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Monday, June 10, 2019

भारत की हिन्द महासागरीय रणनीति

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल सम्भालने के महज सप्ताह भर बाद कूटनीतिक गहमागहमी की शुरुआत इस दफ़े हिन्द महासागर के गर्म होते पानी और देर से आते मानसून के बीच बीते पचास घंटो में मालदीव और श्रीलंका की अत्यधिक व्यस्तता भरी राजकीय यात्रा से हुई।
इससे पहले उन्होंने अपने पहले कार्यकाल 2014 के जून में दो भूआवेष्ठित देश हिमालयी देश भूटान और नेपाल की यात्रा से शुरू की थी।
पहले कार्यकाल में हिमालय और फिर दूसरे में हिन्द महासागरीय देशों कि यात्रा से आख़िर मोदी विश्व को क्या संकेत देना चाह रहे है ?

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भूगोल की सदैव महत्वपूर्ण भूमिका रही है,यह भूगोल ही जो 1200 से ज्यादा बेतरतीब फैले कोरल द्वीपसमूह और महज पांच लाख से कम जनसंख्या वाले मालदीव को अत्यधिक रणनीतिक महत्व प्रदान करता है।यह देश विश्व के व्यस्ततम पूर्वी पश्चिमी समुद्री नौवहन मार्ग पर अवस्थित है ,जब हम बेतरतीब फैलाव वाले आबादी रहित द्वीपों की बात करते हैं तो यहां प्रशासन चलाना टेढ़ी खीर हो सकती है लेकिन सामरिक,रणनीतिक और लॉजिस्टिक के विभिन्न दृष्टिकोण से इन कटे छंटे द्वीप समूह  बेहद महत्वपूर्ण और मुफ़ीद माने जाते है।
 भारत और श्रीलंका के  सांस्कृतिक,धार्मिक, भाषाई और विद्वता के सम्बंध करीब 2500 वर्ष पुराने है।श्रीलंका को हम यूं नही "गेटवे ऑफ एशिया" कहते है। अपनी अनूठे भौगोलिक स्थिति लिए इस देश को मोतियों को देश भी कहा जाता है।

प्रधानमंत्री की हालिया आतंकी हमलों से त्रस्त श्रीलंका की निडर और बेख़ौफ़ यात्रा ने अत्यधिक सुकुमार,और संवेदनशील उन पश्चिमी देशों के मुंह पर करारा तमाचा मारा है जिन्हें दक्षिण एशिया में थोड़ी सी हल्ला हंगामा या आतंकी घटना के बीच फौरन अपने नागरिकों को उस देश या विशेष क्षेत्र में अपने नागरिकों को न जाने की लंबी लम्बी "एडवाइजरी " जारी करता है।जिससे सम्बंधित देश की पर्यटन और सेवा क्षेत्र ख़ासा प्रभावित होता है।
प्रधानमंत्री के यात्रा की  इस सफल मेजबानी के बाद श्रीलंका ने देश मे कानून और व्यवस्था की स्थिति पर उठ रहे सारे सवाल को दरकिनार कर दिया,इस यात्रा के बाद निश्चित रूप से अन्य देश श्रीलंका पर लगाये गए अपनी" ट्रेवल एडवाइजरी"वापस लेंगे जिससे श्रीलंका के पर्यटन और सेवा क्षेत्र में उछाल आएगा।

मालदीव के ये तितर बितर द्वीप अपनी भौगोलिक स्थलाकृतियों के कारण बेहतरीन सबमरीन हाईड आउट्स हो सकते है, विशेषीकृत और उच्च सैन्य प्रयोगशाला, केमिकल बायोलॉजिकल और न्यूक्लियर हथियारों का जखीरा स्थल,विशेष बलों के सेफ हाउस और डिटेंशन सेंटर,सैटेलाइट लिसनिंग स्टेशन,लम्बी दूरी के निगरानी के लिए राडार केंद्र,रणनीतिक मौसम पूर्वानुमान राडार केंद्र, मिसाइल लांच पैड्स ,मिसाइल बैटरी और डिपो, आपातकालीन कॉलिंग ऑन पोर्ट,विशेषीकृत आसूचना केंद्र, एन्टी पायरेसी अभियान को अंजाम देने वाले विशेष बलों के ठिकाना,कोस्टल रडार सर्विलेंस सिस्टम का बेस,गुप्त और एन्ड टू एन्ड एन्क्रिप्टेड संचार के लिए समर्पित केंद्र आदि हो सकते है।
इन द्वीपों की यही खासियत चीन समेत अन्य देशों को लुभाती है जिसके लिए वे हरवक्त तत्पर दिखते हैं, आज भी करीब करीब सभी महाशक्तियों के "ओवरसीज टेरिटरी' को आज भी देखा जा सकता है,जिसका बेहतरीन उदाहरण मालदीव के समीपस्थ हिन्द महासागर में अवस्थित ब्रिटिश अमेरिकी एयरफोर्स और नेवी का बेस डिएगो गार्शिया है।

मालदीव के बिखरे हुए द्वीप और श्रीलंका के तटीय क्षेत्र दोनों देशों के पर्यटन और सेवा क्षेत्र में अहम भूमिका निभाता है तो दूसरी ओर दूसरे देशों को अपनी ठोस रणनीतिक स्थिति  बनाने में मदद करता है। चीन भी इसी कारण से मालदीव के पूर्वर्ती सरकार से कई द्वीपों पर पर्यटन विकसित करने के झांसे में खरीद चुका या सौदे को अंतिम रूप दे चुका है,अगर ऐसा हुआ तो यहां पर्यटन को छोड़कर बाकी वह सब कुछ होगा जिसकी हम कल्पना नहीं कर सकते है।
 यही हाल श्रीलंका की,कोलम्बो हम्बनटोटा और अन्य तटीय क्षेत्रों में अवसंरचनात्मक क्षेत्रों में भारी चीनी निवेश  और बंदरगाहों  का उन्नयन कुछ इसी दिशा में संकेत देता है,गौरतलब है कि चीन ने हम्बनटोटा बन्दरगाह को 99 वर्ष के पट्टे पर ले रखा है।
यह अलहदा है कि भारतीय और अंतरराष्ट्रीय दवाब के कारण  श्रीलंका की नौसेना ने अपना दक्षिणी कमान को हम्बनटोटा में ले जाने का निर्णय किया है,और चीन को ''सामरिक महत्व" के किसी तरह के कार्यों से दूर रहने का "अनुरोध"किया है ।वैसे हम चीन के कारनामों को पहले भी दक्षिणी चरण सागर में स्पार्टले द्वीप समूह पर पर  देख चुके हैं ।

