जम्मू कश्मीर राज्य के उड़ी में रविवार 18 सितम्बर के अलसुबह हुए सेना के 12वीं ब्रिगेड के मुख्यालय पर हुए फ़िदायीन हमले के बाद देश के जनमानस,राजनीति और मीडिया में उठे ववाल आरोप प्रत्यारोप और घटना के जिम्मेदार देश पर सैन्य कार्रवाई के मांग जो जनता के नजरिये से जायज़ है ,मैं जनमानस के राष्ट्रप्रेम और सैनिकों के शहादत और सर्वोच्च बलिदान को शत शत नमन और कोटि कोटि वंदन करता हूँ। पर इन सब के बीच यहाँ यह समझना बेहद जरुरी है कि हम गाहे बगाहे 'surgical attack' /"इन्फेंट्री अटैक"/बिना सीमा पार किये मिसाइल से हमला/ब्रह्मोस मिसाइल का प्रयोग/covert opp.को यूँ ही अंजाम नहीं दे सकते है ।
क्योंकि इसके लिए सैन्य हलकों में एक विशेष प्रकार की स्टैण्डर्ड आपरेशन प्रोसिजर(SOP) होता है जो मीडिया ,राजनीतिक दल,और आम जनमानस के समझ से व्यापक होता है क्योंकि इस तरह की कार्रवाई का चरित्र हमारे समझ से परे और हाँ, यह 'पूरी तरह गुप्त 'होता होता है।इसे सेना अपने उच्च पेशेवर अंदाज़ में अपने हिसाब से अंजाम देती है। इसमें निश्चित रूप से समय लगता है।यह "कोई चट मंगनी और पट ब्याह"वाली स्थिति नहीं होती है।
इसका एक वाकया देखिये
9/11 WTC के ट्विन टावर पर विमानों के टक्कर मारने के घटना के बाद अमेरिका जैसी महाशक्ति ने भी 10/11 या 20/11को ओसामा बिन लादेन और उसके पनाहगार तालिबान पर सीधा हमला नहीं बोला दिया था।पहले उसने अपने तमाम संसाधनों और वैश्विक मंचो पर "war against terrorism''को अमली जामा पहनाया ,राजनयिक पहलों के साथ देशो के साथ लामबंदी ,अपनी पूरी सैन्य संगठन और आयुध को युद्ध के लिए दुरुस्त किया और फिर सही वक़्त ,मौसम और जमीनी हालात को समझ कर हवाई और नौसैनिक पोत से मिसाइल हमले से शुरुआत की। उस देश पर जिसके वायुसेना के नाम पर रद्दी और पुराने पड़ चुके जहाज़ थे। जिसकी अंतिम परिणति "ऑपेरशन जेरेनिमो"के रूप में एबटाबाद में देखने को मिली।
भारत के लिहाज से यह खास हो जाता है कि पहले हमें यह समझना चाहिए कि हम अमेरिका या इजराइल नहीं है ।इन दोनों देशों के भौगोलिक परिस्थितियां ,सैन्य संरचना,जरूरतें,और पीठ पीछे की सहायता, भारतीय जरूरतों से बिलकुल भिन्न है।
हम इन दोनों देशों के आतंकवाद विरोधी/निरोधी मॉडल को भारतीय मॉडल में मिला कर अपनी आवश्यकता को जरूर पूरी कर सकते है और जरुरत पड़ने पर करते भी हैं लेकिन कोई हमें कहे की 'हम "इजराइल "की तरह व्यवहार करे तो भारतीय परिस्थिति में यह तर्कसंगत नहीं है।इसमें कोई दो राय नहीं की इजराइल की आतंकवाद निरोधी कार्यप्रणाली दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रणालियों में एक है ,जिसका कोई तोड़ नहीं है लेकिन यह इजराइल को उसके परिस्थितियों के अनुसार 'सूट' करता है। इसलिए "हम बात बात पर आतंकवाद के खिलाफ इस्रायली मॉडल"पर अपना गला न फाड़े तो बेहतर होगा।
