व्लादिवोस्तक में सम्पन्न ईस्टर्न इकनोमिक फोरम में भारत ने रूस के साथ बहुप्रतीक्षित व्लादिवोस्तोक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) को मूर्त रूप देने की घोषणा की।
भारत के इस कदम से रूस भारत के आर्थिक संबंधो नई दिशा मिलेगी वहीँ रूस के सुदूर पूर्व को एक व्यापक बाजार मिलेगा जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए लालायित सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगा. भारत, चीन से पहले ही स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड,न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझते हुए उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा।
दूसरी तरफ़ भारत के इस कदम से जहाँ चीनी आक्रामक नौसैनिक गतिविधि पर अंकुश लगने की उम्मीद जगी है वहीँ भारत, जापान के साथ "फोर लिटिल ड्रेगन" ("दक्षिण कोरिया सिंगापुर ताइवान और हांगकांग ) के साथ भारत रूस के साथ मिलकर चीनी प्रभुत्व वाले क्षेत्र में जहाँ अपनी तगड़ी उपस्थिति दर्शायेगा और चीनी स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स के जहर की प्रभावी काट को सामने रख सकेगा ।
भारत का दक्षिण कोरिया,सिंगापुर के साथ गहरे नौसैनिक संबंध है इसमे सिंगापुर का चांगी बंदरगाह को तो भारतीय नौसेना को पोर्ट ऑफ कॉल से कहीं ज्यादा इस्तेमाल करने की अनुमति है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का के देशों के साथ भारत जे विश्वनीय नौसिनिक संबंध है,चूंकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का चीनी सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन का सबसे अहम ''चॉक पॉइंट" है।यहां पर भी भारत अपनी एक्ट ईस्ट और इंडो पैसिफिक नीति के तहत मलेशिया,इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ नौसिनिक राजनय के तहत गहरे रणनीतिक सम्बन्ध बनाने में सफल रहा है। उपरोक्त तमाम देशों के साथ दक्षिणी चीनी सागर को लेकर नौसिनिक विवाद व्याप्त है
व्लादिवोस्तक: इसे रूस का सैन फ्रांसिस्को कहा जाता है। यह रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र का एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है रूसी ट्रान्स साइबेरियन रेलवे का पूर्वी और अंतिम छोर व्लादिवोस्तक जिसे "रूलर ऑफ द ईस्ट"भी कहा जाता है । यह रूस के सुदूर पूर्वी भाग और उत्तर कोरिया के उत्तर में "गोल्डन हॉर्न की खाड़ी" में यह में अवस्थित है। इसकी सीमा चीन से भी समीपता दर्शाती है।
यहां रूसी नौसेना के प्रशांत बेड़े का मुख्यालय और प्रशांत महासागर में रूस का सबसे बड़ा बन्दरगाह है।
व्लादिवोस्तक के विशाल बारहमासी बन्दरगाह ,जिसमे नौवहन औऱ व्यावसायिक मत्स्यन की भरपूर संभावनाएं विद्यमान है। व्लादिवोस्तक से चेन्नई के बीच 5600 नॉटिकल मील या 10,300 किलोमीटर की समुद्री मार्ग में दक्षिण से जापान सागर,कोरियाई प्रायद्वीप,ताइवान,फिलीपींस,दक्षिणी चीन सागर,सिंगापुर होते हुए मलक्का की खाड़ी से निकलकर बंगाल की खाड़ी के अंडमान सागर होते हुए चेन्नई तक जाता है। यह दूरी को तय करने में विशाल कन्टेनर शिप जो 20-25 नॉट प्रति घंटे की गति से चलती है उसे 10- 12 दिन लगेंगे ।
रूस की चाहत
भारत ने रूस के साथ अपनी बेहतर सामरिक समझदारी के साथ इंडो प्रशांत क्षेत्र में एक सम्मानित नौसैन्य प्रतिष्ठा प्रदान की साथ ही इस क्षेत्र में "रूस की हिंद महासागर" नीति की पुष्टि कर दी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत के साथ मिलकर "बेहद दूरदर्शितापूर्ण " कार्रवाई से जहां एक ओर बीजिंग को स्पष्ट संकेत मिला है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों को अंकुश लगाने के लिये रूसी इशारा है। हिन्द महासागर से रोमांस करने की रूसी चाहत कोई नई नहीं है,दरअसल रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी 1971 से ही लुभा रहा है,लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर वह बैकफुट पर ही रहा।
रूस,इससे पूर्व भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश के रूप पुर में उसके पहले परमाणु बिजली घर के निर्माण कर रहा है,और बांग्लादेश की "मुक्ति" में उसका निर्णायक योगदान रहा,वीसीएमसी के उसे उभरने का और अमेरिकी हेजेमनी को चुनौती देने मौका मिल रहा है,जिसे पुतिन शायद ही किसी कीमत पर छोड़ना चाहेंगे।
भारत के लिये इस मार्ग का महत्व
यह समुद्री मार्ग भारत और सुदूर पूर्वी रूस के बीच दो महत्वपूर्ण पत्तन को जोड़ेगा या यूं कहें कि यह कुडनकुलम से व्लादिवोस्तक के बीच के संबन्धों को और मजबूत करेगा,जो भारत रूस के नाभिकीय रिश्तों में और प्रगाढ़ता लाएगी। ईईएफ के मंच से भारत ने रूस की मदद से 20 नये परमाणु संयंत्र की स्थापना करने के समझौते पर हस्ताक्षर करेगा।
इस मार्ग के व्यवहारिक रूप से क्रियान्वित होने से भारत और रूस की सीधी पहुँच दक्षिण चीन सागर तक हो पायेगी जो अभी तक नहीं है।
इंडो प्रशान्त की संकल्पना में दक्षिणी चीन सागर खासा महत्व रखती है। इस क्षेत्र में रूसी -भारतीय गठजोड़ से चीन व्यवहारिक रूपसे शांत तो नहीं पर शांत होने का दिखावा जरूर करेगा,जिसका इंतज़ार अमेरिका सहित कई देशों को है।
भारत रूस और वियतनाम के संभावित त्रिपक्षीय धुरी से चीन कहीं न कहीं रक्षात्मक मुद्रा में मजबूरी में रहेगा क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भूखे चीन को रूस अबाध ऊर्जा सुरक्षा मुहैय्या कराता है।