यहां गौर करने वाली बात यह है कि उनकी यह यात्रा ठीक  ऐसे समय हो रही है,जब रूस में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग रूस के दौरे पर हैं और अपने समकक्ष व्लादिमीर पुतिन के साथ निश्चित रूप से बैठकर "मस्कोवस्कया ओसोबया"(Moskovskaya Osobaya)का तो स्वाद न हीं चख रहे होंगें न ही "पांडा" का आदान प्रदान  कर रहे होंगे ।
यह विगत छह वर्षो  ने चीनी राष्ट्रपति ही आठवीं रूसी यात्रा है।
आपने राजनय रिश्तो की  70वीं वर्षगांठ मन रहे है जब  दुनिया आर्थिक अंधराष्ट्रवाद,एकपक्षीयवाद और संरक्षणवाद के मसले का सामना कर रही है तो चीन और रुस बहुपक्षीय बातचीत कर रहे हैं।इस बातचीत के अलग ही मायने है।
आज ये तीनो राजनेता अलग अलग मसलों पर बात कर रहे हैं लेकिन आगामी 13-14जून के बीच ये तीनो नेता किर्गिज़स्तान बाकी राजधानी बिश्केक में शंघाई सहयोग संगठन में साथ होंगे और फिर नये मसले पर चर्चा करेंगे।
प्रचंड जनादेश के साथ सत्ता वापसी के बाद  वैश्विक स्तर पर चर्चा के केंद्रबिंदु रहे प्रधानमंत्री मोदी की यह दोनों द्वीपीय देशों की यात्रा गाहे बगाहे  विशेषज्ञों को अनेको प्रश्नों और संभावनाओं वहीं विरोधियों को आशंकाओं को जन्म देती है,चूंकि कूटनीति में नकारात्मक से सकारात्मक की तरफ आना  एक "सेफ जोन" माना जाता है।  प्रधानमंत्री की यात्रा और मालदीव के सांसद "पीपुल्स मजलिस" में और कोलंबो के इंडिया हाउस में उनके वक्तव्यों पर अगर ध्यान केंद्रित किया जाय तो हम पाते हैं कि...
इस यात्रा से उन्होंने मालदीव के पूर्व राष्ट्रपति और वर्तमान मालदीव संसद के अध्यक्ष मोहम्मद नशीद अन्नी की कालजयी कल्पना "इंडिया फर्स्ट"नीति को सम्पूर्णता और वैधता प्रदान किया।
उन्होंने क्रोधित ड्रैगन की अंगारे बरसाती आंखों और निगलने को लपलपाती जीभ से मालदीव में लोकतन्त्र की दुहाई देकर को बचा लिया,हलांकि यह कदम उन्हें अपने पहले कार्यकाल में हीं उठाना चाहिए था,लेकिन " देर आये पर दुरुस्त आए" की यह नीति उतनी भी बुरी नहीं हैं।
आज इन चीनी ऋणग्रस्त देशों को एहसास हो रहा है कि अपनी संप्रभुता के साथ तात्कालिक समझौता कर ,उच्च वृद्धि दर के हसीन सपनों को करने के चक्कर मे उन्होंने न सिर्फ अपने कोमल पैर पर स्वयं से कुल्हाड़ी का तेज प्रहार किया बल्कि क्षेत्र की पूरी "सुरक्षा आर्किटेक्चर"को बिगाड़ कर रख दिया है।
चूंकि भारत अपने निकट पड़ोस में घटित हो रहे इन तमाम घटनाओं पर धृतराष्ट्र कि भाँति आंख मूंदे नहीं सकता जबकि उसकी सीता और द्रौपदी का सामूहिक चीरहरण होता रहे,नेपाल,भूटान,बंगलादेश,मालदीव और श्रीलंका सही मायने में हमारी विदेश नीति की "राष्ट्रीय अस्मिता,इज्जत और सम्मान"है इनपर किसी तरह की धीमी से धीमी आंच और हल्का सा खरोंच हमें बर्दाश्त से बाहर होना चाहिए। इनपर खरोंच का सीधा मतलब हमारी एकता और अखंडता के साथ क्षेत्रीय संप्रभुता से है ,औरअपनी संप्रभुता की रक्षा करना आपका नैसर्गिक अधिकार है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को मालदीव का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान देकर मालदीव ने अपने पूर्ववर्ती के शासन में उत्पन्न  हुए भारत विरोधी बयार को मन्द करनेकी दिशा में परिपक्व राजनय का परिचय दिया है।
वहीं श्रीलंका में नरेंद्र मोदी का तेज माननसूनी हवाओं और झमाझम बारिश ने किया।प्रोटोकॉल तोड़ते हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति  ने जिस कदर स्वयं प्रधानमंत्री को भींगने से बचाने के लिए खुद छाता खोलकर, बाकी रही सही सम्भावनाओं को निर्मूल साबित किया।

भारत के संकल्प पर गौर किया जाय,तो
"भारत मालदीव के साथ अपने संबंधों को सबसे अधिक महत्व देता है। हम एक दूसरे के साथ एक गहरी और मजबूत साझेदारी चाहते हैं। एक समृद्ध, लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण मालदीव पूरे क्षेत्र के हित में है।
प्रधानमंत्री के स्पष्ट किया "मैं यह दोहराना चाहता हूं कि भारत
मालदीव की "हर संभव "सहायता करने के लिए हमेशा प्रतिबद्ध है।
"हमारे दोनों देशों को 'हिन्द महासागर "की लहरों ने हजारों साल से घनिष्ठ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों में बांधा है।यह अटूट मित्रता मुश्किल समय में भी हमारी मार्गदर्शक बनी है।मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि भारत अपनी शक्ति और क्षमताओं का उपयोग केवल अपनी समृद्धि और सुरक्षा के लिए ही नहीं करेगा बल्कि इस क्षेत्र के अन्य देशों की क्षमता के विकास में, आपदाओं में उनकी सहायता के लिए, तथा सभी देशों की साझा सुरक्षा, संपन्नता और उज्ज्वल भविष्य के लिए करेगा।

2.Indo-Pacific(भारत प्रशान्त) क्षेत्र हमारी जीवन रेखा है और व्यापार का राजमार्ग भी है। यह हर मायने में हमारे साझा भविष्य की कुंजी है।इसलिए, मैंने जून 2018 में सिंगापुर में बोलते हुए Indo-Pacific Region में खुलेपन, एकीकरण एवं संतुलन कायम करने के लिए सबके साथ मिलकर काम करने पर ज़ोर दिया था।
प्रधानमंत्री ने कहा कि "समर्थ, सशक्त और समृद्ध "भारत दक्षिण एशिया और इंडो पैसिफ़िक(भारत-प्रशांत) में ही नहीं, पूरे विश्व में शांति, विकास और सुरक्षा का आधार स्तम्भ होगा हम सामुद्रिक पड़ोसी हैं हम मित्र हैं और दोस्तों में कोई छोटा और बड़ा, कमज़ोर और ताकतवर नहीं होता। शांत और समृद्ध पड़ौस की नींव भरोसे, सद्भावना और सहयोग पर टिकी होती है।

यह बात भारत के बिग ब्रदर एटीट्यूड को नहीं बल्कि भारत के पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज प्रतिपादित "Elder Brother Atitude'' कांसेप्ट को मूर्त रूप प्रदान करता है।वहीं श्रीलंका के दौरे पर उंन्होने स्पष्ट रूप से कहा कि भारत जरूरत के समय अपने दोस्तों को कभी नहीं भूलता" उनके इस वक्तव्य से चीनी कर्ज़े में डूबते श्रीलंका की स्थिति की विकरालता और गंभीरता का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। यहां भारत की जिम्मेदारी भी बनती है कि वह श्रीलंका की स्थिति की व्यापक तौर सुलझाए और विभिन्न मोर्चों पर दिल खोल कर आर्थिक मदद दे।

मालदीव के सदन "पीपुल्स मजलिस "में प्रधानमंत्री
के संयुक्त सदन में संबोधन के अपने गहरे निहितार्थ हैं जो उन्होंने इस शांतिप्रिय क्षेत्र में भारतीय हितों और  चिंता और अपनी परवाह को बेहद सरल शब्दों में पूरी स्पष्टता के साथ रखते हुए इस क्षेत्र में इंडिया फर्स्ट की अवधारणा को सत्यता प्रदान किया।

सबसे बड़ा सवाल ।
श्रीलंका और मालदीव  अपने भौगोलिक अवस्थिति को लेकर हमारे लिए हिन्द महासागर के दो अनमोल मोती हैं जिन्हें  बेल्ट एंड रोड और मेरीटाइम सिल्क रोड  जैसे अत्यधिक लचीले ,धारदार और बेहद मजबूत चीनी रेशम से इन दोनो मोतियों को चीन अपनी "स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स"रणनीति के जरिए पिरो चुका है। पाकिस्तान के "ग्वादर'',मालदीव के 'मराओ" श्रीलंका के "हम्बनटोटा",,म्यामार के "कोको द्वीप समूह" और बांग्लादेश के "कॉक्सबाज़ार,और चटगांव" को अगर नक्शे पर देखें तो चीनी रेशम ने इन सभी स्थानों को एक सूत्र में पिरो दिया है। इन सभी स्थानों पर चीन ने अत्यधिक अवसंरसनात्मक विकास के लिए अत्यधिक निवेश किया है,और इन जगहों पर अपने सामरिक और लॉजिस्टिक क्षमता विकसित की है ,अगर समय रहते इन मालाओं के रेशम को न काटा गया तो तो ये दक्षिण एशिया के राजनीति ने चीनी पदार्पण होगा, हिन्द महासागर  का नीला पानी पहले गर्म और फिर लाल होगा और ये मोतियों की माला हमारी गर्दन पर धीरे धीरे कसती जाएगी, फिर हमारा दम घुटेगा,यह समस्या सिर्फ समुद्र से ही नहीं स्थल खंड पर भी बरक़रार है तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र से नेपाल की राजधानी काठमांडो तक प्रस्तावित सीधी रेल सेवा,भूटान के चुम्बी घाटी के जरिये सिलीगुड़ी  कॉररिडोर या संकरी चिकेन नेक पर ड्रैगन की नजर जिसे वह कब्जा कर एक ही झटके में गर्दन दबाते हुए भारतीय मुख्य भूमि से उत्तरपूर्व के आठ राज्यों को काट अपने दक्षिणी तिब्बत में मिलाने की मंशा जगजाहिर है।
इसलिए समय रहते हुए भारत को चाहिए कि चीनी ड्रैगन के घातक जहर का तत्काल,और प्रभावी और अचूक इलाज ढूंढेते हुए खुद के साथ इन् पड़ोसी देशों को भी बचाएं।