यहां इस बात का खास ख्याल रखना होगा की इस घटना के बाद सेना को अपने अभियान में पैनापन लाने और उसे "प्रभावकारी रूप" से अंजाम देने के लिए जरुरी और "पूरी छूट" अवश्य दिया जाना चाहिए जिस पर कोई राजनितिक हस्तक्षेप नहीं होनी चाहिए और न कोई राजनीतिक टीका टिप्पणी ।
"सेना को जो उचित लगेगा वह करेगी "और उसके अभियान के जो भी परिणाम हो उनकी जिम्मेवारी हमारे राजनितिक नेतृत्व की होगी। चूँकि हमारे साथ राजनयिक और कूटनयिक प्रयासों और मध्यस्थों का तड़का के साथ "डेटेरेन्ट" और "स्ट्राइक" पावर दोनों ही मौजूद है। जिसका फायदा हमें आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध में करना चाहिए।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को चाहिए की वे पूरी शिद्दत और आक्रमकता के साथ विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर ''आतंक के उत्पादक और पनाहगार "के चेहरे को बेनकाब कर उसका असली चेहरा उनकर तथाकथित"आका''और उनके " सदाबहार"धृतराष्ट्र बने उनके मित्र को दिखाएं और जरुरत पड़े तो उनकी आँखों में "Dialates"या पूर्ण स्वदेशी" नेत्रबिन्दु' और "दृष्टि"eye ड्राप जरूर डालें।
#Uri Attack की इस कायराना हरकतों ने हमें एक बार फिर से आत्ममंथन करने और इस तरह की घटना भविष्य में दोबारा न हो इसके लिए कड़ी और प्रभावकारी कार्रवाई करने मौका दिया है जिससे हम अपने नागरिकों और दुनिया को बता सकें की सही मायने में "संप्रभुता" सिर्फ किताबों में ही नहीं हक़ीक़त में भी दिखाई देती है।
प्रचंड और प्रभावी बहुमत और जनता के पूरे विश्वास के प्रतीक के रूप में वर्तमान सरकार के पास अपनी संप्रभुता की रक्षा करने की पूरी शक्ति है ।
उन्हें न ' पोटोमैक', न 'टेम्स',न 'मस्कोवा' ,न सीन,और न 'ह्वांग हो ',
से मंत्रणा, विचार -विमर्श और परामर्श लेने की आवश्यक्ता है और न ही बताने की ,कि हम क्या करने वाले है ?और क्या करेंगे और "कहाँ और कब" करेंगे।
अगर बहुत लगे तो अपने पुराने,विश्वासी और सदाबहार मित्र से मंत्रणा करें और वे अगर आपके साथ दें तो ठीक नहीं तो दूर से ही राम सलाम।हालाँकि उम्मीद है वे पहले की तरह हमारे साथ ही रहेंगे जिसका संकेत उन्होंने Dhruzhba 2016 को रद्द कर हमें दे दिया है।
यहाँ सवाल यह उठता है हम जनमानस को "सेकंड एंड रिटेलिएटरी स्ट्राइक कैपेबिलिटी"और" कोल्ड स्टार्ट" डॉक्ट्रिन कैसे समझाएं । लेकिन उन्हें समय की मांग के अनुसार समझना पड़ेगा।
वे तो बस एक के बदले 10 की मांग कर रहे है।
माना कि जंग और प्यार में सब जायज़ है लेकिन रणनीति भी कोई चीज़ होती है जिसके आभाव में जीती बाज़ी भी हाथ से निकल जाती है।
सैन्य हलकों में कहा भी जाता है "अभ्यास में जितना पसीना बहाओगे जंग के मैदान में उतना ही कम ख़ून बहाना पड़ेगा"
"यमुना"और 7,RCR इस मसले बेहद संजीदगी और उच्च प्राथमिकता के साथ इस पर अमल कर क्योंकि "सभी संभावित विकल्प" हमारे पास मौजूद है।
