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Wednesday, November 27, 2019

श्रीलंकाई राजनीति में राजपक्षे बंधु 2.0 का आगाज़।

बीते सप्ताह भारत के निकटतम पड़ोसी देश श्रीलंका में  सम्पन्न राष्ट्रपति चुनाव और उसके अंतिम नतीजों ने वैश्विक ध्यान खींचा है।21 अप्रैल 2019 श्रीलंका के तीन शहरों में ईस्टर के मौके पर चर्च में हुए कोऑर्डिनेटेड सुसाइडल अटैक के बाद इस चुनाव में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा को मुख्य चुनावी एजेंडा बना कर सत्ता में वापसी करने वाले पूर्व रक्षा सचिव और श्रीलंका पोडुजूना पार्टी(एसएलपीपी) के उम्मीदवार गोटाबया राजपक्षे की सत्ता में वापसी हुई है उन्होने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, पूर्व राष्ट्रपति रणसिंघे प्रेमदासा के पुत्र और न्यू डेमोक्रेटिक फ्रंट के उम्मीदवार साजित प्रेमदासा को 13 लाख मतों के प्रभावी अंतर से मात दिया।


श्रीलंका में इस बार चुनाव में राष्ट्रपति पद के लिए कुल 35 उम्मीदवार हैं, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है।सत्ताधारी पार्टी के उम्मीदवार साजित प्रेमदासा,जो सिरीसेना सरकार में आवास मंत्री थे  वे पूर्व राष्ट्रपति रणसिंह प्रेमदासा के पुत्र हैं। जिनकी 1993 में तमिल टाइगर के आत्मघाती दस्ते  ने हत्या कर दी थी।

साजित प्रेमदासा ने नब्बे के दशक में  राजनीति में प्रवेश किया, फिर 2000 में संसद में पहुंचे और बाद में देश के स्वास्थ्य मंत्री बने। अपने पिता के नक्शेकदम पर चलते हुए प्रेमदासा ने गरीबों की मदद करने वाली परियोजनाओं के माध्यम से अपनी छवि बनाई,लेकिन ईस्टर के हमलों के बाद उन्होंने इस हमले लिए न्याय की मांग के बीच, उन्होंने अपने चुनाव अभियान में सुरक्षा पर जोर दिया। आतंकवाद से निजी रूप से पीड़ित प्रेमदासा ने संकल्प लिया और कहा कि "हम आतंकवाद और उग्रवाद के सभी रूपों को खत्म करने के लिए मजबूत कानूनी कदम उठाएंगे।जबकि गोटाबया के रक्षा और सुरक्षा के प्रभि राजनीतिक रिकॉर्ड का मुकाबला करने के लिए उन्होंने पूर्व सेना प्रमुख फील्ड मार्शल सरथ फोंसेका को रक्षा मंत्री बनाने की घोषणा की थी लेकिन गोटाबया के जादू के समक्ष उनकी एक नहीं चली तथा वे प्रभावी अंतर से पराजित हुए।


श्रीलंका में एक सदनीय संसदीय प्रकिया का पालन होता है और अर्द्ध अध्यक्षात्मक प्रणाली के तहत शासन चलाया जाता है यानी"Head of State और Head Of Government" की शक्तियां राष्ट्रपति में अंतर्निहित होती है।राष्ट्रपति की सहायता के लिए यहां प्रधानमंत्री और कैबिनेट का गठन का प्रावधान है ।

गोटाबया राजपक्षे ने पद और गोपनीयता के शपथ के फौरन बाद देश में संसदीय चुनाव कराने की घोषणा कर दी और प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे को इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया,विक्रमसिंघे के इस्तीफे के तुरंत ही राष्ट्रपति गोटाबया ने विपक्ष के नेता, अपने भाई  और पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे को देश का अंतरिम प्रधानमंत्री नियुक्त किया ।अब वह सम्भवतःआगामी अप्रैल 2020 में आम चुनाव होने तक कार्यवाहक मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री के रूप में टेम्पल ट्री में निवास करेंगे ,महिंदा राजपक्षे को वित्त और रक्षा जैसे महत्वपूर्ण  मंत्रालय का भी मुखिया बनाया गया है।
इस चुनाव में विपक्ष के खराब प्रदर्शन और जनता से मिले प्रचंड जनमत औऱ राजपक्षे बंधुओं की चौकड़ी के दम पर  कुल मिलाकर राष्ट्रपति गोटाबया के पास सत्ता की एकछत्र बागडोर  है।

जीवन वृत्ति :

सत्तर वर्षीय लेफ्टिनेंट कर्नल (सेवानिवृत) गोटबया राजपक्षे, श्रीलंका सेना के एक सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी हैं । उन्होंने 1971 में अपने कैरियर की शुरुआत कैडेट ऑफिसर के रूप में किया और सिग्नल रेजिमेंट में उन्हें प्रारंभिक कमीशन मिला। पाकिस्तान के रावलपिंडी और 1983 भारत में ऊटी के डिफेंस सर्विस कॉलेज वेलिंग्टन, जैसे प्रतिष्ठित सैन्य संस्थान से प्रशिक्षित  गोटाबया  ने 1974 में इन्फेंट्री को वरीयता दी और सिंहा रेजिमेंट में पदस्थापित हुए औऱ  ग़ज़बा रेजिमेंट के गठन में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने और प्रथम ग़ज़बा बटालियन के कमान अधिकारी के दायित्व का निर्वहन किया। पूर्व सेना प्रमुख फील्ड मार्शल शरथ फोंसेका (तब कमांडिंग ऑफिसर ,प्रथम सिंहा बटालियन )औऱ  लेफ्टिनेंट कर्नल गोटाबया( कमांडिंग ऑफिसर प्रथम ग़ज़बा बटालियन) समक्ष थे के जाफना किले में लिट्टे के विरुद्ध की गई सैन्य कार्रवाई को श्रीलंका सेना की सबसे सफलतम सैन्य कार्रवाई  माना जाता है। लिट्टे के सफाये के सारा श्रेय  लिए तत्कालीन सेनाध्यक्ष ले. जन शरथ फोंसेका ,रक्षा सचिव गोटाबया और राष्ट्रपति महिंदा की तिड़की  को दिया जाता है।

श्रीलंका सेना के वर्तमान प्रमुख ले.जन.शवेंद्र सिल्वा,गोटाबया के अधीन प्रथम ग़ज़बा बटालियन में एक युवा अधिकारी के रूप में साथ कार्य  कर चुके है

राष्ट्रवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा श्रीलंका का राष्ट्रपति चुनाव:

इस वर्ष ईस्टर के दिन श्रीलंका में चर्च पर हुए आत्मघाती हमले और 269 बेकसूरों की मौत तत्पश्चात वहाँ लगे आपातकाल के बाद हुए श्रीलंका के राष्ट्रपति चुनाव के नतीजों से स्पष्ट हो जाता है कि सम्पूर्ण दक्षिण एशिया में राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा चुनाव का अहम मसला है। 2019 के मई में पहले भारत, फिर बांग्लादेश, भूटान और अब श्रीलंका के चुनावी नतीजों नतीजों  ने स्पष्ट कर दिया कि राष्ट्रवाद  और राष्ट्रीय सुरक्षा घरेलू राजनीति का अहम मसला बन चुका है।

श्रीलंका की राजनीति में आतंकवाद की समस्या एक अहम भूमिका निभाई है। राष्ट्रपति प्रेमदासा आत्मघाती हमले में मारे गए थे जबकि चंद्रिका कुमारतुंगा को अपनी एक आँख आत्मघाती हमले में गंवानी पड़ी । लगभग एक दशक से श्रीलंका में आतंकवादी हमलों में व्यापक गिरावट देखी गयी है लेकिन ईस्टर पर हुए बम हमले के बाद देश मे स्थिति चुनौतपूर्ण हो गयी थी।

इस बार भी आतंकवाद फैक्टर ने गोटबया को जीत हासिल करने में अच्छी खासी मदद दी।

श्रीलंका चुनाव पर चीन की प्रतिक्रिया।

"China and Sri Lanka are strategic cooperative partners with sincere mutual assistance and ever-lasting friendship. On the basis of mutual respect, equality and mutual benefit, China stands ready to work with the new leadership and government of Sri Lanka for high-quality BRI cooperation and greater progress in China-Sri Lanka relations to deliver more tangible benefits to our countries and peoples."
https://www.fmprc.gov.cn/mfa_eng/xwfw_665399/s2510_665401/2511_665403/t1716772.shtml

गोटबया राजपक्षे को छीन की झुकाव वाले नेता के रूप में माना जाता है।  श्रीलंका में लिट्टे टाइगर्स  के सफाये के दौरान उनका चीनी प्रेम जग जाहिर है महिंदा राजपक्षे सरकार में  रक्षा सचिव रहते हुए उन्होंने उन्नत चीनी हथियारों और परिष्कृत राडारों  और संचार सहायता श्रीलंकाई सेना को लैस किया और प्रभाकरन की अगुवाई वाले लिट्टे के सफाये के लिए  निर्ममता के साथ आतंक के खिलाफ अभियान चलाया। चीन का यह कर्ज़ दोनो भाई( तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा और उनके रक्षा सचिव गोटाबया )आज भी चीन की "Debt  Trap Diplomacy"के  रूप में अपने क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को चीन की सरकार प्रयोजित कंपनियों के हाथों गिरवी तथा बेच कर चुका रहे हैं।


चीन का "Game of Loans" और हम्बनटोटा :श्रीलंका की दुखती रग ।

इस कड़ी में सबसे पहला झटका दिसंबर 2017 में सामरिक रूप से महत्वपूर्ण हम्बनटोटा बन्दरगाह  के अधिकतर( 71फीसद) इक्विटी हिस्सेदारी 99 साल के लीज पर चीनी कम्पनी को  दे दी गयी। सेंटर फॉर ग्लोबल डेवेलपमेंट  के आंकड़ो पर ध्यान दें तो श्रीलंका पर चीन का कर्ज $3.85 बिलियन हो चुका है।

चीन श्रीलंका को  "Concessional Financing" और  "Commercial Loans" के तरीकों से ऋण उपलब्ध कराता है जबकि श्रीलंका को विकास सहायता (Developing Assistance)  के लिए  ExIm Bank, China Development Bank, और Industrial & Commercial  Bank of China के माध्यम विकासात्मक ऋण, वहीं चीनी वाणिज्य मंत्रालय के माध्यम से   अनुदान(Grants) ब्याज मुक्त ऋण(interest Free Loan) मुहैय्या कराता है।

ऋण अनुदान और ब्याज मुक्त ऋण के माध्यम से चीन, श्रीलंका की आर्थिक और वाणिज्यिक संप्रभुता को पूरी तरह अपने कब्जे में ले चुका है। चीन की यह नवीन आर्थिक उपनिवेशवाद की नीति का शिकार अफ्रीका के तीव्र विकास के लालायित देश तथा सार्क के भूटान अफगानिस्तान और भारत छोड़ अन्य देश हो चुके हैं।
श्रीलंका के विस्तृत ,दंतुरित और प्रचुर सामुद्रिक संसाधन पर चीन का "अनकहा" कब्जा हो चुका है, श्रीलंकाई शीर्ष नेतृत्व चीन के साथ अपने संबंधों और उसके आर्थिक मॉडल पर भारत सहित अन्य देशों और मंचो पर कितनी भी सफाई क्यों न दें लेकिन जमीनी हक़ीक़त कुछ अलग ही बयां करती है।

Map of the Sri Lankan Exclusive Economic Zone (EEZ) .

(Source: Maritime Boundaries Geodatabase, Flanders Marine Institute.


श्रीलंका के पास फिलहाल और आने वाले वर्षों में उतनी आर्थिक संवृद्धि नहीं हो पाएगी कि वह ड्रैगन के भीमकाय कर्जे को चुका सके इसलिए चीन प्रयोजित एवं निर्मित सभी परियोजनाओं को या तो चीन को सौंपना पड़ेगा या फिर चीनी शर्तो पर क्रियान्वित करना पड़ेगा,जैसा कि हम्बनटोटा मामले में हुआ।
" Industrialization  and  further  development  of  Hambantota  Air  Sea  Hub  in  southern Sri  Lanka.  Hambantota  is  a  smaller  harbor  than  Colombo  and  Trincomalee,  built using  a  loan  from  China’s  EXIM  Bank.  Due  to  our  debt-situation  we  have  decided  to lease  Hambantota  to  a  Joint  Venture  Company  comprising  China  Merchants Company and Sri Lanka  Ports Authority"

हर्ष डि सिल्वा,श्रीलंका के उप विदेश मंत्री,तिरुवनंतपुरम में आयोजित ओशन डायलॉग -2017 के अपने व्याख्यान के दौरान।
उपरोक्त बयान से चीनी कर्ज़ को न चुका पाने  की श्रीलंकाई सरकार की मजबूरी स्पष्ट हो जाती है।


चीन श्रीलंका द्विपक्षीय सम्बन्ध

21वीं शताब्दी में चीन श्रीलंका के उत्तरोत्तर विकसित होते संबंधों को  हम क्षेत्रीय और वैश्विक परिदृश्य में देखें  और दोनो देशों के समझौते के आधिकारिक शब्दों पर गौर करें तो मामला और इनकी मंशा पूरी तरह साफ हो जाती है।राइस एंड रबर पैक्ट से शुरू हुए राजनय सम्बन्धो  की नई शुरुआत

2005 में तत्कालीन चीन के प्रधानमंत्री/प्रीमियर वेन जियाबाओ की श्रीलंका दौरे कोदोनो देशों ने

" China Srilanka All Round Cooperation Partnership of Sincere Mutual Support and Ever Lasting Friendship"

का नाम दिया तो  मई 2013 में तत्कालीन  श्रीलंका के राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे की चीन यात्रा का दौरान  दोनों देशों ने इस संबंध में सामरिक और रणनीतिक महत्व का तड़का लगाते हुए इसे
"China SriLanka relationship to the Strategic Cooperative Partnership of Sincere Mutual Support and Ever Lasting Friendship"का नाम दिया।

वन बेल्ट वन रोड और श्रीलंका

 चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ग्रेट चाइनीज ड्रीम यानी चार ट्रिलियन डॉलर वाली  वन बेल्ट वन रोड  जिसे वे 2049 तक  यसनी चीन के 100 साल होने तक सम्पूर्ण विश्व व्यवस्था में प्रभावी चीनी पदचिह्न की अवसंरचनात्मक परियोजना मानते हैं।
  चीन की वन बेल्ट वन रोड तथा इससे सम्बद्ध परियोजना में श्रीलंका का अति महत्वपूर्ण स्थान है। हिन्द महासागर क्षेत्र में बीचों बीच मौजूदगी और अपने भू रणनीतिक और सामरिक महत्व के कारण श्रीलंका चीन की  खाड़ी देशों से असीमित ऊर्जा की निर्बाध आपूर्ति और अफ्रीका से आने वाली खनिज सुरक्षा में सबसे अहम भूमिका निभाता है।
अपने प्राकृतिक,विशाल, दंतुरित और गहरे समुद्री तट वाले श्रीलंका के तटों को पोर्ट ऑफ कॉल, हब और लॉजिस्टिक फैसिलिटी केंद्र, दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों  से आने वाले माल के लिए ट्रांज़िट गुड्स  केंद्र के रूप में विकसित किये जाने की असीम रणनीतिक संभावना है जिसे चीन विकसित करने में किसी कीमत पर कोई कोर कसर नहीं छोड़ना चाहता है।

चीन के श्रीलंका ओबीओआर परियोजना में हार्ड और सॉफ्ट पावर डिप्लोमसी के कुल पांच मुख्य लक्ष्य उभर कर सामने आए  है।