चीन अपने "फाइव फिंगर पालिसी"में कोई बदलाव नहीं करने जा रहा है,तो ऐसी स्थिति में भारत को अपने पड़ोसी देशों के साथ  "गुजराल डॉक्ट्रिन"नेबरहुड फर्स्ट,एक्ट एंड एक्सटेंडेड एशिया और सागर नीति को नए सिरे से और व्यावहारिक तौर पर हिन्द महासागर के भू रणनीतिक कैनवास पर उकेरना होगा,"बिग ब्रदर सिंड्रोम" और" बिग ब्रदर एटीट्यूड"से ग्रस्त इन पड़ोसी देशों को यह समझाये कि यह "बड़े भाई "का गलत अंग्रेजी अनुवाद है, सही अर्थों में भारत कि भूमिका "एल्डर ब्रदर"(elder brother) के रूप में रही है जो बिना किसी हेकड़ी के Helping(मददगार) caring (परवाह  करने वाला)और sharing(साझीदार) की निःस्वार्थ भूमिका निभाता है और रहेगा

भारत को चाहिए इन देशों को छोटी छोटी समस्या, जो हमारे लिए सामान्य लगे लेकिन उनके लिए संप्रभुता और राष्ट्रीय अस्मिता का खतरा बन जाती है,उन पर विशेष ध्यान दें ।

ट्रैक1 औऱ 2 डिप्लोमेसी के अलावा विभिन्न पारम्परिक और गैर पारम्परिक राजनय  के जरिये उनसे सदा जुड़ाव बनाये रखे।

भारतीय मीडिया संस्थानों के एयरकंडीशन स्टूडियो में बैठे एंकर और गेस्ट को चाहिए कि इन देशों के बारे में बात करने से पहले अपना सही से होम वर्क करे और रिपोर्टर चीखने और दौड़ने की बजाय उस देश के साथ भारत के विभिन्न सम्बंधो के साथ अपनी रिपोर्टिंग करे। क्योंकि हमारी थोड़ी सी चूक चाहे वह ,स्क्रॉल के फ़्लैश /टिकर या पैकेजिंग के स्लग में लिखी तथ्य/वर्तनी या संख्यात्मक रूप से तात्कालिक अशुद्ध ऑन एयर हो जाय जो फौरन शुद्ध कर लिया जाय लेकिन इन देशों की भारत विरोधी मीडिया को गाहे बगाहे एक। चटपटा मसाला मिल जाता है जिसे अन्य भारत विरोधी शक्तियां सोशल मीडिया और अन्य साधनों के जरिये आग में घी डालते हुए माहौल बिगाड़ने में में कोई कोर कसर नहीं छोड़ती। अभी प्रधानमंत्री के शपथग्रहण समारोह में शिरकत करने आये भूटान के प्रधानमंत्री की "फोटोग्राफ" का ताज़ा विवाद हमारे सामने है।

प्रधानमंत्री ने आतंकवाद के विभन्न स्वरूपों के विभेदीकरण को एक बार सिरे से खारिज़ करते हुए उंन्होने पाकिस्तान और चीन की सदाबहार दोस्ती को आड़े लिया। प्रधानमंत्री  श्रीलंका के इस्टर बम धमाके के बाद यहां पहुंचने वाले विश्व के पहले राजनेता है,उंन्होने आतंकवाद के विभिन्न स्वरूपों की एक बार फिर कड़ी निंदा की।


यह ऐसा तब हो रहा है भारत और पाकिस्तान आगामी 12-13 जून को किर्गिज़स्तान की राजधानी बिश्केक होने वाली शंघाई सहयोग संगठन के बैठक में आमने सामने होंगे,चीनी राष्ट्रपति से तो मोदी एक औपचारिक/अनौपचारिक मुलाकात भी तय है,वहीं पाकिस्तान मोदी से बातचीत के लालायित है।
प्रधानमंत्री मोदी लोकतन्त्र की खूबसूरती और भारतीय लोकतंत्र की विशेषता को बताने के लिए जाने जाते है इसी कड़ी में कल मजलिस में उनका यह 11वां संबोधन था,इससे पहले उंन्होने 2014 में भूटान,नेपाल,न्यूज़ीलैंड और फिजी की संसद को संबोधित किया, तो 2015 में मॉरिशस, श्रीलंका, मँगोलिया और अफ़ग़ानिस्तान की संसद में भारतीय गरिमा का मान बढ़ाया जबकि 2016 में संयुक्त राज्य अमेरिका,2017 में अफ्रीकी देश युगांडा के संसद को संबोधित किया।

प्रधानमंत्री मोदी को अब तक आठ देशों और संस्थाओ ने अपने सर्वोच्च नागरिक पुरस्कार से सम्मानित किया है।
जिसमे रूस के सेंट एंड्रयू अवार्ड,संयुक्त अरब अमीरात का ज़ायेद मैडल,फिलिस्तीन का ग्रैंड कॉलर ऑफ द स्टेट ऑफ फिलिस्तीन, सऊदी अरब का किंग अब्दुल अजीज साश
अफगानिस्तान का अमीर अमानुल्लाह खान अवार्ड,
और हालिया मालदीव का निशान इज़्जुद्दीन सम्मान से नवाजा गया। इसके अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ नर चैंपियन ऑफ द अर्थ और दक्षिण कोरिया ने सिओल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया है।
इन सम्मान का सीधा अर्थ भारतीय लोकतंत्र की विशेषता विश्वसनीयता औए जनादेश का सम्मान के रूप मेंI लगाया,और साथ ही अपने उन ज्ञात अज्ञात स्वंत्रता सेनानियों को याद और नमन करना चाहिए जिन्होंने इस दिन का सपना देखा था जिसे वे जीवंत स्वरूप प्रदान नहीं कर पाए।

भारत ने मालदीव के साथ इन क्षेत्रों के उन्नयन हेतु मालदीव के समझौता हुआ है

विभिन्न द्वीपों पर पानी और सफाई की व्यवस्था;
● छोटे और लघु उद्योगों के लिए पर्याप्त वित्त व्यवस्था;
● बंदरगाहों का विकास;
● कांफ्रेंस और कम्युनिटी सेंटर्स का निर्माण;
● क्रिकेट स्टेडियम का निर्माण
● आपातकालीन चिकित्सा सेवाएं;
● एम्बुलेंस सेवा;
● तटीय सुरक्षा सुनिश्चित करना;
● आउटडोर फिटनेस उपकरण की व्यवस्था;
● ड्रग डिटॉक्स सेंटर;
● स्टूडेंट फेरी;
● कृषि और मत्स्य पालन;
● नवीकरणीय ऊर्जा और पर्यटन;
दोनों देशों के बीच सामरिक भागीदारी के तहत मालदीव के तटीय क्षेत्रों में  राडार तन्त्र को और मजबूत करना, हमारे राडार और लिसनिंग पोस्ट पहले से भी इन  क्षेत्र में मौजूद है,रक्षा बलों में क्षमता निर्माण और बेहतर समन्वय के लिए  प्रशिक्षण केंद्र को रक्षा बलों को सौंपना।
भारत को इन तटवर्ती देशो के लिए खासा सावधान रहने की आवयश्कता है, इस क्षेत्र में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन से है, जहां भारत मालदीव और श्रीलंका को तरजीह दे रहा है तो चीन ,रूस की तरफ़ निगाहें जमा रखा है।
वैसे भी  जब जब चीन रूस के  बीच गठजोड़ हुआ है,वह भारत के लिए अच्छा नही हुआ है,यह दूसरी बात है ये तीनो देश जी 20,ब्रिक्स, एससीओ,आरआईसी में बराबरी के साझेदार है लेकिन चीन इस क्षेत्र में अपनी प्रभाव को किसी भी रूप में कम होने देना नही चाहेगा,मालदीव और श्रीलंका चीन को "मलक्का डाइलेमा",से मुक्ति प्रदान करने और चीन की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में ये दोनों देश अहम पड़ाव माने जाते है। इस क्षेत्र में भारत की सक्रियता को चीन कभी भी हल्के से नहीं लेगा,इसलिए भारत को सभी मोर्चों पर अत्यधिक चौकन्ना रहने की जरूरत है। यह वही चीन है उसके राष्ट्रपति अहमदाबाद में  प्रधानमंत्री के साथ  वार्तालाप में व्यस्त थे तब चीनी ने लद्दाखः के एक भारतीय सेक्टर पर स्टैंड ऑफ मॉड में काफी दिनों तक खड़े थे,जिसे कड़ी कूटनीतिक मशक्कत के बाद इस मसले को सुलझाया जा सका था। आने वाले वर्षों में हिन्द महासागर का पानी और उबलेगा, जिसमे हमे अपनी नौसेना और वायुसेना को एक "फ़ोर्स मल्टीप्लायर" के रूप में विकसित करना होगा जिससे इस क्षेत्र में दबाव बरकार रहे। आज ब्लू ईकॉनमी और पर्ल इकोनॉमी के दौर में  जरूरत इस बात  की है कि भारतीय नौसेना को  "ब्राउन वाटर नेवी " से "ब्लू वाटर नेवी"  में जल्द से जल्द तब्दील करें क्योंकि ये ही इस क्षेत्र में आगामी वर्षो में होने वाली कड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक झड़पों को सफलतापूर्वक अंजाम देंगे। 

