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Tuesday, May 28, 2019

बिम्सटेक :मास्टर स्ट्रोक ऑफ मोदी डिप्लोमेसी.

सत्रहवें आम चनाव के अंतिम परिणाम ने नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली भारतीय जनता पार्टी नीत राजग गठबंधन ने लोकसभा चुनावों में शानदार और ऐतिहासिक जीत हासिल की है। अकेले भाजपा 303 सीट जीतकर 272 के जादुई आंकड़े से कहीं आगे निकलते हुए जीत का कीर्तिमान स्थापित किया।

2014 के नतीजों से आगे बढ़ते हुए बीजेपी ने प्रचंड बहुमत के साथ कामयाबी का परचम लहराया है और पूरे देश में पार्टी के वोट शेयर में ज़बरदस्त उछाल के साथ भाजपा ने बड़े ही आराम से बहुमत का आंकड़ा पार करते हुए देश को "टीमो" (देयर इज मोदी ओनली) फ़ैक्टर से देश को अवगत कराया,इससे पहले सिर्फ "टीना"(देयर इज नो अल्टरनेटिव टू इंदिरा गांधी ) को ही समझा जाता था।

सरकार गठन से ठीक पहले  वैश्विक नेताओं से मिले बधाई संदेश और अपने पाकिस्तानी समकक्ष इमरान खान के "डायलिंग डिप्लोमेसी" के बीच अपने शपथग्रहण समारोह में शांत, संपन्न और स्थिर बंगाल की खाड़ी क्षेत्र' के संगठन "बिम्सटेक"'(बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फ़ॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन) (BIMSTEC)' देशों के राज्यप्रमुखों के साथ साथ पारंपरिक मित्र देश मॉरीशस और मध्य एशिया के रणनीतिक और सामरिक साझेदार किर्गिज़स्तान के राज्यप्रमुख को मुख्य अतिथि के रूप में न्योता देते हुए प्रधानमंत्री "नियुक्त" नरेंद्र मोदी ने तेजी से बदलते हालिया घटनाक्रम में एक शानदार मास्टर स्ट्रोक खेलते हुए पाकिस्तान को हतप्रभ और चौकन्ने चीन को अचंभित कर पूरे एशिया औऱ इंडो पैसेफिक क्षेत्र को प्रतिसंतुलित कर दिया ।

जिसका उदाहरण  बिम्सटेक देशों के राज्यप्रमुखों का आगामी 30 मई को होने वाले शपथग्रहण में आमन्त्रण देकर जहां पकिस्तान और चीन के "सदाबहार दोस्ती " की धुरी को भारत ने वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में यूं कहें कि मैदान मार लिया तो कहना कोई बेईमानी नहीं होगी। शांति की राह पर चलने को व्याकुल पाकिस्तान को शपथ ग्रहण समारोह में न बुलाया जाना अपने आप में बहुत बड़ी कूटनयिक जीत मानी जा रही है।


भू:राजनीति और सामरिकी में बदलते हुए पैमाने पर जहां आज भू:आर्थिकी और ऊर्जा सुरक्षा को तरज़ीह दी जा रही है लेकिन भूगोल का महत्व किसी भी कीमत पर कम नहीं हुआ है ।
 भारत के इस फैसले से एकबार फिर से यह भी सिद्ध हुआ की राजनय प्रक्रिया में आप आप भूगोल को नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं जिसे वर्तमान कूटनीतिक गलियारों में "भूगोल"को वह व्यापक तवज्जो नहीं मिल रही थी, जो अमूमन उसे मिलना चाहिये भूगोल की जगह जो पिछले तीन दशकों से मुख्य रूपसे आर्थिकी ,पर्यावरणीय मसले,निः शस्त्रीकरण, विश्व शांति और मानवाधिकार ने ले रखा है, पर भारत के इस फैसले ने बदलती भू राजनीति 2.0 के रूप में इसकी शुरुआत कर  दिया,जिसे अन्य दूसरे देश को अपनाने में देरी नहीं करेंगे।

भारत ने अपने इस फैसले से कई हितों और लक्ष्यों को एक साथ साधा तो पूरे विश्व को अपनी शक्ति से परिचय का संदेश भी दिया।
इस फैसले के  कई संभावित आयाम है जिसमे:


  • श्रीलंका में गत माह ईस्टर के मौक़े पर सिलसिलेवार हुए आत्मघाती बम हमला और क्षेत्र में उपजी अस्थिरताओं का वातावरण।
  • राजनीति पर नियंत्रण, लेकिन इस्लामी चरमपंथ और कूटनीति से जूझता बांग्लादेश।
  • श्रीलंका में ईस्टर आत्मघाती बॉम्बिंग की घटना के बाद बांग्लादेश में सुरक्षा की स्थिति को और अधिक चिंताजनक बना दिया,जिसके बाद देश में सुरक्षा बलों द्वारा आतंकवादियों के खिलाफ़ जबर्दस्त आतंकवाद निरोधी अभियान चलाए जा रहे है।
  • पहले चीन के प्रभाव में आता नेपाल और अब राजनीतिक उथल पुथल से जूझता नेपाल ,बीते सप्ताह बम हमलों में कम से कम चार लोग मारे गए थे,आमतौर पर नेपाल को अमन पसन्द देश माना जाता है।
  • भूटान में नयी सरकार के गठन ,के बाद बीजिंग की फिर से भूटान के साथ राजनयिक सम्बन्ध बनाने की प्रबल इच्छा ,चुम्बी घाटी समेत अन्य क्षेत्रों में उसकी पुरानी "हथियाने की कोशिश "जारी ।
  • जबकि म्यांमार में शांति का सीधा अर्थ हमारे सम्पूर्ण उत्तरपूर्वी राज्यों की शांति तथा आर्थिक समृद्धि और खुशहाली से है। म्यांमार हमारे लिए भावी ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी अत्यधिक संवेदनशील है,जो भारत और चीन के रिश्तों में किसी तरह के बदलाव के लिये जिम्मेदार है। 
  • काउंटर टेररिज़म के जद में  श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार और भारत है।साथ ही बांग्लादेश और म्यांमार के बीच रोहिंग्या शरणार्थी का मसला और बांग्लादेश में म्यांमार से सटे इलाके में रोहिंग्या द्वारा नशीली दवाइयां के अवैध व्यापार से जूझना और इनकी विकराल होती मानवीय समस्या और बांग्लादेश पर बढ़ता आर्थिक बोझ ने स्थिति और भी जटिल और गंभीर बना दिया 
  • वहीं पारंपरिक मित्र देशों में मॉरीशस एफडीआई सहित अन्य आर्थिक मोर्चे पर हमारा पुराना साथी रहा है,जो इस वक्त  चागोस और डिएगो गार्सिया द्वीपों पर कानूनी कब्जे को लेकर ब्रिटेन तथा अमेरिका से उलझा पड़ा  है और  भारत इसमे महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
  • जबकि किर्गिज़स्तान की बात करें तो यह देश हमारे लिए मध्य एशिया का गेटवे है। शंघाई सहयोग संगठन की अध्यक्षता संभाल रहे इस भू:सामरिक और रणनीतिक महत्व के देश की अहमियत अमेरिका और रूस भी मानते है।

उपरोक्त सभी देशों को किसी न किसी रूप से एक अदद भारतीय सहयोग की दरकार है क्योंकि ये तमाम देशों विभिन्न समस्याओं से लगातार जूझ रहे है वहीं दूसरी ओर भारत को  इन देशों की समस्या चाहे वह आतंकवाद निरोधी अभियान  ,लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बढ़ावा देना, क्षमता निर्माण अथवा कौशल विकास के साथ साथ राजव्यवस्था के अन्य सभी पहलुओं,शांति,कृषि एवं सम्बद्ध क्षेत्र ,पर्यावरणीय,आपदा प्रबंधन,और राहत एवं बचाव कार्य/मिशन,विज्ञान एवम तकनीक, अंतरिक्ष प्रद्योगिकी और सैन्य और तमाम असैन्य समस्या से सफलतापूर्वक निबटने क्या व्यापक अनुभव है जिसे यह समूह अपनी समस्या भारत से साझा कर अपनी समस्याओं से निजात पा सकता है।
वहीं दूसरी तरफ भारत को भी इन देशों के साथ अच्छे और मित्रवत संबध हैं इसलिए भारत अपनी विशेषज्ञता को इनके साथ बांटने में कभी संकोच नहीं करेगा और न ही  भारत को करना चाहिए जबकि इस दिशा में और बेहतर, समन्वयकारी औऱ मजबूत संबन्ध विकसित करने की दिशा में भरसक न्यायोचित कदम उठाने की दरकार होनी चाहिए ।

नेपाल और बांग्लादेश दो ऐसे देश हैं जिनके प्रधानमंत्रियों ने इस आम सभा के अंतिम चुनावी नतीजों का इंतजार किये बगैर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उनके दूसरे कार्यकाल की बधाई देने में कोई देर नहीं लगाई। यह घटना इनके परस्पर आपसी विश्वास को दर्शाता है। जहां नेपाल और भूटान को हम "नेशनल ट्रीटमेंट" देतें हैं तो वहीं वर्तमान बांग्लादेश से विभिन्न मोर्चे पर हमारे संबंध काफी मधुर है।जिसके कई उदाहरण हाल के वर्षों में देखे गए हैं।इसके अतिरिक्त समूह  के अन्य इन सभी देशों के साथ भारत के सम्बंध काफी बेहतर है,जबकि सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि हकीकत में ये दोनों देश चीन के तरफ से गंभीर आर्थिक दबाब झेल रहे हैं लेकिन भूगोल को तो आप बदल नहीं सकते हैं। इन देशों में चीन की चुनौती बरकरार है जिसे तोड़ना भारत के लिए एक गम्भीर समस्या की तरह है,क्योंकि म्यामांर,श्रीलंका, नेपाल ,बांग्लादेश,के साथ साथ थाईलैंड में भी विशाल चीनी अवसंरचनात्मक और रणनीतिक निवेश भारत की चिंताओं के सबब बन कर उभर रहा है,जिसके ताज़ा कड़ी में बांग्लादेश में कॉक्स बाजार में चीनी पनडुब्बियों के लिए अवसंरचना तैयार होने की खबर निश्चित रूप से हमे परेशान करने और चीन की मोतियों की मालाओं की रणनीति/स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स का आखिरी पड़ाव के रूप में पूरा होने के रूप में देखा जा रहा है।