1 पॉलिसी कोऑर्डिनेशन
2 कनेक्टिविटी
3 निर्बाध व्यापार
4 फाइनेंशियल इंटेग्रेशन
5 पीपुल टू पीपुल  कॉन्टेक्ट जिसके तहत  सांस्कृतिक,साहित्यक, अकादमिक क्षेत्र को बढ़ावा देना।


इसके तहत  चीन श्रीलंका की निम्न विकास दर, से उच्च विकास दर पाने की चाह, आधुनिक अवसंरचनात्मक विकास  की आकांक्षा और तथाकथित आधुनिकतम जीवन शैली निर्माण के झांसा देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। इसी कड़ी में चीन पूरे आक्रमकता के साथ  ओबीओआर के घटक बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव बीआरआई  के तहत आठ बिलियन डॉलर वहीं एशियाई अवसंरचनात्मक  बैंक  से 32 बिलियन डॉलर की राशि श्रीलंका के  अवसंरचनात्मक  विकास में खर्च करेगा जिसमे 269 हेक्टयर में निर्मित  कोलंबो इंटरनेशनल फाइनेंशिल  सिटी में 13बिलियन डॉलर का निवेश करेगा,जो श्रीलंका ने अब तक का सबसे बड़ा प्रत्यक्ष विदेशी निवेश(एफडीआई) है।
चीन के ऊर्जा और खनिज सुरक्षा के लिए हम्बनटोटा का एक महत्वपूर्ण  स्थान  है
वहीं दूसरी ओर भारत की संप्रभुता के लिए श्रीलंका में  चीनी निवेश  "बेहद खतरनाक "है।
श्रीलंका को अपने निकटतम पड़ोसी और  हिन्द महासागर में भारतीय हितों का ख्याल रखना भी वर्तमान सरकार की "जिम्मेदारी" है। गोटाबया यह मानते हैं कि  तत्कालीन  सरकार का चीन को हंबनटोटा बंदरगाह
Source.indiatimes.com
का नियंत्रण देने को फैसला एक गलत  नीतिगत कदम था लेकिन इस बन्दरगाह  निर्माण के लिए चीन को आमंत्रण  तत्कालीन राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे ने दिया था।। "

गोटबया  चीनी श्रीलंका के आपसी संबंध पर चाहे जितनी भी सफाई दें कि उनके चीनी संबध "पिछले कुछ वर्षों में चीन के साथ भागीदारी को विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक "है लेकिन चीन की हिंदमहासागर में कैट फिश जैसे खुराफ़ात किसी से छुपी नहीं है तमाम  भू-रणनीतिक विश्लेषकों ने चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स  के लगातार आक्रामक होते चीनी रुख को भारतीय हित के लिए बेहद खतरनाक बताया है।


श्रीलंकाई परिवारवाद की राजनीति पर भारत की पैनी नजर:

 गोटबया और उनके परिवार की श्रीलंका की राजनीति में मजबूत पकड़ है, बड़े भाई महिंदा को रक्षा और वित्त मंत्रालय की कमान, जबकि  चामल को  कृषि,सिंचाई, आंतरिक व्यापार,और उपभोक्ता कल्याण मंत्रालय, और बासिल राजपक्षे को  पर्दे के पीछे पार्टी का मुख्य रणनीतिकार  माना जाता है। महिंदा राजपक्षे को प्रधानमंत्री के अतिरिक्त वित्त और रक्षा मंत्रालय का कार्यभार देकर  गोटाबया ने पहला अपने भाई का कर्ज़ चुकाया वहीं चीन को भी  मनचाहा व्यक्ति प्रदान कर अपने दोनों हित साध लिया, प्रखर मार्क्सवादी नेता गुणवर्धने को विदेश मंत्रालय सौंपकर राष्ट्रपति ने घरेलू और अंतरराष्ट्रीय राजनीति में बढ़त हासिल कर ली है।

महिंदा का चीनी प्रेम किसी से छुपा नहीं है लेकिन  राजपक्षे 2.0 सरकार को पिछली गलतियों को दुरुस्त करना होगा जो हिन्द महासागर क्षेत्र में  वक़्त की तकाजा है। श्रीलंका को यह मानना होगा कि सम्पूर्ण हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत एक नैसर्गिक और निर्विवाद महाशक्ति के साथ साथ फर्स्ट रेस्पांडर है जिसकी तुलना किसी से न कि जाय तो बेहतर होगा।

गोटबया की जीत के फौरन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ट्विटर पर उन्हें वैश्विक रूप में सर्वप्रथम बधाई देना और भारत की यात्रा के लिए आमंत्रित करना

https://twitter.com/narendramodi/status/1195960355551268865?s=19

और चुनाव में जीत के महज 16 घण्टे के भीतर सबको चौंकाते हुए  विदेश मंत्री सुब्रह्मयनम जयशंकर का राष्ट्रपति सहित अन्य लोगों से मिलना तथा आगामी 29 नवम्बर को गोटबया राजपक्षे की अपनी पहली राजकीय यात्रा के रूप में भारत को चुनना महज एक संयोग नहीं कहा जा सकता। राजनय हलकों में प्रधानमंत्री के सर्वप्रथम बधाई के ट्वीट और विदेश मंत्री की श्रीलंका यात्रा को अत्यधिक तवज्जो दी जा रही है।

https://twitter.com/DrSJaishankar/status/1196789834536423425?s=19


https://twitter.com/DrSJaishankar/status/1196789839691157504?s=19

गोटबया राजपक्षे ने 25 नवम्बर को ही अपना पहला साक्षात्कार भारत के ऑनलाइन समाचार पोर्टल को दिया।

इस साक्षात्कार में उन्होंने विस्तार से भारत चीन के साथ अपने बेहतर संबंध और भारतीय हितों की प्राथमिकता की मुखालफत की हम्बनटोटा बंदरगाह लीज की समीक्षा की बात की लेकिन इनकी कथनी औऱ करनी से भारत को पूरी तरह सतर्क रहने की आवश्यकता है।

क्या  ड्रेगेन के जहर की काट खोज पाएगा भारत 


भारत के लिए श्रीलंका में राजपक्षे बंधु की वापसी को एक अच्छे संकेत के रूप में नहीं माना जा सकता है। इस  मन्तव्य के पीछे महिंदा राजपक्षे नेतृत्व की पिछली सरकार ने भारत की एकता अखण्डता और संप्रभुता को तार तार करने में कोई कसर नहीं  छोड़ी थी।हिन्द महासागर क्षेत्र में अचानक चीनी नौसेना की बढ़ती गतिविधि और श्रीलंका को अपना शरणस्थली बनने की चीनी मंशा और महिंदा के साथ गोटाबया का साथ को भारत को कभी नही भूलना चाहिये क्योंकि तत्कालीन रक्षामंत्री ही आज श्रीलंका के वर्तमान राष्ट्रपति है।

श्रीलंका के राष्ट्रपति गोटबाया राजपक्षे इस सप्ताह के अंत में भारत दौरे पर आने वाले हैं। एक साक्षात्कार में राजपक्षे ने कहा है कि
1." उनका देश किसी भी ऐसी गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता जिससे भारत की सुरक्षा को खतरा हो।"

2. उन्होंने भारत सरकार से " निवेश, शिक्षा और प्रौद्योगिकी के विकास में मदद करने का अनुरोध करते हुए कहा कि वे निवेश और मदद चाहते हैं लेकिन किसी सैन्य और भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता में शामिल नहीं होना चाहते।"

3." भारत, सिंगापुर, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों को अपने यहां निवेश करने के लिए आमंत्रित किया। "

4.वंही उन्होने  तत्कालीन महिंदा राजपक्षे सरकार की पिछले कुछ वर्षों में चीन के साथ  भागीदारी को विशुद्ध रूप से वाणिज्यिक बतलाया "

5.गोटबया राजपक्षे ने श्रीलंका द्वारा चीन को हंबनटोटा बंदरगाह  का नियंत्रण देने को एक नीतिगत गलती  बताया। "
पर

गोटबया भारत और अन्य इंडो पैसिफ़िक देशों के साथ के साथ सॉफ्ट पावर राजनय की वकालत करते है लेकिन चीन के साथ अपने हार्ड पावर  राजनय, चीनी ऋण कर मसले पर पूरी चतुरायी के साथ बच निकलते है।

भारत को राजपक्षे2.0 की हर एक राजनय और नीतिगत नीतियों का गहन और सूक्ष्मतम विश्लेषण और प्रभावी कार्रवाई करने की आवश्यकता है।

भारत को श्रीलंकाई राष्ट्रपति के ऐसे विशुद्ध राजनयिक बयान के झांसे में न आने की आवश्यकता है क्योंकि श्रीलंका में जमीनी सच्चाई क्या है ?
 यह सबको मालूम है कि चीनी किस कदर ख़ुराफ़ात हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनय में राष्ट्रीय हित की सर्वोच्चता ही सर्वश्रेष्ठ राजनीति कहलाती है।

 इत्तेफाक से चीन श्रीलंका और भारत ये तीनो अपनी राष्ट्रीय हितों की बात करते है क्योंकि चीन की खनिज और ऊर्जा सुरक्षा के लिए श्रीलंका एक अहम स्थान है दूसरी तरफ तीव्र विकास और दोनों हाथों से खाना खाने की भूख लिए श्रीलंका के चीनी निवेश स्वप्न सरीखा अलादिन का चिराग और बिन मांगे मोती समान है तो भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा के  साथ साथ हमारे भू आर्थिक,सामरिक ,रणनीतिक और संभरिकी हितों में श्रीलंका का अहम स्थान है।

इसलिए भारत को श्रीलंका के मुद्दे पर केवल अपना ध्यान विशुद्ध रूप से अपने राष्ट्रीय हितों की निर्बाध पूर्ति होंने की दिशा में लगाना चाहिए क्योंकि चीन जिस कदर स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की नीति से ऊपर निकल कर भारत को हिन्द महासागर में जिस तरह भारत के गर्दन में मोतियों की माला की कसावट  के रूप में गर्दन कस रही है वह किसी भी सूरत में अच्छे संकेत नहीं  है।

आगामी 29 नवंबर को अपनी पहली राजकीय यात्रा पर भारत आ रहे राष्ट्रपति गोटबया राजपक्षे के बयानों पर पूरी निगाहें बनी रहेगी। उनसे उम्मीद रहेगी कि वे अपने भाई महिंदा की पिछ्ली गलतियों को न दोहराएं तथा दोनो देश आपसी समझबूझ,आपसी विश्वास,भाईचारा,तथा एक दूसरे की संप्रभुता और राष्ट्रीय हितों का खयाल रखते हुए हिन्द महासागर की नैसर्गिकता और शांति के क्षेत्र की अवधारणाओं का निश्चित रूप से खयाल रखें क्योंकि स्थाई और शांतिपूर्ण भारत में ही श्रीलंका की समृद्धि और संवृद्धि का बीज छिपा हुआ है।



Wednesday, November 13, 2019

11वें ब्रिक्स सम्मेलन :भारत की बढ़ती भूमिका और जिम्मेदारी

भारत में शरद ऋतु दस्तक दे चुकी है और कैस्पियन सागर की नमी लेते हुए पश्चिमी विक्षोभ अपने तयशुदा मार्ग के जरिये भारत में प्रवेश कर रहा है। इसी कड़ी में वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक हलकों में तमाम उठापटक के बीच संभवतः ब्रासिलिया में 11वें ब्रिक्स का यह सम्मेलन वर्षांत का सबसे बड़ा राजनीतिक जमावड़ा है। यह सम्मेलन इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि चीन अमेरिका के बीच चल रहे ट्रेड वॉर,अमेरिका द्वारा चीन को "करेंसी मैनीपुलेटर देश घोषित करना, और ब्लूमबर्ग इकोनॉमिक्स रिपोर्ट के अनुसार: अगर, चीन और अमेरिकी के बीच हालात न सुधरे तो  वैश्विक आर्थिक वृद्धि दर अपने सात वर्षों के 2.8 फीसद के निचले स्तर से गिर जाएगी जो आगे विश्वव्यापी मंदी कि राह खोलेगी।

इसी बीच अमेरिका का  रूस के साथ इंटरमीडियट रेंज  न्यूक्लियर फ़ोर्स (आईएनएफ़ ) संधि से एकतरफा बाहर होना, अफगानिस्तान में आसन्न सत्ता परिवर्तन,अफ़ग़ानिस्तान, सीरिया और इराक से अमेरिकी फौज की स्वदेश वापसी,ईरान के साथ अमेरिकी द्विपक्षीय संबंधों में कटुता,तकरार और अविश्वास,हॉरमुज़ की खाड़ी में लगातार बढ़ता सऊदी,ईरान और अमेरिकी त्रिकोणात्मक रणनीतिक विवाद, वेनेज़ुएला में घटता अमेरिकी प्रभुत्व बढ़ता रूसी दबदबा,व्यापार और निवेश नीतियों पर बढ़ते विवाद के बीच अमेरिका द्वारा भारत को  जनरलाइस्ड सिस्टम ऑफ प्रेफरेंस से मिलने वाले लाभ से वंचित कर देना,एस 400 ट्रायम्फ मिसाइल प्रणाली के खरीद पर अमेरिका का लगातार नाक भौं सिकोड़ना और राष्ट्रपति ट्रम्प का भारत के प्रति लगातार आते उल जुलूल बयान,भारत द्वारा आरसीईपी में शामिल न होने का नीतिगत  फैसला, सीरिया में रूसी-टर्किश फौज  की वापसी के बाद नए बनते समीकरण, अमेजन के वर्षा वन में लगी बुझती आग,वोलीविया के कद्दावर नेता और लैटिन अमेरिका ने पिंक टाइड सोशलिज्म के आखिरी समर्थकों में एक इवा मोराल्स को अर्जेंटीना में राजनीतिक शरण की खबरें  और आलेख लिखे जाने तक गाज़ा पट्टी में इजरायली फौज के साथ भीषण मुठभेड़ और चिरपरिचित इस्रायली सैन्य करवाई के बीच ब्रिक्स के 11वें सम्मेलन पर सम्पूर्ण विश्व की निगाहें टिकी रहेंगी

व्लादिवोस्टक में संपन्न फॉर ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम के बाद प्रधानमंत्री अपने रूसी समकक्ष राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ द्विपक्षीय वार्ता के साथ इस सम्मेलन में भारत का आगाज़ करेंगे, प्रधानमंत्री गत माह मामल्लपुरम के भारत चीन इनफॉर्मल मीट के बाद चीनी राष्ट्रपति शी शिंगपिंग से भी वार्ता करेंगे। रूस भारत का सबसे भरोसेमंद साझीदार और मित्र देश है।भारत उम्मीद रखता है कि  यह "रूसी साथ और रोमांस" "सदैव"जारी रहेगा।

 11वें ब्रिक्स सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ब्राजीलिया के खूबसूरत सैन टियागो के Itamraty Palace में अपने समकक्ष नेताओ के साथ द्विपक्षीय मुलाकात करेंगे और  ब्रिक्स बिजनेस फोरम , लीडर्स डायलाग विथ  ब्रिक्स बिजनेस कौंसिल और न्यू डेवलपमेंट बैंक  की बैठकों में भारत का मजबूत पक्ष रखेंगे।

https://twitter.com/narendramodi/status/1194727245094350848?s=09


(सौ:प्रधानमंत्री के ट्विटर हैंडल से)

11वें ब्रिक्स सम्मेलन की थीम : Economic Growth for an Innovative Future रखा गया है।

ब्रिक्स दुनिया की पाँच अग्रणी उभरती अर्थव्यवस्थाओं- ब्राज़ील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका के समूह के लिये एक संक्षिप्त शब्द (Acronym) है।

BRICS की चर्चा वर्ष 2001 में वित्तीय संस्था गोल्डमैन सैक्स (Goldman Sachs )के प्रमुख अर्थशास्री जिम ओ’ नील द्वारा ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन की अर्थव्यवस्थाओं के लिये विकास की संभावनाओं पर एक आंतरिक रिपोर्ट में की गई थी।

