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Wednesday, July 31, 2019

चीन की रक्षा श्वेत पत्र 2019 और भारत पर नौसैन्य प्रभाव।



चीन ने हालिया सुरक्षा पर जारी अपने नवीनतम श्वेत पत्र "नए युग में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा" शीर्षक में स्पष्ट किया है कि चीन विदेशों में अब और भी सैन्य अड्डे बनाएगा,दक्षिणी चीन सागर, नाइन डैश लाइन, स्ट्रेट ऑफ मलक्का,बंगाल की खाड़ी और कोको द्वीपसमूह,हम्बनटोटा से मालदीव,अदन की खाड़ी से हॉर्न ऑफ अफ्रीका के जिबूती तक सक्रिय चीनी नौसेना की  हिन्द महासागर की प्रभाव वाले इस सम्पूर्ण क्षेत्र में चीनी नौसैनिक उपस्थिति निश्चित रूप से भारत के लिए चिंताजनक है।

कई विश्लेषक इसे  हाल ही में प्रकाशित अमेरिका  रक्षा रिपोर्ट के जबाब के रूप में देख रहे हैं,चीन अपने रिपोर्ट में अमेरिका को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जम कर आलोचना करते हुए नजर आता है। इस श्वेत पत्र में  अमेरिका परमाणु हथियार नियंत्रण और आण्विक आधुनिकीकरण के मसले पर असहयोगी रवैया अपना रहा है । चीन की बन्द व्यवस्था में इस दस्तावेज का अत्यधिक महत्व है, दस्तावेज चीन की  "पीसफुल राइज " की नीति से कहीं आगे निकलता दिख रहा है,यह स्पष्ट तौर पर पूरे यूरेशियन क्षेत्र में नई  "होड़" को जन्म  देगा।

भारत पर  नौसैन्य प्रभाव
डोक ला(डोकलाम) तनाव के इस दस्तावेज में जहां एकतरफ चीन पूरी तरह भारत के साथ संयमित व्यवहार दर्शा रहा है पर दक्षिणी चीन सागर,और हिन्द प्रशांत क्षेत्र के साथ साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल(LAC) और मैकमोहन रेखा पर उसकी तैयारियां उपरोक्त से मेल नहीं खा रही है। दस्तावेज कहता है कि सीमा पर शांति और स्थिरता बढ़ाने के प्रयास और प्रक्रिया तेज की जाएंगी,   एक नजर चीनी नौ सेना की तैयारियों पर।
  
रिपोर्ट कहती है कि टाइप 052C पोत और  052D  या लुयांग श्रेणी के विध्वंसक पोत जिसे चीनी नौसेना के सतही बेड़े की जान माना जाता है इस बेड़े को और उन्नयन किया जा रहा है,इसी कड़ी में 154मीटर लंबे और 7500टन विस्थापन क्षमता वाले टाइप 052D  के कुल 11 उन्नत विध्वंसक पोतों  को नौसेना में शामिल करना,जिसमें नौ  ( 09) इक्विपमेंट फिटिंग और समुद्री परीक्षण के दौर से गुजर रही है।

ये विध्वंसक पोत एडवांस्ड इलेक्ट्रानिकली स्कैन्ड ऐरे सिस्टम(AESA) और 64 वर्टीकल लांच सिस्टम(VLS) से लैस है। साथ ही आधुनिक वायु सुरक्षा प्रणाली, क्षमतावान रडार सिस्टम,जो  आने वाले " इंटरफेरेंस"से उत्पन्न  नॉइज से इन प्रणालियों को सुरक्षित रखता है,साथ ही  कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम को बेहतर बनाता है। 
दस्तावेज में साफ तौर पर कहा गया है कि चीन अपने आर्थिक,ऊर्जा और सामरिक हितों की रक्षा और सुरक्षा के लिये विदेशों में भी और सैन्य ठिकाने का निर्माण करेगा।