हिन्द महसागर में  चीनी नौसेना की बढ़ती मौजूदगी में भारत की भू राजनीतिक और सुरक्षा के निहितार्थ है,पूरे हिन्द महसागर क्षेत्र में प्रमुख शक्तियों के बीच किसी भी संघर्ष का प्रभाव भारतीय रणनीतिक हित को  व्यापक रूप से प्रभावित करेगा।


अजहरुद्दीन टैक्टिस.
दरअसल इस शब्द के जनक वर्तमान भारतीये विदेश मंत्री है,मैदान में  मुसीबतों के समय पूर्व भारतीय क्रिकेट टीम के सभी खिलाड़ियों को घेरे में लेकर प्रतिद्वंद्वी टीम को बुरी तरह चौंकाने की कप्तान मो.अज़हरुद्दीन की अनोखी रणनीति को डॉ जयशंकर राजनय और कूटनीतिक बिसात पर इस्तेमाल करने से नहीं चूकते है और हम पूरी उम्मीद कर सकते हैं कि वे यहां भी नहीं चूकेंगे।
अभी दौर क्रिकेट विश्वकप का चल रहा है, हरफनमौला अंग्रेज बल्लेबाज जॉनी बेयरस्टो का मानना है कि, "जिस तरह क्रिकेट के बदलते स्वरूप में जिस तेजी से "बिग हिटर्स" उभरे हैं  उतनी ही तेजी के साथ "बाउंडरी कैचिंग" और रिले कैचिंग की कला और भी अहम हो गई है साथ ही फील्डिंग पोजिशन पॉइंट भी अहम हो चुकी है। 
आज की  जरूरत के हिसाब से कूटनीति चश्मे से इस पहलू की तरफ सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो स्थिति बेहद साफ साफ दिखाई देती है। वैसे भी कूटनीति में फील्डिंग पोजीशन का का बदलते रहना एक गतिशील,जीवन्त और दीर्घायु राजनय का संकेत है

वैसे सिक्के के दूसरे पहलू और अन्तर्राष्ट्रीय संबंध में अस्थाई हित ही सर्वोच्च होते है,यहां न तो कोई स्थायी मित्र,न कोई हित और न कोई शत्रु होता है और जरूरी नहीं कि जो आप देख रहें हो वह हक़ीक़त हो, चीनी इस सिद्धांत पर आंख मूंदकर भरोसा करते हुए अपनी पूरी तैयारी को इसी पर अंजाम देते है

प्रधानमंत्री का यह सफल विदेश दौरा निश्चित रूप से इस क्षेत्र में सुरक्षा की नई अवधारणा को जन्म दिया है,अपने दूसरे कार्यकाल में "हिन्द महासागर क्षेत्र "को अपने "रणनीतिक केन्द्रबिन्दू" में रखकर भारतीये कूटनीति ने जिस परिपक्वता का परिचय दिया है वह काबिल ए तारीफ है।

Friday, June 07, 2019

कैरियर डिप्लोमेट जयशंकर के समक्ष चुनौतियां

कायदे से उस आलेख का शीर्षक " भारतीय विदेश नीति के समक्ष चुनौतियां"होना चाहिए लेकिन वर्तमान भारतीय राजनय के नक्षत्रमण्डल में जयशंकर ही पर्याय है।

एनडीए 2.0 मंत्रिमंडल में सबसे ज्यादा विश्वव्यापी प्रसंशा  किसी एक फैसले को मिली तो वह थी सुब्रमण्यम जयशंकर को भारतीय राजनय का कमान सौंपना। इस फैसले को विश्वव्यापी मीडिया कवरेज मिला।

जयशंकर के समक्ष पहली चुनौती उस विरासत को संभालने और आगे बढ़ाने कि हैं जिसे उनके पूर्वर्ती विदेश मंत्री और उनके विदेश सचिव के कार्यकाल में "बॉस" रहे सुषमा स्वराज ने जिस सीमित संसाधन के वावजूद बहुत ही "स्नेहिल और प्रभावी"तरीके से वैश्विक कूटनीति के मंच पर भारतीय राजनय को उस प्रतिमान तक पहुंचाया जो विगत कई दशक से लंबित था।
श्रीमती सुषमा स्वराज ने पारंपरिक, गैर पारंपरिक और क्वासी डिप्लोमेसी ,शिखर और शेरपा कूटनीति के साथ साथ सूचना और संचार तकनीक और सोशल मीडिया प्लेटफार्म का प्रभावी प्रयोग स्वयं और उनके मातहत रहे तत्कालीन प्रवक्ता विकास स्वरूप,फिर सैयद अकबरुद्दीन,और रवीश कुमार ने जिस स्फूर्ति और तत्परता के साथ आम भारतीय को विदेश मंत्रालय के साथ जुड़ाव मोबाइल के माध्यम सर्व सुलभ कर दिया,जिसकी कल्पना शायद किसी ने न की थी।

डॉ सुब्रमण्यम जयशंकर की नियुक्ति रायसीना कि पथरीली पहाड़ी की पगडंडी में कांटे बिछे उस राह पर हुई है जहां एक ओर अमेरिकी खेमा आपको आर्थिक और सामरिक मोर्चे पर आंखे तरेर रहा है,चीन की मनहूसियत भरी चुप्पी आपको चैन से बैठने नहीं दे रही है,आपके गर्भनाल से निकले और चिपके अन्य पड़ोसी देश में व्यापक बैचेनी का आलम व्याप्त है,अपने को सर्वाधिक सभ्य समझने वाले यूरोपीय देश प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापस हुई सरकार के साथ जिस ठंडे तरीके से सरकार का स्वागत किया ये कोई शुभ संकेत नहीं है।

लगभग चार दशकों के विभिन्न्न क्षमताओं वाले उच्चस्तरीय राजनयिक  कार्यानुभव और विश्वव्यापी बेदाग छवि के मालिक जयशंकर के लिए ये चुनौतियां परेशान तो कर सकती है पर पराजित नहीं,शायद इसी लक्ष्य के साथ उन्हें मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है।

इनकी क्षमता के बारे में आप महज इस बात से अंदाजा लगा सकते है कि उनके चीनी स्टेट काउंसिलर और इनके समक्ष वांग ई ने इन्हें विशेष सन्देश भेजा तो इन्हें जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में परास्नातक कक्षाओं में पढ़ाने वाले मूर्धन्य विद्वान डॉ पुष्पेश पंत ने भी इन्हें बधाई संदेश भेज कर उनकी विद्वता को रेखांकित किया।

राजनायिक गलियारों में ऐसा होना एक दुर्लभतम घटना मानी जाती है,जब आपके बारे में आपके गुरुजन ,विपक्ष,सत्तापक्ष और अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिके बिरादरी समवेत स्वर में आपकी प्रसंशा करे और यह कहे कि जयशंकर विदेश मंत्री के रूप में इस सरकार का सबसे बेहतरीन और उत्कृष्ट चुनाव है।
 इन तमाम सकारात्मक कार्यों के बीच भारतीय विदेशनीति  फ़िलहाल सरकार के "अत्यधिक स्थायित्व " प्राप्त करने की  एक नई चुनौती का सामना कर रही है।

तकनीकी तौर पर अत्यधिक स्थायित्व प्राप्त सरकार होने से सबसे अधिक परेशानी आपके पड़ोसी देशों  को भीतर से होती है, वे अपनी सुरक्षा के लिए भयभीत और बैचेन रहते हैं,और उन्हें अपने अस्तित्व पर संकट और संप्रभुता में अतिक्रमण और असुरक्षा का भाव नैसर्गिक रूप से सताते रहता है। भारतीय उपमहाद्वीप के देशों कि राजनीति के केंद्रबिंदु में भारत है और भूटान छोड़कर सभी पड़ोसी देश चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक ख़रब डॉलर(01 ट्रिलियन$) वाली मल्टी मॉडल अवसंरचनात्मक कार्यक्रम बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव कार्यक्रम का भारत के लाख न चाहने पर भी इसके साझेदार देश बन चुके हैं।