उपरोक्त घटनाक्रमों पर "रायसीना हिल्स" और "7,एलकेएम" की त्वरित सक्रियता और प्रो एक्टिव कदम आज की स्थिर और स्थायित्व प्राप्त भारतीय राजनीति और राजनय में बेहतर कदम माना जा रहा है,और यही इसकी राजनयिक परिपक्वता और इस क्षेत्र में अपनी जिम्मेदारियों को दर्शाता है।

'बे ऑफ़ बंगाल इनिशिएटिव फ़ॉर मल्टी-सेक्टरल टेक्निकल एंड इकनॉमिक कोऑपरेशन (BIMSTEC).
बिम्सटेक की स्थापना 1997 में हुई थी| बिम्सटेक का इतिहास एक उपक्षेत्रीय आर्थिक सहयोग संगठन के रूप में इसका गठन 6 जून, 1997 को बैंकाक घोषणा के बाद किया गया।
इसमें भारत के अलावा नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका, म्यांमार, भूटान और थाईलैंड शामिल हैं।दुनिया की कुल 22 फीसद आबादी बिम्सटेक देशों में रहती है।साथ ही बिम्सटेक देशों की कुल जीडीपी 2.8 ट्रिलियन डॉलर है।बिम्सटेक देश आर्थिक ,सामरिक और रणनीतिक रूप में काफी अहम है।
विस्तृत जानकारी के लिए : https://bimstec.org/

जहां एक तरफ विश्व "हॉरमुज़ स्ट्रेट क्राइसिस",ईरान पर तेल निर्यात पर प्रतिबंध, तेज़ होती व्यापार युद्ध की तपिश, अमेरिका में ट्रंप का विरोध और शिनपिंग का समर्थन,चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर में नित नए आते नए मोड़,वेनेज़ुएला संकट,दक्षिणी चीन सागर में बढ़ता तनाव ,ऊर्जा सुरक्षा और संकट,वैश्विक तापन,पर्यावरणीय मसले, डब्लूटीओ और अन्य मौद्रिक संस्थाओ में आपसी खींचतान से जुड़े मसले और ताजा ब्रेग्जिट मसला से दो चार हो रहा है। वहीं हिंद और प्रशांत महासागर से लगे हुए चार लोकतंत्र जिनकी सोच एक जैसी मानी जाती है,जो एक भू-राजनैतिक इलाक़े का निर्माण करते हैं जिसे इंडो-पैसिफ़ि‍क कहते हैं। इंडो पसिफ़िक देश इसमें अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।जिनमें जापान सुर ऑस्ट्रेलिया को भारत "एक्सटेंडेड नेबरहुड" मानता है,जो भारत के आर्थिक,रानीतिक और सामरिक साझेदार भी है ।

इनके साथ-साथ विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढने पर भारत को चीन की तरफ से अक्सर विपरीत प्रतिक्रिया आती रहती है,लेकिन इस दफ़े भारत की सधा हुआ जवाब देकर ड्रैगन को तिलमिला कर रख दिया है।
भारत ने पाकिस्तान को शपथग्रहण में न बुलाकर उसे आईना दिखाया गया जिसका वह सही मायने में हक़दार था,साथ ही यह भी संदेश गया कि आतंकवाद और बातचीत साथ साथ नहीं चल सकती है, वहीं दूसरी तरफ गेंद पाकिस्तान के पाले में डालते हुए भारत ने स्पष्ट किया कि  बात करनी है तो पाकिस्तान बातचीत का माहौल और पिच खुद तैयार करे "और आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेंस नीति जारी रहेगी ,आतंकवादी निरोधी अभियान पूरे शबाब पर यहां तक कि रमजान में भी जारी रहेगा।

प्रभावकारी चीनी पक्ष और चुनौती।

गत वर्ष चीन के प्रभावकारी स्वरूप उस वक्त सामने  आया जब नेपाल ने पुणे में आयोजित बिम्सटेक के साझा सैन्य अभ्यास में शामिल होने से मना कर दिया और चीन के साथ सागरमाथा श्रृंखला के सैन्य अभ्यास में शामिल होना ज़्यादा पसन्द किया,यह महज बानगी भर ऐसे कई मौके देखे गए है जब इस क्षेत्र में चीनी प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुए हैं।हिंद-प्रशांत में भारत स्वायत्तता और सामंजस्य के बीच एक तालमेल बनाना चाहता है वहीं बीआरआई /ओबीओआर मसले भारत पर भारत के स्पष्ट नकारात्मक रूप ने लगातार दूसरे दफ़े बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव फोरम के बहिष्कार से चीन को कई महत्वपूर्ण सन्देश दिए हैं।
राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने जहां एक “न्यू एज " और “चीनी राष्ट्र के महान कायाकल्प” की घोषणा भी की थी।लेकिन उनका यह संकल्प भारत के बिना अधूरा है,और यह बात चीनी अच्छे से जानते है,डोक ला/डोक लाम तो महज ट्रेलर था तो मसूद अजहर प्रकरण सिनेमा का इंटरवल,वैसे जल थल और नभ में सिनेमा अभी जारी है और रहेगा।


अगर मामले की सूक्ष्मता से अवलोकन करें तो यह यह स्पष्ट है की कहने को तो सीपीईसी पाकिस्तान और चीन की ‘सदाबहार/ऑल वेदर  मित्रता’ के अंतर्गत चीनी निवेश के ज़रिये पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों, जैसे की कृषि, संचार आर्थिक बाजार का पुनः प्रवर्तन है पर इसका प्रमुख उद्देश्य चीन का सैन्य विस्तारीकरण है।

इसी कड़ी में बंगाल की खाड़ी का महत्व खासा बढ़ जाता है।हिन्द-प्रशांत के व्यापक क्षेत्र में बंगाल की खाड़ी फिर से केंद्रीय भूमिका में आने लगी है । भारतऔर दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के विचारों में अपेक्षाकृत अधिक निकटता दृष्टिगोचर हो रही है और इन देशों के बीच इसकी खासी जरुरत महसूस होने लगी है कि अब वे और ज्यादा प्रभावी तरीके से एक दूसरे के साथ तालमेल और संपर्क बढ़ाएं।

इसका अंदाजा आप सहज लगा सकते हो जब समुद्र के रास्ते पूरी दुनिया में होने वाले व्यापार का एक-चौथाई हिस्सा बंगाल की खाड़ी से होकर गुज़रता हो और ऊर्जा सुरक्षा और उच्चतर जीडीपी के भूखे चीन की सम्पूर्ण ऊर्जा राजनय की नब्ज़ इसी क्षेत्र से गुजरती हो जिसे तकनीकी भाषा मे" सी लाइन ऑफ़ कम्युनिकेशन"(एसएलओसी) कहते है।पूरी चीनी ऊर्जा सुरक्षा ,जिसकी नब्ज भारतीय प्रभुत्व वाले हिन्द महासागर से हो कर गुजरती है। चीनी भारत से इस कदर खौफ़जदा रहते हैं कि वे  अपने आयल टैंकरो को सुरक्षा प्रदान करते हुए अपने परमाणु पनडुब्बी को भी इस क्षेत्र मे भेजने से नहीं हिचकते हैं वहीं भारत ने पूरे हिन्द महासागर को " शांति का क्षेत्र" के रूप में घोषित और वर्णित करता है। जो चीन को रास नही आता है।

भारत के उद्देश्य का एक सकारात्मक तर्क यह भी है कि हिंद-प्रशांत को एक सिलसिलेवार रणनीति के तौर पर देखा जाए न कि क्षेत्रीय आधार पर कुछ बंटे हुए लक्ष्यों, साझेदारियों और गठबंधनों के तौर पर ये चार देशों का यह समूह, यानि क्वाड(QUAD), भारत को एक मौक़ा देता है कि वो इलाके के मध्य में होने के नाते दोनों छोर पर रणनीतिक आधार पर अपनी सुरक्षा ज़रूरतों को खाड़ी से लेकर मलक्का स्ट्रेट (मलक्का जलडमरूमध्य) तक पुख़्ता करे, दूसरी बात यह है कि भारत की लुक ईस्ट नीति है जो बदलकर पहले एक्ट ईस्ट और फिर "एक्सटेंडेड एक्ट  ईस्ट" की दिशा में मुखर हो रही है । यह तमाम संभावित लक्ष्यों को नरेंद्र मोदी नीत सरकार ने महज एम लक्ष्य में बेध दिया है ऐसा पहले कभी देखा नहीं  गया  था।

भारत की एक्ट ईस्ट पालिसी और नेबरहुड फर्स्ट के संदर्भ में यह खासतौर पर अहम साबित हो सकता है| पाकिस्तान की गैर-मौजूदगी वाला यह संगठन दक्षिण एशिया के देशों को आपसी सहयोग के लिये सार्क से बेहतर और बड़ा वैकल्पिक मंच दे सकता है| बिम्सटेक का 14 मुख्य उद्देश्य है. जिसमें बंगाल की खाड़ी के किनारे दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक सहयोग शामिल है।
साथ ही निवेश, टेक्नोलॉजी, टूरिज्म, ह्यूमन रिसोर्स डेवलेपमेंट, कृषि, मत्स्य पालन, परिवहन और संचार, कपड़ा, चमड़ा आदि शामिल है।
बिम्सटेक का मुख्य उद्देश्य बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में स्थित दक्षिण एशियाई और दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक सहयोग स्थापित करना है।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी और नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी को लेकर बिम्सटेक भारत के लिए महत्वपूर्ण है.