ब्रिक्स की संरचना

ब्रिक्स कोई अंतर्राष्ट्रीय अंतर-सरकारी संगठन नहीं है, न ही यह किसी संधि के तहत स्थापित हुआ है।हम इसे पाँच देशों का एकीकृत प्लेटफॉर्म कहा जा सकता है।
ब्रिक्स देशों के सर्वोच्च नेताओं का तथा अन्य मंत्रिस्तरीय सम्मेलन प्रतिवर्ष आयोजित किये जाते हैं।
ब्रिक्स शिखर सम्मलेन की अध्यक्षता प्रतिवर्ष B-R-I-C-S क्रमानुसार सदस्य देशों के सर्वोच्च नेता द्वारा की जाती है।वैश्विक व्यापार में 30 फीसद हिस्सेदारी के साथ ब्रिक्स लगभग 42 प्रतिशत वैश्विक आबादी को जोड़ता है।

ब्रिक्स की बैठकों पर दुनिया के बाकी हिस्सों द्वारा बारीकी से नजर रखी जाती है और इसके निर्णय को  गहरे वैश्विक और भू सामरिक प्रभाव पैदा करने की क्षमता है। जैसा कि वर्तमान विश्व में  भू-सामरिक,आकृतिक,आर्थिक,रणनीतिक ऊर्जा सुरक्षा को  लेकर परिवर्तन देखे जा रहे हैं जिसका सीधा संबंध वैश्विक शांति और सुरक्षा पर पड़ता है।



भारत का रुख।

भारत शेष विश्व की तरह एशिया में एक नियम-आधारित प्रणाली का समर्थन करता है।
लेकिन आतंकवाद, संघर्ष, अंतर-राष्ट्रीय अपराधों और समुद्री खतरों जैसी अपरिहार्य चुनौतियों का सामना करते ऊर्जा सुरक्षा की कमी, अपर्याप्त कुशल मानव संसाधन और एक तरफावाद सहित स्थायी विकास के ज्वलन्त मुद्दे पर भी अपना सक्रिय, जिम्मेदार और गम्भीर मत रखता है।वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के मौजूदा माहौल में और नियमों पर आधारित बहुपक्षीय व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण चुनौतियां - ब्रिक्स देशों को वैश्विक स्थिरता और विकास सुनिश्चित करने के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी।

ओसाका संकल्प 2019 से आगे की राह। 

इस संदर्भ में, बीते जुलाई में ओसाका में हुए जी 20 शिखर सम्मेलन के दौरान अंतिम ब्रिक्स नेताओं की अनौपचारिक बैठक में, हमारे प्रधान मंत्री ने ब्रिक्स देशों के बीच अधिक तालमेल के लिए 5 प्रमुख सिफारिशें की थीं - अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों में ॑ सुधारित बहुपक्षवाद ’ को बढ़ावा देना; कम लागत पर ऊर्जा संसाधनों की उपलब्धता सुनिश्चित करना; एनडीबी (न्यू डेवलपमेंट बैंक) द्वारा बुनियादी ढाँचे और नवीकरणीय ऊर्जा संबंधी परियोजनाओं को अधिक प्राथमिकता देना; कुशल कर्मियों के आवागमन में आसानी और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई के लिए ब्रिक्स की एक मजबूत प्रतिबद्धता है। प्रधानमंत्री के प्रमुख सिफारिशों पर संजीदगी से गौर किये जाने जी आवश्यकता है।



ब्रिक्स और आतंकवाद।

ब्रिक्स नेताओं ने हमें क्रमागत ब्रिक्स शिखर सम्मेलनों में आतंकवाद पर एक मजबूत जनादेश दिया है  ब्रिक्स देशों में  भारत,पाकिस्तान प्रायोजित और समर्थित आतंकवाद से सर्वाधिक ग्रस्त रहा है, पाकिस्तान को विभिन्न मोर्चों पर  सँरा सुरक्षा परिषद के एक सदस्य देश द्वारा नियमित रूप से पाकिस्तानी मामलों पर आंख मूंदकर अनेदखी करने अभयदान मिल जाता है।भारत ब्रिक्स के  जोहान्सबर्ग शिखर सम्मेलन के तहत काउंटर टेररिज्म सहयोग के लिए उच्च महत्व देता है। भारत ने  ज़ियामेन घोषणा और आतंकवाद से लड़ने के अपने मजबूत सामूहिक संकल्प को प्रतिबिंबित किया था। भारत आतंकवाद पर वैश्विक सम्मेलन के लिए इन देशों के समान समर्थन का अनुरोध करत है। इस तरह के एक वैश्विक सम्मेलन के लिए ब्रिक्स का समर्थन एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय कानूनी आधार पर आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण के लिए ब्रिक्स की आंतकवाद निरोधी सक्रिय और मजबूत वचनबद्धता और  प्रतिबद्धता को रेखांकित करेगा ।


उल्लेखनीय है काउंटर टेररिज्म पर ब्रिक्स कार्य समूह की बैठकों में पिछले कुछ वर्षों में अच्छी प्रगति हुई है।
तीसरी सीटीडब्ल्यूजी बैठक में, निम्नलिखित के लिए उप-कार्य समूहों की स्थापना पर विचार करने के लिए सहमति व्यक्त की गई थी जिसमे

(i) आतंकी वित्तपोषण को संबोधित करना.
 (ii) आतंकी उद्देश्यों के लिए इंटरनेट के उपयोग का मुकाबला करना.
 (iii) क्षमता निर्माण.
 (iv) कट्टरता का मुकाबला करना.
 (v) एफटीएफ का मुकाबला करना.और
(vi) करीबी आसूचना और कानून प्रवर्तन में आपसी सहयोग सहयोग।

इस संबंध में ब्रिक्स देशों इस प्रक्रिया में अपना समर्थन दोहराना होगा और आतंकवाद पर आम दृष्टिकोण को विकसित करना, आतंकवादी खतरे के समाधान में प्रयासों को समन्वित करना,सूचनाओं औऱ आसूचना को साझा करना शामिल है और इन उप-समूहों के कामकाज को ब्रासीलिया शिखर सम्मेलन के परिणामों में से एक के रूप में इस सम्मेलन में इसे जमीनी हक़ीक़त प्रदान करने की आवश्यकता है।


G 20 से आगे की राह आर्थिक अपराध पर वैश्विक प्रहार।

 आज बदलते विश्व मे ब्रिक्स देशों को  आर्थिक अपराधियों और भगोड़ों के खिलाफ एक साथ काम करने की आवश्यकता है, क्योंकि यह दुनिया की आर्थिक स्थिरता के लिए एक गंभीर खतरा है। प्रधानमंत्री मोदी ने जी 20 ब्यूनस आयर्स समिट में भगोड़े आर्थिक अपराधियों और एसेट रिकवरी के खिलाफ कार्रवाई के लिए नौ-प्वाइंट एजेंडा का सुझाव दिया था। जिसपर ब्रिक्स देशों को भी अमली जामा पहनाने की आवयश्कता है ये नौ विंदू हैं
प्रस्तावित एजेंडा में मजबूत और सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय सहयोग, कानूनी प्रक्रियाओं में सहयोग,प्रत्यर्पण, सूचनाओं का आदान-प्रदान,भगोड़े आर्थिक अपराधियों के लिए प्रवेश और सुरक्षित आश्रय को रोकना आदि शामिल हैं। भारत,ब्रिक्स को अत्यधिक महत्व और तरजीह देता है। भारत ब्रिक्स देशो के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने और मजबूत करने के लिए : आपसी विश्वास, सम्मान और पारदर्शिता की भावना के साथ अपने ब्रिक्स भागीदारों के साथ मिलकर कार्य करने में यकीन करता है। इसके अलावा वित्तीय मुद्दों पर भी यह सहयोग निरन्तर विस्तारित हुआ है जिसे ब्रासीलिया 2019 में इसे और आगे ले जाने की दरकार है।


 ब्रिक्स की तकनीकी उत्कृष्टता के संभावित क्षेत्र।

 प्रौद्योगिकी में प्रगति, डिजिटल क्रांति और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उत्पादन प्रक्रिया, वैश्विक मूल्य श्रृंखला, कार्यबल की प्रवीणता, काम का भविष्य, डिजिटल बुनियादी ढांचे में निवेश आदि से संबंधित चुनौतियों के साथ-साथ अवसरों का सृजन में असीम संभावना है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी, नवाचार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित करने से आई ब्रिक्स  (iBRICS )नेटवर्क के निर्माण, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण पर सहयोग, आईसीटी में सहयोग, रिमोट सेंसिंग उपग्रहों का नक्षत्र जैसी नई पहलों के क्षेत्र में अपनी विषेज्ञता दर्शानी होगी।
 इस संबंध में, ब्रिक्स यह भी विचार कर सकता है कि जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने और एक खुले, स्वतंत्र, टिकाऊ, मानव-केंद्रित भविष्य के समाज के निर्माण में इन अवसरों का लाभ कैसे उठाया जाए।
साथ ही "ब्लू इकॉनोमी और इसके सहकारी क्षेत्र" और "बीच टूरिज्म"  पर विशेष ध्यान देने की आवयश्कता है क्योंकि इन पांचों देशो की विशाल दंतुरित और खूबसूरत तट इस क्षेत्र में व्यापक भागीदारी की आवश्यकता है।


ब्रिक्स का उद्देश्य

ब्रिक्स का उद्देश्य अधिक स्थायी, न्यायसंगत और पारस्परिक रूप से लाभकारी विकास के लिये समूह के साथ-साथ, अलग-अलग देशों के बीच सहयोग को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाना है जिसमे ब्रिक्स द्वारा अपने प्रत्येक सदस्य की आर्थिक स्थिति और विकास को ध्यान में रखा जाता है ताकि संबंधित देश की आर्थिक ताकत के आधार पर संबंध बनाए जाएँ और जहाँ तक संभव हो सके प्रतियोगिता से बचा जाए।
ब्रिक्स विभिन्न वित्तीय उद्देश्यों के साथ एक नए और आशाजनक राजनीतिक-राजनयिक इकाई के रूप में उभर रहा है जो वैश्विक वित्तीय संस्थानों में सुधार के मूल उद्देश्य से परे है।

सहयोग के क्षेत्र

1. आर्थिक सहयोग

ब्रिक्स देशों में कई क्षेत्रों में आर्थिक सहयोग की गतिविधियों के साथ-साथ व्यापार और निवेश तेज़ी से बढ़ रहा है। ब्रिक्स समझौतों से आर्थिक और व्यापारिक सहयोग, नवाचार सहयोग, सीमा शुल्क सहयोग, ब्रिक्स व्यापार परिषद, आकस्मिक रिज़र्व समझौते और न्यू डेवलपमेंट बैंक के बीच रणनीतिक सहयोग आदि सामने आए हैं।ये समझौते आर्थिक सहयोग को मज़बूत करने और एकीकृत व्यापार तथा निवेश बाज़ारों को बढ़ावा देने के साझा उद्देश्यों की प्राप्ति में योगदान देते हैं।
2. पीपुल-टू-पीपुल एक्सचेंज।

3. राजनीतिक और सुरक्षा सहयोग सुर और बहुपक्षवाद दक्षिण-दक्षिण सहयोग शमिल हैं।

4.वैश्विक संस्थागत सुधारों पर ब्रिक्स का प्रभाव

BRICS देशों के बीच सहयोग शुरू करने का मुख्य कारण वर्ष 2008 का वित्तीय संकट था। इस वित्तीय संकट के कारण डॉलर के प्रभुत्व वाली मौद्रिक प्रणाली की स्थिरता पर संदेह उत्पन्न हुआ था।
BRICS ने बहुपक्षीय संस्थानों के सुधार के क्रम में वैश्विक अर्थव्यवस्था में संरचनात्मक परिवर्तन और तेज़ी से उभरते हुए बाज़ार (जो केंद्रीय भूमिका निभाते हैं) को दर्शाया है।


न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB):

शंघाइ स्थित न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) को वर्ष 2012 में नई दिल्ली में आयोजित चौथे ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में ब्रिक्स और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ विकासशील देशों में बुनियादी ढाँचा और सतत विकास परियोजनाओं के लिये एक  की स्थापना पर विचार किया गया। सन 2014 के फोर्टालेजा घोषणा में कहा गया कि NDB ब्रिक्स देशों के बीच सहयोग को मज़बूत करेगा और वैश्विक विकास के लिये बहुपक्षीय तथा क्षेत्रीय वित्तीय संस्थानों के प्रयासों को पूरा करके स्थायी और संतुलित विकास में योगदान देगा।
NDB के संचालन के प्रमुख क्षेत्र हैं- स्वच्छ ऊर्जा, परिवहन, अवसंरचना, सिंचाई, स्थायी शहरी विकास और सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग।
NDB सभी सदस्य देशों के समान अधिकारों के साथ ब्रिक्स सदस्यों के बीच एक परामर्श तंत्र पर काम करता है।
आकस्मिक रिज़र्व व्यवस्था(Contingent Reserve Arrangement)
अपनी प्रारंभिक क्षमता 100 बिलियन डॉलर के साथ शुरुआत किये इस कोष के नतीजे उत्साहवर्द्धक रहे है।
यह वैश्विक वित्तीय सुरक्षा नेट को मज़बूत करने और मौजूदा वित्तीय अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्थाओं को मज़बूत करने में योगदान देगा।

न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) पर इस सम्मेलन में विशेष सत्र का आयोजन किया जा रहा है,इससे इसके महत्व को समझा जा सकता है।

 समावेशी विकास पर भारतीय दृष्टिकोण।

भारत का मानना है कि विकास को वैश्विक व्यापार के लिए केंद्रीय रहना चाहिए और इसके लिए समान लाभ साझाकरण, रोजगार सृजन और समावेशी विकास अभिन्न होने चाहिए।
भारत ने हमेशा ब्रिक्स को एक जन-केंद्रित उद्यम बनाने पर जोर दिया हैऔर ब्रिक्स के भीतर गरीबी, भुखमरी, रोजगार सृजन और महिलाओं के सशक्तीकरण से निपटने के लिए सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को साकार करने और ऐसे किसी भी उपाय का समर्थन करने पर होना चाहिए,जो सामूहिक रूप से वैश्विक समुदाय द्वारा सहमत इन लक्ष्यों को प्राप्त करने में उपयोगी हो।


भारत और मल्टीलेटेरिज्म की संकल्पना।

भारत का  मानना है कि 'सुधारित बहुपक्षवाद' इन समयों में आगे बढ़ने का मार्ग है - विशेषकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का सुधार। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों पर विचार-विमर्श सदा के लिए एक अभ्यास नहीं हो सकता है जबकि सुरक्षा परिषद की विश्वसनीयता और वैधता का क्षरण लगातार जारी है।
भारत कमोबेश सभी मंचो से मुखर स्वर में यह सदैव कहता रहा है कि सभी को यह सुनिश्चित करने के लिए एक साथ काम करना चाहिए कि : एक नियम-आधारित विश्व व्यवस्था बनाए रखी जाए जिससे संयुक्त राष्ट्र, विश्व व्यापार संगठन, यूएनएफसीसीसी, आईएमएफ, विश्व बैंक आदि जैसे बहुपक्षीय संस्थान प्रासंगिक बने रहें और समकालीन वैश्विक वास्तविकताओं को प्रतिबिंबित  करते रहे।

ब्रिक्स देशों को भी भारत कि इस संबंध में  "न्यायिक मांग" को स्वीकार करते हुए  अंतर्राष्ट्रीय शासन के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में खुद को विभाजित करने के बजाय एक मजबूत,मुखर और समवेत स्वर में अपनी आवाज  बुलन्द करनी चाहिये

Thursday, September 12, 2019

व्लादिवोस्तक-चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर : इंडो रशियन मेरीटाइम सिल्क रोड