व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) कहीं न कहीं शी जिनपिंग की ग्रेट चाइनीज ड्रीम के कहे जाने वाले ट्रिलियन डॉलर वाली वन बेल्ट वन रोड(ओबीओआर) के तहत चाइनीज मेरीटाइम सिल्क रूट(एमएसआर) के कॉउंटरबैलेंस के रूप में देखा जा रहा है,जहां चीन की एमएसआर नीति का प्रमुख उद्देश्य ढांचागत और अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के जरिये चीनी प्रभुत्व को बढ़ावा और एशियाई अफ्रीकी मेरीटाइम मार्ग पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करना है।
व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) जो दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरेगा, यह प्राकृतिक खनिज संपदा और ऊर्जा के असीमित संभावना के दोहन का क्षेत्र है। इस क्षेत्र पर वैश्विक मंचो के इतर चीन अपना "ऐतिहासिक दावा " बताते हुए संपूर्ण दक्षिणी चीन सागर को अपना हिस्सा बताता है।
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय भूराजनीतिक परिदृश्य में यह क्षेत्र चीन के साथ समुद्री सीमा साझा करने वाले देशों के साथ अनकहे शीत युद्ध का अखाड़ा बन चुका है। वियतनाम,फिलीपींस,ब्रूनेई और ताइवान के साथ चीन की झड़प की खबरें सामान्य होती जा रही है। चीन के लिए यह सागर उसकी निर्बाध ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन(एसएलओसी) है।
ये झड़पें अमेरिकी नौसेना को इस क्षेत्र में ओपन सी पॉलिसी और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन(एफओएन) के बहाने दक्षिणी चीन सागर में अपने पैर पसारने का मौका दे रही है।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है साउथ चाइना सी.
सेन्टर फ़ॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज(सीएसआईएस) के एक अध्ययन के मुताबिक
यह विश्व के सबसे व्यस्ततम वाणिज्यिक मेरी टाइम कॉरीडोर है। इस मार्ग के जरिये विश्वव्यापी समुद्री व्यापार का तक़रीबन तीस फीसद हिस्सा गुजरता है।
सन 2016 में इस मार्ग से चीन के समुद्री व्यापार का 64 फीसद ($1.47 ट्रिलियन),जापान का 42 फीसद($242 बिलियन)औरअमेरिका का 14प्रतिशत ($208बिलियन), दक्षिण-कोरिया($423बिलियन) इंडोनेशिया($239बिलियन) हिस्सा दक्षिण चीन सागर के अहाते से गुजरा।
जबकि कुल व्यापार मूल्य की बात किया जाय तो इस क्षेत्र लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का व्यापार हुआ,जो विश्वव्यापी व्यापार का कुल 21 फीसद है।
जैवविविधता से परिपूर्ण दक्षिणी चीन सागर।
"कोरल त्रिभुज " के भाग के नाम से जाने वाला यह क्षेत्र समुद्री जैवविविधता का विश्व में सबसे सम्पन्न क्षेत्र है।यह क्षेत्र उच्च मूल्य पर प्राप्त होने वाली और पर्याप्त न्यूट्रिशन युक्त समुद्री मछलियां जैसे स्पेनिश मॉक्रेल,पैसिफिक कॉड,जायंट ग्रॉउपर और टूना जैसी मछलियों का प्राकृतिक हैचिंग,ब्रीडिंग और कैचिंग ग्राउंड है।अनुवांशिक और जैव भौतिक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ो से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र के स्पार्टली द्वीपसमूह में विस्तृत कोरल रीफ मत्स्यन के लिए प्राकृतिक रूप से "बायो कनेक्टिविटी"प्रदान करता है।
इससे इस क्षेत्र के मत्स्यन,रोजगार,आय,पोषण,खाद्य सुरक्षा,और विदेशी मुद्रा भंडार का सीधा संबंध है।
हिन्द महासागर में रूस की मजबूत होगी पैठ .
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व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) पर पुतिन और मोदी की मुहर ने सम्पूर्ण इंडो पैसिफिक क्षेत्र की भू सामरिक महत्व और "सिक्योरिटी आर्किटेक्चर" में आमूल चूल परिवर्तन ला दिया है।
हिन्द महासागर के उफनते गर्म पानी पर सर्फिंग और स्कूबा डाइविंग करने की दशकों की चाह को भारत ने एक झटके में पूरा कर दिया। भारत के इस कदम से एक तीर से कई शिकार किये
पहला,इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकन प्रभुत्व को तगड़ी चुनौती दिया क्योंकि अभी तक अमेरिका इस क्षेत्र का निर्विवाद नायक समझता था और क्वाड (QUAD) की संकल्पना के जरिये भारत,अमेरिका,जापान ऑस्ट्रेलिया को लेकर आक्रमक चीनी मेरीटाइम पॉलिसी को चुनौती देने की योजना बना रहा था।
भारत इस अमेरिकी नीति पर लंबे समय तक यकीन नहीं कर सकता है क्योंकि ट्रम्प के गैर जिम्मेदार नीतियों और उनके लगातार बदलते फैसलों से हालात बिगड़ सकते हैं।
दूसरा:रूस की दशकों की चाहत को पूरा करते हुए भारत ने चीन और अमेरिका दोनो को कड़ा भू सामरिक संदेश देते हुए खुद को सुरक्षित किया और चीन अमेरिका के बीच उपजे तनाव और असुरक्षा के सुर में रूसी काउंटर बैलेन्स का भरोसा दिलाया । अगर मॉस्को के नजरिये इस क्षेत्र को देखें तो यह रूस की एफ्रो एशियन( हिन्द) महासागर नीति की वापसी है। जहाँ रूस को हिन्द महासागर में प्रवेश मिलेगा तो वहीं चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की काट के रूप में भारत जापान सागर में अपनी प्रभुत्व को बरकरार रख सकेगा
, समरिक विशेषज्ञ इस भावी कदम को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के तोड़ के रूप यानी "मिरर रिस्पांस "के रूप में देखते हैं । इससे भारत की ब्लू वाटर नेवी संकल्पना को अमली जामा पहनाया जा सकेगा। अब इस क्षेत्र में सभी कार्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तीनों स्थायी सदस्यों के बीच "त्रिकोणीय रूपरेखा"पर होगा। विशेषज्ञ की माने तो, रूस ने अमेरिका की चीन केन्द्रित "पाइवोट टू एशिया" और अपनी "बैलेंसिंग चाइना" नीति को कुशलता के साथ साध लिया है।
courtesy:lowy inst.