बिम्सटेक की बढ़ती अहमियत।

सात देशों का यह संगठन मुख्य रूप से एक " ,बहुपक्षीय सहयोगात्मक संगठन" है जो 4T(ट्रेड,ट्रांसपोर्ट, टूरिज्म टेक्नोलॉजी)तथा,ऊर्जा,कृषि एवं सहायक क्षेत्र ,गरीबी उन्मूलन, आतंकवाद, संस्कृति, जनसंपर्क, सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन को भी शामिल किया गया।
बिम्सटेक का मुख्यालय ढाका में है।बिम्सटेक के जनांकिये लाभांश का महत्त्व का अंदाज़ा महज इसी बात से लगाया जा सकता है कि दुनिया की लगभग 22 फीसदी आबादी बंगाल की खाड़ी के आस-पास स्थित इन सात देशों में रहती है जिनका संयुक्त सकल घरेलू उत्पाद 2.8ट्रिलियन डॉलर के समीप है।
इन सभी देशों ने 2012 से 2016 के बीच अपनी औसत आर्थिक वार्षिक वृद्धि दर को 3.5 फीसदी से 7.2 फीसदी के मध्य बनाए रखने का जीवन्त लक्ष्य रखा है।इसके रणनीतिक महत्व और भी बढ़ जाता है जब वैश्विक समुद्री व्यापार का एक-चौथाई हिस्सा बंगाल की खाड़ी से होकर गुज़रता है|

बिम्सटेक के मुख्य उद्देश्य

बंगाल की खाड़ी के किनारे दक्षिण एशियाई और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच तकनीकी और आर्थिक,रणनीतिक सहयोग समेत 14 अन्य सहयोगों में साझा मंच प्रदान करना शामिल है।

बिम्सटेक भारत के लिये महत्त्वपूर्ण क्यों है।

बिम्सटेक के सात  देश बंगाल की खाड़ी के आसपास स्थित हैं जो एकसमान क्षेत्रीय एकता को दर्शाते हैं| भारत ने शुरूआती दौर से ही इस संगठन को आगे बढ़ाने में आपनी सक्रिय भूमिका निभाई है| "गुजराल डाक्ट्रिन" के जद में यह क्षेत्र मृतप्राय पड़ गया था लेकिन क्षेत्र की बदलती भू:आर्थिकी ने इसे पुनर्जीवित कर दिया।बिम्सटेक , दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के बीच एक संपर्क सेतु की तरह काम करता है| 
इस समूह में दो देश म्याँमार और थाईलैंड दक्षिण-पूर्व एशिया के हैं जो भारत को दक्षिण-पूर्वी इलाकों से जोड़ने के लिहाज़ से बेहद अहम हैं| इससे भारत के वाणिज्य और व्यापार को न केवल बढ़ावा मिलेगा बल्कि भारत और म्याँमार के बीच हाईवे प्रोजेक्ट भारत,कलादान मल्टी मॉडल ट्रांसपोर्ट प्रोजेक्ट सहित अन्य प्रोजेक्ट को  पूर्व एशिया नीति को मज़बूती प्रदान करेगा जिसमे भारत-म्याँमार के बीच परिवहन   परियोजना,भारत-म्याँमार-थाईलैंड राजमार्ग परियोजना का विकास और भारत बांग्लादेश और नेपाल के बीच राजमार्ग परियोजना को तेजी से गति मिलेगी और वाणिज्य व्यापार के साथ साथ आपसी संपर्क और प्रगाढ़ होगा।
भारत के अलावा बिम्सटेक के सदस्य देशों के लिये यह संगठन काफी महत्त्वपूर्ण है। बिम्सटेक देशों के बीच मज़बूत संबंध भारत के संपूर्ण पूर्वोत्तर क्षेत्र के विकास को गति प्रदान करता है,बिम्सटेक दक्षिण और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच एक पुल की तरह काम करता है| इसके सात में से पाँच देश सार्क के सदस्य हैं जबकि दो आसियान के सदस्य हैं| ऐसे में यह सार्क और आसियान देशों के बीच अंतर क्षेत्रीय सहयोग का भी एक महत्वपूर्ण मंच है।

बिम्सटेक के ज़रिये बांग्लादेश की तीव्र गति से बढ़ती अर्थव्यस्था की सीधी पहुंच  भूटान, नेपाल और म्यांमार होते हुए सीधे थाईलैंड तक हो जाती है और बांग्लादेश की पहचान बंगाल की खाड़ी में खुद को मात्र एक छोटे से देश से ज़्यादा महत्त्व के रूप बढ़ जाती  है ।
वहीं श्रीलंका इसे दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने के अवसर के रूप में देखता है।इसके ज़रिये श्रीलंका की सीधी पहुंच हिन्द महासागर और प्रशांत महासागर में अपनी आर्थिक गतिविधि भी बढ़ाना चाहता है जबकि दूसरी तरफ भूमि आबद्ध (लैंड लॉक्ड) नेपाल और भूटान के लिये बिम्सटेक ,बंगाल की खाड़ी से जुड़ने और अपनी भूमिगत भौगोलिक स्थिति से बचने की उम्मीद को आगे बढ़ाता है और चीन को कॉउंटर बैलेन्स करता है। म्याँमार और थाईलैंड को इसके ज़रिये बंगाल की खाड़ी से जुड़ने और भारत के साथ व्यापार करने के नए अवसर मिलता है। चीन ने भूटान और भारत को छोड़कर लगभग सभी बिम्सटेक देशों में भारी भरकम निवेश कर रखा है और ये तमाम देश उसकी "डेब्ट डिप्लोमेसी " के चँगुल में बुरी तरह फंस गए है ,जिसका बेहतरीन उदाहरण श्रीलंका है।इन देशो को चीनी चँगुल से उबरने के लिए भी बिम्सटेक को नए विकल्प को ये देश देख रहें हैं। 

थाईलैंड के लिए यह संगठन सबसे मुफ़ीद रहा है क्योंकि पूरे बंगाल की खाड़ी ,अंडमान सागर और मलक्का जलडमरूमध्य के त्रिकोणात्मक महत्व और महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन जिसके जरिये अफ्रीका और फारस की खाड़ी से दक्षिणी चीन सागर की तरफ जाने वाले 90 फीसद से अधिक कच्चे तेल की आपूर्ति होती है या कहें 16 मिलियन बैरल कच्चे तेल की रोजाना आपूर्ति होती है जबकि कुल विश्व व्यापार का 25 फीसद हिस्सा लगभग 600 नॉटिकल मील संकड़े एनर्जी चॉक पॉइंट  से होकर गुजरता है। बीते वर्ष 2017 में जहां भारत और इंडोनेशिया ने अपने मध्य राजनयिक सम्बन्धों के 70वीं वर्षगाँठ मनाया है।जो इनके आपसी विश्वास को दर्शाता है।
मलक्का जलडमरूमध्य (स्ट्रेट ऑफ मलक्का) जो पूर्व में प्रशांत महासागर को पश्चिम में अवस्थित हिन्द महासागर को जोड़ता है। यह एक  महत्वपूर्ण "चोक पॉइन्ट" के रूप में जाना जाता है जिसकी सामूहिक निगरानी 2004 में गठित "मलक्का चौकड़ी"(quad of Malacca )के नाम से मशहूर इंडोनेशिया,मलेशिया, थाईलैंड और सिंगापुर मिलकर  "मलक्का स्ट्रेट पैट्रॉल"(MSP)के जरिये करते  है। भारत को भी इसमें शामिल करने की बात चल रही है और इस सिलसिले में थाईलैंड और सिंगापुर से हामी भी मिल गयी है जबकि मलेशिया और इंडोनेशिया से रजामंदी मिलनी बाकी है।
उम्मीद है की जोको विडोडो के दूसरे कार्यकाल में यह मसला भी सुलझ जाय जिससे भारतीय नौसेना  मलक्का चौकड़ी के साथ इस क्षेत्र में अपनी गश्त बढ़ा सकेगी।चूंकि भारत के साथ इन चारों देशो के साथ गहरे सांस्कृतिक,राजनयिक ,रणनीतिक और सामरिक संबंध है।
जिसके तहत भारतीय सेना इंडोनेशिया के साथ
"गरुड़ शक्ति", जबकि थाईलैंड के  साथ "मैत्रयी"  और भारतीय वायुसेना "सियाम भारत" जैसे वायुसैनिक अभ्यास को सफलतापूर्वक अंजाम दे चुकी है। वहीं भारतीय नौसेना ने इंडोनेशिया के साथ,इंडिया-इंडोनेशिया कोऑर्डिनेटेड पैट्रॉल और इंडिया-इंडोनेशिया बाईलैटरल एक्सरसाइज।
मलेशिया के साथ "टेबल टॉप" सिंगापुर के साथ सिंगापुर इंडिया मैरिटाइम बाईलेटरल एक्सरसाइज (सिम्बक्स) और थाईलैंड के साथ" इंडो थाई कोऑर्डिनेटेड पैट्रॉल" के जरिये इस क्षेत्र में नई रणनीतिक महत्व को संपुष्ट करते हुए नव उपनिवेषी और आक्रमक चीनी प्रभुत्व को लगातार चुनौती देती हुए इस क्षेत्र में "दवाब बना रहे " को अमली जामा पहनाते रहती है।