व्लादिवोस्तक में सम्पन्न ईस्टर्न इकनोमिक फोरम में भारत ने रूस के साथ बहुप्रतीक्षित व्लादिवोस्तोक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) को मूर्त रूप देने की घोषणा की।
 भारत के इस कदम से रूस भारत के आर्थिक संबंधो नई दिशा मिलेगी वहीँ रूस के सुदूर पूर्व को एक व्यापक बाजार मिलेगा जो ऊर्जा सुरक्षा के लिए लालायित सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया को ऊर्जा सुरक्षा प्रदान करेगा. भारत, चीन से पहले ही स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड,न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझते हुए उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए  चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा।

 दूसरी तरफ़ भारत के इस कदम से जहाँ  चीनी आक्रामक नौसैनिक गतिविधि पर अंकुश लगने की उम्मीद जगी है वहीँ भारत, जापान के साथ "फोर लिटिल ड्रेगन" ("दक्षिण कोरिया सिंगापुर  ताइवान  और हांगकांग ) के साथ भारत रूस के साथ मिलकर चीनी प्रभुत्व वाले क्षेत्र में  जहाँ अपनी तगड़ी उपस्थिति दर्शायेगा और चीनी स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स  के जहर   की प्रभावी काट को सामने रख सकेगा ।
भारत का दक्षिण कोरिया,सिंगापुर के साथ गहरे नौसैनिक संबंध है इसमे सिंगापुर का चांगी बंदरगाह को तो भारतीय नौसेना को पोर्ट ऑफ कॉल से कहीं ज्यादा इस्तेमाल करने की अनुमति है। स्ट्रेट ऑफ मलक्का के देशों के साथ भारत जे विश्वनीय नौसिनिक संबंध है,चूंकि स्ट्रेट ऑफ मलक्का चीनी सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन का सबसे अहम ''चॉक पॉइंट" है।यहां पर भी भारत अपनी एक्ट ईस्ट और इंडो पैसिफिक नीति के तहत मलेशिया,इंडोनेशिया और वियतनाम के साथ नौसिनिक राजनय के तहत गहरे रणनीतिक सम्बन्ध बनाने में सफल रहा है। उपरोक्त तमाम देशों के साथ दक्षिणी चीनी सागर को लेकर नौसिनिक विवाद व्याप्त है

व्लादिवोस्तक: इसे रूस का सैन फ्रांसिस्को कहा जाता है। यह रूस के सुदूर पूर्वी क्षेत्र का एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है रूसी ट्रान्स साइबेरियन रेलवे का पूर्वी और अंतिम छोर व्लादिवोस्तक जिसे "रूलर ऑफ द ईस्ट"भी कहा जाता है । यह रूस के सुदूर पूर्वी भाग और उत्तर कोरिया के उत्तर में "गोल्डन हॉर्न की खाड़ी" में यह में अवस्थित है। इसकी सीमा चीन से भी समीपता दर्शाती है।

यहां रूसी नौसेना के प्रशांत बेड़े का मुख्यालय और प्रशांत महासागर में रूस का सबसे बड़ा बन्दरगाह है।
व्लादिवोस्तक के विशाल बारहमासी बन्दरगाह ,जिसमे नौवहन औऱ व्यावसायिक मत्स्यन की भरपूर संभावनाएं विद्यमान है। व्लादिवोस्तक से चेन्नई के बीच 5600 नॉटिकल मील या 10,300 किलोमीटर की समुद्री मार्ग में दक्षिण से जापान सागर,कोरियाई प्रायद्वीप,ताइवान,फिलीपींस,दक्षिणी चीन सागर,सिंगापुर होते हुए मलक्का की खाड़ी से निकलकर बंगाल की खाड़ी के अंडमान सागर होते हुए चेन्नई तक जाता है। यह दूरी को तय करने में विशाल कन्टेनर शिप जो 20-25 नॉट प्रति घंटे की गति से चलती है उसे 10- 12 दिन लगेंगे ।

रूस की चाहत
 भारत ने रूस के साथ अपनी बेहतर सामरिक समझदारी के साथ इंडो प्रशांत क्षेत्र में एक सम्मानित नौसैन्य प्रतिष्ठा प्रदान की साथ ही इस क्षेत्र में "रूस की हिंद महासागर" नीति की पुष्टि कर दी। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की भारत के साथ मिलकर  "बेहद दूरदर्शितापूर्ण " कार्रवाई  से जहां एक ओर बीजिंग को स्पष्ट संकेत मिला है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों को अंकुश लगाने के लिये रूसी इशारा है। हिन्द महासागर से रोमांस करने की रूसी चाहत कोई नई नहीं है,दरअसल रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी 1971 से ही लुभा रहा है,लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर वह बैकफुट पर ही रहा।

रूस,इससे पूर्व भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश के रूप पुर में उसके पहले परमाणु बिजली घर के निर्माण कर रहा है,और बांग्लादेश की "मुक्ति" में उसका निर्णायक योगदान रहा,वीसीएमसी के उसे उभरने का और अमेरिकी हेजेमनी को चुनौती  देने मौका मिल रहा है,जिसे पुतिन शायद ही किसी कीमत पर छोड़ना चाहेंगे।


भारत के लिये इस मार्ग का महत्व 

यह समुद्री मार्ग भारत और सुदूर पूर्वी रूस के बीच दो महत्वपूर्ण पत्तन को जोड़ेगा या यूं कहें कि यह कुडनकुलम से व्लादिवोस्तक के बीच के संबन्धों को और मजबूत करेगा,जो भारत रूस के नाभिकीय रिश्तों में और प्रगाढ़ता लाएगी। ईईएफ के मंच से भारत ने रूस की मदद से 20 नये परमाणु संयंत्र की स्थापना करने के समझौते पर हस्ताक्षर करेगा।
इस मार्ग के व्यवहारिक रूप से क्रियान्वित होने से भारत और रूस की सीधी पहुँच दक्षिण चीन सागर तक हो पायेगी जो अभी तक नहीं है।

इंडो प्रशान्त की संकल्पना में दक्षिणी चीन सागर खासा महत्व रखती है। इस क्षेत्र में रूसी -भारतीय गठजोड़ से चीन व्यवहारिक रूपसे शांत तो नहीं पर शांत होने का दिखावा जरूर करेगा,जिसका इंतज़ार अमेरिका सहित कई देशों को है।
भारत रूस और वियतनाम के संभावित त्रिपक्षीय धुरी से चीन कहीं न कहीं रक्षात्मक मुद्रा में मजबूरी में रहेगा क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा को लेकर भूखे चीन को रूस अबाध ऊर्जा सुरक्षा मुहैय्या कराता है।

व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) कहीं न कहीं शी जिनपिंग की ग्रेट चाइनीज ड्रीम के कहे जाने वाले ट्रिलियन डॉलर वाली वन बेल्ट वन रोड(ओबीओआर) के तहत चाइनीज मेरीटाइम सिल्क रूट(एमएसआर) के कॉउंटरबैलेंस के रूप में देखा जा रहा है,जहां चीन की एमएसआर नीति का प्रमुख उद्देश्य ढांचागत और अवसंरचनात्मक परियोजनाओं के जरिये चीनी प्रभुत्व को बढ़ावा और एशियाई अफ्रीकी मेरीटाइम मार्ग पर प्रत्यक्ष रूप से नियंत्रित करना है।


व्लादिवोस्तक चेन्नै मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) जो दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरेगा, यह प्राकृतिक खनिज संपदा और ऊर्जा के असीमित संभावना के दोहन का क्षेत्र है। इस क्षेत्र पर वैश्विक मंचो के इतर चीन अपना "ऐतिहासिक दावा " बताते हुए संपूर्ण दक्षिणी चीन सागर को अपना हिस्सा बताता है।

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय भूराजनीतिक परिदृश्य में यह क्षेत्र चीन के साथ समुद्री सीमा साझा करने वाले देशों के साथ अनकहे शीत युद्ध का अखाड़ा बन चुका है। वियतनाम,फिलीपींस,ब्रूनेई और ताइवान के साथ चीन की झड़प की खबरें सामान्य होती जा रही है। चीन के लिए यह सागर उसकी निर्बाध ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन(एसएलओसी) है।

ये झड़पें अमेरिकी नौसेना को इस क्षेत्र में ओपन सी पॉलिसी और फ्रीडम ऑफ नेविगेशन(एफओएन) के बहाने दक्षिणी चीन सागर में अपने पैर पसारने का मौका दे रही है।


क्यों इतना महत्वपूर्ण है साउथ चाइना सी.

सेन्टर फ़ॉर स्ट्रेटजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज(सीएसआईएस) के एक अध्ययन के मुताबिक
यह विश्व के सबसे व्यस्ततम वाणिज्यिक मेरी टाइम कॉरीडोर है। इस मार्ग के जरिये विश्वव्यापी समुद्री व्यापार का तक़रीबन तीस फीसद हिस्सा गुजरता है।
सन 2016 में इस मार्ग से चीन के समुद्री व्यापार का 64 फीसद ($1.47 ट्रिलियन),जापान का 42 फीसद($242 बिलियन)औरअमेरिका का 14प्रतिशत ($208बिलियन), दक्षिण-कोरिया($423बिलियन) इंडोनेशिया($239बिलियन) हिस्सा दक्षिण चीन सागर के अहाते से गुजरा।
जबकि कुल व्यापार मूल्य की बात किया जाय तो इस क्षेत्र लगभग 3.4 ट्रिलियन डॉलर मूल्य का व्यापार हुआ,जो विश्वव्यापी व्यापार का कुल  21 फीसद है।



जैवविविधता से परिपूर्ण दक्षिणी चीन सागर।

"कोरल त्रिभुज "  के भाग के नाम से जाने वाला यह क्षेत्र समुद्री जैवविविधता का विश्व में सबसे सम्पन्न क्षेत्र है।यह क्षेत्र उच्च मूल्य पर प्राप्त होने वाली और पर्याप्त न्यूट्रिशन युक्त समुद्री मछलियां जैसे स्पेनिश मॉक्रेल,पैसिफिक कॉड,जायंट ग्रॉउपर और टूना जैसी मछलियों का प्राकृतिक हैचिंग,ब्रीडिंग और कैचिंग ग्राउंड है।अनुवांशिक और जैव भौतिक अध्ययन से प्राप्त आंकड़ो से यह स्पष्ट है कि इस क्षेत्र के स्पार्टली द्वीपसमूह में विस्तृत कोरल रीफ मत्स्यन के लिए  प्राकृतिक रूप से "बायो कनेक्टिविटी"प्रदान करता है।
इससे इस क्षेत्र के मत्स्यन,रोजगार,आय,पोषण,खाद्य सुरक्षा,और विदेशी मुद्रा भंडार का सीधा संबंध है।


हिन्द महासागर में रूस की मजबूत होगी पैठ .
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व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर(वीसीएमसी) पर पुतिन और मोदी की मुहर ने सम्पूर्ण इंडो पैसिफिक क्षेत्र की भू सामरिक महत्व और "सिक्योरिटी आर्किटेक्चर" में आमूल चूल परिवर्तन ला दिया है।
हिन्द महासागर के उफनते गर्म पानी पर सर्फिंग और स्कूबा डाइविंग करने की दशकों की चाह को भारत ने एक झटके में पूरा कर दिया। भारत के इस कदम से एक तीर से कई शिकार किये
पहला,इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिकन प्रभुत्व को तगड़ी चुनौती दिया क्योंकि अभी तक अमेरिका इस क्षेत्र का निर्विवाद नायक समझता था और क्वाड (QUAD) की संकल्पना के जरिये भारत,अमेरिका,जापान ऑस्ट्रेलिया  को लेकर आक्रमक चीनी मेरीटाइम पॉलिसी को चुनौती देने की योजना बना रहा था।
 भारत इस अमेरिकी नीति पर लंबे समय तक यकीन नहीं कर सकता है क्योंकि ट्रम्प के गैर जिम्मेदार नीतियों और उनके लगातार बदलते फैसलों से हालात बिगड़ सकते हैं।

दूसरा:रूस की दशकों की चाहत को पूरा करते हुए भारत ने चीन और अमेरिका दोनो को कड़ा भू सामरिक संदेश देते हुए खुद को सुरक्षित किया और चीन अमेरिका के बीच उपजे तनाव और असुरक्षा के सुर में रूसी काउंटर बैलेन्स का भरोसा दिलाया । अगर मॉस्को के नजरिये इस क्षेत्र को देखें तो यह रूस की एफ्रो एशियन( हिन्द) महासागर नीति की वापसी है। जहाँ  रूस को हिन्द महासागर में प्रवेश मिलेगा तो वहीं  चीनी स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स की काट के रूप में भारत जापान सागर में अपनी प्रभुत्व को बरकरार रख सकेगा



, समरिक विशेषज्ञ इस भावी कदम को स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स के तोड़ के रूप यानी "मिरर रिस्पांस "के रूप में देखते हैं । इससे भारत की ब्लू वाटर नेवी संकल्पना को अमली  जामा पहनाया जा सकेगा। अब इस क्षेत्र में सभी कार्य संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के तीनों स्थायी सदस्यों के बीच "त्रिकोणीय रूपरेखा"पर होगा। विशेषज्ञ की माने तो, रूस ने अमेरिका की चीन केन्द्रित "पाइवोट टू एशिया" और अपनी  "बैलेंसिंग चाइना" नीति को कुशलता के साथ साध लिया है।

courtesy:lowy inst.

तीसरा: भारतीय - रूसी गठजोड़ से पूरे पूर्वी तथा दक्षिण एशिया के आर्थिक और सामरिक व्यवस्था में व्यापक बदलाव आएगा  जहाँ भारत अपनी एक्ट ईस्ट नीति का विस्तार करते हुए "फार एक्ट ईस्ट नीति"अपना सकेगा वहीं इस क्षेत्र में रूस की पहुंच से न सिर्फ चीनी समुद्री ऐतिहासिक आतंक से त्रस्त "आसियान 10" देशों को राहत मिलेगी,एपेक और ईस्ट एशिया समिट के देशों  को नए कलेवर वाले रूस से भेंट होगी,जो वर्तमान में  बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था की वक़ालत करते हुए अमेरिकी वर्चस्व को विभिन्न मोर्चों पर जमकर चुनौती दे रहा है। पुतिन के प्रो एक्टिव पैसिफिक पॉलिसी से कहीं न कहीं ट्रम्प और शिंगपिंग को परेशानी में अवश्य डालेगी पर ये दोनों ऐतिहासिक रूसी हक़ीक़त जानते हैं इसलिए ये दोनों अपनी देश अपनी दूसरी योजना पर अवश्य कार्य करेंगे।

चौथा: एक दूरदर्शी दृष्टिकोण से इस परियोजना को देखा जाय तो हम पाते हैं कि इससे सुदूर बर्फ से जमे आर्कटिक महासागर का  गर्म हिन्द महासागर का मिलन होगा जो न केवल सामरिक 
 आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से पूरे क्षेत्र के लिए "गेम चेंजर" होगा।
रूसी आर्कटिक क्षेत्र असीमित प्राकृतिक खनिज,पेट्रोलियम रिज़र्व,बहुमूल्य गैस रिज़र्व औऱ वानिकी संपदाओं से परिपूर्ण है जो जापान सागर,पूर्वी चीन सागर,दक्षिणी चीन सागर,अंडमान सागर होते हुए बंगाल की खाड़ी में बसे सम्पूर्ण पूर्वी और दक्षिण एशिया के ऊर्जा सुरक्षा के भूखे और उच्च जीडीपी की आकांक्षा लिए इन देशों को निर्बाध ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित कर सकता है। वैसे भी यह क्षेत्र समुद्री पाइरेसी से मुक्त है इसलिए निर्बाध व्यापार में कोई समस्या नहीं होगी। इसके इतर रूस के इस क्षेत्र में प्रवेश से चीन और अमेरिका इस क्षेत्र में "सम्मानजनक हरकत" करेंगे और दूसरे देशों के "क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता" का ख़याल रखेंगे।

 पांचवा:बीते समय की अवधारणा होने की रह पर चल पड़ी  भारत जापान की साझी एशिया अफ्रीका  ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)को पुनर्जीवन मिलेगा चूंकि रूस जापान के रिश्ते बेहतर हो रहे है और वे 1905 ,क्यूराइल,सखलिन से इतर देखने की ओर अग्रसर है जिसे हम पुतिन-अबे को हालिया सम्पन्न व्लादिवोस्तक में ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम की बैठक में देख चुके है। दरअसल एएजीसी की संकल्पना  चीन के ओबीओआर और बीआरआई नीति को प्रतिसंतुलित करने के उद्देश्य से 2017 में अहमदाबाद में जापान और भारत की संयुक्त पहल थी। रूस के इस क्षेत्र में शीतयुद्धकालीन सम्पर्क व्याप्त रहे है इसलिए पूर्वी एशियाई देशों के साथ उसे अपने सम्बन्धो को "री सेट"करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा।


                एशिया अफ्रीका  ग्रोथ कॉरिडोर (एएजीसी)


भारत के लिए चुनौती।

भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर,जिसका विस्तार एशिया से अफ्रीका तक है, को ज़ोन ऑफ पीस  घोषित कर चुका है, और क्षेत्रीय सुरक्षा     आर्किटेक्चर को कॉमन,कॉम्प्रिहेंसिव,कोऑपरेटिव और सस्टेनेबल,नियम आबद्ध ,पीसफुल,क्षेत्रीय अखंडता को सम्मान देते हुए ,निर्बाध और मुक्त नौवहन पर विश्वास करता है। रूस के आने से इंडो पैसिफिक क्षेत्र में नौसिनिक हलचलों में इज़ाफ़ा तो अवश्य होगा लेकिन चीनी नौसैनिक आक्रमकता में कमी आएगी क्योंकि आज  की बदली हुई परिस्थिति में चीन किसी भी मसले पर रूस के साथ किसी तरह का टकराव मोल नहीं लेना चाहेगा और जिसका सीधा लाभ भारत को मिलेगा.