भारतीय गर्भनाल से जुड़ा"नेशनल ट्रीटमेंट" प्राप्त और भू आवेष्टित(लैंडलॉक) देश नेपाल में चीन की प्रभावशीलता तो देखने को ही बनती है,नेपाल का चीनी खेमा में जाने का अर्थ अपना विनाश के अतिरिक्त कुछ भी नहीं।कमोबेश एहि स्थिति बांग्लादेश श्रीलंका,मालदीव के साथ है।
पाकिस्तान तो चीन का "सदाबहार दोस्त " मित्र देश है जिसके निशाने पर हर क्षण भारत है।


इसलिये जयशंकर की सबसे बड़ी चुनौती इन छोटे पड़ोसी देश लेकिन सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण इन देशों में जिंम्मेदार भारतीय राजनयिक विश्वास बहाल करते हुए उन्हें यह बताया जाय कि वे तथा कथित "बिग ब्रदर"सिंड्रोम से ऊपर उठते हुए समावेशी विकास के लिये साथ मिलकर कदम उठाएं और दक्षिण एशिया में चीनी प्रभाव सर अपनी धूमिल हो रही कूटनीतिक प्रतिष्ठा को वापस लाना इनकी पहली प्राथमिकता होगी।

संभवतः इसी मंशा के साथ उन्होंने आगामी  सात जून से प्रस्तावित उनकी पहली विदेश दौरे के रूप में भूटान को चुना है,वहीं प्रधानमंत्री ने मालदीव और श्रीलंका को अपनी "नेबरहुड फर्स्ट"नीति के तहत चुना है।भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी का यह कथन "आप सब कुछ बदल सकते है लेकिन अपना पड़ोसी नहीं" आज भी चरितार्थ करती है।

सबसे बड़ी चनौती भारत और अमेरिका के सम्बन्ध को
" री सेट" करना। ट्रम्प प्रशासन की भृकुटि उस समय से तनी हुई है,उसकी दिमाग की नसें बुरी तरह दुखती है जब से भारत ने अपने सबसे विश्वसनीय सामरिक साझेदार रूस के अत्याधुनिक मिसाइल डिफेंस सिस्टम एस 400 सौदे को अमेरिकी कॉउंटरिंग अमेरिका एडवेरसरिज थ्रू सैनक्शन्स एक्ट (CAATSA) के प्रावधान को दरकिनार करते हुए अंतिम रूप दिया,यह अमेरिकी प्रावधान रूस ,ईरान और उत्तरी कोरिया के साथ सामरिक खरीददारी को किसी दूसरे देश को प्रतिबंधित  करता है।
 दूसरा अमेरिकी प्रतिबंध से घिरे ईरान के साथ कच्चे तेल आयात को मई तक बरकरार रखा,लेकिन दोनों देशों के
दोनो देश के बीच सबसे बड़ी समस्या आपसी विश्वास को बहाली को लेकर है,डब्लूटीओ में अमेरिकी वर्चस्व में सुधार,भारत और अमेरिका के बीच कई फ़ोकस एरिया हैं जिसमे दोनों देशों की समान हित है जिसमे अफ़ग़ानिस्तान,इंडो पैसिफिक,श्रीलंका,दक्षिणी चीन सागर में निर्बाध नौवहन, आदि प्रमुख हैं जिसमे दोनों देशों के बीच सहयोग की आवश्यकता है।

भारत और अमेरिका के बीच के रणनीतिक समझौते के तहत सबसे पहले 2002 में  सामान्य सुरक्षा सैन्य सूचना समझौता [General Security of Military  Information Agreement(GSOMIA),
2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज ऑफ मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट[Logistic Exchange Memorandum of Agreement(LEMOA) ]और हालिया communication Compatibility and Security Agreement (COMCASA) शामिल है।

अंतिम समझौते के रूप के रूप में  भू स्थानिक सहयोग हेतु बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता [Basic Exchange and Cooperation Agreement For Geo Spatial Cooperation(BECA)के मसौदे पर बातचीत जारी है जिसे पूर्ण कर सम्पूर्ण रणनीतिक साझेदारी को पूरा करने का अंतिम का जिम्मा भी जयशंकर के कंधों पर ही होगा।

इन समझौतों की बात इसलिए कि जा रही है क्योंकि आने वाले दिनों में युद्ध स्वरूप बदल जायेगा जिसे स्पेक्ट्रम वारफेयर के रूप में देखा जाएगा और सशस्त्र बलों के  लिए सारा दारोमदार इनके  सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड संचार उपकरण जिसे High End  secured Encrypted communicatio Equipments कहा जाता है,पर होगी।
भारतीय सैन्य बलों द्वारा अमेरिका से प्राप्त इन संचार उपकरणों को अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर लगाया जाएगा जिसमे C -130 J super Hercules, भीमकाय C-17 ग्लोबमास्टर, समुद्र में लंबी निगरानी करने और पनडुब्बी रोधी वारफेयर में अव्वल Poisiden 8 I विमान,सुपर हैवी लिफ्टर हेलीकाप्टर चिनूक ,और अत्याधुनिक अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल होंगे।

भारत के पारंपरिक, नैसर्गिक मित्र राष्ट्र रूस के साथ आने वाले समय मे सम्बन्ध सुधारना बेहद जरूरी है, बदले हुए पुतिन के रूस को आज महज "ग्लासनोस्त और पेरेस्त्रोइका" के चश्मे से देखना किसी भी देश के लिए निश्चितरूपसे "माराडोना गोल"साबित होगा। कनेक्ट सेंट्रल एशिया पॉलिसी,अश्गाबात समझौता,चीनी बीआरआई कि काट आईएनएसटीसी समझौता,यूरेशियन इकनोमिक यूनियन,के अतिरिक्त सामरिक,विज्ञान प्राद्योगिकी,अन्तरिक्ष और सैन्य क्षेत्र यह देश हमारा सबसे विश्वसनीय और " टाइम टेस्टेड फ्रेंड"है। इसका विश्वास महज अमेरिकी आर्थिक दवाब में आकर नहीं तोड़ा जा सकता है।

अमेरिका ने काँउटरिंग अमेरिका एडवर्सिरीज थ्रू संक्शन्स एक्ट (CAATSA)के प्रावधानों के तहत रक्षा और आसूचना क्षेत्र की कमोबेश सभी महत्वपूर्ण 39 रूसी इकाइयों के अधिसूचित करते हुए भारत सहित किसी तीसरे पक्ष से सम्बन्धित किसी तरह के क्रय विक्रय को पूरी तरह प्रतिबंधित किया है। इनसे भी चुनौती पाना इनके लिए कठिन होगा और रूसी विश्वास को नहीं डिगने देने की पूरी जिम्मेदारी विदेशमंत्री और इनकी टीम की रहेगी।

हिन्द महासागर और इसके आसपास के क्षेत्रों में कहें कि बढ़ती लालसा, और दक्षिण चीन सागर उच्च विकासदर की लालसा और अपनी ऊर्जा सुरक्षा और नवउपनिवेशक मानसिकता वाले चीन की आक्रामक नौसैनिक तैनाती और हिन्द महासागर में "पनडुब्बी टैक्टिस", स्ट्रिंग आफ पर्ल्स,और डेब्ट एंड चेकबुक डिप्लोमेसी के घातक त्रिकोणात्मक हथियार के साथ प्रवेश,जो किसी भी सूरत ए हाल में मंजूर नहीं और यह भारतीय संप्रभुता के लिए गंभीर चनौती है।

ईरान और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच जारी "हॉरमुज़ संकट "और उसपर आर्थिक प्रतिबंध के बाद भारतीय ऊर्जा सुरक्षा तैयारियों को गंभीर झटका लगा है,ऊर्जा सुरक्षा किसी भी देश की आर्थिक आधार की मेरुदण्ड होती जिसे निर्बाध आपूर्ति किसी भी देश का मूलाधिकार है।
ईरान पर अमेरिकी  प्रतिबंध से भारत को व्यापक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त पाकिस्तान को पूरी तरह अलग थलग करते हुए  अफगानिस्तान तक सीधी और व्यापक पहुँच के लिए ईरान का चाबाहार बन्दरगाह भारत के लिए सामरिक, आर्थिक और भू राजनीतिक तौर पर बेहद अहम है।