चीन की सांस्कृतिक घुसपैठ और चेकबुक डिप्लोमेसी।

हिन्द महासागर का गर्म होते पानी तक अपनी पहुंच की चीनी व्याकुलता को आप कालिदास के महाकाव्य मेघदूतम के नायक की अपनी प्रेयसी से मिलनकी चाह,विरह और उसकी व्याकुलता से कर सकते हैं ।
हिन्द महासागर में प्रभुत्व का मतलब पूरी दुनिया के समुद्री व्यापार पर एकाधिकार,भला कौन नहीं चाहेगा इस पर अधिकार। चीनी चाहत को नियंत्रित,संतुलित,प्रतिउत्तरित करने के लिए बिम्सटेक एक महत्वपूर्ण उपकरण की भांति कार्य करता है, जो उसे बंगाल की खाड़ी तक पहुँच बनाने से बाधित और संतुलित करते हुए इस पूरे क्षेत्र को "शान्ति क्षेत्र "और "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन" में तब्दील करते हुए चीन के अतिमहत्वाकांक्षी प्रवृत्ति पर जरूरी अंकुश लगाता है।
और दूसरी तरफ भारत को हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी में अपनी पहुँच और प्रभुत्व को बरकरार रखने में मदद करता है ।
इस लिहाज़ से भी बिम्सटेक भारत के लिये काफी महत्त्वपूर्ण हो जाता है। पारिस्थितिकी रूप से बिम्सटेक न सिर्फ दक्षिण व दक्षिण-पूर्वी एशिया को जोड़ता है बल्कि हिमालय और बंगाल की खाड़ी की पारिस्थितिकी को भी शामिल करता है।
यह भारत के लिये बिम्सटेक ‘नेबरहुड फर्स्ट पॉलिसी" और "पूर्व की और देखो’ की हमारी विदेश नीति की प्राथमिकताओं और प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिये एक स्वाभाविक मंच प्रदान करता है| वैश्विक परिदृश्य में हर देश में क्षेत्रीय सहयोग एक महत्त्वपूर्ण मुद्दा रहा है जिसका मुख्य मकसद क्षेत्रीय और आर्थिक विकास, शांति,विकास और समृद्धि को बढ़ावा देना है| मौजूदा दौर में जो परिस्थितियाँ हैं उससे निपटने के लिये भी हमेशा आदर्श मंच की तलाश होती रहती है और यही वज़ह है कि बिम्सटेक का गठन हुआ। बिम्सटेक के ज़रिये जहां दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन के "सांस्कृतिक घुसपैठ" को रोकने में मदद मिली है जिससे यह क्षेत्र एक दूसरे से जुड़े हुए अपने ऐतिहासिक सांस्कृतिक साझा मूल्यों, अपने गौरवमयी इतिहास और समावेशी जीवनपद्धति के चलते बिम्सटेक शांति और विकास के लिये एक समान स्थिति का प्रतिनिधित्व करता है।

क्या बिम्सटेक सार्क का विकल्प बनकर उभरा है?

भारत और पाकिस्तान के आपसी खींचता। सार्क में चीन की  शामिल होने की मृगतृष्णा सी चाहत ने इस पूरे संगठन का बेड़ा गर्क किया है,चूंकि सार्क में सारे निर्णय सभी सदस्यों की रजामंदी से होता है इसलिय यहाँ चीन की दाल गल नहीं रही है वर्ना 2016 में तो पाकिस्तान नेपाल ,श्रीलंका,और बंगलादेश की चौकड़ी तो न जाने कब से चीन को अपना समर्थन देने को अकुलाएऔर छटपटाते फिर रहे थे।
दूसरी तरफ अपनी आपने उद्देश्यों और उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा सार्क दरअसल, पिछले 30 सालों से जिस स्थिति में सार्क रहा है, यह संगठन मात्र औपचारिक बनकर रह गया है| केवल सम्मेलनों का नियमित रूप से आयोजित होना किसी संस्था के जीवित रहने का प्रमाण नहीं है।
जहाँ तक सार्क के ठोस कदम उठाने का सवाल है तो पाकिस्तान के असहयोग और राजनीतिक विभाजन की वज़ह से ऐसा नहीं हो पा रहा है| सदस्य देशों में कई बार आतंकवाद के खिलाफ जंग को लेकर भी सहमति बनी है लेकिन आतंकवाद के मुद्दे पर सार्क के सदस्य देश और भारत के पड़ोसी देश पाकिस्तान ने कभी साथ नहीं निभाया और यही सार्क की विफलता की एक बड़ी वज़ह बन गया जहां तक सार्क की सीमित उपलब्धियों का सवाल है,तो ऊर्जा और परिवहन के क्षेत्र में हुए कई समझौते बेहद महत्त्वपूर्ण रहे है।

विस्तृत जानकारीhttp://www.saarc-sec.org/

चीन के साथ ग्लोबल पॉलिटक्स सार्क और बिम्सटेक
सार्क में चीन के शामिल होने की लालसा और भारत का चीन को सार्क में शामिल करने से इंकार से एक संभावित परिणाम में  परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह(NSG)देशो के संगठन में भारत की एंट्री पर प्रतिबंध के रूप में देखा जाता रहा है। चीन NSG के माध्यम से भारत से इस क्षेत्र में समझौता करना चाहता है वहीं  चीन के वन बेल्ट वन रोड में भारत का सहयोग न होने से चीन पूरी तरह ख़फ़ा चल रहा है। संभव  है कि बीजिंग आप पर पलटवार करे जो किसी भी तरह का,और कहीं भी और किसी स्वरूप में हो सकता है,क्योंकि चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का विस्तृत संदेश जिस रफ़्तार से आया वो उसे अलग माहौल बनाता है, यह संयमित लेकिन स्नेह भरा संदेश था लेकिन हमे उनके स्नेहिल शब्दों कें झांसे में नहीं पड़ना है क्योंकिं चीन में चल रहे "सुअर वर्ष "में यह "बाघ का दुलार"है जिसमे आपको पता भी नहीं चलेगा कि आप कब रोमांस करते करते शहीद हो गए।
भारत की विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाये गए इस रणनीति का ही नतीजा है कि पाकिस्तान के नए आक़ा चीन को ना-नुकुर के बाद भी आख़िरकार मसूद अज़हर को अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का समर्थन करना पड़ा।
वर्तमान के राजनीतिक परिदॄश्य में भारतीय कूटनीति की यह अग्रणी शुरुआत है,चूंकि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अस्थाई हित ही सर्वप्रमुख होते हैं,यहां न तो कोई स्थाई मित्र होता है न, ही कोई स्थायी हित होते हैं और न ही दुश्मन। राष्ट्र का हित सर्वोपरि होता है।
आज के दौर में हम भारत कूटनीति से यह अपेक्षा कर सकते हैं क्योंकि आम जनमानस को प्रचंड जनादेशयुक्त स्थायित्व प्राप्त सरकार से निश्चय ही इस तरह की उम्मीद जगती है कि अपनी बहुआयामी,सुरक्षात्मक और आक्रमक कूटनीति का परिचय देते हुए हर मोर्चे पर देश की एकता अखंडता और संप्रभुता को बरकरार रखे।

Thursday, May 16, 2019

स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ में फंसता हुआ अमेरिका।

हालिया संयुक्त अरब अमीरात के पोर्ट फ़ुजैरा में हुए से संदेहास्पद चार ऑयल टैंकर में तोड़ फोड़ और "बिना की जान माल के क्षति" और  हमले के बाद समुद्र में "अत्यधिक कीमती एक बूंद भी तेल का रिसाव न होना "  जैसा हमला या तोड़फोड़ जो सम्भवतः यह विश्व का पहला इस प्रकार का हमला होगा,जिसमे हमलावर ने अपने दुश्मन को किसी तरह की क्षति न पहुँचाने के लिए हमला किया गया हो।इस रहस्मय और अनूठे और बचपना भरे तथाकथित "हमले" के पीड़ित सऊदी अरब और न ही संयुक्त अरब अमीरात ने इस अनूठे हमले की "प्रकृति"के विवरण साझा किए। इस घटना के बाद जिस तरह अमेरिकी प्रशासन हरकत में आया और अमेरिकी विदेशमंत्री माइक पोम्पियो ने अपनी तयशुदा मॉस्को यात्रा को रदद् कर दिया और  अमेरिका ने जिस आक्रमकता के साथ सभी  कार्य संपादित किये उससे तो पूरी दाल ही काली दिखती है।

अमेरिका ने इस तोड़ फोड़ के लिए सीधे तौर पर ईरान को जिम्मेदार ठहराया है ।
जबकि ईरान ने इस तरह के तोड़फोड़ औऱ किसी हमले में शामिल होने से साफ इन्‍कार करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। इससे पूर्व तेजी से बदलते घटनाक्रम और खाड़ी क्षेत्र में आक्रामक अमेरिकी सैन्य समन्वय और हमलावर मंशा के बीच ईरान ने अपने प्रतिद्वंदी देशों को चेतावनी दी थी कि अगर अमरीका ने उसे रणनीतिक जलमार्ग का उपयोग करने से रोका तो वह स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ को अवरुद्ध कर देगा।
यहां यह जानना आवश्यक है कि विश्व की आर्थिक ,राजनीति और भू सामरिकी और तेल राजनय में हॉरमुज़ की खाड़ी का आखिर क्यों इतना महत्व है । जिसे ईरान इतना महत्व दे रहा है और अमेरिका की रणनीतिक प्रतिष्ठा दांव पर लगी दिख रही है।