बदले हुए हालात में चीन अपनी ग्रेट पावर डिप्लोमेसी में तब्दीली लाते हुए संभवतः अपनी चिरपरिचित  चाइनीज भू सामरिक के अपने  तीन पिलर पर अपना कार्य और गंभीरता के साथ शुरु करेगा,जो निम्नलिखित है ।

1.सिक्युरीटाइजेशन  ऑफ सॉवरेनिटी,नेशनल इंट्रेस्ट एंड इंटरनेशनल नॉर्म मेकिंग
2.इफेक्टिव मैनेजमेंट ऑफ ग्लोबल डिस्ट्रीब्यूशन ऑफ पावर।
3 विनिंग ओवर फॉलोवर स्टेबल एंड पीसफुल एनवायरनमेंट.
भारत को चाहिए कि बदले हुए हालात में भी अपनी हिन्द महासागर की नीति पर कठोरता से अमल करे,और आक्रमक चीनी चाल का मुकाबला करने को सदैव तैयार रहे क्योंकि अगर चीन समुद्र में शांत होगा तो इसका यह कतई अर्थ नहीं कि वह भूमि और वायु में भी शांत हो,भारत को चीन के  साथ आर्थिक,पर्यावरणीय,और व्यापारिक मोर्चों पर उसकी कुटिल रणनीति पर खासा चौकन्ना रहने की जरूरत है,खासकर अपने पर्यावरणीय दृष्टि से सुभेद्य और आपदा आसन्न क्षेत्र पर।

रूस के साथ सम्बन्धों को और मजबूत करे भारत.

हिन्द महासागर क्षेत्र में और स्थिरता और स्थायित्व लाने के लिए भारत को  रूस के साथ लॉजिस्टिक्स एक्सचेंज मेमोरेंडम ऑफ एग्रीमेंट (LEMOA) जैसे  मिलिट्री लॉजस्टिक्स समझौते के अंजाम देना चाहिए,इस तरह के समझौतों में दोनों देश एक दूसरे की "सैन्य संस्थाओं/संस्थानों और बेस,पोर्ट आदि का सुगमतापूर्वक इस्तेमाल करते है।भारत, अमेरिका और फ्रांस के साथ इस तरह के समझौते को अमली जामा पहना चुका है।
रूस के साथ इस तरह के समझौते से भारत और रूस के संबंधों में प्रगाढ़ता ही आएगी और दबे स्वर में ही सही रूसी शिकायत कि "भारत का लागातार झुकाव अमेरिका की तरफ हो रहा है" इस तरह के समझौते से रूसी शिकायत का प्रभावी समाधान किया जा सकेगा।

भारत को रूस की शिकायतें अगर कोई है तो उसे बेहद गंभीरता से निपटारा करना होगा,जब आप रूस को अपना अभिन्न(integral) मित्र  बताते हैं तो "किसी तरह की शिकायतों" की कोई गुंजाईश नहीं होनी चाहिए।

बदलते हुए दौर में पाकिस्तान  के साथ रूस का साथ किसी रूप में भारत के लिए "अच्छा नहीं " है, विगत तीन सालों की घटना पर गौर करें  तो 2016 में रूस-पाकिस्तान  के बीच साझा पहला सैन्य अभ्यास हुआ ,मिलिट्री तकनीकी समझौता को 2017 में मूर्त रूप दिया गया जबकि 2018  में  नौसैनिक सयोग समझौता की  पुष्टि हुई. 2014 से  2018  प्राप्त आंकड़ों  पर गौर किया जाय तो रूस पाकिस्तान का तीसरा बड़ा पारम्परिक सैन्य हार्डवेयर निर्यातक बना जो पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का छह फीसद है ।
भारत चाहिए की रूसी सहयोग को और बेहतर करे तथा बदलते सुरक्षा परिदृश्य और अफगानिस्तान में अमेरिकी ढुलमुल रैवये के बीच भी रूस पर अपना नैसर्गिक अधिकार जताते हुए पाकिस्तान  फैक्टर को जड़ से समाप्त करे।

भारत के लिए रूस उन चंद देशों में शामिल है जिसके साथ भारत के त्रिस्तरीय सैन्य अभ्यास, आण्विक त्रिस्कन्द  और अंतरिक्ष सहयोग, हाई एन्ड कटिंग एज तकनीक क्षेत्र में भी बेहतरीन संबंध हैं।

 भारत औऱ रूस के द्विपक्षीय संबंधों को किसी परिभाषा की दरकार नहीं है,ये समय के साथ साथ और घनिष्ठ और आत्मीय होते जा रहे है। तभी तो प्रधानमंत्री ने इईएफ में  कहा कि

"Indo-Russia ties based on the principles of "rules-based order, sovereignty, respect for territorial integrity and is against engaging in the internal matters of other countries".

बीते साल के 27 जनवरी 2018  को राष्ट्रपति पुतिन, जोसफ स्टालिन के बाद सबसे लम्बे समय तक रूस पर शासन वाले राष्ट्राध्यक्ष बन गए हैं।
राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिन्होंने अटल बिहारी वाजपेयी से नरेंद्र मोदी के भारतीय शासन को देखा,समझा और महसूस किया है और मोदी जो पुतिन को अपना परम और अभिन्न मित्र  मानते है और उनकी पर्सनल केमिस्ट्री किसी से छिपी नहीं है।

मोदी का मास्टर स्ट्रोक और पुतिन का साथ

भारत के सामरिक दृष्टिकोण से देखा जाय तो व्लादिवोस्तक चेन्नई मेरीटाइम कॉरिडोर (वीसीएमसी) महत्ता को देखते हुए विशेषज्ञ इसे  "इंडो रशियन मेरीटाइम सिल्क रोड " और  "आर्कटिक टू  इंडियन ओशन" कहते हैं  इसके जरिये भारत "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन पैट्रॉल"के जरिये दक्षिणी चीन सागर में मजबूती के अपनी उपस्थिति  दर्शायेगा इसके साथ भारत चीन के पूर्वी तट पर अपनी  नौसिनिक ताकत में इज़ाफ़ा कर सकेगा,जो अभी तक संभव नही हो पा रहा था।
चीन, रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दारोमदार रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के ऊर्जा बाहुल्य क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर लम्बे समय से गड़ी है और वह इन क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है, इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन को चिंतित करती रही है।अंतर्राष्ट्रीय राजीनति की बिसात पर पुतिन खुद मंझे हुए खिलाडी है वे चीन की सभी चालों से वाकिफ और उसके आसन्न चालों के प्रति चौकन्ने है

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति सबसे निर्मम होती है राष्ट्र हित के सामने सभी हित बेमानी होती है और वर्तमान अंतर्राष्ट्रीय राजनीति  में इस तथ्य को पुतिन से बेहतर शायद ही कोई नेता समझता हो।
मौजूद दौर में रूस चीन की गठजोड़ वक़्त का तकाज़ा है जिसे पुतिन भली भांति समझते हैं और वे आसन्न चीनी पैंतरे और खतरे प्रति सावधान दिखते हैं।
इसी कड़ी में भारत के साथ चेन्नई व्लादिवोस्तक मेरीटाइम कॉरिडोर,जापान के साथ अपने सम्बन्ध सुधारना ,चीन के साथ सीमा विवाद वाले सभी देशों के साथ रूस के बेहतर सम्बन्ध। प्रिमकोव ट्राइंगल  RIC (रूस भारत और चीन) के बाद अब हालिया
पुतिन ट्राइंगल RIV(रसिया इंडिया,और वियतनाम)की संकल्पना और उसे मूर्त रूप प्रदान करते हुए रणनीतिक और आर्थिक संबंधों के साथ साथ इस क्षेत्र में चीनी चुनौती की काट खोजना वे भली भांति जानते हैं।

Tuesday, September 03, 2019

टू अमूर फ्रॉम यमुना : ए टाइम टेस्टेड फ्रेंडशिप

भारत रूस के सम्बन्धों को और प्रगाढ़ता लाने की दिशा  में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 3 सितम्बर से सुदूर रूसी शहर व्लादिवोस्तक यात्रा करेंगे।

भारत और रूस के संबंधों को सामान्यतया ऐतिहासिक, आपसी विश्वास, और आपसी एवं पारस्परिक समझ पर आधारित है और बिना किसी "लाभ हानि"की चिंता किये ये दोनों देश समय के क्रूर पहिये पर पड़ोसी की "आल वेदर फ्रेंडशिप" के फ़र्ज़ी दावे से कहीं सुदूर  "अपने आप मे अनूठी "(sui generis) दोस्ती को दर्शाती है।



तभी तो भारतीय विदेश मंत्री सुब्रह्मण्यम जयशंकर ने बीते बुधवार को स्पष्ट किया कि

'विश्व बदल रहा है लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनय में भारत और रूस के संबंध समय पर खरे,सदैव अचर,स्थिर,और स्थाई रहें हैं।
इन दोनो देशों के इस अनूठे सम्बन्धो को बिगाड़ने,तोड़ने,मरोड़ने,खटास पैदा करने,के साथ साथ धमकाने,आर्थिक प्रतिबन्ध लगाने,तक जैसी ओछी हरकत करने से ये महाशक्तियां और इनके पुछल्ले देश बाज़ नहीं आये लेकिन भारत रूस के ये संबध इन कुटिल चालों से सदा ऊपर उठकर रही।
यह संबंध तो 1468 से 1472 के बीच जब रूसी यात्री अफनसे निकितिन ने फारस और  ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्र से होते हुए भारत की यात्रा की और अपनी कृति khozheniye za tri morya (द जर्नी बियॉन्ड थ्री सी) लिखा तब से ही व्यापक हो चुके थे। मॉस्को,सेंट पीटर्सबर्ग, अस्त्रखान से हमारे बहुआयामी सम्बन्ध तो आदि काल से रहे है।

जिसे हमने गंगा-मस्कवा ,रुपये-रूबल,टैगोर-गोर्की
दिनकर-पुश्किन,राहुल-दोस्तव्स्की,इसरो-रॉस्कोसमोस,बार्क-रॉसएटम,एचएएल-रोसोबोरोनएक्सपोर्ट,के जरिये सांस्कृतिक,तकनीकी और आर्थिक सम्बन्ध को मजबूत बनाया है।

 रांची,भिलाई,बोकारो,हल्दिया,मथुरा सहित कई अन्य औद्योगिक शहर,के औद्योगिकीकरण में कुछ कहने की जरूरत नहीं पड़ेगी,बस आप नाम लेकर आप अपनी आंखें बंद कीजिए रूस का योगदान जेहन में तैरता नजर आएगा।
नेहरू,शास्त्री इंदिरा,गुजराल,राजीव,राव,बाजपेयी,सुषमा,
जयशंकर के साथ नरेंद्र मोदी इस अनन्य राजनीतिक और राजनयिक सम्बन्धों को आगे बढ़ा रहे हैं।

मास्को के प्रसिद्ध सर्कस,लचीली जिम्नास्ट,राज कपूर की लाल टोपी, विश्वनाथन आनन्द और गैरी कास्पोरोव, मरात साफ़िन,दिनारा सफ़ीना,अन्ना कुर्निकोवा से मारिया शारापोवा और वर्तमान में एके 101 असॉल्ट राइफल, सुखोई 30, भीष्म,पिनाक, विक्रमादित्य,चक्र औऱ मिग बाइसन-अभिनंदन की जोड़ी भी दोनो देशों के सांस्कृतिक रणनीतिक संबंधों को बयां करती ।

ये चंद उदाहरण है जिसे विदेश मंत्री के उपरोक्त वक्तव्य की पुष्टि होती है ,और दोनों देशों की रिश्ते से चिढ़ कर अपना सर नोचने वाले देशो के लिये सबक मिलता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक में राजनय और दोस्ती को कैसे साथ लेकर चला जाय।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति और राजनय की कॉपी बुक स्टाइल तो कहती है कि "जो आप कहते है उससे कहीं ज्यादा ध्यान उस पर दिया जाना चाहिए जो आप नहीं कहते है"भारत के साथ रूस की कमोबेश यही स्थिति बरकरार रही है।


भारत के लिए क्यों खास है व्लादिवोस्तक ।

 रूस के रोमानोव वंश के महान योद्धा और शासक अलेक्जेंडर तृतीय जो रूस के सम्राट के साथ साथ ग्रैंड ड्यूक ऑफ फ़िनलैंड और किंग ऑफ पोलैंड भी थे  उनकी प्रसिद्ध उक्ति है
"Russia only has  two allies which are the army and the fleet"
इसी कथन को चरितार्थ करते हुए करीब पांच दशक पहले दिसंबर 1971 के सर्दियों में जब अमेरिकी और ब्रिटिश नौसेना ने बांग्लादेश मुक्ति युद्ध के दौरान भारत को धमकाते हुए अपने विमानवाहक पोत का रुख पाकिस्तान के समर्थन में बंगाल की खाड़ी की ओर मोड़ दिया था तब तत्कालीन सोवियत संघ ने अपने प्रशांत बेड़े को परमाणु आयुध से सुसज्जित पनडुब्बी भी थी उसे भारत की सहायता के लिए भेज दिया था।
तत्कालीन सोवियत संघ के इस कदम ने पूरे युद्ध की संरचना ही बदल दी आक्रमक अमेरिकी प्रशासन ने अपने सातवें बेड़े ने युद्ध समाप्ति के फौरन बाद अपनी वापसी करना उचित समझा और ब्रिटिश नौसेना किसी भी सूरत में रूसी नौसेना के साथ कोई टकराव मोल लेना नहीं चाहती थी।इसलिए उन्होंने इस क्षेत्र से वापसी में ही अपनी भलाई समझी।