मध्य एशिया हमारे लिए बेहद अहम है,पाकिस्तान की कुटिल कूटनीति तो खाड़ी सहयोग परिषद में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के समक्ष एक नहीं चली,पर पाकिस्तानी ऐतिहासक रूप से निकृष्टतम और नकारात्मक कूटनीतिक के लिए जाने जाते है इसलिए वे चुप तो नहीं बैठेंगे इसलिए पाकिस्तानी मोर्चे को अरब और खाड़ी देशों में मात देना भी विदेश विभाग के जिम्मे ही होगा।
दक्षिण एशिया और अफ्रीका में फैल रहे चीन ड्रैगन के जहर की पक्की काट भी विदेशमंत्री के हाथों में होगी,
सरकार की अतिमहत्वाकांक्षी "नेबरहुड फर्स्ट "और "एक्सटेंडेड नेबरहुड" की नीतियों को प्रभावी अमली जामा पहनाना ,"इंडो पैसिफिक क्षेत्र "बिम्सटेक और" क्वाड" की अवधारणा पर चीनी चुनैतियों को मूर्तरूप देना।

वहीं ब्रिक्स में जोहसन्सबर्ग घोषणा से आगे बढ़ना,इब्सा,और आरआईसी के साथ व्यापक सहयोग को बढ़ाना शामिल है।
जी 20 ,शंघाई सहयोग संगठन जिसकी हालिया बैठक आगामी सप्तांहत में शुरू हो जाएगी, यह विदेशमंत्री तौर जयशंकर का पर पहला लिटमस टेस्ट होगा।

शंघाई सहयोग संगठन जो आठ सदस्यी यूरेशियन आर्थिक राजनीतिक और सामूहिक सुरक्षा संगठन है,इसमे विश्व की करीब 40 फीसद जनसंख्यां, और वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 20 फीसद इस क्षेत्र से आता है जो भौगोलिक वितरण और जनसंख्या के लिहाज से इसे विश्व का सबसे बड़ा क्षेत्रीय संगठन के रूप में ख्याति प्रदान करता है।।इसके चार्टर में युक्त शब्द "शंघाई  स्पिरिट " के जद आते हुए भी पाकिस्तान को आमने सामने सामूहिक बैठकों के वावजूद अगर वे पाकिस्तान को "कूटनीतिक तौर" पर अलग थलग करने में सफल हुए तो भारतीय राजनय की बड़ी सफलता मानी जायेगी।
यूरोपीय यूनियन,पता नहीं क्यों  थोड़ा मुर्झाया हुआ प्रतीत होता है, उसे भी सामरिक और आर्थिक मोर्चे पर  विश्वास में लेना होगा।
अगर विदेश मंत्री के राजनयिक कार्यकाल का सूक्ष्म अवलोकन किया जाय तो जयशंकर को अमेरिकी,रूसी और चीनी अधिकारियों के साथ कूटनीति पींग पढाने में माहिर समझा जाता हैं,वे बेहद मंझे हुए पेशेवर की तरह की अपनी बात मनवाने के लिये जाने जाते है ।
अपने कैरियर की शुरुआती दौर में तत्कालीन सोवियत संघ(अब वर्तमान का रूस) में कार्य की शुरूआत करना ही इनके प्रतिभा को दर्शाता है।किसी मूल रूसी की तरह धारा प्रवाह रूसी बोलना इनके कार्य के और बेहतर बना देता है।

 कांग्रेस नीत संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के पहले चरण में  "न्यूक्लियर डील", और  लद्दाख के देपसांग में चीन के अतिक्रमण और राजग सरकार के बीते कार्यकाल में डोक ला(डोक लाम) स्टैंडऑफ़ विवाद को कूटनीतिक बिसात पर जिस चपलता के साथ शह मात कूटनीति खेली और विकराल होते हुए मसले को पूरी तत्परता के साथ मसले को सुलझाया पूरी दुनिया उनके इस कार्य की कायल हो गयी ,इस सुलझाव से उन्होंने 21वीं सदी में निश्चित तौर पर उन्होंने कूटतनीति को वह स्थान दिलाया जो विगत कुछ दशक पहले तक भू राजनीति,/सामरिकी ने ले रखा था।जिसे कम से कम इन तीन मसलों पर विश्व ने देखा और महसूस किया।

शासन प्रशासन की समझ जयशंकर को पारिवारिक विरासत में मिली है,दिल्ली विश्वविद्यालय के सेंट स्टीफंस कॉलेज से स्नातक जयशंकर ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति विज्ञान की स्नातकोत्तर और परमाणु कूटनीति में एम.फिल,,की उपाधि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से प्राप्त किया,और1977 के भारतीय विदेश सेवा के अधिकारी के रूप मे देश सेवा किया उनके पिता के. सुब्रह्मण्यम को देश के अग्रणी रणनीतिक विश्लेषक और परमाणु कूटनीति के पुरोधा के रूप में ख्याति प्राप्त है उन्हें "परमाणु शक्ति और आयुध का प्रबंध करने" और "पहले उपयोग न करने की नीति "(No First Use) नीति को
 तैयार करने का श्रेय दिया जाता है।

 चीनी  जयशंकर के  प्रतिभा के इस क़दर कायल हैं कि उनके चीनी समकक्ष उन्हें  चीनी नाम  सू जिइशेंग (,जिसे,
जि शांग पढ़ा जाता है) से बुलाते है,मंदारिन में इसका अर्थ होता है "बेहतरीन विद्यार्थी" (एक्सीलेन्ट स्टूडेंट).
अब जब वे अपने चीनी समकक्ष के साथ आने वाले बैठक में शरीक होंगे तो उनका दर्ज़ा अधिकारी और राजनेता से आगे निकलते हुए राजनयिक राजनेता के रूप में
अपनी बात से वांग ई को अवगत कराएंगे,यह ऐसा तब  होगा जब जयशंकर चीनी नहीं बोलते,चीन में राजदूत रहे उनके पूर्ववर्ती  अशोक कंठ,गौतम बम्बावले और वर्तमान विदेश सचिव विजय गोखले बेहतर मंदारिन भाषी रहे हैं, पर बीजिंग इस बात से भली भांति परिचित है कि इस "बेहतरीन विद्यार्थी"चीनी कूटनीति को बेहतर तरीके से समझता है ।तभी तो अमेरिकी समाचारपत्र वाशिंगटन पोस्ट जयशंकर के विदेशमंत्री के रूप में शपथ लेने पर टिप्पणी करता है कि "अब भारत पहले से कहीं ज्यादा मजबूती के साथ अंतरराष्ट्रीय/वैश्विक मंचो पर  अपनी मज़बूत और प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराएगा"







Tuesday, June 04, 2019

तियानमेन के तीस साल


लोकतंत्र के मजबूती और विश्व राजनीति में हुए तेजी बदलाव के लिहाज से वर्ष 1989 बेहद महत्वपूर्ण है,थोड़ा फ्लैशबैक में जाते हुए विगत तीस साल पहले हुए घटनाक्रम पर नजर डालें तो सबसे पहले "वार्सा पैक्ट" नाटो के कुटिल नीति के आगे परास्त हुआ और शीत युद्धकालीन प्रतिद्वंदी सोवियत संघ का विघटन हो गया,वहां चुनाव हुए, जर्मनी का एकीकरण हुआ, बर्लिन की मजबूत दीवार ढह गई,पोलैंड में सोलेडीरिटी पार्टी ने लोकतंत्र का स्वाद चखा, इसी साल वैल्वेट क्रान्ति से हैवेल्स चेकोस्लोवाकिया के राष्ट्रपति बने,जापानी सम्राट हिरोहितो का निधन हुआ,अंगोला में चल रहे भीषण गृह युद्ध में संघर्ष विराम हुआ,और  दक्षिण अमेरिकी देश चिली में तानाशाही सैन्य शासन का अंत हुआ, राजनैतिक रंगभेद और छुआछूत का शिकार दक्षिण अफ्रिका में  पहली बार इसी साल राजनीतिक बंदियों की रिहाई शुरू हुई जिसका अंत अफ्रीकी गांधी और "भारत रत्न" नेल्सन मंडेला की रिहाई पर जाकर समाप्त हुई, नोबेल का शांति पुरस्कार निर्वासित तिब्बती धर्म गुरु 14वें दलाई लामा को प्रदान किया गया।

इन तमाम बीते हुए घटनाक्रम पर सरसरी नजर डाले तो ऐसा प्रतीत होता है कि दुनिया में नवजात लोकतंत्र अपने यौवन को छोड़कर से निकलकर मज़बूत और परिपक्व अवस्था को प्राप्त कर रहा था। 

