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Wednesday, April 24, 2019

चरम मौसमी दशाओं से जूझता हमारा पर्यावरण


बीते 22 अप्रैल को विश्व पृथ्वी दिवस मनाया गया।

2020 में हम इसकी स्वर्णजयंती समारोह मनाएंगे। संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा 22 अप्रैल को अन्तर्राष्ट्रीय पृथ्वी दिवस अर्थात धरती दिवस वैश्विक रूप से आयोजित करने की घोषणा की गयी है। सबसे पहले इसे  1970 में इस उद्देश्य से मनाया गया था कि लोगों को अपनी धरती के प्रति संवेदनशील बनाया जा सके। यहाँ यह देखना बेहद जरुरी हो गया है की जब  2020 में हम इसकी 50वीं सालगिरह में प्रवेश करेंगे तो हमें पीछे मुड़कर देखना होगा कि विगत वर्षो में हमने क्या खोया और क्या पाया।

हमें खुद को और आने वाली पीढ़ियों को जिसे हम समावेशी विकास और संवृद्धि के मायावी दुनिया और क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों के आंकड़ारूपी मकड़जाल में उलझाए रखा है उन्हें पर्यावरणीय ,राजनीति और अर्थशास्त्र के विकासात्मक ,मानवीय और पर्यावरणीय स्वरूप को स्पष्ट करते हुए धरती के बिगड़ते हालत पर विशेष नज़र एयर इनसे निपटने के उपाय पर कड़ी नजर रखनी होगी।

earthday.org जो अर्थ डे की हिमायती संस्थान है ,वेबसाइट इस पर उनकी अध्यक्ष कैथलीन रोजर्स  लिखती है कि
22 अप्रैल 1970 को औद्योगिक क्रांति और उसके विकासरूपी नकारात्मक प्रभाव से त्रस्त होकर 20 मिलियन अमेरिकी लोगो ने  अपना विरोध दर्ज़ करते हुए हुए  ऐतिहासिक Clean Air Act, Clean Water Act, Endangered Species Act  के साथ साथ अन्य प्रभावी पर्यावरणीय कानूनों को अमली जमा पहना ही दिया

अमेरिकी लोग निश्चित ही बेहद भाग्यशाली रहे जिनको ये प्रभावी क़ानूनी अधिकार मिला  लेकिन विश्व बहुत से अन्य देशो में यह बात नहीं बन पायी।

हम दूसरे किसी अन्य देश की बात करने के बजाय अपने देश भारत में देखे  तो कई पर्यावरणीय कानून ,पंचाट,और अभिकरण  के साथ साथ अनेक जीव जंतु से सम्बंधित  विशेष  परियोजनाओं  को व्यापकता के साथ तरजीह दी गयी  जिसमें  प्रोजेक्ट टाइगर और एलीफैंट का जिक्र वैश्विक स्तर पर लिया जाता है। भारत मे संविधान के पर्यावरणीय प्रावधानों के अतिरिक्त मौजूद अन्य कानूनों की लंबी श्रृंखला है
जिसके तहत 

1.जल प्रदूषण संबंधी-कानून.


रीवर बोर्ड्स एक्ट, 1956.
जल (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण ) अधिनियम, 1974
जल उपकर (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण ) अधिनियम, 1977
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986.

2.वायु प्रदूषण संबंधी कानून.

फैक्ट्रीज एक्ट, 1948
इनफ्लेमेबल्स सबस्टंसेज एक्ट, 1952
वायु (प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण ) अधिनियम, 1981
पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986

3.भूमि प्रदूषण संबंधी कानून.

फैक्ट्रीज एक्ट, 1948
इण्डस्ट्रीज (डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन) अधिनियम, 1951
इनसेक्टीसाइडस एक्ट, 1968
अर्बन लैण्ड (सीलिंग एण्ड  रेगयुलेशन) एक्ट, 1976

4.वन तथा वन्यजीव संबंधी कानून.

फॉरेस्ट कंजरवेशन एक्ट, 1960
वाइल्ड लाईफ प्रोटेक्शन एक्ट, 1972
फोरेस्ट (कंजरवेशन) एक्ट, 1980
वाइल्ड लाईफ (प्रोटेक्शन) एक्ट, 1995
जैव-विविधता अधिनियम, 2002. आदि शामिल है,
इसके अतिरिक्त पर्यावरणीय मसलों पर पूर्णतः समर्पित राष्ट्रीय हरित अभिकरण का भी गठन किया गया है। 

भारत में पर्यावरण संबंधित उपरोक्त कानूनों का निर्माण उस समय किया ,गया था जब पर्यावरण प्रदूषण देश में इतना व्यापक नहीं था। अत: इनमें से अधिकांश कानून अपनी उपयोगिता खो चुके हैं। परन्तु अभी भी ये काननू व नियम पर्यावरण संरक्षण में अपना महत्त्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं 
विकास और पर्यावरण के साथ असंतुलित तालमेल, विकास के नाम पर औद्योगिक घराने और नीति नियंताओ की सांठगांठ के परिणामस्वरूप धरती की और उसके क्षमताओं से परे जाकर प्राकृतिक संसाधनों कस  अवैज्ञानिक शोषण और दोहन कर रही है; जलवायु परिवर्तन ,तेजी से गर्म होते महासागर ,समुद्रतल  का लगातार बढ़ता जलस्तर और उसमे बढ़ती अम्लीयता का स्तर ,विश्व के विभिन्न हिस्सों में व्याप्त चरम मौसमीय दशाएं ,मौसमी और कीटजनित रोगों को बढ़ता  प्रकोप, ग्लेशियरों का लगातार असामान्य गति से पिघलना औऱ तेजी से सूखते जल स्रोतों की घटनायें निश्चित रूप से किसी गंभीर आसन्न खतरे के संकेत का इशारा कर रही है जिसे समय रहते जल्द समझा जाय वर्ना एक देश दूसरे देश पर ठीकरा फोड़ते नजर आएंगे।


अंतरिक्ष में सबसे पहले कदम रखने वाले पहले कॉस्मोनॉट यूरी गैगरिन से जब तत्कालीन सोवियत नियंत्रण कक्ष ने पूछा कि अंतरिक्ष से धरती कैसी दिख रही है ? उन्होने उत्तर दिया

"मैं पृथ्वी देख रहा हूँ ! यह बहुत खूबसूरत है"

यह धरा सचमुच बेहद खूबसूरत है तभी तो मानव जिसे सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी माना जाता है वह यहां बसता है और मैन एंड बायोस्फियर की संकल्पना को मूर्त रूप देता है ।

महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने भी कहा था कि दो चीजें असीमित हैं--एक ब्रह्माण्ड तथा दूसरी मानव की मूर्खता। मनुष्य ने अपनी मूर्खता के कारण अनेक समस्याएँ उत्पन्न की हैं, जिनमें पर्यावरण प्रदूषण भी एक है।

लेकिन जब रक्षक ही भक्षक बन जाय तो आप, हम किस पर यकीन  करेंगे आज रक्षक और भक्षक की दोनों की जिम्मेवारी मानव खुद निभा रहे हैं धरा की सबसे बुद्धिमान प्राणी होने के वावजूद पर्यावरण के प्रति हमारा नजरिया बेहद नकारात्मक रहा है ।

हम अन्य मुद्दों की अपेक्षा इस मसले पर "चलता है,/ठीक है"," हमें मिल गया न,आगे की बात आने वाले सोंचे", हमें  क्या। .. आदि काम चलाऊ सम्बोधनों से ही इसे देखते और समझतें  है जबकि यह हमारे जीवनशैली का अभिन्न अंग है लेकिन हमारी प्राथमिकता सूची में सबसे निचले पायदान पर है.

