गोल्ड,प्लेटिनम टँगस्टन) से सम्पन्न है।
यह शहर उत्तरी प्रशान्त महासागर में होने के कारण सालों भर व्यापार के लिए खुला रहता है,जबकि रूस से अधिकतर बन्दरगाह आर्कटिक क्षेत्र में होने के कारण सर्दियों में बंद रहते है। व्लादिवोस्तक जो ट्रांस साइबेरियन रेल मार्ग का सबसे पूर्वी टर्मिनस है और क्यूराईल और सखलिन जैसे ऊर्जा संसाधन सम्पन्न क्षेत्र से घिरा हुआ है, यह शहर न सिर्फ पत्तन के दृष्टि से वरण सामरिक रूप से  रूस चीन जापान और कोरिया के चतुष्कोणीय आर्थिक व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए "संघर्ष"का मुख्यालय बनेगा।
भारत भी इस ग्रेट गेम का हिस्सा बनना चाहेगा,क्योंकि हमें भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और रूसी हाथों के साथ यह कार्य अन्य क्षेत्रों से ज्यादा सहज है।
इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी को चिंतित करती रही है,इसी क्रम में पुतिन द्वारा मोदी को इस सम्मलेन में गेस्ट ऑफ आनर दिये जाने के निहितार्थ को समझा जा सकता है।


चीन फैक्टर.

भारत और रूस  विस्तृत इंडो पैसेफिक क्षेत्र में बढ़ता चीनी दबदबा,आक्रमक नौसैनिक नीति और एम्बुश और डेब्ट डिप्लोमेसी,आर्कटिक क्षेत्र में ऊर्जा दोहन के लिए महत्वाकांक्षी रणनीति,और चीन और अमेरिका बदलते व्यापारिक रिश्ते और तथाकथित ट्रेड वॉर से उत्पन्न हालात से चिंतित है।यहाँ यह देखना दिलचस्प है कि चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दायित्व रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के इस क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर गड़ी है और वह इस क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है। चीन इस क्षेत्र में पूरे जनसँख्या पैटर्न को बदलने पर उतारू है,इसी कड़ी चीन अपने नागरिकों को इस इस क्षेत्र में पहले पर्यटन,फिर कामागार के रूप के बसाना शुरू करता है और पूरी जनसंख्या लाभांश को बदल देता है ।रूस चीनी चाल को भली भांति समझता है,उसे बेहतर समझ है कि यह वही चीन है जो उससे उसरी नदी पर लड़ चुका है,और यह अपनी पीसफुल राइज की नीति से कहीं आगे निकल चुका है,औऱ इसकी नजर रूस से होते हुए पूरे यूरेशिया पर है। चीन की अरबों डॉलर की  न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की अवधारणा और इनसे होने वाले सम्भावित परिणाम से रूस समेत सभी देश वाक़िफ़ है।
भारत चीन से पहले स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड,न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझ रहा है और उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा। इस समुद्री मार्ग के जरिये जहां रूस के सुदूर पूर्व व्लादिवोस्तक में भारत महज 24 दिन में पहुंच सकेगा,जो अभी 42 दिन लगता है। इस रास्ते से भारत न सिर्फ कोरियाई प्रायद्वीपीय,जापान सागर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकेगा ।


यह समुद्री मार्ग  पूर्वी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरता है जहां चीन अपनी ऐतिहासिक दावा कूटनीति के जरिये सम्पूर्ण क्षेत्र पर अपना अधिकार जताते हुए अपने सभी पड़ोसियों के साथ आक्रमकता के साथ पेश आता है,चीन के आक्रमकता से त्रस्त इन सभी देशों के साथ भारत के बेहतर राजनयिक और नौसिनिक सम्बन्ध है। इस क्षेत्र में भारत वियतनाम के साथ मिलकर  चीन के इन मंसूबो पर मजबूती से लगाम लगा सकता है।