इन सब बातों के बीच विशालकाय एशियाई देश चीन में स्थिति सामान्य नहीं थी,यहां ऐसा कुछ घटित हो रहा जिससे ऐतिहासिक चीनी समाज की मनः स्थिति, शासन प्रणाली के तानाशाही स्वरूप, राज्यव्यवस्था में चीनी सेना का वीभत्स रूप ,मानवाधिकार का दमन,और प्रजातंत्र की उम्मीद की आस में चीनी नागरिकों की उम्मीद के विशाल वटवृक्ष पर वज्रपात कर उसे सदा के लिए ठूंठ बना दिया।

हम बात कर रहे हैं चार जून 1989 को चीन की राजधानी पीकिंग (बीजिंग) के तियानामेन चौक पर  लोकतंत्र  के समर्थन और लोकतांत्रिक सुधार के लिए हज़ारों छात्रों ने जोरदार प्रदर्शन किया।  बीजिंग के मध्य में अवस्थित इस चौक पर छात्रों ने अपना कब्जा जमा कर चीन सरकार से अपनी लोकतांत्रिक, आर्थिक,राजीनीतिक सुधार की मांग को दोहराया जो उनसे वादा किया गया था।
छात्रों ने अपनी एकता से डेंग जियापिंग शासन को बदलाव का स्पष्ट संकेत दिया और फिर प्रतिउत्तर में चीनी सेना ने अपना वीभत्स रूप दिखाते हुए शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे अपने ही नागरिकों पर अंधाधुंध गोलियां बरसाते हुए कम से कम दस हज़ार नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया जिसकी कल्पना वर्तमान सभ्य समाज कर ही नहीं सकता है। वर्ष 2019 के चार जून को इस अमानवीय घटना के तीस साल पूरे हो गए हैं।
 चीनी भाषा में 'तियानमेन" का अर्थ होता है गेट ऑफ हैवेनली पीस या "असीम शांति का अनुभव कराने वाला द्वार"

क्या कारण थे।

15 अप्रैल 1989 में लोकप्रिय सुधारवादी नेता और कम्युनिस्ट पार्टी के उच्च पदस्थ नेता हू याओबांग ,जो देश राजनैतिक और आर्थिक सुधारों के धुर समर्थक थे,उनकी अचानक मौ के बाद दो दिन बाद हज़ारो की संख्या में लोकतंत्र समर्थक छात्र तियानमेन स्क्वायर पर जमा होने लगे और  देश मे व्याप्त तमाम मुद्दों पर भाषणबाज़ी और अपने प्रिय नेता को श्रंद्धाजलि देते हुए प्रदर्शन करने लगे जिसकी तीव्रता दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा थी थी।

चीन के  कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र  "पीपुल्स डेली' ने  अपने आलेख में छात्रों के इस आंदोलन को "पहले से तयशुदा और संस्थागत अराजकता "फैलाने वाला कदम बताया जो न सिर्फ "पार्टी विरोधी" बल्कि "समाजवाद विरोधी" भी था। छात्रों ने इस आलेख की जम कर निंदा की और सरकार  पर दवाब बनाने और सुधारात्मक उपचार की मांग को लेकर भूख हड़ताल पर बैठ गए जो चीनी नेतृत्व को इन छात्रों का तरीका नागवार गुजरा।
बीजिंग की सड़कें छात्रमय हो चुकी थी जो एकबारगी यह बता रही थी कि माओ के देश मे लोकतंत्र की कोंपले खिल उठेंगी,छात्रों का प्रदर्शन बढ़ता गया,ठीक इसी समय रूस के तत्कालीन राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचोव चीन के राजकीय दौरे पर थे,वे अपने तयशुदा कार्यक्रम के साथ बीजिंग तो पहुंचे पर  उत्साही और लोकतंत्र समर्थक छात्रों  के आंदोलन के कारण उनका पारंपरिक रूप से रस्मी स्वागत नहीं हो सका। किसी राजकीय अथिति का स्वागत न  हो पाना अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में आप में दुर्लभतम घटना है, इससे से भी तियानमेन चौक की स्थिति का सहज अंदाज़ा लगाया जा सकता है।
छात्रों के इस वर्ताव से और बिगड़ती स्थिति को देखते हुए आग बबूला प्रीमियर ली पेंग के आदेश पर 19 मई को राजधानी में "मार्शल लॉ" लगाते हुए प्रशासन सेना को सौंप दिया।

इसके साथ मीडिया,खासकर पश्चिमी मीडिया पर जबदरस्त नकेल कसा और उन्हें चीनी सेना से जुड़े किसी भी पत्रकारीय कार्य के लिए प्रतिबंध लगाया।
छात्रों के साथ साथ उस वक्त बीजिंग में मौजूद पत्रकारों को भी चीनी सेना पर पूरा भरोसा था ,वे इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि चीनी सेना छात्रों के साथ कुछ भी अमानवीय हरकत नहीं करेगी।
दरअसल चीन उस वक़्त विभिन्न  घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर बुरी तरह उलझा हुआ था, रही सही कसर सोवियत संघ के विघटन ने पूरी कर दी।
इस विघटन के पश्चात चीनी रणनीतिक विश्लेषकों का मानना था कि विश्व व्यवस्था में रूस का स्थान नैसर्गिक रूप से चीन ही ले सकता है। छात्रों  के इस प्रदर्शन को कठोर और संकुचित चीनी राजव्यवस्था के लिए गंभीर खतरा माना गया तथा केंद्रीय पोलित ब्यूरो ने सेना को इसपर कठोरतम कार्रवाई के आवश्यक दिशा निर्देश जारी किए जिसका परिणाम जग जाहिर है

चीनी सेना का अमानवीय और वीभत्स रूप।
सेना अपने कार्यप्रणालियों पर अपना काम करती रहीं ,विरोध होता रहा,छात्र अपनी मांग रखते रहे,लेकिन  4 जून की अल सुबह सेना एकाएक हरकत में आई  बख़्तरबंद गाड़ियों और टैंको के काफ़िला के साथ पूरे इलाके में चीनी सैनिकों के शार्पशूटर्स ने बीजिंग में पूर्वी और पश्चिमी छोर से इन निहत्थे और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को बिना किसी पूर्व चेतावनी दिए जम कर अपना निशाना बनाया और "काउंटर रेवोल्यूशनरी' के आरोप लगाते हुए बड़े पैमाने देशव्यापी अवैध गिरफ्तारी किया।

हालाकिं सेना का जनविद्रोह को कुचलने के लिए इस्तेमाल किया  जाना कोई नई बात नहीं है, भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को देखा जाय तो औपनिवेशिक ब्रिटिश शासन  का मुख्य आधार सेना ही थी जिसमे भारी संख्या में भारतीय शामिल थे जो "नाम ,नमक और निशान" की , भावना सर ओतप्रोत होकर भारतीय जनता पर अंग्रेजी आदेशो का पालन करते हुए अत्याचार करते थे,1857 से पहले और बाद के तमाम आदिवासी विद्रोहों और अन्य क्षेत्रों में हुए विद्रोहों और क्रांतियों को  सेना ने ही बुरी तरह कुचला और ब्रिटिश शासन को स्थायित्व प्रदान किया लेकिन इनसब के वावजूद एक नाम गढ़वाल रेजिमेंट के सैनिक चन्द्र सिंह गढ़वाली का भी है जिसने पेशावर में स्वतंत्रता सेनानीयों पर गोली चलाने के आदेश की अवहेलना कर दी थी। सैन्य परम्परा के हिसाब से चंद्र सिंह का यह कृत्य अक्षम्य था लेकिन एक भारतीय होने के नाते उसके इस कृत्य ने इतिहास में अमर बना दिया।
औपनिवेशिक शासन व्यवस्था के समाप्ति के पूरे विश्व मे सेना के प्रति दृष्टिकोण में बदलाव आया, अब सेना उत्पीड़क नही मित्र और संकटमोचन की भूमिका निभाती है,चीन में भी अपनी सेना से प्रदर्शनकारी छात्र संभवतः यही उम्मीद कर रहे थे।

टैंक मैन
इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक कालजयी तस्वीर सामने आती है जिसमे एक साधारण सा दिखने वाला चीनी व्यक्ति जिसके हाथ में घरेलू सामान को थैला लिए चीनी सेना के टैंको के काफिले  के सामने तन कर खड़ा हो गया,हालाँकि इस व्यक्ति की पहचान कभी नही हो पाई। लेकिन इस तस्वीर ने बिना कहे पूरे कहानी बयां कर देती है।सरकार की इस सैन्य कदम ने पूरे आंदोलन की कमर तोड़ दी,प्रदर्शनकारियों को देश मे रहना दूभर हो गया, बहुतों ने पश्चिमी देशों में तो अनेकों ने हांगकांग में शरण लिया