विश्व की बढ़ती आबादी घटता पानी, चरम मौसमीय दशाएँ,जैव विविधता में लगातार होता तेजी से क्षरण,समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का औद्योगिक और अन्य स्वार्थपरक विकासात्मक कार्यों के लिए अंधाधुंध दोहन, आर्कटिक और अंटार्कटिक के गर्भ में छिपे बहुमूल्य ऊर्जा भंडार को लेकर आसन्न तनातनी,,नदियों को माता का दर्जा देने वाले मछुआरों आजीविका पर गहराता रोजी रोटी का संकट आदि महज चंद उदाहरण हैं ।


अगर हाल के महीनों में चर्चा में रहे कुछ मौसम जनित घटनाओ पर गौर करें तो आप आश्चर्य चकित रह जाएंगे जैसे, गत सात फरवरी को दिल्ली राजधानी क्षेत्र के बाशिंदों ने मौसम का एक अलग ही मिज़ाज को देखा जब इस दिन इतने ओले गिरे की  सड़कों पर शिमला के माफ़िक सफेद चादर सी बिछ गई। देश के पूर्वी हिस्से में भी इस असमय गिरे ओले ने जम कर कहर बरपाया और मक्के की खड़ी फसल को पूरी तरह तबाह कर दिया। कड़ाके की सर्दी और असमय भारी बारिश में वृद्धि की घटनाओं को वैश्विक तापमान परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है।

 "वेदर क्लाइमेट एंड कैटास्ट्रोफ इनसाइट रिपोर्ट 2018" के आंकड़ो पर गौर करें तो गत वर्ष प्राकृतिक आपदाओं ने दुनिया भर में 225 बिलियन डॉलर की क्षति पहुंचाई थी,यह लगातार तीसरे साल था जब प्राकृतिक आपदाओं ने 200 बिलयन डॉलर का नुकसान पहुंचाया।

 इन प्राकृतिक आपदाओं में चक्रवात,दवानल (जंगल मे आग) गम्भीर सूखा, और बाढ़ मुख्य रूप से शामिल था । इस रिपोर्ट की माने और अगर भारत की बात करें तो, यहां सिर्फ़ बाढ़ से 5.5 बिलियन डॉलर का नुकसान पहुंचा है। अगस्त 2018 में दक्षिणी राज्य और "भगवान का निवास "कहे जाने वाले  केरल में  आई बाढ़,जो सदी की सभी भीषण बाढ़ थी,जहां देश एक तरफ इस  बाढ़ का  गवाह बना वहीं दूसरी तरफ देश के ज्यादातर हिस्से सूखा प्रभावित रहा।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार ,जो पिछले 117 सालों में सबसे कम बारिश वाला साल रहा, यह चिंताजनक बात इसलिए है कि क्योंकि तथाकथित मायावी जीडीपी के आंकड़े इन्ही मानसूनी बारिश के मिज़ाज को देख कर तय किये जाते है।

भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ो के साथ साथ " द इम्पैक्ट ऑफ एयर पॉल्युशन न डेथ,'डिज़िज़ बर्डन एंड लाइफ एक्सपेक्टेन्सी अक्रास द स्टेट्स ऑफ इंडिया', लांसेट की 'द ग्लोबल बर्डन ऑफ़ डिसीज स्टडी 2017 'और 'डाउन टू अर्थ' विभिन्न आलेखों और रिपोर्ट्स पर एक नजर डालें तो भारत मे गत वर्ष  विभिन्न राज्यो में आये आंधी तूफान,धूल भरी तेज आँधी,बाढ़ औऱ भारी बारिश,हिमस्खलन,वज्रपात,शीतलहर,और तटीय राज्यो ओडिशा और तमिलनाडु में आये चक्रवात (क्रमशःतितली,गज)आदि से करीब 1410 लोग असमय काल कवलित हुए है।

मामला यहां थमता दिख नहीं रहा ,"विश्व मौसम संगठन(डब्ल्यूएमओ) नीत "द स्टेट ऑफ ग्लोबल क्लाइमेट इन 2018 रिपोर्ट " ने दुनियाभर में व्याप्त चरम मौसमी घटनाओं को वैश्विक खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले विपरीत प्रभाव और खाद्य सुरक्षा की बढती असुरक्षा को इंगित किया रिपोर्ट में अफ्रीका सहित अन्य महाद्वीपों पड़े चरम सूखे के लिये मजबूत अल नीनो ,स्थानीय मौसमी और जलवायविक दशाओं को मुख्य रूप से जिम्मेदार है और  जिसका सीधा संबंध कुपोषण से है,और वर्ष 2017 तक के आंकड़ो में विश्व मे कुपोषित जनसंख्या बढ़कर 82.1करोड़ हो गई।
इसे संयुक्त राष्ट्र ,एफएओ और इंडियन कौंसिल ऑफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आईसीएआर) और नेशनल अकेडमी ऑफ एग्रीकल्चरल  साइंस के हालिया आंकड़ो पर नजर डाले जिसमे  स्पष्ट कहा गया है कि देश का 71 फीसद कृषि योग्य क्षेत्र मृदा प्रदूषण की मार झेल रहा है और ऐसी स्थिति से गुजर रहा है जो भविष्य में कृषिगत कार्यों के लिए उपयुक्त नहीं रहेगा। 
वहीं भूमि प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन के जद में आने से समुद्री पारिस्थितिकी तन्त्र भी अछूता नहीं रहा है एक आंकड़ो के तहत समुद्र में  प्रतिदि अरबों गैलन बिना किसी ट्रीटमेंट किये गंदगी समुद्रो में उड़ेली जाती है जिससे गंभीर पर्यावरणीय संकट उत्पन्न होने के तीव्र आसार  है।
कोरल ब्लीचिंग बैलास्ट वाटर पॉल्युशन, ऑइल स्पिलिंग, फिश बाय कैचिंग ,डीप मिनरल एक्सप्लोरेशन से होने वाले सामुद्रिक तंत्र को होने वाले नुकसान के साथ ही वर्तमान में प्लास्टिक से उत्पन्न प्रदूषण भी कम चिंताजनक नहीं रहा है,समुद्र में व्याप्त करोड़ों टन प्लास्टिक जो समुद्र में महीन कणों में अपघटित हो कर पहले समुद्री खाद्य जाल में प्रवेश करती है और फिर हमारे किचन और डाइनिंग टेबल तक पहुंचती है।

गत वर्ष जून 2018 में नई दिल्ली में आयोजित  विश्व पर्यावरण दिवस जिसका थीम  “प्लास्टिक प्रदूषण को हराएं” था, जो समुद्र में प्लास्टिक की भयवहता के दृश्य को बताता है कि  एक बार उपयोग में आने वाले प्लास्टिक से निपटने के लिए पूरी दुनिया एकजुट हो रही है।

आंकड़ों पर गौर करें तो जितनी देर में हार्दिक पंड्या एक ओवर फेंकते हैं, उतनी देर में चार ट्रक के बराबर प्लास्टिक का कचरा महासागर में बहा दिया जाता है। तीन बार ग्रीन ऑस्कर  पुरस्कार के विजेता और परिसद्ध पर्यावरणविद माइक एच पांडेय ने अपने एक आलेख में लिखा कि "अगर इसी तरह हम समुद्र को नुकसान पहुंचाते  रहे तो 2048 में में समुद्र से मछलिया गायब हो जाएँगी  "

खाद्य  और जल सुरक्षा भी वर्तमान की सबसे बड़ी चुनौती बनते जा रही है जो आने वाले समय में  भारत सहित विश्व के तमाम देशों को बुरी तरह  प्रभावित करेगा। संयुक्त राष्ट्र  खाद्य और  कृषि संगठन (एफ़एओ) के आंकड़े पर मौजूं करे तो इस समय दोहन किये जा रहे वैश्विक भू जल  का एक चौथाई हिस्सा भारत में निकल रहा है जबकि प्रकृति से बारिश के जरिये जितना पानी प्राप्त होता है उसमे भारत का महज चार फीसद हिस्सा होता है 