सोवियत संघ की नौसेना का यह प्रशांत बेड़ा रूस के सुदूर पूर्वी भाग व्लादिवोस्तक के गोल्डन हॉर्न खाड़ी में स्थित था । रूस के इस कदम ने 1971 की युद्ध की दशा और दिशा ही बदल दी,यह बेड़ा युद्ध समाप्त होने के बाद लम्बे अरसे तक इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी दर्ज कराता रहा ताकि इस क्षेत्र में अमेरिका प्रतिरोध को समाप्त किया जा सके।विश्व इतिहास में यह शायद पहला मौका था जब दो आण्विक महाशक्तियां एक दूसरे के खिलाफ आमने सामने किसी अन्य देश के लिए हुए थे फलस्वरूप आज मुक्त बांग्लादेश को हम नक़्शे पर देख पा रहे है।इस घटना के बाद "व्लादिवोस्तक"के लिए भारतीयों के दिल और दिमाग मे अपना विशेष स्थान बना चुका है।

ग्लॉसनोस्त और पेरेस्त्रोइका से आगे निकलते हुए रूसी राष्ट्रपति पुतिन की  वोस्तानॉवलेनये (रिस्टोरेशन) की  अभिनव  नीति  और अपने सुदूर पूर्व पूर्वी क्षेत्र के लिए प्रतिबद्ध कार्यक्रम  ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम(ईईएफ)2019 के लिए इस साल राष्ट्रपति पुतिन ने जब भारतीय प्रधानमंत्री को मुख्य अतिथि के रूप मे आमन्त्रित किया तो बरबस ऐसा लग रहा है कि भारत को व्लादिवोस्तक के कर्ज़ को चुकाने के सुनहरे मौका मिला है जिसे चुकाया जाय।हालांकि इस रूसी कर्ज़ को,जिसे कभी चुकाया नहीं जा सकता है,पर,हां उसके संवृद्धि और विकास कार्य मे दिल से भागीदार बनकर उसके उन्नति में अपना योगदान तो दिया ही जा सकता है।

इसी क्रम में भारत ने व्लादिवोस्तक के महत्व को बहुत पहले ही पहचान लिया था और भारत पहला ऐसा देश था जिसने 1992 में यहां अपना महावाणिज्य दूतावास को खोला था। इस क्षेत्र में इरकुटस्क क्षेत्र जहां भारत के लिए मिग और सुखोई श्रेणी के लड़ाकू विमानों विनिर्माण होता है। सखालिन क्षेत्र में प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड(ओ एन जी सी) के अनुषंगी कंपनी ओवीएल ने प्राकृतिक गैस उत्खनन के लिए भारी निवेश किया है।

ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम (ईईएफ) 2019.

रूस के कुल छह औद्योगिक क्षेत्र है जिसमे छठा औरअंतिम "सुदूर पूर्व औद्योगिक केंद्र(The Russian Far East Industrial Centre) का मुख्यालय " व्लादिवोस्तक है जिसे रूस के सैन फ्रांसिसको कहा जाता है। यह रूस के एशियाई भाग का क्षेत्र है जो यूरोपीय रूस की तुलना में कम विकसित है।
उत्तरी प्रशांत महासागर के जापान सागर के मुहाने पर स्थित व्लादिवोस्तक सामरिक और प्राकृतिक संसाधन से सम्पन्न क्षेत्र  होने के वावजूद अपनी दुरूह भौगौलिक स्थिति के कारण इसका विकास नहीं हो पाया था,राष्ट्रपति पुतिन ने अपनी Pivot of Asia रणनीति के तहत इस समस्या से निपटने के लिए 2012 में एक अलग मंत्रालय, विशेष आर्थिक क्षेत्र बनाया,और 2015 से  इस क्षेत्र के विकास के लिए सालाना  ईस्टर्न इकोनॉमिक फोरम(ईईएफ) का आयोजन व्लादिवोस्तक में होना सुनिश्चित किया।अब इस सम्मेलन में ईईएफ से इतर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था,क्षेत्रीय एकता, नवीन औद्योगिक और तकनीकी क्षेत्र के नवाचार से जुड़े मुद्दों पर विचार विमर्श का एक बेहतरीन प्लेटफार्म माना जाता है जो पूरे यूरेशियन और आर्कटिक राजनय  के लिए अति महत्वपूर्ण है।

द ग्रेट यूरेशियन गेम।

व्लादिवोस्तक रणनीतिक रूप से कोरियाई प्रायद्वीप के पूर्वी भाग में स्थित है जो रूस को उत्तरी और दक्षिण कोरिया और जापान के मुख्य द्वीपों साथ  जोड़ता है। यह क्षेत्र जिसे सुदूर पूर्व फेडरेल डिस्ट्रिक्ट कहा जाता है जो क्षेत्रफल में  भारत से दोगुना है और जनसंख्या मात्र 6.3 मिलियन।इसमे कुल आठ डिस्ट्रिक्ट हैं जो बहुमूल्य खनिज और प्राकृतिक संसाधनों (कोयला डायमंड गोल्ड,प्लेटिनम टँगस्टन) से सम्पन्न है।
यह शहर उत्तरी प्रशान्त महासागर में होने के कारण सालों भर व्यापार के लिए खुला रहता है,जबकि रूस से अधिकतर बन्दरगाह आर्कटिक क्षेत्र में होने के कारण सर्दियों में बंद रहते है। व्लादिवोस्तक जो ट्रांस साइबेरियन रेल मार्ग का सबसे पूर्वी टर्मिनस है और क्यूराईल और सखलिन जैसे ऊर्जा संसाधन सम्पन्न क्षेत्र से घिरा हुआ है, यह शहर न सिर्फ पत्तन के दृष्टि से वरण सामरिक रूप से  रूस चीन जापान और कोरिया के चतुष्कोणीय आर्थिक व्यापारिक और ऊर्जा सुरक्षा के लिए "संघर्ष"का मुख्यालय बनेगा।
भारत भी इस ग्रेट गेम का हिस्सा बनना चाहेगा,क्योंकि हमें भी अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करनी है और रूसी हाथों के साथ यह कार्य अन्य क्षेत्रों से ज्यादा सहज है।
इस क्षेत्र में चीन की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मोदी को चिंतित करती रही है,इसी क्रम में पुतिन द्वारा मोदी को इस सम्मलेन में गेस्ट ऑफ आनर दिये जाने के निहितार्थ को समझा जा सकता है।


चीन फैक्टर.

भारत और रूस  विस्तृत इंडो पैसेफिक क्षेत्र में बढ़ता चीनी दबदबा,आक्रमक नौसैनिक नीति और एम्बुश और डेब्ट डिप्लोमेसी,आर्कटिक क्षेत्र में ऊर्जा दोहन के लिए महत्वाकांक्षी रणनीति,और चीन और अमेरिका बदलते व्यापारिक रिश्ते और तथाकथित ट्रेड वॉर से उत्पन्न हालात से चिंतित है।यहाँ यह देखना दिलचस्प है कि चीन रूस का सबसे बड़ा व्यापारिक और रणनीतिक सझीदार है चीन की निर्बाध पूरी ऊर्जा सुरक्षा की आपूर्ति का दायित्व रूस के उपर है जो अपने सुदूर पूर्व में अकूत ऊर्जा संसाधन से सम्पन्न है,रूस के इस क्षेत्र में कुटिल ड्रेगन की नजर गड़ी है और वह इस क्षेत्र में कई अवसंरचनात्मक विकास के लिए जोर शोर से खर्च कर रहा है। चीन इस क्षेत्र में पूरे जनसँख्या पैटर्न को बदलने पर उतारू है,इसी कड़ी चीन अपने नागरिकों को इस इस क्षेत्र में पहले पर्यटन,फिर कामागार के रूप के बसाना शुरू करता है और पूरी जनसंख्या लाभांश को बदल देता है ।रूस चीनी चाल को भली भांति समझता है,उसे बेहतर समझ है कि यह वही चीन है जो उससे उसरी नदी पर लड़ चुका है,और यह अपनी पीसफुल राइज की नीति से कहीं आगे निकल चुका है,औऱ इसकी नजर रूस से होते हुए पूरे यूरेशिया पर है। चीन की अरबों डॉलर की  न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की अवधारणा और इनसे होने वाले सम्भावित परिणाम से रूस समेत सभी देश वाक़िफ़ है।
भारत चीन से पहले स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स और वन बेल्ट वन रोड,न्यू सिल्क रोड,और मेरीटाइम सिल्क रोड की चतुष्कोणीय चीनी चुनौती से जूझ रहा है और उसकी काट ढूंढ रहा है। इसी कड़ी में भारत के लिए इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग की संकल्पना को रूस के साथ मिलकर मूर्त रूप देने से निश्चित रूप से ड्रेगन के अवसंरचनात्मक जहर की काट सिद्ध होगा। इस समुद्री मार्ग के जरिये जहां रूस के सुदूर पूर्व व्लादिवोस्तक में भारत महज 24 दिन में पहुंच सकेगा,जो अभी 42 दिन लगता है। इस रास्ते से भारत न सिर्फ कोरियाई प्रायद्वीपीय,जापान सागर में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा सकेगा ।


यह समुद्री मार्ग  पूर्वी चीन सागर और दक्षिणी चीन सागर से होकर गुजरता है जहां चीन अपनी ऐतिहासिक दावा कूटनीति के जरिये सम्पूर्ण क्षेत्र पर अपना अधिकार जताते हुए अपने सभी पड़ोसियों के साथ आक्रमकता के साथ पेश आता है,चीन के आक्रमकता से त्रस्त इन सभी देशों के साथ भारत के बेहतर राजनयिक और नौसिनिक सम्बन्ध है। इस क्षेत्र में भारत वियतनाम के साथ मिलकर  चीन के इन मंसूबो पर मजबूती से लगाम लगा सकता है।

रूसी चाहत

रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी सदा लुभाता रहा है।चेन्नई -व्लादिवोस्तक मार्ग के संचालित होने के बाद  प्रशांत महासागर का हिन्द महासागर में मिलन हो सकेगा और चीन रूस के आगोश में शांति से रह सकेगा।इस समुद्री मार्ग के जरिये ही भारत -वियतनाम -रूस की त्रिपक्षीय नवीन संकल्पना को मूर्त प्रदान किया जा सकेगा। इससे आसियान देशों के लिए भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी और एक्सटेंडेड ईस्ट पॉलिसी में रूसी सहयोग बढ़ेगा। ये दोनों देश ब्रिक्स,एससीओ,आरआईसी आदि सहयोगी मंचो पर विद्यमान है।

सम्बन्ध सुधारने की और जरूरत.

रूस के  साथ द्विपक्षीय संबंध को गति देने के लिए भारत को  रणनीतिक आण्विक और सामरिक सम्बन्ध के साथ साथ अन्य आर्थिक व्यापारिक गतिविधि को और बढ़ावा देना पड़ेगा।दोनो देशों के बीच कई मुद्दों पर अभी और भी सक्रियता के साथ इन मुद्दों पर गंभीरता से विचार से कहीं ऊपर उठकर क्रियान्वयन करने की जरूरत है।इन मुद्दों में सबसे प्रमुख हैं व्यापारिक कनेक्टिविटी ,भौगोलिक दूरी,विदेशी निवेश संबंधी कानून,कमजोर बैंकिंग व्यवस्था,नीतिगत विषमता,रूस की वीजा रेस्ट्रिक्ट नीति आदि मसलों पर ध्यान देने की जरूरत है। 
भौगौलिक दूरी दोनो देशों के बीच व्यापार और व्यापार असंतुलन की सबसे बड़ी बाधा है,जिसे इंटरनेशनल नार्थ साउथ कॉरिडोर और चेन्नई -व्लादिवोस्तक समुद्री मार्ग  पर तीव्रता से व्यापारिक रूप से व्यवहारिक बनाना होगा जिससे स्वेज नहर पर निर्भरता कम हो सके  और दोनों देशों के बीच मुक्त व्यापार समझौता,मुक्त व्यापार मंच जैसे यूरेशियन इकनोमिक यूनियन आदि मसलों पर बेहद  संजीदगी के साथ पेश आना होगा।
ट्रेड वॉर,अमेरिकी कड़े होते वीजा नीति, अमेरिकी डिग्लोबलाइजेशन नीति,अमेरिका की रूस पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध और संरक्षणवाद,चीन की ग्लोबलाइजेशन 2.0 विथ चाइनीज करेक्टर के इस दौर भारत और रूस को चाहिए कि बदलते भू राजनीतिक परिदृश्य में साथ मिलकर आगे आते हुए इन आर्थिक अवसरों लाभ  उठाने की आवश्यकता है।
हिन्द प्रशान्त क्षेत्र की बदलती जरूरत,अफगानिस्तान में कमजोर होती अमेरिकी पकड़ और बढ़ता रूसी वर्चस्व,
पश्चिम एशिया में सीरिया पर प्रभावी रूसी करवाई,ईरान के साथ अमेरिकी टकराहट, आदि मसलों पर रूस को भारत की सख्त जरूरत होगी ।

रसियन रोमांस.

ग्रेट पैसिफिक रिम की संकल्पना के बाद "पाइवोट ऑफ एशिया/यूरेशिया" चीन की आक्रमक मेरीटाइम नीति,और बदले हुए  'इंडो पैसिफिक अवधारणा "और रूस अमेरिका के बीच आईएएफ संधि के बाद खटास होते रिश्ते के ,भारत पर रूसी सैन्य हार्डवेयर न खरीदने का अमेरिकी दवाब के बीच प्रधानमंत्री की यह यात्रा और रूस के कम विकसित सुदूर पूर्व क्षेत्र और व्लादिवोस्तक के विकास के लिए गहरी भारतीय प्रतिबद्धता को  को "व्यापक अर्थों "में देखा जाना चाहिए।

भास्कर,
3/9/2019
दिल्ली

Wednesday, July 31, 2019

चीन की रक्षा श्वेत पत्र 2019 और भारत पर नौसैन्य प्रभाव।



चीन ने हालिया सुरक्षा पर जारी अपने नवीनतम श्वेत पत्र "नए युग में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा" शीर्षक में स्पष्ट किया है कि चीन विदेशों में अब और भी सैन्य अड्डे बनाएगा,दक्षिणी चीन सागर, नाइन डैश लाइन, स्ट्रेट ऑफ मलक्का,बंगाल की खाड़ी और कोको द्वीपसमूह,हम्बनटोटा से मालदीव,अदन की खाड़ी से हॉर्न ऑफ अफ्रीका के जिबूती तक सक्रिय चीनी नौसेना की  हिन्द महासागर की प्रभाव वाले इस सम्पूर्ण क्षेत्र में चीनी नौसैनिक उपस्थिति निश्चित रूप से भारत के लिए चिंताजनक है।

कई विश्लेषक इसे  हाल ही में प्रकाशित अमेरिका  रक्षा रिपोर्ट के जबाब के रूप में देख रहे हैं,चीन अपने रिपोर्ट में अमेरिका को प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जम कर आलोचना करते हुए नजर आता है। इस श्वेत पत्र में  अमेरिका परमाणु हथियार नियंत्रण और आण्विक आधुनिकीकरण के मसले पर असहयोगी रवैया अपना रहा है । चीन की बन्द व्यवस्था में इस दस्तावेज का अत्यधिक महत्व है, दस्तावेज चीन की  "पीसफुल राइज " की नीति से कहीं आगे निकलता दिख रहा है,यह स्पष्ट तौर पर पूरे यूरेशियन क्षेत्र में नई  "होड़" को जन्म  देगा।