तीसरा: भारतीय - रूसी गठजोड़ से पूरे पूर्वी तथा दक्षिण एशिया के आर्थिक और सामरिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव आएगा जहाँ भारत अपनी एक्ट ईस्ट नीति का विस्तार करते हुए "फार एक्ट ईस्ट नीति"अपना सकेगा वहीं इस क्षेत्र में रूस की पहुंच से न सिर्फ चीनी समुद्री ऐतिहासिक आतंक से त्रस्त "आसियान 10" देशों को राहत मिलेगी,एपेक और ईस्ट एशिया समिट के देशों को नए कलेवर वाले रूस से भेंट होगी,जो वर्तमान में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वक़ालत करते हुए अमेरिकी वर्चस्व को विभिन्न मोर्चों पर जमकर चुनौती दे रहा है। पुतिन के प्रो एक्टिव पैसिफिक पॉलिसी से कहीं न कहीं ट्रम्प और शिंगपिंग को परेशानी में अवश्य डालेगी पर ये दोनों ऐतिहासिक रूसी हक़ीक़त जानते हैं इसलिए ये दोनों अपनी देश अपनी दूसरी योजना पर अवश्य कार्य करेंगे।
आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से पूरे क्षेत्र के लिए "गेम चेंजर" होगा।
रूसी आर्कटिक क्षेत्र असीमित प्राकृतिक खनिज,पेट्रोलियम रिज़र्व,बहुमूल्य गैस रिज़र्व औऱ वानिकी संपदाओं से परिपूर्ण है जो जापान सागर,पूर्वी चीन सागर,दक्षिणी चीन सागर,अंडमान सागर होते हुए बंगाल की खाड़ी में बसे सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया के ऊर्जा सुरक्षा के भूखे और उच्च जीडीपी की आकांक्षा लिए इन देशों को निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। वैसे भी यह क्षेत्र समुद्री पाइरेसी से मुक्त है इसलिए निर्बाध व्यापार में कोई समस्या नहीं होगी। इसके इतर रूस के इस क्षेत्र में प्रवेश से चीन और अमेरिका इस क्षेत्र में "सम्मानजनक हरकत" करेंगे और दूसरे देशों के "क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता" का ख़याल रखेंगे।
पांचवा:बीते समय की अवधारणा होने की रह पर चल पड़ी भारत जापान की साझी एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)को पुनर्जीवन मिलेगा चूंकि रूस जापान के रिश्ते बेहतर हो रहे है और वे 1905 ,क्यूराइल,सखलिन से इतर देखने की ओर अग्रसर है जिसे हम पुतिन-अबे को हालिया सम्पन्न व्लादिवोस्तक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम की बैठक में देख चुके है। दरअसल एएजीसी की संकल्पना चीन के ओबीओआर और बीआरआई नीति को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से 2017 में अहमदाबाद में जापान और भारत की संयुक्त पहल थी। रूस के इस क्षेत्र में शीतयुद्धकालीन सम्पर्क व्याप्त रहे है इसलिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ उसे अपने सम्बन्धो को "री सेट"करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)
भारत के लिए चुनौती।
भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर,जिसका विस्तार एशिया से अफ्रीका तक है, को ज़ोन ऑफ पीस घोषित कर चुका है, और क्षेत्रीय सुरक्षा आर्किटेक्चर को कॉमन,कॉम्प्रिहेंसिव,कोऑपरेटिव और सस्टेनेबल,नियम आबद्ध ,पीसफुल,क्षेत्रीय अखंडता को सम्मान देते हुए ,निर्बाध और मुक्त नौवहन पर विश्वास करता है। रूस के आने से इंडो पैसिफिक क्षेत्र में नौसिनिक हलचलों में इज़ाफ़ा तो अवश्य होगा लेकिन चीनी नौसैनिक आक्रमकता में कमी आएगी क्योंकि आज की बदली हुई परिस्थिति में चीन किसी भी मसले पर रूस के साथ किसी तरह का टकराव मोल नहीं लेना चाहेगा और जिसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा.
बदले हुए हालात में चीन अपनी ग्रेट पावर डिप्लोमेसी में तब्दीली लाते हुए संभवतः अपनी चिरपरिचित चाइनीज भू सामरिक के अपने तीन पिलर पर अपना कार्य और गंभीरता के साथ शुरु करेगा,जो निम्नलिखित है ।
1.सिक्युरीटाइजेशन ऑफ सॉवरेनिटी,नेशनल इंट्रेस्ट एंड इंटरनेशनल नॉर्म मेकिंग
2.इफेक्टिव मैनेजमेंट ऑफ ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ पावर।
3 विनिंग ओवर फॉलोवर स्टेबल एंड पीसफुल एनवायरनमेंट.
भारत को चाहिए कि बदले हुए हालात में भी अपनी हिन्द महासागर की नीति पर कठोरता से अमल करे,और आक्रमक चीनी चाल का मुकाबला करने को सदैव तैयार रहे क्योंकि अगर चीन समुद्र में शांत होगा तो इसका यह कतई अर्थ नहीं कि वह भूमि और वायु में भी शांत हो,भारत को चीन के साथ आर्थिक,पर्यावरणीय,और व्यापारिक मोर्चों पर उसकी कुटिल रणनीति पर खासा चौकन्ना रहने की जरूरत है,खासकर अपने पर्यावरणीय दृष्टि से सुभेद्य और आपदा आसन्न क्षेत्र पर।
रूस के साथ सम्बन्धों को और मजबूत करे भारत.