इस मसले पर जनमानस और प्रतिपक्ष सरकार के साथ है।इसलिए "प्रभावी"और "भयादोहन" तो बनता है।
परमाणु शस्त्रों के उपयोग करने की उनकी कोरी धमकी के बहकावे में आये बिना उन्हें बताइये की "क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.....," उन्हें अच्छी तरह अपनी "औकात" 'जद' "क्षमता और सीमा" पता है।इसलिए वे क्षेत्र में भय का माहौल उत्पन्न कर रहे हैं।उन्हें अच्छी तरह पता है कि "प्रथम परमाणु हमले' का क्या परिणाम होता है ।
आज जरुरत इस बात की है कि भारतीय नेतृत्व खुलकर और पूरी आक्रामकता के साथ अपनी बात विश्वमंच पर रखें और कहे "या तो मेरे साथ या फिर मेरे खिलाफ".आज मौका भी है और दस्तूर भी संयुक्त राष्ट्र का सालाना जलसा शुरू होने वाला है ।पड़ोसी के "वजीर ए आज़म" रावलपिंडी से लिखे गए झूठ और मक्कार के चिठ्ठे और अपनी पुरानी घिसी पिटी दलील मंच पर पेश करेंगे।उधर दुनिया के पुलिसमैन की हालत डावांडोल न्यूयॉर्क अशांत है ,सीरिया में युद्धविराम के दिन आज पूरे हुए है, उनके जंगी तैयारों का निशाना गलत जगह लग रहा है जिससे सीरियाई सैनिक और अफ़ग़ानी पुलिसवाले मारे जा रहे है उन्हें मित्र और शत्रु में कोई भेद नज़र ही नहीं आ रहा है।
भारत को चाहिए ही इस मंच पर स्वर्गीय ह्यूगो चावेज़ और फिदेल कास्त्रो की तरह पहले मंच को कब्जाए और "हिंदी अंग्रेजी उर्दू , बलूची,पश्तो और दारी' के साथ साथ "Sign लैंग्वेज' में भी अपना वक्तव्य पेश करने के बाद ही मंच छोड़े ।चिंता न करें वहां कोई "मार्शल "नहीं होता है। उम्मीद है हमारे पड़ोसियों को इनमे कोई भाषा तो समझ में जरूर आएगी और नहीं आई तो फिर पांचवी बार पिटेंगे और छठी बार नक़्शे पर दिखाई देंगे की नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है,पर हाँ वे "हड़प्पा और मोहनजोदड़ो "की श्रेणी में अवश्य आ जाएंगे।
फिर देखिये इनकी घिग्गी कैसे बनती है और हां ,आज हम 1999 की स्थिति से पूरी तरह अलग है और हमारे पास चुनी हुई लोकतान्त्रिक और राजनितिक रूप से स्थायी सरकार है। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि हमें
किसी " -------adminstration/प्रशासन"के पास जाने की या उनकी बात/सुझाव/सलाह मानने की किसी भी रूप में आज के हालिया समय में जरुरत है।
#Udi Attack के जिम्मेदार "Actor/State Sponsored Actor/preparators" को सख्त से सख्त सज़ा देना उनके 'structure'और ''Superstcture"को नेस्तनाबूद करना।
आर्थिक ,राजनीतिक,सामाजिक और राजनयिक रूप/मंचो पर उनके दोहरे(माफ़ कीजियेगा उनके DNA के"दोगले ")चरित्र को उज़ागर करना और उन्हें स्थल ,नभ,जल के साथ जरूरत पड़े तो अंतरिक्ष से भी उनपर प्रहार कर के उनके मंसूबो को नाकाम करना।
सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर बेलगाम बहस और सुझाव के बीच हमें एक जिम्मेदार नागरिको की भांति सरकार के कदमो का समर्थन करना चाहिये ।