अगर इनकी तैयारियों को कुछ महीने पीछे जाकर कुछ असामान्य बातों पर गौर करें तो स्थिति साफ साफ दिखने लगती है। विगत कुछ महीनों से हिन्द महासागर क्षेत्र में चीनी पनडुब्बियों की आवाजाही पर खासी "कमी" देखने को मिली है,जिसे ऐसा माना जा रहा है कि  बीजिंग ने अपना आक्रमक हिन्द महासागर अभियान को रोक दिया है।ऐसा 2018 के वुहान सम्मेलन के बाद से हो रहा है,जिसके बाद भारत चीन एक "कॉलोबोरेटिव पाथ" पर चलते दिखाई दे रहे है,जहां भारत भी दक्षिणी चीन सागर मसले पर तथाकथित "मौन" साधे हुए है तो बदले में चीन भी हिंदमहासागर में अपनी गतिविधियों को तत्काल विराम दे रहा है।
इस बात पर बल और मिलता है जब बीते अप्रैल में  चीन के क्विंगदाओ में आयोजित चीनी नौसेना के फ्लीट रिव्यु में  जिसने भारतीय नौसैनिक पोतों  भी शरीक होते हैं।

वर्तमान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र और हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती चीनी चुनौती और "स्ट्रिंग आफ पर्ल" के वे मोती जो चीनी मांझे में पिरोये हुए है और ग्वादर से कॉक्सबाजार तक भारत के गले को लगातार कस रहे है,कभी ढील दी रहे है। विवाद जमीन पर होता है असर समुद्र के भीतर होता है। इन विपरीत परिस्थितियों में आज भारत को जरूरत है कि हिंदमहासागर की "सुरक्षा अर्चिटेक्टर "को और प्रभावी रूप से चाक चौबंद करे।



 इसके लिए भारत को अपने विस्तृत तट से लेकर अपने "अनन्य आर्थिक क्षेत्र "की सुरक्षा सुनिश्चित करने की फौरी आवश्यकता है।
नए नेवल और लिस्निंग पोस्ट, आधुनिक फ़ास्ट अटैक इंटरसेप्टर और गहरे समुद्र में पनडुब्बियों की गश्त पर आक्रामकता के साथ पेश आना होगा,इसके अतिरिक्त  अधूरे और लम्बित पड़े तमाम। नौसैनिक प्रोजेक्ट में और तेजी लाने की आवश्यकता है, जरूरत  पुराने हो चुके आठ कसम चलाऊ तकनीकी उपकरण को "फेज आउट" करते हुए अत्यधुनिक सोनार और स्टील्थ खोजी प्रणाली विकसित करें/खरीद करें। 

नौसेना को आधुनिक और कटिंग एज युक्त  तकनीक और उत्कृष्ट मानव बल चाहिए तभी यह बेहतरीन परिणाम देती है। भारत को एन्टी सबमरीन वारफेयर सिस्टम को और अत्यधुनिक बनाते हुए दुरुस्त करें,और उसमे महारथ हासिल करें।

अत्यधुनिक सोनार बीपिंग सिस्टम क्षमता को और मजबूत बनाये, नए पीढ़ी के नौसैनिक साउंड सेंसर को मरीन टोपोग्राफी के उन अनछुए जगहों पर लगाया जाए जहाँ से चीनी घुसपैठ कर सकते है,साथ ही नॉइज सिग्नेचर डिवाइस को और आधुनिक करें,पारंपरिक माइन से आगे निकलते हुए आधुनिक और बेहद धीमी से धीमी इंफ्रासोनिक साउंड को पहचानने वाले एकॉस्टिक डेटोनॉटिंग माइंस बिछाएं जाएं। 