हिन्द महासागर क्षेत्र में और स्थिरता और स्थायित्व लाने के लिए भारत को रूस के साथ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) जैसे मिलिट्री लॉजस्टिक्स समझौते के अंजाम देना चाहिए,इस तरह के समझौतों में दोनों देश एक दूसरे की "सैन्य संस्थाओं/संस्थानों और बेस,पोर्ट आदि का सुगमतापूर्वक इस्तेमाल करते है।भारत, अमेरिका और फ्रांस के साथ इस तरह के समझौते को अमली जामा पहना चुका है।
रूस के साथ इस तरह के समझौते से भारत और रूस के संबंधों में प्रगाढ़ता ही आएगी और दबे स्वर में ही सही रूसी शिकायत कि "भारत का लागातार झुकाव अमेरिका की तरफ हो रहा है" इस तरह के समझौते से रूसी शिकायत का प्रभावी समाधान किया जा सकेगा।
भारत को रूस की शिकायतें अगर कोई है तो उसे बेहद गंभीरता से निपटारा करना होगा,जब आप रूस को अपना अभिन्न(integral) मित्र बताते हैं तो "किसी तरह की शिकायतों" की कोई गुंजाईश नहीं होनी चाहिए।
बदलते हुए दौर में पाकिस्तान के साथ रूस का साथ किसी रूप में भारत के लिए "अच्छा नहीं " है, विगत तीन सालों की घटना पर गौर करें तो 2016 में रूस-पाकिस्तान के बीच साझा पहला सैन्य अभ्यास हुआ ,मिलिट्री तकनीकी समझौता को 2017 में मूर्त रूप दिया गया जबकि 2018 में नौसैनिक सयोग समझौता की पुष्टि हुई. 2014 से 2018 प्राप्त आंकड़ों पर गौर किया जाय तो रूस पाकिस्तान का तीसरा बड़ा पारम्परिक सैन्य हार्डवेयर निर्यातक बना जो पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का छह फीसद है ।
भारत चाहिए की रूसी सहयोग को और बेहतर करे तथा बदलते सुरक्षा परिदृश्य और अफगानिस्तान में अमेरिकी ढुलमुल रैवये के बीच भी रूस पर अपना नैसर्गिक अधिकार जताते हुए पाकिस्तान फैक्टर को जड़ से समाप्त करे।
भारत के लिए रूस उन चंद देशों में शामिल है जिसके साथ भारत के त्रिस्तरीय सैन्य अभ्यास, आण्विक त्रिस्कन्द और अंतरिक्ष सहयोग, हाई एन्ड कटिंग एज तकनीक क्षेत्र में भी बेहतरीन संबंध हैं।
भारत औऱ रूस के द्विपक्षीय संबंधों को किसी परिभाषा की दरकार नहीं है,ये समय के साथ साथ और घनिष्ठ और आत्मीय होते जा रहे है। तभी तो प्रधानमंत्री ने इईएफ में कहा कि
"Indo-Russia ties based on the principles of "rules-based order, sovereignty, respect for territorial integrity and is against engaging in the internal matters of other countries".
बीते साल के 27 जनवरी 2018 को राष्ट्रपति पुतिन, जोसफ स्टालिन के बाद सबसे लम्बे समय तक रूस पर शासन वाले राष्ट्राध्यक्ष बन गए हैं।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी के भारतीय शासन को देखा,समझा और महसूस किया है और मोदी जो पुतिन को अपना परम और अभिन्न मित्र मानते है और उनकी पर्सनल केमिस्ट्री किसी से छिपी नहीं है।
मोदी का मास्टर स्ट्रोक और पुतिन का साथ
भारत के सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) महत्ता को देखते हुए विशेषज्ञ इसे "इंडो रशियन मेरीटाइम सिल्क रोड " और "आर्कटिक टू इंडियन ओशन" कहते हैं इसके जरिये भारत "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन पैट्रॉल"के जरिये दक्षिणी चीन सागर में मजबूती के अपनी उपस्थिति दर्शायेगा इसके साथ भारत चीन के पूर्वी तट पर अपनी नौसिनिक ताकत में इज़ाफ़ा कर सकेगा,जो अभी तक संभव नही हो पा रहा था।
चीन, रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दारोमदार रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के ऊर्जा बाहुल्य क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर लम्बे समय से गड़ी है और वह इन क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है, इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन को चिंतित करती रही है।अंतर्राष्ट्रीय राजीनति की बिसात पर पुतिन खुद मंझे हुए खिलाडी है वे चीन की सभी चालों से वाकिफ और उसके आसन्न चालों के प्रति चौकन्ने है।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति सबसे निर्मम होती है राष्ट्र हित के सामने सभी हित बेमानी होती है और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इस तथ्य को पुतिन से बेहतर शायद ही कोई नेता समझता हो।
मौजूद दौर में रूस चीन की गठजोड़ वक़्त का तकाज़ा है जिसे पुतिन भली भांति समझते हैं और वे आसन्न चीनी पैंतरे और खतरे प्रति सावधान दिखते हैं।
इसी कड़ी में भारत के साथ चेन्नई व्लादिवोस्तक मेरीटाइम कॉरिडोर,जापान के साथ अपने सम्बन्ध सुधारना ,चीन के साथ सीमा विवाद वाले सभी देशों के साथ रूस के बेहतर सम्बन्ध। प्रिमकोव ट्राइंगल RIC (रूस भारत और चीन) के बाद अब हालिया
पुतिन ट्राइंगल RIV(रसिया इंडिया,और वियतनाम)की संकल्पना और उसे मूर्त रूप प्रदान करते हुए रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ साथ इस क्षेत्र में चीनी चुनौती की काट खोजना वे भली भांति जानते हैं।