एफ़एओ के मानक के अनुसार प्रति व्यक्ति प्रतिवर्ष  कम से कम दो हज़ार घन मीटर पानी चाहिए इससे कम पानी की उपलब्धता वाले देश को  गंभीर जल आभाव वाले देश की श्रेणी में रखा जाता है ,संयुक्त राष्ट्र के हालिया वैश्विक जनसँख्या के आंकड़े  में भारत की आबादी 136 करोड़ तक पहुँच गयी है इन दोनों आंकड़ों से स्पष्ट होता है की जल्द ही भारत को  गंभीर जल संकट से रु ब रु होना पड़ेगा 

भारत  में पर्यावरण  भारतीय जीवनशैली से जुड़ा  मसला है और इसलिए इसपर बहुत संजीदगी से आम नागरिक और सरकार गंभीरता के साथ कार्य करती है 


  • भारत सरकार ने गत  वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस का समारोह आयोजित कर भारत सरकार एक बेहद ज्वलंत मुद्दे के नेतृत्व का बीड़ा उठा रही है।तथा इस दिशा में  आम लोगो में जागरूकता को  प्रोत्साहित करने के क्रम में ढेर सारी रुचिकर गतिविधियां और कार्यक्रम आयोजित कर रही है जिनमें लोगों की भारी रुचि और भागीदारी देखने को मिल रही है।


संपूर्ण भारत में सार्वजनिक जगहों, राष्ट्रीय उद्यानों और जंगलों से प्लास्टिक की सफाई और साथ ही साथ समुद्र तटों की सफाई  और ब्लू फ्लैग सर्टीफिकेशन जैसे अभियानों का उदाहरण पेश करते हुए, भारत ने अपनी जिम्मेदारी के रूप में इस पहल की शुरूआत की है। 

भारत ने जलवायु परिवर्तन और कम कार्बन वाली अर्थव्यवस्था की ओर रुझान की आवश्यकता के मुद्दे पर वैश्विक मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभाई है और मुखर स्वर में विकसित देशों के प्रोपगेंडा प्रदर्शन की पोल खोलने में कोई देर नहीं किया है ,इन देशों को उम्मीद है कि अब भारत प्लास्टिक प्रदूषण के खिलाफ बड़ी कार्यवाही करने की दिशा में उनकी मदद करेगा।

यह दुनिया भर के लिए संकटपूर्ण है और जीवन के हर पहलू को प्रभावित कर रहा है जो हमारे पीने के पानी में और हमारे भोजनतंत्र  में मौजूद है। प्लास्टिक हमारे समुद्र तटों और महासागरों को नष्ट कर रहा है। हमारे महासागरों और ग्रह को बचाने के लिए जोर लगाने का बीड़ा अब भारत सहित अन्य विकासशील देशों को युद्धस्तर पर उठाना होगा। जहां भारत की भूमिका एक अग्रणी देश के रूप में होगी जो उभर कर सामने आ रहा है, जो इस तथ्य से भी उजागर होता है कि भारत की गिनती दुनिया में सर्वाधिक पुनःचक्रण दर वाले देशों में की जाती है। प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने में यह निर्णायक भूमिका निभा सकता है। 

प्लास्टिक प्रदूषण से जुड़े तथ्य:

प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में 500 अरब प्लास्टिक बैगों का उपयोग किया जाता है। हर वर्ष, कम से कम 8 मिलियन टन प्लास्टिक महासागरों में पहुंचता है, जो प्रति मिनट एक कूड़े से भरे ट्रक के बराबर है।
पिछले एक दशक के दौरान उत्पादित किये गए प्लास्टिक की मात्रा, पिछली एक शताब्दी के दौरान उत्पादित किये गए प्लास्टिक की मात्रा से अधिक थी ।
हमारे द्वारा प्रयोग किये जाने वाले प्लास्टिक में से 50% प्लास्टिक का सिर्फ एक बार उपयोग होता है।
हर मिनट 10 लाख प्लास्टिक की बोतलें खरीदी जाती हैंहमारे द्वारा उत्पन्न किए गए कुल कचरे में 10% योगदान प्लास्टिक का होता है

Sunday, April 14, 2019

जूड़ शीतल :मिथिलांचल का प्रकृति को सलाम

जूड़ शीतल त्योहार मुख्यतः देश के मिथिलांचल क्षेत्र में प्रकृति और मानव के बीच आपसी नैसर्गिक और संयोजी सबंधो को दर्शाने के लिए मनाया जाता है। यह मानव और जैवमण्डल(biosphere)के अन्योन्याश्रय संबंधों को लेकर मनाये जाने वाले पुरातन त्योहारों में संभवतः एक है। इसमें घर के बड़े बुजुर्गों द्वारा अपने अनुजों को
अल सुबह शीतल जल से आशीर्वाद दिया जाता है जिसे "जूड़ाना"कहते है।यह आशीर्वाद न सिर्फ मानव को बल्कि बग़ीचे के फूल पत्तियों से लेकर आम,नीम,जामुन, महुआ सहित सभी पेड़ों को जल से जूड़ाते हैं,  नए सिरे से पौधरोपण भी करते है। जुड़ाने की इस सूची में तालाब पोखर और कुआं के साथ पालतू पशु पक्षी भी शामिल होते हैं।
आज के दिन चूल्हे चौके को भी आराम दिया जाता है। गृहणियां दिन का खाना अलसुबह ही बना लेती है ,भोजन सेवन से पूर्व पकाए हुए सभी भोजन का कुछ हिस्सा पशु पक्षियों को समर्पित किया जाता है जो पर्व के मानवीय सम्बंध को दर्शाते हैं।
आज से ही नए फसल से तैयार अन्न/खाद्यान्न,सब्जी और मिथिलांचल की शान समझी जाने वाले आम के बौर{टिकोला) को अपने आराध्य को  समर्पित कर , अपने लिए इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं।
जूड़ शीतल पर्व के साथ ही किसानों को कृषि कार्य से थोड़ा सुस्ताने ,तीव्र गर्मी से निजात पाने,मनोरंजन, हास् परिहास करने ,और अपने सामाजिक मेल मिलाप और जिंदगी में  नई उम्मीद ,रणनीति  बनाने का मौका मिलता है और अपने सामाजिक पारिवारिक कर्तव्य के निर्वहन से जूड़ शीतल के बाद मांगलिक कार्य की शुरुआत भी हो जाती है। कुल मिलाकर यह पूरे ग्रामीण अर्थव्यस्था को  प्रकृति के साथ समन्वयकारी प्रवित्तियों को जोड़ती और दर्शाती है
कुछ दशक पूर्व युवाओ द्वारा खेतों में सूखती पानी को कीचड़ बना कर उसमें अपने को पूरी तरह सनते हुए शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन किया जाता था,माना जाता है कि धरा में कई ऐसी ख़ूबियां होती है जो सर्दी और बसन्त के बाद मौसम के परिवर्तन से होने वाली तमाम बीमारियों को रोकने में इस कीचड़ काफी कारगर माना जाता रहा है।
इससे सामाजिक समरसता तो बढ़ती ही थी और लोगों को अपनी मिट्टी, अपने समाज और पर्यावरण से जुड़ाव बढ़ता था, आज के युवा कीचड़ तो दूर सूखी मिट्टियां भी हाथ में "हैंड ग्लव्स "को लगाकर उठाते/उठाती है, बदलते वैश्विक परिस्थितियों ,चरम पर्यावरणीय परिस्थितियां और बदलते पर्यावरणीय हालात,वैश्विक तापन में आज जरूरत है इस पर्व को सहेजने, इसे संरक्षण देने और इसके अर्थों को अपने जीवन में समाहित करने की ताकि सही मायने में पर्यावरणीय आर्थिक सामाजिक समावेशी विकास के सही अर्थों को समझते हुए  विकास कर पाएं।