आज जरुरत न सिर्फ़ मरीन टोपोग्राफी  पर महारथ हासिल करने से है बल्कि  आपको पी 81आई जैसे और एन्टी सबमरीन वारफेयर में महारथ हासिल टोही विमान और कमोव सीरीज के हेलीकॉप्टर की  त्वरित खरीद और तैनाती करने की है।  इन सब  उपायों के अतिरिक्त गहन गश्ती से ही भारतीय सामुद्रिक हित सुरक्षित हो सकेंगे। चीनी नौसेना ने आज तक आमने सामने की लड़ाई नहीं किया है ,जो कुछ किया है,अभ्यास किया है,भारतीय नौसेना को यहां "लीड और एज"मिलता है जो हर परिस्थिति में हमे बुलन्दी तक पहुंचाएगा लेकिन इसके किये शांति काल मे भी "काफी पसीना बहाने की जरूरत है,और रहेगी"

इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती साख से चीन खासा चिंतित है इसलिये भारतीय नौसैन्य तैयारी पर इस दस्तावेज पैर ज्यादा जोर नहीं डाला गया है।

भारत की तैयारी पर नजर डालें तो  भारत ने इस क्षेत्र में  सामरिक रूप से महत्वपूर्ण और  मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक इंडोनेशिया के सबांग डीप सी पोर्ट के उपयोग करने का समझौता कर चीन के "मल्लक्का डिलेमा" को और बढ़ा दिया है और ओमान के  डूक़ुम पोर्ट पर उपयोग के अधिकार को प्राप्त कर लिया है ।अमेरिका के  साथ LEOMA समझौते के बाद भारत इस क्षेत्र में अमेरिका की डिएगो गरसिया नौसैन्य अड्डा भी आधिकारिक रूप से उपयोग में ला सकता है। क्वैड के संकल्पना के साथ साथ और "पेरिस-नई दिल्ली-कैनबरा" की संकल्पना से भी चीन पर असर हुआ है।

हमें यहां चीन से बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है, हिंदमहासागर क्षेत्र में चीनी गतिविधियों में "कमी" देखने को मिली है,पर यह "पूरी तरह समाप्त " नहीं हुई है.
चीन लम्बे समय से " स्टील्थ क्षमता वाले पनडुब्बियों " के विकास में जुटा हुआ हैऔर अपने स्टील्थ पनडुब्बियों को और उन्नत बना रहा है। ऐसा हो सकता है कि ये स्टील्थ पनडुब्बी मेरे लेख लिखे जाने समय में  हिन्द महासागर के गर्भ में कहीं खूंखार "कैट फिश"की तरह सागर की तलहटी में  दम साधे अपना कार्य कर रहा हो।


क्योंकि इतिहास गवाह है कि "चीनी जो कहते हैं वे बिल्कुल नहीं करते,गाहे बगाहे ऐतिहासिक दावा करते है,अपनी गलती पर इतनी तेजी से माफी मांगते है कि "चमेलियन" शर्म से लाल और पानी पानी हो जाता है। वे  सुन ज़ू  और कन्फ्यूसियस को एक साथ मानते है, जरूरत पड़ने पर बुद्ध को सामने करते हुए मानवता की बात करते है लेकिन वे अपना मुख्य कार्य कभी नहीं भूलते । इसलिए चीन को आप महाभारत के "मारीच"प्राणियों में "चमेलियन"  की श्रेणी में रख कर उनके बारे में अपनी राय बनाये।

हिन्द महासागर क्षेत्र में "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन "और "जोन ऑफ पीस " की संकल्पना पर भारतीय नेतृत्व पूरी तरह प्रतिबद्घ है और "चोल कालीन राज्य से" हिन्द महासागर हमारा अभिन्न अंग और सांस्कृतिक विरासत रहा था,है, और इसे हर हाल में बरकरार रखना है । 
भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और  SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को गंभीरता से लेता है। जो नैसर्गिक रूप से इस क्षेत्र में सभी परिस्थितियों में 'फर्स्ट रेस्पांडर" है..