भारत के इस कदम से रूस भारत के आर्थिक संबंधो नई दिशा मिलेगी वहीँ रूस के सुदूर पूर्व को एक व्यापक बाजार मिलेगा जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए लालायित सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगा. भारत, चीन से पहले ही स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड,न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझते हुए उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा।
दूसरी तरफ़ भारत के इस कदम से जहाँ चीनी आक्रामक नौसैनिक गतिविधि पर अंकुश लगने की उम्मीद जगी है वहीँ भारत, जापान के साथ "फोर लिटिल ड्रेगन" ("दक्षिण कोरिया सिंगापुर ताइवान और हांगकांग ) के साथ भारत रूस के साथ मिलकर चीनी प्रभुत्व वाले क्षेत्र में जहाँ अपनी तगड़ी उपस्थिति दर्शायेगा और चीनी स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स के जहर की प्रभावी काट को सामने रख सकेगा ।
भारत का दक्षिण कोरिया,सिंगापुर के साथ गहरे नौसैनिक संबंध है इसमे सिंगापुर का चांगी बंदरगाह को तो भारतीय नौसेना को पोर्ट ऑफ कॉल से कहीं ज्यादा इस्तेमाल करने की अनुमति है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का के देशों के साथ भारत जे विश्वनीय नौसिनिक संबंध है,चूंकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का चीनी सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन का सबसे अहम ''चॉक पॉइंट" है।यहां पर भी भारत अपनी एक्ट ईस्ट और इंडो पैसिफिक नीति के तहत मलेशिया,इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ नौसिनिक राजनय के तहत गहरे रणनीतिक सम्बन्ध बनाने में सफल रहा है। उपरोक्त तमाम देशों के साथ दक्षिणी चीनी सागर को लेकर नौसिनिक विवाद व्याप्त है
व्लादिवोस्तक: इसे रूस का सैन फ्रांसिस्को कहा जाता है। यह रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र का एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है रूसी ट्रान्स साइबेरियन रेलवे का पूर्वी और अंतिम छोर व्लादिवोस्तक जिसे "रूलर ऑफ द ईस्ट"भी कहा जाता है । यह रूस के सुदूर पूर्वी भाग और उत्तर कोरिया के उत्तर में "गोल्डन हॉर्न की खाड़ी" में यह में अवस्थित है। इसकी सीमा चीन से भी समीपता दर्शाती है।
यहां रूसी नौसेना के प्रशांत बेड़े का मुख्यालय और प्रशांत महासागर में रूस का सबसे बड़ा बन्दरगाह है।
व्लादिवोस्तक के विशाल बारहमासी बन्दरगाह ,जिसमे नौवहन औऱ व्यावसायिक मत्स्यन की भरपूर संभावनाएं विद्यमान है। व्लादिवोस्तक से चेन्नई के बीच 5600 नॉटिकल मील या 10,300 किलोमीटर की समुद्री मार्ग में दक्षिण से जापान सागर,कोरियाई प्रायद्वीप,ताइवान,फिलीपींस,दक्षिणी चीन सागर,सिंगापुर होते हुए मलक्का की खाड़ी से निकलकर बंगाल की खाड़ी के अंडमान सागर होते हुए चेन्नई तक जाता है। यह दूरी को तय करने में विशाल कन्टेनर शिप जो 20-25 नॉट प्रति घंटे की गति से चलती है उसे 10- 12 दिन लगेंगे ।
रूस की चाहत
भारत ने रूस के साथ अपनी बेहतर सामरिक समझदारी के साथ इंडो प्रशांत क्षेत्र में एक सम्मानित नौसैन्य प्रतिष्ठा प्रदान की साथ ही इस क्षेत्र में "रूस की हिंद महासागर" नीति की पुष्टि कर दी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत के साथ मिलकर "बेहद दूरदर्शितापूर्ण " कार्रवाई से जहां एक ओर बीजिंग को स्पष्ट संकेत मिला है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों को अंकुश लगाने के लिये रूसी इशारा है। हिन्द महासागर से रोमांस करने की रूसी चाहत कोई नई नहीं है,दरअसल रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी 1971 से ही लुभा रहा है,लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर वह बैकफुट पर ही रहा।
रूस,इससे पूर्व भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश के रूप पुर में उसके पहले परमाणु बिजली घर के निर्माण कर रहा है,और बांग्लादेश की "मुक्ति" में उसका निर्णायक योगदान रहा,वीसीएमसी के उसे उभरने का और अमेरिकी हेजेमनी को चुनौती देने मौका मिल रहा है,जिसे पुतिन शायद ही किसी कीमत पर छोड़ना चाहेंगे।
भारत के लिये इस मार्ग का महत्व
यह समुद्री मार्ग भारत और सुदूर पूर्वी रूस के बीच दो महत्वपूर्ण पत्तन को जोड़ेगा या यूं कहें कि यह कुडनकुलम से व्लादिवोस्तक के बीच के संबन्धों को और मजबूत करेगा,जो भारत रूस के नाभिकीय रिश्तों में और प्रगाढ़ता लाएगी। ईईएफ के मंच से भारत ने रूस की मदद से 20 नये परमाणु संयंत्र की स्थापना करने के समझौते पर हस्ताक्षर करेगा।
इस मार्ग के व्यवहारिक रूप से क्रियान्वित होने से भारत और रूस की सीधी पहुँच दक्षिण चीन सागर तक हो पायेगी जो अभी तक नहीं है।
इंडो प्रशान्त की संकल्पना में दक्षिणी चीन सागर खासा महत्व रखती है। इस क्षेत्र में रूसी -भारतीय गठजोड़ से चीन व्यवहारिक रूपसे शांत तो नहीं पर शांत होने का दिखावा जरूर करेगा,जिसका इंतज़ार अमेरिका सहित कई देशों को है।
भारत रूस और वियतनाम के संभावित त्रिपक्षीय धुरी से चीन कहीं न कहीं रक्षात्मक मुद्रा में मजबूरी में रहेगा क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भूखे चीन को रूस अबाध ऊर्जा सुरक्षा मुहैय्या कराता है।