Friday, April 12, 2019

जलियांवाला बाग हत्याकांड के सौ साल


आज जालियांवाला बाग़ हत्याकांड को पूरे एक सौ एक वर्ष हो गए है।
भारतीय इतिहास में यह दिन अंग्रेजी औपनिवेशिक मानसिकता से  ग्रस्त और व्हाइट मेन बर्डनशिप का बोझ लिए झूमते बीते अंग्रेजी राज के अत्याचार को बयां करता है,जिसके बूटों तले हमारी समृद्ध विरासत,ज्ञान और संस्कृति पूरी तरह कुचली गयी।

 मैली टेम्स को पावन हुगली के जल से पूरी तरह कायाकल्प किया गया और हुगली को मैला बना दिया,कभी लंदन से हर मामले में अत्यधिक समृद्ध रहा मुर्शिदाबाद ,वर्तमान की हालत बयां करने लायक नहीं बचा है। थ्योरी ऑफ डाउनवार्ड फिल्टरेशन के जरिए अंग्रेज़ी राज ने हमे  मिट्टी में मिलाने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ी गई थी।


इस त्रासदी की  गंभीरता को महज प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी के गत वर्ष दिए गए वक्तव्य से समझा जा सकता है। उन्होंने ने कहा कि

‘‘भारत की आज़ादी का संघर्ष बहुत लम्बा है, बहुत व्यापक है, बहुत गहरा है, अनगिनत शहादतों से भरा हुआ है। पंजाब से जुड़ा एक और इतिहास है। 2019 में जलियांवाला बाग की उस भयावह घटना के भी 100 साल पूरा हो रहा है इस  घटना ने पूरी मानवता को शर्मसार कर दिया"

बेशक,दुनिया के दूसरे हिस्से के लिए महज़ यह सालाना जलसा हो सकता है,पर बीते सौ सालों के बाद भी उन अंग्रेजों के अमानुष अत्याचार,अन्याय से हमारे जख्म आज भी हरे हैं और साल दर साल यह जख्म और भी हरे होते रहेंगे।

सबल्टर्न भारतीय इतिहासकारों को पढ़ते हुए हमारे कान आज भी उन बेबस,निहत्थे और लाचार बच्चे बूढ़े,स्त्री पुरुष जो शांति से जमा थे,उन पर बरसती मशीनगन की गोलियों के बीच उनकी चीख को महसूस कर सकते हैं।

ब्रिटिश सरकार और उनके मंत्री कई दफे इस लोमहर्षक हत्याकांड पर अफसोस तो जता चुके हैं 2019 में  भी तत्कालीन ब्रिटिश प्रधानमंत्री थेरेसा मे  ने इस घटना पर अफसोस जताया है ।

वर्तमान ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन कोविड 19 से ग्रस्त थे ,वे कल ही गहन चिकित्सा कक्ष से बाहर आये है और फ़िलहाल  सिनेमा देखनेऔर पहेलियां सुलझाने में व्यस्त है। अगर वे स्वस्थ रहते और कोविड19 का प्रकोप न रहता तो वे भी अपने पूर्ववर्ती के राह पर चलने में किंचित संकोच नहीं करते, कहते हैं न आखिर वचन से क्यों दरिद्र होऊँ,अफसोस ही तो जताना है।

लेक़िन आज भी किसी भी ब्रिटिश राजनेता को रत्ती भर शर्म नहीं आयी है कि वे भारतीय जनता से  जलियांवाला हत्याकांड पर माफ़ी मांगने की कोई जहमत उठाएं।


क्या था रौलेट एक्ट ?

भारत मे बढ़ते क्रांतिकारियों के प्रभाव को जड़ से समाप्त करने के उद्देश्य से ब्रिटिश सरकार ने 1917 में ब्रिटिश जज सर सिडनी रौलेट की अगुवाई वाली समिति का गठन किया। इस समिति का मुख्य कार्य यह पता लगाना था कि

"1.भारत मे  किस स्तर तक क्रांतिकारी आंदोलन संबंधी षड्यंत्र फैले हुए हैं।
2.इन षड़यंत्र का प्रभावी रूप से मुकाबला करने के लिए किस प्रकार के कानूनों की आवश्यकता है।

ब्रिटिश सरकार भारत मे बढ़ती क्रांतिकारी गतिविधियों से बुरी तरह त्रस्त थी और  कठोर "भारतीय रक्षा क़ानून" की मियाद पूरी हो रही थी।

समिति ने 1918 में अपनी रिपोर्ट ब्रिटिश सरकार को सौंपी,समिति कीअनुसंशा पर केंद्रीय विधानमंडल ने आनन फानन में फरवरी 1919 में दो विधेयक पेश किया जिसमें एक को तो वापस ले लिया गया  लेकिन दूसरे जिसे " क्रांतिकारी एवं अराजकतावादी अधिनियम या Anarchical and Revolutionary Crimes Act,1919  को  18 मार्च 1919 को  पारित कर दिया।

इस दमनकारी कानून की  की अवधि तीन साल रखी गई। इसे ही रौलेट एक्ट या काला कानून कहा जाता है। इस कानून को तमाम भारतीय नेताओं और आम जनमानस से तीखे विरोध का सामना करना पड़ा, भारतीयों ने इसे "काला बिल"/आतंकी अपराध अधिनियम कहा, भारतीय नेताओं ने इसके विरोध में केंद्रीय विधानमंडल से अपना इस्तीफा दे दिया,पर असंवेदनशील ब्रिटिश सरकार पर कोई असर नहीं हुआ।

यहां यह ध्यान रखना बेहद जरूरी होगा कि  यह दौर महात्मा गांधी के सफलतम "सत्याग्रह ",क्रांतिकारियों के "सूरत फूट" के बाद उनकी तीव्र और प्रभावी क्रांतिकारी गतिविधि ,और तुर्की के खलीफा को लेकर उपजे ख़िलाफ़त आंदोलन का था।।

रौलेट एक्ट के प्रावधान।

इस विधेयक के प्रावधानों के  तहत भारत मे नागरिक अधिकार को कुचलने के लिए  तत्कालीन ब्रिटिश सरकार को असीम शक्ति प्रदान की गयी थी। इसके तहत मजिस्ट्रेट किसी व्यक्ति/सरकार की नजर में आतंकी गतिविधियों में शामिल होने का संदेहास्पद व्यक्ति को बिना कारण बताये अनिश्चितकाल के लिए कारावास में रख कर दंडित कर सकती थी।

जिसमे सुनवाई कम से कम दो साल तक तो संभव नहीं थी,इस अधिनियम में ब्रिटिश भारतीय पुलिस को कई मानवाधिकार विरोधी शक्तियां मिली थी जिसका वे बेजा इस्तेमाल कर सकती थी।

इसकी जद में मीडिया,आम निर्दोष व्यक्ति,बच्चे ,महिला आदि  शामिल थे। दूसरे शब्दों में इसके प्रावधान पश्चिमी देशों के उपज "प्राकृतिक और नैसर्गिक न्याय" का पूरी तरह  मखौल उड़ा रहे थे।इसे "बिना वकील,बिना अपील और बिना दलील का कानून" भी कहा जाता था।

महात्मा गांधी ने इस बिल के प्रावधानों को लेकर पुरजोर विरोध किया। गाँधी ने इसके खिलाफ  06 अप्रैल 1919 को  देशव्यापी हड़ताल  का आह्वान किया, और सत्याग्रह  सभा की  जिसे "रॉलेट सत्याग्रह"भी कहा जाता है।


पंजाब में लगातार बढ़ता विरोध प्रदर्शन का सिलसिला,विफल होता प्रशासन।

पंजाब में विरोध प्रदर्शन की शुरुआत स्वामी श्रद्धानन्द के नेतृत्व में  दिल्ली से हुई जिसमें पुलिस की गोली से पांच आंदोलनकारी मारे गए,देखते ही देखते यह बम्बई,अहमदाबाद, पंजाब और लाहौर को भी अपने आगोश में ले लिया।