हाल ही में सम्पन्न रक्षा मंत्री की पहली विदेश यात्रा में मोज़ाम्बिक को चुना जाना इसके गम्भीरता को दर्शाता  है। अफ्रीका महाद्वीप में चीन की बढ़ती असामान्य सैन्य और अवसंरचनात्मक निवेश और उसकी "डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी " को बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में रक्षा मंत्री इस यात्रा के गहरे रणनीतिक और सामरिक  निहितार्थ हैं।

अफ्रीका के अधिकतर देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की  पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी  की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर  चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे  और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत  अपनी "कॉटन रोड अप्रोच" से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।   वर्तमान भूआर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में भारत को चीन  के साथ प्रतिस्पर्धा के बीच अफ्रीका एक अहम "डेस्टिनेशन" बन गया है।


समय के साथ इस क्षेत्र में भारत को  इन देशो के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में को आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से  चीन की ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या,सूडान,तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को  को  अपने परित्यक्त  "पीसफुल राइज"नीतियों को  इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशनआर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी  अपना प्रभाव बढ़ा रही है। भारत को  बदलते भू  रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है।


इसी बीच एक अभूतपूर्व भू राजनीतिक घटनाक्रम के अंतर्गत भारत ने म्यामांर के साथ एक रक्षा सौदे के तहत अपनी "किलो क्लास सबमरीन "आईएनएस सिंधुवीर " को म्यांमार को देने का फैसला लिया है। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम की भनक तो हाल ही भारत की यात्रा पर आए म्यामांर के उच्च रैंक के कमांडर की भारत यात्रा और यहाँ शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकात के बाद लगनी शुरू हो गई थी,क्योंकि यह कमांडर अमेरिका के "वीजा बैन"की श्रेणी में थे।


भारत  और रूस संबंधों को नया आयाम

हिन्द महासागर में चीन की लगातार बदलती नौसैन्य नीति और सुरक्षा अर्चिटेक्टर को मद्दनेजर दोनो देशो ने इस मसले पर गज़ब की साझेदारी,आपसी विश्वास और क्षेत्र की रणनीतिक और सामरिक महत्व को "आंखों ही आंखों" में समझ कर एक दूसरे को अपने सबसे भरोसेमंद और नैसर्गिक मित्र होने का परिचय दिया।मिलिट्री हार्डवेयर के मामले और किसी तीसरे देश को बेचने/सौंपने के मामले में भारत अमेरिका के साथ "सोचने "की भी जहमत नहीं कर सकता है। वहीं यह ऐसा दूसरी दफे हो रहा है जब भारत ने रूसी संघ के मिलिट्री हार्डवेयर को "रिफ़र्बिशेड"किया सबसे पहले आईएल 76( IL 76 )में इजरायली अवाक्स सिस्टम को भारत ने "माउंट" किया था।  किलो क्लास सबमरीन(पी 877)जिसे  तत्कालीन सोवियत संघ ने 1980 में भारत को बेचा था,उसे हिंदुस्तान शिपयार्ड  लिमिटेड विशाखापत्तनम ने म्यांमार के नौसेना के आवश्यकतानुसार "रिफर्बिश्ड" रेट्रोफिटिंग, रिफिटिंग,और मॉडर्ननाइज्ड" किया,और भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने इसमें नए भारतीय टॉरपीडो  "श्येना"को इस सबमरीन के लिए  बनाया। 
198 मिलियन डॉलर वाले इस लाइन ऑफ क्रेडिट के समझौते के तहत भारत म्यांमार की नौसेना को न सिर्फ सबमरीन प्रदान करेगा,बल्कि उसे क्रू मेंबर,नाविकों और अफसरों को इस सबमरीन को संचालन से जुड़ी तमाम प्रक्रिया में प्रशिक्षित करेगा। यह नई डील भारत की एक्ट ईस्ट नीति के प्रवेशद्वार माने जाने वाले म्यामांर के साथ आपसी संबंधों की दिशा में एक नए युग का शुरुआत होगा,क्योंकि चाहें चीन के साथ इसके गहरे सामरिक और आर्थिक संबंध किसी से छुपे नहीं हैं,इस परिस्थिति में म्यांमार का चीन की तरफ न देखकर भारत से सामरिक सम्बन्ध विकसित करना अपने आप मे एक नए युग सूत्रपात है,जिसे और मजबूत करने की आवश्यकता है।