व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) कहीं न कहीं शी जिनपिंग की ग्रेट चाइनीज ड्रीम के कहे जाने वाले ट्रिलियन डॉलर वाली वन बेल्ट वन रोड(ओबीओआर) के तहत चाइनीज मेरीटाइम सिल्क रूट(एमएसआर) के कॉउंटरबैलेंस के रूप में देखा जा रहा है,जहां चीन की एमएसआर नीति का प्रमुख उद्देश्य ढांचागत और अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के जरिये चीनी प्रभुत्व को बढ़ावा और एशियाई अफ्रीकी मेरीटाइम मार्ग पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करना है।
व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) जो दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरेगा, यह प्राकृतिक खनिज संपदा और ऊर्जा के असीमित संभावना के दोहन का क्षेत्र है। इस क्षेत्र पर वैश्विक मंचो के इतर चीन अपना "ऐतिहासिक दावा " बताते हुए संपूर्ण दक्षिणी चीन सागर को अपना हिस्सा बताता है।
वर्तमान अंतरराष्ट्रीय भूराजनीतिक परिदृश्य में यह क्षेत्र चीन के साथ समुद्री सीमा साझा करने वाले देशों के साथ अनकहे शीत युद्ध का अखाड़ा बन चुका है। वियतनाम,फिलीपींस,ब्रूनेई और ताइवान के साथ चीन की झड़प की खबरें सामान्य होती जा रही है। चीन के लिए यह सागर उसकी निर्बाध ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन(एसएलओसी) है।
ये झड़पें अमेरिकी नौसेना को इस क्षेत्र में ओपन सी पॉलिसी और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन(एफओएन) के बहाने दक्षिणी चीन सागर में अपने पैर पसारने का मौका दे रही है।
क्यों इतना महत्वपूर्ण है साउथ चाइना सी.
सेन्टर फ़ॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज(सीएसआईएस) के एक अध्ययन के मुताबिक
यह विश्व के सबसे व्यस्ततम वाणिज्यिक मेरी टाइम कॉरीडोर है। इस मार्ग के जरिये विश्वव्यापी समुद्री व्यापार का तक़रीबन तीस फीसद हिस्सा गुजरता है।
सन 2016 में इस मार्ग से चीन के समुद्री व्यापार का 64 फीसद ($1.47 ट्रिलियन),जापान का 42 फीसद($242 बिलियन)औरअमेरिका का 14प्रतिशत ($208बिलियन), दक्षिण-कोरिया($423बिलियन) इंडोनेशिया($239बिलियन) हिस्सा दक्षिण चीन सागर के अहाते से गुजरा।
जबकि कुल व्यापार मूल्य की बात किया जाय तो इस क्षेत्र लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का व्यापार हुआ,जो विश्वव्यापी व्यापार का कुल 21 फीसद है।
जैवविविधता से परिपूर्ण दक्षिणी चीन सागर।
"कोरल त्रिभुज " के भाग के नाम से जाने वाला यह क्षेत्र समुद्री जैवविविधता का विश्व में सबसे सम्पन्न क्षेत्र है।यह क्षेत्र उच्च मूल्य पर प्राप्त होने वाली और पर्याप्त न्यूट्रिशन युक्त समुद्री मछलियां जैसे स्पेनिश मॉक्रेल,पैसिफिक कॉड,जायंट ग्रॉउपर और टूना जैसी मछलियों का प्राकृतिक हैचिंग,ब्रीडिंग और कैचिंग ग्राउंड है।अनुवांशिक और जैव भौतिक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ो से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र के स्पार्टली द्वीपसमूह में विस्तृत कोरल रीफ मत्स्यन के लिए प्राकृतिक रूप से "बायो कनेक्टिविटी"प्रदान करता है।
इससे इस क्षेत्र के मत्स्यन,रोजगार,आय,पोषण,खाद्य सुरक्षा,और विदेशी मुद्रा भंडार का सीधा संबंध है।
हिन्द महासागर में रूस की मजबूत होगी पैठ .
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व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) पर पुतिन और मोदी की मुहर ने सम्पूर्ण इंडो पैसिफिक क्षेत्र की भू सामरिक महत्व और "सिक्योरिटी आर्किटेक्चर" में आमूल चूल परिवर्तन ला दिया है।
हिन्द महासागर के उफनते गर्म पानी पर सर्फिंग और स्कूबा डाइविंग करने की दशकों की चाह को भारत ने एक झटके में पूरा कर दिया। भारत के इस कदम से एक तीर से कई शिकार किये
पहला,इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकन प्रभुत्व को तगड़ी चुनौती दिया क्योंकि अभी तक अमेरिका इस क्षेत्र का निर्विवाद नायक समझता था और क्वाड (QUAD) की संकल्पना के जरिये भारत,अमेरिका,जापान ऑस्ट्रेलिया को लेकर आक्रमक चीनी मेरीटाइम पॉलिसी को चुनौती देने की योजना बना रहा था।
भारत इस अमेरिकी नीति पर लंबे समय तक यकीन नहीं कर सकता है क्योंकि ट्रम्प के गैर जिम्मेदार नीतियों और उनके लगातार बदलते फैसलों से हालात बिगड़ सकते हैं।
दूसरा:रूस की दशकों की चाहत को पूरा करते हुए भारत ने चीन और अमेरिका दोनो को कड़ा भू सामरिक संदेश देते हुए खुद को सुरक्षित किया और चीन अमेरिका के बीच उपजे तनाव और असुरक्षा के सुर में रूसी काउंटर बैलेन्स का भरोसा दिलाया । अगर मॉस्को के नजरिये इस क्षेत्र को देखें तो यह रूस की एफ्रो एशियन( हिन्द) महासागर नीति की वापसी है। जहाँ रूस को हिन्द महासागर में प्रवेश मिलेगा तो वहीं चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की काट के रूप में भारत जापान सागर में अपनी प्रभुत्व को बरकरार रख सकेगा