रूसी चाहत

रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी सदा लुभाता रहा है।चेन्नई -व्लादिवोस्तक मार्ग के संचालित होने के बाद  प्रशांत महासागर का हिन्द महासागर में मिलन हो सकेगा और चीन रूस के आगोश में शांति से रह सकेगा।इस समुद्री मार्ग के जरिये ही भारत -वियतनाम -रूस की त्रिपक्षीय नवीन संकल्पना को मूर्त प्रदान किया जा सकेगा। इससे आसियान देशों के लिए भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एक्सटेंडेड ईस्ट पॉलिसी में रूसी सहयोग बढ़ेगा। ये दोनों देश ब्रिक्स,एससीओ,आरआईसी आदि सहयोगी मंचो पर विद्यमान है।

सम्बन्ध सुधारने की और जरूरत.

रूस के  साथ द्विपक्षीय संबंध को गति देने के लिए भारत को  रणनीतिक आण्विक और सामरिक सम्बन्ध के साथ साथ अन्य आर्थिक व्यापारिक गतिविधि को और बढ़ावा देना पड़ेगा।दोनो देशों के बीच कई मुद्दों पर अभी और भी सक्रियता के साथ इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार से कहीं ऊपर उठकर क्रियान्वयन करने की जरूरत है।इन मुद्दों में सबसे प्रमुख हैं व्यापारिक कनेक्टिविटी ,भौगोलिक दूरी,विदेशी निवेश संबंधी कानून,कमजोर बैंकिंग व्यवस्था,नीतिगत विषमता,रूस की वीजा रेस्ट्रिक्ट नीति आदि मसलों पर ध्यान देने की जरूरत है। 
भौगौलिक दूरी दोनो देशों के बीच व्यापार और व्यापार असंतुलन की सबसे बड़ी बाधा है,जिसे इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग  पर तीव्रता से व्यापारिक रूप से व्यवहारिक बनाना होगा जिससे स्वेज नहर पर निर्भरता कम हो सके  और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता,मुक्त व्यापार मंच जैसे यूरेशियन इकनोमिक यूनियन आदि मसलों पर बेहद  संजीदगी के साथ पेश आना होगा।
ट्रेड वॉर,अमेरिकी कड़े होते वीजा नीति, अमेरिकी डिग्लोबलाइजेशन नीति,अमेरिका की रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और संरक्षणवाद,चीन की ग्लोबलाइजेशन 2.0 विथ चाइनीज करेक्टर के इस दौर भारत और रूस को चाहिए कि बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य में साथ मिलकर आगे आते हुए इन आर्थिक अवसरों लाभ  उठाने की आवश्यकता है।
हिन्द प्रशान्त क्षेत्र की बदलती जरूरत,अफगानिस्तान में कमजोर होती अमेरिकी पकड़ और बढ़ता रूसी वर्चस्व,
पश्चिम एशिया में सीरिया पर प्रभावी रूसी करवाई,ईरान के साथ अमेरिकी टकराहट, आदि मसलों पर रूस को भारत की सख्त जरूरत होगी ।

रसियन रोमांस.

ग्रेट पैसिफिक रिम की संकल्पना के बाद "पाइवोट ऑफ एशिया/यूरेशिया" चीन की आक्रमक मेरीटाइम नीति,और बदले हुए  'इंडो पैसिफिक अवधारणा "और रूस अमेरिका के बीच आईएएफ संधि के बाद खटास होते रिश्ते के ,भारत पर रूसी सैन्य हार्डवेयर न खरीदने का अमेरिकी दवाब के बीच प्रधानमंत्री की यह यात्रा और रूस के कम विकसित सुदूर पूर्व क्षेत्र और व्लादिवोस्तक के विकास के लिए गहरी भारतीय प्रतिबद्धता को  को "व्यापक अर्थों "में देखा जाना चाहिए।

भास्कर,
3/9/2019
दिल्ली