भारत पर  नौसैन्य प्रभाव
डोक ला(डोकलाम) तनाव के इस दस्तावेज में जहां एकतरफ चीन पूरी तरह भारत के साथ संयमित व्यवहार दर्शा रहा है पर दक्षिणी चीन सागर,और हिन्द प्रशांत क्षेत्र के साथ साथ लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल(LAC) और मैकमोहन रेखा पर उसकी तैयारियां उपरोक्त से मेल नहीं खा रही है। दस्तावेज कहता है कि सीमा पर शांति और स्थिरता बढ़ाने के प्रयास और प्रक्रिया तेज की जाएंगी,   एक नजर चीनी नौ सेना की तैयारियों पर।
  
रिपोर्ट कहती है कि टाइप 052C पोत और  052D  या लुयांग श्रेणी के विध्वंसक पोत जिसे चीनी नौसेना के सतही बेड़े की जान माना जाता है इस बेड़े को और उन्नयन किया जा रहा है,इसी कड़ी में 154मीटर लंबे और 7500टन विस्थापन क्षमता वाले टाइप 052D  के कुल 11 उन्नत विध्वंसक पोतों  को नौसेना में शामिल करना,जिसमें नौ  ( 09) इक्विपमेंट फिटिंग और समुद्री परीक्षण के दौर से गुजर रही है।

ये विध्वंसक पोत एडवांस्ड इलेक्ट्रानिकली स्कैन्ड ऐरे सिस्टम(AESA) और 64 वर्टीकल लांच सिस्टम(VLS) से लैस है। साथ ही आधुनिक वायु सुरक्षा प्रणाली, क्षमतावान रडार सिस्टम,जो  आने वाले " इंटरफेरेंस"से उत्पन्न  नॉइज से इन प्रणालियों को सुरक्षित रखता है,साथ ही  कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम को बेहतर बनाता है। 
दस्तावेज में साफ तौर पर कहा गया है कि चीन अपने आर्थिक,ऊर्जा और सामरिक हितों की रक्षा और सुरक्षा के लिये विदेशों में भी और सैन्य ठिकाने का निर्माण करेगा।

अगर इनकी तैयारियों को कुछ महीने पीछे जाकर कुछ असामान्य बातों पर गौर करें तो स्थिति साफ साफ दिखने लगती है। विगत कुछ महीनों से हिन्द महासागर क्षेत्र में चीनी पनडुब्बियों की आवाजाही पर खासी "कमी" देखने को मिली है,जिसे ऐसा माना जा रहा है कि  बीजिंग ने अपना आक्रमक हिन्द महासागर अभियान को रोक दिया है।ऐसा 2018 के वुहान सम्मेलन के बाद से हो रहा है,जिसके बाद भारत चीन एक "कॉलोबोरेटिव पाथ" पर चलते दिखाई दे रहे है,जहां भारत भी दक्षिणी चीन सागर मसले पर तथाकथित "मौन" साधे हुए है तो बदले में चीन भी हिंदमहासागर में अपनी गतिविधियों को तत्काल विराम दे रहा है।
इस बात पर बल और मिलता है जब बीते अप्रैल में  चीन के क्विंगदाओ में आयोजित चीनी नौसेना के फ्लीट रिव्यु में  जिसने भारतीय नौसैनिक पोतों  भी शरीक होते हैं।

वर्तमान में हिन्द प्रशांत क्षेत्र और हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती चीनी चुनौती और "स्ट्रिंग आफ पर्ल" के वे मोती जो चीनी मांझे में पिरोये हुए है और ग्वादर से कॉक्सबाजार तक भारत के गले को लगातार कस रहे है,कभी ढील दी रहे है। विवाद जमीन पर होता है असर समुद्र के भीतर होता है। इन विपरीत परिस्थितियों में आज भारत को जरूरत है कि हिंदमहासागर की "सुरक्षा अर्चिटेक्टर "को और प्रभावी रूप से चाक चौबंद करे।



 इसके लिए भारत को अपने विस्तृत तट से लेकर अपने "अनन्य आर्थिक क्षेत्र "की सुरक्षा सुनिश्चित करने की फौरी आवश्यकता है।
नए नेवल और लिस्निंग पोस्ट, आधुनिक फ़ास्ट अटैक इंटरसेप्टर और गहरे समुद्र में पनडुब्बियों की गश्त पर आक्रामकता के साथ पेश आना होगा,इसके अतिरिक्त  अधूरे और लम्बित पड़े तमाम। नौसैनिक प्रोजेक्ट में और तेजी लाने की आवश्यकता है, जरूरत  पुराने हो चुके आठ कसम चलाऊ तकनीकी उपकरण को "फेज आउट" करते हुए अत्यधुनिक सोनार और स्टील्थ खोजी प्रणाली विकसित करें/खरीद करें। 

नौसेना को आधुनिक और कटिंग एज युक्त  तकनीक और उत्कृष्ट मानव बल चाहिए तभी यह बेहतरीन परिणाम देती है। भारत को एन्टी सबमरीन वारफेयर सिस्टम को और अत्यधुनिक बनाते हुए दुरुस्त करें,और उसमे महारथ हासिल करें।

अत्यधुनिक सोनार बीपिंग सिस्टम क्षमता को और मजबूत बनाये, नए पीढ़ी के नौसैनिक साउंड सेंसर को मरीन टोपोग्राफी के उन अनछुए जगहों पर लगाया जाए जहाँ से चीनी घुसपैठ कर सकते है,साथ ही नॉइज सिग्नेचर डिवाइस को और आधुनिक करें,पारंपरिक माइन से आगे निकलते हुए आधुनिक और बेहद धीमी से धीमी इंफ्रासोनिक साउंड को पहचानने वाले एकॉस्टिक डेटोनॉटिंग माइंस बिछाएं जाएं। 

आज जरुरत न सिर्फ़ मरीन टोपोग्राफी  पर महारथ हासिल करने से है बल्कि  आपको पी 81आई जैसे और एन्टी सबमरीन वारफेयर में महारथ हासिल टोही विमान और कमोव सीरीज के हेलीकॉप्टर की  त्वरित खरीद और तैनाती करने की है।  इन सब  उपायों के अतिरिक्त गहन गश्ती से ही भारतीय सामुद्रिक हित सुरक्षित हो सकेंगे। चीनी नौसेना ने आज तक आमने सामने की लड़ाई नहीं किया है ,जो कुछ किया है,अभ्यास किया है,भारतीय नौसेना को यहां "लीड और एज"मिलता है जो हर परिस्थिति में हमे बुलन्दी तक पहुंचाएगा लेकिन इसके किये शांति काल मे भी "काफी पसीना बहाने की जरूरत है,और रहेगी"

इस क्षेत्र में भारत की बढ़ती साख से चीन खासा चिंतित है इसलिये भारतीय नौसैन्य तैयारी पर इस दस्तावेज पैर ज्यादा जोर नहीं डाला गया है।

भारत की तैयारी पर नजर डालें तो  भारत ने इस क्षेत्र में  सामरिक रूप से महत्वपूर्ण और  मलक्का जलडमरूमध्य के नजदीक इंडोनेशिया के सबांग डीप सी पोर्ट के उपयोग करने का समझौता कर चीन के "मल्लक्का डिलेमा" को और बढ़ा दिया है और ओमान के  डूक़ुम पोर्ट पर उपयोग के अधिकार को प्राप्त कर लिया है ।अमेरिका के  साथ LEOMA समझौते के बाद भारत इस क्षेत्र में अमेरिका की डिएगो गरसिया नौसैन्य अड्डा भी आधिकारिक रूप से उपयोग में ला सकता है। क्वैड के संकल्पना के साथ साथ और "पेरिस-नई दिल्ली-कैनबरा" की संकल्पना से भी चीन पर असर हुआ है।

हमें यहां चीन से बेहद सतर्क रहने की आवश्यकता है, हिंदमहासागर क्षेत्र में चीनी गतिविधियों में "कमी" देखने को मिली है,पर यह "पूरी तरह समाप्त " नहीं हुई है.
चीन लम्बे समय से " स्टील्थ क्षमता वाले पनडुब्बियों " के विकास में जुटा हुआ हैऔर अपने स्टील्थ पनडुब्बियों को और उन्नत बना रहा है। ऐसा हो सकता है कि ये स्टील्थ पनडुब्बी मेरे लेख लिखे जाने समय में  हिन्द महासागर के गर्भ में कहीं खूंखार "कैट फिश"की तरह सागर की तलहटी में  दम साधे अपना कार्य कर रहा हो।


क्योंकि इतिहास गवाह है कि "चीनी जो कहते हैं वे बिल्कुल नहीं करते,गाहे बगाहे ऐतिहासिक दावा करते है,अपनी गलती पर इतनी तेजी से माफी मांगते है कि "चमेलियन" शर्म से लाल और पानी पानी हो जाता है। वे  सुन ज़ू  और कन्फ्यूसियस को एक साथ मानते है, जरूरत पड़ने पर बुद्ध को सामने करते हुए मानवता की बात करते है लेकिन वे अपना मुख्य कार्य कभी नहीं भूलते । इसलिए चीन को आप महाभारत के "मारीच"प्राणियों में "चमेलियन"  की श्रेणी में रख कर उनके बारे में अपनी राय बनाये।

हिन्द महासागर क्षेत्र में "फ्रीडम ऑफ नेविगेशन "और "जोन ऑफ पीस " की संकल्पना पर भारतीय नेतृत्व पूरी तरह प्रतिबद्घ है और "चोल कालीन राज्य से" हिन्द महासागर हमारा अभिन्न अंग और सांस्कृतिक विरासत रहा था,है, और इसे हर हाल में बरकरार रखना है । 
भारत हिन्द प्रशांत क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और  SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को गंभीरता से लेता है। जो नैसर्गिक रूप से इस क्षेत्र में सभी परिस्थितियों में 'फर्स्ट रेस्पांडर" है..

हाल ही में सम्पन्न रक्षा मंत्री की पहली विदेश यात्रा में मोज़ाम्बिक को चुना जाना इसके गम्भीरता को दर्शाता  है। अफ्रीका महाद्वीप में चीन की बढ़ती असामान्य सैन्य और अवसंरचनात्मक निवेश और उसकी "डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी " को बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में रक्षा मंत्री इस यात्रा के गहरे रणनीतिक और सामरिक  निहितार्थ हैं।

अफ्रीका के अधिकतर देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की  पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी  की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर  चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे  और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत  अपनी "कॉटन रोड अप्रोच" से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।   वर्तमान भूआर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में भारत को चीन  के साथ प्रतिस्पर्धा के बीच अफ्रीका एक अहम "डेस्टिनेशन" बन गया है।


समय के साथ इस क्षेत्र में भारत को  इन देशो के साथ अपने संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में को आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से  चीन की ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या,सूडान,तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को  को  अपने परित्यक्त  "पीसफुल राइज"नीतियों को  इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशनआर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी  अपना प्रभाव बढ़ा रही है। भारत को  बदलते भू  रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है।


इसी बीच एक अभूतपूर्व भू राजनीतिक घटनाक्रम के अंतर्गत भारत ने म्यामांर के साथ एक रक्षा सौदे के तहत अपनी "किलो क्लास सबमरीन "आईएनएस सिंधुवीर " को म्यांमार को देने का फैसला लिया है। इस अप्रत्याशित घटनाक्रम की भनक तो हाल ही भारत की यात्रा पर आए म्यामांर के उच्च रैंक के कमांडर की भारत यात्रा और यहाँ शीर्ष नेतृत्व के साथ मुलाकात के बाद लगनी शुरू हो गई थी,क्योंकि यह कमांडर अमेरिका के "वीजा बैन"की श्रेणी में थे।


भारत  और रूस संबंधों को नया आयाम

हिन्द महासागर में चीन की लगातार बदलती नौसैन्य नीति और सुरक्षा अर्चिटेक्टर को मद्दनेजर दोनो देशो ने इस मसले पर गज़ब की साझेदारी,आपसी विश्वास और क्षेत्र की रणनीतिक और सामरिक महत्व को "आंखों ही आंखों" में समझ कर एक दूसरे को अपने सबसे भरोसेमंद और नैसर्गिक मित्र होने का परिचय दिया।मिलिट्री हार्डवेयर के मामले और किसी तीसरे देश को बेचने/सौंपने के मामले में भारत अमेरिका के साथ "सोचने "की भी जहमत नहीं कर सकता है। वहीं यह ऐसा दूसरी दफे हो रहा है जब भारत ने रूसी संघ के मिलिट्री हार्डवेयर को "रिफ़र्बिशेड"किया सबसे पहले आईएल 76( IL 76 )में इजरायली अवाक्स सिस्टम को भारत ने "माउंट" किया था।  किलो क्लास सबमरीन(पी 877)जिसे  तत्कालीन सोवियत संघ ने 1980 में भारत को बेचा था,उसे हिंदुस्तान शिपयार्ड  लिमिटेड विशाखापत्तनम ने म्यांमार के नौसेना के आवश्यकतानुसार "रिफर्बिश्ड" रेट्रोफिटिंग, रिफिटिंग,और मॉडर्ननाइज्ड" किया,और भारत डायनामिक्स लिमिटेड ने इसमें नए भारतीय टॉरपीडो  "श्येना"को इस सबमरीन के लिए  बनाया। 
198 मिलियन डॉलर वाले इस लाइन ऑफ क्रेडिट के समझौते के तहत भारत म्यांमार की नौसेना को न सिर्फ सबमरीन प्रदान करेगा,बल्कि उसे क्रू मेंबर,नाविकों और अफसरों को इस सबमरीन को संचालन से जुड़ी तमाम प्रक्रिया में प्रशिक्षित करेगा। यह नई डील भारत की एक्ट ईस्ट नीति के प्रवेशद्वार माने जाने वाले म्यामांर के साथ आपसी संबंधों की दिशा में एक नए युग का शुरुआत होगा,क्योंकि चाहें चीन के साथ इसके गहरे सामरिक और आर्थिक संबंध किसी से छुपे नहीं हैं,इस परिस्थिति में म्यांमार का चीन की तरफ न देखकर भारत से सामरिक सम्बन्ध विकसित करना अपने आप मे एक नए युग सूत्रपात है,जिसे और मजबूत करने की आवश्यकता है।

चीन की नई चाल
स्ट्रिंग ऑफ पर्ल  नीति की धुंधली सफ़लता के बाद चीन ने भारत के पड़ोसी देशों की नौसेना की आधुनिकिकरण कर बीड़ा उठा लिया है।इसी कड़ी में उसने 2017 में अपने पुराने पड़ चुके बेड़े में  "मिंग क्लास' की  टाइप 035G सबमरीन को बांग्लादेश को सौंप था।  रोहिंग्या मसले को लेकर बांग्लादेश और म्यांमार का जहां "छत्तीस का आंकड़ा" है वही ये दोनों देश लंबी स्थल और समुद्री सीमा साझा करते है। चूंकि म्यांमार और बंगलादेश के पास 2017 तक सबमरीन नहीं होने की वजह से दोनों नौसेना एक ही पलड़े पर थी,लेकिन क्षेत्रीय असन्तुलन और आगे बढ़ने की मंशा में निश्चित रूप से बांग्लादेश ने म्यांमार पर मनोवैज्ञानिक नौसैन्य बढ़त हासिल कर ली थी।चीन जहां श्रीलंका और मालदीव के नौसेना को अपग्रेड करने की अपनी कुत्सित नीतियों को अमली जामा पहना रहा है औरअपने इस नीतियों से जहाँ  पूरे हिन्द महासागरीय क्षेत्र में 'मसल फ्लेक्सिबिलिटि"क्षेत्रीय नौसैन्य विषमता और हथियारों की होड़ को बढ़ावा देकर भारत के लिए नई चिंताएं उत्पन्न कर रहा है.
  