, समरिक विशेषज्ञ इस भावी कदम को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के तोड़ के रूप यानी "मिरर रिस्पांस "के रूप में देखते हैं । इससे भारत की ब्लू वाटर नेवी संकल्पना को अमली जामा पहनाया जा सकेगा। अब इस क्षेत्र में सभी कार्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तीनों स्थायी सदस्यों के बीच "त्रिकोणीय रूपरेखा"पर होगा। विशेषज्ञ की माने तो, रूस ने अमेरिका की चीन केन्द्रित "पाइवोट टू एशिया" और अपनी "बैलेंसिंग चाइना" नीति को कुशलता के साथ साध लिया है।
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तीसरा: भारतीय - रूसी गठजोड़ से पूरे पूर्वी तथा दक्षिण एशिया के आर्थिक और सामरिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव आएगा जहाँ भारत अपनी एक्ट ईस्ट नीति का विस्तार करते हुए "फार एक्ट ईस्ट नीति"अपना सकेगा वहीं इस क्षेत्र में रूस की पहुंच से न सिर्फ चीनी समुद्री ऐतिहासिक आतंक से त्रस्त "आसियान 10" देशों को राहत मिलेगी,एपेक और ईस्ट एशिया समिट के देशों को नए कलेवर वाले रूस से भेंट होगी,जो वर्तमान में बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वक़ालत करते हुए अमेरिकी वर्चस्व को विभिन्न मोर्चों पर जमकर चुनौती दे रहा है। पुतिन के प्रो एक्टिव पैसिफिक पॉलिसी से कहीं न कहीं ट्रम्प और शिंगपिंग को परेशानी में अवश्य डालेगी पर ये दोनों ऐतिहासिक रूसी हक़ीक़त जानते हैं इसलिए ये दोनों अपनी देश अपनी दूसरी योजना पर अवश्य कार्य करेंगे।
चौथा: एक दूरदर्शी दृष्टिकोण से इस परियोजना को देखा जाय तो हम पाते हैं कि इससे सुदूर बर्फ से जमे आर्कटिक महासागर का गर्म हिन्द महासागर का मिलन होगा जो न केवल सामरिक
रूसी आर्कटिक क्षेत्र असीमित प्राकृतिक खनिज,पेट्रोलियम रिज़र्व,बहुमूल्य गैस रिज़र्व औऱ वानिकी संपदाओं से परिपूर्ण है जो जापान सागर,पूर्वी चीन सागर,दक्षिणी चीन सागर,अंडमान सागर होते हुए बंगाल की खाड़ी में बसे सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया के ऊर्जा सुरक्षा के भूखे और उच्च जीडीपी की आकांक्षा लिए इन देशों को निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। वैसे भी यह क्षेत्र समुद्री पाइरेसी से मुक्त है इसलिए निर्बाध व्यापार में कोई समस्या नहीं होगी। इसके इतर रूस के इस क्षेत्र में प्रवेश से चीन और अमेरिका इस क्षेत्र में "सम्मानजनक हरकत" करेंगे और दूसरे देशों के "क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता" का ख़याल रखेंगे।
पांचवा:बीते समय की अवधारणा होने की रह पर चल पड़ी भारत जापान की साझी एशिया अफ्रीका ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)को पुनर्जीवन मिलेगा चूंकि रूस जापान के रिश्ते बेहतर हो रहे है और वे 1905 ,क्यूराइल,सखलिन से इतर देखने की ओर अग्रसर है जिसे हम पुतिन-अबे को हालिया सम्पन्न व्लादिवोस्तक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम की बैठक में देख चुके है। दरअसल एएजीसी की संकल्पना चीन के ओबीओआर और बीआरआई नीति को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से 2017 में अहमदाबाद में जापान और भारत की संयुक्त पहल थी। रूस के इस क्षेत्र में शीतयुद्धकालीन सम्पर्क व्याप्त रहे है इसलिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ उसे अपने सम्बन्धो को "री सेट"करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।
भारत के लिए चुनौती।
भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर,जिसका विस्तार एशिया से अफ्रीका तक है, को ज़ोन ऑफ पीस घोषित कर चुका है, और क्षेत्रीय सुरक्षा आर्किटेक्चर को कॉमन,कॉम्प्रिहेंसिव,कोऑपरेटिव और सस्टेनेबल,नियम आबद्ध ,पीसफुल,क्षेत्रीय अखंडता को सम्मान देते हुए ,निर्बाध और मुक्त नौवहन पर विश्वास करता है। रूस के आने से इंडो पैसिफिक क्षेत्र में नौसिनिक हलचलों में इज़ाफ़ा तो अवश्य होगा लेकिन चीनी नौसैनिक आक्रमकता में कमी आएगी क्योंकि आज की बदली हुई परिस्थिति में चीन किसी भी मसले पर रूस के साथ किसी तरह का टकराव मोल नहीं लेना चाहेगा और जिसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा.
बदले हुए हालात में चीन अपनी ग्रेट पावर डिप्लोमेसी में तब्दीली लाते हुए संभवतः अपनी चिरपरिचित चाइनीज भू सामरिक के अपने तीन पिलर पर अपना कार्य और गंभीरता के साथ शुरु करेगा,जो निम्नलिखित है ।
1.सिक्युरीटाइजेशन ऑफ सॉवरेनिटी,नेशनल इंट्रेस्ट एंड इंटरनेशनल नॉर्म मेकिंग
2.इफेक्टिव मैनेजमेंट ऑफ ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ पावर।
3 विनिंग ओवर फॉलोवर स्टेबल एंड पीसफुल एनवायरनमेंट.
भारत को चाहिए कि बदले हुए हालात में भी अपनी हिन्द महासागर की नीति पर कठोरता से अमल करे,और आक्रमक चीनी चाल का मुकाबला करने को सदैव तैयार रहे क्योंकि अगर चीन समुद्र में शांत होगा तो इसका यह कतई अर्थ नहीं कि वह भूमि और वायु में भी शांत हो,भारत को चीन के साथ आर्थिक,पर्यावरणीय,और व्यापारिक मोर्चों पर उसकी कुटिल रणनीति पर खासा चौकन्ना रहने की जरूरत है,खासकर अपने पर्यावरणीय दृष्टि से सुभेद्य और आपदा आसन्न क्षेत्र पर।
रूस के साथ सम्बन्धों को और मजबूत करे भारत.