चीन की नई चाल
स्ट्रिंग ऑफ पर्ल  नीति की धुंधली सफ़लता के बाद चीन ने भारत के पड़ोसी देशों की नौसेना की आधुनिकिकरण कर बीड़ा उठा लिया है।इसी कड़ी में उसने 2017 में अपने पुराने पड़ चुके बेड़े में  "मिंग क्लास' की  टाइप 035G सबमरीन को बांग्लादेश को सौंप था।  रोहिंग्या मसले को लेकर बांग्लादेश और म्यांमार का जहां "छत्तीस का आंकड़ा" है वही ये दोनों देश लंबी स्थल और समुद्री सीमा साझा करते है। चूंकि म्यांमार और बंगलादेश के पास 2017 तक सबमरीन नहीं होने की वजह से दोनों नौसेना एक ही पलड़े पर थी,लेकिन क्षेत्रीय असन्तुलन और आगे बढ़ने की मंशा में निश्चित रूप से बांग्लादेश ने म्यांमार पर मनोवैज्ञानिक नौसैन्य बढ़त हासिल कर ली थी।चीन जहां श्रीलंका और मालदीव के नौसेना को अपग्रेड करने की अपनी कुत्सित नीतियों को अमली जामा पहना रहा है औरअपने इस नीतियों से जहाँ  पूरे हिन्द महासागरीय क्षेत्र में 'मसल फ्लेक्सिबिलिटि"क्षेत्रीय नौसैन्य विषमता और हथियारों की होड़ को बढ़ावा देकर भारत के लिए नई चिंताएं उत्पन्न कर रहा है.
  
रूस की चाहत

 भारत ने रूस के साथ अपनी बेहतर सामरिक समझदारी के साथ  बांग्लादेश के मुकाबले एक सम्मानित नौसैन्य प्रतिष्ठा प्रदान की साथ ही इस क्षेत्र में "रूस की हिंदमहासागर" नीति की पुष्टि कर दी। रूसी राष्ट्रपति व्लदीमिर पुतिन की भारत के साथ मिलकर यह छोटी सी लेकिन "बेहद दूरदर्शितापूर्ण " कार्रवाई  से जहां एक ओर बीजिंग को स्पष्ट संकेत मिला है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों को अंकुश लगाने के लिये रूसी इशारा है।
रूस इससे पूर्व भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश के रूपपुर में उसके पहले परमाणु बिजली घर के निर्माण कर रहा है,और बांग्लादेश की "मुक्ति" में उसका निर्णायक योगदान रहा था। दरअसल रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी 1971 से ही लुभा रहा है,लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर वह बैकफुट पर ही रहा लेकिन उसे उभरने का मौका मिल रहा है,जिसे पुतिन किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहेंगे।

उच्च विकास दर औऱ ऊर्जा के भूूखे चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  समुद्री पाइरेसी की रोकथाम के लिये निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे

(अगली कड़ी में चीन के वायुसैनिक औऱ थल सैनिक तैयारियों पर  टिप्पणी)


Monday, July 29, 2019

रक्षामंत्री की पहली राजकीय यात्रा,वैश्विक राजनय में अफ्रीका का बढ़ता महत्व


रक्षामंत्री राजनाथ सिंह अपनी पहली विदेश यात्रा की शुरुआत भू सामरिक और भू आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दक्षिण पूर्वी अफ़्रीकी देश मोज़ाम्बिक से आगाज़ किया।