स्वामी श्रद्धानंद और डॉ.सत्यपाल के आमंत्रण पर गाँधी पंजाब की तरफ कूच किये लेकिन हरियाणा के पलवल  में उन्हें 8 अप्रैल 1919 को गिरफ्तार कर बम्बई भेज दिया गया और उन्हें पंजाब जाने से प्रतिबंधित कर दिया गया। गांधी को पंजाब में प्रतिबंध को लेकर आम जनमानस में खासा रोष था।


पंजाब में हिन्दू, सिख और मुस्लिम समुदाय की एकता अंग्रेजों को फूटी आंख नहीं सुहा रही थी। अंग्रेज किसी भी कीमत पर इस एकता को तोड़ने और भारतीय लोगों के मन में से निकल चुके डर को फिर से स्थापित करना चाहते थे। और इसके लिए किसी भी हद तक जा सकते थे।


इसी बीच तेजी  से बदलते घटनाक्रम में 9 अप्रैल 1919 को  पंजाब के दो लोकप्रिय नेता डॉक्टर सत्यपाल और डॉक्टर सैफ़ुद्दीन किचलू को पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ डायर के निर्देश पर अमृतसर के जिला उपायुक्त ने बिना किसी कारण बताये गिरफ्तार कर लिया।

 इस गिरफ़्तारी ने आक्रोश से उबल रहे पंजाब के लोगों की सब्र की सीमा तोड़ दी,फिर भी वे इस गैर कानूनी गिरफ़्तारी को लेकर शांतिपूर्ण ढंग से सड़कों पर उतर कर जुलूस के शक्ल में अपना अपनी कौमी एकता  को सुदृढ़ करते हुए अपना विरोध दर्ज कराया, यह विरोध इतना जबर्दस्त था कि छह अप्रैल को पूरे पंजाब में हड़ताल रही और 10 अप्रैल 1919 को हिन्दू एवं मुसलमानों ने मिलकर बहुत बड़े स्तर पर रामनवमी के त्योहार का आयोजन किया।


लेकिन पुलिस पहले से ही यह तय कर बैठी थी कि इस जूलूस का दमन करना है। पुलिस ने जुलूस को  को रोकने का असफ़ल प्रयास किया और जुलूस पर बिना चेतावनी दिए गोलीबारी कर दी,जिससे कम से कम दस लोग मारे गए,अब प्रदर्शनकारियों के सब्र का पैमाना टूट गया और उग्र भीड़ ने पुलिस पर पत्थरबाजी के साथ पलटवार किया, उन्होंने कई सरकारी इमारतों में आग लगा दी  और  पांच अंग्रेज को मार दिया और एक अंग्रेजी महिला के साथ हाथापाई की (जिसे बाद में भारतीयों ने ही बचाया)  मामले की गंभीरता ,वक़्त का तकाजा और प्रशासन के हाथों से तेजी से निकलती सरकारी मशीनरी को बचाने के लिए सबसे पहले पंजाब में मार्शल लॉ लगाया गया और अमृतसर शहर का प्रशासन 55 वर्षीय ब्रिटिश सैन्य अधिकारी ब्रिगेडियर जनरल रेगिनाल्ड एडवर्ड हैरी डायर को सौंप दिया गया।

अगले दिन 600 सैनिकों की टुकड़ी अमृतसर पहुंच कर मोर्चा संभाल लिया, रेगीनाल्ड डायर ने आते ही जम कर गिरफ्तारियां की और  पूरे शहर में निषेधाज्ञा लगा दिया, जिससे  धरना प्रदर्शन तो दूर, तीन व्यक्ति एक साथ इकट्ठे नहीं हो सकते थे।

आखिर क्या हुआ  बैशाखी के दिन

अमृतसर में उपजे हालात से बेख़बर आस पड़ोस जिले क करीब 10 से 15 हज़ार लोग पवित्र बैशाखी का त्योहार मनाने  चारों तरफ से विशाल दीवारों से घिरे जलियांवाला बाग ,जो एक सामाजिक मेल जोल का प्रसिद्ध स्थल था, जमावड़ा होने शुरु होने लगा था।

यह सभा जलियांवाला बाग में शाम करीब 4:30 बजे होने को थी। मौसम विभाग के अनुसार उस दिन आसमान मौसम साफ था,हवा थोड़ी ठंडक लिए मन्द गति से चल रही थी लोग अपने प्रिय नेता की गिरफ्तारी से व्यथित,उग्र,और परेशान थे।

जब रेगीनाल्ड डायर को इन श्रद्धालुओं को आने की खबर मिली तो वह आगबबूला हो उठा,उसने अपने मातहत से कहा कि निषेधाज्ञा लगे होने के वावजूद ये लोग उसके आदेश की अवहेलना कैसे कर सकते है।

उसने फौरन अपना निर्णय लिया और मुख्यतः गोरखा और कुछ बलूची सैनिकों और 7.92 एमएम मशीनगन लगे बख्तरबंद वाहन के साथ जालियांवाला बाग पहुंच कर पूरे मैदान की घेरेबन्दी कर दी। इसके बाहर निकलने के पांचों तंग रास्ते को बंद कर दिया और अपने  सैनिकों को मैदान के दीवारों पर मोर्चा संभालने का आदेश दिया और 150 गज से भी कम दूरी से सभा में शामिल निहत्थे ,स्त्री पुरूष, बुज़ुर्ग, बच्चों को सभा से जाने, सभा से निषेधाज्ञा का उल्लंघन होने की चेतावनी दिए बिना उसने अपने सैनिकों से अन्तिम गोली समाप्त होने तक इन निहत्थे लोगो पर गोलीबारी करने का आदेश दिया ।

ब्रिटिश सरकार के आधिकारिक आंकड़ो में दस मिनट में  कुल 1650 राउण्ड की गोलीबारी हुई जिसमें कम से कम 379 लोग मारे गए,1137 लोग बुरी तरह जख़्मी हुए, डायर के कलेजे को शांति मिली कि शायद ही एक भी गोली बर्बाद गयी।


ब्रिगेडियर डायर के सैनिकों ने पहले चेतावनी देने के लिए न हवा में गोली चलाई,और न ही पैरों पर, सैनिकों ने सभा कर रहे लोगो के सिर,चेहरे,छाती और महिलाओं के पेट और गर्भ पर गोलियां मारी,।
सैनिक अपनी राइफल की मैगज़ीन खाली करते और दूसरी लगाते हुए करीब दस मिनट तक चले रक्तपात से रक्तपिपासु डायर को क्षणिक शांति दे गया

डायर द्वारा किये  नरसंहार में मरने वालों की संख्या ब्रिटिश सरकार ने 379 बताई, जबकि भारतीय कांग्रेस की रिपोर्ट के अनुसार इसमें एक हजार से अधिक लोग मारे गए।
जलियांवाला बाग में गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं, जो अंग्रेजों के अत्याचार की कहानी कहते नजर आते हैं।

जालियां वाला हत्याकांड एक पागल ,सनकी,वहशी व्यक्ति का करतूत नहीं बल्कि औपनिवेशिक मानसिकता और नस्लभेद से ग्रस्त दिमाग की उपज थी।इसमे किसी को कोई शक नहीं होना चाहिए कि दोनो डायर ख़ूनी हत्यारा है।


अतीत में भी ब्रिटिश सामूहिक नरसंहार के लिए जाने गए हैं, जैसे पीटर लू,बोस्टन कॉमन्स, आयरलैंड के डब्लिन मे ईस्टर रिबेलिएन आदि चंद उदाहरण हैं जिसमे ब्रिटिश औपनिवेश के सैनिक कमांडरों की खून की प्यास  देखने को मिलती है और इन्हें इस नरसंहार पर कोई शर्म नहीं है।

जलियांवाला बाग हत्याकांड की इस घटना से पूरा देश स्तब्ध रह गया। वहशी क्रूरता ने देश को मौन कर दिया। पूरे देश में बर्बर हत्याकांड की भर्त्सना की गयी।


नोबेलजई  रवींद्रनाथ टैगोर ने ब्रिटिश महारानी द्वारा दी गई “नाइट”की उपाधि वापस कर दी गई थी। इसके साथ ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सर शंकरन नायर ने वायसराय की कार्यकारिणी परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था।

रवींद्रनाथ टैगोर ने कहा कि "'अब समय आ गया है जब सम्मान के तमगे अपमान के बेतुके संदर्भ में हमारे कलंक को सुस्पष्ट कर देते हैं  जहां तक मेरा प्रश्न है मैं सभी विशेष उपाधियों से रहित होकर अपने देशवासियों के साथ खड़ा होना चाहता हूँ "

इस शर्मनाक हत्याकांड के बारे में प्रसिद्ध इतिहासकार
थॉमसन और गैरेट ने लिखा  कि "अमृतसर दुर्घटना भारत ब्रिटेन संबंध में युगांतरकारी घटना थी  जैसा कि 1857 का विद्रोह था" वहीं दीनबंधु एफ०एंड्रूज ने हत्याकांड को “”जानबूझकर की गई हत्या”” कहा.