हिन्द महासागर क्षेत्र में और स्थिरता और स्थायित्व लाने के लिए भारत को रूस के साथ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) जैसे मिलिट्री लॉजस्टिक्स समझौते के अंजाम देना चाहिए,इस तरह के समझौतों में दोनों देश एक दूसरे की "सैन्य संस्थाओं/संस्थानों और बेस,पोर्ट आदि का सुगमतापूर्वक इस्तेमाल करते है।भारत, अमेरिका और फ्रांस के साथ इस तरह के समझौते को अमली जामा पहना चुका है।
रूस के साथ इस तरह के समझौते से भारत और रूस के संबंधों में प्रगाढ़ता ही आएगी और दबे स्वर में ही सही रूसी शिकायत कि "भारत का लागातार झुकाव अमेरिका की तरफ हो रहा है" इस तरह के समझौते से रूसी शिकायत का प्रभावी समाधान किया जा सकेगा।
भारत को रूस की शिकायतें अगर कोई है तो उसे बेहद गंभीरता से निपटारा करना होगा,जब आप रूस को अपना अभिन्न(integral) मित्र बताते हैं तो "किसी तरह की शिकायतों" की कोई गुंजाईश नहीं होनी चाहिए।
बदलते हुए दौर में पाकिस्तान के साथ रूस का साथ किसी रूप में भारत के लिए "अच्छा नहीं " है, विगत तीन सालों की घटना पर गौर करें तो 2016 में रूस-पाकिस्तान के बीच साझा पहला सैन्य अभ्यास हुआ ,मिलिट्री तकनीकी समझौता को 2017 में मूर्त रूप दिया गया जबकि 2018 में नौसैनिक सयोग समझौता की पुष्टि हुई. 2014 से 2018 प्राप्त आंकड़ों पर गौर किया जाय तो रूस पाकिस्तान का तीसरा बड़ा पारम्परिक सैन्य हार्डवेयर निर्यातक बना जो पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का छह फीसद है ।
भारत चाहिए की रूसी सहयोग को और बेहतर करे तथा बदलते सुरक्षा परिदृश्य और अफगानिस्तान में अमेरिकी ढुलमुल रैवये के बीच भी रूस पर अपना नैसर्गिक अधिकार जताते हुए पाकिस्तान फैक्टर को जड़ से समाप्त करे।
भारत के लिए रूस उन चंद देशों में शामिल है जिसके साथ भारत के त्रिस्तरीय सैन्य अभ्यास, आण्विक त्रिस्कन्द और अंतरिक्ष सहयोग, हाई एन्ड कटिंग एज तकनीक क्षेत्र में भी बेहतरीन संबंध हैं।
भारत औऱ रूस के द्विपक्षीय संबंधों को किसी परिभाषा की दरकार नहीं है,ये समय के साथ साथ और घनिष्ठ और आत्मीय होते जा रहे है। तभी तो प्रधानमंत्री ने इईएफ में कहा कि
"Indo-Russia ties based on the principles of "rules-based order, sovereignty, respect for territorial integrity and is against engaging in the internal matters of other countries".
बीते साल के 27 जनवरी 2018 को राष्ट्रपति पुतिन, जोसफ स्टालिन के बाद सबसे लम्बे समय तक रूस पर शासन वाले राष्ट्राध्यक्ष बन गए हैं।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी के भारतीय शासन को देखा,समझा और महसूस किया है और मोदी जो पुतिन को अपना परम और अभिन्न मित्र मानते है और उनकी पर्सनल केमिस्ट्री किसी से छिपी नहीं है।
मोदी का मास्टर स्ट्रोक और पुतिन का साथ
भारत के सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) महत्ता को देखते हुए विशेषज्ञ इसे "इंडो रशियन मेरीटाइम सिल्क रोड " और "आर्कटिक टू इंडियन ओशन" कहते हैं इसके जरिये भारत "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन पैट्रॉल"के जरिये दक्षिणी चीन सागर में मजबूती के अपनी उपस्थिति दर्शायेगा इसके साथ भारत चीन के पूर्वी तट पर अपनी नौसिनिक ताकत में इज़ाफ़ा कर सकेगा,जो अभी तक संभव नही हो पा रहा था।
चीन, रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दारोमदार रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के ऊर्जा बाहुल्य क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर लम्बे समय से गड़ी है और वह इन क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है, इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन को चिंतित करती रही है।अंतर्राष्ट्रीय राजीनति की बिसात पर पुतिन खुद मंझे हुए खिलाडी है वे चीन की सभी चालों से वाकिफ और उसके आसन्न चालों के प्रति चौकन्ने है।
अंतर्राष्ट्रीय राजनीति सबसे निर्मम होती है राष्ट्र हित के सामने सभी हित बेमानी होती है और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में इस तथ्य को पुतिन से बेहतर शायद ही कोई नेता समझता हो।
मौजूद दौर में रूस चीन की गठजोड़ वक़्त का तकाज़ा है जिसे पुतिन भली भांति समझते हैं और वे आसन्न चीनी पैंतरे और खतरे प्रति सावधान दिखते हैं।
इसी कड़ी में भारत के साथ चेन्नई व्लादिवोस्तक मेरीटाइम कॉरिडोर,जापान के साथ अपने सम्बन्ध सुधारना ,चीन के साथ सीमा विवाद वाले सभी देशों के साथ रूस के बेहतर सम्बन्ध। प्रिमकोव ट्राइंगल RIC (रूस भारत और चीन) के बाद अब हालिया
पुतिन ट्राइंगल RIV(रसिया इंडिया,और वियतनाम)की संकल्पना और उसे मूर्त रूप प्रदान करते हुए रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ साथ इस क्षेत्र में चीनी चुनौती की काट खोजना वे भली भांति जानते हैं।