रक्षामंत्री की तीन दिवसीय राजकीय यात्रा में उनके साथ रक्षा और विदेश मंत्रालय का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के शामिल है जो आज मोज़ाम्बिक  की राजधानी मापुते पहुंचे। यहां मोज़ाम्बिक के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करेंगे और प्रवासी भारतीयों को संबोधित करेंगे।इसी यात्रा के मध्य दोनो देशो के मध्य तीन समझौतों पर भी हस्ताक्षर करेंगे।

हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम किनारे पर अवस्थित मोज़ाम्बिक को 1498 में वास्को डि गामा द्वारा खोजा गए  और 1505 में इसे पुर्तगाली औपनिवेश बना लिया गया। 1975 में इसे आज़ादी मिली ।
मोज़ाम्बिक का स्वेज नहर के शुरू होने से पहले वैश्विक समुद्री व्यापार में अहम स्थान था जो उसके मोज़ाम्बिक चैनल से होकर गुजरता था,वर्तमान में असीमित ऊर्जा स्रोतों(मुख्यतः एलएनजी और प्राकृतिक गैस है) के पता चलने और सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन ,समुद्री सुरक्षा एवं व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टि से यह वैश्विक तप्त स्थल बन चुका है।जिसकी तरफ़ ऊर्जा सुरक्षा के ललायित विश्व के तमाम देश मोज़ाम्बिक की ओर ताक रहे है।

भारत और मोज़ाम्बिक के सम्बंध सदियों से कायम है,पश्चिमी भारत के राज्यो के मोज़ाम्बिक के साथ संबंधों के प्रमाण इतिहास के पन्नो में दर्ज है जो उसके स्वतन्त्रता के साथ राजनयिक आर्थिक,राजनैतिक और सामरिक सम्बन्ध स्थापित हुए और मधुर रहे हैं।

इसी कड़ी में रक्षा मंत्री की पहली विदेश यात्रा के लिए मोज़ाम्बिक को चुना जाना दोनो देशो के रिश्तों की गर्माहट को बयां करता है। इससे पहले अप्रैल1982 में ततत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जुलाई 2016 में निवर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोज़ाम्बिक की यात्रा कर दोनों देशों के सम्बंध को नए प्रतिमान पर पहुंचाया।

इससे पहले मोज़ाम्बिक के आज़ादी के बाद  इनके सभी चार राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आ चुके है। इसकी शुरुआत सर्वप्रथम अप्रैल 1982 में राष्ट्रपति सामोरा मचैल,1988 और 2003 में जोआक्विम चिसानो, 2010 में अर्मेन्डो गएबूज़ा और बीते अगस्त 2015 में राष्ट्रपति फिलिप न्यूसी ने भारत की यात्रा की
हिन्द महासागर क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और  SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को मजबूत करते हुए  रक्षा मंत्री की  इस पहली विदेश यात्रा को जोड़ कर देखा जा रहा है। अफ्रीका में चीन की बढ़ती असामान्य सैन्य और अवसंरचनात्मक निवेश और उसकी "डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी " को बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में इस यात्रा के गहरे रणनीतिक और सामरिक निहितार्थ हैं। भारत  हिन्द महासागर क्षेत्र में नैसर्गिक रूप से"फर्स्ट रेस्पांडर" है। 

भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर क्षेत्र को "जोन ऑफ पीस "पहले ही घोषित कर चुका है और इसकी गरिमा  बरकरार रखने को प्रतिबद्ध है। इसी कड़ी में हिन्द महासागर में मोज़ाम्बिक की भौगोलिक अवस्थिति मोज़ाम्बिक बेहद खास बनाती है,इसलिए तो इसे  मलावी,ज़ाम्बिया,ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, और लेसेथो जैसे उच्चस्तरीय खनिज और अनछुए प्राकृतिक संसाधन से धनी  और भू आवेष्ठित देशों का द्वार कहा जाता है। साथ ही तंज़ानिया और दक्षिण अफ्रीका के साथ अपनी सीमा साझा करते हुए यह भू सामरिक ,सामुद्रिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम स्थान हो जाता है ।
                      (मैप स्रोत Lonely planet)