ब्रिटिश डिप्लोमेटिक केबल की रिपोर्ट

अगर गुप्त ब्रिटिश डिप्लोमेटिक केबल की माने तो चीन की सेना की इस कार्रवाई में कम से कम दस हज़ार लोग मारे गए।यह केबल ब्रिटेन के चरण में राजदूत सर एलन डोनाल्ड ने  चार जून 1989 को लंदन प्रेषित अपने कूट संदेश में इस घटना का पूरा ब्यौरा भेजा।

चीनी सरकार ने तीस साल बीत जाने के बाद आज तक कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।इस घटना कोई आंतरिक मसला बताते हुए डेंग जियपिंग से मौजूदा शी शिनपिंग के शासन ने इसपर किसी तरह के बयान देने से सदा परहेज किया।

द्वितीय विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद किसी सेना द्वारा अपने नागरिकों पर किया गया संभवतः सबसे वीभत्स और अमानुषिक कार्रवाई थी।
चीन के इस कदम की चहुँ ओर निंदा की गई,लेकिन चीन पर इसका कोई असर नहीं हुआ साथ ही चीन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया की दिशा में उठाये गए कदम को फौजी बूटों द्वारा बेरहमी के साथ कुचल दिया गया।
सरकार चौकन्नी हो गयी और उस आंदोलन से जुड़े एक एक लोगों पर कठोर कार्रवाई पर उतारू होते हुए तमाम लोगों को सज़ा देने का कार्य युद्धस्तर पर किया जाने लगा।

सबूतों को मिटाना

 चीन की जनवादी सरकार के कर्मचारियों ने इस घटना से जुड़े 20 लाख से अधिक ऑनलाइन सेंसर किये,इस घटना से जुड़े तमाम शब्द, को हटा दिया गया ऑनलाइन तथा ऑफ़लाइन कड़ी निगरानी रखी जाने लगी । 

इस घटना के 25 साल बाद 2014 में  चीन प्रशासित हांगकांग में हांगकांग फेडरेशन ऑफ स्टूडेंट्स और लोकतंत्र समर्थक छात्र संगठन "स्कॉलरिज्म" के बैनर तले "येलो अम्ब्रेला" मूवमेंट  को आगाज़ किया गया,लेकिन इसे भी फौरी तौर पर शांत कर दिया गया।इस आंदोलन की कमान छात्रों ने ही संभाली और सूचना प्रौद्योगिकी का सहारा लिया प्रशासन द्वारा इनरनेट को ठप्प किये जाने की स्थिति में उन्होंने "फायर चैट" नामक एक ऑफलाइन मोड में चलने वाला ऐप विकसित किया जिससे डाउनलोड करके आंदोलनकारी एकदूसरे से संपर्क में रह सकते हैं।

गांधी फैक्टर

तियानमेन चौक औऱ हांगकांग कर घटना में बस इतनी समानता है कि ये दोनों आंदोलन छात्रों की दिमाग की उपज थी,दोनो आंदोलन में  चीन के विरुद्ध कोई युद्ध नहीं छेड़ा जा रहा था,उनकी बस एक ही मांग की "संस्थागत सुधार की उस प्रक्रिया को अपनाया जाय जो उनसे वादा किया गया था"  छात्र वही कर रहे थे जो 79 साल पहले गांधी ने किया था,"सविनय अवज्ञा"(सरकार के आदेश को विन्रमतापूर्वक न मानने की पहल)जो उन्होंने दांडी मार्च के दौरान दिया था,माओ के चीन की कम्युनिस्ट धरती पर गांधी के प्रभावी विचारों का पदार्पण कम्युनिस्टों की सोच से कहीं परे है ।

अमेरिका षड्यंत्र।
तियानमेन चौक की घटना पर सभी देशों में चीन का आंतरिक मामला बता कर अपना पल्ला झाड़ने की कोशिश की वहीं चीन ने इसे अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए की कारस्तानी बताते हुए उसे अस्थिर करने की साज़िश बताया लेकिन इन सब मे मूल मुद्दा गौण हो गया,जो आज तक कायम है।

विश्वव्यापी अन्य लोकतांत्रिक क्रांतियां

1989 से 2019 के वर्षो में राजशाही,सीमित  और नवजात लोकतंत्र वाले देश मे अनेकों प्रदर्शन हुए जिसमे,ट्यूनीसिया में 2011की की चमेली क्रान्ति( जैस्मिन रेवोल्यूशन), मलेशिया में गुड़हल क्रांति(हिबिस्कस रेवोल्यूशन), जॉर्जिया में 2003 में हुए गुलाब(रोज़)क्रांति,यूक्रेन में 2004 में हुए नारंगी/चेस्टनट क्रांति (ऑरेंज /चेस्टनट रेवोल्यूशन),किर्गिस्तान में 2005 में हुए ट्यूलिप /पिंक/लेमन/सिल्क/डाफोडिल्स क्रांति।इराक में 2005 में ही हुए बैंगनी (पर्पल )क्रांति,इसी साल लेबनॉन में हुए देवदार क्रांति,कुवैत में हुए नीली(ब्लू) क्रांतिम्यांमार,में 2007 में हुए केसर(सैफरन)क्रान्ति, ईरान में हुए 2009 की हरी (ग्रीन)क्रांति,मिस्र के तहरीर चौक पर हुए 2011की (ट्विटर /लोटस रेवोल्यूशन) जिसे पश्चिमी मीडिया ने अरब स्प्रिंग का नाम दिया था जिसका दायरा अमेरिका के "ऑक्युपाई वालस्ट्रीट"से बढ़ता हुआ एमानुएल मैक्रॉन के फ्रांस  में 'येलो वेस्ट क्रांति तक जा पहुंचा है।

अगर सभी क्रांति की समीक्षा करें तो एक बात सामने आती  जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया को सुचारू रूप  से निर्वहन की बात करती है,उपरोक्त तमाम रंगीन क्रांति को या तो येन केन प्रकारेण कुचल दिया गया या फिर गबन के तरीके है चालीस और हर किसी का मूल्य होता  है के तर्ज पर तत्काल शांत कर कठोर निगरानी सूची में शामिल कर लिया गया।

30वीं वर्षगांठ पर कार्यक्रम
अमेरिका की राजधानी वाशिंगटन डी सी के कैपिटल हिल के सामने 23 मानवाधिकार संगठनों ने चार जून को इस घटना के पीड़ित परिजनों के साथ तियानमेन स्क्वायर कि घटना के विरोध में रैली निकाली,जिसमे लोकतंत्र की सुनहरे सपनो को संजोये उन तमाम युवा छात्रों के बलिदान को याद किया गया।




ट्रेड वॉर के बीच अमेरिकी विदेश सचिव माइक पोम्पियो में 
कल जारी किए वक्तव्य में तियानमेन के चीनी प्रदर्शनकारियों को " हीरो"बताया और उनकी माताओं को सलाम किया।  उन्होंने उन चीनी लोगों को भी सलाम किया जो अपने अधिकारों को लेकर आज भी भी डट कर खड़े है।सचिव ,पोम्पियो को भरोसा है कि तियानमेन चौक  से प्रेरणा लेकर आने वाली पीढ़ियां लोकतंत्र और स्वतंत्रता के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी,जैसे बर्लिन की दीवार ढही और पूर्वी यूरोप में कम्युनिज्म का पतन हुआ।
विदेश सचिव पोम्पियो के इस बयान कि चीनी विदेश मंत्रालय ने तीखी प्रतिक्रिया जाहिर करते हुए बयान को पूरी गैर जिंम्मेदार,मनगढंत और बेतुका और पूर्वाग्रह से ग्रस्त क़रार दिया चीन के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने से बाज़ आने को कहा ।

तियानमेन की यह घटना लोकतंत्र के हालात,उसकी बेहतरी,उन्नयन,उसमे नवोन्मेष,उसकी शुचिता,गरिमा को बरकरार  रखने की दिशा ने उठाया जाने वाले कदम की दिशा में संजो कर रखने वाली चिर अविस्मरणीय घटना है ,जब भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के सुदृढ़ीकरण की बात आएगी निश्चित रूप सर तियानमेन चौक की घटना बरबस हमारे जेहन को झंकृत करेगी और उन तथाकथित वैश्विक चौधरियों की चुप्पी औऱ तटस्थता को जी भर के कोसेगी।