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Wednesday, April 24, 2013

"दिलदार दिल्ली" या दागदार दिल्ली


 निर्भया" घटना के जख्म सूखे भी नहीं थे दिल्ली  के गांधीनगर में पांच वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार की घटना ने "दिलदार दिल्ली" को दानव और दागदार दिल्ली में तब्दील कर दिया। 
यह शहर एक बार  फिर  अपने एक नाकारे नागरिक की वजह से शर्मशार हुआ है उसकी  इस जघन्य,वीभत्स,बर्बर और अमानविक घटना ने पूरी दिल्ली को दागदार किया है। इस घटना को  स्वस्थ समाज में कभी भी, किसी कीमत पर बर्दास्त नहीं किया जा सकता है। इस घटना की जितनी भी निंदा की जाए वह न्यूनतम होगी।
उस बलात्कारी के  पाशविक मानसिकता का अंदाजा बच्ची के इलाज कर रहे डॉक्टरों के बयान से लगाया जा सकता है जिन्होंने उसके शरीर से मोमबत्ती और बोतल बरामद की है
 हमारे समाज में घटित यह सब घटनाएं हमारी नीतिगत खामियां को दर्शाती है,सरकार व न्यायपालिका  के लचर रवैय्ये से भी अपराधियों में  क़ानून का डर जेहन से  समाप्त हो रहा है।
अपराधियों को लगता है कि वे अपराध करने के बाद भी  वे बच जायेंगे 

आज जरूरत न सिर्फ माँ  को शिक्षित करने की है ,क्यूंकि वह किसी भी बच्चे की पहली शिक्षक होती है,हमे शिक्षा व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन की सख्त जरूरत है।बदलते समय के मुताबिक अपने बच्चे को जागरूक करे,परिजनों को चाहिए कि अपने बच्चों के बदलते व्यवहार पर पैनी नजर रखे , अगर कुछ संदेह और गलत महसूस होता है तो मामले को सख्ती से निपटायें।
 जरूरत इस बात की भी है कि उपलब्ध  मौजूदा कानूनों  का अनुपालन सख्ती के साथ और सही तरीके  से किया जाये।
कानून व्यवस्था तो राज्य का विषय है और इस तंत्र  को राज्य की  पुलिस द्वारा क्रियान्वित  किया जाता है। इस तरह के घटनाओं  से बचने के लिए पुलिस प्रशासन  को चाक चौबंद और सुधारों  पर तुरंत कड़े कदम उठाने होंगे।
पुलिस  का मतलब तो "'पुरुषार्थ  लिप्स्यारहित  और सहायक"  होती है , लेकिन क्या इस घटना के बाद इस तंत्र को हम इस मतलब  में रख सकते हैं ?

सवाल यहाँ तो  कम्युनिटी  और मोरल  पुलिसिंग  पर ऊठते  है ,अपने को  "आपके साथ आपके  लिए-- हमेशा''  कहने वाली दिल्ली पुलिस  के लिए तो  उसकी यह  मोटो कतई सटीक नहीं बैठती। 
इस मामले में दिल्ली पुलिस ने  जिस बेशर्मी और गैरजिम्मेदाराना तरीके से  मामले को देखा और परखा है उससे तो उसकी मानवीय संवेदना की बात करना बेमानी होगी।
 इस घटना पर विरोध  दायर कर रहे प्रदर्शनकारी बच्ची  पर दिल्ली पुलिस  के वरीय अधिकारी बी एस अहलावत   द्वारा प्रदर्शनकारी लड़की के कान पर जोरदार थप्पड़ मार,उसके कान से खून निकाल कर अपनी असंवेदनशीलता और गैरजिम्मेदार अधिकारी   के रूप में   अपना और अपने विभाग का परिचय तो दिया ही। इससे तो लोगों में पुलिस  के प्रति रहा सहा विश्वास  उठ जाए तो किसी को कोई आपत्ति  नहीं होनी चाहिए।
  आज वक्त आ गया है की हम आप अपने नैतिकता को न छोड़ें। सरकार और न्यायपालिका की यह नैतिक जिम्मेदारी  है की वह इस तरह के घृणित वहशी  और कामांधपूर्ण  अपराध के लिए गुनाहगार दोषियों को  कड़ी से कड़ी उचित सजा एक लघु अविधि में दिलाये।
जिससे इस तरह की दरिंदगी  से संपूर्ण समाज  को बचाया जा  सके।
और इस तरह के नीतिगत  फैसलों से आम जनता  में सरकार, कानून और न्यायव्यवस्था के प्रति  विश्वास बरकरार  रहेगा  .....  अन्यथा  लोग कानून  को अपने हाथ में ले लेंगे और हमारा  राजपथ  अगर ""तहरीर चौक"" बन जाए तो किसी को कोई  आपत्ति नहीं होनी चाहिए.