जलियांवाला बाग नरसंहार के कारणों की जांच के लिये 
हंटर कमेटी ।

सरकार ने विवशता में जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच हेतु 1 अक्टूबर 1919 को लार्ड हंटर की अध्यक्षता में एक आठ सदस्यी आयोग का नियुक्ति की थी।

जिसमें पांच अंग्रेज और तीन भारतीय सदस्य थे।

1 . लॉर्ड हंटर , जस्टिस रैस्किन,डब्लू०एफ० राइस ,
मेजर जनरल सर जार्ज बैरो और सर टॉमस स्मिथ ।

जबकि अन्य तीन भारतीय सदस्य थे।

1. सर चिमनलाल सीतलवाड़
2. साहबजादा सुल्तान अहमद
3. जगत नारायण ।


हंटर कमेटी ने मार्च 1920 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थीइसके पहले ही सरकार ने दोषी लोगों को बचाने के लिए "इण्डेम्निटी बिल " पास कर लिया था।


हंटर समिति ने इस पूरे घटनाक्रम पर लीपापोती करने का प्रयास किया , समिति ने सबसे पहले पंजाब के गवर्नर को निर्दोष घोषित किया गया वहीं समिति ने जनरल रेगीनाल्ड डायर पर दोषों का हल्का बोझ डालते हुए कहा कि "डायर ने कर्तव्य को गलत समझते हुए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया  लेकिन जो कुछ किया पूरी निष्ठा से किया "

तत्कालीन भारतीय सचिव मांटेग्यू ने कहा '"जनरल आर०डायर ने जैसा उचित समझा उसके अनुसार बिल्कुल नेक नीयती से कार्य किया था अतः उसे परिस्थिति को ठीक-ठीक समझने में गलती हो गई "

जलियांवाला बाग हत्याकांड के समय पंजाब के लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ०डायर ने इस कृत्य के संदर्भ में कहा कि
"तुम्हारी कार्यवाही ठीक है गवर्नर इसे स्वीकार करता है।"

डायर को उसके अपराध के लिए ससम्मान और भारी धनराशि के साथ उसे नौकरी से हटाने का दंड दिया गया था लेकिन स्वदेश वापसी के बाद उसका राष्ट्र नायक के रूप में स्वागत किया गया, उसके सम्मान में कशीदे गढ़े गए।

 प्रसिद्ध उपन्यासकार और साहित्य में नोबेल पुरस्कार विजेता रूडयार्ड किपलिंग ने जनरल  रेगीनाल्ड डायर की  प्रशँसा  करते हुए कहा कि "Man Who Saved India" .

,ब्रिटिश अखबारों ने उसे "ब्रिटिश साम्राज्य का रक्षक" बताया वहीं ब्रिटिश संसद के निम्न सदन हाउस ऑफ कॉमन्स ने जहाँ उसके कृत्य की निंदा की

वहीं ब्रिटिश उच्च सदन हाउस ऑफ  लॉर्ड ने उसे "ब्रिटिश साम्राज्य का शेर " कहा था।

ब्रिटिश सरकार ने उसकी सेवाओं के लिए आर०डायर को
"स्वोर्ड ऑफ ऑनर" प्रदान किया गया।

इंग्लैंड के एक अखबार मॉर्निंग पोस्ट ने आर डायर के लिए तीस हज़ार पाउंड की धनराशि इकट्ठा किया था।

प्रसिद्ध इतिहासकार ताराचंद के शब्दों में पंजाब को कमोबेश "शत्रु देश मान लिया गया था जिसे अभी विजित किया गया हो वहां के निवासियों को उपयुक्त सजाएं देकर ऐसा सबक सिखाया गया कि वह सरकार को चुनौती देने और उसकी आलोचना करने के सभी इरादो से बाज आये '

सुरेंद्र नाथ बनर्जी ने लिखा है कि "जलियांवाला बाग नें देश में आग लगा दी थी"

तहकीकात कमेटी 1919.

जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में एक समिति की नियुक्ति की थी
इस समिति को तहकीकात समिति कहा गया गया अन्य सदस्यों में  महात्मा गांधी , मोतीलाल नेहरु, अब्बास तैय्यबजी सी०आर०दास एंव पुपुल जयकर थे।


इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में ब्रिटिश अधिकारियों के इस बर्बर कार्य के लिए उन्हें निंदा का पात्र बनाया सरकार से दोषी लोगों के खिलाफ कार्यवाही करने और मृतकों के परिवारों को आर्थिक सहायता देने की मांग की थी। लेकिन सरकार ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया फलस्वरुप गांधी जी ने असहयोग आंदोलन चलाने का निर्णय लिया और  इस प्रकार स्वतंत्रता संघर्ष के तृतीय चरण की शुरुआत हुई और स्वतंत्रता के आंदोलन में गांधीजी का आगमन हुआ। पंजाब को दमन के अकल्पनीय दौर से गुजरना पड़ा था

चार सितंबर 1920 को कोलकाता में कांग्रेस का विशेष अधिवेशन का आयोजन किया गया था किस अधिवेशन में पंजाब और खिलाफत के प्रश्न पर सरकार की कटु आलोचना की गई थी इस कटु आलोचना को करने वाले महात्मा गांधी द्वारा प्रस्तावित प्रस्ताव में कहा गया कि इस कांग्रेस का यह भी मत है कि जब तक अन्याय का प्रतिकार और स्वराज्य की स्थापना नहीं हो जाती है तब तक भारतीय जनता के लिए इसके सिवाय और कोई रास्ता नहीं है कि वह क्रमिक अहिंसक असहयोग की नीति का अनुमोदन करें और उसे अंगीकार करें।


जालियांवाला बाग कांड जैसी हिंसक घटना के पीछे के अमर संदेश को याद करते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गत वर्ष (24 जून)को मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में जलियांवाला बाग हत्याकांड को याद करते हुए मोदी ने कहा, कहा था कि  हिंसा और क्रूरता से कभी किसी समस्या का समाधान नहीं किया जा सकता। जीत हमेशा शांति और अहिंसा की होती है, त्याग और बलिदान की होती है।

पीएम ने कहा ‘‘13 अप्रैल,1919 का वो काला दिन कौन भूल सकता है जब शक्ति का दुरुपयोग करते हुए क्रूरता की सारी हदें पारकर निर्दोष, निहत्थे और मासूम लोगों पर गोलियाँ चलाई गयी थीं। इस घटना के 100 वर्ष पूरे होने वाले हैं।

  2020 में इस हत्याकांड के  101 साल पूरे हो गए है,साल दर साल यह संख्या बढ़ती रहेगी आने वाले हर बैशाखी पर अंग्रेजों द्वारा दिये गए न मिटने वाले जुल्मों सितम को हमारी पीढ़ी और आने वाले पीढ़ी याद करेंगी।