स्ट्रेट ऑफ हॉरमुज़ एक 21 मील या 33 किलोमीटर चौड़ी जलसंधि है जो ईरान को ओमान के मुख्य भूमि से अलग करती है जबकि ओमान की खाड़ी को अरब सागर से जोड़ती है।लेकिन इसका नौवहन मार्ग मात्र दो मील या तीन किलोमीटर चौड़ा है।
1.विश्व स्तर पर खपत होने वाले तेल का लगभग पांचवां हिस्सा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से होकर गुजरता है।
2.होर्मुज की एक अंतरराष्ट्रीय पारगमन मार्ग है जहां  विभिन्न एशियाई देशों के साथ साथ यूरोप सहित अन्य महाशक्तियों की निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा को यह जलसंधि सुरक्षित करता है।

यहां दो बातें मुख्य रूपसे सामने आती है ।ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए उच्च गुणवत्ता तथा क्षमता वाले ऑयल टैंकर अमूमन विकसित देशों के होते है और दूसरा चूंकि इन ऑयल टैंकर का  बीमा अत्यधिक महंगा होता है,जो  साधारणतया अमेरिकी बहुराष्ट्रीय बीमा कंपनियां करती है, यानि हर हाल में ये वैश्विक महाशक्तियां अपने राष्ट्रीय,व्यापारिक एवं भू सामरिक हितों को सुरक्षित रखने के लिए किसी स्तर तक जा सकती है। इसलिए  हॉरमुज़ सहित अन्य कोई भी नौवहन मार्ग जहां से  यतायात सुनिश्चित होता है वहां किसी भी तरह की परेशानी अमेरिका के कान खड़े कर देती है और उनके रातों की नींद हराम हो जाती है । हॉरमुज़ जलसंधि का बन्द या आबाध नौवहन में थोड़ी सी भी रुकावट का सीधा मतलब है करोड़ो डॉलर का प्रतिदिन नुकसान जो ये बहुराष्ट्रीय कंपनियां कभी नहीं चाहेंगी, उर्जा सुरक्षा किसी देश की सकल घरेलू उत्पाद और उसकी आर्थिक समृद्धि का मेरूदंड होता है जिसे कोई देश किसी भी कीमत पर खोना नहीं चाहता,इसके लिए वह देश विभिन्न मोर्चों पर थोड़े बहुत समझौते भे करने से नहीं चूकता है। भारत ,चीन, सहित अन्य एशियाई देशों  की यही सबसे  बड़ी परेशानी है।ऊर्जा सुरक्षा निर्बाध गति से इन देशों को निरन्तर मुहैय्या होती रहे इसके लिए सभी राष्ट्रों की नौसेना अपने टैंकरों के साथ साथ इस पूरे "सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन" या SLOC की सुरक्षा और एंटी पायरेसी के आड़ लेकर समुद्र के भीतर और सतह पर पूरे क्षेत्र में गश्त लगाती और आपनी ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करती है।

इसमे अमरीकी सेना नियमित गश्त से गुजरने में अव्वल है। इसी क्रम में खाड़ी के कई हिस्सों में अमेरिका ने सैन्य अड्डे बना रखे हैं। इसमें सबसे अड्डा बड़ा कतर में है जहां पर उसके लगभग 10,000 हजार सैनिक हैं।क़तर के अल उदीद एयर बेस अमरीकी सैन्य बेस पर भी स्ट्रेटोस्फेरिक बमवर्षक बी-52 विराजते हैं ।अतीत में अमेरिकी सेना ने संयुक्त अरब अमीरात में अल धफ्रा एयर बेस और अल उदीद दोनों में अपनी उपस्थिति दर्ज़ कराते रही है।

अमेरिकी दिलचस्पी यूँ ही नहीं बढ़ी है इस क्षेत्र में, क्यूंकि खाड़ी देशो के अमेरिकी सहयोगी देशों  की पूरी ऊर्जा सुरक्षा इस मार्ग से ही होता है इस क्षेत्र से सऊदी अरब, इराक, यूएई, कुवैत, कतर और ईरान के भी ज्यादातर तेल का निर्यात हॉर्मूज जलसंधि से होता है और यह आंकड़ा कम से कम 1.5 करोड़ बैरल्स प्रतिदिन है। चूंकि स्ट्रेट ऑफ हौरमुज पर प्रत्यक्ष रूप से ईरान की संप्रभुता है जो अमेरिका को फूटी आंख नहीं सुहाता है,जिसको लेकर दोनों देशों के बीच के संबंधों तनावपूर्ण रहे हैं जहां "अमेरिका फ्रीडम ऑफ नेवीगेशन"(आबाध और सुरक्षित नौवहन ) कि वक़ालत करता है वहीँ ईरान का मानना है कि हॉरमुज़ जलसंधि उसका अभिन्न अंग है इसलिए ईरानी नौसैनिक अधिकारियों का मानना है कि इसे ठप्प करना "बस एक गिलास पानी पीने जैसा होगा" ।


शिया बहुल राष्ट्र ईरान सुन्नी शासित खाड़ी मुल्कों के साथ तनाव के चलते अक्सर इस जलडमरू मध्य पर नाकेबंदी की धमकी देता है और अपनी शक्ति प्रदर्शन के लिए  हॉरमुज़ जलसंधि उसका पसंदीदा रणक्षेत्र बनता है बीते मार्च के शुरूआती सप्ताह में आई मीडिया रिपोर्ट के अनुसार ईरान ने ईरान की खाड़ी और हिंद महासागर के एक विशाल क्षेत्र में तीन दिवसीय वार्षिक नौसेना ड्रिल की शुरुआत हुई । ईरान के नौसैनिक कमांडर रियर एडमिरल होसैन खानजादी के अनुसार ड्रिल हॉर्मुज जलसंधि मकरान तट, ओमान सागर और हिंद महासागर के उत्तर में जलडमरूमध्य में  संपन्न हुआ।

इस तरह के नौसैनिक अभ्यास से सबसे ज्यादा नींद हराम अमेरिकी प्रशासन की होती है। वर्तमान के हालात में अमेरिकी इस क़दर घबराये और आक्रोशित है कि उसने अपने मध्यपूर्व(भारत के लिए पश्चिम एशिया) में अपना "पेट्रियॉट मिसाइल डिफ़ेंस सिस्टम" बैटरी की तैनाती कर दी है दूसरी तरफ उसने खाड़ी में अपना विमानवाहक युद्धपोत यूएसएस अर्लिंगटन भेज दिया है जिसपर आधुनिक एंफीबियस वारफेयर में माहिर साजो सामान और लड़ाकू उपकरण और लड़ाकू जहाज हैं तैनात है ।ये युद्धपोत यूएसएस अब्राहम लिंकन के साथ खाड़ी में तैनात रहेग।अमरीकी रक्षा विभाग पेंटागन का कहना है कि कतर के एक सैन्य ठिकाने पर बम बरसाने वाले US B-52 विमान भी भेजे जा चुके हैं. अमरीका ने ईरान को एक 'स्पष्ट और सीधा' संदेश देने के लिए मध्य पूर्व में अपना एक यद्धपोत तैनात किया है।


अमरीका का क्या कर रहा है।

जब बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे तो उन्होंने 2015 में संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थायी सदस्य और जर्मनीके साथ मिलकर ईरान  से समझौता किया था जिसे P5+1 समझौता कहा गया ।इसमे तय किया गया था ईरान परमाणु हथियार नहीं बनाएगा।और आप के सभी नाभिकीय प्रसंस्करण फैसिलिटी को आईएईए के निगरानी में रखेगा।
अमेरिका सहित यह समझौता विश्वव्यापी राजनीतिक और राजनयिक मोर्चे पर बेहतरीन कामयाबी थी, लेकिन सत्ता में आते ही डोनाल्ड ट्रम्प ने सबसे पहले इस समझौते को रद्द कर दिया और यहीं से ताजा समस्या की शुरूआत हुई है और यह मामला इतनी आसानी से सुलझने का सवाल ही पैदा नहीं होता ईरान भी चुपचाप बैठने वाला नहीं है क्योंकि उसके लिए तो यह  "वजूद "का मसला बन गया है वह अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा अखंडता और संप्रभुता को हवाला देते हुए किसी भी रूप में झुकने को तैयार नहीं है।

ट्रंप प्रशासन, ईरान को जार्ज बुश सीनियर द्वार प्रतिपादित "एक्सिस ऑफ एविल " यानी "शैतान की धुरी" में एक बास्त फिर से ईरान  को शामिल कर लिया,अमेरिका ने पहले एकतरफा पहल करते हुए ईरान के साथ P5+1 परमाणु संधि से खुद को अलग किया फिर ईरान पर तरह तरह के प्रतिबन्ध लगाए, उसके वाणिज्य और व्यापार को छिन्न भिन्न किया।
अगर चीन को छोड़ दें तो ज्यादातर देशों ने चुप्पी साध रखी है. अमेरिका का कोई विरोध नहीं कर रहा है। रूस की चुप्पी भी सब कुछ अच्छा नहीं होने के संकेत दे रहे है। असम तौर पर राष्ट्रपति  पुतिन काफी मुखर रहते है,निश्चित ही उनके दिमाग मे कोई दूसरा काट चल रहा होगा। रूसी आम तौर पर दिलदार और मददगार दोस्त की भूमिका निभाते आये है,चाहे क्यूबा संकट हो या बांग्लादेश की मुक्ति या  फिर हालिया सीरिया को अमेरिकी काले साये से बचाना, इसलिए ईरान को रूसी उम्मीद तो बिल्कुल नहीं छोड़नी चाहिए, दोनो देशो के बीच बेहतर संबंध है जिसका लाभ ईरान को मिलना चाहिए और भूराजनीतिक रूप से निश्चित रूप से मिलेगा। इतना तय है कि यदि जंग का कोई भी स्वरूप सामने आया  तो यह पूरी दुनिया के लिए बेहद खतरनाक साबित होगा।