विदेश नीति और सैनिक कार्रवाई का अपना अपना एक तौर तरीका होता है।सैन्य विकल्प हमेशा से ही अंतिम विकल्प के रूप में होता है जिसे हम1971 bangladesh मुक्ति संग्राम में देख चुके है इसे ही आज़माना चाहिए।"जमीन और वक्त हम तय करेंगे" यह वर्तमान समय में सबसे उचित विकल्प है।
एक प्रसिद्ध चीनी सामरिक कहावत का सार है "जंग में अपना कम से कम नुकसान कर शत्रु को युद्ध के हर मोर्चे पर सफाया करना ही सच्ची जीत है"
भास्कर
20 सितम्बर 2016
क्योंकि इसके लिए सैन्य हलकों में एक विशेष प्रकार की स्टैण्डर्ड आपरेशन प्रोसिजर(SOP) होता है जो मीडिया ,राजनीतिक दल,और आम जनमानस के समझ से व्यापक होता है क्योंकि इस तरह की कार्रवाई का चरित्र हमारे समझ से परे और हाँ, यह 'पूरी तरह गुप्त 'होता होता है।इसे सेना अपने उच्च पेशेवर अंदाज़ में अपने हिसाब से अंजाम देती है। इसमें निश्चित रूप से समय लगता है।यह "कोई चट मंगनी और पट ब्याह"वाली स्थिति नहीं होती है।
इसका एक वाकया देखिये
9/11 WTC के ट्विन टावर पर विमानों के टक्कर मारने के घटना के बाद अमेरिका जैसी महाशक्ति ने भी 10/11 या 20/11को ओसामा बिन लादेन और उसके पनाहगार तालिबान पर सीधा हमला नहीं बोला दिया था।पहले उसने अपने तमाम संसाधनों और वैश्विक मंचो पर "war against terrorism''को अमली जामा पहनाया ,राजनयिक पहलों के साथ देशो के साथ लामबंदी ,अपनी पूरी सैन्य संगठन और आयुध को युद्ध के लिए दुरुस्त किया और फिर सही वक़्त ,मौसम और जमीनी हालात को समझ कर हवाई और नौसैनिक पोत से मिसाइल हमले से शुरुआत की। उस देश पर जिसके वायुसेना के नाम पर रद्दी और पुराने पड़ चुके जहाज़ थे। जिसकी अंतिम परिणति "ऑपेरशन जेरेनिमो"के रूप में एबटाबाद में देखने को मिली।
भारत के लिहाज से यह खास हो जाता है कि पहले हमें यह समझना चाहिए कि हम अमेरिका या इजराइल नहीं है ।इन दोनों देशों के भौगोलिक परिस्थितियां ,सैन्य संरचना,जरूरतें,और पीठ पीछे की सहायता, भारतीय जरूरतों से बिलकुल भिन्न है।
हम इन दोनों देशों के आतंकवाद विरोधी/निरोधी मॉडल को भारतीय मॉडल में मिला कर अपनी आवश्यकता को जरूर पूरी कर सकते है और जरुरत पड़ने पर करते भी हैं लेकिन कोई हमें कहे की 'हम "इजराइल "की तरह व्यवहार करे तो भारतीय परिस्थिति में यह तर्कसंगत नहीं है।इसमें कोई दो राय नहीं की इजराइल की आतंकवाद निरोधी कार्यप्रणाली दुनिया की सर्वश्रेष्ठ प्रणालियों में एक है ,जिसका कोई तोड़ नहीं है लेकिन यह इजराइल को उसके परिस्थितियों के अनुसार 'सूट' करता है। इसलिए "हम बात बात पर आतंकवाद के खिलाफ इस्रायली मॉडल"पर अपना गला न फाड़े तो बेहतर होगा।
यहां इस बात का खास ख्याल रखना होगा की इस घटना के बाद सेना को अपने अभियान में पैनापन लाने और उसे "प्रभावकारी रूप" से अंजाम देने के लिए जरुरी और "पूरी छूट" अवश्य दिया जाना चाहिए जिस पर कोई राजनितिक हस्तक्षेप नहीं होनी चाहिए और न कोई राजनीतिक टीका टिप्पणी ।