Tuesday, April 09, 2019

चमत्कारी और प्रभावी होमियोपैथी।

आपने कभी न कभी छोटी छोटी डिबिया में बंद मीठी गोलियां को जरूर चखा होगा जो जीभ पर थोड़ी अल्कोहल का स्वाद देती है .....डॉक्टर को कहते सुना होगा ...दो तीन बून्द दवा हर दूसरे घंटे पर लेना है या 10 बून्द दवा आधे कप पानी के साथ दिन में दो बार याद से ले लीजियेगा...,कुछ दिन नियमित सेवन के पश्चात आपका मर्ज़ ग़ायब । यकीन नहीं होगा पर यह सच है।
हम बात कर रहे हैं होमियोपैथी चिकित्सा पद्धति की जो  कमोबेश हर तरह के रोगों को जड़ से समाप्त करने की क्षमता रखती है। जरूरत है सिर्फ़ विश्वास की और  मर्ज़ को भांपने वाले दक्ष चिकित्सकों की, चूंकि यह पद्धति ‘समः समम् समयते’ अर्थात similia similibus Curentur( सिमलिया सिमलीबस )' सिद्धांत पर कार्य करती है ,जिसका मतलब है कि "जहर को जहर मारता है " अर्थात् लक्षणों की समानता के आधार पर कार्य करती है।
अत: एक ही रोग होने पर भी दो भिन्न व्यक्तियों के लक्षणों के आधार पर दोनों के लिए भिन्न-भिन्न औषधियां भी दी जाती हैं।

आज विश्व होम्योपैथी दिवस है,जिसे  महान जर्मन चिकित्सक व होम्योपैथी के संस्थापक डॉ सैमुअल हनीमैन  (1755-1843) की जयंती के रूप में  वैश्विक स्तर पर मनाया जाता है।

आज जहां अत्यधिक महंगी होती स्वास्थ्य सुविधाएं, महंगा  उपचार और पैथोलोजिकल टेस्ट के साथ डॉक्टर की फीस जो आम आदमी की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, ऐसे में डॉ हनीमैन को श्रेय देना होगा कि उन्होंने वर्षों पहले आमजन के लिए एक बेहतरीन वैकल्पिक चिकित्सा की खोज की जिसे निम्न आय वाले व्यक्ति से उच्च आय व्यक्ति आसानी से वहन कर सके।
डॉ. हैनेमैन ने होम्योपैथी की खोज करके 'आर्गेनान ऑफ मेडिसन, जो कि डॉक्टर हैनेमैन की अनमोल रचना है।

स्पष्ट है कि इसमें रोग से उत्पन्न शारीरिक और मानसिक लक्षणों के आधार पर ही दवा दी जाती है, यानी बीमारी के आधार पर नहीं, बल्कि रोगी के तन-मन के हालात को देखते हुए चिकित्सा की जाती है। इस विधा के विशेषज्ञ रोगों के प्रति खासे संवेदनशील होते है ,वे मरीज़ों की एक एक बात को बहुत चौकन्ने तरीके से सुनते हैं और दवा देते है। मसलन "बुखार के साथ सिर दाएं तरफ दर्द कर रहा है " के लिए अलग दवा और "सिर बायीं ओर दर्द " के लिए दूसरी दवा दी जाती है। यानी जितनी तरह की परेशानी उतने तरह की दवा। आधुनिक चिकित्सा पद्धति में जो उच्च क्षमता वाली एंटीबायोटिक,एन्टी वायरल दवा दी जाती है, इससे मर्ज़ में फौरी राहत तो मिलती है लेकिन शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र इम्यून सिस्टम  के साथ साथ लिवर और किडनी जैसे महत्वपूर्ण अंग  बुरी तरह से प्रभावित होता है,वहीं सामान्यतया होमियोपैथ में इस तरह की कोई समस्या देखने को नहीं मिलती।
यक़ीन नहीं होगा,पर यही सच्चाई है,और इस पद्धति की ख़ूबसूरती जो अन्य किसी भी चिकत्सा विधा में मौजूद नहीं है।
आधुनिक चिकित्सा में जहां रोगों को दबाया जाता है वहीं  होमियोपैथी में मर्ज को पहले बाहर  निकाल कर फिर जड़ से समाप्त किया जाता है।
भारत मे चिकित्सा की यह  विधा खासी लोकप्रिय है।भारत को होमियोपैथी की राजधानी कहा जाता है।
भारत सरकार इसे प्रोत्साहित और जनसामान्य बनाने के उद्देश्य से अपनी इसे आयुष चिकित्सा पद्धतियों में शामिल किया  है।
केंद्रीय होम्योपैथी परिषद की एक  रिपोर्ट के मुताबिक
देश मे हर पांचवा रोगी होम्योपैथी में इलाज करा रहा है.
अगर आपातकालीन परिस्थितियों को छोड़ दें तो करीब अस्सी फीसद से अधिक रोगों के इलाज के लिए होम्योपैथी एक अत्यधिक कारगर और प्रभावी चिकित्सा प्रणाली है.इसमे मरीज़ों और चिकित्सकों को एक दूसरे पर भरोसा रखने की अत्यधिक दरकार होती है। अधिकतर मरीज़ बहुत जल्द परेशान हो जाते हैं और दवा बीच मे छोड़ देते है,जिससे बचना चाहिए।किसी अन्य चिकित्सा के मुकाबले होम्योपैथी चिकित्सा कम खर्चीली, अत्यधिक सुरक्षित, सरल एवं प्रमाणिक अंतरराष्ट्रीय चिकित्सा पद्धति है.इसे बढ़ावा देने के लिए केंद्र व राज्य सरकारें तेजी से कार्य कर रही हैं।
दुनिया के सैकड़ों देशों में होम्योपैथिक चिकित्सा को अपनाया जा रहा है यूरोप के कई देश खास कर जर्मनी में तो इसकी लोकप्रियता अत्यधिक  है।भारत में इसका क्रेज़ पहले भी रहा था पर अब एलोपैथिक दवाओं के साइड इफ़ेक्ट के होने की बढ़ती घटनाओं के बाद इस पद्धति का काफी तेजी से विकास हुआ है. संचारी और गैर संचारी रोगों में भी यह खासी प्रभावी है। होम्योपैथी महामारियों जैसे स्वाइन फ्लू, डेंगू, खसरा, चिकन पॉक्स, माक्स, कॉलरा, मलेरिया, दिमागी बुखार जैसे बदले मौसम जनित खतरनाक रोगों से बचाव में  बेहद भरोसेमन्द,प्रभावी और कारगर है. होम्योपैथ में इलाज बीमारी के लक्ष्ण को ध्यान में रखकर किया जाता है। रोग लक्षण एवं औषधि लक्षण में जितनी अधिक समानता होगी, रोगी के स्वस्थ होने की संभावना भी उतनी ज्यादा होगी।
होम्योपैथी  दवाओं का सेवन कुछ अंगरेजी दवाओं के साथ भी किया जा सकता है, जैसे- वे मरीज जो डायबिटीज से ग्रस्त हैं और इंसुलिन डिपेंडेंट  है तो उसका इंसुलिन बंद नहीं किया जा सकता, वहीं अगर मरीज किसी एक्यूट और क्रोनिक डिजीज जैसे एग्जिमा, सोराइसिस से ग्रसित है, तो बिना इंसुलिन बंद किये होम्योपैथी दवा का प्रयोग कर सकता है और लाभ पा सकता है.आजकल शुगर फ्री मीठी गोलियां भी मौजूद है
होम्योपैथिक दवा की कोई एक्सपायरी डेट नहीं होती।
 यदि इन दवाइयों को धूप, धूल, धुंआ, तेज गंध व केमिकल्स से बचाकर रखा जाये तो यह दवा वर्षों तक चलती रहेंगी.
इन दवाओं का कोई साइड इफेक्ट नहीं होता यह पूरी तरह सुरक्षित होता है।इन दवाओं से कोई विशेष परहेज नहीं होता.
दवा को लेने के आधा घंटा पहले और आधा घंटा बाद तक कुछ खाना-पीना नहीं चाहिए
इसकी लोकप्रियता से अभिभूत माननीय उपराष्ट्रपति एम वेंकैया नायडू  गत वर्ष होमियोपैथी से जुड़े एक सम्मलेन में बोलते हुए  कहा कि "होम्योपैथी का उपचार सबसे सरल, सस्ता और लोकप्रिय है। साथ ही उन्होंने कहा कि इस पद्धति का उपचार मिशन है, कमीशन नहीं। उन्होंने कहा कि देश भर में 2 लाख 80 हजार से ज्यादा पंजीकृत होम्योपैथ के डॉक्टर हैं। ऐसा माना जाता है कि डॉक्टर इसमें पैसे कमाने के लिए नहीं आते बल्कि मिशन के तहत काम करने के लिए आते हैं। भारत मे इसकी लोकप्रियता अंदाज़ा इसी आंकड़े से लगाया जा सकता है जहाँ देश क़रीब3 लाख पंजीकृत होम्योपैथी चिकित्सक चिकित्सा कार्य कर रहे है लगभग 10 हजार सरकारी होम्योपैथिक डिस्पेंसरियाँ 300 से अधिक होम्योपैथिक चिकित्सालय,
लगभग 200 मेडिकल कालेज एवं 600 से अधिक दवा निर्माण इकाइयाँ स्थापित है तथा लगभग 13000 से अधिक छात्र प्रतिवर्ष होम्योपैथी कालेजों में प्रवेश लेते है।