अमेरिका द्वारा आरोपित ये प्रतिबंध अमरीकी कंपनियों को ईरान और इसके साथ सीधे व्यापार करने वाली कंपनियों से व्यापार करने से रोकते हैं।विश्व मुद्रा कोष यानी आईएमएफ़ के हालिया अनुमान  में कहा है कि 2019 में ईरान की अर्थव्यवस्था  छः फीसद सिकुड़ जाएगी. हालांकि अमरीका की ओर से प्रतिबंधों को और कड़ा करने के कारण ये अनुमान और बड़ा हो सकता है।

उदाहरण के लिए अमरीका ने चीन, भारत, जापान, दक्षिण कोरिया और तुर्की को ईरान से तेल खरीदने की छूट दे रखी थी, जिसे ख़त्म कर दिया गया।अमरीकी प्रतिबंधों के जवाब में ईरान बार-बार हॉरमुज़ समुद्री रास्ते के जरिये व्यापार रोकने की धमकी देता रहा है,जहां से दुनिया की ज़रूरत के 20 प्रतिशत तेल की आवाजाही होती  है।

अमेरिका ने हालिया पूरे तोड़ फोड़ प्रकरण के लिए ईरान को जिम्मेदार ठहराया है जबकि ईरान ने इस तरह के तोड़फोड़ औऱ किसी हमले में शामिल होने से साफ इन्‍कार करते हुए मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है। ईरान ने अपने बयान में इसे "कुछ बुरा चाहनेवालों की साजिश "और "कुछ विदेशी ताकतों के "दुस्साहसी रोमांस" और "रोमांच"की कोशिश" भी करार दिया है जो वाज़िब प्रतीत होता है। अमेरिका की दिली इच्छा है कि ईरान पर एक नये समझौते का दबाव बनाया जाए जिसमें केवल परमाणु कार्यक्रम ही नहीं बल्कि उसके बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम को भी शामिल किया जाए, जिसे अमरीका मध्यपूर्व में तनाव का कारण मानता है।अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन का मानना है कि ट्रंप प्रशासन ने ये फ़ैसला 'कई परेशान करने वाले और उकसाने वाले संकेतों और चेतावनियों के जवाब में' लिया है ।

अमेरिकी, ईरानी हमले के भय से इस कदर सशंकित है कि अब उन्हे खुफिया जानकारी  है कि मध्यपूर्व में मौजूद अमरीकी सुरक्षाबलों के ठिकानों पर हमले की आशंका जताई जा रही थी इस कारण अमरीका ने ये क़दम उठाया है और जॉन बोल्टन ने कहा कि वे किसी भी तरह के हमले का जवाब 'पूरे ज़ोर-शोर' से देंगे।

बोल्टन ने अपने एक बयान में कहा, "अमरीका यूएसएस अब्राहम लिंकन कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और एक बॉम्बर टास्क फ़ोर्स को अमरीका के 'सेंट्रल कमांड' क्षेत्र में भेज रहा है, हम ऐसा ईरानी शासन को एक स्पष्ट और सीधा संदेश देने के लिए कर रहे हैं। संदेश यह है कि अगर अमरीका या उसके सहयोगियों पर किसी तरह का हमला हुआ तो अमेरिकी वायु सेना इसका माकूल जबाब देगी ।

बीते रविवार को व्हाइट हाउस ने घोषणा की कि वह तेहरान का मुकाबला करने के लिए यूएसएस अब्राहम लिंकन एयरक्राफ्ट कैरियर स्ट्राइक ग्रुप और फारस की खाड़ी में हमलावरों दस्ते और विध्वंसक पोत को भेजेगा।
अमेरिका अपने शत्रुओं पर  पूर्व नियोजित हमलो के लिए विश्व प्रसिद्ध है वह पहले इस तरह का माहौल  बनाता है और फिर उसी अनुरूप कार्रवाई करते हुए अपने राष्ट्र हित को सुरक्षित रखता है। 

उदाहरण के तौर पर इराक में जैव रासायनिक हथियारों का हौव्वा खड़ा किया ,पूरी दुनिया में विभिन्न मंचों से यह शोर मचाया कि इराक के पास भारी मात्र में रासायनिक हथियार हैं अगर समय रहते इराक को नहीं रोका गया तो दुनिया में अनर्थ हो जाएगा ,इस भूमिका के बाद उसने सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाने की नीयत से इराक पर हमला बोल दिया जैवरासायनिक हथियारों के इस्तेमाल की खबर पूरी तरह झूठी अफवाह निकली।प्रमुख जांच कर्ता हैन्स ब्लिंक्स को कहीं भी ऐसे हथियार के इस्तेमाल के सुराग नहीं मिले लेकिन इराक पर हमला हुआ और बाद में सद्दाम हुसैन की पूरे परिवार को समाप्त कर दिया गया ।यहां भी एक दफ़े फिर से ऐसा लग रहा है कि अमेरिका वही कहानी ईरान के साथ दोहराने जा रहा है जिस तरह  उसने सबसे पहले उसने ईरान की सेना की विशेष बल ईस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर(आईआरजीसी)को आतंकी संगठन घोषित कर दिया है।यह पहली बार है जब अमरीका ने किसी और देश की सेना को आतंकी संगठन क़रार दिया वहीं व्हाइट हाउस का कहना है कि आईआरजीसी का मतलब है 'इंप्लिमेंटिंग इट्स ग्लोबल टेररिस्ट कैंपेन'। ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ा हुआ है।


इस्लामिक रिवॉल्युशनरी गार्ड कोर

सन 1979 की ईरानी क्रांति के बाद सर्वोच्च धार्मिक नेता अयातुल्ला खुमैनी के दिमाग की उपज थी रिवॉल्युशनरी गार्ड । रिवोल्यूशनरी  गार्ड का गठन नई हुकूमत की हिफ़ाज़त और ईरानी सेना के साथ सत्ता संतुलन बनाना था ईरान में शाह के पतन के बाद हुकूमत में आई सरकार को ये लगा कि उन्हें एक ऐसी फ़ौज की ज़रूरत है जो नए निजाम और क्रांति के मक़सद की हिफाज़त कर सके। ईरान के कानून में  जिसमें नियमित सेना को देश की सरहद और आंतरिक सुरक्षा का जिम्मा दिया गया जबकि  रिवॉल्यूशनरी गार्ड को निज़ाम की हिफाज़त का काम दिया गया।
उदाहरण के लिए रिवॉल्युशनरी गार्ड क़ानून और व्यवस्था लागू करने में भी सेना को  मदद करती हैं और आर्मी, नौसेना और वायुसेना को लगातार उसका सहारा मिलता रहा है वक़्त के साथ-साथ रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की फ़ौजी, सियासी और आर्थिक ताक़त बन गई। रेवोल्यूशनरी गार्ड्स में ज़मीनी जंग लड़ने वाले सैनिक, नौसैना, हवाई दस्ते हैं और ईरान के रणनीतिक हथियारों की निगरानी का काम भी इन्हीं के जिम्मे हैं।रिवॉल्युशनरी गार्ड के मौजूदा कमांडर-इन-चीफ़ मोहम्मद अली जाफ़री ने हर उस काम को बख़ूबी अंजाम दिया है जो ईरानी के सुप्रीम लीडर ने उन्हें सौंपा गया  है। रिवॉल्यूशनरी गार्ड की स्पेशल आर्मी है बासिज फ़ोर्स जो क़ानून लागू करने का भी काम करता है और अपने कैडर को भी तैयार रखता है वहीं क़ुड्स फ़ोर्स विदेशी ज़मीन पर संवेदनशील मिशन को अंजाम देता है. हिज़्बुल्लाह और इराक़ के शिया लड़ाकों जैसे ईरान के करीबी सशस्त्र गुटों हथियार और ट्रेनिंग देने का काम भी क़ुड्स फोर्स के ही जिम्मे है, क़ुड्स फोर्स के कमांडर जनरल क़सीम सुलेमानी को ईरान के सुप्रीम लीडर अली खामनेई ने 'अमर शहीद' का खिताब दिया है. जनरल क़सीम सुलेमानी ने यमन से लेकर सीरिया तक और इराक़ से लेकर दूसरे मुल्कों तक रिश्तों का एक मज़बूत नेटवर्क तैयार किया है ताकि इन देशों में ईरान का असर बढ़ाया जा सके. सीरिया में शिया लड़ाकों ने मोर्चा खोल रखा है तो दूसरी तरफ। इराक़ में वे इस्लामिक स्टेट(आईएस) के खिलाफ लड़ रहे हैं. रिवॉल्युशनरी गार्ड की कमान ईरान के सुप्रीम लीडर के हाथ में है. सुप्रीम लीडर देश के सशस्त्र बलों के सुप्रीम कमांडर भी हैं.ऐसा आकलन है कि रिवॉल्युशनरी गार्ड ईरान की अर्थव्यवस्था के एक तिहाई हिस्से को नियंत्रित करता है. अलग-अलग क्षेत्रों में काम कर रही कई चैरिटी संस्थानों और कंपनियों पर उसका नियंत्रण है. ईरानी तेल निगम और इमाम रज़ा की दरगाह के बाद रिवॉल्युशनरी गार्ड मुल्क का तीसरा सबसे धनी संगठन है। ट्रंप ने जब से ईरान के साथ अंतरराष्ट्रीय परमाणु क़रार तोड़ा है तब से दोनों देशों के बीच तनाव काफी बढ़ा हुआ है लेकिन अमेरिका को समझना चाहिए कि उसका पाला ईरान से पड़ा है और वह इराक नहीं है। दूसरी बात विश्व व्यवस्था में  अब रूस, चीन, भी खासे मुखर हो गए है। और दोनों देशों से ईरान के संबंध काफी अच्छे हैं । सीरिया में ट्रम्प प्रशासन अपना हाथ जला चुका है,इसलिये यहां भी वेे कोई भी कदम फूंक फूंक कर ही रखेंगे। इस मसले पर भारत का शिया फैक्टर भी काफी अहम हो जाता है।