इन सभी देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। मोज़ाम्बिक के साथ बेहतर  सम्बन्ध का सीधा असर इन लैंड लॉक्ड देशो के संबंध पर पड़ेगा जो पहले से बेहतर है। मोज़ाम्बिक के साथ ये देश भी भारत से वे तमाम सुविधायें हासिल कर सकते है। भारत मोज़ाम्बिक के विस्तृत तट की चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में मोज़ाम्बिक नौसेना को भारत के तरफ से फ़ास्ट अटैक इनटरसेप्टेर पोत भेंट करेंगे

ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की  पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी  की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। चीन ने हालिया सुरक्षा पर जारी अपने नवीनतम श्वेत पत्र "नए युग में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा" शीर्षक में स्पष्ट किया है कि चीन विदेशों में अब और भी सैन्य अड्डे बनाएगा,जिबूती और अदन की खाड़ी में सक्रिय चीनी नौसेना की उपस्थिति निश्चित रूप से भारत के लिए चिंताजनक है।
वर्तमान भूआर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में मोजाम्बिक के साथ के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में को आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से  चीन की  ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या,सूडान,तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को  को  अपने परित्यक्त  "पीसफुल राइज"नीतियों को  इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशनआर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी  अपना प्रभाव बढ़ा रही है।भारत को  बदलते भू  रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है। जिसमें मोज़ाम्बिक भारत का एक बेहतर सझीदार देश बन सकता है।

अपने इस यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री क्षेत्र  भारत की भूमिका को और जवाबदेह,जिम्मेदार,सशक्त और प्रभावी भूमिका को बरकरार रखने के क्रम में  मोज़ाम्बिक के साथ तीन अहम समझौतों पर हस्ताक्षर करेंगे जिसमे 

1.अनन्य आर्थिक क्षेत्र पर निगरानी
2.व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन सूचना की साझेदारी और
3 हाईड्रोग्राफी के क्षेत्र में  समझौता शामिल हैं

इसके अतिरिक्त भारत मोज़ाम्बिक को नौसैन्य सहायता प्रदान करेगा। व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन सूचना की साझेदारी के  जरिये भारत को व्यव्यसायिक और गैर सैन्य व्यापारिक पोतों के बारे  उनकी पहचान और मूवमेंट से जुड़ी आवश्यक और जरूरत की सूचना मिल सकेगी।
इन  समझौतों के बाद जहां दोनो देशो के मध्य द्विपक्षीय संबंध मजबूत होंगे वहीं दूसरी तरफ इसके सामरिक आयाम भी नजर आएंगे । मोज़ाम्बिक के साथ इन समझौतों के साथ ही भारत चीनी हरकतों को प्रभावी रूप से मॉनिटरिंग कर सकेगा। भारत पहले भी मोज़ाम्बिक को अपने भारतीय आयात निर्यात निगम (इसीजीसी)के जरिये रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट के रूप में सहायता मुहैया कराते रहा है जो 2010 में 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था 2016 में मोज़ाम्बिक के  व्यापार और उद्योग मंत्रालय को  सूखे प्रभावित इलाकों में गेंहू खरीदने के लिए 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर के रूप में विकासात्मक सहायता दी गई जबकि   100 टन दवाएं भी इन क्षेत्रों में भेजी गई।
समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर  चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे  और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत  अपनी "कॉटन रोड अप्रोच" से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।