देश में वैकल्पिक उपचार के तौर पर होम्योपैथी पद्धति उभर रही है।देश में होम्योपैथी उपचार को बढ़ावा देने के लिए शोध करने की जरूरत है। "लोगों को इस पद्धति के प्रति जागरूक करने की जरूरत है एवं इसमें ज्यादा से ज्यादा शोध करने की आवश्यकता है। होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति में नैनो और बायो टेक्नोलॉजी जैसे नवीनतम तकनीकों के इस्तेमाल पर शोध सही दिशा में उठाया गया एक बेहतर कदम है। यह भारतीय चिकित्सा पद्धति के लिए भविष्य में वरदान साबित होगा।

होम्योपैथी की दवा सबसे ज्यादा प्रमाणिक
केंद्रीय होम्योपैथी अनुसंधान संस्थान नोएडा  के मुताबिक किसी भी बीमारियों को जड़ से खत्म करने के लिए वर्तमान में  होम्योपैथी का इलाज सबसे कारगर और प्रमाणिक माना जाता है।खासकर मौसमी बीमारियां (सरदर्द, बुखार, डेंगू , चिकनगुनिया, पेट दर्द) में होम्योपैथी की दवाएं जल्द असर करती हैं। उन्होंने कहा कि पथरी, एलर्जी , अस्थमा, त्वचा संबंधी और बालों संबन्धित रोग का उपचार इस पद्धति में बड़ी सरलता से किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त होम्योपैथी की दवा गंभीर बीमारियों को भी नियंत्रित करने के लिए लाभदायक है।
ऐसा देखा गया है क्रॉनिक बीमारियों को दूर करने के लिए एलोपैथी की दवाएं जिंदगी भर खाने से अच्छा है कि होम्योपैथी की दवा सही मात्रा में 1-2 सालों तक लेकर स्वस्थ हो सकते हैं

 होम्योपैथ में साइड इफेक्ट होने का कोई डर नहीं रहता है।
होम्योपैथी कोई करामाती पैथी नहीं बल्कि इसके कुछ सिद्धांत हैं, जिन पर दवाई का चुनाव करके चमत्कार प्रत्यक्ष रूप में होते हैं। लाइलाज बीमारियां भी इलाज योग्य बन जाती है। किसी भी आपरेशन से पहले होम्योपैथिक डॉक्टर की सलाह जरूर लें।


होम्योपैथी कोई देसी दवाई या नुस्खा आधार इलाज विधि नहीं, बल्कि इसमें मरीज की मर्ज के लक्षण व मरीज के मन को समझ कर दवाई का चुनाव किया जाता है व होम्योपैथी दवा, जिसको मीठी गोलियां कहा जाता है, वह तो सिर्फ दवाई देने का जरिया होता है। यह दवाई रोग को जड़ से खत्म करने का साम‌र्थ्य रखती है।
होम्योपैथी संबंधी बहुत सी गलत धारणाएं लोगों के मन में घर कर गई हैं। होम्योपैथी कांच के गिलास में ही लेनी चाहिए। इस दवाई के साथ प्याज, लहसुन, लौंग, इलायची का प्रयोग नहीं करना चाहिए या दवाई देर से प्रभाव करती है, ऐसा कुछ भी नहीं। यह सिर्फ लोगों के मन के वहम है।

होम्योपैथी सिर्फ मानव जाति के लिए ही नहीं, बल्कि पशु पक्षियों, यहां तक कि फसलों को लगने वाली बीमारियों का भी इलाज करती है व उन लोगों की जुबान भी बंद करती है, जो कहते हैं कि होम्योपैथी तो सिर्फ 'प्लैसी गंध' भाव सिर्फ मीठी गोलियां हैं, क्योंकि पशुओं व पौधों पर तो कोई साइक्लोजिकल प्रभाव नहीं होते। आप जितना अपनी बीमारी बारे खुल कर बताऐंगे, डॉक्टर को आपकी उतनी ही बीमारी जड़  से पकड़ में आएगी।

 डॉक्टर के पास अपना  दुख बताने  में मरीज को  हिचकिचाना नहीं चाहिए है। मच्छर जनित और वाहक  तमाम बीमारियां डेंगू, चिकनगुनिया व इंसेफेलाइटिस , अनेक तरह के फ्लू यथा स्वाइन, बर्ड फ्लू जो मौजूदा समय में सबसे देश के बड़े हिस्से में बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनी हुई हैं। मानसून के दिनों में इन बीमारियों का संक्रमण फैलता है। खासतौर पर डेंगू का प्रकोप दिल्ली-एनसीआर सहित पूरे देश में देखा गया है। वहीं, इंसेफेलाइटिस से पूर्वी उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों में हजारों लोग प्रभावित होते हैं। ऐसे में इन बीमारियों की रोकथाम व इलाज की कारगर तकनीक ढूंढना चिकित्सा जगत के लिए बड़ी चुनौती है और इस पर अनेकों शोध भी चल रहे हैं लेकिन इन सभी रोग में होमियोपैथी में कारगर उपचार मौजूद है।

होम्योपैथ डेंगू से बचाव में कारगर है।

बरसात के मौसम में डेंगू से बचाव के लिए स्वस्थ्य लोग तीन महीने तक हर सप्ताह होम्योपैथिक दवा की एंटीडोट के रूप एक खुराक लें तो इस बीमारी से बच सकते हैं। होम्योपैथ में इपोटोरियम दवा डेंगू से बचाव में  बेहद कारगर साबित हुई है ।यह दवा डेंगू में तेजी से गिरते ब्लड प्लेटलेट्स को पहली ख़ुराक़ से से नियंत्रित करता और उसे बढ़ाने में सहायता करता है। इसका ट्रायल भी किया गया है। इसके अलावा बेलाडोना 200-ई नामक दवा इंसेफेलाइटिस की रोकथाम में कारगर है।

मणिपुर सरकार लोगों को दवा वितरित करा रही है
मणिपुर सरकार यह दवा लोगों को वितरित भी करा रही है। पिछले साल करीब दो लाख लोगों को यह दवा वितरित की गई थी। लेकिन मणिपुर के अलावा और किसी राज्य में सरकार द्वारा इन दवाओं को आम लोगों को वितरित करने के लिए पहल नहीं की गई है।