 अमेरिकी रणनीति

चूंकि अगले साल (2020 में) डोनाल्ड ट्रंप को फिर से चुनाव में उतरना है। इसलिये वे अपने पूर्ववर्ती राष्ट्रपति कि तरह इस मसले पर कोई कोर कसर तो नहीं छोडेंगे  ,हालांकि,अमेरिका द्वारा ईरान के खिलाफ और प्रतिबंध एवं सीमित तथा प्रॉक्सी वॉर की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है। अमेरिका ने आगाह किया था कि ईरान क्षेत्र में समुद्री यातायात को निशाना बना सकता है।।   इससे पहले भारत सहित कुछ अन्य देशों को तेहरान से व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के लिए व्यापार में थोड़ी रियायतें मुहसिया कराई की छूट दी थी लेकिन अब वह भी खत्म हो गई है. ईरान वाकई परेशानी में है लेकिन उसने अमेरिकी दवाब में झुकने से इनकार कर दे,जैसा कि ईरान ने स्पष्ट रूप से कहा है कि यदि संकट नहीं सुलझा तो वह हॉरमुज़ जलसंधि मार्ग को बंद कर देगा.।अगर ईरान के तेल के जहाज जलसंधि मार्ग से नहीं जाएंगे तो बाकी देशों के तेल के जहाज भी जलसंधि को पार नहीं कर पाएंगे. जाहिर सी बात है कि इससे अमेरिका बौखला गया है. यदि किसी जहाज पर ईरान ने वाकई हमला कर दिया तो जंग छिड़ सकती है. इसका असर निश्चय ही पूरी दुनिया पर पड़ेगा


अमेरिकी चिढ़ और उसकी दुखती रग।

अमेरिका ईरान से यूँ ही नही चिढ़े रहता है उसे लगातार वह
444 दिनों का तेहरान में अमेरिकी दूतावास का बंधक प्रकरण याद आता है जो अभी भी महाशक्तियों में सर्वश्रेष्ठ अमेरिका को सालता है।जब रोनाल्ड रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति बने तभी बंधकों की रिहाई संभव हो पाई।उसे यह पूरा प्रकरण कचोटता है और उसकी दुखती रगों हर साल दर्द देता है। उस पूरे बंधक प्रकरणों को आप आस्कर विजेता सिनेमा"आर्गो" में देख सकते हैं। संभवतः एक यह  भी कारण है कि अमेरिका किसी भी सूरत में ईरान को या तो तबाह कर देना चाहता है या फिर वह चाहता है कि ईरान में सत्ता उसकी मनमर्जी से चले जबकि ईरान पर काबू पाने की चाहत का रणनीतिक कारण इजराइल और सऊदी अरब भी हैं जो अमेरिका के "ब्लू ऑय" (चहेते हैं) और ईरान उन्हें फूटी आंखों नहीं सुहाता है.  

भारत की राजनयिक दुविधा और कूटनीतिक चुनौती।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत अभी अमरीका के ख़िलाफ़ नहीं जा सकता है. हाल ही में अमरीका ने आतंकवादी संगठन जैश-ए-मोहम्मद के संस्थापक मसूद अज़हर को संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद से वैश्विक आतंकवादी घोषित कराने में खुलकर मदद की थी।ईरानी तेल का भारत, चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा ख़रीदार है. अमरीकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने इसमें कटौती कर दी थी और हर महीने 1.25 मिलियन टन की सीमा तय कर दी थी।।
2017-18 में भारत ईरान से प्रतिवर्ष 22.6 मिलियन टन तेल ख़रीद रहा था. भारत की ऊर्जा ज़रूरतें और शिया कनेक्शन भारत और ईरान के बीच दोस्ती के अन्य बातों के अतिरिक्त मुख्य रूप से दो आधार बताए जाते हैं. एक भारत की ऊर्जा ज़रूरतें हैं और दूसरा ईरान के बाद दुनिया में सबसे ज़्यादा शिया मुसलमानों का भारत में होना
गल्फ़ को-ऑपरेशन काउंसिल से आर्थिक संबंध और भारतीय कामगारों के साथ प्रबंधन के क्षेत्र से जुड़ी प्रतिभाओं के कारण अरब देशों से भारत के मज़बूत संबंध कायम हुए हैं।
भारत की ज़रूरतों के हिसाब से ईरान से तेल आपूर्ति कभी उत्साहजनक नहीं रही. इसके मुख्य कारण इस्लामिक क्रांति और इराक़-ईरान युद्ध रहे।
भारतीय राजनयिकों के लिए वर्तमान ईरानी संकट से  सफलतापूर्वक समाधान करना एक जबरदस्त चुनौती होगी जहां एक ओर ईरानी विदेशमंत्री की संकटकालीन भारत यात्रा और उनकी भारत से अपेक्षाएं और दूसरी तरफ विभिन्न मोर्चे पर  अमेरिकी दवाब के बीच अपने ऊर्जा सुरक्षा की भरोसेमंद आपूर्ति के इस त्रिकोणात्मक परेशानी से पार पाना बेहद चुनौती भरा कदम होगा।  भारत को जहां इस मसले पर दो तरफा मुक़ाबला करना होगा एक जो पर्दे के भीतर होगा वहीं दूसरे तरफ भारत को  लगातार अमरिकी हथियार लॉबी से लगातार मिल रहे गाहे बगाहे लुभावन ऑफर  (जैसे S-400 के बदले THAAD मिसाइल सिस्टम खरीदने का ऑफर और लॉकहीड मार्टिन द्वारा सिर्फ भारत के लिये F 21 लड़ाकू विमान  मुहैया कराने जैसे मसले) से भी दो चार होना होगा जिसका असर आपके बारगेनिंग कैपेसिटी पर निश्चित रूपसे पड़ता है ,
अंतरराष्ट्रीय राजनीति के बिसात पर शह और मात के खेल में आज जरूरत इस बात की  होगी कि आप अपनी बाजी कब,कहाँ और कैसे चलते हैं।

Sunday, May 12, 2019

भारतीय वायुसेना में शामिल हुआ अपाचे.


आधुनिक  युद्धकला के इतिहास में अपाचे हेलीकाप्टर को एक क्रांतिकारी विकास के रूप में देखा जाता है जिसने युद्ध की पूरी शक्ल ओ सूरत बदल कर रख दिया। 
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उड़ते विशालकाय टैंक" और "लादेन किलर" जैसे उपमा  से  नवाजे गए अपाचे के युद्ध मे किये गए वार को सहन करना और उससे बचना सम्भव ही नहीं इसलिए तो इसे "Terryfying Machine to Ground Forces" कहा जाता  है। भारतीय वायुसेना को अत्याधुनिक तकनीक और हर चरम परिस्थितियों में उड़ान भरने में सक्षम अपाचे  (AH-64 E (I)) के  गार्डियन अटैक हेलीकॉप्टर की पहली खेप मिल गयी है। इससे वायुसेना के पुराने पड़ते हेलीकॉप्टर बेड़े  को और मजबूती मिलेगी और आधुनिकीकरण की प्रक्रिया तेज होगी,साथ ही इसकी मारक क्षमता,विषम भौगोलिक प्रदेशों में वायुसेना की व्यापक पहुंच और मिशन के दौरान परिष्कृत और गुप्त संचार प्रणाली के जरिये रियल टाइम वारफेयर और बेहतर बैटल मैनेजमेंट को भी नई दिशा मिलेगी।
फ़ोटो साभार : iaf-mcc.
इस दो सीट वाले अटैक हेलीकाप्टर के कॉकपिट में चालक दल के दो सदस्य होते हैं।जिसमे एक पायलट और दूसरा गनर होता है ,इस लड़ाकू  हेलीकाप्टर में कई ऐसी खूबियां है जो विश्व के किसी अन्य सैन्य अटैक हेलीकाप्टर में नहीं है,जो इसे बेहद खास और मारक बना देता है,अपाचे को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि दुश्‍मन की किलेबंदी को भेदकर और उसकी सीमा में घुसकर हमला कर सकुशल वापस  लौटने में सक्षम है। यह अटैक हेलीकाप्टर  युद्ध अथवा सीमित युद्ध के  दौरान "गेम चेंजर "की भूमिका निभाएगा,इसबात पर बल इसलिए दिया जा रहा है भारत ने अमेरिका के साथ पहले चिनूक जैसे हैवी लिफ्ट हेलीकाप्टर औऱ बाद में अपाचे को खरीदने से पहले  अमेरिका के साथ दोनों देशों के सशस्त्र बलों के बीच  परस्पर संबंध को बेहतर बनाने के लिए उच्च स्तरीय  सैन्य प्लेटफॉर्मो के हस्तांतरण की अनुमति के लिए  चार समझौतों में तीन पर दस्तखत किए है 

जिसमे सबसे पहले 
1.2002 में  सामान्य सुरक्षा सैन्य सूचना समझौता
 [General Security of Military  Information Agreement(GSOMIA),

2. 2016 में लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज ऑफ मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट[Logistic Exchange Memorandum of Agreement(LEMOA) ]और 

हालिया communication Compatibility and Security Agreement (COMCASA) शामिल है। 

अंतिम समझौते के रूप के रूप में  भू स्थानिक सहयोग हेतु बुनियादी विनिमय और सहयोग समझौता [Basic Exchange and Cooperation Agreement For Geo Spatial Cooperation(BECA)]के मसौदे पर बातचीत जारी है।