अफ्रीका के पश्चिमी हिन्द महासागर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से सम्पन्न है ।
वेस्टर्न इंडियन मरीन साइंस एसोसिएशन(WIOMSA)के  अनुसार इसमे कुल दस देश शामिल हैं ये हैं  सोमालिया,केन्या,तंजानिया,मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, कोमोरोस, मेडागास्कर,सेशेल्स, मॉरिशस,और रीयूनियन जो 'हॉर्न ऑफ अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका  के तट तक विस्तारित है। यहां भारत के लिए  मौका है कि वह मेरीटाइम सिक्योरिटी के क्षेत्र में व्यापक पहुंच बनाये। अफ्रीका के 54 देशों में 38 देश या तो तटीय  या फिर द्वीपीय देश है जिनकी कुल तटीय सीमा 18950 नॉटिकल मील/30,497 किलोमीटर है। अफ्रीका का लगभग 90 फीसद व्यापार समुद्री मार्ग से होता है। भारत अफ्रीका के इन देशो के साथ भारत "ब्लू इकॉनमी"  के क्षेत्र में जिम्मेदार साझेदार बनने की प्रतिबद्धता जाहिर कर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय राष्ट्रध्वज के नीले चक्र को इस "ब्लू इकोनॉमी"के रूप में जोड़ चुके हैं।भारत  के साथ इन सभी देशों के साथ सैन्य और रणनीतिक संबंध है,इसी क्रम में बीते मार्च में पुणे स्थित औंध मिलिट्री स्टेशन में मोज़ाम्बिक सहित 16 अफ्रीकी देशो ने भारत के साथ(Africa India field training  exercise) AFINDEX 19 को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था।

भारत के लिए अफ्रीका का महत्व।
भारत के लिए अफ्रीका कितना महत्वपूर्ण इसका सहज अनुमान 28 जुलाई से शुरू होने वाली राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की सप्ताह भर की तीन देशों की यात्रा  जिसमे  बेनिन,गिनी कोनाकरे और गैम्बिया कि यात्रा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मोज़ाम्बिक यात्रा के कार्यक्रम से लगाया जा सकता है।
भारत इस क्षेत्र में न सिर्फ व्यापार,सैन्य सहायता,क्षमता निर्माण ,प्रशिक्षण सहायता औऱ सुरक्षा के लिए ही मौजूद है,बल्कि भारत की जिम्मेवारी इनसे कहीं व्यापक है जिसकी एक झलक पूरी दुनिया ने बीते 15 मार्च को कैटेगरी चार स्तर के विनाशकारी  उष्णकटिबंधीय साइक्लोन "ईडाई' के कहर से पूरी तरह तबाह हुए मोज़ाम्बिक के तटीय शहर' "बेरिया"की सहायता के लिए मोज़ाम्बिक सरकार के आग्रह पर भारतीय नौसेना ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जान माल के नुकसान को सीमित किया। इस क्षेत्र से अपने प्रशिक्षण मिशन अंजाम देकर को वापस लौट रहे भारतीय नौसेना के तीन पोत  आईएनएस "सुजाता"और "शार्दूल" और भारतीय तटरक्षक के पोत "सारथी'ने फौरन पहुंचकर "मानवीय सहायता और आपदा बचाव "और "सर्च और रेस्क्यू"अभियान को पेशेवर और प्रभावी तरीके से अंजाम देते हुए माली नुकसान को काफी सीमित  किया,इस क्षेत्र में समय रहते न पहुँचने पर स्थिति पूरी तरह हाथ से निकल सकती थी। भारतीय नौसेना ने समय पर पहुंच सामान्य स्थिति बहाल करने और मोज़ाम्बिक के जनमानस में अपनी उल्लेखनीय छवि का निर्माण किया और सरकार से अपनी प्रशंसनीय भूमिका निभाने के लिए  भारत के ध्वज को शिरोधार्य रखा। इससे पहले 2015 में नई दिल्ली में आयोजित भारत अफ्रीका फोरम में इस महादेश के सभी 54 देशों ने शिरकत कर भारत के साथ अपने सुमधुर सम्बन्ध की मुहर पहले ही लगा चुके थे।