रूस की चाहत

 भारत ने रूस के साथ अपनी बेहतर सामरिक समझदारी के साथ  बांग्लादेश के मुकाबले एक सम्मानित नौसैन्य प्रतिष्ठा प्रदान की साथ ही इस क्षेत्र में "रूस की हिंदमहासागर" नीति की पुष्टि कर दी। रूसी राष्ट्रपति व्लदीमिर पुतिन की भारत के साथ मिलकर यह छोटी सी लेकिन "बेहद दूरदर्शितापूर्ण " कार्रवाई  से जहां एक ओर बीजिंग को स्पष्ट संकेत मिला है और दूसरी तरफ इस क्षेत्र में बढ़ती चीनी गतिविधियों को अंकुश लगाने के लिये रूसी इशारा है।
रूस इससे पूर्व भारत के साथ मिलकर बांग्लादेश के रूपपुर में उसके पहले परमाणु बिजली घर के निर्माण कर रहा है,और बांग्लादेश की "मुक्ति" में उसका निर्णायक योगदान रहा था। दरअसल रूस को हिन्द महासागर का गर्म पानी 1971 से ही लुभा रहा है,लेकिन तमाम विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर वह बैकफुट पर ही रहा लेकिन उसे उभरने का मौका मिल रहा है,जिसे पुतिन किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहेंगे।

उच्च विकास दर औऱ ऊर्जा के भूूखे चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  समुद्री पाइरेसी की रोकथाम के लिये निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे

(अगली कड़ी में चीन के वायुसैनिक औऱ थल सैनिक तैयारियों पर  टिप्पणी)


Monday, July 29, 2019

रक्षामंत्री की पहली राजकीय यात्रा,वैश्विक राजनय में अफ्रीका का बढ़ता महत्व


रक्षामंत्री राजनाथ सिंह अपनी पहली विदेश यात्रा की शुरुआत भू सामरिक और भू आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दक्षिण पूर्वी अफ़्रीकी देश मोज़ाम्बिक से आगाज़ किया।

रक्षामंत्री की तीन दिवसीय राजकीय यात्रा में उनके साथ रक्षा और विदेश मंत्रालय का उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के शामिल है जो आज मोज़ाम्बिक  की राजधानी मापुते पहुंचे। यहां मोज़ाम्बिक के शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात करेंगे और प्रवासी भारतीयों को संबोधित करेंगे।इसी यात्रा के मध्य दोनो देशो के मध्य तीन समझौतों पर भी हस्ताक्षर करेंगे।

हिन्द महासागर के दक्षिण पश्चिम किनारे पर अवस्थित मोज़ाम्बिक को 1498 में वास्को डि गामा द्वारा खोजा गए  और 1505 में इसे पुर्तगाली औपनिवेश बना लिया गया। 1975 में इसे आज़ादी मिली ।
मोज़ाम्बिक का स्वेज नहर के शुरू होने से पहले वैश्विक समुद्री व्यापार में अहम स्थान था जो उसके मोज़ाम्बिक चैनल से होकर गुजरता था,वर्तमान में असीमित ऊर्जा स्रोतों(मुख्यतः एलएनजी और प्राकृतिक गैस है) के पता चलने और सी लाइन ऑफ कम्युनिकेशन ,समुद्री सुरक्षा एवं व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा के दृष्टि से यह वैश्विक तप्त स्थल बन चुका है।जिसकी तरफ़ ऊर्जा सुरक्षा के ललायित विश्व के तमाम देश मोज़ाम्बिक की ओर ताक रहे है।

भारत और मोज़ाम्बिक के सम्बंध सदियों से कायम है,पश्चिमी भारत के राज्यो के मोज़ाम्बिक के साथ संबंधों के प्रमाण इतिहास के पन्नो में दर्ज है जो उसके स्वतन्त्रता के साथ राजनयिक आर्थिक,राजनैतिक और सामरिक सम्बन्ध स्थापित हुए और मधुर रहे हैं।

इसी कड़ी में रक्षा मंत्री की पहली विदेश यात्रा के लिए मोज़ाम्बिक को चुना जाना दोनो देशो के रिश्तों की गर्माहट को बयां करता है। इससे पहले अप्रैल1982 में ततत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और जुलाई 2016 में निवर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मोज़ाम्बिक की यात्रा कर दोनों देशों के सम्बंध को नए प्रतिमान पर पहुंचाया।

इससे पहले मोज़ाम्बिक के आज़ादी के बाद  इनके सभी चार राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आ चुके है। इसकी शुरुआत सर्वप्रथम अप्रैल 1982 में राष्ट्रपति सामोरा मचैल,1988 और 2003 में जोआक्विम चिसानो, 2010 में अर्मेन्डो गएबूज़ा और बीते अगस्त 2015 में राष्ट्रपति फिलिप न्यूसी ने भारत की यात्रा की
हिन्द महासागर क्षेत्र में अपने प्रभाव को उच्चस्तर पर बढ़ाये रखने और  SAGAR (सिक्योरिटी ग्रोथ फ़ॉर ऑल इन दी रीजन) डॉक्ट्रिन को मजबूत करते हुए  रक्षा मंत्री की  इस पहली विदेश यात्रा को जोड़ कर देखा जा रहा है। अफ्रीका में चीन की बढ़ती असामान्य सैन्य और अवसंरचनात्मक निवेश और उसकी "डेब्ट ट्रैप डिप्लोमेसी " को बढ़ते प्रभाव को कम करने की दिशा में इस यात्रा के गहरे रणनीतिक और सामरिक निहितार्थ हैं। भारत  हिन्द महासागर क्षेत्र में नैसर्गिक रूप से"फर्स्ट रेस्पांडर" है। 

भारत सम्पूर्ण हिन्द महासागर क्षेत्र को "जोन ऑफ पीस "पहले ही घोषित कर चुका है और इसकी गरिमा  बरकरार रखने को प्रतिबद्ध है। इसी कड़ी में हिन्द महासागर में मोज़ाम्बिक की भौगोलिक अवस्थिति मोज़ाम्बिक बेहद खास बनाती है,इसलिए तो इसे  मलावी,ज़ाम्बिया,ज़िम्बाब्वे, बोत्सवाना, और लेसेथो जैसे उच्चस्तरीय खनिज और अनछुए प्राकृतिक संसाधन से धनी  और भू आवेष्ठित देशों का द्वार कहा जाता है। साथ ही तंज़ानिया और दक्षिण अफ्रीका के साथ अपनी सीमा साझा करते हुए यह भू सामरिक ,सामुद्रिक और ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से बेहद अहम स्थान हो जाता है ।
                      (मैप स्रोत Lonely planet)

इन सभी देशों में चीन ने व्यापक पैमाने पर विभिन्न क्षेत्रों में निवेश किये है,जो उसके अरबों डॉलर महत्वाकांक्षी मल्टी मॉडल मेरीटाइम सिल्क रोड का हिस्सा है। मोज़ाम्बिक के साथ बेहतर  सम्बन्ध का सीधा असर इन लैंड लॉक्ड देशो के संबंध पर पड़ेगा जो पहले से बेहतर है। मोज़ाम्बिक के साथ ये देश भी भारत से वे तमाम सुविधायें हासिल कर सकते है। भारत मोज़ाम्बिक के विस्तृत तट की चौबीसों घंटे सुरक्षा प्रदान करने की दिशा में मोज़ाम्बिक नौसेना को भारत के तरफ से फ़ास्ट अटैक इनटरसेप्टेर पोत भेंट करेंगे

ग्वादर से जिबूती तक विस्तार कर रही चीन की  पीपुल्स लिबरेशन आर्मी नेवी  की हिन्द महासागर क्षेत्र में बढ़ती असामान्य गतिविधि भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय है। चीन ने हालिया सुरक्षा पर जारी अपने नवीनतम श्वेत पत्र "नए युग में चीन की राष्ट्रीय सुरक्षा" शीर्षक में स्पष्ट किया है कि चीन विदेशों में अब और भी सैन्य अड्डे बनाएगा,जिबूती और अदन की खाड़ी में सक्रिय चीनी नौसेना की उपस्थिति निश्चित रूप से भारत के लिए चिंताजनक है।
वर्तमान भूआर्थिकी के निरंतर बदलते घटनाक्रम में मोजाम्बिक के साथ के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत बनाना वक़्त का तक़ाज़ा बन गया है क्योंकि चीन अपने पश्चिम एशिया और पूर्वी तटीय अफ्रीकी देशों के साथ अपनी नीतियों में को आक्रमक रवैया अख़्तियार किये हुए है। ये वही क्षेत्र है जहां से  चीन की  ऊर्जा और संसाधन के शिपमेंट की शुरुआत होती है। केन्या,सूडान,तंज़ानिया और मोज़ाम्बिक के बंदरगाह अवसंरचना को  को  अपने परित्यक्त  "पीसफुल राइज"नीतियों को  इन विकासात्मक कार्यो में झोंक रहा है। पीपुल्स लिबरेशनआर्मी नेवी पश्चिमी हिन्द महासागर में भी  अपना प्रभाव बढ़ा रही है।भारत को  बदलते भू  रणनीतिक पहलुओं पर गंभीरता से ध्यान देते जरूरत है। जिसमें मोज़ाम्बिक भारत का एक बेहतर सझीदार देश बन सकता है।

अपने इस यात्रा के दौरान रक्षा मंत्री क्षेत्र  भारत की भूमिका को और जवाबदेह,जिम्मेदार,सशक्त और प्रभावी भूमिका को बरकरार रखने के क्रम में  मोज़ाम्बिक के साथ तीन अहम समझौतों पर हस्ताक्षर करेंगे जिसमे 

1.अनन्य आर्थिक क्षेत्र पर निगरानी
2.व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन सूचना की साझेदारी और
3 हाईड्रोग्राफी के क्षेत्र में  समझौता शामिल हैं

इसके अतिरिक्त भारत मोज़ाम्बिक को नौसैन्य सहायता प्रदान करेगा। व्हाइट शिपिंग इन्फॉर्मेशन सूचना की साझेदारी के  जरिये भारत को व्यव्यसायिक और गैर सैन्य व्यापारिक पोतों के बारे  उनकी पहचान और मूवमेंट से जुड़ी आवश्यक और जरूरत की सूचना मिल सकेगी।
इन  समझौतों के बाद जहां दोनो देशो के मध्य द्विपक्षीय संबंध मजबूत होंगे वहीं दूसरी तरफ इसके सामरिक आयाम भी नजर आएंगे । मोज़ाम्बिक के साथ इन समझौतों के साथ ही भारत चीनी हरकतों को प्रभावी रूप से मॉनिटरिंग कर सकेगा। भारत पहले भी मोज़ाम्बिक को अपने भारतीय आयात निर्यात निगम (इसीजीसी)के जरिये रियायती लाइन ऑफ क्रेडिट के रूप में सहायता मुहैया कराते रहा है जो 2010 में 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर का था 2016 में मोज़ाम्बिक के  व्यापार और उद्योग मंत्रालय को  सूखे प्रभावित इलाकों में गेंहू खरीदने के लिए 10 मिलियन अमेरिकी डॉलर के रूप में विकासात्मक सहायता दी गई जबकि   100 टन दवाएं भी इन क्षेत्रों में भेजी गई।
समुद्री पायरेसी रोकथाम के नाम पर  चीन की नौसेना ने इस क्षेत्र में  अपने निर्देशित मिसाइल विध्वंसक, पनडुब्बी, और फ्रिगेट्स के तैनाती के खबरों के बीच यह जरूरी  है कि भारतीय नौसेना अपने "फ़ोर्स प्रोजेक्शन" और" ब्लू वाटर नेवी"की संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान करते हुए इस क्षेत्र को ज़ोन ऑफ पीस में बरकरार रखे  और अफ्रीका में चीन के 'न्यू ग्रेट गेम" बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव को भारत  अपनी "कॉटन रोड अप्रोच" से प्रतिसन्तुलित कर सकता है।

अफ्रीका के पश्चिमी हिन्द महासागर क्षेत्र प्राकृतिक संसाधन ऊर्जा सुरक्षा की दृष्टि से सम्पन्न है ।
वेस्टर्न इंडियन मरीन साइंस एसोसिएशन(WIOMSA)के  अनुसार इसमे कुल दस देश शामिल हैं ये हैं  सोमालिया,केन्या,तंजानिया,मोज़ाम्बिक, दक्षिण अफ्रीका, कोमोरोस, मेडागास्कर,सेशेल्स, मॉरिशस,और रीयूनियन जो 'हॉर्न ऑफ अफ्रीका से दक्षिण अफ्रीका  के तट तक विस्तारित है। यहां भारत के लिए  मौका है कि वह मेरीटाइम सिक्योरिटी के क्षेत्र में व्यापक पहुंच बनाये। अफ्रीका के 54 देशों में 38 देश या तो तटीय  या फिर द्वीपीय देश है जिनकी कुल तटीय सीमा 18950 नॉटिकल मील/30,497 किलोमीटर है। अफ्रीका का लगभग 90 फीसद व्यापार समुद्री मार्ग से होता है। भारत अफ्रीका के इन देशो के साथ भारत "ब्लू इकॉनमी"  के क्षेत्र में जिम्मेदार साझेदार बनने की प्रतिबद्धता जाहिर कर चुका है। प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय राष्ट्रध्वज के नीले चक्र को इस "ब्लू इकोनॉमी"के रूप में जोड़ चुके हैं।भारत  के साथ इन सभी देशों के साथ सैन्य और रणनीतिक संबंध है,इसी क्रम में बीते मार्च में पुणे स्थित औंध मिलिट्री स्टेशन में मोज़ाम्बिक सहित 16 अफ्रीकी देशो ने भारत के साथ(Africa India field training  exercise) AFINDEX 19 को सफलतापूर्वक अंजाम दिया था।

भारत के लिए अफ्रीका का महत्व।
भारत के लिए अफ्रीका कितना महत्वपूर्ण इसका सहज अनुमान 28 जुलाई से शुरू होने वाली राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की सप्ताह भर की तीन देशों की यात्रा  जिसमे  बेनिन,गिनी कोनाकरे और गैम्बिया कि यात्रा और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की मोज़ाम्बिक यात्रा के कार्यक्रम से लगाया जा सकता है।
भारत इस क्षेत्र में न सिर्फ व्यापार,सैन्य सहायता,क्षमता निर्माण ,प्रशिक्षण सहायता औऱ सुरक्षा के लिए ही मौजूद है,बल्कि भारत की जिम्मेवारी इनसे कहीं व्यापक है जिसकी एक झलक पूरी दुनिया ने बीते 15 मार्च को कैटेगरी चार स्तर के विनाशकारी  उष्णकटिबंधीय साइक्लोन "ईडाई' के कहर से पूरी तरह तबाह हुए मोज़ाम्बिक के तटीय शहर' "बेरिया"की सहायता के लिए मोज़ाम्बिक सरकार के आग्रह पर भारतीय नौसेना ने त्वरित कार्रवाई करते हुए जान माल के नुकसान को सीमित किया। इस क्षेत्र से अपने प्रशिक्षण मिशन अंजाम देकर को वापस लौट रहे भारतीय नौसेना के तीन पोत  आईएनएस "सुजाता"और "शार्दूल" और भारतीय तटरक्षक के पोत "सारथी'ने फौरन पहुंचकर "मानवीय सहायता और आपदा बचाव "और "सर्च और रेस्क्यू"अभियान को पेशेवर और प्रभावी तरीके से अंजाम देते हुए माली नुकसान को काफी सीमित  किया,इस क्षेत्र में समय रहते न पहुँचने पर स्थिति पूरी तरह हाथ से निकल सकती थी। भारतीय नौसेना ने समय पर पहुंच सामान्य स्थिति बहाल करने और मोज़ाम्बिक के जनमानस में अपनी उल्लेखनीय छवि का निर्माण किया और सरकार से अपनी प्रशंसनीय भूमिका निभाने के लिए  भारत के ध्वज को शिरोधार्य रखा। इससे पहले 2015 में नई दिल्ली में आयोजित भारत अफ्रीका फोरम में इस महादेश के सभी 54 देशों ने शिरकत कर भारत के साथ अपने सुमधुर सम्बन्ध की मुहर पहले ही लगा चुके थे।