इन समझौतों की बात इसलिए कि जा रही है क्योंकि आने वाले दिनों में युद्ध स्वरूप बदल जायेगा जिसे स्पेक्ट्रम वारफेयर के रूप में देखा जाएगा और सशस्त्र बलों के  लिए सारा दारोमदार इनके  सुरक्षित और एन्क्रिप्टेड संचार उपकरण जिसे High End  secured Encrypted communicatio Equipments कहा जाता है,पर होगी। 
भारतीय सैन्य बलों द्वारा अमेरिका से प्राप्त इन संचार उपकरणों को अमेरिकी प्लेटफॉर्म पर लगाया जाएगा जिसमे C -130 J super Hercules, भीमकाय C-17 ग्लोबमास्टर, समुद्र में लंबी निगरानी करने और पनडुब्बी रोधी वारफेयर में अव्वल 
Poisiden 8 I विमान,सुपर हैवी लिफ्टर हेलीकाप्टर चिनूक ,और अत्याधुनिक अपाचे हेलीकॉप्टर शामिल होंगे। 


 चूंकि भारत के पास पहले से हो रूसी मूल के MI सीरीज के लड़ाकू कई अन्य हेलीकॉप्टर मौजूद है जिसमे सबसे घातक और मारक MI-35 को माना जाता है,जिनकी विश्वसनीयता पर कोई संदेह नहीं है, कुल मिलाकर देखा जाय तो अत्याधुनिक रूसी-अमेरिकी प्लेटफॉर्म ,और भारतीय सैन्य बलों की अदम्य साहस उत्कृष्ट जिजीविषा,विपरीत परिस्थितियों में कार्य करने और सफल होने का माद्दा, मैन एंड मशीन में बेहतर समन्वय  भी इन शूरवीरों को खास बना देती है।
इन तकनीकी प्लेटफॉर्म के जरिये हम अपनी रणनीतिक सूचनाओं को अत्यधिक कूटबद्ध कर सकेंगे  जिसे डिकोड कर पाना नामुमकिन  होगा, जो हमे युद्धकालीन वक्त पर 'लीडिंग एज"प्रदान करता रहेगा। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात  यह है कि ट्राई सर्विसेज फोर्सेज के बीच समन्वय में उल्लेखनीय बढोत्तरी होगी,किसी भी भौगोलिक परिस्थितियों में कोई भी मिशन को इसके जरिये सफलतापूर्वक अंजाम दिया जा सकेगा इसी खूबियों  को रक्षा विश्‍लेषकों मानते है कि अपाचे युद्ध के समय 'गेम चेंजर' की भूमिका निभा सकता है। 

इससे पूर्व भारत ने  अमेरिका से  तीन बिलियन डॉलर में कुल 15 चिनूक हैवी लिफ्टर और 22 अपाचे अटैक हेलीकॉप्टर खरीदने का  सौदा किया था। इस हेलीकॉप्टर से भारतीय वायुसेना में शामिल होने से इसकी की ताकत कई गुना तक बढ़ जाएगी।
  
भारत, अभी तक रूस में बने एमआई-17 लिफ्ट हेलीकॉप्टर पर ही निर्भर है। इसके अलावा सेना के पास रूस में निर्मित एमआई-26 हेलीकॉप्टर भी मौजूद है। वहीं अगर अटैक हेलीकॉप्टर की बात करें तो भारतीय सेना की ताकत एमआई-35 पर ही निर्भर है  जो मुख्य रूप से एक असाल्ट हेलीकॉप्टर है जिसका इस्तेमाल दुर्दांत आतंकियों के साथ मुठभेड़ में अपने विशेष बलों को पहुंचाने और अपने क्ष्रेत्र को सुरक्षित रखने जैसे बहुआयामी कार्य में इस्तेमाल किया जाता है यह काफी जंचस परखा और बेहद भरोसेमंद है जिसका इस्तेमाल तत्कालीन सोवियत संघ द्वारा 1980 के दशक में अफगानिस्तान के आपरेशन के दौरान किया था। 
भारतीय वायुसेना को अपाचे के रूप में ऐसा पहला हेलिकॉप्‍टर मिला है जो विशुद्ध रूप से हमले करने का काम करेगा। अमेरिकी एयरोस्पेस कंपनी बोइंग ने भारतीय वायुसेना को 22 अपाचे गार्जियन लड़ाकू हेलीकॉप्टरों में से पहला हेलीकॉप्टर सौंप दिया है। 

अरबों डॉलर का यह हेलीकॉप्टर सौदा लगभग साढ़े तीन साल पहले हुआ था। वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि एएच-64ई (आई) अपाचे हेलीकॉप्टर को शामिल करना बल के हेलीकॉप्टर बेडे़ के आधुनिकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। अमेरिकी कंपनी बोइंग निर्मित AH-64E अपाचे अटैक हेलिकॉप्‍टर दुनिया के सबसे आधुनिक और घातक हेलिकॉप्‍टर माने जाते हैं। बोइंग AH-64E अमेरिकी सेना और अन्य देशो के सैन्य बलों  के लिए अत्याधुनिक लड़ाकू हेलिकॉप्टर में एक है जोकि एक साथ कई कार्य करने में सक्षम है। इस हेलिकॉप्टर को अमेरिकी सेना के एडवांस्ड अटैक हेलिकॉप्टर प्रोग्राम के लिए बनाया गया था। इसने पहली उड़ान साल 1975 में भरी, लेकिन इसे अमेरिकी सेना में साल 1986 में शामिल किया गया। 
अमेरिकी बलों ने अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर को पनामा से लेकर अफगानिस्तान और इराक तक के साथ दुश्मनों से लोहा लेने में इस्तेमाल किया। इजरायल भी लेबनान और गाजापट्टी में अपने सैन्य ऑपरेशनों में इसी अटैक हेलिकॉप्टर के जरिये सफलतापूर्वक अंजाम देते रहता है। 
अमेरिका के अलावा इजरायल, इजिप्ट और नीदरलैंड की सेनाएं भी इस अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर का इस्तेमाल करती हैं।  तकनीकी रूप से अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर में दो जनरल इलेक्ट्रिक T700 टर्बोशाफ़्ट इंजन हैं और आगे की तरफ एक सेंसर फिट है जिसकी वजह से यह रात के अंधेरे में भी उड़ान भर सकता है। यह 365 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से उड़ान भरता है। इतनी तेज गति होने की वजह से यह दुश्मन के टैंकों के परखच्चे आसानी से उड़ा सकता है। 
अगर इसमे लगे हथियारों की बात की जय तो अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर में हेलि फायर और स्ट्रिंगर मिसाइलें लगी हैं और दोनों तरफ 30mm की दो गन हैं। हेल फायर मिसाइल हर एक मिसाइल अपने आप मे एक  मिनिएचर एयरक्राफ्ट की भांति कार्य करता है, जिसका अपना गाइडेन्स सिस्टम,स्टीयरिंग कंट्रोल और प्रोपल्शन सिस्टम रहता है,साथ ही इसका पेलोड उच्च विस्फोटकों से लैस,जिसे कॉपर लाइन्ड चार्ज वारहेड कहते है हो किसी भी भीमकाय टैंक पूरी तरह नष्ट करने में सक्षम है।इन मिसाइलों का पेलोड इतने तीव्र विस्फोटकों से भरा होता है कि दुश्मन का बच निकलना नामुमकिन होता है।  यह हेलीकॉप्टर अपने सॉफिस्टिकेटेड आर्म्ड सिस्टम के जरिये जमीन पर मौजूद  व हरकत कर रही दुश्मन की कवचित रक्षा प्रणाली,बख़्तरबंद टैंक, बंकर, को अपने विनाशकारी फायरिंग के जद में लाकर नेस्तनाबूद कर देती है
इसका हेलीकाप्टर का वजन लगभग 5,165 किलोग्राम है और इसमें पायलटों के बैठने के लिए दो सीटें होती हैं। इस हेलिकॉप्टर को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि यह युद्ध क्षेत्र की हर परिस्थिति में टिका रह सके। 
अपाचे हेलिकॉप्टर का सबसे क्रांतिकारी फीचर है इसका हेल्मेट माउंटेड डिस्प्ले, इंटिग्रेटेड हेलमेट और डिस्प्ले साइटिंग सिस्टम (Integrated Helmet and Display Sighting System), जिसकी मदद से पायलट हेलिकॉप्टर में लगी ऑटोमैटिक M230 चेन गन को अपने दुश्मन पर टारगेट कर सकता है। यह किसी भी का मौसम हो, किसी भी तरह की परिस्थिति हो, अपाचे अटैक हेलिकॉप्टर उड़ान भर अपने मिशन को अंजाम दे सकता है ।

 अपाचे एक स्टील्थ ,वर्सेटाइल लड़ाकू हेलीकाप्टर है जो किसी तरह के लड़ाकू अभियान के अंजाम देने में  सक्षम है,इसमे अत्याधुनिक लेज़र और इंफ्रारेड  गाइडेड सिस्टम लगे है जो इसे विपरीत और चरम मौसमी दशाओं में कार्य करने में अत्यधिक प्रभावी और सक्षम बनाते हैं।
इस हेलीकॉप्टर की खूबियों और इसकी जरूरतों के बारे में रक्षा मंत्रालय  ने कहा कि

'"The helicopter has been customized to suit IAF’s future requirements and would have significant capability in mountainous terrain. The helicopter has the capability to carry out precision attacks at standoff ranges and operate in hostile airspace with threats from ground. The ability of these helicopters, to transmit and receive the battlefield picture, to and from the weapon systems through data networking makes it a lethal acquisition.," the Indian defence ministry statement said."