"सेना को जो उचित लगेगा वह करेगी "और उसके अभियान के जो भी परिणाम हो उनकी जिम्मेवारी हमारे राजनितिक नेतृत्व की होगी। चूँकि हमारे साथ राजनयिक और कूटनयिक प्रयासों और मध्यस्थों का तड़का के साथ "डेटेरेन्ट" और "स्ट्राइक" पावर दोनों ही मौजूद है। जिसका फायदा हमें आतंक के ख़िलाफ़ युद्ध में करना चाहिए।
विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को चाहिए की वे पूरी शिद्दत और आक्रमकता के साथ विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मंचो पर ''आतंक के उत्पादक और पनाहगार "के चेहरे को बेनकाब कर उसका असली चेहरा उनकर तथाकथित"आका''और उनके " सदाबहार"धृतराष्ट्र बने उनके मित्र को दिखाएं और जरुरत पड़े तो उनकी आँखों में "Dialates"या पूर्ण स्वदेशी" नेत्रबिन्दु' और "दृष्टि"eye ड्राप जरूर डालें।
#Uri Attack की इस कायराना हरकतों ने हमें एक बार फिर से आत्ममंथन करने और इस तरह की घटना भविष्य में दोबारा न हो इसके लिए कड़ी और प्रभावकारी कार्रवाई करने मौका दिया है जिससे हम अपने नागरिकों और दुनिया को बता सकें की सही मायने में "संप्रभुता" सिर्फ किताबों में ही नहीं हक़ीक़त में भी दिखाई देती है।
प्रचंड और प्रभावी बहुमत और जनता के पूरे विश्वास के प्रतीक के रूप में वर्तमान सरकार के पास अपनी संप्रभुता की रक्षा करने की पूरी शक्ति है ।
उन्हें न ' पोटोमैक', न 'टेम्स',न 'मस्कोवा' ,न सीन,और न 'ह्वांग हो ',
से मंत्रणा, विचार -विमर्श और परामर्श लेने की आवश्यक्ता है और न ही बताने की ,कि हम क्या करने वाले है ?और क्या करेंगे और "कहाँ और कब" करेंगे।
अगर बहुत लगे तो अपने पुराने,विश्वासी और सदाबहार मित्र से मंत्रणा करें और वे अगर आपके साथ दें तो ठीक नहीं तो दूर से ही राम सलाम।हालाँकि उम्मीद है वे पहले की तरह हमारे साथ ही रहेंगे जिसका संकेत उन्होंने Dhruzhba 2016 को रद्द कर हमें दे दिया है।
यहाँ सवाल यह उठता है हम जनमानस को "सेकंड एंड रिटेलिएटरी स्ट्राइक कैपेबिलिटी"और" कोल्ड स्टार्ट" डॉक्ट्रिन कैसे समझाएं । लेकिन उन्हें समय की मांग के अनुसार समझना पड़ेगा।
वे तो बस एक के बदले 10 की मांग कर रहे है।
माना कि जंग और प्यार में सब जायज़ है लेकिन रणनीति भी कोई चीज़ होती है जिसके आभाव में जीती बाज़ी भी हाथ से निकल जाती है।
सैन्य हलकों में कहा भी जाता है "अभ्यास में जितना पसीना बहाओगे जंग के मैदान में उतना ही कम ख़ून बहाना पड़ेगा"
"यमुना"और 7,RCR इस मसले बेहद संजीदगी और उच्च प्राथमिकता के साथ इस पर अमल कर क्योंकि "सभी संभावित विकल्प" हमारे पास मौजूद है।
इस मसले पर जनमानस और प्रतिपक्ष सरकार के साथ है।इसलिए "प्रभावी"और "भयादोहन" तो बनता है।
परमाणु शस्त्रों के उपयोग करने की उनकी कोरी धमकी के बहकावे में आये बिना उन्हें बताइये की "क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो.....," उन्हें अच्छी तरह अपनी "औकात" 'जद' "क्षमता और सीमा" पता है।इसलिए वे क्षेत्र में भय का माहौल उत्पन्न कर रहे हैं।उन्हें अच्छी तरह पता है कि "प्रथम परमाणु हमले' का क्या परिणाम होता है ।
आज जरुरत इस बात की है कि भारतीय नेतृत्व खुलकर और पूरी आक्रामकता के साथ अपनी बात विश्वमंच पर रखें और कहे "या तो मेरे साथ या फिर मेरे खिलाफ".आज मौका भी है और दस्तूर भी संयुक्त राष्ट्र का सालाना जलसा शुरू होने वाला है ।पड़ोसी के "वजीर ए आज़म" रावलपिंडी से लिखे गए झूठ और मक्कार के चिठ्ठे और अपनी पुरानी घिसी पिटी दलील मंच पर पेश करेंगे।उधर दुनिया के पुलिसमैन की हालत डावांडोल न्यूयॉर्क अशांत है ,सीरिया में युद्धविराम के दिन आज पूरे हुए है, उनके जंगी तैयारों का निशाना गलत जगह लग रहा है जिससे सीरियाई सैनिक और अफ़ग़ानी पुलिसवाले मारे जा रहे है उन्हें मित्र और शत्रु में कोई भेद नज़र ही नहीं आ रहा है।
भारत को चाहिए ही इस मंच पर स्वर्गीय ह्यूगो चावेज़ और फिदेल कास्त्रो की तरह पहले मंच को कब्जाए और "हिंदी अंग्रेजी उर्दू , बलूची,पश्तो और दारी' के साथ साथ "Sign लैंग्वेज' में भी अपना वक्तव्य पेश करने के बाद ही मंच छोड़े ।चिंता न करें वहां कोई "मार्शल "नहीं होता है। उम्मीद है हमारे पड़ोसियों को इनमे कोई भाषा तो समझ में जरूर आएगी और नहीं आई तो फिर पांचवी बार पिटेंगे और छठी बार नक़्शे पर दिखाई देंगे की नहीं यह कहना थोड़ा मुश्किल है,पर हाँ वे "हड़प्पा और मोहनजोदड़ो "की श्रेणी में अवश्य आ जाएंगे।
फिर देखिये इनकी घिग्गी कैसे बनती है और हां ,आज हम 1999 की स्थिति से पूरी तरह अलग है और हमारे पास चुनी हुई लोकतान्त्रिक और राजनितिक रूप से स्थायी सरकार है। इसलिए मुझे नहीं लगता है कि हमें
किसी " -------adminstration/प्रशासन"के पास जाने की या उनकी बात/सुझाव/सलाह मानने की किसी भी रूप में आज के हालिया समय में जरुरत है।
#Udi Attack के जिम्मेदार "Actor/State Sponsored Actor/preparators" को सख्त से सख्त सज़ा देना उनके 'structure'और ''Superstcture"को नेस्तनाबूद करना।
आर्थिक ,राजनीतिक,सामाजिक और राजनयिक रूप/मंचो पर उनके दोहरे(माफ़ कीजियेगा उनके DNA के"दोगले ")चरित्र को उज़ागर करना और उन्हें स्थल ,नभ,जल के साथ जरूरत पड़े तो अंतरिक्ष से भी उनपर प्रहार कर के उनके मंसूबो को नाकाम करना।
सोशल मीडिया के प्लेटफार्म पर बेलगाम बहस और सुझाव के बीच हमें एक जिम्मेदार नागरिको की भांति सरकार के कदमो का समर्थन करना चाहिये ।
विदेश नीति और सैनिक कार्रवाई का अपना अपना एक तौर तरीका होता है।सैन्य विकल्प हमेशा से ही अंतिम विकल्प के रूप में होता है जिसे हम1971 bangladesh मुक्ति संग्राम में देख चुके है इसे ही आज़माना चाहिए।"जमीन और वक्त हम तय करेंगे" यह वर्तमान समय में सबसे उचित विकल्प है।
एक प्रसिद्ध चीनी सामरिक कहावत का सार है "जंग में अपना कम से कम नुकसान कर शत्रु को युद्ध के हर मोर्चे पर सफाया करना ही सच्ची जीत है"
भास्कर
20 सितम्बर 2016